Thursday, July 31, 2008

प्रेमचंद जयन्ती के अवसर पर - 'प्रेमचंद घर में'




आज से कोई पच्चीस साल पहले जब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रेमचंद शतवार्षिकी के आयोजन की तैयारियां चल रही थीं तब हमारे 'हिन्दी मास्स्साब' ने एक किस्सा सुनाया था कि जब किसी पत्रकार ने हिन्दी सिनेमा की एक मशहूर अदाकारा से प्रेमचंद के बाबत कुछ पूछा था तो उस स्त्री का प्रतिप्रश्न था -'हू इज प्रेमचण्ड?' पता नही इस खबर में कितनी सत्यता थी या कि यह एक चुटकुला था या फ़िर सिनेमा की दुनिया के प्रति 'हिन्दी वालों' के दुराग्रह का नमूना था लेकिन इससे सवाल तो उठता ही है कि हम अपने लेखकों, कवियों, कलाकारों को कितना जानते है?

प्रेमचंद (३१ जुलाई १८८० - ८ अक्टूबर १९३६) के लेखन विविध आयामों को समझने-बूझने के लिए ढे़र सारी किताबें मौजूद हैं और निरंतर नई छप भी रही हैं लेकिन उनके व्यक्तित्व को समझने की दो जरूरी कुंजियां हैं- एक तो 'कलम का सिपाही' जो उनके बेटे अमृत राय की लिखी हुई है और दूसरी किताब उनकी पत्नी शिवरानी देवी (१८९४ -१९७६) की लिखी 'प्रेमचंद घर में' है. पहली किताब तो आसानी से उपलब्ध है किंतु दूसरी पुस्तक १९४४ मे पहली बार छपी थी और उसका पुनर्प्रकाशन लगभग आधी सदी से अधिक समय गुजर जाने के बाद ही हुआ वह भी प्रेमचंद और शिवरानी देवी के नाती प्रबोध कुमार और संजय भारती के प्रयासों से. शिवरानी देवी अपने समय की चर्चित कहानीकार रही हैं. श्री प्रबोध कुमार अपने संस्मरणात्मक लेख 'नानी अम्मा' में यह खुलासा करते हैं कि उन्होंने अपना लेखकीय नाम 'शिवरानी देवी प्रेमचंद' माना था.

'प्रेमचंद घर में' अपने आप मे एक अनूठी पुस्तक है. इसमे एक पत्नी के नजरिए से उस व्यक्ति को समझने की कोशिश की गई है जो कि एक मशहूर लेखक है किंतु स्वयं को एक मजदूर मानता है- 'कलम का मजदूर'. शिवरानी जी ने बेहद छोटे-छोटे डिटेल्स के माध्यम घर-परिवार , नातेदारी-रिश्तेदारी, लेखन -प्रकाशन की दुनिया में मसरूफ़ प्रेमचंद की एक ऐसी छवि गढ़ी है जो 'देवोपम' नहीं है , न ही वह उनकी 'कहानी सम्राट' और 'उपन्यास सम्राट' की छवि को ग्लैमराइज करती है बल्कि यह तो एक ऐसा 'पति-पत्नी संवाद' है जहां दोनो बराबरी के स्तर पर सवालों से टकराते हैं और उनके जवाब तलाशने की कोशिश मे लगे रहते हैं. यह पुस्तक इसलिये भी / ही महत्वपूर्ण है कि स्त्री के प्रति एक महान लेखक के किताबी नजरिए को नहीं बल्कि उसकी जिन्दगी के 'फ़लसफ़े' को बहुत ही बारीक ,महीन और विष्लेषणात्मक तरीके से पेश करती है. स्त्री विमर्श के इतिहास और आइने में झांकने के लिये यह एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ है.

आज प्रेमचंद जयन्ती के अवसर पर कोई कहानी, उपन्यास अंश, निबंध,संपादकीय आदि न देकर और न ही प्रेमचंद का जीवन परिचय अथवा उनके द्वारा लिखित तथा अनूदित पुस्तकों की सूची देकर रस्म अदायगी करने की मंशा है और न ही 'उनके बताए रास्ते पर चलने' का संदेश देने का ही मन है अपितु 'प्रेमचंद घर में' पुस्तक का अंश इस इरादे से दिया जा रहा है कि अक्सर ऐसा देखा गया है कि बाहर की दुनिया का 'महान मनुष्य' घर की चहारदीवारी में घुसते ही अपनी महानता का केंचुल उतारकर 'मर्द' के रूप में रूपांतरित हो जाता है. प्रेमचंद ने स्वयं को 'घरे-बाइरे' के इस दुचित्तेपन के खतरे से बाहर कर लिया था ; केवल शब्द में ही नहीं कर्म में भी.



मैं गाती थी, वह रोते थे / शिवरानी देवी

बंबई में एक रात बुखार चढ़ा तो दूसरे दिन भी पांच बजे तक बुखार नहीं उतरा. मैं उनके पास बैठी थी. मैंने भी रात को अकेले होने की वजह से खाना नहीं खाया था. कोई छ: बजे के करीब उनका बुखार उतरा.

आप बोले- क्या तुमने भी अभी तक खाना नहीं खाया?

मैं बोली- खाना तो कल शाम से पका ही नहीं.

आप बोले- अच्छा मेरे लिए थोड़ा दूध गरम करो और थोड़ा हलवा बनाओ. मैं हलवा और दूध तैयार करके लाई. दूध तो खुद पी लिया और बोले- यह हलवा तुम खाओ. जब हम दोनो आदमी खा चुके , मैं पास में बैठी.

आप बोले- कुछ पढ़ करके सुनाओ, वह गाने की किताब उठा लो. मैंने गाने की किताब उठाई. उसमें लड़कियों की शादी का गाना था. मैं गाती थी, वह रोते थे. उसके बाद मैं तो देखती नहीं थी, पढ़ने में लगी थी, आप मुझसे बोले- बंद कर दो, बड़ा दर्दनाक गाना है. लड़कियों का जीवन भी क्या है. कहां बेचारी पैदा हों, और कहां जायेंगी, जहां अपना कोई नहीं है. देखो, यह गाने उन औरतों ने बनाए हैं जो बिल्कुल ही पढ़ी-लिखी ना थीं. आजकल कोई एक कविता लिखता है या कवि लोगों का कवि सम्मेलन होता है, तो जैसे मालूम होता है कि जमीन-आसमान एक कर देना चाहते हैं. इन गाने के बनानेवालियों का नाम भी नहीं है.

मैंने पूछा- यह बनानेवाले थे या बनानेवालियां थीं?

आप बोले- नहीं, पुरुष इतना भावुक नहीं हो सकता कि स्त्रियों के अंदर के दर्द को महसूस कर सके. यह तो स्त्रियों ही के बनाए हुए हैं.स्त्रियों का दर्द स्त्रियां ही जान सकती हैं, और उन्हीं के बनाए यह गाने हैं.

मैं बोली- इन गानों को पढ़ते समय मैं तो ना रोई और आप क्यों रो पड़े?

आप बोले- तुम इसको सरसरी निगाह से पढ़ रही हो, उसके अंदर तक तुमने समझने की कोशिश नहीं की. मेरा खयाल है कि तुमने मेरी बीमारी की वजह से दिलेर बनने कोशिश की है.

मैं बोली- कुछ नहीं, जिन स्त्रियों को आप निरीह समझते हैं, कोई उनमें निरीह नहीं है.अगर हैं निरीह, तो स्त्री-पुरुष दोनो ही हैं.दोनो परिस्थिति के हाथ के खिलौने हैं, जैसी परिस्थिति होती है, उसी तरह दोनो रहते हैं. पुरुषों के ही पास कौन उनके भाई-बंद बैठे रहते हैं, संसार में आकर सब अपनी किस्मत का खेल खेला करते हैं.

आप बोले- जब तुम यह पहलू लेती हो, तो मैं यह कहता हूं, कि दोनो एक दूसरे के माफ़िक अपने-अपने को बनाते हैं, और उसी समय सुखी होते हैं, जब एक-दूसरे के माफ़िक होते हैं. और उसी में सुख-आनंद है.

मगर हां इसके खिलाफ़ दोनो हों, तो उसमें पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक निरीह हो जाती है.

Wednesday, July 30, 2008

नया दिन और एक और नये कबाड़ी का स्वागत

गीत चतुर्वेदी के ब्लॉग ने मुझे इतना प्रभावित किया था कि जून के महीने में मैंने एक पूरी की पूरी पोस्ट उस पर यहां लगाई थी. गीत के बारे में कुछ और लिखूं इस से अच्छा है कि आप दो काम करें: एक तो उनके ब्लॉग पर जा कर उनकी प्रोफ़ाइल देखें (ब्लॉग तो देखते ही होंगे) और कबाड़ख़ाने में लगी इस पोस्ट को पढ़ें.

इधर मैं कबाड़ख़ाने की टीम को बड़ा करने की जुगत में लगा हूं ताकि कबाड़ की और भी विरल और समृद्ध एक्सक्लूसिव क़िस्में आप को पेश की जा सकें. इस क्रम में कल भाई संजय पटेल ने मेरा न्यौता स्वीकार किया और आज गीत ने.

इस अति संभावनाशील हिन्दी कवि, कहानीकार, पत्रकार, अनुवादक और हां मेरे कुमाऊं के जंवाईराजा का स्वागत करते हुए मैं कबाड़ख़ाने के सारे सदस्यों की तरफ़ से उन्हें दो उपहार प्रस्तुत करता हूं.

उनके प्रोफ़ाइल में मेरे बहुत प्रिय पुर्तगाली कवि फ़र्नान्दो पेसोआ की एक कविता लगी हुई है. ख़ाकसार ने इस कवि की कविताओं का पिछले दस सालों में थोड़ा बहुत अनुवाद किया है. इस साल के विश्व पुस्तक मेले में ये अनुवाद किताब की सूरत में संवाद प्रकाशन से 'पृथ्वी की सारी ख़ामोशी' के नाम से छपा. सो गीत के लिए उनके प्रोफ़ाइल में लगी कविता का इस किताब से अनुवाद:


मैं एक भगोड़ा हूं
जब मैं पैदा हुआ
उन्होंने मुझे बंद कर दिया
मेरे भीतर
उफ़,
पर मैं भाग निकला.

अगर लोग
उसी पुरानी जगह पर रहने से ऊब जाते हैं
तो उसी पुरानी त्वचा के भीतर रहने से
क्यों नहीं ऊबते?

मेरी आत्मा
मेरी तलाश में निकली हुई है
पर मैं झुका ही रहता हूं
क्या वह कभी मुझे खोज पाएगी?
मैं आशा करता हूं
ऐसा कभी नहीं होगा.

ख़ुद सिर्फ़
मैं हो जाने का मतलब हुआ
पछाड़ दिया जाना
और निहायत कोई भी हो जाना,
मैं रहूंगा भागता हुआ
जीवित
और जियूंगा सचमुच.

दूसरा उपहार रेशमा आपा की आवाज़ में पंजाब का एक बहुत ही मार्मिक लोकगीत:



(स्केच 'कासा फ़र्नान्दो पेसोआ' का लोगो है)

Tuesday, July 29, 2008

नए कबाड़ी का स्वागत

काफ़ी दिनों बाद कबाड़ख़ाने में एक नए कबाड़ी की एन्ट्री हुई है. इन्दौर में रहने वाले संजय पटेल को हिन्दी ब्लॉग जगत एक बेहद संवेदनशील, संगीत के बारे में अथाह जानकारी रखने वाले सचेत व्यक्ति के रूप में जानता है. जोगलिखी संजय पटेल की नामक उनका ब्लॉग काफ़ी लोकप्रिय और चर्चित है.

मैं जानता हूं कबाड़ख़ाने में इस संगीत-मर्मज्ञ के आने से और भी नए और अनूठे आयाम जुड़ेंगे. क़रीब दस माह पहले शुरू किए गए और रचनात्मक कबाड़ के उत्खनन और संग्रहण के उद्देश्य से बनाए गए इस ब्लॉग पर आने वाले संजय पटेल तीसवें कबाड़ी हैं.

इस पोस्ट के माध्यम से कबाड़ख़ाना उनका इस्तकबाल करता है और उनके सम्मान में शुन्तारो तानीकावा की यह कविता प्रस्तुत करता है



पीली चिड़ियों वाला लैंडस्केप

चिड़ियां हैं
इसलिए आसमान है
आसमान है
इसलिए ग़ुब्बारे हैं
ग़ुब्बारे हैं
इसलिए बच्चे दौड़ रहे हैं
बच्चे दौड़ रहे हैं
इसलिए हंसी है
हंसी है
इसलिए उदासी है
उदासी है
इसलिए प्रार्थना है
और झुकने के लिए धरती
धरती है
इसलिए पानी बहता है
और आज है और आने वाला कल
एक पीली चिड़िया है
इसलिए सारे रंगों, आकृतियों और गतियों के साथ
संसार है.

सुन चरखे दी मिट्ठी मिट्ठी कूक: नुसरत की आवाज़ में पंजाबी लोकगीत

अपनी नातों और सूफ़ियाना क़व्वालियाओं के लिए जगतविख्यात नुसरत फ़तेह अली ख़ान अपने जीवनकाल में ही एक किंवदन्ती बन गए थे. आवाज़ के साथ उनकी जादूगरी के साथ मैं पता नहीं कितनी कितनी बार बहा हूं, रोया हूं और नितान्त अकेलेपन में भी अलौकिक साथियों से घिरा हूं. नुसरत साहब की दिव्य आवाज़ में बेहद सादगी से गाया गया पंजाब का एक प्रसिद्ध लोकगीत सुनिये:



(इस प्लेयर से परिचय माननीय श्री अफ़लातून जी के ब्लॉग पर लगी इस संग्रहणीय पोस्ट से हुआ. उनका धन्यवाद.)

Monday, July 28, 2008

'लोकसरस्वती' का लोकसंगीत - दो प्रस्तुतियां


एक थे बाबू काली दासगुप्ता (१९२६ - २००५)। उनका परिचय बस इतना भर नहीं है कि एक सक्रिय और सजग राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने 'जन' से अपने जुडा़व को प्रचार और प्रोपेगैंडा तक सीमित रखते हुए एक साधारण और सामान्य जीवन जिया. काली बाबू का लगाव संगीत से ज्यादा था. वह भरतीय राजनीति की जिस वाम धारा से जुड़े रहे वह कितनी जन आधारित रही है या आगे रह सकेगी यह गंभीर वाद,विवाद और संवाद का मुद्दा है किन्तु अपने स्तर पर काली बाबू ने जनजीवन से अपनी निकटता को संगीत के जरिए न केवल जोड़ा बल्कि उसे बचाने का सार्थक प्रयास भी किया. अपने कार्यक्षेत्र बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के नदी-नालों, चायबागानों.बस्ती-बस्ती,परबत-परबत घूमते हुए वे श्रमिकों -कामगारों, मछुआरों-मल्लाहों, बुनकरों-रंगरेजों और उन तमाम लोगों के निकट जाक उस संगीत को सहेजने की जुगत में लगे रहे जिसे 'श्रम संगीत' कहा जाता है. इसकी प्रेरणा उन्हें १९६५ के अपने इंगलैंड दौरे के बाद मिली. उन्होंने देखा कि पश्चिम में काफ़ी लोग साधारण जनता की जीवनशैली, उसकी ताकत ,कमजोरियों और अतीत तथा स्वप्न के बीच संगति-विसंगति को समझने के लिए 'जनसंगीत' को एक औजार, उपकरण या टूल के रूप सफ़लता पूर्वक प्रयोग करे हैं. यह काम उन्हें भा गया. इस काम लिये उन्होने 'लोकसरस्वती' नाम से अपनी एक संगीत मंडली तैयार की जिसमे उनके साथ पूरबी भट्टाचार्य, सुस्मिता सेन, जॊली बागची, विश्वनाथ दत्ता, विमल दे, भास्कर राय, सौमिक दास, निरंजन हालदार, गौर पॊल, देवीप्रसाद मंडल और कुछ अन्य साथियों को मिलाकर जीवन भर उस संगीत को बचाने के काम में लगे रहे जो जनता और उसके श्रम का संगीत है- जनसंगीत.

काली दासगुप्ता का काम बिखरा पडा़ है। कुछ सीडीज में(प्राय: अप्राप्य), कुछ भारत भवन और नेशनल सेंटर फ़ॊर परफ़ार्मिंग आर्ट्स जैसी संस्थाओं के पास. लुप्त होती होती हुई धुनों को बचाकर, उन्हें पुन: प्रस्तुत कर वे तो अपना काम तो कर गये लेकिन उनकी थाती को सहेजना, समझना, सराहना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारा काम है.

आज प्रस्तुत हैं काली बाबू के मंडली द्वारा दो गीत- पहला असम के चायबागानों में काम करने वाले संथाल आदिवासियों का गीत है जिसमें वे उस ठेकेदार को कोसते हैं जो उन्हें प्रलोभन देकर अपनी जमीन से उखाडकर यहां ले आया था जहां कि न चैन है न आराम। दूसरा गीत पूरबी बंगाल के मछुआरों का गीत है जिसमे नौका दौड़ में पिछड़ने वाली अपने प्रतिस्पर्धी टोली की खिल्ली उड़ाई गई है. संभव है कि इन दोनोनो गीतों के बोल समझने में कठिनाई हो लेकिन धुन तो पसंद आएगी ही क्योंकि यह खाये, पिये, मुटाये, अघाये लोगों का नहीं अपितु दुख-दलिद्दर से जूझती और उसमें ही आनंद के दो पल खोज-निकाल लेने वाली जनता का संगीत है-

'रांची से भेजल कुली' - चायबागान के श्रमिकों का संथाली गीत


'अल्ला हो बोलो' - पूरबी बंगाल के मछुआरों का गीत


Sunday, July 27, 2008

काला राजा


जापानी के महानतम आधुनिक कवियों में गिने जाने वाले शुन्तारो तानीकावा (जन्म १९३१) ने स्विस-जर्मन कलाकार पॉल क्ली (१८७९-१९४०) की पेन्टिंग्स को लेकर ग्यारह कविताओं की श्रृंखला लिखी थी. उसी में से एक बेहद छोटी कविता 'काला राजा' प्रस्तुत है:

ख़ाली पेट एक बच्चा
उदास था क्योंकि ख़ाली था उसका पेट
भरे पॆट वाला एक राजा
उदास था क्योंकि उसका पेट था भरा हुआ

बच्चे ने हवा की आवाज़ सुनी
राजा ने संगीत सुना
दोनों की आंखों में आये आंसू
यहां इसी एक नक्षत्र पर.

[चित्र: पॉल क्ली की पेन्टिंग 'फ़ायर एन्ड डैथ'. तानीकावा की कुछेक कविताएं आप इस ब्लॉग पर पहले भी लगाई जा चुकी हैं. पढ़ना चाहें तो दांई तरफ़ के साइडबार में 'जमा किया गया कबाड़' शीर्षक के नीचे शुन्तारो तानीकावा के नाम पर क्लिक करें. कविता संवाद प्रकाशन (बम्बई/मेरठ) द्वारा प्रकाशित शुन्तारो तानीकावा के अनुवादों की पुस्तक 'एकाकीपन के बीस अरब प्रकाशवर्ष' से साभार. अनुवाद ख़ाकसार के हैं.]

मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको

(कोई छह साल पहले लखनऊ के अख़बार अमृत प्रभात के साप्ताहिक संस्करण में अदम गोंडवी उर्फ़ रामनाथ सिंह की एक बहुत लम्बी कविता छपी थी : ``मैं चमारों की गली में ले चलूंगा आपको´´। उस कविता की पहली पंक्ति भी यही थी। एक सच्ची घटना पर आधारित यह कविता जमींदारी उत्पीड़न और आतंक की एक भीषण तस्वीर बनाती थी और उसमें बलात्कार की शिकार हरिजन युवती को `नई मोनालिसा´ कहा गया था। एक रचनात्मक गुस्से और आवेग से भरी इस कविता को पढ़ते हुए लगता था जैसे कोई कहानी या उपन्यास पढ़ रहे हों। कहानी में पद्य या कविता अकसर मिलती है - और अकसर वही कहानियां प्रभावशाली कही जाती रही हैं जिनमें कविता की सी सघनता हो - लेकिन कविता में एक सीधी-सच्ची गैरआधुनिकतावादी ढंग की कहानी शायद पहली बार इस तरह प्रकट हुई थी। यह अदम की पहली प्रकाशित कविता थी। अदम के कस्बे गोंडा में जबरदस्त खलबली हुई और जमींदार और स्थानीय हुक्मरान बौखलाकर अदम को सबक सिखाने की तजवीव करने लगे - मंगलेश डबराल, १९८८- "धरती की सतह पर " की भूमिका से )



आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी की कुएं में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी खामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेिड़या है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेखबर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आखिर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पांव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे जिन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें
बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गंवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गांव की गलियों में क्या इज्जत रहे्रगी आपकी´
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूंछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हां मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर जोर था
भोर होते ही वहां का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
`जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने´
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर `माल वो चोरी का तूने क्या किया´
`कैसी चोरी माल कैसा´ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
`मेरा मुंह क्या देखते हो ! इसके मुंह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूंक दो´
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहां चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुंहा बच्चा व बुड्ढा जो वहां खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
´´ कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएं नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूं कोई कहीं जाए नहीं ´´
यह दरोगा जी थे मुंह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े ``इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
इक सिपाही ने कहा ``साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें´´
बोला थानेदार ``मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है´´

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
`कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल ´
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूं आएं मेरे गांव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छांव में
गांव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहां पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

Saturday, July 26, 2008

इब्ने सफ़ी बी.ए. के बहाने जासूसी दुनिया की याद


जनाब असरार अहमद को ज़माना इब्ने सफ़ी बी. ए. के नाम से जानता है. 'जासूसी दुनिया' और 'इमरान सीरीज़' के नाम से क़रीब ढाई सौ किताबें लिख चुके इब्ने सफ़ी का नाम भारत पाकिस्तान के बाहर यूरोप तक ऐसा फैला कि जासूसी उपन्यासों की सरताज मानी जाने वाली अगाथा क्रिस्टी ने एक बार कहा था: "मैं उर्दू नहीं जानती लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के जासूसी उपन्यासों की मुझे जानकारी है. वहां सिर्फ़ एक ही ओरिजिनल लेखक है - इब्ने सफ़ी."

इलाहाबाद ज़िले में सफ़ीउल्लाह और नज़ीरन बीबी के घर १९२८ में आज ही के दिन (२६ जुलाई) को जन्मे इब्ने सफ़ी ने में आगरा विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट की डिग्री हासिल की और अपने नाम के आगे उसे लगाना भी शुरू कर दिया. विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए. वहीं एक सेकेन्डरी स्कूल में मास्टरी करते हुए १९५० के दशक के प्रारंभिक सालों में उन्होंने जासूसी उपन्यास लिखना शुरू किया. बाद में उन्होंने इसरार पब्लिकेशन नाम से कराची में अपना ख़ुद का कारोबार शुरू कर दिया.

१९६० से १९६३ के बीच वे बहुत अस्वस्थ रहे लेकिन बीमारी से लौटते ही उन्होंने इमरान सीरीज़ का बेस्टसैलर 'डेढ़ मतवाले' लिखा.

सफ़ी के उपन्यासों में एडवेन्चर, सस्पेन्स, हिंसा, रोमान्स और कॉमेडी का शानदार संयोजन हुआ करता था और पाठकों ने उन्हें बहुत पसन्द किया. उन की लोकप्रियता का आलम यह था कि भारत और पाकिस्तान की तमाम भाषाओं में अनूदित हो कर हर महीने छपने वाले उनके उपन्यास ब्लैक में तक बिका करते थे.

सफ़ी के उपन्यासों के पात्रों के साथ पाठकों को दुनिया भर के देशों में घूमने का मौका मिलता था. सफ़ी कभी भी भारत-पाकिस्तान से बाहर नहीं गए पर दुनिया के अन्य देशों की विविध जगहों का उनका वर्णन आश्चर्यजनक रूप से सही है

जासूसी दुनिया के प्लेटिनम अंक की भूमिका में इब्ने सफ़ी ने पाठकों को बताया कि उनके ज़्यादातर उपन्यास पूरी तरह ओरिजिनल थे अलबत्ता आठ या दस की कथावस्तु यूरोप के विख्यात जासूसी लेखकों के कार्यों पर आधारित थी. इब्ने सफ़ी ने बाक़ायदा इन उपन्यासों के नाम भी गिनाए.

भारत-पाकिस्तान में पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार करने का श्रेय इब्ने सफ़ी को जाता है. उनके द्वारा प्रस्तुत विवरण इस क़दर प्रामाणिक होते थे कि पाकिस्तान की खु़फ़िया एजेन्सी आई एस आई ने अपने प्रशिक्षार्थियों की ट्रेनिंग के लिए आधिकारिक तौर पर उनकी सेवाएं लीं.

इब्ने सफ़ी एक अच्छे शायर भी थे और असरार नारवी के नाम से लिखा करते थे. उनकी ग़ज़लों को साहित्यालोचकों द्वारा पसन्द भी किया गया. ग़ज़लों के अलावा उन्होंने उर्दू कविता की अन्य विधाओं जैसे हम्द, नात, मर्सिया इत्यादि में भी रचनाएं कीं. 'मता-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र' नाम से उन्होंने अपना संग्रह भी तैयार किया था जो अप्रकाशित ही रहा.

यह अलग बात है कि उनकी बेतहाशा लोकप्रिय जासूसी उपन्यासकार की छवि के आगे उनका कवि-व्यक्तित्व हमेशा छोटा ही रहने को विवश रहा.

दिसम्बर १९७९ के आसपास उनका स्वास्थ्य दुबारा बिगड़ा लेकिन उन्होंने लिखना बन्द नहीं किया. अपने बावनवें जन्मदिन यानी २६ जुलाई १९८० को ही जब पैंक्रियाटिक कैंसर से उनकी असमय मृत्यु हुई, वे इमरान सीरीज़ की एक किताब 'आख़िरी आदमी' पर काम कर रहे थे. इस किताब की पांडुलिपि उनके सिरहाने धरी हुई थी.

२००७ में इब्ने सफ़ी के कार्य पर दिल्ली स्थित साहित्य अकादमी द्वारा एक सेमिनार का आयोजन भी किया गया. इस सेमिनार में उनके कार्य को उचित सम्मान मिला और भागीदारों का एक स्वर में कहना था कि इब्ने सफ़ी की किताबें उर्दू साहित्य के बेशकीमती नगीने हैं.

*इब्ने सफ़ी पर और अधिक जानकारी के लिए इस वेबसाइट पर जाया जा सकता है.

Friday, July 25, 2008

अलखतै बिखौती मेरि दुर्गा हरै गे: कुमाऊंनी लोकगीत गोपाल बाबू गोस्वामी की आवाज़ में

उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के छोटे से गांव चांदीकोट में जन्मे गोपाल बाबू गोस्वामी का परिवार बेहद गरीब था. बचपन से ही गाने के शौकीन गोपाल बाबू के घरवालों को उनकी यह आदत पसंद नहीं था क्योंकि रोटी ज़्यादा बड़ा मसला था. घरेलू नौकर के रूप में अपना करियर शुरू करने के बाद गोपाल बाबू ने ट्रक ड्राइवरी की. उसके बाद कई तरह के धंधे करने के बाद उन्हें जादू का तमाशा दिखाने का काम रास आ गया. पहाड़ के दूरस्थ गांवों में लगने वाले कौतिक - मेलों में इस तरह के जादू तमाशे दिखाते वक्त गोपाल बाबू गीत गाकर ग्राहकों को रिझाया करते थे.

एक बार अल्मोड़ा के विख्यात नन्दादेवी मेले में इसी तरह का करतब दिखा रहे गोपाल बाबू पर कुमाऊंनी संगीत के पारखी स्व. ब्रजेन्द्रलाल साह की नज़र पड़ी और उन्होंने नैनीताल में रहने वाले अपने शिष्य (अब प्रख्यात लोकगायक) गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' के पास भेजा कि इस लड़के को 'देख लें'. गिर्दा बताते हैं कि ऊंची पिच में गाने वाले गोपाल बाबू की आवाज़ की मिठास उन्हें पसंद आई और उनकी संस्तुति पर सांग एंड ड्रामा डिवीज़न की नैनीताल शाखा में बड़े पद पर कार्यरत ब्रजेन्द्रलाल साह जी ने गोपाल बाबू को बतौर कलाकार सरकारी नौकरी पर रख लिया.

यहां से शुरू हुआ गोपाल बाबू की प्रसिद्धि का सफ़र जो ब्रेन ट्यूमर से हुई उनकी आकस्मिक मौत तक उन्हें कुमाऊं का लोकप्रिय गायक बना गया था. जनवरी के महीने में हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले में निकलने वाले जुलूस में मैने खुद हज़ारों की भीड़ को उनके पीछे पीछे उनके सुर में सुर मिलाते देखा है. बांसुरी और हुड़के की मीठी जुगलबन्दी पर गोपालबाबू के गाए "कैले बाजै मुरूली", "घुरु घुरु उज्याव है गो", "घुघूती ना बासा" और "रुपसा रमोती" जैसे गाने आज भी खूब चाव से सुने जाते हैं और कुछेक के तो अब रीमिक्स तक निकलने लगे हैं. यहां इस बात को जोड़ना अप्रासंगिक नहीं होगा कि गोपाल बाबू कुमाऊंनी लोकसंगीत के पहले सुपरस्टार का दर्ज़ा रखते हैं.

आज प्रस्तुत है गोपाल बाबू का गाया एक लोकप्रिय कुमाऊंनी गीत: "अलबेरै बिखौती मेरि दुर्गा हरै गे". द्वाराहाट में लगने वाले बिखौती मेले में एक आदमी अपनी पत्नी के अचानक कहीं गुम हो जाने पर किस किस तरह की परेशानियों से रू-ब-रू होता है, उसी का वर्णन इस गीत में है. गीत शुरू करने से पहले गोपाल बाबू गीत की कथावस्तु का थोड़ा बहुत खुलासा करते ही हैं:



(शुरू के पांच-सात सेकेन्ड ऑडियो शायद कुछ न बोले. उस के लिए क्षमायाचना. गोपाल बाबू के परिचय के लिए इरफ़ान की टूटी बिखरी का आभार.)

Thursday, July 24, 2008

अदम गोंडवी की ग़ज़लें



हिंदी ग़ज़ल की सबसे शुरूआती बानगी कबीर के `हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या´ में मिलती है। आधुनिक काल में यह निराला से शुरू होकर त्रिलोचन, शमशेर और दुष्यंत तक आती है। इसके बाद आते हैं ग़ज़ल को एक बिलकुल नया जनवादी मुहावरा देने वाले अदम गोंडवी, हालांकि बरसों से वे खामोश हैं, पर याद बहुत आते हैं। कोई बीस साल पहले उनका संकलन सुरेश सलिल जी ने `धरती की सतह पर´ नाम से छापा था, जिसमें `चमारों की गली´ शीर्षक प्रसिद्ध नज़्म और मंगलेश डबराल की लिखी महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह संकलन अब अप्राप्य है। ये दो ग़ज़लें और अदम जी की तस्वीर उत्तराखंड की पत्रिका `मेजर टर्निंग प्वाइंट´ से साभार

एक

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

दो

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो !

पाकिस्तानी कवि और गद्यकार इब्ने इंशा (१९२७-१९७८) मेरे सबसे पसन्दीदा कवि-लेखकों में हैं. उनकी दो किताबे 'प्रतिनिधि कवितायें' और 'उर्दू की आखिरी किताब' मेरी रोजाना की मानसिक 'खुराक' मे शामिल हैं. 'सुखनसाज' में उनकी कई रचनायें संगीत के लिबास में शामिल हो हमारे सामने पेश हैं. इंशा साहब का असली नाम शेर मोहम्मद ख़ां था. उनकी ज़्यादातर रचनाओं से एक फक्कड़मिजाज़ मस्तमौला और अनौपचारिक इन्सान की तस्वीर उभरती है जो मीर तक़ी मीर और नज़ीर अकबराबादी की रिवायत को आगे ले जाने का हौसला और माद्दा रखता है.

सुनते हैं इब्ने इंशा साहब की नज़्म छाया गांगुली के स्वर में:



फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों
फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो
फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों
फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो
फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो

video


कवि के परिचय के लिए 'सुखनसाज़' के साजिंदे अशोक पांडे के प्रति आभार!

Wednesday, July 23, 2008

नाज़िम हिकमत की रुबाइयां

नाज़िम हिकमत की कविता कल आपने उन्हीं की आवाज़ में सुनी थी. यह बात बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि नाज़िम ने रुबाइयां भी लिखी थीं. 'पहल' के ७५वें अंक में इन में से चुनिन्दा के वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल डंगवाल द्वारा किए गए अनुवाद प्रकाशित हुए थे. कहीं रूमानी, कहीं विद्रोही, कहीं दार्शनिक - नाज़िम के तमाम स्वरों को इन रचनाओं में सुना जा सकता है.

पहली श्रृंखला

१.

जो दुनिया तुमने देखी रूमी, वो असल थी, न कोई छाया वगैरह
यह सीमाहीन है और अनंत, इसका चितेरा नहीं है कोई अल्लाह वगैरह
और सबसे अच्छी रूबाई जो तुम्हारी धधकती देह ने हमारे लिए छोड़ी
वो तो हरगिज़ नहीं जो कहती है - "सारी आकृतियाँ परछाई हैं" वगैरह

२.

न चूम सकूं, न प्यार कर सकूं, तुम्हारी तस्वीर को
पर मेरे उस शहर में तुम रहती हो रक्त-मांस समेत
और तुम्हारा सुर्ख़ मूं, वो जो मुझे निषिद्ध शहद, तुम्हारी वो बड़ी बड़ी आंखें सचमुच हैं
और बेताब भंवर जैसा तुम्हारा समर्पण, तुम्हारा गोरापन मैं छू तक नहीं सकता !

३.

ये बाग़, ये नम मिट्टी, ये चमेली की ख़ुशबू, ये चांदनी रात
ये तब भी जगमगाएगी जब मैं बीत जाऊंगा रोशनी से
क्योंकि ये मेरे आने से पहले थी और बाद में मेरा हिस्सा न थी -
इस मूल की सिर्फ़ एक प्रतिलिपि मुझमें दिखाई दी.

४.

एक दिन मां कुदरत कहेगी, "अब चलो ...
अब और न हंसी, न आंसू, मेरे बच्चे ..."
और अन्तहीन एक बार और ये शुरू होगी
ज़िन्दगी जो न देखे, न बोले, और न सोचा करे.

दूसरी श्रृंखला

१.

अपना प्याला शराब से भर लो इस से पहले कि तुम्हारा
प्याला भर उठे ख़ाक से, "खैय्याम ने कहा
हड्डही नाक और बग़ैर जूतों वाला आदमी उसे ताका किया
उसके ग़ुलाब बाग़ में;
"सितारों से भी ज़्यादा दुआओं से भरी इस दुनियां में", वो आदमी
बोला, "मैं भूखा मर रहा हूं;
मेरे पास रोटी ख़रीदने तक को पैसा नहीं,
शराब की तो बात छोड़ो."

२.

"ज़िन्दगी बीत रही है, लूट लो वक़्त का वैभव, इसके पहले कि सो जाओ
नींद न टूटने वाली;
भर लो कांच के पैमाने को सुर्ख़ शराब से नौजवान, भोर हुई जग जाओ"
अपने नंगे बर्फ़ीले ठण्डे कमरे में नौजवान उठा सुनकर चीत्कार
फ़ैक्ट्री की सीटी की, जो देरी के लिए माफ़ नहीं करती.

३.

मुझे बीते दिनों की याद नहीं आती
-सिवा गर्मी की वो रात.
और आख़िरी कौंध भी मेरी आंखों की
तुम को बतलाएगी आने वाले दिनों की बात

तीसरी श्रृंखला

या तो लोग तुम्हें प्यार करे हैं, या वो तुम्हारे दुश्मन हैं
या तो तुम यों विस्मृत होते गोया तुम कभी थे ही नहीं
या फिर तुम एक पल के लिए , दिल से बाहर जाते नहीं ...
कांच सा साफ़ सर्दी का एक बेदाग़ दिन
दांत गड़ाना एक स्वस्थ सेब की पुष्ट-गौर देह पर
मेरी जान, यह सांस लेने जैसा सुखदाई है एक बर्फ़ीले
चीड़ वन में यह तुम्हें प्यार करना.

('पहल' से साभार. नाज़िम की अन्य रचनाएं पढ़ने और उनके लिंक देखने के लिए पिछली पोस्ट को देखें.)

Tuesday, July 22, 2008

नाज़िम हिकमत की आवाज़ में 'अखरोट का पेड़'

बीसवीं सदी की विश्वकविता में तुर्की के नाज़िम हिकमत कबाड़ख़ाने के नियमित पाठकों के लिए नया नाम नहीं है. वीरेन डंगवाल द्वारा किए गए उनके कई ऐतिहासिक महत्व के अनुवाद यहां प्रकाशित किये जा चुके हैं. नाज़िम की एक कविता 'अखरोट का पेड़' प्रस्तुत है पहले स्वयं नाज़िम हिकमत की आवाज़ में तुर्की भाषा में, बाद में इसका वीरेन डंगवाल द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद. इसे जेल में लिखा गया था. अपनी दूसरी पत्नी को सम्बोधित यह कविता नाज़िम ने १९५५ में इस्ताम्बूल रेडियो के लिए रिकॉर्ड करवाई थी:



अखरोट का पेड़

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
न तुम ये बात जानती हो न पुलिस !

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
मेरी पत्तियां चपल हैं, चपल जैसे पानी में मछलियाँ
मेरी पत्तियां निखालिस हैं, निखालिस जैसे एक रेशमी रूमाल
उठा लो, पोंछो मेरी गुलाब अपनी आंखों में आंसू एक सौ हज़ार

मेरी पत्तियां मेरे हाथ हैं, मेरे हैं एक सौ हज़ार
मैं तुम्हें छूता हूँ एक सौ हज़ार हाथों से, मैं छूता हूँ इस्ताम्बुल को
मेरी पत्तियां मेरी आंखें हैं, मैं देखता हूँ अचरज से
मैं देखता हूँ तुम्हें एक सौ हज़ार आंखों से, मैं देखता हूँ इस्ताम्बुल को

एक हज़ार दिलों की तरह धड़को - धड़को मेरी पत्तियो

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
न तुम ये बात जानती हो न पुलिस !

*नाज़िम के बारे में जानने के लिए इन पोस्टों को देखें:

९-१० रात्रि की कविताएं: भाग १
जीना एक संगीन मामला है तुम्हें प्यार करने की तरह
आज नाज़िम हिकमत की स्त्री को लगना चाहिये सुन्दर - एक बाग़ी झण्डे की तरह
हमें यों जीना चाहिये जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं

Monday, July 21, 2008

श्रीलंका से कुछ फ़ोटू

श्रीलंका से कुछ फ़ोटू, जहां मुझे एक उत्सव के सिलसिले में इसी साल जून-जुलाई में क़रीब दस रोज़ ठहरने का अवसर मिला.

कोलम्बो से नब्बे किलोमीटर दूर पिन्नेवेला गांव में पान का शौकीन एक महंत

पिन्नेवेला गांव में पान का शौकीन एक कैंडी नर्तक

पिन्नेवेला गांव में हाथियों का अनाथालय

पिन्नेवेला गांव में एक हाथी

कैंडी से पहले एक सुरंग का प्रवेशद्वार

कैंडी ने निकट घना जंगल

कोलम्बो के निकट पान्निपिटिया क़स्बे में किंग कोकोनट से लदी बैलगाड़ी

नर्तकी की आकृति वाला एक असाधारण पुष्प जिसे आम भाषा में 'कैंडियन फ़्लावर' कहा जाता है

दग़ाबाज़ों के बीच निराला जी की याद

अन्धेरा ऐसा कि बिल्कुल नज़दीक की हर चीज़ में आसन्न मृत्यु की सघन, काली आहट; पैरों तले बेढब फिसलनभरी ज़मीन और हर हाल में चलते चले जाना सांस लेने की अनिवार्य शर्त.

मन खिन्न है बहुत दिनों से. निराला लगातार गूंज रहे हैं भीतर:


लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो
भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा,
उन्हीं बीजों के नए पर लगे,
उन्हीं पौधों से नया रस झिरा.

उन्हीं खेतों पर गए हल चले,
उन्हीं माथों पर गए बल पड़े,
उन्हीं पेड़ों पर नए फल लगे,
जवानी फिरी जो पानी फिरा.

पुरवा हवा की नमी बढ़ी,
जुही के जहां की लड़ी कढ़ी,
सविता ने क्या कविता पढ़ी,
बदला है बादल से सिरा.

जग के अपावन धुल गए,
ढेले गड़ने वाले थे घुल गए,
समता के दृग दोनों तुल गए,
तपता गगन घन से घिरा.


और अब इस के आगे न कोई प्रस्तावना न उपसंहार:

दग़ा की

चेहरा पीला पड़ा.
रीढ़ झुकी. हाथ जोड़े.
आंख का अन्धेरा बढ़ा.
सैकड़ों सदियां गुज़रीं.
बड़े-बड़े ऋषि आए, मुनि आए, कवि आए,
तरह-तरह की वाणी जनता को दे गए.
किसी ने कहा कि एक तीन हैं,
किसी ने कहा कि तीन तीन हैं.
किसी ने नसें टोईं, किसी ने कमल देखे.
किसी ने विहार किया, किसी ने अंगूठे चूमे.
लोगों ने कहा कि धन्य हो गए.
मगर खंजड़ी न गई.
मृदंग तबला हुआ,
वीणा सुर-बहार हुई.
आज पियानो के गीत सुनते हैं.
पौ फटी. किरनों का जाल फैला.
दिशाओं के होंठ रंगे.
दिन में, वैश्याएं जैसे रात में.
दग़ा की इस सभ्यता ने दग़ा की.

Sunday, July 20, 2008

मंगलेश डबराल: उसे विफलता नहीं, उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए!

पिछले कई दिनों से चल रहे असद जैदी विवाद में जिस व्यक्ति की बार-बार लगभग मानहानि जैसी हुई है, वो हैं हमारे प्रिय और विलक्षण कवि मंगलेश डबराल। मंगलेश जी ने असद जी वाले मामले में सच कहने का साहस दिखाया और कई-कई साम्प्रदायिक हमले भी सहे। ऐसे विवाद चाहें तो जिन्दगी भर चलते रह सकते हैं। असद जैदी और मंगलेश डबराल दोनों ही हमारे समय के बहुत बड़े कवि हैं और उन्होंने अब तक जितना रच लिया है, उसी से वे आने वाले समय में अपनी जगह बना चुके हैं। आज कवि वीरेन डंगवाल से इस सम्बन्ध में हुई एक बातचीत के बाद यहां प्रस्तुत हैं मंगलेश जी की दो प्रसिद्ध कविताएं: 'संगतकार´ और `केशव अनुरागी´, जिनमें मंगलेश जी के सीधे-सरल व्यक्तित्व का मूल मंत्र भी छुपा है।

संगतकार

मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज सुन्दर कमजोर कांपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य या
पैदल चलकर सीखने आनेवाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज में
वह अपनी गूंज मिलाता आया है प्राचीन काल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है या अपने ही सरगम को लांघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सम्भाले रहता है
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था
तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढाढ़स बंधाता
कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर
कभी-कभी वह यों ही दे जाता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
और उसकी आवाज में जो एक हिचक साफ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए !


केशव अनुरागी


ढोल एक समुद्र है साहब केशव अनुरागी कहता था
इसके बीसियों ताल हैं सैकड़ों सबद
और कई तो मर-खप गए हमारे पुरखों की ही तरह
फिर भी संसार में आने और जाने अलग-अलग ताल साल
शुरू हो या फूल खिलें तो उसके भी अलग
बारात के आगे-आगे चलती इसकी गहन आवाज
चढ़ाई उतराई और विश्राम के अलग बोल
और झोड़ा चांचरी पांडव नृत्य और जागर के वे गूढ़ सबद
जिन्हें सुनकर पेड़ और पर्वत भी झूमते हैं अपनी-अपनी जगह
जीवन के उत्सव तमाम इसकी आवाज के बिना जीवनहीन
यह जितना बाहर बजता है उतना अपने भीतर भी
एक पाखे से फूटते बोल सुनकर बज उठता है दूसरे पाखे का कोई ढोल
बतलाता उस तरफ के हालचाल
देवताओं को नींद से जगाकर मनुष्य जाति में शामिल करता है
यह काल के विशाल पर्दे को बजाता हुआ
और जब कोई इस संसार से जाता है
तो मृत्यु का कातर ढोल सुनाई देता है
दूर-दूर से बुला लाता लोगों को
शवयात्रा में शामिल होने के लिए
लोग कहते थे केशव अनुरागी ढोल के भीतर रहता है
ढोल सागर के भूले-बिसरे तानों को खोजनेवाला बेजोड़ गायक
जो कुछ समय कुमार गंधर्व की संगति में भी रहा
गढ़वाल के गीतों को जिसने पहुंचाया शास्त्रीय आयामों तक
उसकी प्रतिभा के सम्मुख सब चमत्कृत
अछूत के घर कैसे जन्मा यह संगीत का पंडित
और जब वह थोड़ी पी लेता तो ढोल की तानों से खेलता गेंद की तरह
कहता सुनिए यह बादलों का गर्जन
और यह रही पानी की पहली कोमल बूंद
यह फुहार यह झमाझम बारिश
यह बहने लगी नदी
यह बना एक सागर विराट प्रकृति गुंजायमान
लेकिन मैं हूं अछूत कौन कहे मुझे कलाकार
मुझे ही करना होगा
आजीवन पायलागन महराज जय हो सरकार
बिना शिष्य का गुरू केशव अनुरागी
नशे में धुत्त सुनाता था एक भविष्यहीन ढोल के बोल
किसी ने नहीं अपनायी उसकी कला
अनछपा रहा वर्षों की साधना का ढोल सागर
इस बीच ढोल भी कम होते चले गए हमारे गांवों में
कुछ फूट गए कुछ पर नई पूड़ें नहीं लगीं
उनके कई बाजगी दूसरे धंधों की खोज में चले गए
केशव अनुरागी
मदहोश आकाशवाणी नजीबाबाद की एक कुर्सी पर धंसा रहा
एक दिन वह हैरान रह गया अपने होने पर
एक दिन उसका पैर कीचड़ में फंस गया
वह अनजाने किसी से टकराया सड़क पर
एक दिन वह मनुष्यों और देचताओं के ढोल से बाहर निकल गया
अब वह रहता है मृत्यु के ढोल के भीतर

मंगलेश जी की केशव अनुरागी सुनिए उन्ही के स्वर में आर्ट ऑफ़ रीडिंग पर

Saturday, July 19, 2008

प्रसन्नवदनः सौभाग्यदाम भाग्यदाम: एनिग्मा के संगीत का लुत्फ़ लीजिये

1957 में रूमानिया के बुखारेस्ट शहर में जन्मे मिखाएल क्रेट्यू ने अपने साथियों डेविड फ़ैयरस्टीन और फ़्रैंक पीटरसन के साथ 1989 में 'एनिग्मा' की स्थापना की थी. यह समय संगीत के क्षेत्र में इलैक्ट्रोनिक क्रान्ति का था और इसी लगभग अनचीन्हे इलाक़े को एनिग्मा ने अपना कार्यक्षेत्र बनाने की ठानी थी. यहां यह बात ग़ौरतलब है कि मिखाएल क्रेट्यू इस के पहले कई नामी-गिरामी संगीतकारों-गीतकारों-म्यूज़िक ग्रुपों के साथ काम कर चुके थे.

आठ महीनों की मशक्कत के बाद क्रेट्यू ने MCMXC a.D. नाम से अपना पहला अल्बम रिलीज़ किया. आधुनिक संगीत में इस के बाद क्रान्ति आ गई. बॉलीवुड के तमाम संगीतकारों तक ने (जिनमें ए. आर. रहमान का नाम प्रमुख है) एनिग्मा की धुनों और बीट्स को इस्तेमाल किया. दुनिया भर में इस अल्बम बिक्री के सारे कीर्तिमान तोड़ डाले. फ़्लोइंग सिन्थेसाइज़र, एक सी ही धुनों का बार-बार बजाया जाना, ग्रेगोरियन मठों के मन्त्रोच्चार, फ़्रांसीसी कविता की लरज़, पियानो के शानदार सोलो पीसेज़, सकुहाजी बांसुरी और एथनिक परकशन का इस्तेमाल इस अलबम की विशेषता थी. यह अलबम अपने गीतों के विवादास्पद कथ्य के कारण भी चर्चा में रहा. सैक्स, धर्म और व्यक्तिगत विश्वास पर चर्चा करने के साथ ही इस संग्रह में एक गीत सत्रहवीं सताब्दी के सनसनीख़ेज़ व्यक्तित्व मार्क्विस द साद को लेकर भी है.

एनिग्मा ने बेहतरीन प्रयोगों की परम्परा भी डाली, जिनमें मुख्य था दुनिया भर के साहित्य और संगीत का प्रयोग कर एक सार्वभौमिक संगीत भाषा बनाना. तो यहां आपको ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर हंगरी और अफ़्रीका तक की बोलियों और संगीत के टुकड़ों का हैरत अंगेज़ मिश्रण सुनने को मिलेगा. इस ग्रुप के माध्यम से लगातार विविधतापूर्ण अलबम निकलते रहे हैं और दुनिया भर में उनके चाहने वाले उनका इन्तज़ार करते हैं. एनिग्मा की स्थापना के सत्रह सालों बाद एनिग्मा के आधिकारिक प्रबंधन द्वारा जारी एक रपट के मुताबिक संगीत-अलबमों की बिक्री दस करोड़ से ज़्यादा पहुंच चुकी थी.

आज आप के लिए प्रस्तुत है एनिग्मा के दूसरे अलबम 'द क्रॉस ऑफ़ चेन्जेज़' से दो और तीसरे 'Le Roi Est Mort, VIVE Le Roi! ' (यानी The King is Dead, Long Live the King) से एक रचना. ये तीनों मुझे बहुत ज़्यादा पसन्द हैं.


'द आईज़ ऑफ़ ट्रुथ'

(क्रेट्यू इस गीत के माध्यम से एक उच्चतर शक्ति की तरफ़ इशारा करते हैं. इस अचम्भित कर देने वाले पीस में एक ड्राइविंग बोट, तबला, शकूहाजी बांसुरी, गिरजाघर का कॉयर, मंगोलियाई स्वर तो है ही क्रेट्यू की पूर्व पत्नी सान्ड्रा की मखमली आवाज़ भी है)



'रिटर्न टू इनोसेन्स'

(यह गीत एनिग्मा के सबसे बड़े हिट के रूप में विख्यात है. गीत की शुरुआत ताईवान के आदिवासी संगीत से होती है और उसके बाद ड्र्मों और ग्रेगोरियन चान्ट्स का अविस्मरणीय जादू आपको अपने भीतर डुबो लेता है.)



आख़िर में सुनिये 'Le Roi Est Mort, VIVE Le Roi!' अलबम से 'द चाइल्ड इन अस'. मधुमक्खियों की भिनभिन जैसी आवाज़ से शुरू होती है यह कम्पोज़ीशन. और उसके बाद ऋग्वेद की एक ऋचा, मंगोलियाई लोकधुन और स्वयं मिखाएल क्रेट्यू की तनिक हिचकभरी आवाज़ मिल कर एक और उम्दा रचना का निर्माण करते हैं. बहुत सलीके से इस्तेमाल किये गए ग्रेगोरियन चान्ट्स के कारण इस गीत को बहुत से विशेषज्ञ ईसामसीह के जन्म से मिला कर भी देखते हैं.



मुझे ' द आईज़ ऑफ़ ट्रुथ' का वीडियो भी अद्भुत लगता है इसलिए बावजूद पोस्टों में यूट्यूब की उपस्थिति से मेरी थोड़ी नापसंदगी के, आपके वास्ते इस वीडियो को भी लगा रहा हूं.

आनन्द लीजिए.


Friday, July 18, 2008

जब केवल पाँच प्रश्न हुआ करते थे हल करने को, अनिवार्य थे कबीर

नैनीताल में कॉलेज हॉस्टल में एक कविता पोस्टर के माध्यम से आशुतोष ने हरीशचन्द्र पाण्डे नाम से परिचय कराया था. फ़क़त छः पंक्तियों की इस नन्ही सी कविता में पाण्डे जी हमारे घर-परिवार की एक करुण सच्चाई से आपका सामना कराते हैं:

पिता पेड़ हैं
हम शाखाएं हैं उनकी
मां छाल की तरह चिपकी पड़ी है पूरे पेड़ पर
जब भी चली है कुल्हाड़ी
पेड़ या उसकी शाखाओं पर
मां ही गिरी है सबसे पहले टुकड़े टुकड़े हो कर


बड़ी मुश्किल से खोजने पर कुछेक महीनों बाद इलाहाबाद से छपी उनकी कविताओं की एक बहुत ही दुबली सी पुस्तिका 'कुछ भी मिथ्या नहीं है' कहीं से हाथ लगी. एक से एक जटिल विम्ब इस कवि की सरल और सुग्राह्य भाषा में बहुत आसानी से प्रवेश करते चले जाते थे. इन विम्बों में गुंथे होते थे हमारे समय के सबसे ज़रूरी और मुश्किल सवाल भी. कहना न होगा मैं जल्दी ही हरीशचन्द्र पाण्डे जी का फ़ैन बन गया था और वह स्टेटस आज भी बरकरार है. इन सालों में उनसे कुछेक आत्मीय मुलाकातें हुईं और वे अपनी कविताओं की ही तरह एक बेहद सादगीभरे व्यक्ति के रूप में मेरे भीतर अपनी जगह बनाए हुए हैं.

१९५२ में जन्मे हरीश चन्द्र पाण्डे इलाहाबाद में महालेखाकार कार्यालय में नौकरी करते हैं. 'कुछ भी मिथ्या नहीं है' के लिए उन्हें १९९५ का सोमदत्त सम्मान दिया गया. कविताओं की उनकी पहली बड़ी किताब 'एक बुरूँश कहीं खिलता है' कुछ साल पहले छपी (साल मुझे याद नहीं आ रहा). हिन्दी जगत में इसे काफ़ी चर्चित पुस्तकों में गिना गया और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के सर्जना पुरुस्कार से सम्मानित हुई. प्रतिष्ठित केदार सम्मान और ऋतुराज सम्मान भी इस कवि को मिल चुके हैं.

वर्ष २००६ में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उनका नवीनतम संग्रह 'भूमिकाएं ख़त्म नहीं होतीं' प्रकाशित हुआ है. पहली ही कविता 'एक दिन में' में वे कहते हुए इस संग्रह की टोन स्थापित करते हुए लिखते हैं:


... एक दिन में नहीं बन गयी पुस्तक

लेकिन
एक दिन में नष्ट किया जा सकता है कोई भी पुस्तकालय ...


काव्यात्मक प्रौढ़ता तो इस में है ही, नए जोखि़म उठाने का साहस भी इस संग्रह की कविताओं में नज़र आता है और अगर मैं भविष्य में उनसे बहुत बड़े काम की उम्मीद कर रहा हूं, तो यह मेरा विश्वास है.

इसी संग्रह 'भूमिकाएं ख़त्म नहीं होतीं' से प्रस्तुत हैं आपके लिए कुछ कविताएं:


एक दिन में

दन्त्य ‘स’ को दाँतों का सहारा

जितने सघन होते दाँत
उतना ही साफ़ उच्चरित होगा ‘स’
दाँत छितरे हो तो सीटी बजाने लगेगा

पहले पहल
किसी सघन दाँतों वाले मुख से ही फूटा होगा ‘स’
पर ज़रूरी नहीं
उसी ने दाख़िला भी दिलवाया हो वर्णमाला में ‘स’ को
सबसे अधिक चबाने वाला
ज़रूरी नहीं, सबसे अधिक सोटने वाला भी हो

यह भी हो सकता है
असमय दन्तविहीन हो गये
या आड़े-तिरछे दाँतों वाले ने ही दिया हो वर्णमाला को ‘स’
अभाव न ही दिया हो भाव

क्या पता किसी काट ली गयी जुबान ने दिया हो ‘ल’
अचूमे होठों ने दिया हो ‘प’
प्यासे कण्ठ ने दिया हो ‘क’
क्या पता अभवों के व्योंम से ही बनी हों
सारी भाषाओं की वर्णमालाएँ
और एक दिन में ही नहीं बन होगी कोई भी वर्णमाला...

ध्वनि शुरू हो इस यात्रा में
वर्णमाला तक
आये होगें कितने पड़ाव
कितना समय लगा होगा
कितने लोग लगे होगें !

दिये होंगे कुछ शब्द जंगलों ने कुछ घाटियों ने
कुछ बहाव ने दिये होंगे कुछ बाँधों ने
कुछ भीड़ के एकान्त ने दिये होंगे
कुछ धूप में खड़े पेड़ों की छाँव ने
कुछ आये होंगे अपने ही अन्तरतम से
और कुछ सूखे कुओं की तलहटी से
कुछ पैदाइशी किलकारी ने दिये होंगे
कुछ मरणान्तक पीड़ा ने
सुनी गयी होंगी ये सारी ध्वनियाँ सारी आवाज़ें
सुनने वाला ही तो बोला करता है

पहली बार बोलने से पूर्व
जाने कितने दिनों तक
कितने लोगों को सुनता है एक बच्चा
जाने कितने लोग रहे होगें
कितने दिनों तक
शब्दों को सुनने ही से वंचित

न सुनने ने भी दिये होगें कितने-कितने शब्द

एक दिन में नहीं बन गये अक्षर
एक दिन में नहीं बन गयी वर्णमाला
एक दिन में नहीं बन गयी भाषा
एक दिन में नहीं बन गयी पुस्तक

लेकिन
एक दिन में नष्ट किया जा सकता है कोई भी पुस्तकालय

बुद्ध मुस्कराये हैं

लाल इमली कहते ही इमली नहीं कौंधी दिमाग़ में
जीभ में पानी नहीं आया
‘यंग इण्डिया’ कहने पर हिन्दुस्तान का बिम्ब नहीं बना

जैसे महासागर कहने पर सागर उभरता है आँखों में
जैसे स्नेहलता में जुड़ा है स्नेह और हिमाचल में हिम
कम से कमतर होता जा रहा है ऐसा

इतने निरपेक्ष विपर्यस्त और विद्रूप कभी नहीं थे हमारे बिम्ब
कि पृथिवी पर हो सबसे संहारक पल का रिहर्सल
और कहा जाए
बुद्ध मुस्कराये हैं

ले देकर एक

कोई नहीं बच पाया इस असाध्य रोग से कहा उसने

वो नहीं बचा इलाहाबाद का और लखनऊ का वो
और वो तो दिल्ली जा कर भी नहीं बच पाया
और तो और मन्त्रीजी नहीं बच पाये लन्दन जाकर

उसने दस-बारह ऐसे और रोगियों के नाम लिये
फिर रोगी की ओर निराशा से देख कर धीमे से कहा
-बच नहीं पाएगा ये

दस-बारह क्या सैकड़ों रोगी थे उस असाध्य रोग के और
जो बच नहीं पाये थे

लेकिन पास ही खड़े उनके मित्र को याद नहीं आये वे सब
उसने कहा बनारस में हैं मेरे एक घनिष्ठ
जो पीड़ित थे इसी असाध्य रोग से
बहुत ही बुरी दशा थी उनकी
वे ठीक हो गये बिल्कुल और दस साल से ठीक-ठाक हैं
उसने रोगी की ओर देख कर कहा
-ये भी ठीक हो जाएगा

वही नहीं, जहाँ जो असाध्य रोगी मिला
उसने उससे यही बात कही कि बनारस में....

उसके पास ले-देकर एक उदाहरण था

यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत

यहाँ आटे की चक्की है

एक जंग लगे टिन को रगड़-रगड़
प्राइमर के ऊपर काला रंग पोत
सफ़ेद अक्षरों में लिखा गया है इसे
और टाँग दिया गया है बिजली के खम्भे के सीने पर

यहाँ आटे की चक्की है
इस इबारत के ठीक नीचे बना है एक तीर

यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत
कि ग्राहक को ठीक-ठाक पहुँचा सके चक्की तक

माना कि बड़ी सामर्थ्य है शब्द में

बैठक का कमरा

चली आ रही हैं गर्म-गर्म चाय भीतर से
लज़ीज़ खाना चला आ रहा है भाप उठाता
धुल के चली आ रही हैं चादरें परदे
पेंण्टिग पूरी होकर चली आ रही है
सँवर के आ रही है लड़की

जा रहे हैं भीतर जूठे प्याले और बर्तन
गन्दी चादरें जा रही हैं परदे जा रहे हैं
मुँह लटकाये लड़की जा रही है
पढ़ लिया गया अख़बार भी

खिला हुआ है कमल-सा बाहर का कमरा

अपने भीतर के कमरों की क़ीमत पर ही खिलता है कोई
बैठक का कमरा
साफ़-सुथरा सम्भ्रान्त

जिसे रोना है भीतर जा के रोये
जिसे हँसने की तमीज नहीं वो भी जाए भीतर
जो आये बाहर आँसू पोंछ के आए
हँसी दबा के
अदब से

जिसे छींकना है वहीं जाए भीतर
खाँसी वहीं जुकाम वहीं
हँसी-ठट्ठा मारपीट वहीं

वहीं जलेगा भात
बूढ़ी चारपाई के पायों को पकड़ कर वहीं रोएगा पूरा घर
वहीं से आएगी गगनभेदी किलकारी और सठोरों की ख़ुशबू

अभी-अभी ये आया गेहूँ का बोरा भी सीधे जाएगा भीतर
स्कूल से लौटा ये लड़का भी भीतर ही जा कर आसमान
सिर पर उठाएगा

निष्प्राण मुस्कुराहट लिये अपनी जगह बैठा रहेगा
बाहर का कमरा

जो भी जाएगा घर से बाहर कभी, कहीं
भीतर का कमरा साथ-साथ जाएगा

कबीर

(1)

सामने छात्रगण
गुरु पढा रहे हैं कबीर

सूखते गलों के लिए
एक काई लगे घड़े में पानी भरा है

गुरु पढ़ा रहे हैं कबीर
बीच बीच में घड़े की ओर देख रहे हैं

बीच-बीच में उनका सीना चौड़ा हुआ जा रहा है

(2)

कौन जाएगा मरने मगहर
सबको चाहिए काशी अभी भी
मगहर वाले भी यह सोचते हुए मरते हैं सन्तोष से

वे मगहर में नहीं
अपने घर में मर रहे हैं

(3)

इतनी विशालकाय वह मूर्ति
कि सौ मज़दूर भी नहीं सँभाल पाये
उसे खड़ा करना मुश्किल

पत्थर नहीं
एक पहाड़ पूजा जाएगा अब

(4)

एक नहीं
दसियों लाउडस्पीकर हैं
एक ही आवाज़ अपनी कई आवाज़ों से टकरा रही है
पखेरू भाग खड़े हुए हैं पेड़ों से
अब और भी कम सुनाई पड़ता है ईश्वर को

(5)

जब केवल पाँच प्रश्न हुआ करते थे हल करने को
अनिवार्य थे कबीर
आज अनगिनत प्रश्न हैं

* यहां भी देखें: नया साल मुबारक हो

Thursday, July 17, 2008

जहां से भी देखो

साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित श्री लीलाधर जगूड़ी जी हिन्दी कविता के पाठकों के लिये कोई नया नाम नहीं हैं. कबाड़ख़ाने में आप लोग उन्हें एकाधिक बार पढ़ चुके हैं. उनकी एक बहुत छोटी, ताज़ा, अप्रकाशित कविता पढ़िये:

अपने से बाहर

घाटी में था तो
शिखर सुन्दर दिखता था
शिखर पर पहुंचा
तो बहुत सुन्दर दिख रही घाटी.

अपने से बाहर जहां से भी देखो
दूसरा ही सुन्दर दिखता है.

------
इस ब्लॉग पर जगूड़ी जी की अन्य कविताओं के लिंक:

प्रेम, गिलहरी और गाय
तुम अपने बाहर को अन्दर जानकर अपने अन्दर से बाहर आ जाओ
ऊंचाई है कि
नंदीग्राम और तसलीमा पर लीलाधर जगूड़ी की एक छोटी कविता

Wednesday, July 16, 2008

पटियाला बरास्ता काबुल: संगीत की एक यात्रा पर चलिये



पूर्वी शास्त्रीय संगीत के महानतम ख़लीफ़ाओं में एक उस्ताद मोहम्मद हुसैन सराहंग अफ़ग़ानिस्तान के विख्यात संगीतकार उस्ताद ग़ुलाम हुसैन के सुपुत्र थे. मोहम्मद हुसैन सराहंग का जन्म १९२४ में पुराने काबुल यानी खराबात में हुआ था. परम्परा से ही यह शहर संगीतकारों के लिये जाना जाता रहा है.

स्कूल जाने की आयु से ही उस्ताद ने अपने पिता से संगीत के शुरुआती पाठ सीखना शुरू किए. बहुत जल्द ही पिता से सारा कुछ सीख चुके इस किशोर लड़के की संगीत में रुचि देखते हुए ग़ुलाम हुसैन साहब ने मोहम्मद को भारत के पटियाला संगीत विद्यालय में 'द लाइट ऑफ़ पंजाब' के नाम से जाने जाने वाले उस्ताद आशिक़ अली ख़ान के पास भेज दिया. अगले सोलह सालों तक गुरू की सेवा और उनसे संगीत की बारीकियां सीखने के बाद मोहम्मद हुसैन वापस काबुल लौट गए. २५ साल की आयु में काबुल के प्रसिद्ध पामीर सिनेमा में होने वाले संगीत महोत्सव में शिरकत की और पहली ही सार्वजनिक महफ़िल में संगीतमर्मज्ञों का दिल जीत लिया.

बहुत जल्द ही अफ़गानिस्तान की सरकार ने उन्हें 'सराहंग' की उपाधि से नवाज़ा. जीवन भर संगीत सेवा में लगे रहे उस्ताद ने ख़याल, ठुमरी, तराना, ग़ज़ल और अन्य शास्त्रीय प्रारूपों पर भी ख़ूब काम किया. चन्डीगढ़ स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक ने उन्हें 'कोह-ए-बलन्द' की उपाधि से सम्मानित किया तो इलाहाबाद के सेन्ट्रल स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक ने उन्हें 'सरताज-ए-मौसीक़ी' कहा. १९७९ में दिल्ली में हुई उनकी आख़िरी कन्सर्ट में उन्हें 'बाबा-ए-मौसीक़ी' का ख़िताब अता किया गया.
उस्ताद ने भारत में क़रीब ५०० राग और ग़ज़लें रेकॉर्ड किए. अमीर खुसरो और अबुल मानी बेदिल का कलाम उन्होंने ख़ूब गाया. इसके अलावा उन्होंने शास्त्रीय संगीत और रागों को लेकर 'क़ानून-ए-तरब' और 'मौसीक़ी-ए-राग-हा' नाम की दो महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं.

१९८३ में उस्ताद का देहान्त हो गया.

इस महान गायक के साथ मेरा परिचय फ़क़त एक दिन पुराना है. कल जीवन में पहली बार असद ज़ैदी साहब से टेलीफ़ोन पर हुई छोटी सी बातचीत के दौरान उन्होंने उस्ताद सराहंग के बारे में बड़ी मोहब्बत के साथ बताया और आज मेरे मेलबॉक्स में असद जी ने उस्ताद का गाया राग यमन अटैच कर के भेजा हुआ था.

सुनने के बाद मेरी पहली प्रतिक्रिया थी: "क्या बात है!" उसके बाद नैट खंगालने का जुनून चालू हुआ और उस्ताद मोहम्मद हुसैन सराहंग का अच्छा ख़ासा संग्रह दिन भर में जमा हो गया.

कबाड़ी द्वारा जुटाए गए इसी ख़ज़ाने से आपके लिए पेश है वही बड़े गु़लाम अली ख़ान साहब की याद दिलाने वाला अमर-अजर-अद्वितीय "याद पिया की आए".

यह पोस्ट हमारे समय के अद्भुत और बड़े कवि माननीय असद ज़ैदी जी को बहुत सारे प्यार और इज़्ज़त के साथ पेश की जाती है. उनके साथ आप भी सुनें.



(आने वाले समय में उस्ताद मोहम्मद हुसैन सराहंग को आप और-और सुनेंगे.)

Tuesday, July 15, 2008

बहुत हुई गुर्र,फ़ुर्र, हुर्र,तुर्र: अब सुनो गाना- 'अभी तो मैं जवान हूं'

कविता,कवि और छवि को लेकर
बहस जारी है- जारी रहेगी
लेकिन संगीत तो चलेगा -चलता रहेगा.


ता
रहेगा
गा-गा-गा
मैं ना बताऊंगा कौन रहा है गा
आप ही बूझो और लेवो मजा
'अउर किया'

आनन्द शंकर के संगीत का मज़ा लेना है तो यहाँ आइये....


आज बहुत दिनों बाद आपसे रूबरू होने का मौका मिला है....क्या किया जाय कारण नौकरी भी थी.....और अपना कम्प्यूटर भी साथ नहीं दे रहा था.....और मन तो कब का अनमनाया सा ही है...कुछ भी सुनने सुनाने का दिल भी नहीं कर रहा था....इस तरह के मूड में कुछ ऐसी संगीत रचनाएं सुनने को मिल जाती हैं जो आपको अपने आस पास की दुनियाँ से अलग किसी और ही उड़ान पर ले जाता है.....और ऐसे मौके पर आनंद शंकर की कुछ रचनाएं तो राम बाण साबित होती हैं.........सुनते रहिये अपनी उड़ान भरते रहिये......खो जाइये मधुर संगीत की दुनियाँ में। अगर उनके बारे मे कुछ जानना हो तो यहाँ चटका लगा के जान सकते हैं.....

मैने आनन्द शंकर के बैले ग्रुप को देखा है.. वो तो एक अलग ही दुनियाँ रचते थे.....आज उनकी दो मधुर रचना पेश कर रहा हूँ....सुनिये और अपने को भूलकर सुनिये मज़ा आयेगा...... ये दोनों आनन्द शंकर के अलबम(A Life In Music Best Of The EMI Years (2006))से हैं

पहली रचना ...............Missing you



और ये दूसरी रचना है..........The River

ये देश है वीर जवानों का उर्फ़ भुस भरने का नवीनतम फ़ॉर्मूला

अ स द ज़ै दी
अ स द जै दी
अ स द जी दी
अ स द जी दो
अ स द जो शी
अ स द जो थी
अ स द जो था
अ स द जो सो
अ स द सो सो
आ स व ही दो
ई स प की पो
मः गः पः सः हः
प म ग स र
ब ज ज़ फ फ़
ट ट ट ट ट
टः टः टः टः टः
ठ ठ ठ ठ ठ
ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं
छ छ छ छ छ
छा छा छा छा छा
छी छी छी छी छी
थ थ थ थ थ
थू थू थू थू थू
थू थू थू थू थू
थू थू थू थू थू
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
तू तू तू तू तू
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं
मैं मैं मैं मैं मैं

म्याऊं
भौं
पौं
चीं ...

(अपनी योग्यतानुसार फ़ॉर्मूले को बढ़ा-घटा सकते हैं. इस गणित में यह सहूलियत है. कोई नियम-कानून नहीं. कोई फ़िक्स्ड फ़ॉर्मूला नहीं. न कोई मास्टर, न कोई इस्कूल. सब फ़िरी-फ़ोकट. जल्दी चालू हों.)

... ऐसी भी कुछ विशेषज्ञों की सलाह है कि प्रश्न हल हो जाने पर (या न होने पर भी) अपने दोनों हाथों को हवा में उठा कर धीमा भांगड़ा नाचते हुए निम्न पंक्तियों को बारम्बार गाया जाए.

"इस देश का यारो ... होए!!!
इस देश का यारो ... हुर्र ...!!!

इस देश का यारो ... होए!!!
इस देश का यारो ... हुर्र !!!

इस देश का यारो ... होए!!!
इस देश का यारो ... हुर्र !!!"

Monday, July 14, 2008

पर मैं हाथ तक नहीं लगाऊंगा चीज़ों को नष्ट करने के लिए

15 जून 1970 मध्य प्रदेश के सतना ज़िले में जन्मे विजयशंकर चतुर्वेदी को ब्लॉगजगत में उनके बेबाक आज़ाद लब के माध्यम से जाना जाता है. कुछ दिन पहले उनके कवि रूप से एक बार आपको कबाड़ख़ाना में परिचित कराने की छोटी सी कोशिश की थी. घरेलू फ़ोटो अलबम को लेकर लिखी उनकी एक कविता को बहुत पसन्द किया गया था.

सदियों से भारतीय पारम्परिक समाज की धुरी का काम कर रही परिवार नाम की इकाई विजयशंकर को बहुत गहरे छूती है और इस बेहद व्यक्तिगत संसार में अपनी और अपने समाज की जड़ें तलाशते हुए वे कितनी ही सारी अनचीन्ही, अजानी जगहों की तरफ़ जा रहे रास्तों पर निकल आते हैं. इस काम को कविता में कर पाना बहुत मुश्किल का काम है. एक तो ख़तरों से भरी इस डगर पर किसी भी पहली सुरक्षित मांद में घुस जाना सबसे सहूलियतभरा होता है और इस विषय पर कलम चलाते हुए हमारे यहां हिन्दी में बड़े-बड़े स्वनामधन्य महाकवि टें बोल चुके हैं. बहुत साहस और सतर्कता के साथ आगे बढ़ते हुए किसी गुप्त ख़ज़ाने की सी तलाश में निकले कवि को अपने चोर दरवाज़े ख़ुद तलाशने होते हैं. इस लिहाज़ से मुझे विजयशंकर चतुर्वेदी एक अति साहसी कवि नज़र आते हैं.

उनकी एक अति विलक्षण कविता है 'साहचर्य'. मुझे व्यक्तिगत रूप से यह मानने में कोई हिचक नहीं कि आज तक पढ़ी हज़ारों प्रेम कविताओं के बीच से अगर कोई दस श्रेष्ठतम कविताएं चुनने को कहा जाए तो मैं बेशक इसे उस लिस्ट में जगह दूंगा. ज़रा देखिये इस कविता का ग़ज़ब का फ़ॉर्मेट और क्या अंडरस्टेटेड सेंसुअलिटी:


आल्मारी बन्द थी कस के
और पत्नी से चल रही थी खटपट
भीतर बंद थीं बहुत ज़रूरी चीज़ें हमारी

पहले तो वह झूलती रही हत्थे से
धरती पर पांव गड़ाकर
ज़ोर लगाया दीवार ठेलकर
और फिर मेरी तरफ़ देखा कातर
मैं साथ देने उठा हंसकर
खुल गए कपाट दुनिया के
धड़ाम से पीछे गिरे हम
जाने कितनी यादें आ गिरीं हम पर.

इसी क्रम में संसार भर की चीज़ें शनैः शनैः विजयशंकर के ख़ज़ाने में प्रवेश होती चली आती हैं और कविता से यह कवि किसी उस्ताद जासूस के औज़ारों का सा काम ले लेता है. बीसवीं सदी की सारी चिन्ताएं, सारे सरोकार एक अलग ज़ुबान में इस कवि के हाथों अद्वितीय कोणों से झलमल करने लगती हैं जैसे कि आप उन्हें किसी कैलाइडोस्कोप के भीतर से देख रहे हों.

अपने कविकर्म को लेकर विजयशंकर का क्या मानना है, यह उनकी 'बीज' शीर्षक छोटी सी कविता में देखिये:


हटो ... हटो ... हटो
पृथ्वी बेपर्द
उठो ... उठो ... उठो हिमालय
ओ ज्वालामुखी मुझे उगने दो
पाताल लोक फटो ...

कविता का जादू इस में है कि कवि हिमालय से ऊंचा उठ पाने के साथ साथ पाताल के खड्डे के बारे में भी सोच सकता है. ख़ैर, ज़्यादा बकबक नहीं करूंगा ताकि आप उनकी कविताओं का आनन्द ले सकें. बस एक ज़रूरी ख़बर यह है कि विजयशंकर चतुर्वेदी का संग्रह 'पृथ्वी के लिए तो रुको' बहुत जल्द ही छप कर आने को है. हमारे समय के बड़े कवि श्री लीलाधर जगूड़ी ने इस संग्रह की भूमिका लिखी है. कवि को कबाड़ख़ाने की शुभकामनाएं.

संबंधीजन

मेरी आंखें हैं मां जैसी
हाथ पिता जैसे हैं
चेहरा-मोहरा मिलता होगा ज़रूर
कुटुंब के किसी आदमी से

हो सकता है मिलता हो दुनिया के पहले आदमी से
मेरे उठने-बैठने का ढंग
बोलने-बतियाने में हो उन्हीं में से किसी एक का रंग
बहुत संभव है मैं होऊं उनका अंश
जिन्होंने देखे हों दुनिया को सुन्दर बनाने के सपने
क्या पता गुफाओं से पहले पहल निकलने वाले रहे हों मेरे अपने
या फिर पुरखे रहे हों जगदगुरु शिल्पी
गढ़ गए हों दुनिया भर के मन्दिरों में मूर्तियां
उकेर गए हों भित्तिचित्र
कौन जाने कोई पुरखा मुझ तक पहुंचा रहा हो ऋचाएं
और धुन रहा हो सिर

निश्चित ही मैं सुरक्षित बीज हूं सदियों से दबा धरती में
सुनता आया हूं सिर पर गड़गड़ाते हल
और लड़ाकू विमानों का गर्जन.

यह समय है मेरे उगने का
मैं उगूंगा और दुनिया को धरती के क़िस्सों से भर दूंगा
मैं उनका वण्शज हूं जिन्होंने चराई भेड़ें
और लहलहा दिए मैदान

संभव है कि हमलावर मेरे कोई लगते हों
कोई धागा जुड़ता दिख सकता है आक्रांताओं से
पर मैं हाथ तक नहीं लगाऊंगा चीज़ों को नष्ट करने के लिए
भस्म करने की निगाह से नहीं देखूंगा कुछ भी
मेरी आंखें मां जैसी हैं
हाथ पिता जैसे.



देवता हैं तैंतीस करोड़

बहुत दिनों से देवता हैं तैंतीस करोड़
उनके हिस्से का खाना-पीना नहीं घटता
वे नहीं उलझते किसी अक्षांश-देशांतर में
वे बुद्धि के ढेर
इन्द्रियां झकाझक उनकीं
सर्दी-खांसी से परे
ट्रेन से कटकर नहीं मरते
रहते हैं पत्थर में बनकर प्राण
कभी नहीं उठती उनके पेट में मरोड़
देवता हैं तैंतीस करोड़

हम ढूंढ़ते हैं उन्हें
सूर्य के घोड़ों में
गंधाते दुखों में
क्रोध में
शोक में
जीवन में
मृत्यु में
मक्खी में
खटमल में
देश में
प्रदेश में
धरती में
आकाश में
मंदिर में
मस्जिद में
दगे में
फ़साद में
शुरू में
बाद में
घास में
काई में
बाम्हन में
नाई में
बहेलिये के जाल में
पुजारी की खाल में
वे छिप जाते हैं सल्फ़ास की गोली में

देवता कंधे पर बैठकर चलते हैं साथ
परछाई में रहते हैं पैबस्त
सोते हैं खुले में
धूप में
बारिश में
गांजे की चिलम में छिप जाते हैं हर वक़्त

नारियल हैं वे
चंदन हैं
अक्षत हैं
धूप-गुग्गुल हैं देवता
कुछ अंधे
कुछ बहरे
कुछ लूले
कुछ लंगड़े
कुछ ऐंचे
कुछ तगड़े
बड़े अजायबघर हैं
युगों-युगों के ठग
जन्मांतरों के निष्ठुर
नहीं सुनते हाहाकार
प्राणियों की करुण पुकार

हम तमाम उम्र अधीर
मांगते वर गंभीर
इतनी साधना
इतना योग
इतना त्याग
इतना जप
इतना तप
इतना ज्ञान
इतना दान
जाता है निष्फल

वे छिपे रहते हैं मोतियाबिन्द में
फेफड़ों के कफ़ में
बालों के तेल में
हमारी पीड़ाएं नुकीले तीर
छोड़ती रहती है धरती से आकाश
और बच-बच निकल जाते हैं तैंतीस करोड़ देवता

हमारा घोर एकान्त
घनी रात
भूख-प्यास
घर न द्वार
राह में बैठे खूंखा़र
तड़कता है दिल-दिमाग़
लौटती हैं पितरों की स्मृतियां
राह लौटती है
लौटते हैं युग
वह सब कुछ लौटता है
जो चला गया है चौरासी करोड़ योनियों का
और तिलमिला उठते हैं
तैंतीस करोड़ देवता.



बयानात

पिता का बयान है-
वह हंसने-खेलने वाली लड़की थी
ज़िन्दगी में कोई तकलीफ़ नहीं थी उसे
वह सजा रही थी भविष्य के सपने

भाई ने बताया -
कल ही तो कहा था उस ने
भैया, अभी मत आना
मैं जा रही हूं इनके साथ बाहर कहीं घूमने

सहेलियों ने याद किया -
हममें सबसे अच्छी बोलनेवाली थी वह
सबसे अच्छी खिलाड़ी
बड़ी ज़िन्दादिल

मां ने छाती पीट ली -
हे विधाता! इसका ही अन्देशा था मुझे

कितना कुछ छिपाती रहती हैं लड़कियां
आत्महत्या के दिन पहले तक
... और कितना छिपाती रहती है मां ज़िन्दगी भर.



विज्ञापन

एक विज्ञापन हमारी आत्मा को काटते-काटते खुद को काट देता है एक दिन
तब गढ़ लिया जाता है दूसरा विज्ञापन
हमारी उगाई फ़सलों के बारे में हमीं को बरगलाया जाता है
हमारा अन्न हमीं को सोना बताया जाता है

कौन करता है यह छल
कौन पी जाता है हमारे जीवन का मीठा जल?
पानी की कमी का
क्यों नहीं होता विज्ञापन पथराई आंखों की नमी का?

एक स्त्री करती है प्यार का विज्ञापन
हमारी कोमल भावनाएं सहलाते हुए
एक पुरुष करता है मर्दानगी का विज्ञापन
हमारी हैवानियत उकसाते हुए

एक विज्ञापन हमें सुलाने की कोशिश करता है
झूठी लोरियां गाकर
मां को डस लेता है यह विज्ञापन.



प्रेम ही करूं

प्रेम ही करूं
बसूं सबके मन
घोड़ों पर सवार दौड़ता फिरूं
नाप लूं पल में गगन
ओस की बूंद में नाचूं
सुनूं पत्तियों का सितार

सदा ही रहू गतिमय
खड्ग में -खंभ में
तुझ में - सबमें
ख़ुद में लौटूं बार-बार

बहूं पवन में
चूम लूं सारा संसार
प्रेम ही करूं.



दस मौतें

पहला तीखा बहुत खाता था, इसलिए मर गया
दूसरा मर गया भात खाते-खाते
तीसरा मरा की दारू की थी उसे लत
चौथा नौकरी की तलाश में मारा गया
पांचवे को मारा प्रेमिका की बेवफ़ाई ने
छठा मरा इसलिए कि वह बनाना चाहता था घर
सातवां सवाल करने के फेर में मरा
आठवां प्यासा मर गया भरे समुद्र में
नौवां नंगा था इसीलिए शर्म से मरा ख़ुद-ब-ख़ुद
दसवां मरा इसलिए कि कोई वजह नहीं थी उसके जीने की.

Sunday, July 13, 2008

असद ज़ैदी के बहाने दो बातें और

बात सन अस्सी के दशक के आखिरी सालों की है. कॉलेज-कैंटीन में साहित्य-कला वगैरह पर बातें-बहसें करना नया शौक़ बना था. 'हंस' दुबारा छपनी शुरू हुई थी और उन शुरुआती सालों के 'हंस' के अंक वाक़ई संग्रहणीय हुआ करते थे. 'पहल', 'अलाव', 'संदर्श', 'परिवेश' और जाने कौन कौन सी पत्रिकाओं ने नैनीताल में डाक से आना शुरू कर दिया था.

शायद 'हंस' में ही छपी थी 'दुर्गा टॉकीज़' शीर्षक कविता. सही-सही याद नहीं पड़ता. मैं एकदम से सन्न रह गया था उसे पढ़कर. 'यानी कविता में यह सब भी किया जा सकता है!' - यह मेरी पहली प्रतिक्रिया थी उसके बाद.

बचपन की आदत है - जो पसन्द आए उसे चाहे जैसे भी हो, पूरी तरह खोजना. किसी फ़रिश्ते की तरह तब जीवन में वीरेन डंगवाल जी का आना हुआ. उन्होंने मुझे असद ज़ैदी की किताब 'बहनें और अन्य कविताएं' की प्रति कहीं से लाकर दी.

कविता-पोस्टर बनाने का चस्का लगा था सन १९९० के आसपास. हज़ारों पोस्टर बनाए. शायद असद जी की हर कविता का पोस्टर कम से कम एक बार तो बनाया ही होगा.

बहुत सालों तक यही एक संग्रह मेरे पास था. मालूम करने पर पता चलता था कि ज़ैदी साहब ने और कोई किताब अभी नहीं छपाई है.

इस साल के पुस्तक मेले में जो पहली किताब मैंने ख़रीदी वह थी 'सामान की तलाश'. असद ज़ैदी का यह संग्रह आने वाले समय में अपनी साहसपूर्ण अभिव्यक्ति, विषयों की विविधता और नई काव्य-भाषा के लिए मील का पत्थर बनने वाला है. २९ मार्च और २६ जून इस संग्रह से दो कविताएं कबाड़ख़ाना आपके सामने रख ही चुका है.

कल एक ब्लॉग पर असद जी की कविताओं के साथ जो कुछ सुलूक हुआ उस से मेरा दिल बेतरह क्षुब्ध है.

असद ज़ैदी अगर साम्प्रदायिक कवि हैं तो हज़रत बाबा अमीर ख़ुसरो, कबीरदास, तुलसीदास, निराला, बुल्लेशाह, मुक्तिबोध, वीरेन डंगवाल, विष्णु खरे, रघुवीर सहाय, नागार्जुन ... सारे के सारे परम साम्प्रदायिक कवि हैं.

असद जी का दोष उनके नाम में है. मुसलिये हैं ना! कटुए हैं! पाकिस्तान क्यों नहीं चले जाते?

असद जी की कविताओं पर कीचड़ फेंकने वाले महानुभावों की मृत संवेदनाओं की स्मृति में दो मिनट का मौन और दो ही कविताएं अपने इस प्रिय कवि की:


सुबह की दुआ

जीवित रहे मेरी रज़ाई जिसने मुझे पाला है
जीवित रहे सुबह जो मेरी ख़ुशी है

और रहें फिर संसार में वे जिन्हें रहना है.

मौखिक इतिहास

कुछ होना था सत्तर के दशक में जो नहीं हुआ
अस्सी के दशक में चलने लगीं उल्टी - सीधी हवाएं
और नब्बे के दशक में जो नहीं होना था हो ही गया

इस तरह सदी के ख़त्म होने से पहले ही
रुख़सत हो चली एक पूरी सदी

अब यह सब अध्ययन की वस्तु है

और चूंकि हम बीसवीं सदी के कुछ प्रतिनिधि नमूने हैं
तो गैलैक्सी चैनल की मौखिक इतिहास परियोजना के तहत
एक प्रश्नावली और एक माइक लेकर आ रहे हैं
इक्कीसवीं सदी के ये शोधकर्ता जिन्हें
इक्कीसवीं का अलिफ़ और सदी का ये पता नहीं

ये हमसे क्या पूछ सकेंगे
इन्हें हम क्या समझा सकेंगे!

सिवा इसके कि मैं साफ़ हज़ामत बनाकर
ज़रा तनकर कुर्सी पर बैठूं
और मेरी बीवी भी इस मौक़े पर
बालों में कंघी कर ले.

('दुर्गा टॉकीज़' बहुत जल्दी पढ़िये इसी ब्लॉग पर.)

असद ज़ैदी को कबाड़ख़ाने पर यहां भी पढ़ें:

१८५७: सामान की तलाश
जो देखा नहीं जाता

Friday, July 11, 2008

आने वाले संसार में विज्ञान और कविता का राज्य होगा: बिली जोएल को सुनिए



सन १९९३ में बिली जोएल का संग्रहणीय अलबम 'रिवर ऑफ़ ड्रीम्ज़' रिलीज़ हुआ था. एक अर्से से बिली मेरे प्रिय गायक-संगीतकारों में रहे हैं. विश्व के सबसे प्रतिभाशाली पियानोवादकों में शुमार किए जाने वाले बिली अपने गीत ख़ुद लिखते हैं और उनका संगीत भी बनाते हैं. 'रिवर ऑफ़ ड्रीम्ज़' के गीतों का स्वर बहुत गम्भीर है. यहां प्रस्तुत किये जा रहे उनके गीत 'वी आर टू थाउज़ैंड ईयर्स' को सुनिये और देखिए बिली जोएल कितने साफ़ शब्दों में कितनी ज़रूरी चीज़ों को रेखांकित करते जाते हैं. ख़ास तौर पर कबाड़ख़ाने के श्रोताओं के लिए गीत का अंग्रेज़ी से अनुवाद भी प्रस्तुत है:



In the beginning
There was the cold and the night
Prophets and angels gave us the fire and the light
Man was triumphant
Armed with the faith and the will
Even the darkest ages couldn't kill

Too many kingdoms
Too many flags on the field
So many battles, so many wounds to be healed
Time is relentless
Only true love perseveres
It's been a long time and now I'm with you
After two thousand years

This is our moment
Here at the crossroads of time
We hope our children carry our dreams down the line
They are the vintage
What kind of life will they live?
Is this a curse or a blessing that we give?

Sometimes I wonder
Why are we so blind to fate?
Without compassion, there can be no end to hate
No end to sorrow
Caused by the same endless fears
Why can't we learn from all we've been through
After two thousand years?

There will be miracles
After the last war is won
Science and poetry rule in the new world to come
Prophets and angels
Gave us the power to see
What an amazing future there will be

And in the evening
After the fire and the light
One thing is certain: Nothing can hold back the night
Time is relentless
And as the past disappears
We're on the verge of all things new
We are two thousand years

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प्रारम्भ में
बस ठंड थी और रात
पैगम्बरों और फ़रिश्तों ने हमें आग और रोशनी दी
मनुष्य विजयी हुआ
उसके पास विश्वास था और इच्छाशक्ति
जिन्हें सबसे अन्धेरे युग भी नहीं मार सके.

इतने सारे राज्य
धरती पर इतने सारे झंडे
इतने सारे युद्ध, इतने सारे घाव जिन पर मरहम लगाया जाना है
समय बड़ा क्रूर होता है
जिसमें बस सच्चा प्रेम ही बचा रह पाता है
बहुत दिन गुज़र गए पर अब मैं तुम्हारे साथ हूं
दो हज़ार सालों के बाद

यह हमारा क्षण है
हम खड़े हैं यहां समय के चौराहे पर
हम उम्मीद करते हैं कि हमारे बच्चे हमारे सपनों को आगे ले जाएंगे
उनमें बहुत पुरानापन है
कैसी ज़िन्दगी जियेंगे वे?
क्या हम उन्हें शाप दे रहे हैं या आशीर्वाद?

कभी मैं सोचता हूं
हम इतने अंधे क्यों हैं भाग्य को लेकर?
बिना प्यार के नफ़रत का कोई अन्त नहीं हो सकता
न ही दुःख का
जिनके पीछे होते हैं वही अन्तहीन भय.
हम क्यों नहीं सीखते उस सब से जो बीता है हम पर
दो हजार सालों बाद भी?

आख़िरी युद्ध के जीत लिए जाने के बाद
चमत्कार होंगे
आने वाले संसार में विज्ञान और कविता का राज्य होगा
पैगम्बरों और फ़रिश्तों ने
हमें यह देखने की शक्ति दी है.
क्या शानदार होगा वह भविष्य.

और शाम को
आग और रोशनी के बाद
एक बात तो तय है: कोई नहीं रोक सकता रात को
समय बहुत क्रूर होता है
और जैसे जैसे बीता हुआ कल अदृश्य होता जाएगा
हम लोग नई चीज़ों की देहरियों पर होंगे.
हम हैं दो हज़ार साल.

Thursday, July 10, 2008

क्या देश के आम नागरिक को वास्तविकता के बारे में बताना अपराध है

कुछ दिन पहले कबाड़ख़ाने में एक ईमानदार आई. पी. एस. अफ़सर अभिनव कुमार को लेकर एक आलेख छापा गया था. मामला यूं था कि इस अत्यधिक प्रतिभावान और पढ़े लिखे अफ़सर की बेबाकी हमारे आला हुक्मरानों के क़तई गले नहीं उतर पाई थी. छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशों में भारी विसंगतियों को लेकर अभिनव ने इन्डियन एक्सप्रेस में दो लेख लिखे थे. बहुत सलीके से भारतीय अफ़सरशाही की बखिया उधेड़ते इन लेखों के कारण केन्द्र सरकार ने अभिनव को बाक़ायदा एक नोटिस भेजा जिसकी तफ़सील आप पिछली पोस्ट में पढ़ चुके हैं.

अभिनव की कलम की ईमानदारी देखनी हो तो उन का लेख 'लोनली मैन विद लाठी' पढ़ियेगा. यह बात दीगर है कि पिछले कई सालों से इस प्रतिष्ठित अख़बार में नियमित रूप से पुलिस कान्स्टेबलों की सरकारी दुर्गति को लेकर लिखे गए उनके किसी भी लेख पर केन्द्र को क्या राज्य सरकार को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई.

बहरहाल अपने लेख 'द अदर कास्ट-सिस्टम' में वे लिखते हैं: "अखिल भारतीय सेवाओं ने देश की उम्मीदों को पराजित करना कब शुरू किया? क्या १९७० के दशक में लगी इमरजेन्सी ने? या १९८४ के सिख विरोधी दंगों के समय? या क्या १९९२ में हुआ बाबरी मस्जिद का ध्वंस संभवतः एक बेहतर निर्धारक-चिन्ह माना जा सकता है?"

इसी लेख में आगे जाकर उनका मानना है कि "वैश्वीकरण के पन्द्रह सालों बाद, राजनेताओं और व्यवसाइयों को अपने अन्तहीन लालच से निर्मित खेल की हदें तराशने के लिए आई.ए.एस. अफ़सरों की ज़रूरत पड़ती है, जबकि आई.पी.एस. का काम इस स्वार्थ और लूट से उपजने वाले हिंसक सामाजिक प्रभावों का प्रबंधन भर रह गया है."

इस लेख में अभिनव कुमार छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशों को भारतीय लालफ़ीताशाही के इतिहास की नई मनुस्मृति बताते हुए राजनीति-अफ़सरशाही-व्यवसायी के लौह त्रिकोण को अनावृत्त करते हुए बताते हैं कि कैसे एक स्वार्थप्रेरित साज़िश की मदद से सारा देश लुटेरों के हाथों गिरवी धर दिया गया है.

जाहिर है एक सेवारत अफ़सर के ये बयान आसानी से इस लौह-त्रिकोण को पचने वाले नहीं थे. केन्द्र सरकार की चिट्ठी के कुछ अंश पुनः उद्धृत कर रहा हूं जिसमें अभिनव कुमार से राज्य सरकार की मारफ़त अपना स्पष्टीकरण देने का 'आदेश' दिया गया था:

Shri Kumar has alleged/implied that only coalitions of vested interest come to power through elections and that they take the patronage of the Indian State in cash or kind and has further stated that the IAS exists today only to deliver this patronage in an organized and legitimate manner and take its own cut in cash or kind. He has attempted to paint all parties and politicians with the same brush and has, in that context, alleged/implied that all of them are involved in the loot of the nation in their own selfish interests. It is further alleged that all IAS officers are only engaged in delivering this loot to the politicians and take their own cut in cash or in kind.

The writer has explicitly stated that the nation is presided over by a triad of politicians, businessman and bureaucrat kleptocracy. Kleptocracy is defined as a government or state in which those in power exploit natural resources and steal; rule by a thief or thieves. The term kleptocracy is used for high level corruption by senior officials. Therefore, the writer has implied that the nation is ruled by an evil triad of politicians bureaucrats and politicians and their rule is a rule of thieves. He has also stated that the politicians and the businessmen are even now shaping the rules of the game in a manner suited to their unending greed and that the IAS officers are helping them in this nefarious purpose. He has further made serious accusations by stating that the IAS is concerned only with ensuring its own primacy even at the cost of the national interest.

He has criticized the entire 6th CPC which comprised Justice B.N. Shrikrishna as Chairmen and Prof Ravindra Dholakia, Shri J.S. Mathur and Smt Sushma Nath as Members, by accusing the members of the Commission of seeking to undermine the very letter and spirit of the Constitution by appropriating the Indian state as the plaything of the IAS.

He has also cast aspersions on the integrity of very senior officers of the Government of India who comprise the Committee of Secretaries formed to consider the recommendations of the 6th CPC by stating they cannot rise above service interests in looking into the grievances of officers including IPS officers. It is apparent that he is also casting aspersions on the integrity of the non IAS members of the Committee by implying that they would not have any role to play in the ultimate decision of the Committee. The officers against whom such statements have been made are the Cabinet Secretary, the Home Secretary, the Defence Secretary, the Expenditure Secretary, The Secretary Department of Personnel and Training, the Secretary Department of Pension and Pensioners’ Welfare, the Secretary Department of Posts, the Secretary Department of Science and Technology, Financial Commissioner, Railway Board, Deputy Comptroller and Auditor General and Secretary (security) Cabinet Sectt. Implicitly the writer has also criticized the action and the policy of the government and of the highest authority in the government by calling into the question the composition of the Committee of Secretaries and implying that it is not capable of looking into the issue in an impartial, unbiased and objective manner.


अब देखिये इसी चिट्ठी को राज्य स्तर पर प्रमुख सचिव द्वारा कैसे इस अफ़सर तक पहुंचाया जाता है:

आपके द्वारा राष्ट्रीय समाचार पत्र 'दि इन्डियन एक्सप्रेस' (नई दिल्ली संस्करण) दिनांक: २७ मार्च २००८ को 'The Other Caste System' तथा 'दि इन्डियन एक्सप्रेस' (नई दिल्ली संस्करण) दिनांक: २३ मार्च २००८ को 'By the IAS for the IAS' नामक लेख प्रकाशित किए गए हैं. उक्त लेखों की विषयवस्तु अखिल भारतीय सेवाएं आचरण नियमावली १९६८ में निहित प्रावधानों के प्रतिकूल है. उपर्युक्त लेखों में प्रतिकूल तथ्य निम्नवत हैं:

1. You have alleged that only coalitions of vested interest come to power through elections and the patronage of the Indian State in cash or kind and have further stated that the IAS exists today only to deliver this patronage in an organized and legiltimate manner and take its own cut in cash or kind .You have attempted to paint all parties and politicians with the same brush and have in that context you alleged that all of them are involved in the loot of the nation in their own selfish interests. It is further alleged that all IAS officers are only engaged in delivering this loot to the politicians and take their own cut in the bounty in cash or in kind.

2. You have explicitly stated that the nation is presided over by a triad of polticians , businssmen and bureaucrat kleptocracy. Kleptocracy is defined as a government or state in which those in power exploit national resources and steal, rule by a thief or tjieves. The term kleptocracy is used for high level corruption by senior officials. Therefore, you have implied that the nation is ruled by an evil triad of politicians, bureacurat and businessmen and their rule is a rule of thieves. You have also stated that the politicians and the businessmen are even now shaping the rules of the game in a manner suited to their unending greed and the IAS officers are helping them in this nefarious purpose. You have further made serious accusations by stating that the IAS is concerned only with ensuring its own primacy even at the cost of the national interest.

3. You have criticized the entire 6th Central Pay Commission, which comprised justice B.N. Srikrishna as Chairman and Prof. Ravindra Dholakia, Shri J.S. Mathur And Smt. Sushma Nath as members, by accusing the members of the Commission of seeking to undermine the very letter and spirit of the Constitution by appropriating the Indian state as the plaything of the IAS.

4. You have also cast aspersions on the integrity of very senior officers of the Government of India who comprise the committee of Secretaries, formed to consider the recommendations of the 6th Pay Commission by stating that they cannot rise above service interests in looking into the grievances of officers including IPS officers. It is apparent that you are also casting aspersions on the integrity of the non-IAS members of the committee by implying that they would not have any role to play in the ultimate decision of the committee. The officers against whom such statements have been made are the Cabinet Secretary, the Home Secretary, the Defence Secretary, the Expenditure Secretary, the Secretary, Department of Personal and Training, the Secretary, Department of Pension and Pensioners Welfare, the Secretary, Department of Posts, the Secretary, Department of Science and Technology, Financial Commissioner, Railway Board, Deputy Comptroller & Auditor General and Secretary (Security), Cabinet Secretariat, Implicitly, you have also criticized the action and policy of the government and of the highest authority in the government by calling into question the composition of the committee of Secretaries and implying that it is not capable of looking into issue in an impartial, unbiased and objective manner.

उपरोक्तानुसार आपके द्वारा अखिल भारतीय सेवाएं आचरण नियमावली १९६८ के नियम ७ में निहित प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है. ...

चिट्ठी में कुछ एक-दो औपचारिक वाक्य और हैं बस. आप ज़रा देखिये कि राज्य स्तर पर प्रमुख सचिव जैसे महत्वपूर्ण ओहदे से लिखे गए पत्र में पहले ही वाक्य में अभिनव कुमार को अपराधी घोषित करते हुए उसी चिट्ठी को सीधे-सीधे कॉपी-पेस्ट कर दिया गया है जो केन्द्र सरकार से भेजी गई थी.

मैंने बताया था कि अभिनव ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े-लिखे अफ़सर हैं और उनकी समझ, मानवीय मूल्यों के प्रति सजगता और ईमानदारी निर्विवाद है. इस पाये के अफ़सर को सिर्फ़ नियम - कानूनों का हवाला देकर, बिना किसी ठोस तर्क के 'धमकाया' जाना न सिर्फ़ अभिनव की समझदारी का मखौल उड़ाए जाने जैसा है बल्कि दशकों से सड़ रही हमारी लालफ़ीताशाही की कार्यप्रणाली को नंगा कर के रख देना भी है.

सरकार के इस कृत्य को मीडिया ने नोटिस किया और अभिनव के समर्थन में वह आगे भी आया. 'कादम्बिनी' के जुलाई अंक में 'कबाड़ख़ाना' के हवाले से इस बाबत एक टिप्पणी लगाई गई थी.

इसके अलावा १ जुलाई २००८ को अखिल भारतीय आई.पी.एस. एसोसियेशन द्वारा आहूत एक असाधारण बैठक में केन्द्र सरकार के इस कृत्य की निन्दा में एक प्रस्ताव पारित हुआ और इस बाबत प्रभु चावला ने 'मेल टुडे' के ७ जुलाई के अंक में छापा:

"Last week, about 150 officers of the IPS officers( Central) association met in New Delhi, among them several DGPs and IGs. Their grouse –Pay Commission, promotion norms, pensions, empanelment etc. The policemen are showing anew belligerence. They are particularly galled that ashowcause notice has been served on Abhinav Kumar, abright young SSP from the Uttarakhand cadre. His crime was that he wrote two incisive articles in anewspaper about the stepmotherly treatment to the IPS. Each time abomb blast takes scores of lives in Hyderabad, Jaipur or wherever, the Prime Minister and the Home Minister appear on TV to wax eloquent about the need to strengthen the internal security apparatus. No dispute on that. But instead of heading for the green room to comb his hair before facing the TV cameras, Shivraj Patil, perhaps the most ineffective Home Minister this country has ever had, should put his money where his mouth is and give these brअ ve officers their due."


हमारे यहां सूचनाओं पर नाग की तरह बैठी रहने वाली सरकारें और अफ़सरशाही अब भी सूचना के अधिकार के अस्तित्व में आने के बावजूद यथास्थिति बनाए रखने की हामी हैं. दफ़्तरों में कागज़-पत्तरों के अबूझ पहाड़ों के तले देश लगातार बिकता रहा है.

ऐसे में अभिनव कुमार का मानना है कि यदि देश के आम नागरिक को वास्तविकता के बारे में बताना अपराध है तो हम सब अपराधी गिने जाने चाहिये. आप क्या कहते हैं?

जुर्त, फुर्त, सुर्त, हाथ का सच्चा, बात का पक्का, लंगोटी का सच्चा यानी "हिरना समझ बूझ बन चरना"

कुमार गन्धर्व जी पर लिखी वसन्त पोतदार की अद्भुत संस्मरणात्मक पुस्तक 'कुमार गन्धर्व' (मेधा बुक्स, वर्ष २००५) को पढ़ना एक अविस्मरणीय अनुभव रहा है मेरे लिए.

किताब के एक हिस्से से कुछ दिलचस्प पंक्तियां आपके लिए:


चण्डालसिंह: हिमालय की गोद में एक देहात में रहनेवाले चण्डालसिंह नामक एक आदमी ने परिपूर्ण और सुलक्षण व्यक्ति की व्याख्या करते हुए मुझ से कहा था - 'जुर्त, फुर्त, सुर्त, हाथ का सच्चा, बात का पक्का, लंगोटी का सच्चा -ऐसा स्वभाव हो तो आदमी सच्चा आदमी.'

कुमार जी को देखते और मिलते हुए मुझे सौ वर्ष के चण्डालसिंह की याद हमेशा आती थी.

जुर्त - यानी हिम्मत -ज़ुर्रत. संगीत क्षेत्र में उनका काम और उनके व्यक्त किये हुए विचार - इनमें कुमार जी का असीम साहस हम आगे चलकर देखेंगे.

फुर्त - यानी चापल्य. संगीत छोड़कर उन्होंने उम्र भर कुछ भी किया नहीं. समय भी नहीं मिला. हां गायकी में उनका चापल्य अतुल था.

सुर्त - यानी अच्छी स्मरणशक्ति. गायक-वाद्कों की स्मरणशक्ति अच्छी होती ही है. कुमार जी अपनी उम्र के बारहवें साल से भारत - भर के गायकों के गीत मास्टर जी के यहां सुनते आए. बाद में अच्छे गुरु भी बहुत मिलेऔर उन्होंने बिना मांगे ही अपनी बंदिशें कुमार जी को दे दीं. उनके पास चीज़ों (रागों और बन्दिशों) का विशाल भंडार था.

हाथ का सच्चा यानी ईमानदार. पैसे के मामलों में ईमानदारी. यहां कुमार जी सौ फ़ीसदी सच्चे थे. पैसे के व्यवहार में इतना सच्चा कलाकार दिखाई देना मुश्किल है.

बात का पक्का यानी अपनी ज़ुबान पालने वाला. मैंने बड़े-बड़े नायक-वादक देखे हैं जो बात के पक्के नहीं हैं. पारिश्रमिक की आधी रकम पहले लेकर भी ऐन वक़्त किसी बहाने से नहीं आए. मगर कुमार जी ने कभी ऐसा नहीं किया. बीमारी के कारण वे कुछ कार्यक्रम नहीं कर सके पर इससे आयोजकों को दुःख नहीं हुआ. कुमार जी को ही हुआ. एक बार बोले -"तीन महीनों से प्रकृति मुझ पर नाराज़ है. मुंबई, कोल्हापुर, दिल्ली वगैरह स्थानों के कार्यक्रम नहीं कर सका. संयोजकों को परेशानी और हमारी बदनामी".

चण्डालसिंह की आख़िरी शर्त 'लंगोटी का सच्चा'. सचमुच बहुत कठिन है. कुमार एक सुदर्शन कलाकार. हमेशा चाहने वालों से घिरा हुआ एक प्रतिभावंत और जनप्रिय गायक. मगर पूरी ज़िन्दगी में कुमार जी के नाम पर एक भी, सीधे-सटक शब्दों में कहा जाए तो, एक भी 'लफ़ड़ा' नहीं. कुमार जी कहते -"मेरी ज़िन्दगी में तीन लड़कियां आईं. दो मराठी और एक दिल्ली की पंजाबी. भानु ने बाज़ी मार ली."

कुमार जी के स्वभाव और व्यक्तित्व की यह थी एक झलक. १९४६ में उनकी गायकी परिवर्तित हुई, स्वतंत्र हुई. उसी प्रकार १९६१ में उनके स्वभाव में भी परिवर्तन आया. वह अस्मिताबिन्दु आखिर तक चमकता रहा. "हम गानेवाले हैं" - यह था वह अस्मिताबिन्दु! उसे ध्यान में रखते हुए ही हमें आगे बढ़ना है. अब बारह वर्षीय कुमार के साथ देवधर गुरुजी के गुरुकुल में चलते हैं ...


प्रस्तुत है कुमार जी की वाणी में कबीर दास जी की रचना. इसे सुनते हुए कई बार ऐसा भी लगता है कि कुमार जी (या कि कबीरदास जी) सुनने वाले को चण्डालसिंह की शर्तों को लगातार याद कराते चल रहे हैं कि "हिरना समझ बूझ बन चरना":