(ये कविता मैंने अशोकदा की 'जब सोती होंगी सुंदर लड़कियां' सुनने के बाद खुंदक में आ कर लिखी थी सालों पहले, मतलब सालों पुराना कबाड़ निकाला गया है)
लड़कियों के लंबे बालों
और गुलाबी होंठों पर लिखी
कविता या गज़ल
बेमतलब नहीं होती
लेकिन बेमायनी हो जाती है तब
जब वो उलझ कर रह जाती है
लङकी की खूबसूरती पर
जब लड़कियां हँसती हैं
तो अच्छी लगती हैं
अक्सर कविताऒं में
लड़कियों की खिलखिलाहट
पहाड़ी नदियों की मानिंद होती है
उसे सिरफ दो इंची मुस्कराहट के
मुलम्मे में मत ढक जाने दो
रोते हुए भी लड़कियां बुरी नहीं लगती
लेकिन उनका रोना अच्छा नहीं होता
रोने और हँसने के अलावा
सोच भी सकती हैं लड़कियां
ये बात अक्सर भुला दी जाती है
खुशियों और दुख को
वो भी परिभाषित कर सकती हैं
नई पत्तियों से उगते नए शब्दों में
अपने हिस्से की हवा में ढूंढती है खुशबू
धूप के चमकीले धागों से बुनकर सपने
उनमें जीना चाहती है वो
भुला दी जाती है ये बात
और जब भुला दी जाती है ये बात
तो अक्सर लड़कियां खुल कर हँस नहीं पाती।
भई वाह. भौब्बड़िया.
ReplyDeletebahut achchi, dil kush ho gaya
ReplyDeleteदीपा अब आपने जोरदार काम किया है।
ReplyDeleteमेरे चिपकाए उस कबाड़ से कितने पुराने सम्पर्क और स्मृतियां फिर से जी उठी हैं।
थोड़ी शाबासी का हकदार तो मैं भी हूं ही !
सीमा आपको याद करती है...........
क्या पटख़नी दी तूने इस कबाड़िए को, दीपा. वाह, वाह और सिर्फ़ वाह, वाह.
ReplyDeleteमगर हे कबािड़यो,
ReplyDeleteअशोक और दीपा की कविताएं परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि ही पक्ष की हैं। दोनों में स्त्रियों के प्रति परंपरागत नजरिए को लेकर नाराजगी साफ देखी जा सकती है। यानी दोनों ही कबाड़वादी खेमे के कवि हैं।