Saturday, February 20, 2010

ऐसा था काफ़्का



फ़्रांज़ काफ़्का से उसकी युवावस्था में और उसके प्रौढ़ हो चुकने पर मिले हुए तमाम लोगों को लगता था कि वह "कांच की एक दीवार" से घिरा रहता था. वह वहीं रहा करता था, ख़ूबसूरती से टहलता हुआ, इशारों में बात करता बोलता हुआ; वह किसी अतिसतर्क, बेहद लचीले देवदूत की तरह मुस्कराता था और उसकी मुस्कान विनम्रता से पैदा हुए उस आखिरी फूल जैसी होती थी जो स्वयं को प्रस्तुत करते ही वापस लौट जाता था, खुद को खर्च कर चुकने के बाद ईर्ष्या के साथ अपने ही भीतर बन्द हो जाता हुआ. ऐसा लगता था मानो वह कह रहा हो: "मैं तुम जैसा ही हूं, मैं तुम्हारी ही तरह एक आदमी हूं, तुम्हारी ही तरह मैं यातनाएं सहता हूं और प्रसन्न रहता हूं". लेकिन जितना अधिक वह दूसरों के भाग्य और उनकी यातना में हिस्सेदारी करता था उतना ही वह खुद को इस खेल से दूर कर लेता था. निमन्त्रण और निर्वासन की वह धुंधली छाया जो उसके होठों पर रहती थी हमें बताती थी कि वह कभी भी उपस्थित नहीं हो सकता था कि वह बहुत दूर रहता था एक ऐसे संसार में जो स्वयं उसका भी नहीं था.

कांच की उस नाजुक दीवार के पीछे लोग क्या देखते थे? वह एक लंबा आदमी था – दुबला और छरहरा, जो अपने लंबे शरीर को इस तरह साथ लेकार चलता था जैसे वह उसे तोहफे में मिला हो. उसे लगता था वह कभी बड़ा नहीं होगा और न ही वह उस चीज के भार, स्थिरता और भय को जानेगा जिसे बाकी के लोग एक नासमझ आनन्द के साथ ‘परिपक्वता’ कहते हैं. उसने एक दफे मैक्स ब्रोड को स्वीकार करते हुए बताया था: "मैं पुरुषत्व को कभी महसूस नहीं करूंगा, बच्चे से मैं सीधा बूढ़ा बन जाऊंगा – सफेद बालों वाला." हर कोई उसकी आंखों से आकर्षित हो जाया करता था जिन्हें वह बहुत ज्यादा खुला रखता था ; कभी कभी घूरती हुई वे आंखें फोटोग्राफों में मैग्नीशियम की आकस्मिक चमक के कारण किसी विक्षिप्त या स्वप्नदृष्टा की लगती थीं. उसकी भौंहें लंबी थीं; उसकी पुतलियां कभी भूरी कभी सलेटी कभी नीली और कभी बस गहरी होती थीं अलबत्ता पासपोर्ट के मुताबिक वे "गाढ़ी सलेटी नीली" थीं. जब वह स्वयं को आईने में देखता, वह पाता था कि उसकी दृष्टि "अविश्सनीय तरीके से ऊर्जावान " थी; लेकिन बाकी के लोगों ने उसकी आंखों के बारे में बोलना और उनकी व्याख्या करना कभी बन्द नहीं किया मानो उन्हीं के पास उसकी आत्मा के वास्ते एक दरवाजा हो. कुछ के मुताबिक वे उदासी से भरपूर थीं; कुछ समझते थे कि वह लगातार उन पर निगाह धरे उन्हें पढ़ रही हैं; कुछ ने उन्हें अचानक चमकते देखा था, सुनहरे कणों से दिपदिपाते हुए, फिर वे विचारमग्न हो जाती थीं; कुछ ने उन्हें देखा था एक विडंबना में रंगते हुए – जो कभी बहुत हल्की होती थी कभी बहुत तीखी; कुछ के मुताबिक उनमें एक आश्चर्य और एक अजीब कुढ़न थी; कुछ जो उसे बहुत चाहते थे और उसकी पहेली को हजार तरीकों से सुलझाने में लगे रहते थे , सोचते थे कि ताल्सताय की तरह उसे कुछ ऐसी बात पता है जिसके बारे में दूसरे कुछ नहीं जानते; कुछ को उसकी आंखें भेद पाना असम्भव लगता था; और अन्तत: कुछ का मानना था कि जब तब उसकी निगाह पत्थर जैसी शान्ति , एक क्षणिक खोखलेपन और अन्त्येष्टि जैसे एक विराग से भर जाया करती थी.

4 comments:

सागर said...

सर क्या कर रहे हैं ? अब तो हैंगओवर हो जायेगा..

मनीषा पांडे said...

अशोक काफ्का के बहुत बड़े फैन हैं। पसंद तो हमें भी है, पर ऐसे दीवानगी की हद तक नहीं। लेकिन अशोक हैं ही नहीं। इनका प्रेम और घृणा सब दीवानगी की हद तक होता है।
वैसे बहुत अच्‍छा लिखा है अशोक। Really Good.

sanjay vyas said...

शानदार.कुछ कुछ वैसा ही जैसे सिताती ने ट्रायल और कासल पर डूब कर लिखा हो.

मनीषा पांडे said...

अरे मेरे कमेंट में हैं ही नहीं को पढ़ें 'हैं ही ऐसे।' दिमाग कुछ और सोचता है और की बोर्ड कुछ और टाइप करता रहता है।