
बदतर हो चुकी पवित्रता के लिए विशिष्ट भवन अभी भी हैं। ये वही भवन हैं जहां आधी शताब्दी पहले दोस्तोव्स्की का सबसे महत्वपूर्ण नायक प्रकट हुआ था। जब रास्कोल्निकोव को एक नई इमारत की चौथी मंजिल पर पुलिस स्टेशन बुलाया जाता है वह दुनिया के “अंडरग्राउन्ड” में प्रविष्ट होता है। सीढ़ियां संकरी और गन्दी हैं। चारों मंजिलों पर स्थित सारे अपार्टमेन्टों के दरवाजे सीढ़ियों की तरफ खुलते हैं और उनकी रसोइयों से तमाम किस्म की सड़ांध निकलती रहती है। पुलिस स्टेशन के छोटे छोटे कमरों में भी सस्ते वार्निश की बू अटी पड़ी है और यहां रास्कोल्निकोव अचेत हो जाता है।
'द ट्रायल' लिखते हुए काफ्का ने अपने महान उस्ताद को याद करते हुए न्यायालय के पहले दफ्तर को ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ के पुलिस स्टेशन से मिलता जुलता दिखाया है। न्यायालय की पहली इमारत ऊंची और सलेटी है जहां गरीब लोग रहते हैं। प्रवेश करने का अहाता तालाबंद वैनों से भरा हुआ है। तीन प्रवेशद्वारों से तीन ही ज़ीनों को रास्ता खुलता है ; जोसेफ के सीढ़ियों से होता चढ़ रहा होता है और अपार्टमेन्टों के दरवाजे खुले होते हैं जिनकी छोटी रसोइयों में औरतें बच्चों को थामे चूल्हों पर झुकी दिखाई देती हैं और अधनंगी लड़कियां व्यस्त होकर यहां वहां दौड़ती फिरती दिखती हैं। पांचवीं मंजिल पर जहां न्यायालय है ¸ एक जवान स्त्री टब में बच्चे के कपड़े धो रही है। बगल के संकरे कमरे में भाप भरी हुई है; सूरज की मैली किरणों ने वातावरण को सफेद और चुंधियाने वाला बना दिया है। उसके बाद अगली मंजिल पए एक लम्बा गलियारा है जिसमें टूटे दरवाजों वाले पार्टीशन लगे हैं; लकड़ी की बेन्चों पर फरियादी भिखारियों की तरह झुके बैठे हैं। इमारत के बाशिन्दों के कपड़े सूखने को टंगे हुए हैं और भीतर हवा इस कदर दमघोंटू है कि जोसेफ के. बेहोश होने की हालत में पहुंच जाता है जिस तरह पीटर्सबर्ग के पुलिस स्टेशन में रास्कोलनिकोव के साथ होता है। न्यायालय की दूसरी इमारत जिससे हमारा परिचय कुछ महीनों बाद होता है ¸ और भी घिनौनी है। वहां रहने वाले और भी गरीब हैं¸ घर ज्यादा अंधेरे हैं और गलियां गन्दगी और पिघलती बर्फ से पटी पड़ी हैं।
इन्हीं घृणास्पद जगहों पर न्यायालय के सबसे घटिया प्रतिनिधि रहते हैं : कुत्तों की तरह परजीवी भ्रष्ट सिपाही; कुरुचिपूर्ण कपड़े पहने क्लर्क; परिचित न्यायाधीश; कुख्यात चित्रकार; दलाल और वैश्याएं जो हर किसी को अपना बचकाना और अशालीन आकर्षण प्रस्तुत करते हैं ; यहां जासूस भी हैं मुखबिर भी और अपराधी भी। कानून की सबसे निचली सीढ़ी पर का यह संसार सबसे ज्यादा गन्दगीभरा है। लेकिन तो भी सामान्य जीवन से कहीं नीचे रह रहे ये लोग किसी रहस्यमय और विडंबनापूर्ण तरीके से हमें कानून के बारे में कुछ बताते हैं। उन सिपाहियों के पास ¸जिनसे जोसेफ के. को नफरत है¸ दैवीय संसार के बारे में कुछ धुंधला सा ज्ञान भी है। अपराध और कानून के बारे में वे वही बातें करते हैं जैसी कुछ महीनों बाद पादरी करता है। सिर्फ एक ही न्यायालय है। ऊपर और नीचे दोनों ही जगह कानून एक सा है : सर्वोच्च न्यायाधीश में भी और रंगीन पंखों वाले फरिश्ते में भी ¸ जो शायद उस बेनाम ईश्वर के रहस्यों को जानते हैं¸ एक दूसरे का खाना चुराने वाले सिपाहियों में भी और पोनोर्ग्राफी पढ़ने वाले न्यायाधीशों में भी। “ईश्वर को किसी आदमी ने नहीं देखा है” (जॉन 1:18) और हम सीधा उस तक नहीं पहुंच सकते और जैसा कि 'द कासल' में दोहराया गया है ऐसा करने के लिए हमें असंख्य बिचौलियों के दरम्यान से होकर गुजरना होगा। शायद ईश्वर की असहनीय रोशनी को किसी अंधेरे परदे के पीछे करना होगा; शायद उसकी गरिमा को किसी घृणित चीज के साथ रखने से ही उचित संतुलन बनता हो या शायद जो सबसे उदात्त है वह दुनिया की सबसे निकृष्ट चीजों के माध्यम से स्वयं को प्रकट कर सकता हो। ये ईश्वर के रहस्य थे जिनके सामने काफ्का का सिर ताजिन्दगी झुका रहा ; जिन्हें रूमी या अत्तार या सन्त तेरेसा जैसे अध्यात्मिक संत पाने की कोशिश कर सकते थे न कि जोसेफ के जैसा एक बेचारा बैंक क्लर्क।
हम इस तरह के न्यायालय की सारी गतिविधियों के बारे में नहीं जानते। अगर हमें काफ्का की 'द ट्रायल' पर यकीन करना ही हो तो आज न्यायालय का सिर्फ एक ही काम है : मुकदमे चलाना। लेकिन ये खास तरह के मुकदमे होते हैं। न्यायालय आरोपी पर किसी विशेष नियम को तोड़ने का आरोप नहीं लगाता ¸ जैसा आम न्यायालयों में होता है या जैसा 'द पैनल कालोनी' में होता है जहां तोड़े गए कानून को अपराधी के बदन में गोद दिया जाता है। जब जोसेफ के को गिरफ्तार किया जाता है¸ सिपाहियों के पास लगाने को पर्याप्त आरोप नहीं हैं; बाद में भी नहीं जब मुकदमा काफी दिन चल चुका होता है। जल्लाद की छुरी के सामने पहुंचने पर भी जोसेफ के को अपना अपराध मालूम नहीं चलना है। हमें क्या सोचना चाहिए? या क्या जोसेफ के का अपराध वही पहला पाप है जिसने मानव की आत्मा पर सदा के लिए दाग लगा दिया है? लेकिन यह संभव नहीं लगता क्योंकि 'द ट्रायल' में थोड़े ही लोगों पर आरोप लगाए जाते हैं। हर बात हमें यह सोचने पर विवश करती है कि जोसेफ के का अपराध कुछ दूसरा ही है। उसके अपराध का न कोई नाम है न मन्तव्य। संक्षेप में कहा जाए तो उसका अपराध असल में अपराधबोध की वह भीषण अनुभूति है जिसने फ़्रान्ज काफ्का को जीवन भर प्रताड़ित किया।
तो इस न्यायालय को सिपाहियों या पूछताछ करने वाले अफसरों की जरूरत नहीं है जैसा कि मानवीय न्यायालयों में होता है जहां यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि किसी प्रतिबंधित कार्य को अंजाम दिया गया या नहीं¸ क्या रास्कोल्नीकोव ने वाकई उन दो स्त्रियों को लूट कर उनका कत्ल किया था। एक सिपाही अपनी बात को बहुत स्पष्ट शब्दों में रख कर कहता है “हमारे अधिकारीगण लोगों के अपराधों की खोज नहीं करते। वे स्वयं अपराध द्वारा आकर्षित कर लिए जाते हैं जैसा कि कानून में लिखा हुआ है।” न्यायालय के पास एक उच्चतर बोध है जो उसे पाप की उपस्थिति का भान करा देती है : यह एक तरह की जादुई घ्राणशक्ति है जो यह जान लेती है कि किस आदमी ने वह बेनाम अपराध किया है। इस तरह एक महिला सिपाही जिसने जोसेफ के को कभी नहीं देखा है उसे पहचान लेती है। गिरजाघर के अन्धकार तक में भी यही होता है।`
जैसा काफ्का हमें ‘द पैनल कालोनी’ में बता चुका है कानून और अपराध¸ ईश्वर और पाप और न्यायाधीश और पापी के बीच एक गहरी निकटता होती है। यदि न्यायालय को अपराध आकर्षित करता है तो अपराध की प्रतिभा रखने वाले शख्स को न्यायालय आकर्षित करता है। आरोप लगाने वाले और आरोपी दोनों का एक दूसरे के बिना गुजारा नहीं है और किसी जादू की तरह उनके बीच संवाद पैदा होता है। पहली सुनवाई के दिन जोसेफ के को कोई नहीं बताता कि उसका मामला कब सुना जाएगा या कहां पर लेकिन वह नियत समय पर नियत न्यायालय में पहुंच जाता है। जीवन की अन्तिम शाम को शोक वाली पोशाक अपनी पहने जोसेफ के जल्लादों की प्रतीक्षा करता है जबकि उसे किसी ने नहीं बतलाया है कि उस शाम उसे हलाक किया जाने वाला है। बाकी के कई आरोपियों के पास भी इस तरह के अंतबोर्ध की शक्ति है। जोसेफ के को अदालत में ऐसे कई लोग मिलते हैं ; अपराधबोध से इस तरह ग्रस्त ऐसे लोग उसने पहले कभी नहीं देखे हैं: थके मांदे पस्त भिखारियों जैसे¸ अपने अन्तहीन मुकदमों के असंभव अंत की प्रतीक्षा करते। जब जोसेफ उन में से एक की बांह पर अपना हाथ रखता है तो वह दिल दहला देने वाली आवाज में चिल्लाता है मानो किसी ने उसे बेहद गर्म चिमटियों से दबोच लिया हो। हमें बाद में पता लगता है कि उस आदमी ने जोसेफ के होंठों पर अपने मुकदमे का फैसला या तो पढ़ लिया था या पढ़ने की कोशिश की थी। इनमें हमें न कोई स्त्री मिलती है न कोई निर्धन व्यक्ति। काफ्का के मुताबिक ये दो लोग केवल स्पष्ट अपराध कर सकते थे और अनन्त किस्म के अपराध उनके बस के बाहर थे। वकील हुल्ड हमें बताता है कि वे सारे यहां तक कि उनमें से जिन्हें देख कर घृणा उपजती है – वे सब समय बीतने के साथ सुन्दर होते चले जाते हैं। जिस तरह 'द पैनल कालोनी' में अदालत की कोई भी कार्रवाई बस एक चुनाव होती है : न अपराध, न दण्ड, बस मुकदमा जो उन्हें क्षुद्र बनाता जाता है और साथ साथ उनके नक्शों को एक खूबसूरती भी देता जाता है।
न्यायालय की उच्चतम परम्पराओं की तरह उसकी कार्यप्रणाली को भी कोई नहीं जान सकता। न्यायाधीशों को हर सूचना पता होती है जबकि बाकी के लोगों को न उस न्याय के स्रोत का पता होता है न उसे जारी रखे रखने वाली चीज का। मानवीय संवेदनाओं और संबंधों और यथार्थ के किसी भी ज्ञान के बिना इन न्यायाधीशों को असलियत का टुकड़ा भर मालूम होता है। न तो वे यह जानते हैं कि वह कहां से आया है न ही यह कि वह किस तरफ चलता जाएगा। जहां तक वकीलों का सवाल है उन्हें बमुश्किल सहन किया जाता है: न्यायालय उनसे बेतरह नफरत करता है। वे अपराध से संबंधित किसी भी दस्तावेज को नहीं देख सकते। तो फिर लैटिन में लिखी वे पोथियां किस काम की हैं? केवल वही दृष्टि मुकदमे को उसकी संपूर्णता में समझ सकती है जो उच्चतर देवताओं के उच्चतम अंधेरों से नीचे उतरी हो। न्याय की एक लम्बी और धीमी सड़क होती है। उससे संबंधित हर चीज से टाले जाने की बू आती रहती है: एक सतत अपरिवर्तनशील गति होती है जो न ऊपर उठती है न नीचे गिरती है। आरोपी बहस करने को लालायित रहता है लेकिन न्याय अपनी प्रक्रिया को अनन्त काल तक खींचे जाने की जुगत में लगा रहता है। कभी कभी न्याय की प्रक्रिया थम जाती है और आरोपी को अस्थाई मुक्ति मिलती है लेकिन फिर किसी और न्यायाधीश के किसी आदेश पर उसकी गिरफ्तारी हो सकती है। सो जांच फिर से शुरू होती है और न्याय धूलभरे कागजों में घिसटता रहता है। अचानक एक दिन बिना किसी अग्रिम चेतावनी के सारा का सारा मुकदमा कहीं और स्थानान्तरित कर दिया जाता है। सारा कुछ उन अदृश्य देवताओं के न्यायालय में भेजा जा चुका होता है जहां से एक दिन अचानक फैसला सुनाया जाएगा।
(जारी)
(फ़ोटो: टैंग्लिन ट्रस्ट स्कूल, सिंगापुर के छात्रों द्वारा मंचित 'द ट्रायल' का पोस्टर)
1 टिप्पणियां:
काफ्का की पोस्ट शानदार हैं. शिरीष जी वाले मुद्दे पर कहूँगी कि कबाड़खाना पर उनका एक अपमान मंग्लेश डबराल वाली पोस्ट में मैने खुद देखा और उसका विरोध भी किया. उन्होने सार्वजनिक इस्तीफ़ा देकर बुरा किया पर अपमान तो हुआ ही है उनका. आप जैसा शानदार काम कर रहे हैं, उन्हें पीछे नहीं हटना चाहिए. ईश्वर करे सब ठीक हो जाए. मेरी शुभकामनायें !
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