Thursday, April 30, 2009

फ़्रान्ज़ काफ़्का का 'द ट्रायल' - ३

(पिछली पोस्ट से जारी)




मुकदमे की अन्तहीन प्रक्रिया में फैसला ही इकलौता निश्चित हिस्सा साबित होता है। वकील हुल्ड कई दफे मुकदमे के "सुखान्त" की तरफ इशारा करता है¸ लेकिन वह हमें कोई विवरण उपलब्ध नहीं कराता¸ फिलहाल उसका काम अपने मुवक्किल को उम्मीद की हताश मनस्थिति में बनाए रखना है। तितोरेली कहता है कि उसने कभी "किसी वास्तविक रिहाई" के बारे में नहीं सुना है। दो और लोगों का भी यही मानना है। यह कहता हुआ जोसेफ़ के गलत नहीं है कि “इकलौता जल्लाद इस समूचे न्यायालय की जगह ले सकता है।” जैसा कि 'इन द पैनल कालोनी' में काफ्का कहता है "अपराध हमेशा निश्चित होता है।"

जोसेफ के का सृजन करने के बाद¸ जिसे काफ्का ने अपनी आयु और अपने नाम का अंश और अपने कमरे का हिस्सा दिया¸ काफ्का ने अपने सारे नामोनिशान मिटा लिए: वह अपने आप से इतनी दूर एक जगह में चला गया जहां उसका अपना गुरू फ्लाबेयर भी फ़्रेडरिक मोरो के माध्यम से नहीं पहुंच पाया था। कार्ल रोसमान के साथ वह एक मुलायम प्रेम से जुड़ा हुआ था। ‘द कासल’ में वह के॰ के साहसिक अध्यात्मिक अभियान के लिए प्रशंसा से भरा हुआ है; लेकिन इस "औसत आधुनिक आदमी" के लिए उसके मन में क्या हो सकता है जो एक बढ़िया बैंक क्लर्क है और न ईश्वर पर यकीन करता है न अदृश्य शक्ति पर यकीन? जैसा कि काफ्का जोसेफ के को हमारे सामने रखता है¸ जोसेफ एक रूखा अकेला शख्स है¸ उसे पता है उसके लिए क्या भला है क्या बुरा¸ सांसारिक सफलता के लिए उसके मन में लालच है। उसके भीतर "आधुनिक आदमी" के सारे दोष हैं। कार्ल रोसमान के बरखिलाफ उसने अपने भीतर से बचपन के सारे निशान मिटा दिए हैं¸ वह किसी अचेतन से किसी तरह का पोषण प्राप्त नहीं करता¸ वह अपने दिल में झांकने से मना कर देता है¸ अपने अनुभवों से कुछ नहीं सीखता¸ अवसर द्वारा पैदा होने वाले व्यवधानों से उसे नफरत है और उसे उम्मीद है कि उसकी लौह इच्छा के सामने यथार्थ अन्तत: हार मान लेगा। हालांकि वह पाप करने में विश्वास नहीं रखता¸ सारे आम आदमियों की तरह वह भी अपराधबोध से भरा हुआ है। उसकी दोयम दर्ज़े की जिन्दगी में एक यही कमी है। मुकदमे की पूरी प्रक्रिया मानो उसे मुक्त करने के उद्देश्य से उसके इस अपराधबोध को परिपक्व और अधिक जटिल बना देती है ; उसकी बुद्धि ज्यादा बेचैन हो जाती है और ऐसा समय भी आता है जब वह उन शब्दों को वाणी देता है जिनके बारे में पहले वह सोच पाने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था।

एक सुबह जोसेफ के को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मकानमालकिन का रसोइया जो हर रोज करीब आठ बजे उसके लिए नाश्ता ले कर आता है उस दिन उसके कमरे में नहीं आता। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। जब के घंटी बजाता है उसके कमरे में काला सूट पहने एक दुबला लेकिन तन्दुरूस्त अजनबी आदमी प्रवेश करता है जबकि बोर्डिंग हाउस के बाकी के कमरों में भी उसी तरह के अजनबी पुलिसिए घुस चुके होते हैं। ‘मैटामॉरफासिस’ की तरह ही यह किताब भी एक व्यवधान से शुरू होती है। एक आशातीत घटना ¸ पत्थर बन चुके रोजमर्रा के जीवन को हिंसा के साथ झकझोरती है। यह व्यवधान सुबह के समय होता है : दिन का सबसे जोखिमभरा समय¸ क्योंकि इसमें यह खतरा समाहित रहता है कि हो सकता है रात भर में सब कुछ बदल गया हो और जब हमारी नींद खुले हम खुद को अलग तरह की दीवारों¸ फनीर्चर इत्यादि से घिरा हुआ किसी नितान्त अपरिचित देश या ग्रह या सौरमण्डल में पाएं जहां हमारे बारे में या हमारी आदतों के बारे में कोई कुछ नहीं जानता। उस दिन तक के को नहीं मालूम कि मुकदमे की प्रक्रिया हर आदमी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। और यह प्रक्रिया स्वयं को उसके सामने पूरी तरह से उदघाटित करती है। लेकिन एक दूसरी बात भी होती है। गिरफ्तार किए गए जोसेफ के को रिहा कर दिया जाता है ठीक जिस तरह पोरफिरी पेत्रोविच द्वारा रास्कोलनिकोव को मुक्त किया जाता है। न्यायालय को¸ जो हर जगह विद्यमान है¸ जोसेफ के को कारागार में रखने की कोई जरूरत नहीं है। वह मुक्त भी है और बन्दी भी¸ वह बिना जंजीरों का कैदी है – हम सब लोगों की तरह जो बिना सलाखों वाली कैद में लगातार जीवित रहते हैं।

जब पहरेदार जोसेफ के को गिरफ्तार करते हैं¸ वह न्यायालय¸ कानून और ईश्वर को लेकर कई सवाल पूछता है। “मैं किसी कानून को नहीं जानता” वह कहता है। इस बेनाम आधुनिक नगर में शायद मिस बर्सट्नर के अलावा वह इकलौता शख्स है जो नहीं जानता कि कानून हर जगह है और बिना किसी की निगाह में आए वह दुनिया भर की तकदीरों को निर्देशित कर रहा है। वह अपनी गिरफ्तारी को स्वीकार नहीं करता¸ वह पहरेदारों से कागज दिखाने की मांग करता है¸ वह उनसे नफरत करता है हालांकि उनके भीतर ईश्वर के कानून की बची खुची चमक बाकी है¸ वह निश्चित है कि वह निर्दोष है जैसा कि किसी ने भी नहीं होना चाहिए। वह चाहता है कि अपने कमरे की कुर्सियों को और नाश्ते की तश्तरी वगैरह को वापस करीने से लगाए और पहरेदारों की उपस्थिति के नामोनिशान मिटा दे। उसे उम्मीद है कि वह अपने जीवन में आए इस व्यवधान को हरा पाएगा। जब वह पहली पेशी पर जाता है तो उसे आश्चर्य होता है कि वह एक ऐसी जगह पर है जहां हर तरह के दस्तावेजों वगैरह को अस्वीकृत कर दिया जाता है। वह नहीं समझ पाता कि ईश्वर का कानून हर तरह की दुनियावी चीज से नफरत करता है। अनुष्ठानों जैसी पोशाकों और दाढ़ियों के सामने खुद को पाने पर वह अन्याय के खिलाफ लड़ रहे किसी योद्धा की तरह व्यवहार करने लगता है। जैसा कि काफ्का हमें बताना चाहता है¸ जोसेफ के को नहीं मालूम कि उसके साथ क्या बीत चुका है। उसका सबसे बड़ा पाप है चीजों पर ध्यान न देना। उसके भीतर सब कुछ चुपचाप स्वीकार कर लेने वाला वह धैर्य नहीं है जो अध्यात्मिक मामलों में हमारी सहायता करने वाला इकलौता गुण होता है। कुछ ही घंटों के भीतर मुकदमे और फैसले का शिकंजा उसके गिर्द कस जाता है। कोई भी उससे हाथ नहीं मिलाता¸ बूढ़ा ग्रूबाख भी नहीं¸ मानो वह हैजे जैसी किसी बीमारी से ग्रस्त हो। ऐसा लगता है कि उसके भाग्य पर मुहर लगाई जा चुकी है।

गिरफ्तारी के बाद भी जोसेफ के पहले जैसा जीवन बिताता रहता है। वह बैंक में काम करता रहता है¸ अपनी दोयम आदतों को बनाए रखता है¸ और पहले की ही तरह दुनिया की सलेटी आवाजों और रंगों से जूझता रहता है। लेकिन आजाद घूमने वाला यह इन्सान एक तरह से सलाखों के पीछे बन्द भी है। सबसे नीच दर्ज़े के आरोपियों की तरह वह अदालत के दायरे से बाहर नहीं जा सकता। वह उस सुबह को¸ उन पहरेदारों को और न्यायाधीशों को भुला ही नहीं पाता। अगर उसे भुला सकना आता होता तो वे पहरेदार¸ न्यायाधीश और कानून के पेंच सारे गायब हो चुके होते। अपराध की विराट छाया उसे पूरी तरह ढंक लेती है। जब वह सड़क पर चल रहा होता है उसे लगता है कि वास्तविक या काल्पनिक आंखें उसकी जासूसी कर रही हैं। जब वह घर पर होता है वह संदेहों से भरा होता है और बिना किसी के बुलाए हुए न्यायालय चला जाता है। महीनों के बीतने के साथ ही वह अपनी सारी ताकत खो देता है। सुबह होने के साथ ही वह अपने को कुचला हुआ पाता है। दफ्तर में वह किसी हवा निकाले निर्जीव आदमी की तरह सिर झुकाए बैठा रहता है। वह अपने ग्राहकों से बात नहीं करता और बिना थमे घंटों तक खिड़की के बाहर गिर रही बर्फ को देखता रहता है। सोए या जागे में वह बेहद मामूली विवरणों पर ध्यान देता रहता है। वह फंतासियों में डूब जाता है और अपने दिमाग में घूम रही छवियों से खेला करता है। उसके लिए उसका नाम¸ उसका व्यक्तित्व¸ और उसका शरीर सब कुछ एक बोझ बन जाता है। उसे लगने लगता है कि सारे ब्रहमाण्ड में एक वही आरोपी है और बाकी के लोग उस पर आरोप लगाने वाले। खिड़की पर खड़े होकर हताशा के साथ जीवन के बारे में सोचा करना और जीवन से बच निकलने की सोचना – इस निरंतरता में के के माध्यम से काफ्का की अपनी नियति को एक तरह की मुक्ति मिलती नजर आती है।

जोसेफ के. को अपने वकील पर जरा भी विश्वास नहीं है और वह अपना मुकदमा खुद लड़ने का फैसला कर लेता है। चूंकि न्यायालय उस पर लगे आरोप को बताता नहीं इसलिए उसे खुद अपने आप से लगातार सवालात करने होंगे और खुद अपनी आत्मकथा लिखनी होगी। इस तरह हताशा के साथ वह इस अनन्त श्रम में सन्नद्ध हो जाता है। वह दफ्तर से छुट्टी लेता है ताकि अपने अपराध को पहचानने के लिए स्वयं को अलग अलग आयामों से देख सके और अपने भीतर उस जगह को चिन्हित कर सके जहां आखिरकार न्यायालय का फैसला उसे डंक मारेगा। अगर उसने अपने आप को बचाना है तो उसने जीना बन्द करना होगा¸ नौकरी छोड़नी होगी¸ आदतों और विचारों से मुक्त होना होगा और सुबह¸ शाम और रात के होने से मिलने वाली सहानुभूति को भी छोड़ देना होगा। इस तरह¸ जैसा कि खुद काफ्का के साथ हुआ था¸ अपराध के खिलाफ अपना बचाव ही जीवन का स्थानापन्न बन जाता है। यह एक श्रमसाध्य काम है जिसमें उसे आरोप के पक्ष और विपक्ष दोनों के बारे में लिखना है। लेकिन क्या यह आत्मकथात्मक संस्मरण जोसेफ के की एक और गलती नहीं माना जाएगा? उसे कौन बता पाएगा कि खुद से पूछे गए उसके सवाल वही हैं जो न्यायालय के होते? कौन विश्वास करेगा कि वह अपने जीवन के क्षुद्रतम विवरणों को खोज निकालेगा? कौन इस बात की कल्पना कर सकता है कि वह अपनी आत्मा की गहराइयों तक पहुंच सकेगा जहां उसका अपराध छिपा हुआ है? जैसा कि काफ्का का विचार था¸ आत्मकथा¸ जो कि तार्किक 'मैं' का शस्त्र होती है¸ हमें जरा भी आश्वस्त नहीं कर सकती कि उसकी सहायता से हम अपने अन्दरूनी सत्य तक पहुंच ही जाएंगे। इस सत्य तक पहुंचने के लिए ‘मैं’ का स्वयं ही विनाश करना पड़ता है या अपने आप को बाहरी संबंधों के ताने बाने में गायब करना होता है।

इस दरम्यान आत्मकथा की ही तरह अनन्त मुकदमा चलता जाता है। हम जानते हैं कि बाकी आरोपियों से हफ्ते में कई बार पूछताछ की जाती है। जहां तक जोसेफ के का सवाल है हमें केवल पहली पेशी के बारे में मालूम है जब वह न्यायालय पर आरोप लगाता है और एक दूसरी पेशी के बारे में जिसका विवरण उसके कज़िन द्वारा पिता को लिखी गई एक चिठ्ठी में मिलता है। इसके अलावा कुछ नहीं। या तो काफ्का ने मुकदमे की पेशियों के बारे में दूसरे अध्यायों में लिखने का मन बनाया था जिन्हें उसने लिखा नहीं या फिर वह मुकदमे के बारे में लिखना ही नहीं चाहता था। इसमें दूसरी वाली बात ज्यादा सही लगती है। ईश्वर का नाम हटा देने के बाद यह किताब में दूसरी बड़ी अनुपस्थिति है। काफ्का किताब के केन्द्र में एक ऐसा खालीपन रख देता है जिसे भरा जाना असंभव है। किताब के बाकी पात्रों द्वारा न्यायालय के बारे में कही गई तमाम बातें हमें किसी निश्चित चीज की तरफ नहीं ले जातीं।

(जारी. अगली किस्त में समाप्त.)

1 टिप्पणियां:

अजित वडनेरकर said...

भाई,
ये दिलचस्प और बेशकीमती हर्फ़ तो प्रिंट निकालकर ही पढ़े जाएंगे। अब चारों किस्तें मुक़म्मिल हो चुकी हैं।