Sunday, January 31, 2010

एक उस्ताद क्या कहता है दूसरे उस्ताद के लेखन पर



"... हेमिंग्वे का सारा काम यह दिखलाता है कि उसकी आत्मा चमकदार तो थी मगर उसका जीवन बहुत संक्षिप्त रहा. यह बात समझ में आती भी है. उसके भीतर का तनाव और लेखन की वैसी मज़बूत तकनीक - इन दोनों को उपन्यास की विशाल और जोखिमभरी ज़मीन पर लम्बे समय तक बनाए नहीं रखा जा सकता था. ऐसा उसका स्वभाव था और उसकी गलती यह थी कि उसने अपनी ही आलीशान हदों को पार करने का प्रयास किया. और यह इसी वजह से है कि तमाम सतही चीज़ें किसी भी और लेखक से कहीं ज़्यादा उसके लेखन में देखी जाती हैं. इसके बरअक्स उसकी कहानियों के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि उन्हें पढ़कर लगता है कि कहीं किसी चीज़ की कमी है और यह चीज़ उन्हें खूबसूरत और रहस्यमय बनाती है. हमारे समय के एक और महान लेखक बोर्हेस के साथ भी यही बात है पर उसे इस बात का भान रहता है कि अपनी सीमाओं के पार न जाया जाए.

फ़्रान्सिस मैकोम्बर द्वारा शेर पर चलाई गई इकलौती गोली शिकार के नियमों के बारे में तो बहुत कुछ बताती ही है, लेखन के विज्ञान का सार भी उसमें निहित है. अपनी एक कहानी में हैमिंग्वे ने लिखा था कि लीरिया का एक सांड एक बुलफ़ाइटर के सीने से रगड़ खा कर लौटता हुआ "कोने पर मुड़ रही किसी बिल्ली" जैसा लगा. पूरे सम्मान के साथ मैं कहता हूं कि इस तरह का ऑब्ज़र्वेशन उन इन्स्पायर्ड मूर्खताओं से भरे टुकड़ों में गिना जा सकता है जो सिर्फ़ शानदार लेखकों के यहां पाये जाते हैं. हेमिंग्वे का सारा काम ऐसे ही सादा और चौंधिया देने वाली खोजों से भरा पड़ा है जो दर्शाते हैं किस बिन्दु पर उसने अपने गद्य की परिभाषा गढ़ी.

निस्संदेह अपनी तकनीक को लेकर इतना सचेत रहना ही इकलौता कारण है कि हेमिंग्वे को अपने उपन्यासों नहीं बल्कि कहानियों की वजह से महान माना जाएगा. ... व्यक्तिगत रूप से मुझे उसकी एक कम चर्चित छोटी कहानी 'कैट इन द रेन' सबसे महत्वपूर्ण लगती है. ..."



'गाब्रीएल गार्सीया मार्केज़ मीट्स अरनेस्ट हेमिंग्वे' (द न्यू यॉर्क टाइम्स, २६ जुलाई, १९८१) में गाब्रीएल गार्सीया मार्केज़

पुनश्च: अगर इसे बड़बोलापन न समझा जाए तो कम से कम मैं तो गाबो की बात से पूरी सहमति रखता हूं.

बचपन की बोरियत सपनों से भरी बोरियत होती है



एक साक्षात्कार में विख्यात इतालवी उपन्यासकार इतालो काल्वीनो से पूछा गया "क्या आप कभी बोर हुए हैं?"

इतालो का जवाब था: " हां, बचपन में. लेकिन मैं यहा पर बताना चाहूंगा कि बचपन की बोरियत एक खास तरह की बोरियत होती है. वह सपनों से भरी बोरियत होती है जो आपको किसी दूसरी जगह किसी दूसरी वास्तविकता में प्रक्षेपित कर देती है. वयस्क जीवन की बोरियत किसी काम को बार-बार किये जाने की वजह से पैदा होती है - यह किसी ऐसी चीज़ में लगे रहने से होती है जिस से अब आप किसी अचरज की उम्मीद नहीं करते. और मैं ... मेरे पास कहां से समय होगा बोरियत के लिए! मुझे सिर्फ़ डर लगता है कि कहीं मैं अपनी किताबों में अपने को दोहराने न लगूं. यही वजह है कि जब जब मेरे सामने कोई चुनौती होती है, मुझे कुछ ऐसा खोजने में लग जाना होता है जो इतना नई हो कि मेरी अपनी क्षमता से भी थोड़ा आगे की चीज़ हो."

Saturday, January 30, 2010

तुम कनक किरन - जयशंकर प्रसाद


आज से ठीक एक सौ इक्कीस साल पहले यानी ३० जनवरी १८८९ को ’कामायनी’ जैसी कालजयी रचना करने वाले महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म हुआ था.

सो इस अवसर पर पढ़िये उनकी एक कविता जो स्कूल के ज़माने में मैंने अपनी डायरी में लिख रखी थी:


तुम कनक किरन के अंतराल में
लुक छिप कर चलते हो क्यों?

नत मस्तक गवर् वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मौन बने रहते हो क्यो?

अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि की गुंजारों में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?

Friday, January 29, 2010

चला गया कैचर इन द राइ


अभी अभी खबर लगी परसों जे. डी. सैलिंगर का देहान्त हो गया.

जीवन में पढ़ी किताबों में अगर मुझसे किन्हीं पांच को बल्कि किन्हीं तीन को चुनने को कहा जाए तो जे. डी. सैलिंगर की ’कैचर इन द राइ’ उनमें ज़रूर होगी.

न पढ़ी हो तो पढ़िये.

फ़िलहाल जिस किताब ने मुझे स्कूल के दिनों से आज तक इस कदर ख़ुशी बख़्शी है, उसके सर्जक को नमन करता हुआ उस से कुछ उद्धरण लगा रहा हूं :




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What I was really hanging around for, I was trying to feel some kind of a good-by. I mean I've left schools and places I didn't even know I was leaving them. I hate that. I don't care if it's a sad good-by or a bad good-by, but when I leave a place I like to know I'm leaving it. If you don't, you feel even worse.
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I don't even know what I was running for - I guess I just felt like it.
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It was that kind of a crazy afternoon, terrifically cold, and no sun out or anything, and you felt like you were disappearing every time you crossed a road.
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People always think something's all true.
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People never notice anything.
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I'm the most terrific liar you ever saw in your life. It's awful. If I'm on my way to the store to buy a magazine, even, and somebody asks me where I'm going, I'm liable to say I'm going to the opera. It's terrible.
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When I really worry about something, I don't just fool around. I even have to go to the bathroom when I worry about something. Only, I don't go. I'm too worried to go. I don't want to interrupt my worrying to go.
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All morons hate it when you call them a moron.
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In my mind, I'm probably the biggest sex maniac you ever saw.
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It's really too bad that so much crumby stuff is a lot of fun sometimes.
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Sex is something I really don't understand too hot. You never know where the hell you are. I keep making up these sex rules for myself, and then I break them right away. Last year I made a rule that I was going to quit horsing around with girls that, deep down, gave me a pain in the ass. I broke it, though, the same week I made it - the same night, as a matter of fact.
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I was half in love with her by the time we sat down. That's the thing about girls. Every time they do something pretty, even if they're not much to look at, or even if they're sort of stupid, you fall half in love with them, and then you never know where the hell you are. Girls. Jesus Christ. They can drive you crazy. They really can.
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There isn't any night club in the world you can sit in for a long time unless you can at least buy some liquor and get drunk. Or unless you're with some girl that really knocks you out.
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It's no fun to be yellow. Maybe I'm not all yellow. I don't know. I think maybe I'm just partly yellow and partly the type that doesn't give much of a damn if they lose their gloves.

येस जे. डी.
इट्स नो फ़न टू बी येलो!
टेक केयर.

Thursday, January 28, 2010

दिल देखते ही हो गया शैदा बसन्त का - नज़ीर अकबराबादी

नज़ीर अकबराबादी साहेब की बसन्त सीरीज़ जारी



जोशे निशात ओ ऐश है हर जा बसन्त का
हर तरफ़ा रोज़गारे तरब जा बसन्त का
बाग़ों में लुत्फ़ नश्वोनुमा की हैं कसरतें
बज़्मों में नग़्मा ख़ुशदिली अफ़्जा बसन्त का
फिरते हैं कर लिबास बसन्ती वो दिलबरां
है जिनसे ज़ेर निगार सरापा बसन्त का
जा दर पे यार के ये कहा हमने सुबह दम
ऐ जान है अब तो कहीं चर्चा बसन्त का
तशरीफ़ तुम न लाए जो करके बसन्ती पोश
कहिये गुनाह हमने क्या किया बसन्त का
सुनते ही इस बहार से निकला कि जिसके तईं
दिल देखते ही हो गया शैदा बसन्त का

अपना वो ख़ुश लिबास बसन्ती दिखा ’नज़ीर’
चमकाया हुस्ने यार ने क्या-क्या बसन्त का

बैठो चमन में नरगिसो सदबर्ग की तरफ़ - नज़ीर अकबराबादी



निकले हो किस बहार से तुम ज़र्द पोश हो
जिसकी नवेद पहुंची है रंगे बसन्त को
दी बर में अब लिबास बसन्ती को जैसे जा
ऐसे ही तुम हमारे सीने से आ लगो
गर हम नशे में "बोसा’ कहें दो तो लुत्फ़ से
तुम पास हमारे मुंह को लाके हंस के कहो "लो"
बैठो चमन में नरगिसो सदबर्ग की तरफ़
नज़्ज़ारा करके ऐशो मुसर्रत की दाद को
सुनकर बसन्त मुतरिब ज़र्री लिबास से
भर भर के जाम फिर मये गुल रंग के पियो
कुछ कुमरियों के नग़्मे को दो सामये में राह
कुछ बुलबुलों का ज़मज़मा ए दिलकुशा सुनो

मतलब है ये नज़ीर का यूं देखकर बसन्त
हो तुम भी शाद दिल को हमारे भी ख़ुश करो

गुलदस्ता उसके आगे हंस हंस बसन्त लाई



नज़ीर अकबराबादी साहेब की बसन्त सीरीज़ से पढ़िये एक और बेमिसाल नज़्म

मिलकर सनम से अपने हंगाम दिलकुशाई
हंसकर कहा ये हमने ए जां! बसन्त आई
सुनते ही उस परी ने गुल गुल शगुफ़्ता हो कर
पोशाक ज़रफ़िशानी अपनी वोही रंगाई
जब रंग के आई उसकी पोशाक पुर नज़ाकत
एक पंखुड़ी उठाकर नाज़ुक सी उंगलियों में
रंगत फिर उसकी अपनी पोशाक से मिलाई
जिस दम किया मुक़ाबिल कसवत से अपने उसको
देखा तो उसकी रंगत उस पर हुई सवाई
फिर तो बसद मुसर्रत और सौ नज़ाकतों से
नाज़ुक बदन पे अपने पोशाक वह खपाई
चम्पे का इत्र मल के मोती से फिर खुशी हो
सीमी कलाइयों में डाले कड़े तिलाई
बन ठन के इस तरह से फिर राह ली चमन की
देखी बहार गुलशन बहरे तरब फ़िज़ाई
जिस जिस रविश के ऊपर आकर हुआ नुमायां
किस किस रविश से अपनी आनो अदा दिखाई
क्या क्या बयां हो जैसे चमकी चमन चमन में
वह ज़र्द पोशी उसकी वह तर्ज़े दिलरुबाई
सदबर्ग ने सिफ़त की नरगिस से बेतअम्मुल
लिखने को वस्फ़ उसका अपनी कलम उठाई
फिए सहन में चमन के आया बहुस्नो ख़ूबी
और तरफ़ा तर बसन्ती एक अंजुमन बनाई
उस अन्जुमन में बैठा जब नाज़ो तमकनत से
गुलदस्ता उसके आगे हंस हंस बसन्त लाई
की मुतरिबों ने ख़ुश ख़ुश आग़ाज़े नग़्मा साज़ी
साक़ी ने जामे ज़र्रीं भर भर के मै पिलाई

देख उसको और महफ़िल उसकी ’नज़ीर’ हरदम
क्या-क्या बसन्त आकर उस वक़्त जगमगाई

आइये आलसी बनिये



बहुत दिन हुए सारे कबाड़ी सोए हुए हैं. स्वास्थ्य कारणों से मैं भी कुछ नहीं कर सका. बिस्तर पए लेटे लेटे 'Idler' पत्रिका के सम्पादक टॉम हॉजकिन्सन की दूसरी ज़बरदस्त किताब ’How to be idle' समाप्त की. असल में मैंने तो तय किया है कि अब कुछ दिनों तक इसी किताब को अपनी बाइबिल मान कर चलूंगा. अलार्म घड़ियों, जल्दी उठने की सलाह देने वाले हितैषियों, दुनिया में सफल होने के गुर बताने वालों को टैम्प्रेरी गुडबाई कहता मैं इस किताब से एकाध टुकड़े पेश करता हूं

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हमें कोशिश करनी चाहिये कि हम हर काम को आलसीपन के साथ करें, सिवा पीने और प्यार करने में, सिवा आलसी होने में.

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शहरों में रहने वाले सम्भ्रान्त लोगों ने कविता को बार बार त्यागा है क्योंकि उन्हें लगता है उनाके पास इस तरह की फ़िज़ूल चीज़ों के वास्ते बर्बाद करने को समय नहीं है. लेकिन एक कविता को थोड़े मिनटों में पढ़ा जा सकता है और उसके बड़े शानदार प्रभाव होते हैं. सुबह के दस बजे बिस्तर में लेटे आलसी आदमी के पास ऐसा करने का समय होता है.

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सच्चा आलसी आदमी सिर्फ़ शनिवार को ही नहीं, हर समय अच्छा जीवन बिताना चाहता है. समय का आनन्द लिया जाना चाहिए बजाय कि आप हर समय उससे लड़ते रहें

Saturday, January 23, 2010

गर्चे यह त्यौहार की पहली ख़ुशी है ज़्यादः - नज़ीर अकबराबादी

करके बसन्ती लिबास सबसे बरस दिन के दिन
यार मिला आन कर हमसे बरस दिन के दिन
खेत पे सरसों के जा, जाम सुराही मंगा
दिल की निकाली मियां! हमने हविस दिन के दिन
सबकी निगाहों में दी ऐश की सरसों खिला
साक़ी ने क्या ही लिया वाह जस दिन के दिन
ख़ल्क में शोर-ए-बसन्त यों तो बहुत दिन से था
हमने तो लूटी बहात ऐश की बस दिन के दिन
आगे तो फिरता रहा ग़ैरों में हो ज़र्द पोश
हमसे मिला पर वह शोख़ खा के तरस दिन के दिन
गर्चे यह त्यौहार की पहली ख़ुशी है ज़्यादः
ऐन जो रस है सो वह निकले है रस दिन के दिन

लूटेगा फिर साल भर गुलबदनों की बहार
यार से मिल ले नज़ीर आज बरस दिन के दिन

साल २०१०: साहित्यिक साजिशों का नाश चाहता हूँ मैं- योगेन्द्र आहूजा

शेक्सपियर ने 'मैकबेथ' के पांचवें और आख़िरी एक्ट के पहले ही सीन में लेडी मैकबेथ से कहलवाया था- What's done cannot be undone.' जैसा कि हमने घोषणा कर दी थी साहित्यकारों वाली रायशुमारी समाप्त करने की. लेकिन उसके बाद हमें ई-मेल के जरिये राय मिली महत्वपूर्ण कथाकार योगेन्द्र आहूजा की. सो हमने उन्हें शामिल करने के लिए इस डन को अनडन कर दिया है:) - विजयशंकर


योगेन्द्र आहूजा (कथाकार):

इतिहास की गति और प्रक्रिया को इतना अवश्य जानता-समझता हूं कि मानव जाति के बेहतर भविष्य में यकीन रख सकूं. लेकिन यदि केवल इस वर्ष की बात करनी हो तो मुझे कोई खास उम्मीदें नहीं- बेशक तमन्नायें और ख्वाहिशें, ऐसी कि उनमें से हर एक पर `दम निकले', तमाम हैं.

जानता हूं कि इस देश के अधिसंख्य के हिस्से में आयी गरीबी और अन्याय का सिलसिला इस बरस भी जारी रहेगा. सामान्यजन के जीवन में लज्जा और अपमान का ढेर लगता रहेगा. करोड़ों भूखे या आधे पेट सोते रहेंगे. विजातीय प्रेमियों में से कुछ शायद इस बरस भी पेड़ों पर लटकाये जायें, बाकायदा पंचायतों के द्वारा फैसला दिया जाकर. कुछ और टी वी बाबा प्रकट होंगे और उनके प्रवचनों में भीड़ पहले से ज्यादा होगी. मन्दिरों से सर्वदा की तरह चप्पलें चोरी होती रहेंगी. अत्याचारियों के धंधे जारी रहेंगे. किसानों की आत्महत्यायें थमेंगी या लोगों का अपने घरों और ज़मीनों से बेदखल किया जाना रुकेगा, इसके कोई संकेत नहीं. झूठ, पाशविकता, बेइंसाफी और उत्पीड़न में इस बरस भी इजाफा होगा. लेकिन इन सबके साथ निशंक रूप से यह भी जानता हूं कि उत्पीड़ित तबकों की लड़ाइयां जारी रहेंगी और हर दिन प्रखरतर होंगी.

आपने उम्मीदों के बारे में जानना चाहा है, इसलिये तमन्नाओं का जिक्र यहां असंगत होगा, फिर भी सिर्फ एक. . . चाहता हूं कि यह बरस इस देश के किसी भी हिस्से या कोने में सामान्यजन की कोई एक विजय, कोई छोटी सी जीत दिखा सके.

हमारी हिन्दी में अब बौद्धिक, वैचारिक, अवधारणापरक बहसें नहीं होतीं. उनकी जगह गासिप्स ने ले ली है. साहित्यिक अवधारणाओं और सौन्दर्य संबधी मूल्य दृष्टियों की लड़ाइयां थम गई हैं. सारे विचारों में लगता है एका हो चुका है, वे मंच पर गलबहियां डाले नज़र आते हैं. नतीजा यह हुआ है कि रचनाओं की परख और मूल्यांकन के मानदण्ड धुंधले पड़ गये हैं . हम देखते हैं एक छोर पर सस्ती, आसान, तर्करहित प्रशंसायें और दूसरे पर विरोधियों को नेस्तनाबूद कर देने, उनका वंशनाश कर डालने की मुद्रायें. अब बहसें नहीं होतीं, सीधे हमले होते हैं. आलोचना के नाम पर निशंक भाव से निर्णय देने और किन्हीं काल्पनिक सूचियों में नामों को ऊपर नीचे या दाख़िल ख़ारिज करने का जो एक सस्ता, निरर्थक, अश्लील खेल जारी है, मैं उसका नाश चाहता हूं.

एक सचेत कोशिश जारी है ऐसी रचनाओं को प्रतिष्ठापित करने की जिनमें कोई चिन्ता न हो, विचार न हो, कोई पक्ष न हो, किसी तरह की बौद्धिक मीमांसा न हो और वे महज लफ़्ज़ों का खेल हों. मैं ऐसी कोशिशों और साजिशों का भी नाश चाहता हूँ.
साफ पोजीशन लेने से बचना और केवल हवाई किस्म की गोल मोल, अमूर्त और बेमतलब मानवीयता से काम चलाना, यह दरअसल आततायियों के पक्ष में जाता है. वे यही तो चाहते हैं. स्पेन के महान फिल्मकार लुई बुनुअल की साफ उद्घोषणा थी कि उनके सारे कृतित्व का एकमात्र उद्देश्य रहा है 'शक्तिशालियों के आत्मविश्वास में छेद करना'.

चाहता हूं कि हमारे वक्त की रचनायें अपने वक्त का केवल बयान न करें, बल्कि स्पष्टतः अपना पक्ष बतायें. उनमें सवाल हों, सपने हों, क्रोध और विरोध हो. साफ पोजीशन लेने से बचना और केवल हवाई किस्म की गोल मोल, अमूर्त और बेमतलब मानवीयता से काम चलाना, यह दरअसल आततायियों के पक्ष में जाता है. वे यही तो चाहते हैं. स्पेन के महान फिल्मकार लुई बुनुअल की साफ उद्घोषणा थी कि उनके सारे कृतित्व का एकमात्र उद्देश्य रहा है 'शक्तिशालियों के आत्मविश्वास में छेद करना'. उसके बरक्स हिन्दी में नामचीनों की बाडी लैंग्वेज जरा देखें - पावर और सत्ता के सामने हमेशा विनत, नतमस्तक. हर साल की तरह इस बरस भी अच्छी बुरी रचनायें आयेंगी, लेकिन चाहता हूं कि इस साल में हमारे शीर्ष लेखक, आलोचक और विचारक कम से कम इरैक्ट चलना सीख सकें.

धन्यवाद!

Friday, January 22, 2010

कलयुग का श्रवण

यह मार्मिक आलेख मुझे हमारे कबाड़ी फ़ोटूकार रोहित उमराव ने भेजा है. फ़ोटो भी जाहिर है उन्ही की है.



पीले वस्त्र गले में रामनामी गमछा मस्तक में सुशोभित रोली नंगे पांव कड़ाके की ठंड में वह आगे बढ़ता जा रहा था. उसे पैरों में गड़ने वाले कंकड़ और कांटों की चुभन की परवाह नहीं थी. उसे एक लम्बी पथ यात्रा में अपनी मां कमला देवी और स्वर्गीय पिता जगदीश वर्मा की अस्थियों को अपने कन्धे पर धरी कांवर में दोनों ओर लटकाए. हरिद्वार, गोला और नीमसार की तीर्थ यात्रा करने. तय करनी है कोसों की दुरी लग सकते दिन महीने और साल भी. जी हां ये कोई कहानी नहीं मातृपितृ भक्त श्रवणकुमार की तरह इक्कीसवर्षीय की मानी प्रतिज्ञा का जीता जागता उदाहरण है जो अभी कुछ दिन पहले बरेली में देखने को मिला. उसके साथ इस यात्रा में उसकी पत्नी भी है.

सीतापुर जिले के परसेंडी चांदपुर का रहनेवाला वीरेन्द्र आज की चकाचौंधभरी ज़िन्दगी से एकदम अलग है. अपने पिता की तीन सन्तानों में वीरेन्द्र सबसे छोटा है. दो बड़ी बहनों का विवाह करने के बाद पिता स्वर्ग सिधार गए. घर की माली हालत भी एकदम ठीक नहीं है. कक्षा आठ तक की पढ़ाई करने के बाद अपने पिता का हाथ बंटाने को लखनऊ के राष्ट्रीय स्वरूप कोल्ड स्टोर में कच्चे केलों को पकाने का काम करने लगा. दो ढाई सौ रुपये रोज़ मिल जाते थे. पर मन में मां को लिए अपने हाथों से पिता की अस्थियों को हरिद्वार की गंगा मैया में विसर्जित करने की इच्छा बनी रही. गोला और नीमसार के दर्शन भी कराने थे अपनी मां को.

वह निकल पड़ा नवरात्रि के बाद ही उस कठिन यात्रा के लिए जिसे वह हर हाल में पूरा करने को वचनबद्ध है. वीरेन्द्र की इस अगाध निष्ठा के सामने उसकी पत्नी प्रीति तथा उसकी बड़ी बहन-बहनोई (सुनीता और वेदप्रकाश) अपने तीन साल के बेटे, एक ठेलीवान के साथ दानापानी लिए सेवक के रूप में निकल पड़े हैं. लगभग पांच किलोमीटर प्रतिदिन की यात्रा करने के बाद ये सारे किसी मन्दिर या सड़क के किनारे को अपना ठिकाना बनाकर तम्बू लगा लेते हैं पूछने पर उसने कहा कितने दिन, महीने या साल लग जाएं पर मां को तीर्थ यात्रा करा कर ही सांस लूंगा.

Thursday, January 21, 2010

दधिचोर गोपीनाथ बिहारी की बोलो जै


शिशिर की कँपन का अभी अंत नहीं हुआ है किन्तु तिथि तो कह रही है वसन्त आ गया है। वसंतागम के साथ ही आजकल 'कबाड़ख़ाना' पर नज़ीर अकबराबादी का साहित्योत्सव चल रहा है। सच है कि जिसने नज़ीर को नहीं पढ़ा उसने कुछ नहीं पढ़ा। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आइए कुछ पढ़ें और सुनें भी। प्रस्तुत है नज़ीर की एक कालजयी रचना ' कन्हैया का बालपन' के कुछ अंश।

शब्द : नज़ीर अकबराबादी
स्वर: उस्ताद अहमद हुसैन व उस्ताद मोहम्म्द हुसैन





क्या - क्या कहूं मैं कृष्न कन्‍हैया का बालपन।
ऐसा था, बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या- क्या कहूँ .......

उनको तो बालपन से ना था काम कुछ जरा।
संसार की जो रीत थी उसको रखा बचा।
मालिक थे वो तो आप ही, उन्‍हें बालपन से क्‍या।
वाँ बालपन जवानी बुढ़ापा सब एक सा।
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या - क्या कहूँ .......

बाले हो ब्रजराज जो दुनिया में आ गये।
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गये ।
इस बालपन के रूप में कितनों को भा गये।
इक ये भी लहर थी जो जहाँ को दिखा गये ।
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या - क्या कहूँ .........

सब मिल के यारो कृष्न मुरारी की बोलो जै।
गोबिन्द छैल कुंज बिहारी की बोलो जै।
दधिचोर गोपीनाथ बिहारी की बोलो जै।
तुम भी 'नज़ीर' कृष्न मुरारी की बोलो जै।
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या - क्या कहूँ ......

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो - नज़ीर अकबराबादी



आलम में जब बहार की लगन्त हो
दिल को नहीं लगन ही मजे की लगन्त हो
महबूब दिलबरों से निगह की लड़न्त हो
इशरत हो सुख हो ऐश हो और जी निश्चिंत हो

जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो

अव्वल तो जाफरां से मकां जर्द जर्द हो
सहरा ओ बागो अहले जहां जर्द जर्द हो
जोड़े बसंतियों से निहां जर्द जर्द हो
इकदम तो सब जमीनो जमां जर्द जर्द हो

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

मैदां हो सब्ज साफ चमकती रेत हो
साकी भी अपने जाम सुराही समेत हो
कोई नशे में मस्त हो कोई सचेत हो
दिलबर गले लिपटते हों सरसों का खेत हो

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

ऑंखों में छा रहे हों बहारों के आवो रंग
महबूब दुलबदन हों खिंचे हो बगल में तंग
बजते हों ताल ढोलक व सारंगी और मुंहचंग
चलते हों जाम ऐश के होते हों रंग रंग

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

चारों तरफ से ऐशो तरब के निशान हों
सुथरे बिछे हों फर्श धरे हार पान हों
बैठे हुए बगल में कई आह जान हों
पर्दे पड़े हों जर्द सुनहरी मकान हों

जब देखिए बसंत को कैसी बसंत हो

कसरत से तायफो की मची हो उलटपुलट
चोली किसी की मसकी हो अंगिया रही हो कट
बैठे हों बनके नाजनी पारियों के गट के गट
जाते हों दौड़-दौड़ गले से लिपट-लिपट

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

वह सैर हो कि जावे जिधर की तरफ निगाह
जो बाल भी जर्द चमके हो कज कुलाह
पी-पी शराब मस्त हों हंसते हों वाह-वाह
इसमें मियां 'नज़ीर' भी पीते हों वाह-वाह

जब देखिए बसंत को कैसी बसंत हो

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

जिसने नज़ीर नहीं पढ़ा उसने कुछ नहीं पढ़ा. नज़ीर अकबराबादी साहब की बसन्त के मौसम पर लिखी कोई दर्ज़न भर कविताओं की सीरीज़ शुरू कर रहा हूं आज से.



जब फूल का सरसों के हुआ आके खिलन्ता
और ऐश की नज़रों से निगाहों का लड़न्ता
हमने भी दिल अपने के तईं करके पुखन्ता
और हंस के कहा यार से ए लकड़ भवन्ता

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

एक फूल का गेंदों के मंगा यार से बजरा
दस मन का लिया गुंथा, आठ का गजरा
जब आंख से सूरज के ढला रात का कजरा
जा यार से मिलकर ये कहा ए मेरे रजरा

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

थे अपने गले में तो कई मन के पड़े हार
और यार के गजरे भी थे एक धवन की मिकदार
आंखों में नशे मै के उबलते थे धुंआधार
जो सामने आता था यही कहता था ललकार

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

पगड़ी में हमारी थे जो गेंदों के कई पेड़
हर झोंक में लगती थी बसन्तों के तईं ऎड़
साक़ी ने भी मटके से दिया मुंह के तईं भेड़
हर बात में होती थी इसी बात पे आ छेड़

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

फिर राग बसन्ती का हुआ आन के खटका
धोंसे के बराबर वो लगा बाजने मटका
दिल खेत में सरसों के हर एक फूल से अटका
हर बात में होता था इसी बात का लटका

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

जब खेत पे सरसों के दिया जा के कदम गाड़
सब खेत उठा सर के ऊपर रख लिया झंझाड़
महबूब रंगीलों की भी एक साथ लगी झाड़
हर झाड़ से सरसों के भी कहती थी अभी झाड़

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

साथ लगा जब जो अजब ऐश का दहाड़ा
जिस बाग़ में गेंदों के गए उसको उजाड़ा
देखी कभी सरसों कभी नरगिस को उजाड़ा
कहते थे इसी बात को बन, झाड़, पहाड़ा

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

ख़ुश बैठे हैं सब शाहो वज़ीर आज अहा हा
दिल शाद हैं अदना ओ फ़क़ीर आज अहा हा
बुल्बुल की निकलती है सफ़ीर आज अहा हा
कहता यही फिरता है 'नज़ीर' आज अहा हा

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

साल २०१०: कायम रहे अंधेरे से जंग का हौसला- अरुण आदित्य

साल २०१० और उसके आगे के समय की पड़ताल करने को लेकर साहित्यकारों से हुई बातचीत की यह आख़िरी कड़ी है. यह श्रृंखला इस मायने में सार्थक कही जा सकती है कि हमारी निजी और तकनीकी सीमाओं के बावजूद जितने महत्वपूर्ण कवि, कथाकार, नाटककार,आलोचक, अनुवादक, व्यंग्यकार शामिल हुए उन्होंने मोटा-मोटी आशा-निराशा की धुरी से हटकर भी वर्त्तमान और भविष्य की नब्ज टटोलने की कोशिश की. हम इनके बेहद आभारी हैं और ह्रदय की गहराइयों से इन सबका धन्यवाद करते हैं. पाठकों की टिप्पणियाँ और उनकी इस रायशुमारी में शिरकत उनकी सदाशयता का द्योतक है. साहित्यकारों का क्रम पहले हुई बातचीत के आधार पर बनता चला गया. किसी को किसी की राय से रंच मात्र भी ठेस पहुँची हो तो हम क्षमा माँगते हैं क्योंकि यह उद्देश्य नहीं था. उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप सब इसी तरह स्नेह बनाए रखेंगे- विजयशंकर

अरुण आदित्य (कवि):

आनन्दोत्थं नयनसलिलम्यत्र नान्यैर निमित्तैर
नान्यस तापं कुसुमशरजाद इष्टसंयोगसाध्यात
नाप्य अन्यस्मात प्रणयकलहाद विप्रयोगोपपत्तिर
वित्तेशानां न च खलु वयो यौवनाद अन्यद अस्ति॥


कालिदास ने मेघदूतम् की उपर्युक्त पंक्तियों में जिस तरह के लोक-काल की कल्पना की है, जहां आनंदाश्रुओं के सिवाय कोई आंसू न हो, वैसी कोई कल्पना नए वर्ष के संदर्भ में कर पाना आज मुश्किल लगता है. हम सब जानते हैं कि वर्ष बदल जाने से कुछ नहीं बदला है. दीवार वही है, जिस पर कैलेंडर नया टांग दिया गया है. पिछले साल ने दरकी हुई दीवार विरासत में दी है, अब हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि अगली जनवरी में जब एक और नया कैलेंडर टांगने की बारी आए तो दीवार वैसी ही न रहे, जैसी अभी है. इस वर्ष भले ही नई दीवार न बना सकें, लेकिन कम से कम पुरानी दीवार की मरम्मत तो करा ही सकें.

अमेरिका बदल जाएगा या ओसामा सुधर जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं कर सकते, पर इनके इरादों के सामने डटकर खड़े रहने का जज्बा जिंदा रहे, यह स्वप्न तो देखा ही जा सकता है. आसमान में दहकता हुआ नए वर्ष का नया सूरज पूरी दुनिया को अपनी रोशनी से लालम-लाल कर देगा, इसकी उम्मीद नहीं है फिर भी उससे इतनी उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि वह अंधेरे से जंग का अपना हौसला तो बनाए ही रखेगा.

साहित्य में रचनाधर्मिता पर विवाद हावी नहीं होंगे, पुरस्कारों में जोड़-तोड़ नहीं होगी, यह उम्मीद तो नहीं कर सकते, लेकिन इन सब के बीच कभी-कभी सच्ची रचनाओं और रचनाकारों को भी पहचाना जाता रहेगा, यह उम्मीद तो कर ही सकते हैं. उम्मीद है कि गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी पकी हुई पीढ़ी के थके हुए लोग सुविधाओं की सेज पर आराम फरमाते रहेंगे. उनसे मुझे कुछ नहीं कहना है. वैसे भी उस पीढ़ी के लोग सुनने से ज्यादा सुनाने में यकीन रखते हैं. हां, देश के बच्चों से मुझे अब भी उम्मीद है और उन्हें मैं कवि मंगलेश डबराल की इन काव्य-पंक्तियों को संदेश रूप में देना चाहता हूं:

‘प्यारे बच्चो जीवन एक उत्सव है जिसमें तुम हँसी की तरह फैले हो.
जीवन एक हरा पेड़ है जिस पर तुम चिडिय़ों की तरह फडफ़ड़ाते हो.
जैसा कि कुछ कवियों ने कहा है जीवन एक उछलती गेंद है और
तुम उसके चारो ओर एकत्र चंचल पैरों की तरह हो.
प्यारे बच्चो अगर ऐसा नहीं है तो होना चाहिए.’


जानता हूं कि 'ऐसा नहीं है तो होना चाहिए' एक कठिन कामना है. पर इस कठिन समय में कुछ कठिन कामनाएं भी तो करनी ही होंगी… और अगर यह उम्मीद भी ‘आनन्दोत्थं नयनसलिलम्यत्र नान्यैर निमित्तैर’ जैसी कुछ कठिन लग रही हो तो इतनी उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि कि भले ही वैसी व्यवस्था न निर्मित हो सके, कम से कम इतना तो हो जाए कि हरि मृदुल जैसे किसी युवा कवि को फिर से यह न लिखना पड़े कि-

‘अव्वल तो काम मिलना कठिन
काम मिल गया तो टिकना कठिन
टिक गए तो काम कर पाना कठिन
किसी तरह काम कर पाए तो
वाजिब मेहनताना कठिन.’


नए साल से यह कोई बहुत बड़ी उम्मीद तो नहीं है न!


सूरज प्रकाश (वरिष्ठ कथाकार, अनुवादक):

आज के वक्त की सबसे बड़ी तकलीफ यही है कि भाग-दौड़, आपा-धापी और तकनीकी उन्नयन के नाम पर अंधी दौड़ और तथाकथित टार्गेट के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है दुनिया भर में...और ख़ास तौर पर भारत में, उसमें आम आदमी कहीं नहीं है. उसे कोई नहीं पूछ रहा जबकि सारे के सारे नाटक उसी के नाम पर, उसी के हित के नाम पर और उसी की जेब काट कर हो रहे हैं. सारे महानगर ऐसे लाखों लोगों से भरे पड़े हैं जिनके लिए दो जून की रोटी जुटाना, एक गिलास पानी जुटाना और एक कप चाय जुटाना तक मुहाल हो रहा है़
आम आदमी से सब कुछ छीन लिया गया है- पीने का पानी तक. कई बार चौराहों पर बेचारगी से घूमते गांववासियों को देखता हूं तो सोच में पड़ जाता हूं कि बेचारा गांव की तकलीफों, बेरोजगारी, भुखमरी और जहालत से भाग कर यहां आया है तो उसे एक गिलास पानी पीने के लिए और एक कप चाय पीने के लिए कितने लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा! उस भले आदमी से उसका चेहरा ही छीन लिया गया है.

ये सब हुआ है जीवन के हर क्षेत्र में आये अवमूल्यन के कारण. जब तक इस देश में हत्यारे मुख्यमंत्री बनते रहेंगे और रिश्वतखोर केंद्रीय मंत्री, हम कैसे उम्मीद करें कि एक ही साल में कोई क्रांतिकारी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक अथवा राजनीतिक स्तर पर कोई तब्दीलियाँ होंगी.

बीए में अर्थशास्त्र पढ़ते हुए एक सिद्धांत हमें पढ़ाया गया था कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है. मतलब ये कि अगर आपकी जेब में दस रुपये का पुराना नोट हो और कहीं से आपके हाथ में दस रुपये का नया नोट आये तो आप जेब में रखे पुराने नोट की जगह नया नोट रख लेंगे और जेब वाला पुराना नोट सर्कुलेशन में डाल देंगे. हर आदमी यही करता है और सारे नोट जेबों में चले जाते हैं और बेचारे पुराने नोट जस के तस सर्कुलेशन में बने रहते हैं, बल्कि इनमें लोगों की जेब से निकले पुराने नोट भी शामिल हो जाते हैं. आज जीवन के हर क्षेत्र में यही हो रहा है. सब कुछ जो अच्छा है, स्तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है. कभी स्वेच्छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते. आज हमारे आस-पास जो कुछ भी चलन में है, वह औसत है, बुरा है और कचरा है. हम उसे ढो रहे हैं क्योंकि बेहतर के विकल्प हमने खुद ही चलन से बाहर कर दिये हैं. साहित्य में ये सबसे ज्यादा हो रहा है. पाले-पोसे घटिया लेखक, उनकी किताबें और उनके रुतबे ही सर्कुलेशन में हैं. हम ही जानते हैं कि एक-एक घटिया किताब के छपने पर कितने पेड़ों को बलि देनी पड़ती है.

हम ही देखें कि ऐसा क्यों हो रहा है और कब तक हम ऐसा होने देंगे.


विभा रानी (कथाकार, नाटककार, रंगकर्मी, अनुवादक):

नए साल में मेरी आशाएं बहुत अधिक नहीं हैं. सबसे पहली आशा तो अपने साहित्यकार बन्धुओं से ही है कि वे आपस की मारामारी छोड़कर साहित्य और समाज के लिए कुछ सोचें. अपने ही लेखन को सर्वश्रेष्ठ और दूसरों के लेखन को निहायत घटिया न मानें. अपनी साहित्यिक गैर ज़िम्मेदारियों से बाज़ आएं. अगर वे ऐसा कर लेंगे तो निश्चय ही साहित्य और इसके माध्यम से समाज और साहित्य के पाठकों का बड़ा भला होगा. बस इतनी सी ही आशा है. धन्यवाद.

निरंजन श्रोत्रिय (कवि-कथाकार): साल २०१० हमारे लिए वह सब लेकर आये जिसके हम हकदार हैं. साहित्य, संस्कृति और राजनीति में लगातार हो रही गिरावट रुके.

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया पर अंकुश लगे और वह सब न हो जो हो रहा है और जिसे नहीं होना चाहिए था.

दरअसल आज की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जो जिसके लायक है उसे वह नहीं मिल रहा है. हर जगह भृष्टाचार, चापलूसी और मक्कारी है. साहित्य, राजनीति, खेल, अर्थ सभी जगह. नया साल हमें इन सभी से मुक्ति दिलाए. कम से कम कोशिश तो शुरू हो.

एक समय था जब साहित्य, कला, संस्कृति कलाकार से पूर्णकालिक साधना की माँग करती थी. अब सब जगह नेटवर्किंग और मैनेजमेंट है. सब कुछ प्रायोजित. यदि नया साल संस्कृतिकर्मी की पहचान लौटा सके तो यह हमारे समय क़ी बड़ी उपलब्धि होगी.

विजय गौड़ (कवि, हालिया कविता संग्रह 'सबसे ठीक नदी का रास्ता'):
साल २०१० हो या निकट भविष्य का अगला समय, तय है कि दुनिया के बुनियादी चरित्र के बदलाव; जिसमें न कोई शोषित हो न शासित यानी सत्ताविहीन समाज का समय आने से पूर्व के कई जरूरी चरणों से गुजरना होगा. साल २०१० उस तरह के बदलावों को गति देने में एक अहम बिंदु हो यह उम्मीद करना चाहता हूं. लेकिन जानता हूं कि सिर्फ़ उम्मीदें पालने से कुछ हो नहीं सकता.

Wednesday, January 20, 2010

उठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई



(आप में से कई लोगों ने बचपन में कभी न कभी प्रभातफेरी में "उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई" ज़रूर गाया होगा. इस गीत के रचयिता थे श्री बंशीधर शुक्ल. उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के रहने वाले शुक्ल जी का यह गीत राजेन्द्र सिंह बेदी ने अपनी फ़िल्म ’आंखिन देखी’ में इस्तेमाल किया था. मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था इस कालजयी नग्मे को और जे.पी. कौशिक ने संगीतबद्ध किया था. शुक्ल जी के बारे में हमारे कबाड़ी साथी योगेश्वर सुयाल ने मुझे उनके बारे में एक मेल काफ़ी अर्सा पहले भेजी थी. मैं उस मेल को एक पोस्ट की सूरत में लगाना चाहता था लेकिन कुछ मेरा कुछ योगेश्वर भाई का आलस्य - यह काम हो न सका.

आज अभी भोपाल से योगेश्वर ने फ़ोन पर इत्तला दी कि आज यानी बसन्त पंचमी को बंशीधर शुक्ल जी का जन्मदिन पड़ता है. लीजिये आप भी जानिये उनके बारे में. उन्हें नमन. आलेख योगेश्वर सुयाल का है. वैसे योगेश्वर बाबू ने शुक्ल जी पर एक लम्बी पोस्ट लगाना अभी बाक़ी है.)


बात पुरानी ही है. तीस साल पहले की. तब, जब दादाजी भी थे. उनकी सुबहें अक्सर इसी गीत से होती थीं. मगर याद तो उन्हें भी नहीं रहा होगा पूरा. वह पहली चार पंक्तियां गाते-गाते चारपाई और चौखट छोड़कर बाहर निकल जाया करते थे. उस समय हम सोये होते थे. बरसों हो गए, यह गीत नहीं सुना.

दफ़्तर से निकलते ही एक रात अचानक शहामतगंज के एक नुक्कड़ पर लखनऊ के पत्रकार बन्धु संजय त्रिपाठी से गप्शप हो रही थी कि एक बन्दा गाता चला जा रहा था. उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई ... हमारे लिए रात ही थी मगर उसके लिए भोर. गीत के साथ दादाजी भी याद आ गए ... बरसों बाद.

चीत पर चर्चा चला तो संजय भी चहक उठे - "देखा भाईसाहब! खीरी में लिखे गीत आज भी हिन्दुस्तान गा रहा है."

"इस गीत का खीरी से क्या मतलब भाई?"

तभी पता चला कि अवधी के कवि बंशीधर शुक्ल इसके जनक हैं. खीरी के निवासी. गीत संजय को भी याद नहीं था मगर इस चपल पत्रकार ने दूसरे ही दिन कविवर शुक्ल के घर से पूरा संग्रह मंगवा लिया.

आज़ादी के बाद विधायक भी रहे बंशीधर शुक्ल जी अस्सी के दशक में गुज़र गए थे. तीन साल पहले उनकी जन्मशती भी चुपचाप चली गई. गांधी और सुभाष ने जिस कवि के गीतों से आज़ादी की अलख जगाई, सुदूर गुजरात से गढ़वाल तक गाया गया. वो भी उस दौर में, उस स्रष्टा से हम अनजान ही थे.

बताते है साबरमती आश्रम की सुबह आज भी इसी गीत से होती है. बहुत कम लोग जानते होंगे कि आज़ाद हिन्द फ़ौज का तराना - कदम कदम बढ़ाए जा - भी इसी कवि की लेखनी से निकला था.

यूं कहना चाहिये - कवि के लिखे गीत को सुभाष ने आज़ादी के तराने के रूप में चुना.



उठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई
अब रैन कहां तू सोवत है.
जो सोवत है सो खोवत है
जो जाफ़त है सो पावत है

टुक नींद से अंखियां खोल ज़रा
पल अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीत करन की रीत नहीं
जग जागत है तू सोवत है

जो काल करे सो आज कर ले
जो आज करे सो अब कर ले
जब चिड़ियां खेती चुग डाली
फिर पछताए क्या होवत है

अब जाग जगत की देख उड़न
जग जागा तेरे बन्द नयन
यह जग जागृति का मेला है
तू नींद की गठरी ढोवत है

है आज़ादी ही लक्ष्य तेरा
उसमें अब देर लगा न ज़रा
अब सारी दुनिया जाग उठी
तू सिर खुजलावत रोवत है.

उठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई
अब रैन कहां तू सोवत है.

लो फिर बसन्त आई



ताहिरा सैयद कर रही हैं बसन्त का इस्तकबाल.



यहां इस बात का ज़िक्र बेमानी नहीं होगा कि यही रचना उनकी माता मल्लिका पुखराज भी गा चुकी हैं.

(फ़ोटो 'ट्रिब्यून' से साभार)

Monday, January 18, 2010

साल २०१०: वित्तीय साम्राज्यवादी खून-ख़राबा बढ़ेगा- त्रिनेत्र जोशी

पिछली कड़ी में वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा की बातें पढ़कर काफी हलचल मची. नीरज पासवान जी ने तो मुझे भी लपेटे में ले लिया और लिखा- 'आलोक धन्वा जी ने हिंदी के महान लेखकों की सूची गिनाई है उसमें एक भी महिला महान बनती हुई नहीं दिखी. महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उषा प्रियंवदा और कात्यायिनी तक. लगता है पुरुष ही महान हुआ करते हैं. फिर अगर विजयशंकर चतुर्वेदी पोस्ट लिखेंगे तो स्त्री के बारे में सोच भी कौन सकता है? आप लोग महान बनाने का कारखाना चलाते रहिए और बोतल बंद द्रव सरकारी खर्चे पर पीते रहिए. ज़िंदाबाद!'

हम पासवान जी को अपने खर्चे पर धन्यवाद देते हैं और अनुरोध करते हैं कि वह सुनी-सुनायी बातों पर अपनी राय न बनाएं:)... और हाँ, अगली कड़ी इस श्रृंखला की आख़िरी कड़ी होगी.

त्रिनेत्र जोशी (वरिष्ठ कवि, अनुवादक):साल २०१० में जो राजनीति है वह एशिया और अफ्रीका केन्द्रित अधिक हो जायेगी. इसलिए कि एशिया तो अभी विकासशील राष्ट्रों की पांत में आगे है. ख़ास तौर पर भारत-चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया. अफ्रीका इस सदी के उत्तरार्द्ध में विकासशीलों की दौड़ में शामिल होगा. इससे एक क़िस्म का जो ग्लोबल बाज़ार बना है उसके चलते इन देशों में विकसित देशों का हस्तक्षेप और बढ़ेगा; यानी जिसे वित्तीय सामाज्यवाद कहते हैं. इसमें पूंजीवादी तौर-तरीकों से काम होता है, सेना भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ती. शायद इसीलिये लेनिन ने कहा था-'साम्राज्यवाद पूंजीवाद का सर्वोत्तम मंच है.'

साल २०१० में बाज़ारों के लिए मारामारी अधिक बढ़ेगी, जिसका अर्थ यह है कि विकासमान और अल्प विकसित देशों में वित्तीय साम्राज्यवादी खून-ख़राबा बढ़ेगा और पूंजीवादी तौर-तरीके समाज पर हावी होंगे. इसमें कई विकासशील और अल्प विकसित देश साम्राज्यवादी लूट-खसोट का अड्डा बनेंगे और हो सकता है यह साम्राज्यवाद कई नए किस्म के इराक़ खड़े कर दे. लेकिन उम्मीद इस बात पर है कि एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासमान देश इस अचानक आक्रमण से टक्कर लेंगे और इकतरफा विश्व में शक्ति संतुलन कायम कर पायेंगे. लेकिन इसमें भारत-चीन और ब्राज़ील जैसे देशों की रणनीतिक एकता, एक महत्वपूर्ण मुकाम होगी. जैसे कि आसार हैं आपसी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद भारत और चीन एक दूसरे के निकट आने को मजबूर होंगे जिससे निश्चय ही रणनीतिक परिदृश्य बदलेगा.

जहां तक साहित्य का सवाल है, पश्चिमी हवाएं उसकी शैली पर यहाँ तक कि विषय-वस्तु पर भी अपना असर बढ़ाएंगी और साहित्य बाज़ारवाद में अपनी भूमिका निभाने को विवश सा लगेगा. इसका एकमात्र विकल्प यह है कि विकासशील देश और अल्प विकसित देशों के लेखक समाज के प्रति अपनी संवेदनात्मक प्रतिबद्धता बढ़ायें क्योंकि देश-काल के हिसाब से इस 'अग्रगामिता' के शिकार विकासशील और अल्प विकसित देशों या राष्ट्रों के समाज ही होंगे. हालांकि यह एक उम्मीद भर है. इसके बिना साहित्य अपनी बुनियादी भूमिका को सुरक्षित रख पाए, यह अनिश्चित है. लेकिन इस ओर साहित्य प्रवृत्त हो इसकी अपेक्षा करना शोषक और शोषित के बीच शोषित का पक्ष लेने की एक अनिवार्य ज़रुरत है.

यही वजह है कि साहित्यकारों के बीच संवादहीनता बढ़ रही है और मीडिया हर प्राकृतिक कोमल भाव को एक सनसनी में बदल रहा है जिसके भीतर अधिकाँश लोग सादिस्तिक आनंद पा रहे हैं. यह एक पतनशील समाज की पहली पहचान है. अगर साहित्यकार सचमुच साहित्यकार रहना चाहते हैं तो उन्हें इस संवेदनशील परिदृश्य से दो-दो हाथ करना होंगे अन्यथा जो निराशाजनक परिदृश्य है वह और भी गहन हो जाएगा.

इस सबके बावजूद कहना यह है कि न समय रुकता है, न दमन कम होता है- फिर भी यह उक्ति काफी मायने रखती है कि जहां दमन है वहां प्रतिरोध भी अवश्यम्भावी है. इसी उम्मीद के साथ हमें २०१० का आगाज़ करना चाहिए और समय रहते अपनी भूमिका तय कर लेना चाहिए.


विवेक रंजन श्रीवास्तव (कवि-व्यंग्यकार-नाटककार): सैद्धांतिक और बौद्धिक स्तर पर हम किसी से कम नहीं हैं, वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत ने स्वयं को बचाए रखा, २००९ में जो खोया जो पाया वह सब सामने है ही. मेरी कामना है कि वर्ष 2010 में हम कुछ ऐसा कर दिखाएं जिससे मंहगाई नियंत्रित हो जिससे मेरे प्रथम व्यंग्य संग्रह का किरदार 'रामभरोसे', जो महात्मा गाँधी का अंतिम व्यक्ति है, चैन की रोटी खा सके, उसे प्यास बुझाने को पानी खरीदना न पड़े. पड़ोसी देशो की कूटनीति पर हमें विजय मिले, कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन भर नहीं बल्कि कुछ ऐसी नीतिगत खेल व्यवस्था हो कि हम पदक तालिकाओ में भी नजर आयें.

यह तो था मेरा कवि-नाटककार वाला अवतार. अब व्यंग्यकार के चोले में प्रवेश करता हूँ. एक व्यंग्यकार होने के नाते मेरी नए वर्ष से कुछ मांगें इस प्रकार हैं-

1.वात्स्यायन (कामसूत्र वाले) पुरस्कारों की स्थापना हो

जब से हमारे एक प्रदेश के ८६ वर्षीय (अब पूर्व और अभूतपूर्व हो चुके) महामहिम जी पर केंद्रित शयन शैया पर निर्मित फिल्म (पता नहीं 'असल या नकल') का प्रसारण एक टी वी चैनल पर हुआ है, जरूरत हो चली है कि वात्स्यायन पुरस्कारों की स्थापना हो ही जाए. वानप्रस्थ की जर्जर परम्परा और जरावस्था को चुनौती देते कथित प्रकरण से कई बुजुर्गों को इन सद्प्रयासों से नई उर्जा मिलेगी और उनमें साहस का संचार होगा. प्राचीन समय से हमारे ॠषि-मुनि और आज के वैज्ञानिक चिर युवा बने रहने की जिस अनंत खोज में लगे रहे हैं, उस दिशा में यह एक सार्थक, रात्रि-स्मरणीय एवं अनुकरणीय उदाहरण होगा!

2.आतंकवाद के रचनात्मक पहलू पर ध्यान दिया जाए

कभी बेचारे आतंकवादियों के दृष्टिकोण से भी तो सोचिये. कितनी मुश्किलों में रहते हैं वे! गुमनामी के अंधेरों में, संपूर्ण डेडिकेशन के साथ अपने मकसद के लिये जान हथेली पर रखकर, घर-परिवार छोड़ जंगलों में प्रशिक्षण प्राप्त कर, भारी जुगाड़ करके श्रेष्ठतम अस्त्र-शस्त्र जुटाना खाने का काम नहीं है. पल दो पल के धमाके के लिये सारा जीवन होम कर देना कोई इन जांबांजों से सीखे! आत्मघात का जो उदाहरण हमारे आतंकवादी भाई प्रस्तुत कर रहे हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है. अपने मिशन के पक्के दृढ़प्रतिज्ञ हमारे आतंकी भाई जो हरकतें कर रहे हैं वे वीरता के उदाहरण बन सकती हैं. जरूरत बस इतनी है कि कोई आपके जैसा महान लेखक या ब्लॉगर उन पर अपनी सकारात्मक कलम चला दे.

3.भ्रष्टाचार को नैतिक समर्थन मिले

सरवाइवल आफ फिटेस्ट के सिद्धांत को ध्यान में रखें, तो हम सहज ही समझ सकते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद जिस तरह से भ्रष्टाचार दिन दूनी रात चौगुनी गति से फल फूल रहा है, उसे देखते हुये मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि विश्वगुरु भारत को भ्रष्टाचार के पक्ष में खुलकर सामने आ जाना चाहिये. हमें दुनिया को भ्रष्टाचार के लाभ बताना चाहिये. पारदर्शिता का समय है, विज्ञापन बालायें और फिल्मी नायिकायें पूर्ण पारदर्शी होती जा रही हैं. पारदर्शिता के ऐसे युग में भ्रष्टाचार को स्वीकारने में ही भलाई है और हर नस्ल के भ्रष्टाचारियों की मलाई ही मलाई है.

आप मराठी न जानते हों तो भी गुज़ारिश;इसे सुनें ज़रूर !


मराठी नाट्य परम्परा में संगीत का एक महत्वपूर्ण क़िरदार रहा है. नाटक के कथानक को आगे बढ़ाने और मोनोटनी को तोड़ने में नाट्य संगीत कड़ी बनता आया है.
किर्लोस्कर नाट्य कम्पनी के ज़माने से नाटकों में संगीत का सिलसिला बना और उसे बाद में पं.बाल गंधर्व, पं.दीनानाथ मंगेशकर और सवाई गंधर्व ने सँवारा और समृध्द किया. नाट्य पदों की भावभूमि हमेशा से शास्त्रीय संगीत के इर्दगिर्द रची गई और गुणी कलाकारों ने इसे तेज़ तान के साथ टप्पे,ठुमरी और छोटे ख़याल के सारे कलेवरों से सजाया. कालांतर में पं.भीमसेन जोशी,पं.जितेन्द्र अभिषेकी और पं.वसंतराव देशपाण्डे ने इस क्षेत्र में बहुत ख्याति अर्जित की.

पं.वंसतराव देशपाण्डे जल्दी ही इस दुनिया से चले गए. उनके गायन एक अजीब कशिश थी और उनका स्वर-विन्यास हमेशा से श्रोता को एक अलौकिक आनंद की सैर करवाता था. वे एक बेजोड़ तबला वादक और अभिनेता भी थे.पु.ल.देशपाण्डे,कुमार गंधर्व और पं.देशपाण्डे में बड़ा ज़बरदस्त याराना था. तीनो के बीच दो चीज़े कॉमन थीं...रसरंजन और बेग़म अख़्तर. हाँ याद आया इन तीनों के एक और प्यारे दोस्त थे रामूभैया दाते जिन्हें संगीत संसार रसिकराज के रूप में जानता था. वे अपने घर कई बड़े बड़े गायकों की महफ़िलें करते और शानदार ख़ातिरदारी भी. बेग़म अख़्तर इन्दौर आएँ और रामू भैया से न मिले ऐसा हो ही नहीं सकता . रामू भैया के बार में विस्तार से फ़िर कभी

...फ़िलहाल पं.वसंतराव देशपाण्डे के मदमाते और घुमावदार स्वर में सुनते हैं यह मराठी नाट्य पद ...घे ई छंद मकरंद....ज़रा देखिये तो क्या बलखाती तानें हैं और स्वरों की लयकारी....कमाल है.

अशोक भाई आज आपका दिन शायद यही सुनते बीत जाए !


Sunday, January 17, 2010

और ख़ाक में पड़ा है सो है वो भी आदमी

पेश है नज़ीर अकबराबादी के ’आदमीनामा’ का दूसरा और आख़िरी हिस्सा:



यां आदमी ही शादी है और आदमी ब्याह
काज़ी, वकील आदमी और आदमी गवाह
ताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह मख़्वाह
दौड़े है आदमी ही तो मशालें जला के राह

और ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमी

यां आदमी नक़ीब हो बोले है बार-बार
और आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवार
हुक्का, सुराही, जूतियां दौड़े बग़ल में मार
कांधे पे रख के पालकी है आदमी कहार

और उनमें जो चढ़ा है सो है वो भी आदमी

बैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगा
और आदमी ही फिरते हैं रख सर पे खोमचा
कहता है कोई ’लो’ कोई कहता है ’ला रे ला’
किस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बना

और मोल ले रहा है सो है वो भी आदमी

यां आदमी ही क़हर से लड़ते हैं घूर-घूर
और आदमी ही देख उन्हें भागते हैं दूर
चाकर, ग़ुलाम आदमी और आदमी मजूर
यां तक कि आदमी ही उठाते हैं जा ज़रूर

और जिसने वह फिरा है सो है वो भी आदमी

तबले, मजीरे, दायरे, सारंगियां बजा
गाते हैं आदमी ही हर तरह जा ब जा
रंडी भी आदमी ही नचाते है गत बजा
वह आदमी ही नाचे है और देख फिर मज़ा

जो नाच देखता है सो है वो भी आदमी

यां आदमी ही लाल-ओ-जवाहर हैं बे बहा
और आदमी ही ख़ाक से बदतर है हो गया
काला भी आदमी है कि उल्टा है जूं तवा
गोरा भी आदमी है कि टुकड़ा सा चांद का

बदशक्ल, बदनुमा है सो है वो भी आदमी

एक आदमी है जिनके यह कुछ ज़र्क बर्क हैं
रूपे के उनके पांव हैं सोने के फ़र्क हैं
झुमके तमाम ग़ब से ले ताबा शर्क़ हैं
कमख़्वाब, ताश, शाल, दोशालों में ग़र्क हैं

और चीथड़ों लगा है सो है वो भी आदमी

एक ऐसे हैं कि जिनके बिछे हैं नए पलंग
फूलों की सेज उनपे झमकती है ताज़ा रंग
सोते हैं लिपटे छाती से माशूक शोख़ो संग
सौ सौ तरह से ऐश के करते हैं रंग ढंग

और ख़ाक में पड़ा है सो है वो भी आदमी

हैरान हूं यारो देखो तो क्या ये स्वांग है
और आदमी ही चोर है और आदमी थांग है
है छीना झपटी और कहीं मांग तांग है
देखा तो आदमी ही यहां मिस्ल-ए-रांग है

फ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमी

मरने पै आदमी ही कफ़न करते हैं तैयार
नहला धुला उठाते हैं कांधे पे कर सवार
कलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार ज़ार
सब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबार

और वो जो मर गया है सो है वो भी आदमी

अशराफ़ और कमीने से शाह ता वज़ीर
है आदमी ही साहिब-ए-इज़्ज़त भी और हकीर
यां आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर
अच्‍छा भी आदमी कहाता है ए 'नज़ीर'

और सबमें जो बुरा है सो है वो भी आदमी

अमन की आशा के नाम गुलज़ार की नज़्म


प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक टाइम्स ऑफ़ इण्डिया द्वारा भारत पाकिस्तान के बीच बन गई रिश्तों की खाई को पाटने के इरादे से अमन की आशा उन्वान से एक अभियान आहूत किया गया है . इसके तहत कई कल्चरल इवेंट्स आयोजित होंगे जिसमें सूफ़ी संगीत,संगोष्ठियाँ और कविता-शायरी के जल्से शामिल हैं. इसी हवाले से ख्यात शायर गुलज़ार का वक्तव्य भी अभी कल ही शाया हुआ और साथ में अमन की आशा के नाम एक छोटी लेकिन प्यारी सी नज़्म भी. ये नज़्म गुलज़ार में मौजूद एक प्यारे इंसान का पता भी देती है जिसे अपने परिवेश,पडौस और विरसे से बेइंतहा मुहब्बत है.
गुलज़ार साहब को सलाम !


आँखों को वीज़ा नहीं लगता
सपनो की सरहद होती नहीं
बन्द आँखों से रोज़ मैं सरहद पार
चला जाता हूँ मिलने मेहंदी हसन से

सुनता हूँ उनकी आवाज़ को चोट लगी है
और ग़ज़ल ख़ामोश है सामने बैठी हुई
काँप रहे हैं होंठ ग़ज़ल के
फिर भी उन आँखों का लहजा बदला नहीं...
जब कहते हैं
सूख गये फूल किताबों में
यार फ़राज़ भी बिछड़ गये हैं,
शायद मिले वो ख़्वाबों में !
बन्द आँखों से अकसर सरहद पार चला जाता हूँ मैं !

आँखों को वीज़ा नहीं लगता
सपनों की सरहद, कोई नहीं

यां आदमी ही पास है और आदमी ही दूर



कल आपने नज़ीर अकबराबादी की एक कविता पढ़ी थी. आज पढ़िये उनकी एक मशहूर कविता का पहला हिस्सा. विख्यात नाटककार स्वर्गीय हबीब तनवीर ने अपने कालजयी नाटक ’आगरा बाज़ार’ में इस कविता को छत्तीसगढ़ के लोकगायकों की आवाज़ों में इस्तेमाल किया था और भारतीय रंगमंच के लिए एक नई भाषा ईजाद की थी. भोपाल में १९५९ में स्थापित किए गए उनके ’नया थियेटर’ ग्रुप ने बाबा नज़ीर अकबराबादी की रचनाओं पर आधारित ’आगरा बाज़ार’ के मंचन के माध्यम से इस अज़ीमुश्शान शायर की रचनाओं को आम लोगों तक पहुंचाया. दरअसल बाबा का सारा काव्य उसी आम आदमी से मुख़ातिब है जो कई अपरिहार्य परिस्थितियों के चलते लगातार कविता से वंचित बनाया जाता रहा है. दोनों फ़कीरों को नमन.

आदमीनामा

दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी
ज़रदार बेनवा है सो है वो भी आदमी
नेमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी

टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी

अब्दाल, क़ुतुबी, ग़ौस, वली आदमी हुए
मुन्किर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरे
क्या-क्या करिश्मे, कश्फ़-ओ-करामात के किए
हत्ता कि अपने ज़ोर-ओ-रियाज़त के ज़ोर से

ख़ालिक से जा मिला है सो है वो भी आदमी

फ़िरओन ने किया था जो दावा ख़ुदाई का
शद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदा
नमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमला
यह बात है समझने की आगे कहूं मैं क्या

यां तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमी


यां आदमी ही नार है और आदमी ही नूर
यां आदमी ही पास है और आदमी ही दूर
कुल आदमी का हुस्न-ओ-क़बह में है यां ज़हूर
शैतां भी आदमी है जो करता है मक़्र-ओ-जूर

और हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमी

मसज़‍िद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्‍वाँ
पढ़ते हैं आदमी ही कुरआन और नमाज़ यां
और आदमी ही चुराते हैं उनकी जूतियाँ

जो उनको ताड़ता है सो है वो भी आदमी

यां आदमी पै जान को वारे है आदमी
और आदमी पै तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी को उतारे है आदमी
चिल्‍ला को पुकारे आदमी को है आदमी

और सुनके दौड़ता है सो है वो भी आदमी


नाचे है आदमी ही बजा तालियों को यार
और आदमी ही डाले है अपने इज़ार उतार
नंगा खड़ा उछलता है होकर जलील-ओ-ख़्वार
सब आदमी ही हंसते हैं देख उसको बार बार

और वो जो मसखरा है सो है वो भी आदमी

चलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो, ले के माल
और आदमी ही मारे है फांसी गले में डाल
यां आदमी ही सैद है और आदमी ही जाल
सच्चा ही आदमी ही निकलता है, मेरे लाल

और झूट का भरा है सो है वो भी आदमी

(जारी)

Saturday, January 16, 2010

तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा



कुछ दिन पहले मैंने नज़ीर अकबराबादी साहेब की ’रीछ का बच्चा’ इस ब्लॉग पर लगाई थी. इधर फिर कई दिनों से बाबा के संग्रह में डूबा हुआ हूं. आप भी उनकी इस बेहतरीन कविता ’फ़क़ीरों की सदा’ का लुत्फ़ उठाइये:

बटमार अजल का आ पहुँचा, टुक उसको देख डरो बाबा
अब अश्क बहाओ आँखों से और आहें सर्द भरो बाबा
दिल, हाथ उठा इस जीने से, ले बस मन मार, मरो बाबा
जब बाप की ख़ातिर रोए थे, अब अपनी ख़ातिर रो बाबा

तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा

ये अस्प बहुत उछला-कूदा अब कोड़ा मारो, ज़ेर करो
जब माल इकट्ठा करते थे, अब तन का अपने ढेर करो
गढ़ टूटा, लशकर भाग चुका, अब म्यान में तुम शमशेर करो
तुम साफ़ लड़ाई हार चुके, अब भागने में मत देर करो

तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा


यह उम्र जिसे तुम समझे हो, यह हरदम तन को चुनती है
जिस लकड़ी के बल बैठे हो, दिन-रात यह लकड़ी घुनती है
तुम गठरी बांधो कपड़े की, और देख अजल सर धुनती है
अब मौत कफ़न के कपड़े का याँ ताना-बाना बुनती है

तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा

घर बार, रुपए और पैसे में मत दिल को तुम ख़ुरसन्द करो
या गोर बनाओ जंगल में, या जमुना पर आनन्द करो
मौत आन लताड़ेगी आख़िर कुछ मक्र करो, कुछ फ़न्द करो
बस ख़ूब तमाशा देख चुके, अब आँखें अपनी बन्द करो

तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा

व्यापार तो याँ का बहुत किया, अब वहाँ का भी कुछ सौदा लो
जो खेप उधर को चढ़ती है, उस खेप को याँ से लदवा लो
उस राह में जो कुछ खाते हैं, उस खाने को भी मंगवा लो
सब साथी मंज़िल पर पहुँचे, अब तुम भी अपना रस्ता लो

तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा

कुछ देर नहीं अब चलने में, क्या आज चलो या कल निकलो
कुछ कपड़ा-लत्ता लेना हो, सो जल्दी बांध संभल निकलो
अब शाम नहीं, अब सुब्‌ह हुई जूँ मोम पिघल कर ढल निकलो
क्यों नाहक धूप चढ़ाते हो, बस ठंडे-ठंडे चल निकलो

तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा

Thursday, January 14, 2010

साल २०१०: हिंसा के विरुद्ध जनता और बुद्धिजीवियों की व्यापक एकजुटता हो- आलोक धन्वा


मौजूदा श्रृंखला में अब तक ज्यादातर साहित्यकारों ने अपनी राय संक्षिप्त रूप में दी है लेकिन आज जब हिन्दी के वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा से बात हुई तो उन्होंने हमें वस्तुस्थिति को विस्तार में समझाना उचित समझा. सो आज सिर्फ और सिर्फ आलोक धन्वा-- विजयशंकर

मैं यह चाहता हूँ कि राष्ट्र की जो धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतें हैं वे साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट हों. जितने भी वामपंथी संगठन हैं उनको भी इस मोर्चे में शामिल होना चाहिए. उन्हंं आपसी मतभेद स्थगित करके अपना एक व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाना चाहिए क्योंकि राष्ट्र के सामने साम्प्रदायिक ताकतें आतंकवाद और दूसरी कई शक्लों में हमारी राष्ट्रीय एकता को तहस-नहस कर रही हैं. हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता, हमारी धर्मंनिरपेक्ष साझा-संस्कृति और हमारी लोकतांत्रिक उपलब्धियां ; आज सब भयावह चुनौतियों और ख़तरों से घिरी हैं. भारत को फिर से साम्राज्यवाद का नया उपनिवेश बनाने की साजिश रची जा रही है.


राजनीति और संस्कृति, दोनों क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने नए बाज़ार तैयार कर रही हैं...अब भारत का पूंजीपति वर्ग भी उस राष्ट्रीय चरित्र से वंचित हो रहा है जो भारत के स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी के नेतृत्व में उसने हासिल किया था. हमारा भारतीय समाज बाहर के हमलों की अपेक्षा अन्दर के हमलों से बहुत ज्यादा टूट रहा है. अलगाववाद की सुनियोजित साजिशें हमारे संघीय स्वरूप के ताने-बाने को नष्ट कर रही हैं.

हमारा सांस्कृतिक परिदृश्य भी संतोषजनक नहीं है. इस क्षेत्र में भी रचना विरोधी घात-प्रतिघात का माहौल विभिन्न माध्यमों के जरिये बनाया जा रहा है. हमारी जो प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाएं हैं उनमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हस्तक्षेप शुरू हो चुका है. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण साहित्य अकादमी के भीतर घुसपैठ करके सैमसंग कंपनी के द्वारा 'रवीन्द्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' दिए जाने की घोषणा है.

इस सबके बावजूद जनता के सुख-दुःख के लिए सार्थक लेखन करने वाले साहित्यकारों की भी हमारे देश में कमी नहीं है. यह देखना सुखद है कि भारत के बेहद संकटपूर्ण माहौल में बहुमत जनता अपनी स्वाभाविक मानवीय सृजन-शक्ति के साथ सक्रिय है. नए वर्ष के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं, साथ ही मैं यह चाहता हूँ कि आधुनिक भारत का जो गौरवशाली और संघर्षमय अतीत रहा है, हम उससे हमेशा प्रेरित होते रहें.

बीसवीं सदी एक महान सदी थी. देश और विदेश दोनों जगहों पर आज़ादी की बड़ी लड़ाइयां लड़ी गयीं. कई देशों ने उपनिवेशवाद से मुक्ति हासिल की जिनमें भारत भी शामिल है. फ़ासीवादी विरोधी युद्ध में विश्व भर की शांतिप्रिय और लोकतांत्रिक ताकतों ने मानवीय उत्कर्ष के नए महाकाव्य रचे.


बीसवीं सदी में एक ऐसी घटना घटी जो मानव इतिहास में कभी नहीं घटी थी. रूस में पहली बार मजदूरों और किसानों ने अपनी सत्ता कायम की जिसका प्रभाव पूरी दुनिया के लोकतंत्र पर पड़ा. बीसवीं सदी वैज्ञानिक विचारधाराओं की सदी थी. यह वही सदी थी जिसमें एक ओर लेनिन काम कर रहे थे तो दूसरी ओर महात्मा गांधी भी सक्रिय थे...एक ओर वर्टरैंड रसेल जैसे बड़े मानवतावादी दार्शनिक थे वहीं मैक्जिम गोर्की जैसे मजदूरों के बीच से आनेवाले लेखक थे. यह सदी नाज़िम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, बर्तोल्त ब्रेख्त की सदी थी...साथ ही वह हमारे स्वाधीन भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक नेता प्रेमचंद और महाकवि निराला की भी सदी थी. हमारे स्वाधीन भारत की जो ज्ञान-संपदा है उसे जितना भारतीय बुद्धिजीवियों ने समृद्ध किया उतना ही विश्व के दूसरे बुद्धिजीवियों ने भी समृद्ध किया.


ज्ञान एक विश्वजनीन प्रक्रिया है, उसमें देशी-विदेशी का विभाजन छद्म है. अल्बेयर कामू, फ्रेंज़ काफ़्का और ज्यां पॉल सार्त्र जैसे बड़े लेखकों ने पूंजीवादी चिंतन प्रणाली को और उसकी सत्ता के तमाम अदृश्य यातना-गृहों को न सिर्फ उजागर किया बल्कि पूंजीवादी सत्ता को कटघरे में खड़ा करके उससे लगातार जिरह की. इससे लोकतंत्र के नए पाठ सामने आये.

बीसवीं सदी में हमारे देश में जहां राहुल सांकृत्यायन, रामचंद्र शुक्ल, फैज़ अहमद फैज़, फ़िराक गोरखपुरी, मक़दूम, रामविलास शर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, नामवर सिंह जैसे बड़े साहित्य चिन्तक सक्रिय थे वहीं बांग्ला में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र, काज़ी नज़रुल इस्लाम, विभूतिभूषण बन्दोपाध्याय, माणिक बंदोपाध्याय, जीवनानंद दास, सुभाष मुखोपाध्याय, सुकांत भट्टाचार्य जैसी विभूतियाँ सक्रिय थीं. इसी तरह पश्चिम और दक्षिण भारत में भी बड़े चिन्तक जनता के बीच काम कर रहे थे.

यहाँ नाम गिनाना मेरा उद्देश्य नहीं है बल्कि दरअसल मैं बीसवीं सदी के उस महान कारवां की मात्र कुछ झांकियां प्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि आज हमारे बीच देश और विदेश दोनों जगहों पर ऐसे बुद्धिजीवी मंच पर सामने आ रहे हैं जो फिर से मध्ययुग के अर्द्धबर्बर समाज को कायम करना चाहते हैं. बाबरी मस्जिद के ध्वंस और गुजरात का भयावह नरसंहार, कश्मीर और पंजाब में हजारों निर्दोष लोकतांत्रिक नागरिकों का क़त्लेआम, ईराक़ और अफगानिस्तान पर निरंतर हमले...ये सारी घटनाएँ उसी मध्ययुगीन अर्द्धबर्बर सोच को सामने रखती हैं. यह एक ऐसा भयानक समय है जहां ज्ञान से पलायन की प्रवृत्ति बढ़ रही है.

ओसामा बिन लादेन और हमारे हिन्दू तालिबान लालकृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया, आरएसएस के मोहन भागवत, इनके बीच कोई बुनियादी फर्क़ नहीं है. ये न हिन्दू हैं न मुसलमान, बल्कि ये उसी मध्ययुगीन अर्द्धबर्बर सोच के कारिंदे हैं.

कोसी की बाढ़ से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए जब मेधा पाटकर पटना आयीं तो एक पत्रकार वार्ता में पिछले वर्ष मैंने कहा कि जिसको प्राकृतिक आपदा कहते हैं दरअसल वह मानव-निर्मित आपदा है और पर्यावरण का मुद्दा भी लोकतंत्र का ही मुद्दा है. जो ताकतें नैसर्गिक सुषमा और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रही हैं वही ताकतें प्रेमचंद के देश में हज़ारों किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही हैं.

आज शिक्षण संस्थाओं में भी एक ऐसी प्रतियोगिता जारी है जहां हमारे प्रतिभाशाली नौजवानों में लगातार भय, आत्महीनता और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. हमारी शिक्षा-प्रणाली का उद्देश्य एक ज्यादा मानवीय और संवेदनशील मानव समाज बनाना नहीं बल्कि नए बाज़ार के लिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा मुहैया कराना हो गया है. तो क्या २१ वीं सदी की शुरुआत आत्महत्याओं की सदी की शुरुआत है?

मैंने मेधा पाटकर से यह बात भी कही थी कि पर्यावरण के मुद्दे को पूरे समाज के दूसरे मुद्दों से जोड़कर देखा जाना चाहिए जो कि वैज्ञानिक सोच का एक नैतिक आधार है. जो आज हमारे जंगलों को काट रहा है वही आदिवासियों को भी ख़त्म करना चाह रहा है. शत्रुता, भय और हिंसा से आक्रान्त ऐसा सामाजिक परिदृश्य आधुनिक मानव सभ्यता में जल्दी दिखाई नहीं देता जहां सत्य और न्याय के लिए प्रतिरोध करनेवाली ताक़तें भी विसर्जन का शिकार होती जा रही हैं.

चूंकि मैं एक कवि हूँ इसलिए मैं अपने कवि भाइयों से, साथियों से यह विनम्र आग्रह करना चाहता हूँ कि हमारे बीच जो विरासत आचार्य शिवपूजन सहाय, यशपाल, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, रांगेय राघव, परसाई, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, रेणु, धूमिल, श्रीलाल शुक्ल,राजकमल चौधरी,विजयदान देथा, अमरकांत, मोहन राकेश, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह,मलय, सोमदत्त, ज्ञानरंजन, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, ऋतुराज, विजेंद्र, कुमार विकल, नरेश सक्सेना, देवताले जैसे कई बड़े साहित्यकारों ने हमें सौंपी है, हम उसे कैसे आगे बढ़ायें...उसके प्रति अपना दायित्व-बोध कैसे निभाएं.

हमारे साथ भी जो लोग लिख रहे हैं वे कम प्रतिभाशाली नहीं हैं. अब हमारे बाद दो पीढ़ियाँ आ चुकी है कवियों की...उनसे भी मैं बेहद प्रभावित हूँ.

इस नए वर्ष में मेरी अपेक्षा यह रहेगी कि हम न्याय के पक्ष में ज्यादा से ज्यादा काम करें...हर तरह की हिंसा के विरुद्ध सार्थक संवाद शुरू करें...लोकतंत्र और समाजवाद की बेहद जटिल चुनौतियों से जूझने की, सृजन करने की दिशा में सक्रिय हों.

मुझे याद आता है कि २००७ में जब हम लोगों ने पटना में शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जन्म शताब्दी के लिए समारोह समिति तैयार की उस मोर्चे में ४० से ज्यादा धर्मंनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक जन-संगठन शामिल थे. जब हमने शुरुआत की तो हमें यह पता नहीं था कि भगत सिंह जन्म शताब्दी के समारोहों में वर्ष भर तक जनता की इतनी व्यापक हिस्सेदारी होगी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खान, रामप्रसाद बिस्मिल, जैसे हमारे महान शहीद देश भक्तों की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती चली गयी. मेरे लिए यह एक ऐसा अनुभव था जिससे मैं बेहद अभिभूत हुआ. यह भारतीय समाज के जीवंत और कृतज्ञ होने का एक उज्जवल उदाहरण था.

इन समारोहों ने यह जाहिर किया कि स्वाधीनता की चेतना को ख़त्म नहीं किया जा सकता. मनुष्य स्वाधीनता के पथ पर अपने सतत संघर्ष से जितनी यात्रा कर चुका है वहां से वह पीछे नहीं जाएगा. वह आगे ही जाएगा.धन्यवाद!

Wednesday, January 13, 2010

घमुलि दीदी यथ-यथ आ यानी सर्दियों के लिए बच्चों के वास्ते एक कोरस



आजकल कड़ाके की सर्दी पड़ रही है समूचे उत्तर भारत में. जाहिर है आमतौर पर बातचीत में और टेलीफ़ोन पर भी लगातार सर्दी के इस रूप को लेकर भी सभी से बातें हो रही हैं.

अभी एकाध दिन पहले पिथौरागढ़ ज़िले के गणाई गंगोली के छोटे से गांव रैंतोली में अपने बचपन की सर्दियां याद करते हुए ’दावानल’ नामक प्रसिद्ध उपन्यास के रचयिता और ’हिन्दुस्तान’ अख़बार के उत्तर प्रदेश संस्करणों के सम्पादक श्री नवीन जोशी ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया.

जाड़ों में पहाड़ों में सदा ही अच्छी ख़ासी ठण्ड पड़ती है. स्कूलों की छुट्टियां होती हैं और बच्चे खेलने बाहर भी नहीं जा सकते. ऐसे मौसम में नहाने की बात सोचने से बड़ों की भी घिग्घी बंध जाती है, बच्चों की तो बात ही क्या. तो बच्चे कई कई दिनों तक नहाने से बचे रहते हैं.

ऐसा ही नवीन दा के बचपन में भी होता था. कई दिनों तक न नहाए बाखली के सारे आठ-दस बच्चों को एकबट्याया जाता था और ख़ूब सारा पानी गर्म करने के बाद सामूहिक जबरिया स्नान से उन्हें साफ़ बनाया जाता था. यह काम किसी भी बच्चे की मां या बड़ी बहन या मौसी आदि करते थे.

बाहर धूप आमतौर पर गा़यब रहा करती थी और आसमान में बादल लगे होते थे. इन सद्यःस्नात बच्चों को और भी ठण्ड लगती थी. इस के लिए उन्होंने एक शानदार तकनीक ईजाद की थी. वे उछलते हुए मिलकर एक कोरस गाया करते थे जो सर्दी भगाने का गारन्टीड तरीका हुआ करता था:

"घमुलि दीदी यथ-यथ आ
बादल भीना पर-पर जा "


धूप माने घाम को दीदी कह कर अपने पास आने का अग्रह किया जाता था जबकि बादल को भिना यानी जीजा के नाम से सम्बोधित कर दूर दूर रहने को कहा जाता था.

क्या बात है नवीन दा!

नवीन दा से सम्बन्धित बाकी पोस्ट्स के लिंक ये रहे:

प्रेमपत्रों के परिवार की ज़रूरतों के मांगपत्रों में बदल जाने की नियति
दुःख में जो-जो मुंह से निकला सब लिख देना दुआ क्या
अघिल सीटा चान-चकोरा, पिछाड़ सीटा जोशि

करम कर दीजै


उस्ताद राशिद खान की मख़मल आवाज़ में सुनिये राग देस में तराना

Tuesday, January 12, 2010

आज कुमार गंधर्व की 18वीं बरसी है !



इन्दौर के प्रमुख दैनिक नईदुनिया में आज कुमार जी को उनकी 18वीं बरसी पर याद किया है जिसे क़लमबध्द किया है जीवनसिंह ठाकुर ने. लिखने पढ़ने वालों की बिरादरी में जीवनसिंह जी का नाम अपरिचित नहीं है. वे कुमारजी की कर्मस्थली देवास में ही रहते हैं और कुमारजी के निवास भानुकुल से बरसों से जुड़े है. मुझे लगा कि कुमारजी के मुरीदों तक यह शब्द-चित्र पहुँचना ही चाहिये इसलिये इसे जारी कर रहा हूँ.


मुझे ठंड की शाम और रात सदा से ही अच्छी लगती है। सूनी सड़कों पर घूमना बहुत ही सुकून भरा अहसास होता है। मौसम के ये अवसर मैंने कभी नहीं छोड़े और कभी छूट भी गए तो अफ़सोस का साया इतना घना होता है कि आने वाली रात के इंतज़ार में दॉंत कटकटाने लगते हैं। 11 जनवरी को भी उसी सर्द रात में घूम कर लौटा थाऔर 12 जनवरी की सुबह बेहद सर्द और बर्फ़बारी के साथ लौटी थी। 12 जनवरी 1992 की सुबह पंडित कुमार गंधर्व प्रभाती में या भैरवी के अंत में - प्रभाती की शुरूआत की बेला में एक स्थाई गुनगुनाहट देकर कहीं दूर चले गए थे। जहॉं से उन्हें कोई राग, कोई अलाप, कोई पुकार वापस नहीं ला सकती थी।

पूरे अठ्ठारह बरस हो गए हैं कुमार गंधर्व हमारे बीच नहीं हैं। हालॉंकि उस दिन भी जब उनके पार्थिव शरीर को कंधों पर लिए भारी मन-मस्तिष्क से ले जा रहे थे ऐसा लगा नहीं था कि यह अंतिम यात्रा है। हमें इसे सिर्फ़ यात्रा ही रहने देना चाहते थे। उस दिन अंतिम शब्द को अपने पास फटकने भी नहीं देना चाहते थे। लेकिन चाहने न चाहने के बीच कुदरत अपने नियम का पालन कर रही थी। हम सभी निहत्थे उस नियम को अपने तरीके से काम करते देख रहे थे। वापस लौटे तो भानुकूल के सन्नाटे में शांति तो थी लेकिन रिक्तता नहीं थी। जिस सच्चाई से हम रूबरू हुए थे वह सच्चाई भानुकूल के बाहर कहीं रह गई थी। ऐसा लगा कुमारजी वहीं कहीं है। वही झूला हल्का सा कंपकपाता हुआ। जैसे कुमारजी बस अभी-अभी उठ कर अंदर गए हों या बस आने ही वाले हों ... आज अठ्ठारह बरस गुजर चुके हैं, लेकिन भानुकूल में कभी लगा ही नहीं कि कुमारजी नहीं हैं। वही जीवंतता, वही उपस्थिति का अहसास, वही बालसुलभ भोली निर्दोष आवाज़ ... जैसे दूर से घुँघरुओं की रुनझुन-रुनझुन की तरह सुनाई देती है। कुमारजी कहीं गए नहीं वे इन्हीं हवाओं में इन्हीं शब्दों में उल्हास और उदासियों में ठहाकों और मुस्कुराहटों में हैं। इंसान चला जाता है कुछ घंटों में, कुछ दिन में उसे भुला दिया जाता है। या व़क़्त की गहरी धूल में दब जाता है। लेकिन कुमार गंधर्व यानी बाबा इन अठ्ठारह बरसों में लोगों में निरंतर जिज्ञासा बने रहे। कुमारजी जैसे काल पर विजय प्राप्त करके कालजयी हो गए हों। आज भी 12 जनवरी 2010 है, अठ्ठारह बरस का लम्बा फ़ासला है। हम जब भी भानुकूल गए झूला कभी खाली नहीं लगा। बहन कलापिनी (कुमारजी की बेटी) अंदर से आकर चाय का कप थमाती हैं तो भाई भुवनेश (कुमारजी का सुपौत्र) पानी का गिलास... फिर लगता है जैसे कोई भोली-सी आवाज़ में कह गया- बैठिये। मैं चौंक कर झूले की तरफ़ देखता हूँ, फिर अंदर उनके कमरे में जहॉं बिस्तर पर कुछ फूल पड़े हैं। ताई वसुंधरा (कुमारजी की जीवन और संगीत सहचरी) स्नेहिल हमारा हालचाल पूछती हैं। जो गया उसकी पीड़ा सालती तो है, लेकिन पीड़ा और पीड़ा के अहसास की क्यारियों में आँसुओं के नम, कोमल फूल खिले हैं। उन पर यादों की तितलियॉं बैठती है। कुछ गंध हवाओं में फैली हैऔर एक स्मृति का आँचल आसपास ममतालु लिपट जाता है कुमारजी यहीं हैं...यहीं है...।

(सुनिये कुमार जी की ये दो कालजयी रचनाएं:)

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो:



निरभय निरगुन गुण रे गाऊंगा:

साल २०१०: जब रचना न हो पा रही हो तब अनुवाद हो- डंगवाल

साहित्यकारों की राय वाली पिछली कड़ी में साथी कवि निलय उपाध्याय की बात पढ़कर हमारे प्रिय गौतम राजरिशी हिल उठे हैं. उन्होंने लिखा है- 'निलय जी के शब्दों ने झकझोर दिया है जैसे पूरे वजूद को...एक सकते की सी हालत में हूँ.' वहीं भाई अमिताभ श्रीवास्तव कहते हैं - 'इन चीज़ों को कबाड़ तो नहीं कहा जा सकता...बेहतरीन!'
हमारा कहना है कि हर चीज़ की किस्मत में कबाड़ होना लिखा है और हर कबाड़ बेकार नहीं होता... और आज की कड़ी में भी साहित्यकारों की राय को हम कबाड़ नहीं, हीरा समझ कर प्रस्तुत कर रहे हैं:)-

वीरेन डंगवाल (वरिष्ठ कवि):

हालिया वर्षों में हमारा महादेश कई सारे आशातीत परिवर्तनों से रूबरू हुआ है. कुछ तब्दीलियों को समाज ने अच्छे से आत्मसात कर पाने में सफलता प्राप्त की है. मिसाल के तौर पर सूचना क्रान्ति ने समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव डाला है उसके सारे धनात्मक परिणामों ने अभी अपने आप को पूरी तरह प्रकट करना बाकी है. सभी धरातलों पर मूल्य बदल रहे हैं और मुझे लगता है कि आने वाले साल में यह क्रम और भी तेज़ी से चलता ही रहना है. मैं चाहता हूं कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों में ह्रासोन्मुखता कम हो क्योंकि प्रत्यक्षतः सामाजिक और नैतिक मूल्य ही बाक़ी सारी चीज़ों को तय करते हैं.

साहित्य के क्षेत्र में; खासतौर पर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में हमारे रचनाकारों को अधिक कर्मठ होने की ज़रूरत है. हमारे यहां 'बातें ज़्यादा और काम कम’ पर अधिक तवज्जो दी जाती रही है. फ़िज़ूल के सम्मेलन, पुरस्कार, विमोचन, गुटबाज़ी के चलते हिन्दी का जो नुकसान हुआ है, उसकी थोड़ी बहुत ही सही, भरपाई कर पाने के लिए कर्मठता सबसे ज़रूरी गुण है. जब रचना न हो पा रही तो अनुवाद किया जाना चाहिये. अनुवाद के मामले में हिन्दी अन्य तमाम भाषाओं से बेहद पिछड़ी हुई है. स्तरीय अनुवादों की भीषण कमी है. जब तक साहित्यकार स्वयं अनुवाद नहीं करते, स्थिति जस की तस बनी रहनी है. इसके अलावा हिन्दी के हर साहित्यकार को कम्प्यूटर का न्यूनतम ज्ञान प्राप्त करने का जतन करना चाहिये. समय के साथ बने रहने के लिये यह एक ज़रूरी औज़ार है. हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में जैसा क्रान्तिकारी कार्य हुआ है, उसे एक मिसाल के तौर पर देखे जाने की ज़रूरत है.


प्रत्यक्षा सिन्हा (कथाकार, कहानी-संग्रह 'जंगल का जादू तिल तिल'):

मानवीय गुण अमानवीय गुणों पर भारी पड़ें, सँभावनायें हर क्षेत्र में बनी रहें, सपने देखने का भोलापन बरकरार रहे.

सामाजिक राजनीतिक स्तर में प्रतिबद्धता और उत्तरदायित्व बढ़े, सांस्कृतिक स्तर पर कुछ तोड़फोड़ की उम्मीद रखती हूँ, बने बनाये खाँचों के बाहर, अनदेखे रास्तों पर चलने का दीवानापन दिखे- ऐसी आकांक्षा है.

साहित्यजगत से बहुत भोली उम्मीदें हैं... मन की बेचैनियों का ईमानदार प्रतिवर्तन हो, कुछ अपनी अंतरतम दुनिया में मगन, एक्सर्टर्नल्स की परवाह किये बगैर अपनी रचनात्मकता में धूनी रमायें लोगों का कुनबा हो, अच्छा गंभीर सार्थक लेखन हो, कुछ बच्चे सा भोला उत्साह इन सब को स्फूर्ति देता रहे...बस इतना, इतना ही...


हरेप्रकाश उपाध्याय (कवि, प्रथम कविता संग्रह 'खिलाड़ी दोस्त और अन्य कवितायें'):

मेरी वर्ष २०१० से पहली उम्मीद तो यही है कि लोग २००९ से सबक लेंगे.

कोई राठौर किसी रुचिका पर हाथ डालने से पहले कम से कम १० बार सोचेगा. कोई नारायण दत्त राजभवन की मर्यादा के बारे में ज्यादा संवेदनशील रहेगा. यानी सत्ता के जोश में लोग होश नहीं खोएंगे आदि, इत्यादि...

बाकी एकदम से तो यह नहीं लगता कि सचमुच का कोई बदलाव एकायक आ जाएगा नए साल में. अदालतें थोड़ी सुस्ती कम करें और बिजली गाँवों में चली जाए...लोग देश में निर्भय होकर कहीं भी आयें-जाएँ...यह सब हो तो कितना अच्छा, पर हो पायेगा क्या?

साहित्य जगत में यह हो कि सम्पादक लोगों का यह भरम टूटे कि साहित्य उनका हरम है...कोई सम्पादक किसी लेखक को अपमानित नहीं करे... नामवर लोग झूठ नहीं बोलें और लोगों का भरोसा बना रहने दें साहित्य पर. चौकी और चौके के जो अलग-अलग मानक हैं वे मिट जाएँ...सुधीशों की बकवास से मुक्ति मिले हिन्दी साहित्य को.

इस साल लेखकों को लिखने के लिए पुरस्कार थोड़ा कम मिलें...थोड़ी सजा मिले ताकि प्रसंग का धुंधलका साफ हो सके.

ज़ख्मों को अब गिनूंगा मैं बिस्तर पे लेट के



उर्दू के बड़े शायर शिकेब जलाली की एक ग़ज़ल से कुछ अशआर पेश हैं:

जाती है धूप उजले परों को समेट के
ज़ख्मों को अब गिनूंगा मैं बिस्तर पे लेट के

मैं हाथ की लकीरें मिटाने पे हूँ बज़िद
गो जानता हूँ नक्श नहीं ये सिलेट के

दुनिया को कुछ ख़बर नहीं क्या हादसा हुआ
फेंका था उसने संग गुलों में लपेट के

फव्वारे की तरह न उगल दे हरेक बात
कम-कम वो बोलते हैं जो गहरे हैं पेट के

Monday, January 11, 2010

साल २०१०: साहित्यकारों से मोहभंग हो चुका- निलय

इस श्रृंखला की पिछली पोस्ट का शीर्षक पढ़कर हमारे प्रिय भाई एक जिद्दी धुन (धीरेश सैनी) ने टिप्पणी की है- 'इसका शीर्षक सही है लेकिन युवा ज़रा चिढ़ जाते हैं ऐसा कहने से. इसमें यह भी जोड़ दिया जाए कि वरिष्ठ भी इधर जाने किस-किस मठ, प्रतिष्ठान में नतमस्तक होते घूम रहे हैं.'

हमारा निवेदन यह है कि इस रायशुमारी में हम अपनी तरफ से कुछ जोड़ने-घटाने की तमन्ना नहीं रखते. यह तो आप जैसे समझदार और विचारशील पाठकों पर छोड़ दिया गया है. साहित्यकारों ने जो कहा वह यहाँ अक्षरशः छापा जा रहा है; जैसे कि आज की यह कड़ी-

निलय उपाध्याय (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'कटौती’): इन दिनों मैं बहुत निजी किस्म का जीवन जी रहा हूँ. मेरा कोई सामाजिक जीवन नहीं है. अभी जिन संकटों के दौर से गुज़र रहा हूँ उसमें सार्वजनिक जीवन के लिए कोई जगह नहीं है. पिछला साल जो बीता है उससे मेरी यही अपेक्षा थी कि मेरे परिवार को दो जून का भोजन मिलता रहे. मेरे बच्चों की पढ़ाई चलती रहे...और २००९ में यह पूरा हुआ. आने वाले साल में मैं यह चाहता हूँ कि इन जिम्मेदारियों से अलग होने का वक्त मिले, जिसमें मैं अपने मन के भीतर बसी दुनिया के बारे में लोगों को बता सकूं...कुछ कवितायें लिख सकूं... और जो विकास-क्रम अथवा परिवर्त्तन मेरे भीतर आया है, उसको बता सकूं.

साहित्यकारों से मेरा मोहभंग हो चुका है. अपने अपहरण काण्ड में फंसने की घटना की असलियत मैं अच्छी तरह से जान चुका हूँ. मैं अस्पताल में कंपाउंडर था और वेतन का आधा खर्च पत्र-पत्रिकाएं खरीदने...सदस्य बनने और साहित्यिक यात्राओं में ख़र्च करता था. किन्तु एक मुसीबत आने के बाद जिस तरह प्रेम कुमार मणि से लेकर राजेन्द्र यादव तक ने मुझे सवर्ण करार दे दिया, उससे मेरे दिल को बहुत गहरा धक्का पहुंचा. मुझे पहली बार ये अहसास हुआ कि ये लोग रचनाकार भले ही बहुत अच्छे हों, आदमी बुरे हैं. मैं कवि-लेखक बनकर न रहूँ तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन हिन्दी साहित्य के इन ढपोरशंखियों से अगले साल क्या, पूरी उम्र कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहता. ये लोग साहित्य के पाँव में मोजे की तरह महक रहे हैं और उनके बारे में सोचने पर इनकी ये गंध ज्यादा परेशान करती है. यही लोग हैं जो जनता और साहित्य के बीच बैठकर एक दूरी पैदा कर रहे हैं.

अगले साल मैं जो भी करना चाहता हूँ वह मेरी पारिवारिक परिस्थिति पर निर्भर करेगा. मैं बिहार सरकार की नौकरी से निकाल दिया गया था... और ४५ साल की उम्र में किसी नई जगह, किसी नई विधा में जड़ें जमाना आसान नहीं होता. पहले मैं बिहार के एक गाँव का निवासी था लेकिन मुझे अगर वक्त मिला तो अब मैं जिस जगह पर हूँ...पूरे देश के गाँवों से आए लोग यहाँ हैं...मैं उनकी पीड़ा, उनकी यातना और उनके जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करूंगा...और अपनी कविताओं में यह बताऊंगा कि चाय पीते वक्त उनकी चीनी क्यों कम पड़ जाती है और दाल खाते वक्त नमक.


शिरीष कुमार मौर्य (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'पृथ्वी पर एक जगह'):

सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर तब्दीलियों को लेकर मैं किंचित हताश हूँ. देखना बहुत कुछ चाहता हूँ. एक कवि-नागरिक होने के नाते चाहता हूँ कि नए साल में चीज़ों में सुधार आये. समाज कुछ और मानवीय बने, राजनीति कुछ विचारपरक हो, बाज़ारवाद का छद्म कुछ और उजागर हो, दृष्टिकोण- ख़ास तौर पर स्त्रियों और दलितों के प्रति सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में वांछित बदलाव आये. रही सुकून की बात तो आम आदमी को आज सुकून से ज़्यादा अपने जीवन में घट रही घटनाओं के प्रति जागरूकता और एक गहरी बेचैनी की ज़रुरत ज़्यादा है- सुकून की मंज़िल फ़िलहाल एक स्वप्न है.

साहित्य जगत से मैं महज एक ऐसी अर्थवान आलोचना की उम्मीद करूंगा जो तथाकथित बड़े आलोचकों के घिसे-पिटे पुराने मूल्यों से परे हो और किसी को कुछ बना देने या उसे मिटा देने के थोथे अहंकार से मुक्त भी. कविगण (ख़ासकर युवा कवि) भी हिंदी के इन चाँद-तारों की छाया से बाहर आकर रचनात्मक ऊर्जा के अपने भीतर के सूर्य को पहचानें. हिंदी पट्टी के पाठकों के प्रति उनका खोया विश्वास दुबारा जागे.

गीत चतुर्वेदी (कवि-कथाकार-पत्रकार):

१. इंडिया और भारत का तथाकथित भेद मिट जाए/कम हो जाए.





२. कुछ अच्छी किताबें.


चंद्रभूषण (कवि-पत्रकार, कविता-संग्रह 'इतनी रात गए'): इस साल मैं चाहूंगा कि बहुत सारे उद्योगों में जो छंटनी हो रही है और जो उद्योग मंदी का शिकार हैं, वहां दोबारा काम शुरू किया जाए. वहां लोगों के अधिकार सुरक्षित हों. मंहगाई से सबको राहत मिले.

साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में स्वाभाविक इच्छा है कि अच्छी रचनाएँ आयें. आम लोगों से, मेहनतकश लोगों से जो दूर जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है वह घटे. कामना यह भी है कि दिल्ली में जो राष्ट्रकुल खेल होने जा रहे हैं वे अच्छी तरह से संपन्न हों और देश की साख को कोई बट्टा न लगे.








सुन्दर चंद ठाकुर (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'एक दुनिया है असंख्य'): पहली बात तो यह है कि २००८ का अंतिम हिस्सा और लगभग पूरा २००९ मंदी की मार से आक्रान्त रहा. हज़ारों नौजवान सड़क पर आ गए, इनमें कई पत्रकार भी शामिल थे. नए लड़कों को नौकरियाँ नहीं मिलीं. उम्मीद है कि २०१० में ये स्थितियां पलट जायेंगी.

साल २०१० में मैं जिस तरह का बदलाव देखना चाहूंगा उसे यूटोपिया कह सकते हैं. लेकिन मन में बहुत बड़ा संशय है कि वह अगले साल तो क्या आनेवाले कई सालों में या इस देश में या पृथ्वी पर जीवन के रहते घटित हो पायेगा अथवा नहीं. दुर्योग से देश को चलाने के लिए जरूरी सारी ताक़त और धन राजनीति के हाथों में केन्द्रित हो गया है. ऐसे में अगर राजनीतिज्ञ समाज की जरूरतों को समझ पायें, नेतागण अपने नागरिक होने के कर्तव्यों को निभा पायें...तो संभवतः वे पिछड़े तबकों और जरूरतमंदों का लिहाज करेंगे और उन्हें सौंपी गयी ताक़त के जरिये नौकरशाहों को मजबूर करेंगे कि विकास का पैसा विकास के लिए ही इस्तेमाल हो.

हिन्दी साहित्य से मुझे सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि वह हकीक़त को समझेगा और परम्पराओं में ढोई जाती रही नैतिकताओं और थोथे आदर्शों से बाहर निकलेगा. हिन्दी कविता में दुर्भाग्य से उन विषयों पर नहीं लिखा जा रहा जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन और रिश्तों को प्रभावित करते हैं. आधुनिक जीवन की त्रासदियों को व्यक्त कर पाने वाले औजार वहां से नदारद दिखते हैं. आनेवाले वर्ष में अगर ऐसा हो पाए तो हिन्दी कविता विश्वमंच पर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज़ करेगी और कम से कम वह अपने ही समाज में अलोकप्रिय नहीं रहेगी.


सिद्धेश्वर सिंह (कवि, समीक्षक, अनुवादक, ब्लॉगर): कैलेन्डर बदलने से उम्मीदें नहीं बदलतीं. बड़ी उम्मीदें बड़ी जगह, समय के बड़े हिस्से, बड़ी और लगातार कोशिशों तथा बड़े विचार से ही पूरी होती हैं. यह समय छोटी चीजों का है. हमारे गिर्द 'लघु-लघु लोल लहरें' उठती हैं और उनकी फेनिल आभा हमें समन्दर में गहरे उतरने से रोकती है, बहकाती है, बरजती है. फिर भी साहित्य की दुनिया में हाथ-पाँव मारते हुए यह यकीन कायम है कि शब्द में दम है और उम्मीद पर जहाँ कायम है.

हम सब जिस दुनिया और भूगोल के जिस हिस्से में रह रहे हैं वहाँ रोजमर्रा की परेशानियों का रोजनामचा नई-नई इंदराजों से भरता रहता है. इस समय खाने-पीने की चीजों के दाम जिस तरीके से बढ़ रहे हैं उससे हर स्तर के इंसान की रचनात्मकता/उत्पादकता या उसके आस्वादन/उपभोग का दायरा संकुचित, शिथिल व विकृत हुआ है. इसका असर कार्यक्षमता, कार्यप्रणाली और क्रियात्मकता पर भी पड़ा है.

छोटे-छोटे कस्बों में लगने वाले पुस्तक मेलों से उम्मीद बढ़ी है क्योंकि इनसे अच्छॆ साहित्य के वितरण का प्रक्षेत्र बढ़ा है फिर भी साहित्य सृजन, पुस्तक प्रकाशन और सही पाठक के बीच के पुल को सुगम, चौड़ा और सीधा बनाने की सख्त जरूरत है. नए रचनाकारों के समक्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने का संकट अवश्य कम हुआ है क्योंकि खूब पत्रिकायें निकल रही हैं. हिन्दी ब्लॉग की भी एक बनती हुई दुनिया है जो साहित्य के लिए बहुत ही संभावनाशील माध्यम है. इसे साहित्यकारों को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है.

गौर करने लायक बात यह है कि साहित्य की दुनिया में प्रलोभन और प्रपंच बढ़ा ही है. बड़े-बड़े नामों की कोई कमी नहीं है. उनके बड़े-बड़े कारनामे भी आत्मकथ्यों और संस्मरणों के माध्यम से खूब आ रहे हैं किन्तु हमारे पास बड़ी रचनाओं की कमी है. वैसे इस समय हिन्दी की नई पीढ़ी की रचनात्मकता उफान पर है. आइए दुआ करें कि उसे सही रहगुजर, सही रहबर और सही काफिला मिले.

बची हुई है उम्मीद की डोर. याद है न? हर रात के बाद भोर.

Friday, January 8, 2010

साल २०१०: वैचारिक आग्रह घट गया है नई पीढ़ी में- दानी

हमारी सहृदय पाठिका श्रीमती आशा जोगलेकर ने साहित्यकारों की राय पढ़ने के बाद कहा है-

'बड़े-बड़े लेखकों के कथन हैं, क्या कहें. पर कुछ भी अच्छा नहीं है यह कहना गलत है. जीवनापेक्षा बढ़ी है इसके बावजूद कि हर दिन नई बीमारियां पैदा हो रही हैं. गरीबी कम हुई है इसके बावजूद कि महंगाई बढ़ रही है... और जनजागरण तो तब भी हुआ था जब लोग इससे कहीं अधिक गरीब थे. जरूरत है रुक कर विचार करने की, कि बेतहाशा भागते जाना है या दिशा बदलनी है. भ्रष्टाचार है...और बहुत है, पर इसके लिये भी लेखक और समाचार-माध्यम आवाज़ उठा रहे हैं, उठायेंगे.'

आशा जी की बात से भले ही पूरी तरह से इत्तेफ़ाक न रखा जा सके फिर भी उनकी राय निराशा का नकार तो करती ही है. आइये देखते हैं आज की सूची में शामिल साहित्यकार क्या सोचते हैं-


डॉक्टर सूर्यबाला (वरिष्ठ कथाकार-व्यंग्यकार): मुझे ध्यान में आता है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) में एक छात्र ने मुझसे पूछा था कि जिस तरह की दुनिया की आप कल्पना करती हैं, जो सम्बन्ध आपके पात्र जीते हैं, जिस विश्व की आकांक्षा वे करते हैं, क्या आप सोचती हैं कि यथार्थ के धरातल पर वैसा कभी हो पायेगा?...तो इतने आदर्शों में जीने का अर्थ? इसके जवाब में मैंने कहा था कि मुझे मालूम है कि ऐसा कभी संभव नहीं हो पायेगा लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम सपने देखना छोड़ दें. एक अहम् बात यह भी है कि जब हम बहुत अच्छा सोचेंगे, दूसरों से उन विचारों को बांटेंगे, तो कम से कम हम अपने आस-पास एक छोटी ही सही, ख़ूबसूरत दुनिया बनाने में कामयाब होंगे.


साहित्य जगत में मेरे चाहने या न चाहने से एक साल के अन्दर कुछ नहीं होने वाला. फिर भी अच्छे साहित्य-सृजन की इच्छा बनी रहेगी. मेरी कामना है कि हम रचनाकार अपनी आत्ममुग्धता और स्वकेन्द्रीयता से मुक्त होकर ईमानदारी और पारदर्शिता से समाज की तरफ भी देखें. ज्ञान और शिक्षा ने हमें विनम्र और समझदार नहीं बनाया है. हम बातें ऊंची-ऊंची करते हैं लेकिन जीवन में उस सहजता और पारदर्शिता का निर्वाह नहीं कर पाते. लेकिन यही तो इस यांत्रिक जीवन की थोड़ी सी लाचारियाँ भी हैं.

राजेन्द्र दानी (वरिष्ठ कथाकार): मैं एक अच्छा आदमी बनने के प्रयास में हमेशा सकारात्मक सोचता हूँ लेकिन आस-पास का माहौल निराश करता है. साल २०१० में सब कुछ चमत्कारिक रूप से बदल जाएगा, ऐसी मुझे उम्मीद नहीं है. अभी मैं निरंजन श्रोत्रिय की एक कहानी पढ़ रहा था, उसका शीर्षक है- 'जानवर'. इस कहानी में होता यह है कि पति-पत्नी सो रहे हैं और रात के वक्त कोई उनका दरवाज़ा खटखटाता है. वे इस डर से दरवाज़ा नहीं खोलते कि कोई जानवर होगा. सुबह पति उठता है तो देखता है कि भीड़ लगी हुई है और वहां एक शव पड़ा हुआ है. पति के मन में कौंधता है कि हो न हो यह वही शख्स है जो रात में मदद के लिए दरवाज़ा खटखटा रहा था.
बहरहाल, पति घर लौटता है तो पत्नी पूछती है कि इतनी देर क्यों लगा दी, क्या हुआ था. तो पति कहता है कि कुछ नहीं, कोई जानवर मर गया है.

हमारे आस-पास भी यही माहौल है. आज खुशियों का इजहार भी ज्यादा दूर तक नहीं पहुंचता. वैसे मुझे उम्मीदें तो बहुत हैं नए साल से. अभी हमने आमिर खान की 'थ्री ईडियट्स' देखी जबलपुर में. मैं था, ज्ञान जी थे, पंकज स्वामी थे, अरुण यादव थे. तो उस फिल्म ने हमें खुश कर दिया. फिल्म में बड़े ही ह्यूमरस तरीके से पूरी विट के साथ यह दिखाया गया है कि अकादमिक अथवा यांत्रिक शिक्षा से कोई सचमुच का शिक्षित नहीं हो जाता.

साहित्य के अलावा फिल्मों से समाज में बड़ा बदलाव आ सकता है. अब फिल्मों की परम्परागत भाषा और उसका मुहावरा बदल रहा है. अब वह घिसी-पिटी बात नहीं है कि 'अ ब्वाय मीट्स अ गर्ल.' एक और बात जो मैं २०१० में घटित होते देखना चाहूंगा कि साहित्यकारों की पुरानी पीढ़ी का नयी पीढ़ी से आत्मीय और गहरा संवाद स्थापित होना चाहिए. नई पीढ़ी के लोग अपने कैरियर को लेकर अति महत्वाकांक्षी हैं और उनमें वैचारिक आग्रह कम हो गया है.

सुधीर रंजन सिंह (कवि-आलोचक): अब तो लगता है कि दुनिया अपनी समझ से बाहर होती जा रही है और इसके कसूरवार भी हमीं लोग हैं. जाहिर है एक समय हम दुनिया को बदलने की बात करते थे, व्याख्या की नहीं. लेकिन दुनिया हमारे न चाहते हुए भी इतनी दूर तक बदल गयी है कि व्याख्याकार पीछे छूट गए. अब भी हमें लगता है कि व्याख्या में ही बदलने का काम संभव है.

जनता का जीवन सुकून से गुज़रे इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता. होता यह है कि जो संस्कृति कर्म है, उसको जनता एक भिन्न वस्तु मान लेती है. संस्कृति कर्म के प्रति जनता में एक दायित्वहीनता है और संस्कृतिकर्मियों के यहाँ जनता को लेकर एक क़िस्म की बेफ्रिकी है. एक कलाकार अपने आत्मविश्वास में महत्वाकांक्षा से इस प्रकार ग्रस्त हो जाता है कि वह किसी तरह से जीवन को उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं रहता. दूसरी तरफ जनता यह सोचती है कि यह तो कला है और पहुँच से बाहर है. आखिर हमारे पास जीवन निर्वाह के लिए नीरस गद्यात्मक संसार है. कला और जीवन एक नहीं है लेकिन उनको मुझमें (जनता + कलाकार में) एक होना होगा. मेरे उत्तरदायित्व की एकता में एक होना होगा. यही सूत्र हो सकता है.

साल २०१० में मैं चाहूंगा कि हमारा लेखन, हमारी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ ज्यादा से ज्यादा हों और हमें वर्त्तमान सत्ता-संरचना पर एक दबाव समूह की तरह काम करना होगा. यह तभी संभव है जब साहित्य में मात्रात्मक एवं गुणात्मक परिवर्त्तन होंगे.

बोधिसत्व (कवि, हालिया कविता संग्रह 'दुःख तंत्र’): मुझे उम्मीद यह है कि कविता में कथा तत्व की वापसी होगी क्योंकि बिना कहानी के न कविता जीवित रही है न रहेगी. अगर हम संसार भर के काव्य को ध्यान में रखें तो वही कवितायें जीवित नजर आती हैं जिनमें कहीं न कहीं कथा और चरित्र हैं. आप भारतीय मध्यकालीन साहित्य को ही ले लें, सूर, तुलसी, जायसी या आधुनिक काल के निराला, प्रसाद, टैगोर या अन्य बड़े कवि....तो इनकी सारी बड़ी रचनाएँ एक कथा कहती हैं और चरित्र प्रस्तुत करती हैं. आज की कविता में भी जो चरित्र प्रधान कवितायें हैं, वे ज्यादा पढ़ी जाती हैं, ज्यादा चर्चा में रहती हैं और ज्यादा लोगों को जोड़ती हैं और उनके स्मरण में रहती हैं. मेरी ही कवितायें 'माँ का नाच', 'पागलदास' और 'शांता' लोगों के जहन में मेरी ही दूसरी कविताओं की बनिस्बत ज्यादा गहरे बैठी हुई हैं क्योंकि इनमें कथा है, चरित्र हैं.

आज यह परिभाषित करना जरूरी है कि आम जनता क्या है? क्योंकि जो साहित्य आज लिखा जा रहा है वह किस टाइप की जनता के लिए है...जिसमें आप बदलाव लाना चाह रहे हैं. यह भ्रम भी दूर हो जाना चाहिए कि लिखने से जनता का कुछ भला होता है या समाज में परिवर्त्तन होता है या आर्थिक विसंगतियां दूर हो जाती हैं या साम्प्रदायिक दंगे रुक जाते हैं या किसानों की आत्महत्याएं रुक जाती हैं...तो यह समझना चाहिए कि कविता लिखने से बाल मजदूरी या दहेज़ प्रथा भी दूर नहीं होगी.

कविता आज कहने को तो 'उर्वर प्रदेश' में बतायी जा रही है लेकिन वह भयानक बंजर प्रदेश में भटक रही है... और २०१० में या २०२० तक में भी मुझे नहीं लगता कि वह सचमुच की काव्य-भूमि में लौटेगी. मैं चाहूंगा कि हम जितनी जल्दी चमत्कार पैदा करने वाली कवितायें लिखने से छुटकारा पा लें, उतना ही अच्छा होगा.

डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी (आलोचक, अध्यापक): आनेवाले समय में हमारी आर्थिक-राजनीतिक स्थितियों में तेज़ी से बदलाव आयेगा. हम वैश्वीकरण, विदेशी पूंजी और काला-धन के दबाव का मुकाबला स्वदेशी पूंजी तथा अपने संसाधनों के माध्यम से कर सकेंगे. तय है हमें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा... और हमारे लघु-कुटीर उद्योग धंधे, जिनको अभी तक हमने तिरष्कृत किया है और हाशिये पर रखा है, उन्हीं पर हमें ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना होगा. विभिन्न रूपों में जो अर्थ की सत्ता है उसे आम आदमी तक बांटना पड़ेगा. तभी हम अपने देश का समग्र विकास कर सकते हैं. शिक्षा और स्वास्थ्य की सामान सुविधाएं देकर दलितों, वंचितों तथा आदिवासियों की स्थितियों में सुधार लाना होगा.

हमारे पुराने सामाजिक ढाँचे निरंतर टूट रहे हैं और सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत तेज़ हो गयी है. शादी-विवाह के प्रसंगों में एक तरह का खुलापन आया है. इसी तरह छुआछूत आदि सन्दर्भों में भी व्यापक परिवर्त्तन परिलक्षित किये जा रहे हैं. जहां तक राजनीतिक स्थितियों का सवाल है तो जनता का मौजूदा राजनीति से मोहभंग हुआ है. संकीर्ण हितों के स्थान पर हिन्दुस्तान की जनता बहुत व्यापक परिवर्त्तन की आकांक्षी है इसलिए वह बड़े दलों के स्थान पर छोटे और क्षेत्रीय दलों को स्वीकार करने में गुरेज़ नहीं करती. हम देख सकते हैं कि साम्प्रदायिक ताकतें हताश होकर छद्म रूप से वामपंथी पैंतरे खोज रही हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य सत्ता पर काबिज़ होना है. २०१० में इस प्रक्रिया में कोई बदलाव आता मुझे नहीं दीखता.

साहित्य जगत में अब केवल कल्पना की दुनिया से काम नहीं चलेगा. हमें यथार्थ को ठीक से पहचानना होगा. नारेबाजी के स्थान पर आम आदमी की दुनिया का चित्रण अपनी रचनाओं में करना होगा. हमारे साहित्य से गाँवों को लगभग देशनिकाला दे दिया गया है, जो थोड़ा-बहुत आते भी हैं तो वे स्मृतियों के गाँव हैं. साल २०१० में हमें इस पर ध्यान देना चाहिए.

तुषार धवल (कवि, कविता-संग्रह 'पहर यह बेपहर का'): यह उपभोक्तावादी ताकतों से जोरदार युद्ध करने का समय है. बाज़ार इतनी तेजी से हमला कर रहा है कि सबको बस भागो और भोगो ही सूझ रहा है. मनुष्य के सोचने और विचार करने की शक्ति पर हमला करके उसे भोथरा बनाने का खेल जारी है. ऐसे में मैं चाहता हूँ कि कुछ ऐसा हो कि मानव के भीतर का मानव बचा रहे. वह मशीन न बन जाए. उपभोग की वस्तु न बन जाए. उसके भीतर की तरलता सुरक्षित रहे. आज आदमी का आदमी से जुड़ाव समाप्त होता जा रहा है ख़ास तौर पर मुंबई जैसे महानगरों में.

साहित्य जगत में एक तरह के विभ्रम की स्थिति है. यह तय नहीं हो पा रहा है कि हम किस दिशा में जाएँ. हमारी रचनाओं का कथ्य क्या हो, शिल्प क्या हो...खास कर कविता में. यह ऐसा समय है जब सारे वाद समाप्त हो गए हैं. दक्षिण या वाम का कोई सपना साकार नहीं होता दिख रहा है. सब ध्वस्त हैं. बाज़ार ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है. साहित्य में जो समर्पित गतिविधियाँ थीं वे अब तात्कालिक सफलता और झटपट यशप्राप्ति की कसरतों में तब्दील हो गयी हैं. तरह-तरह के गुट और रैकेट चल रहे हैं. यह भी उपभोक्तावाद का असर है.

लेकिन मेरे मन में एक बड़ी उम्मीद है. खास कर अपनी पीढ़ी के कवियों से यह उम्मीद है कि कोई रास्ता निकलेगा. अब भी साहित्य में समर्पित लोग बचे हुए हैं ...और २०१० में तो नहीं, पर लगता है कि अगले ५-१० वर्षों में साहित्य की दिशा तय हो जायेगी.

(जारी)