Wednesday, June 30, 2010

'स्पीति में बारिश' से झाँकता रोहतांग

पिछले कुछ दिनों में 'कबाड़ख़ाना' और 'कर्मनाशा' पर कुछ पोस्ट्स आई हैं जो मई २०१० के आखिरी सप्ताह की मेरी हिमाचल यात्रा से निकली हैं। जब पहली बार रोहतांग की कुछ छवियाँ साझा की थीं तब भाई मुनीश और कुछ अन्य मित्रों ने रोहतांग के बाबत कुछ लिखने को कहा था जो टलता रहा । दरअसल , आजकल लिखने से अधिक पढ़ने का क्रम गतिमान है। अभी एक बार फिर प्रो० कृष्णनाथ की पुस्तक 'स्पीति में बारिश' पढ़ गया हूँ। यह मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है। इस किताब में लिखे शब्दों के रस्से के सहारे हिमालयी लोक में विचरने का एक अलग व विलक्षण अनुभव है। इस बार यात्रा से लौटकर ( एक बार फिर ) इस पुस्तक को पढ़ना एक दूसरी तरह के पाठकीय अनुभव से गुजरना था। अभी तक जिन जगहों को शब्द - चक्षुओं से देखता आ रहा था उनमें से कुछ को निज की आँख से देख आया हूँ। देख क्या आया हूँ निहारकर भाग आया हूँ । यह देखना कितना और किस तरह का देखना ( हुआ ) है, असमंजस में हूँ .... खैर , रोहतांग अभी चर्चा में है। उसके नीचे , उसके पार्श्व से कुल्लू - मनाली से लाहुल - लेह को जोड़ने के लिए सबसे लम्बी सुरंग बन रही है। 'स्पीति में बारिश' पुस्तक ने भी एक सुरंग बनाई है - मेरी स्मृति के पहाड़ों में। मैं एक साधारण पाठक हूँ। रोहतांग के इतिहास - भूगोल , अतीत - वर्तमान के बारे में मुझे कोई रिसर्च नहीं करनी है। मैं तो बस अपनी पसंदीदा किताब ( 'स्पीति में बारिश' / कृष्णनाथ ) के दो अंश इस उम्मीद से सबके साथ साझा करना चाहता हूँ कि जिन्होंने इसे पढ़ा है उन्हें इसमे लिखा गया कुछ - कुछ ताजा हो जाय और जिन्होंने नहीं पढा है उनमें पढ़ने रुचि ( शायद ) जग जाय। । तो आइए देखें:


'स्पीति में बारिश' से झाँकता रोहतांग
*
रोहतांग भोटी मूल का शब्द है। भोटी भाषा में इसे रोथङ ला कहते हैं। रो का मतलब है शव थङ का मतलब है स्थान, मैदान ; ला तो दर्रा या जोत को कहते हैं। रोथङ माने शव का मैदान। इस दर्रे को पार करने में पुराने जमाने में जैसे शव बिछ जाते थे। रोटांग ( रोहतांग ) के पथार पर पहुँचकर अभी भी शव जैसा विवर्ण और ठण्डा अनुभव होता है। यहाँ पत्थर जमाकर हिम दुर्दिन में फँसे यात्रियों के लिए एक कुटिया है। यहाँ आस पास मैदान है। शव का मैदान , इस ऊँचाई से कुल्लू तक एक दुनिया है। जैसे पहाड़ी पर्यटक केब्द्र होते हैं। व्यास नदी है, देवदार के वन हैं, दूर बर्फ़ से ढ़ँकी चोटियाँ हैं ; कभी हरे कभी नंगे पहाड़ हैं। रोहतांग के इस पार यह दुनिया छूट जाती है।

उस पार हिम की कोख में लाहुल - स्पीति की घाटियाँ हैं। इधर तो हिमाचल है , उधर हिम - आर्त प्रदेश। बर्फ़ से ठिठुरा हुआ है। जहाँ बारिश प्राय: नहीं होती , सिर्फ़ बर्फ़ पड़ती है। अक्टूबर - नवम्बर से मई - जून तक यह घाटियाँ बर्फ़ से ढँकी रहती हैं। जब बर्फ़ पिघलती है तो एक फसल होता है। अधिकांश खेतों में दो बार फसल बोते हैं। एक बार जौ बोते हैं। दूसरी बार कठ्ठ बोते हैं। पाटन घाटी में प्राय: दो फसलें होती हैं। हिमानी चोटियों पर तो बर्फ़ कभी पिघलती नहीं। जब से हिमगिरि है तब से वह बर्फ़ है। कहते हैं कि सौ बरस बर्फ़ जमी रह जाय तो मणि हो जाती है। यहाँ तो जब से हिमालय हुआ तब से बर्फ़ है। शायद लाखों बरस से बर्फ़ पिघली नहीं है। तो यह तो मणियों की मणि हो गई होगी। और इतना करीब कि हाथ बढ़ा कर छू लें। यह हिमलोक रोहतांग के पार है।

रोहतांग को भृगुतुंग से भी जोड़ने की कोशिश चली है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भृगुतुंग के माहात्म्य का वर्णन महामुनि अंगिरा ने महर्षि गौतम से किया था - जो अलोलुप हो तीन रात तक भोजन छोड़ भृगुतुंग के महानद में स्नान - आचमन करता है वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। श्री लालचंद प्रार्थी ने 'कुलूत देश की कहानी' ( कुल्लू , १९७१ ) में रोहतांग को भृगुतुंग का अपभ्रंश माना है। भृगुतुंग का रोहतांग कैसे बनता है ? वैसे तो भाषा में कुछ का कुछ हो सकता है। लेकिन यह तो ज्यादती लगती है। इससे कुछ सहज तो आरोह - थांग, आरोहण का स्थान लगता है। इससे रोहतांग बन सकता है। वैसे यह सीधा नहीं है। मैं समझता हूँ कि रोथङ से रोहतांग है। रोथङ ला से रोहतांग दर्रा या जोत है। मैं कभी रोहतांग , कभी रोथङ, कभी रोटांग , कभी तीनों का इस्तेमाल करता हूँ।

**

शान्त चित्त से रोहतांग को देखता हूँ।

बर्फ़ की फिसलन के बीच रास्ता है। यहाँ हिम मणि की तरह भास्वर नहीं है। मृत्यु की तरह धूसर है। जहाँ आकाश की छाया पड़ती है वहाँ नीला , बैंगनी है। चाहे शब्द , अर्थ की वासना का आरोप हो , मुझे लगा कि हिमानी कब्रगाह है जहाँ अनाम शव बिछे हुए हैं जिन पर न कोई 'क्रास' है , पटिया है। अनाम , अकाल मूरत अजूनी। मरणस्मृति होती है। जो मर गए हैं उनकी स्मृति , जो मरने वाले हैं उनकी स्मृति और उन सब शवों के आगे है मेरा शव। मैं अपने कन्धे पर चढ़ अपना शव देखता हूँ। शव स्थान देखता हूँ। रोटांग देखता हूँ।

इस शव के स्थान पर भी एक मढ़ी है। पत्थर का जमाव। गुहा मानुष , अमानुष के लिए एक द्वार है। एक भोट परिवार है। जो शायद आने - जाने वालों के लिए चाय - शाय दे सकता है। पेट पालने के लिए आदमी - जन कहाँ - कहाँ रहते हैं ! इसके आगे एक मोड़ आता है। बायीं ओर बर्फ़  की चट्टान है। जैसे थक्का की थक्का जमायी हुई पीली पड़ती हुई हड्डियाँ हैं। इन्हें काट कर रास्ता है। रास्ता यहाँ सँकरा है। सँकरा है वह रास्ता जो जिन्दगी की ओर जाता है। चौड़ा है वह रास्ता जो मृत्य की ओर जाता है। रास्ते पर फिसलन है। जीप फिसले तो मृत्यु के उस चौड़े रास्ते पर जाए। अभी तो जिन्दगी के सँकरे रास्ते पर हैं।

तीसरा पहर है। काल का और जिन्दगी का भी। फिर भी मौसम बहुत अच्छा है। शायद रोहतांग इस ऋतु में , इस वेला में , इतना अच्छा कम ही होता है। फिर यह समय आए , न आए। बर्फ़ पर चलने का , फिसलने का , गिरने, गिर कर फिर उठने, चलने का मन होता है। हम रोहतांग जोत के शीर्ष पर हैं। एक पट बताता है रोहतांग , समुद्र सतह से ऊँचाई १३०५० फ़ीट।



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किताब : स्पीति में बारिश / लेखक: कृष्णनाथ / प्रकाशक : वाग्देवी प्रकाशन, सुगन निवास , चन्दन सागर , बीकानेर - ३३४००१ , राजस्थान , भारत।
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Monday, June 28, 2010

रोहतांग : कुछ (और) छवियाँ


आज से बहुप्रतीक्षित रोहतांग टनल का निर्माण कार्य समारोहपूर्वक शुरू हो गया। यह सबसे लम्बी सुरंग होगी जो बनने जा रही है। लक्ष्य है कि २०१५ पर यह काम पूरा कर लिया जाएगा।आज टीवी पर इससे संबंधित समाचारों की धूम है। अखबारों में भी खूब छपा है / कल भी छपेगा। अभी तो पिछले माह की हिमाचल यात्रा के दौरान ली गईं कुछ तस्वीरें।


                  
                     

  








रोहतांग की कुछ छवियाँ यहाँ  और यहाँ भी 

बाबा को याद करते हुए…

26 जून से शुरु हो रहे
बाबा नागार्जुन के
जन्म शताब्दी वर्ष
पर उनकी एक कविता







अग्निबीज


अग्निबीज
तुमने बोए थे
रमे जूझते,
युग के बहु आयामी
सपनों में, प्रिय
खोए थे !
अग्निबीज
तुमने बोए थे

तब के वे साथी
क्या से क्या हो गए
कर दिया क्या से क्या तो,
देख–देख
प्रतिरूपी छवियाँ
पहले खीझे
फिर रोए थे
अग्निबीज
तुमने बोए थे

ऋषि की दृष्टि
मिली थी सचमुच
भारतीय आत्मा थे तुम तो
लाभ–लोभ की हीन भावना
पास न फटकी
अपनों की यह ओछी नीयत
प्रतिपल ही
काँटों–सी खटकी
स्वेच्छावश तुम
शरशैया पर लेट गए थे
लेकिन उन पतले होठों पर
मुस्कानों की आभा भी तो
कभी–कभी खेला करती थी !
यही फूल की अभिलाषा थी
निश्चय¸ तुम तो
इस 'जन–युग' के
बोधिसत्व थे;
पारमिता में त्याग तत्व थे

Sunday, June 27, 2010

अलास्का की तस्वीरें - २

मित्र वेरनर फ़ोगेल की भेजी अलास्का की चन्द और तस्वीरें





Saturday, June 26, 2010

आम, आम, आम

रोहित उमराव ने अपने गांव जाकर अपने पुश्तैनी आम के बग़ीचे की चन्द तस्वीरें भेजी हैं





Friday, June 25, 2010

आप भी ज़रूर आईयेगा

इस रविवार दिल्ली में गीत की किताबों का विमोचन है, दो कहानी संकलन- पिंक स्लिप डैडी और सावंत आंटी की लड़कियां।  इसके पहले उसका कविता संग्रह 'आलाप में गिरह' आ चुका है। आप सब सादर, सस्नेह आमंत्रित हैं


रोपता हूं उसे बलूत के दरख़्त की मानिन्द

निजार क़ब्बानी की एक और कविता

अपनी कविता के पाठकों के लिए एक स्पष्टीकरण

मूर्ख मेरे बारे में कहा करते हैं -
मैं स्त्रियों के घरों में गया
और वहीं का हो रहा.
वे मांग करते हैं कि मुझे फांसी दी जाए,
क्योंकि मैं अपनी प्रेमिका के बारे में
कविता लिखता हूं.
मैंने कभी नहीं किया
हशीश का धन्धा.
कभी चोरी नहीं की.
हत्या नहीं की.
प्रेम किया मैंने खुले दिन में.
क्या पापी हूं मैं?

और मूर्ख मेरे बारे में कहा करते हैं -
अपनी कविता में
मैंने उल्लंघन किया है स्वर्ग के आदेशों का.
किसने कहा
कि प्रेम
स्वर्ग की इज़्ज़त से खेलता है?
स्वर्ग मेरे भीतर रहता है.
वह मेरे साथ रोता है
और हंसता है मेरे साथ.
और उसके सितारे
ज़्यादा चमकने लगते हैं
जब
मुझे प्यार होता है किसी से.
क्या हुआ
अगर मैं जपता रहता हूम अपनी प्रेमिका का नाम
और रोपता हूं उसे
दुनिया की हर राजधानी में
बलूत के दरख़्त की मानिन्द

तमाम फ़रिश्तों की तरह
मैं करूंग अपनेपन की हिमायत.
और बचपन की, मासूमियत की
और शुद्धता की.
मैं अपनी प्रेमिका के बारे में लिखता जाऊंगा
जब तक कि उसके सुनहरे केशों को
गला नहीं देता आसमान के सोने में
मैं हूं
और मुझे उम्मीद है मैं बदलूंगा नहीं
मैं हूं एक बच्चा
जो मनचाही इबारत लिखता है
सितारों की दीवारों पर
जब तक कि
मेरी मातृभूमि में प्रेम की कीमत
हवा की कीमत जितनी न बन जाए
और प्रेम का स्वप्न देखने वालों के लिए
मैं बन जाता हूं
एक शब्दकोश
और उनके होंठों पर मैं बनता हूं
एक क
और एक ख.

Thursday, June 24, 2010

मां के लिए पांच ख़त

रूमानियत और ऐन्द्रिकता से भरपूर उनकी कविता के लिए अरब संसार के पाठकों की कई पीढ़ियों ने निज़ार क़ब्बानी (१९२३ - १९९८) को लगातार इज़्ज़त और प्रेम बख़्शा है. उनकी कविताएं उनके दस काव्य संग्रहों के अलावा अरबी अख़बार अल हयात में लगातार छपती रहने के साथ साथ लेबनान और सीरिया के गायकों द्वारा लोकप्रियता के चरम पर पहुंचाई गईं.

स्त्रियों को क़ब्बानी ने अपनी काव्य प्रेरणा का स्रोत बनाया. चाइल्डहुड ऑफ़ अ ब्रेस्ट नामक उनका पहला काव्य संग्रह १९५४ में छपा था जिसकी इरोटिक और रूमानी कथावस्तु ने अरब साहित्य के पारम्परिक संसार में खासी हलचल पैदा की थी. क़ब्बानी की एक बहन थी जिसने इस वजह से आत्महत्या कर ली थी कि वह अपनी नापसन्द के आदमी से ब्याह नहीं करना चाहती थी. इस घटना ने क़ब्बानी को गहरे प्रभावित किया. अपने रचनाकर्म में उन्होंने लगातार पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज के प्रति अपने विरोध को स्वर देने के साथ साथ स्त्रियों की सामाजिक स्वतन्त्रता की हिमायत की.

सन १९६७ से वे लन्दन में रहने लगे थे अलबत्ता दमिश्क शहर उनकी कविताओं में बहुत मज़बूती के साथ उपस्थित रहा है.

१९६७ के अरब-इज़राइल युद्ध में अरबों की हार के बाद उन्होंने लन्दन में निज़ार क़ब्बानी पब्लिशिंग हाउस स्थापित किया जो जल्द ही अरबी हितों का महत्वपूर्ण माउथपीस बन गया.

क़ब्बानी एक निष्ठावान अरब राष्ट्रवादी थे और बाद के वर्षों की उनकी कविता और बाकी लेखन में स्पष्ट राजनैतिक स्वर सुनाई देते हैं. उनके लेखन में रूमानी और राजनैतिक हताशा का समन्वय देखने को मिलता है.

उनकी दूसरी पत्नी बिल्क़ीस अल-रावी एक ईराक़ी अध्यापिका थीं जिनसे उनकी मुलाक़ात बग़दाद में एक काव्यपाठ के दौरान हुई थी. बिल्क़ीस बेरूत में ईराक़ी संस्कृति मंत्रालय में कार्यरत थीं जहां ईरानी गुरिल्लाओं द्वारा अंजाम दिए गए एक बम विस्फोट में उनकी मौत हो गई. यह निज़ार क़ब्बानी के लिए बहुत बड़ा सदमा था.

७५ की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से लन्दन में उनकी मृत्यु हुई.

निज़ार क़ब्बानी कीकविताओं से आपका पहला परिचय सिद्धेश्वर सिंह करा चुके हैं. बाद में मैंने उनकी कुछ प्रेम कविताएं आपके सम्मुख प्रस्तुत की थीं. आज उनकी एक और कविता श्रृंखला:


मां के लिए पांच ख़त

१.

सुप्रभात मेरी प्यारी
सुप्रभात मेरी प्यारी सन्त
दो साल बीत गए मां
तुम्हारा लड़का निकल गया था
अपनी मिथकीय यात्रा पर.
जब वह छिप गया था अपने असबाब में
अपनी मातृभूमि की हरी सुबह में
और उसके सितारों, धाराओं
और लाल पॉपियों में.
जब वह छिप गया था अपने वस्त्रों में
पोदीने और अजवाइन के गुच्छों में
और दमिश्क के फूलों में.

२.

मैं अकेला हूं.
उकता चुका मेरी सिगरेट का धुंआ
मुझसे उकता चुकी मेरी कुर्सी
मेरे दुख मौसम में किसी हरे खेत को तलाशते चिड़ियों का एक झुण्ड हैं.
मैं परिचित हुआ यूरोप की स्त्रियों से
मैं परिचित हुआ उनकी थकी सभ्यता से.
मैं हिन्दुस्तान गया, चीन गया मैं,
मैंने समूचे पूर्व का भ्रमण किया
मुझे कहीं नहीं मिली वह स्त्री
जो मेरे सुनहरे बाल काढ़ती.
एक स्त्री जो अपने बटुए में छिपाती मेरे वास्ते एक टॉफ़ी.
एक स्त्री जो मुझे कपड़े पहनाती जब मैं होता निर्वस्त्र
और गिर जाने पर उठाती मुझे.
मां - मैं हूं वह लड़का जो निकल गया था समुद्री यात्रा पर
बंधा हुआ लेकिन अब भी उसी टॉफ़ी से.
तो ऐसा कैसे हो सकेगा मां
कि मैं बन सकूं एक पिता और कभी बड़ा न होऊं.

३.

सुप्रभात, मैं मैड्रिड में हूं
बच्ची कैसी है?
मैं विनती करता हूं उसका ख़याल करना
सबसे अलग वह बच्ची.
वह सबसे प्यारी थी अपने पिता की.
उसने उसे बेटी की तरह ही बिगाड़ा.
वह उसे सुबह कॉफ़ी पीने बुलाया करता.
और उसे बचाता अपनी दया से.
और जब उसकी मृत्यु हुई
वह हमेशा उसकी वापसी का सपना देखा करती.
उसने अपने पिता को उसके कमरे के कोनों में तलाशा.
उसने सवाल किए पिता के वस्त्रों के बारे में
उसके अख़बार के बारे में
और गर्मियां आने पर सवाल किए
उसकी नीली आंखों के बारे में,
ताकि वह फेंक सके पिता की हथेलियों में
सोने के अपने सिक्के.

४.

मेरी शुभकामनाएं
उस एक घर को जिसने हमें प्रेम और दया के पाठ पढ़ाए.
शुभकामनाएं तुम्हारे सफ़ेद फूलों को,
जो सबसे बेहतरीन होते थे सारे मोहल्ले में.
शुभकामनाएं मेरे बिस्तर को, मेरी किताबों को
गली के सारे बच्चों को.
शुभकामनाएं उन सब दीवारों को
जिन्हें हम भर दिया करते थे अपनी लिखावट के शोर से.
शुभकामनाएं बालकनी में सो रही आलसी बिल्ली को
पड़ोसी की खिड़की पर चढ़ रही फूलदार बेल को.
दो साल बीत गए मां,
चिड़िया जैसा दमिश्क का चेहरा
मेरे अन्तर को कचोटता रहता है
कुतरता मेरे परदों को,
और मेरी उंगलियों पर मारता अपनी उदार चोंच.
दो साल बीत गए मां,
दमिश्क की रातें
दमिश्क की ख़ुशबूएं
दमिश्क के घर
बसे हुए हैं हमारी कल्पनाओं में.
उसकी मस्ज़िदों के खम्भों की रोशनियां
हमारे पालों को रास्ता दिखाती रही हैं.
जैसे कि हमारे दिलों में बो दिए गए हों
अमावी शहर के खम्भे.
जैसे कि बागानों से अब भी महक रही हमारी चेतना.
जैसे कि रोशनी और चट्टानें
पूरी यात्रा करती रही हों हमारे साथ.

५.

सितम्बर का महीना है मां
मेरे लिए सलीके से लिपटे उपहार लेकर आता है दुःख
मेरी खिड़की पर छोड़ जाता अपने आंसू और अपनी चिन्ताएं.
यह सितम्बर है, दमिश्क कहां है?
कहां हैं पिता और उनकी आंखें,
उनकी निगाहों का रेशम कहां है
कहां उनकी कॉफ़ी की महक.
ईश्वर दया करे उनकी कब्र पर.
और कहां है हमारे विशाल घर की विशालता
कहां है उसका सुकून
कहां है खिलते हुए फूलों की गुदगुदी से हंसता हुआ वह घुमावदार ज़ीना
और मेरा बचपन कहां है.
बिल्ली की पूंछ खींचता हुआ
अंगूर की बेल से अंगूर खाता हुआ
और कतरता हुआ फूलों को.

***

दमिश्क, दमिश्क,
हमने कैसी कविता लिखी अपनी आंखों में.
कितने सुन्दर बच्चे को चढ़ा दिया सूली पर
हम उसके पैरों पर झुके
गल गए उसके प्रेम में
जब तक कि अपने प्रेम से
हमने उसे मार न डाला.

उसके एक हाथ में कैपिटल थी और दूसरे हाथ में दास कैपिटल

जलसा के पहले अंक में प्रकाशित देवीप्रसाद मिश्र की कविता श्रृंखला से एक और टुकड़ा पेश है:

चैनल पर रेडिकल

झारखण्ड के जंगलों जैसी दाढ़ी वाले एंकर को आप
इस तरह भी पहचान सकते हैं कि वह महादेवी वर्मा जैसा
चश्मा लगाए रहता था - आप कह सकते हैं वह छायावादी लगता था
वैसा ही रोमांटिक वैसा ही आल बाल जाल वैसा ही केश कुंचित भाल

इलाचन्द्र जोशी के छोटे भाई जैसा

मृणाल सेन के सबसे छोटे भाई जैसा
और युवा अंबेडकर के बड़े भाई जैसा

चिट फ़ंड वाले टीवी चैनल में नौकरी करते हुए उसने भारतीय राज्य को
बदलने का सपना देखा - यह उसकी ऐतिहासिक भूमिका थी मतलब कि आप
पांच छः लाख रुपये महीना लेते रहें
नव नात्सीवादी प्रणाम करते रहें और नक्सली राज्य बनाने का सपना देखते
रहें ... तो यह उसकी दृढ़ता की व्याख्या थी

तो जैसा कि उसके बारे में कहा गया कि उसके
एक हाथ में कैपिटल थी और दूसरे हाथ में दास कैपिटल
लेकिन बात को यहीं ख़त्म नहीं मान लिया गया कहा गया कि
दास कैपिटल का मायने है कैपिटल का दास मतलब कि
रेडिकल इसलिए हैं कि बाज़ार में
एंकर विद अ डिफ़रेन्स का हल्ला बना रहे

आप जानना चाहेंगे कि मेरी उसके बारे में क्या राय है
तो मैं कहूंगा कि वह अर्णव और प्रणव से तो बेहतर था वह नैतिकता का पारसी
थियेटर था और चैनलों के माध्यम से क्रान्ति का वह सबसे बड़ा आख़िरी प्रयत्न
था और ... और क्या कहा जाय

उसने किसी की परवाह नहीं की -
श को निरन्तर स कहने की भी नहीं
उसने शांति को सांति कहा ज़ोर को
पूरा जोर लगा कर जोर

शरच्चंद्र के एक डाक्टर पात्र की तरह
क्षयग्रस्त मनुष्यता को ठीक करने
वह फिर आएगा किसी चैनल पर
बदलाव का गोपनीय कार्यभार लेकर
डेढ़ करोड़ के पैकेज पर

तब तक आप देव डी का अधरुपतन देखिये
और रंग दे बसन्ती का बॉलीवुडीय विद्रोह -
रेड कॉरिडोर में बिछी लैंडमाइनों की
भांय भांय के बैकड्रॉप में

Wednesday, June 23, 2010

अलास्का की चन्द तस्वीरें

मेरे एक शानदार दोस्त हैं वेरनर फ़ोगेल. ऑस्ट्रिया में रहते हैं. ऑस्ट्रियाई रेलवे विभाग की दूरसंचार सेवा का चीफ़ बन चुकने के बाद फ़क़त पचार की उमर में उन्होंने रिटायरमेन्ट ले लिया. इस बात को दो-तीन साल बीत चुके हैं. तब से वे लगातार दुनिया घूम रहे हैं. उनकी भारत यात्रा के बारे में मैंने एक लम्बा संस्मरण कभी यहां लगाया था. फ़िलहाल वेरनर अलास्का में हैं. उन्होंने मुझे ये तस्वीरें मेल के मार्फ़त कल ही भेजी हैं. आइये तस्वीरें देखी जाएं और वेरनर (वेरनर सुर्ख़ लाल रंग की जैकेट पहने हैं) से रश्क किया जाए:








Tuesday, June 22, 2010

अर्शिया सत्तार से मिलिये

यह आलेख तथा एक ज़रूरी सूचना मुझे मेल से प्रतिलिपि के सम्पादक और कवि गिरिराज किराडू ने भेजे हैं. ग़ौर फ़रमाएं:



अर्शिया सत्तार से मेरा परिचय काफी दिलचस्प तरीके से हुआ. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में वे एक खाली पूल के किनारे बैठी लिटिल मैग्ज़ीन की संपादक अंतरा देवसेन के साथ ऐसे बतिया रही थीं जैसे महीनों बाद ससुराल से लौटी लड़कियां अपनी सहेलियों से. अंतरा से थोड़ा-सा परिचय था, ई-मेल आदि के मार्फ़त.

इस फेस्टिवल में हर रोज़ हम दोपहर आते आते आत्म-मुग्ध, कुछ कुछ दयनीय ढंग से मंडरा रहे सितारा लेखकों की थोक मौजूदगी से त्रस्त हो जाते हैं. कुछ वैसा ही हाल और समय था. हमने अंतरा से दुआ सलाम की और उसके यह कहने पर कि वो सबस्क्राइब करेगी उसे चौथे अंक की एक प्रति दे दी. हमने अर्शिया को बिलकुल भी एड्रेस नहीं किया और काफी थका हारा-सा हलो कह कर चल दिए. अगले दिन अर्शिया का सत्र था और वे जिस तरह दुर्लभ अंतर्दृष्टि के साथ, बहुत निर्भीक स्वर में लेकिन आत्म-मुक्त होकर खुद पर अधिक हंसते हुए बोलीं हमें अपने किये पर किंचित शर्मिन्दगी हो आयी. मैंने उनसे कहा अगर आप चाहें तो मैं आपको एक प्रति इसलिए भी दे सकता हूँ कि उसे पढ़कर आप तय कर लें कि प्रतिलिपि आपके लिखने लायक मंच है कि नहीं. वे मुस्कुरा कर बोलीं, " कल से मैं सोच रही थी क्या किया जाये कि यह सुन्दर पत्रिका मुझे भी मिल जाये!"

फिर उनसे अगली बार मुलाकात हुई बनारस में एक सेमिनार में. वहां उनसे कुछ कायदे का परिचय हुआ. वहां जो हतप्रभ कर देने वाला परचा उन्होंने पढ़ा, वह बाद में प्रतिलिपि में प्रकाशित हुआ. पाठकों की जानकारी के लिए अर्शिया सत्तार के वाल्मीकि रामायण और कथासरित्सागर के अंग्रेजी अनुवाद पेंग्विन ने प्रकाशित किये हैं. उन्होंने क्लासिकी भारतीय साहित्य में शिकागो यूनिवर्सिटी से पी.एचडी की है. वे मुंबई में रहती हैं. संगम हाउस उनके स्थापित किया हुआ है. दक्षिण एशिया में इसका काम वे खुद देखती हैं जबकि अमेरिका में डी.डब्ल्यू. विल्सन. संगम हाउस रेजीडेंसी उन लेखकों पर फोकस करती है जिन पर शुरुआती ध्यान तो गया है लेकिन जिन्हें अभी ठीक से स्थापित होना बाकी है. भारतीय भाषाओँ के साथ इसमें डेनिश, जर्मन, पुर्तगाली, ऑस्ट्रियाई और अंग्रेजी में लिखने वाले नए लेखक भी आये हैं. इस वर्ष भी इसका स्वरुप इसी तरह बहु-भाषीय और बहु-देशीय बने रहने की उम्मीद है. रेजीडेंसी में आने वाले लेखकों में से किसी एक को कोरिया में महीने भर की रेजीडेंसी के लिए भी चुना जाता है. कबाड़खाना के मार्फ़त मैं यह सूचना इच्छुक हिंदी लेखकों तक पहुंचा रहा हूँ. संक्षिप्त विज्ञप्ति नीचे है.

- गिरिराज किराडू

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दक्षिण भारत स्थित अंतर्राष्ट्रीय लेखक पीठ (रायटर्स रेजीडेंसी) संगम हाउस सभी भारतीय भाषाओँ के लेखकों से वर्ष २०१०-२०११ के लिए आवेदन आमंत्रित करती है. रेजीडेंसी सत्र नवम्बर-दिसंबर में दस सप्ताह तक चलता है और एक लेखक के लिए यह अवधि सामान्यतः २ से ४ हफ्ते की होती है. लेखक उपयुक्त सामग्री के साथ आवेदन कर सकते हैं. चयनित लेखकों के आतिथ्य की व्यवस्था हम करते हैं लेकिन उन्हें आने जाने का किराया खुद उठाना होता है.

इस वर्ष आवेदन की अंतिम तिथि ३० जून है. सफल आवेदनकर्ताओं को निर्णय की सूचना अगस्त २०१० के अंत तक दी जाएगी.

और जानकारी के लिए हमारी वेबसाईट देखें: http://sangamhouse.org

Monday, June 21, 2010

दिल वो ज़ालिम कि उसी शख़्स पे मरता जाए




एच एम वी ने क़रीब बीस साल पहले उस्ताद मेहदी हसन साहब की लाइव कन्सर्ट का एक डबल कैसेट अल्बम जारी किया था: 'दरबार-ए-ग़ज़ल'. उस में पहली ही ग़ज़ल थी आलम ताब तश्ना की 'वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए'. बहुत अलग अन्दाज़ था उस पूरी अल्बम की ग़ज़लों का, गो यह बात अलग है कि उसकी ज़्यादातर रचनाओं को वह शोहरत हासिल नहीं हुई. हसन साहब की आवाज़ में शास्त्रीय संगीत के पेंच सुलझते चले जाते और अपने साथ बहुत-बहुत दूर तलक बहा ले जाया करते थे.

कुछेक सालों बाद बांग्लादेश के मेरे बेहद अज़ीज़ संगीतकार मित्र ज़ुबैर ने वह अल्बम ज़बरदस्ती मुझसे हथिया लिया था. उसका कोई अफ़सोस नहीं मुझे क्योंकि ज़ुबैर ने कई-कई मर्तबा उन्हीं ग़ज़लों को अपनी मख़मल आवाज़ में मुझे सुनाया. ज़ुबैर के चले जाने के कुछ सालों बाद तक मुझे इस अल्बम की याद आती रही ख़ास तौर पर उस ग़ज़ल की जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया. यह संग्रह बहुत खोजने पर कहीं मिल भी न सका. कुछ माह पहले एक मित्र की गाड़ी में यूं ही बज रही वाहियात चीज़ों के बीच अचानक यही ग़ज़ल बजने लगी. बीस रुपए में मेरे दोस्त ने दिल्ली-नैनीताल राजमार्ग स्थित किसी ढाबे से सटे खोखे से गाड़ी में समय काटने के उद्देश्य से 'रंगीन गजल' शीर्षक यह पायरेटेड सीडी खरीदी थी. नीम मलबूस हसीनाओं की नुमाइशें लगाता उस सीडी का आवरण यहां प्रस्तुत करने लायक नहीं अलबत्ता आलम ताब तश्ना साहब की ग़ज़ल इस जगह पेश किए जाने की सलाहियत ज़रूर रखती है. ग़ज़ल का यह संस्करण 'दरबार-ए-ग़ज़ल' वाले से थोड़ा सा मुख़्तलिफ़ है लेकिन है लाइव कन्सर्ट का हिस्सा ही.

सुनें:



वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए
दिल वो ज़ालिम कि उसी शख़्स पे मरता जाए

मेरे पहलू में वो आया भी तो ख़ुशबू की तरह
मैं उसे जितना समेटूं, वो बिखरता जाए

खुलते जाएं जो तेरे बन्द-ए-कबा ज़ुल्फ़ के साथ
रंग पैराहन-ए-शब और निखरता जाए

इश्क़ की नर्म निगाही से हिना हों रुख़सार
हुस्न वो हुस्न जो देखे से निखरता जाए

क्यों न हम उसको दिल-ओ-जान से चाहें 'तश्ना'
वो जो एक दुश्मन-ए-जां प्यार भी करता जाए

(अहद-ए-मोहब्बत: प्यार में किये गए वायदे, पैराहन-ए-शब: रात्रि के वस्त्र, हिना हों रुख़सार: गालों पर लाली छा जाए)

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Sunday, June 20, 2010

कि साजन कुत्ता होता जाए

जलसा के पहले अंक से आपका परिचय कराते हुए मैंने आपको देवीप्रसाद मिश्र की एक कविता पढ़वाई थी. आज पढ़िए उसी सीरीज़ से एक और कविता -

सजनी

कि सजनी अब तो रहा न जाए

पानी में तेज़ाब घोल दे नदी चुरा ले जाए
रात बनाए रक्खे कोई दिया न जलने पाए
गाना इतना तेज़ लगा दे बात न होने पाए
हवा धुंए से भर दे सीधे पेड़ काटने आए
बात कहो तो हाथ पकड़ ले औ पिस्तौल दिखाए
बहुत प्यार करने का वादा करके घर न आए

कि साजन सत्ता होता जाए
कि साजन कुत्ता होता जाए

कि सजनी अब तो रहा न जाए

Saturday, June 19, 2010

जब पेले का खेल देखने को युद्धविराम घोषित हुआ था



फ़ुटबॉल के इतिहास के महानतम खिलाड़ी माने जाने वाले पेले की तारीफ़ करते हुए हॉलैण्ड के पूर्व खिलाड़ी और कोच योहान क्रायफ़ ने एक बार कहा था: "पेले दुनिया के इकलौते फ़ुटबॉलर थे जिनका खेल किसी भी नियम-कानून और तर्क से परे निकल जाता था. वे खेलते नहीं थे, जादू किया करते थे." यहां यह बताना उचित लगता है कि तीन बार 'यूरोपियन प्लेयर ऑफ़ द ईयर' का सम्मान पा चुके खुद योहान क्रायफ़ 'टोटल फ़ुटबॉल' के सबसे अच्छे खिलाड़ी माने जाते थे.

पेले कुल सत्रह साल के थे जब उन्होंने १९५८ के फ़ुटबॉल विश्व कप का फ़ाइनल खेला था. स्वीडन में हुए इस विश्वकप फ़ाइनल में ब्राज़ील ने स्वीडन पर पांच-दो से जीत हासिल की थी. पेले तब तक अपने करिश्माई खेल से अंतर्राष्ट्रीय फ़ुटबॉल जगत के नवीनतम सितारे बन चुके थे. इस फ़ाइनल में पेले ने दो शानदार गोल किये थे. जबकि पूरे टूर्नामेन्ट में उनके द्वारा किये गए तेरह गोलों का रिकॉर्ड करीब पचास सालों तक कायम रहा. पेले को मार्क कर रहे स्वीड सुरक्षापंक्ति के एक खिलाड़ी का कहना था: "पांच गोल खा चुकने के बाद किसी तरह की वापसी का विचार करना मूर्खता होती. और जो खेल पेले दिखा रहे थे, उसे न देखना और आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता का अनुभव न करना पाप होता."

इस दर्ज़े के खिलाड़ी की आज के तथाकथित 'पेशेवर' खेलजगत में कल्पना तक नहीं की जा सकती. फ़ुटबॉल के खेल में अपने पूरे कैरियर के दौरान पांच सौ गोल कर पाना किसी भी बड़े खिलाड़ी का सपना होता है. पेले यह उपलब्धि फ़कत बाईस साल की आयु में पा चुके थे. करीब तेरह सौ गोल कर चुके पेले की लोकप्रियता का आलम यह था कि एक बार १९७० में जब वे मैक्सिको सिटी में एक मैच खेलने पहुंचे तो छुट्टी का दिन न होने के कारण समूची मैक्सिको सिटी का सारा काम काज ठप्प पड़ गया था. तमाम दफ़्तरों और दुकानों के बाहर बड़े बड़े बोर्ड लगे हुए थे: "आज बन्द है. हम सब शहंशाह का खेल देखने गये हुए हैं"

ब्राज़ील के एक निर्धन घर में जन्मे पेले का असली नाम एडसन अरान्तेस दो नासीमेन्तो था. घरवाले प्यार से उन्हें डीको कहते थे. लड़कपन के दिनों में वे अपने मुहल्ले में फ़ुटबॉल खेल रहे थे. जाहिर है बाकी के लड़के उनसे कहीं बदतर खेल रहे होंगे. खेल खेल में किसी ने उन्हें पेले कहना शुरू किया. इस बात पर पेले ने आपत्ति की लेकिन जैसे-तैसे वह नाम उनके साथ चिपक ही गया. पेले धीरे धीरे सारे संसार में एक ब्रान्ड बन गया और एक सर्वे के मुताबिक य़ूरोप में 'कोका कोला' के बाद सबसे ज़्यादा बिकने वाला ब्राण्ड पेले था. पेले के प्रशंसकों में कई देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष वगैरह भी थे. एक बार ईरान के तत्कालीन शाह ने अपना कार्यक्रम तीन घंटे आगे खिसका दिया और हवाई अड्डे पर रुक कर पेले की फ़्लाइट का इन्तज़ार किया सिर्फ़ इसलिए कि वे एक बार पेले से मिलना भर चाहते थे.

नाइजीरिया में बायाफ़्रा के साथ चल रहे युद्ध के दौरान दो दिनों का युद्धविराम सिर्फ़ इसलियेये घोषित किया गया कि दोनों पक्षों के लोग पेले को खेलता हुआ देख सकें. १९६९ में कॉंगो के किन्शाशा और ब्राज़ाविल के बीच भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था. पेले के क्लब सान्तोस ने युद्ध से कुछ माह पहले ब्राज़ाविल में एक मैच खेलने की स्वीकृति दी थी. ब्राज़ाविल पहुंचने से पहले किन्शाशा की फ़ौजों ने अपनी सुरक्षा में टीम को कॉंगो नदी तक पहुंचाया. कॉंगो के उस तरफ़ ब्राज़ाविल के सिपाहियों ने टीम को सुरक्षा प्रदान की.

मैच खेल चुकने के बाद यही क्रम दुहराया गया. ब्राज़ाविल के सैनिकों ने टीम को किन्शाशा की फ़ौज को सौंप दिया. लेकिन किन्शाशा में सान्तोस के मैनेजर से कहा गया कि आप तभी वापस जा सकते हैं जब एक मैच किन्शाशा में भी खेलें. मैच हुआ और पेले के खेल को देखने ऐतिहासिक भीड़ जुटी.

तीन दिनों के अघोषित युद्धविराम के बाद पेले के टीम वापस लौट गई. उस के जाने के साथ ही युद्ध पूरी भीषणता के साथ दुबारा शुरू जो गया.

(पेले के खेल की झलक - यूट्यूब से साभार)

Friday, June 18, 2010

वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल, साहित्य, दर्शनशास्त्र और कामू के फटे जूते



फ़ुटबॉल का विश्व कप धीरे धीरे रंग पकड़ रहा है. इस बार ग्रुप सी का हिस्सा है अल्जीरिया की टीम. पहला मैच स्लोवेनिया से ०-१ से हार चुकी है. अभी उसने इंग्लैण्ड और अमेरिका से मैच खेलने बाक़ी हैं. अल्जीरिया मेरी फ़ेवरेट टीम तो नहीं रही है पर हर बार उसके प्रदर्शन पर मेरा ध्यान टिका रहता है. वजह साहित्य से जुड़ी हुई है. साहित्य से मतलब एक बड़े साहित्यकार से जिसने बीसवीं सदी के लेखन को विश्वस्तर पर प्रभावित किया. अजनबी और पतन और द मिथ ऑफ़ सिसिफ़स जैसी कालजयी रचनाओं के लेखक अल्बैर कामू (१९१३-१९६०) की बात कर रहा हूं मैं.

मात्र चवालीस साल की आयु में कामू को साहित्य का प्रतिष्ठित नोबेल पुरुस्कार दिया गया था. रूडयार्ड किपलिंग के बाद इस सम्मान को पाने वाले वे सबसे युवा लेखक थे. आलोचकों ने कामू को अस्तित्ववादी कहा पर वे स्वयं ऐसा मानने से इन्कार करते रहे.

खैर छोड़िये ...



कामू खुद फ़ुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे. उनका कथन था "नैतिकता और कर्तव्य के बाबत जितना भी मुझे निश्चित ज्ञान है, उसके लिए मैं फ़ुटबॉल का ऋणी हूं."

कामू ने १९३० के दशक में अल्जीरिया विश्वविद्यालय की तरफ़ से गोलकीपर की हैसियत से कई मैच खेले थे. उनकी टीम ने नॉर्थ अफ़्रीकन कप और नॉर्थ अफ़्रीकन चैम्पियन्स कप के ख़िताब दो-दो दफ़ा जीते. बाद में टीबी के कारण कामू का फ़ुटबॉल कैरियर ख़त्म हो गया.

कामू का मानना था कि धर्म और राजनीति नैतिकता को खासा जटिल विषय बना देते हैं सो नैतिकता को लेकर उन के पास एक बहुत साफ़ सुथरा और सादा दर्शन था - वे कहते थे कि आपने अपने दोस्तों के प्रति वफ़ादार बने रहना चाहिये. इसके लिए साहस तथा ईमानदारी दो सबसे ज़रूरी वांछित गुण होते हैं. जैसा कि फ़ुटबॉल में आपको करना होता है.

कामू बचपन से ही गोलकीपर की तरह खेला करते थे. इसके पीछे एक खास कारण था. एडुआर्डो गालेनो ने अपनी किताब सॉकर इन सन एन्ड शैडो में इस बारे में लिखा है: "... क्योंकि गोलकीपर की पोज़ीशन में खेलते हुए आपके जूते उतनी जल्दी नहीं घिसते. बहुत गरीब परिवार वाले कामू के लिए मैदान में दौड़ने की सुविधा उठाने लायक संसाधन नहीं थे. उनकी दादी हर शाम उनके लौटने के बाद उनके जूते के तलवों को ग़ौर से देखा करती थी. उनके जल्दी घिस जाने पर कामू की धुनाई होती थी."

फ़ुटबॉल प्रैक्टिस के दौरान कामू ने कई बातें सीखीं. "मैंने सीखा कि जब जब आप गेंद को अपने पास आने की उम्मीद करते हैं, वह आपके पास नहीं आती. इसका मुझे ज़िन्दगी में बहुत लाभ मिला, ख़ास तौर पर बड़े शहरों में रहते हुए जहां लोग वैसे नहीं होते जैसा वे दिखाने का यत्न करते हैं."

कामू आगे बताते हैं: "मैंने यह भी सीखा कि बिना ख़ुद को ईश्वर जैसा महसूस किये जीता जा सकता है और बिना ख़ुद को कचरा जैसा महसूस किये हारा भी जा सकता है. मैंने पाया कि किसी भी तरह का कौशल बहुत आसानी से नहीं प्राप्त किया जा सकता."

फ़ुटबॉल के माध्यम से कामू दर असल मनुष्य की आत्मा के रहस्यों के पाताललोक में उतर रहे थे. टीबी ने उनकी फ़ुटबॉल पर लगाम ज़रूर लगाई पर फ़ुटबॉल जिन चीज़ों से वंचित रह गया, उनके बदले में वह दुनिया को एक महान पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, दार्शनिक और मानवाधिकारों के मुखर वक्ता के रूप में प्राप्त हुआ. फ़ुटबॉल कैरियर का तो कुछ निश्चित पता नहीं पर जीवन और दर्शन के मैदान में गोलकीपिंग करते हुए कामू का रेकॉर्ड शतप्रतिशत रहा.

(चित्र: ऑस्ट्रेलियाई कार्टूनिस्ट और इलस्ट्रेटर जॉन स्पूनर का बनाया अल्बैर कामू का चित्र)

Thursday, June 17, 2010

जलसा - साल की एक बड़ी साहित्यिक घटना



जाने माने कवि श्री असद ज़ैदी ने हाल ही में अपनी एक एक पुरानी महत्वाकांक्षी योजना को ठोस सूरत देते हुए जलसा नाम के प्रकाशन का पहला अंक निकाला है. इसे वे साहित्य और विचार का अनियतकालीन आयोजन कहते हैं. अंग्रेज़ी के विख्यात प्रकाशन ग्रान्टा की तर्ज़ पर इसे एक उपशीर्षक दिया गया है - अधूरी बातें. जाहिर है अगले अंकों में यह उपशीर्षक अलग अलग होंगे. बिना किसी विज्ञापन की मदद से छपी इस पत्रिका/पुस्तक की छपाई और समायोजन बेहतरीन है और देश के युवा और वरिष्ठ कवि-लेखकों की महत्वपूर्ण रचनाएं इसमें शामिल हैं.

जलसा के आवरण पर मकबूल फ़िदा हुसैन की पेन्टिंग पोर्ट्रेट ऑफ़ एन अम्ब्रेला - कॉन्वर्सेशन’ है. जलसा के इस अंक को मंगलेश डबराल को समर्पित किया गया है. रचनाकारों की सूची वृहद है और रचनाओं की गुणवत्ता उत्साह बढ़ाने वाली. विनोद कुमार शुक्ल, चन्द्रकान्त देवताले, लीलाधर जगूड़ी, अशोक वाजपेई, ज्ञानेन्द्रपति, वीरेन डंगवाल, देवीप्रसाद मिश्र, लाल्टू, कुमार अम्बुज, सत्यपाल सहगल, निर्मला गर्ग, अजन्ता देव, नीलेश रघुवंशी, पंकज चतुर्वेदी और शिरीष मौर्य की कविताएं हैं. तादेयूश रूज़ेविच और पाई चुई यी की कविताओं का क्रमशः उदय प्रकाश और त्रिनेत्र जोशी द्वारा किए गए अनुवाद हैं और मनमोहन, शुभा, कृष्ण कल्पित, देवीप्रसाद मिश्र, योगेन्द्र आहूजा, रवीन्द्र त्रिपाठी, ज्योत्सना शर्मा, शिवप्रसाद जोशी और प्रियम अंकित की गद्य रचनाएं.

प्रूफ़ की गलतियां कतई नहीं हैं (कम से कम मुझे तो अब तक नज़र नहीं आईं) और बढ़िया कागज़ पर छपी इस २१६ पृष्ठों की पत्रिका की कीमत मात्र एक सौ पचास रुपए है. मेरा ठोस यक़ीन है कि अर्से बाद हिन्दी साहित्य को एक समग्र और विश्वसनीय प्लेटफ़ॉर्म मिला है.

असद जी इसे पूर्णतः विज्ञापनमुक्त रखना चाहते हैं और स्पष्ट कहते हैं कि पत्रिका किसी भी सूरत में फ़ोकट में नहीं बांटी जाएगी जैसा कि हिन्दी की तमामतर लघु पत्रिकाएं करती आई हैं. अगर आप अपनी लाइब्रेरी को थोड़ा और सम्पन्न बनाना चाहते हैं तो यक़ीनन जलसा आपके संग्रह में होनी चाहिये. जलसा को प्राप्त करने के लिए नीचे लिखे पते पर सम्पर्क किया जा सकता है:

असद ज़ैदी
बी- ९५७, पालम विहार,
गुड़गांव १२२ ०१७

टेलीफ़ोन: 09868126587, ईमेल: jalsapatrika@gmail.com

जलसा के इस अंक में देवीप्रसाद मिश्र की सत्रह कविताएं और एक कहानी प्रकाशित हुई है. बिल्कुल नए डिक्शन और अनूठे ब्लैक ह्यूमर के साथ देवीप्रसाद मिश्र अपनी कविता-श्रृंखला में तेज़ी से बदल रहे हमारे समय की कई महत्वपूर्ण बातों को पकड़ पाने में कामयाब हुए हैं. एक बानगी देखिये
:

फ़्रेंच सिनेमा

(लगे हाथ नग्नता पर एक फ़ौरी विमर्श)

ख़ान मार्केट के पास जहां कब्रिस्तान है
वहां बस रुकती नहीं है - मैं चलती बस से
उतरा और मरते-मरते बचा : यह फ़्रेंच फ़िल्म का कोई
दृश्य होता जिनकी डीवीडी लेने मैं
क़रीब क़रीब हर हफ़्ते उसी तरफ़ जाया करता हूं

यह हिन्दी फ़िल्मों का कोई दृश्य शायद ही हो पाता क्योंकि
इन फ़िल्मों का नायक अमूमन कार में चलता है
और बिना आत्मा के शरीर में बना रहता है वह देश में भी
इसी तरह बहुत ग़ैरज़िम्मेदार तरीक़े से घूमता रहता है
वह विदेशियों की तरह टहलता है और सत्तर करोड़ की फ़िल्म में
हर दो मिनट में कपड़े बदलता है और अहमक पूरी फ़िल्म में
पेशाब नहीं करता है और अपने कपड़ों से नायिका के कपड़ों को इस तरह से
रगड़ता है कि जैसे वह संततियां नहीं विमल सूटिंग के थान पैदा करेगा

मतलब यह कि इन फ़िल्मों में बिना हल्ला मचाए निर्वस्त्र हुआ नहीं जाता
इन फ़िल्मों में सत्ता को नंगा नहीं किया जाता
जो कलाओं की दो बुनियादी वैधताएं हैं

(जलसा से और भी रचनाएं कबाड़ख़ाने पर जल्द देखिये)

Wednesday, June 16, 2010

खानसाहेब सुना रहे हैं राग मेघ

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की दिव्य आवाज़ में राग मेघ मल्हार:



(साभार यूट्यूब)

थोड़ा नमक था उनमें दुख का, सुख का थोड़ा महुआ

ग्वालियर में रहने वाले हमारे कबाड़ी मित्र अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी यह लम्बी कविता मुझे कुछ दिन पूर्व भेजी थी. एक बड़े फलक पर फैली यह कविता हमारी इस इक्कीसवीं सदी पर काफ़ी धारदार और ज़रूरी टिप्पणी है. कविता लम्बी है और ध्यान से पढ़े जाने की दरकार रखती है. शायद यही वजह थी कि मुझे इसे यहां लगाने में इतना समय लगा.



अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार

(एक)

इस जंगल में एक मोर था
आसमान से बादलों का संदेशा भी आ जाता
तो ऐसे झूम के नाचता
कि धरती के पेट में बल पड़ जाते
अंखुआने लगते खेत
पेड़ों की कोख से फूटने लगते बौर
और नदियों के सीने में ऐसे उठती हिलोर
कि दूसरे घाट पर जानवरों को देख
मुस्कुरा कर लौट जाता शेर

एक मणि थी यहां
जब दिन भर की थकन के बाद
दूर कहीं एकान्त में सुस्ता रहा होता सूरज
तो ऐसे खिलकर जगमगाती वह
कि रात-रात भर नाचती वनदेवी
जान ही नहीं पाती
कि कौन टांक गया उसके जूड़े में वनफूल

एक धुन थी वहां
थोड़े से शब्द और ढेर सारा मौन
उन्हीं से लिखे तमाम गीत थे
हमारे गीतों की ही तरह
थोड़ा नमक था उनमें दुख का
सुख का थोड़ा महुआ
थोड़ी उम्मीदें थी- थोड़े सपने…

उस मणि की उन्मुक्त रोशनी में जो गाते थे वे
झिंगा-ला-ला नहीं था वह
जीवन था उनका बहता अविकल
तेज़ पेड़ से रिसती ताड़ी की तरह…
इतिहास की कोख से उपजी विपदायें थीं
और उन्हें काटने के कुछ आदिम हथियार

समय की नदी छोड़ गयी थी वहां
तमाम अनगढ़ पत्थर,शैवाल और सीपियां…

(दो)

वहां बहुत तेज़ रोशनी थी
इतनी कि पता ही नहीं चलता
कि कब सूरज ने अपनी गैंती चाँद के हवाले की
और कब बेचारा चाँद अपने ही औज़ारों के बोझ तले
थक कर डूब गया

बहुत शोर था वहां
सारे दरवाज़े बंद
खिड़कियों पर शीशे
रौशनदानों पर जालियां
और किसी की श्वासगंध नहीं थी वहां
बस मशीने थीं और उनमें उलझे लोग
कुछ भी नहीं था ठहरा हुआ वहां
अगर कोई दिखता भी था रुका हुआ
तो बस इसलिये
कि उसी गति से भाग रहा दर्शक भी…

वहां दीवार पर मोरनुमा जानवर की तस्वीर थी
गमलों में पेड़नुमा चीज़ जो
छोटी वह पेड़ की सबसे छोटी टहनी से भी
एक ही मुद्रा में नाचती कुछ लड़कियां अविराम
और कुछ धुनें गणित के प्रमेय की तरह जो
ख़त्म हो जाती थीं सधते ही…

वहां भूख का कोई संबध नहीं था भोजन से
न नींद का सपनों से
उम्मीद के समीकरण कविता में नहीं बहियों में हल होते
शब्द यहां प्रवेश करते ही बदल देते मायने
उनके उदार होते ही थम जाते मोरों के पांव
वनदेवी का नृत्य बदल जाता तांडव में
और सारे गीत चीत्कार में


जब वे कहते थे विकास
हमारी धरती के सीने पर कुछ और फफोले उग आते



(तीन)

हमें लगभग बीमारी थी ‘हमारा’ कहने की
अकेलेपन के ‘मैं’ को काटने का यही हमारा साझा हथियार
वैसे तो कितना वदतोव्याघात
कितना लंबा अंतराल इस ‘ह’ और ‘म’ में

हमारी कहते हम उन फैक्ट्रियों कों
जिनके पुर्जों से छोटा हमारा कद
उस सरकार को कहते ‘हमारी’
जिसके सामने लिलिपुट से भी बौना हमारा मत
उस देश को भी
जिसमे बस तब तक सुरक्षित सिर जब तक झुका हुआ
…और यहीं तक मेहदूद नहीं हमारी बीमारियां

किसी संक्रामक रोग की
तरह आते हमें स्वप्न
मोर न हमारी दीवार पर, न आंगन में
लेकिन सपनों में नाचते रहते अविराम
कहां-कहां की कर आते यात्रायें सपनों में ही…
ठोकरों में लुढ़काते राजमुकुट और फिर
चढ़कर बैठ जाते सिंहासनों पर…
कभी उस तेज़ रौशनी में बैठ विशाल गोलमेज के चतुर्दिक
बनाते मणि हथियाने की योजनायें
कभी उसी के रक्षार्थ थाम लेते कोई पाषाणयुगीन हथियार
कभी उन निरंतर नृत्यरत बालाओं से करते जुगलबंदी
कभी वनदेवी के जूड़े में टांक आते वनफूल…

हर उस जगह थे हमारे स्वप्न
जहां वर्जित हमारा प्रवेश!


(चार)

इतनी तेज़ रोशनी उस कमरे में
कि ज़रा सा कम होते ही
चिंता का बवण्डर घिर आता चारो ओर

दीवारें इतनी लंबी और सफ़ेद
कि चित्र के न होने पर
लगतीं फैली हुई कफ़न सी आक्षितिज

इतनी गति पैरों में
कि ज़रा सा शिथिल हो जायें
तो लगता धरती ने बंद कर दिया घूमना
विराम वहां मृत्यु थी
धीरज अभिशाप
संतोष मौत से भी अधिक भयावह

भागते-भागते जब बदरंग हो जाते
तो तत्क्षण सजा दिये जाते उन पर नये चेहरे
इतिहास से निकल आ ही जाती अगर कोई धीमी सी धुन
तो तत्काल कर दी जाती घोषणा उसकी मृत्यु की

इतिहास वहां एक वर्जित शब्द था
भविष्य बस वर्तमान का विस्तार
और वर्तमान प्रकाश की गति से भागता अंधकार…

यह गति की मज़बूरी थी
कि उन्हें अक्सर आना पड़ता था बाहर



उनके चेहरों पर होता गहरा विषाद
कि चौबीस मामूली घण्टों के लिये
क्यूं लेती है धरती इतना लंबा समय?
साल के उन महीनों के लिये बेहद चिंतित थे वे
जब देर से उठता सूरज और जल्दी ही सो जाता…
उनकी चिंता में शामिल थे जंगल
कि जिनके लिये काफी बालकनी के गमले
क्यूं घेर रखी है उन्होंने इतनी ज़मीन ?

उन्हें सबसे ज़्यादा शिक़ायत मोर से थी
कि कैसे गिरा सकता है कोई इतने क़ीमती पंख यूं ही
ऐसा भी क्या नाचना कि जिसके लिये ज़रूरी हो बरसात
शक़ तो यह भी था
कि हो न हो मिलीभगत इनकी बादलों से…

उन्हें दया आती वनदेवी पर
और क्रोध इन सबके लिये ज़िम्मेदार मणि पर
वही जड़ इस सारी फसाद की
और वे सारे सीपी, शैवाल, पत्थर और पहाड़
रोक कर बैठे न जाने किन अशुभ स्मृतियों को
वे धुनें बहती रहती जो प्रपात सी निरन्तर
और वे गीत जिनमे शब्दों से ज़्यादा खामोशियां…

उन्हें बेहद अफ़सोस
विगत के उच्छिष्टों से
असुविधाजनक शक्लोसूरत वाले उन तमाम लोगों के लिये
मनुष्य तो हो ही नहीं सकते थे वे उभयचर
थोड़ी दया, थोड़ी घृणा और थोड़े संताप के साथ
आदिवासी कहते उन्हें …
उनके हंसने के लिये नहीं कोई बिंब
रोने के लिये शब्द एक पथरीला – अरण्यरोदन

इतना आसान नहीं था पहुंचना उन तक
सूरज की नीम नंगी रोशनी में
हज़ारों प्रकाशवर्ष की दूरियां तय कर
गुज़रकर इतने पथरीले रास्तों से
लांघकर अनगिनत नदियां,जंगल,पहाड़
और समय के समंदर सात …

हनुमान की तरह हर बार हमारे ही कांधे थे
जब-जब द्रोणगिरियों से ढ़ूंढ़ने निकले वे अपनी संजीवनी…



(पाँच )

अब ऐसा भी नहीं
कि बस स्वप्न ही देखते रहे हम
रात के किसी अनन्त विस्तार सा नहीं हमारा अतीत
उजालों के कई सुनहरे पड़ाव इस लम्बी यात्रा में
वर्जित प्रदेशों में बिखरे पदचिन्ह तमाम
हार और जीत के बीच अनगिनत शामें धूसर
निराशा के अखण्ड रेगिस्तानों में कविताओं के नखलिस्तान तमाम
तमाम सबक और हज़ार किस्से संघर्ष के

और यह भी नहीं कि बस अरण्यरोदन तक सीमित उनका प्रतिकार
उस अलिखित इतिहास में बहुत कुछ
मोर, मणि और वनदेवी के अतिरिक्त
सिर्फ़ ईंधन के लिये नहीं उठीं उनकी कुल्हाड़ियां
हाँ … नहीं निकले जंगलों से बाहर छीनने किसी का राज्य
किसी पर्वत की कोई मणि नहीं सजाई अपने माथे पर
शामिल नहीं हुए लोभ की किसी होड़ में
किसी पुरस्कार की लालसा में नहीं गाये गीत
इसीलिये नहीं शायद सतरंगा उनका इतिहास…

हर पुस्तक से बहिष्कृत उनके नायक
राजपथों पर कहीं नहीं उनकी मूर्ति
साबरमती के संत की चमत्कार कथाओं की
पाद टिप्पणियों में भी नहीं कोई बिरसा मुण्डा
किसी प्रातः स्मरण में ज़िक्र नहीं टट्या भील का
जन्म शताब्दियों की सूची में नहीं शामिल कोई सिधू-कान्हू

बस विकास के हर नये मंदिर की आहुति में घायल
उनकी शिराओं में क़ैद हैं वो स्मृतियां
उन गीतों के बीच जो ख़ामोशियां हैं
उनमें पैबस्त हैं इतिहास के वे रौशन किस्से
उनके हिस्से की विजय का अत्यल्प उल्लास
और पराजय के अनन्त बियाबान…

इतिहास है कि छोड़ता ही नहीं उनका पीछा
बैताल की तरह फिर-फिर आ बैठता उन चोटिल पीठों पर
सदियों से भोग रहे एक असमाप्त विस्थापन ऐसे ही उदास कदमों से
थकन जैसे रक्त की तरह बह रही शिराओं में
क्रोध जैसे स्वप्न की तरह होता जा रहा आंखों से दूर

पर अकेले ही नहीं लौटते ये सब
कोई बिरसा भी लौट आता इनके साथ हर बार

और यहीं से शुरु होता उनकी असुविधाओं का सिलसिला
यहीं से बदलने लगती उनकी कुल्हाड़ियों की भाषा
यहीं से बदलने लगती उनके नृत्य की ताल
गीत यहीं से बनने लगते हुंकार
और नैराश्य के गहन अंधकार से निकल
उन हुंकारों में मिलाता अपना अविनाशी स्वर
यहीं से निकल पड़ता एक महायात्रा पर हर बार
हमारी मूर्छित चेतना का कसमसाता पांव

यहीं से सौजन्यतायें क्रूरता में बदल जातीं
और अनजान गांवों के नाम बन जाते इतिहास के प्रतिआख्यान!


(छः)

यह पहला दशक है इक्कीसवीं सदी का
एक सलोने राजकुमार की स्वप्नसदी का पहला दशक
इतिहासग्रस्त धर्मध्वजाधारियों की स्वप्नसदी का पहला दशक
पहला दशक एक धुरी पर घूमते भूमण्डलीय गांव का
सबके पास हैं अपने-अपने हिस्से के स्वप्न
स्वप्नों के प्राणांतक बोझ से कराहती सदी का पहला दशक

हर तरफ़ एक परिचित सा शोर
‘पहले जैसी नहीं रही दुनिया’
हर तरफ़ फैली हुई विभाजक रेखायें
‘हमारे साथ या हमारे ख़िलाफ़’
युद्ध का उन्माद और बहाने हज़ार
इराक, इरान, लोकतंत्र या कि दंतेवाड़ा

हर तरफ़ एक परिचित सा शोर
मारे जायेंगे वे जिनके हाथों में हथियार
मारे जायेंगे अब तक बची जिनकी कलमों में धार
मारे जायेंगे इस शांतिकाल में उठेगी जिनकी आवाज़
मारे जायेंगे वे सब जो इन सामूहिक स्वप्नों के ख़िलाफ़

और इस शोर के बीच उस जंगल में
नुचे पंखों वाला उदास मोर बरसात में जा छिपता किसी ठूंठ की आड़ में
फौज़ी छावनी में नाचती वनदेवी निर्वस्त्र
खेत रौंदे हुए हत्यारे बूटों से
पेड़ों पर नहीं फुनगी एक
नदियों में बहता रक्त लाल-लाल
दोनों किनारों पर सड़ रही लाशें तमाम
चारों तरफ़ हड्डियों के… खालों के सौदागरों का हुजूम
किसी तलहटी की ओट में डरा-सहमा चांद
और एक अंधकार विकराल चारों ओर
रह-रह कर गूंजतीं गोलियों की आवाज़
और कर्णभेदी चीत्कार

मणि उस जगमगाते कमरे के बीचोबीच सजी विशाल गोलमेज पर
चिल्ल पों, खींच तान ,शोर… ख़ूब शोर… हर ओर
देखता चुपचाप दीवार पर टंगा मोर
पौधा बालकनी का हिलता प्रतिकार में…

(चित्र: पाब्लो पिकासो की विख्यात पेन्टिंग ’गुएर्निका’)

Tuesday, June 15, 2010

सारे पेड़ भागते हैं मेरे पीछे नंगे पांव ...

आज सुबह आपने निज़ार क़ब्बानी की कुछ छोटी छोटी प्रेम कविताएं पढ़ीं. उसी क्रम को बढ़ाते हुए अब पेश हैं इसी कवि की प्रेम कविताओं की अगली किस्त. मैं उम्मीद करता हूं यह इन प्रेम कविताओं की आख़िरी किस्त नहीं होगी.



भाषा

जब आदमी प्यार करता है
कैसे इस्तेमाल कर सकता है वह पुराने शब्दों का?
क्या अपने प्रेमी को चाहने वाली स्त्री को
व्याकरणविदों और भाषाशास्त्रियों के साथ लेटना होगा?

जिस स्त्री से मैंने प्रेम किया
उस से कुछ नहीं कहा मैंने
सिवाय इसके
प्रेम के सारे विशेषणों को
एक सूटकेस में भरकर
मैं हर भाषा से दूर भाग आया

प्रेम की तुलना

मैं तुम्हारे बाक़ी प्रेमियों जैसा नहीं दीखता, प्यारी!
अगर उनमें से कोई तुम्हें एक बादल देगा
तो मैं दूंगा बारिश
अगर वह तुम्हें लालटेन देगा
मैं तुम्हें चन्द्रमा दूंगा
अगर वह तुम्हें एक टहनी देगा
मैं तुम्हें दूंगा पेड़
और अगर वह तुम्हें एक जहाज़ देगा पानी का
तो मैं तुम्हें यात्रा दूंगा.

जब मैं प्यार करता हूं

जब मैं प्यार करता हूं
मुझे लगता है मैं बादशाह हूं समय का
मैं धरती और इस पर की हर चीज़ का मालिक
और अपने घोड़े पर सवार होकर जाता हूं सूरज के भीतर

जब मैं प्यार करता हूं
मैं बन जाता हूं पानीदार रोशनी
जिसे आंखें नहीं देख सकतीं
और मेरी नोटबुक में कविताएं बन जाती हैं
छुईमुई और पोस्ते के खेत.

जब मैं प्यार करता हूं
पानी फूट पड़ता है मेरे हाथों से
घास उगती है मेरी जीभ पर
जब मैं प्यार करता हूं
मैं बन जाता हूं सारे समय से परे समय

जब मैं प्यार करता हूं एक स्त्री से
सारे पेड़
भागते हैं मेरे पीछे नंगे पांव ...

लालटेन से ज़्यादा ज़रूरी होती है रोशनी

अरबी मूल के कवि निज़ार क़ब्बानी की कविताओं से सिद्धेश्वर सिंह पहले ही आपका परिचय करवा चुके हैं. एक पत्रिका के प्रेम-कविता विशेषांक के लिए कविताएं चुनते और अनुवाद करते हुए मेरी निगाह इसी शायर की चन्द छोटी-छोटी प्रेम कविताओं पर पड़ी. तुरन्त अनुवाद करने का मन हुआ.

पेश हैं:



१. जब भी तुम्हें चूमता हूं


जब भी तुम्हें चूमता हूं
किसी लम्बे बिछोह के बाद
मुझे महसूस होता है
मैं डाल रहा हूं एक लाल पोस्टबॉक्स में
जल्दीबाज़ी में लिखा गया एक प्रेम पत्र.

२. लालटेन से ज़्यादा ज़रूरी होती है रोशनी


लालटेन से ज़्यादा ज़रूरी होती है रोशनी
कविता ज़्यादा ज़रूरी नोटबुक से
और चुम्बन ज़्यादा ज़रूरी होंठों से.
तुम्हें लिखे मेरे ख़त
हम दोनों से बड़े और ज़्यादा ज़रूरी हैं
सिर्फ़ वही हैं वे दस्तावेज़
जिनमें लोग खोजेंगे
तुम्हारी खूबसूरती
और मेरा पागलपन.

३. मेरी प्यारी!

मेरी प्यारी!
अगर तुम होतीं पागलपन के मेरे स्तर पर
तुम फेंक देतीं अपने सारे आभूषण
बेच देतीं अपने सारे कंगन
और सो जाती मेरी आंखों में

४. मेरी प्रेमिका पूछती है

मेरी प्रेमिका पूछती है मुझसे:
"क्या फ़र्क़ है आसमान में और मुझ में?"
फ़र्क़, मेरी प्यारी,
यह है कि जब हंसती हो तुम
मैं भूल जाता हूं आसमान के बारे में.

५. गर्मियों में

गर्मियों में
मैं पसर जाता हूं समुद्र किनारे
और तुम्हारे बारे में सोचता हूं
अगर मैंने समुद्र को बता दिया होता
जो मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूं
उसने छोड़ देना था अपने किनारों को
अपनी सीपियों को
अपनी मछलियों को
और आ जाना था मेरे पीछे पीछे


(मशहूर ऑस्ट्रियाई पेन्टर गुस्ताव क्लिम्ट की सबसे विख्यात रचना ’द किस’ का एक हिस्सा)

Saturday, June 12, 2010

धूप में पेड़ भर छाँव , प्यास में घूँट भर जल

'वे जो लकड़हारे नहीं हैं' सुरेश सेन निशान्त की कविताओं का संग्रह है जो अंतिका प्रकाशन से इसी साल २०१० में आया है. निशान्त की कविताओं की सहजता ने हिन्दी कविता के एक बड़े हिस्से  को ओर अपनी ओर खींचा है.उनकी कविताओं की दुनिया में कोई 'दूसरा' संसार नहीं बल्कि अपना 'लोक' है और उनके शिल्प में कारीगरी -कताई - बुनाई की अपेक्षा सीधी - सादी - सरल कहन है. आज इसी संग्रह से साभार प्रस्तुत हैं दो कविताये :

  


मैं क्या ग़लत करता हूँ

मैं क्या ग़लत करता हूँ
एक कवि से माँगता हूँ
उसका ईमानदारी भरा दिल.

एक फूल से चाहता हूँ
उसकी प्यार भरी गंध.

नदी के जल के पास रखता हूँ
मछलियों के संग
तैरने की इच्छा.

मैं क्या ग़लत करता हूँ
पत्नी की आँखों में ढूँढता हूँ
खोई हुई प्रेम भरी
चिठ्ठियों का मजमून.

बच्चों में ढूँढता हूँ
भविष्य के रास्तों की गंध.

स्वर्ग सिधारे पुरखों से
माँगता हूँ
धरती के चेहरे पे फैली
बिवाइयों के लिए माफी.

मैं क्या ग़लत करता हूँ
जो कविता से माँगता हूँ
अंधेरे में कंदील भर रोशनी
धूप में पेड़ भर छाँव
प्यास में घूँट भर जल.

***

कविता

कविता वहीं से करती है
हमारे संग सफ़र शुरू
जहाँ से लौट जाते हैं
बचपन के अभिन्न दोस्त
अपनी - अपनी दुनिया में.

जहाँ से माँ करती है हमें
दूर देश के लिए विदा.

जिस मोड़ पर
अपनी उँगली छुड़ाकर
अकेले चलने के लिए
कहते हैं पिता.

ठीक वहीं से करती है
हमारे संग कविता
अपना सफ़र शुरू.

Thursday, June 10, 2010

रोहतांग : कुछ छवियाँ

पूरे सत्रह दिन की हाड़तोड़ यात्रा के बाद कल अपने बसेरे पर लौटा हूँ. २३ मई की सुबह घर से निकलना हुआ था और ९ जून की सुबह फिर से अपने द्वार पर. यह एक अध्ययन- यात्रा तो थी ही,  विशुद्ध घुमक्कड़ी और आत्मीय पारिवारिक प्रसंग भी इससे जुड़ा हुआ था. इस बीच प्रकृति के तरह - तरह के रंग देखने को मिले. धूप , तपन, उमस , बारिश, बर्फ़बारी के बीच जहाँ एक ओर मैदानी इलाकों की आपाधापी देखी वहीं दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश के ऊपरी क्षेत्र में हिम और हिमानी से साक्षात्कार भी हुआ. इन दिनों में अख़बार ,टीवी, रेडियो,इंटरनेट, कंप्यूटर से दूर रहने का अलग ही आनंद था.स्मृतियों में ढेर सारा 'कबाड़' इकठ्ठा कर लौटा हूँ.इसमें से कुछ - कुछ धीरे - धीरे बाहर आएगा और शब्दों की शक्ल लेगा. अभी तो यात्रा की थकन उतारने के क्रम में केलंग से वापस लौटते हुए ३० मई की शाम को रोहतांग दर्रे को पार करते हुए मोबाइल से खींची कुछ छवियाँ प्रस्तुत हैं. अब ये छवियाँ जैसी भी है लेकिन आज पंखे के नीचे बैठकर इन्हें देखकर तरावट महसूस हो रही है. देखें आपको कैसा लगता है ! खैर..










वैष्णव जन

(कई दिनों से कबाड़खाना पर कोई माल नहीं आया … तो लीजिये पढ़िये अंशु मालवीय की एक कविता उसके संकलन दक्खिन टोला से)

वैष्णव जन
आखेट पर निकले हैं!
उनके एक हाथ में मोबाइल है
दूसरे में देशी कट्टा
तीसरे में बम
और चौथे में है दुश्‍मनों की लिस्‍ट.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
वे अरण्‍य में अनुशासन लाएंगे
एक वर्दी में मार्च करते
एक किस्म के पेड़ रहेंगे यहां.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
वैष्‍णव जन सांप के गद्दे पर लेटे हैं
लक्ष्‍मी पैर दबा रही हैं उनका
मौक़े पर आंख मूंद लेते हैं ब्रह्मा
कमल पर जो बैठे हैं.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
जो वैष्‍णव नहीं होंगे
शिकार हो जाएंगे ...
देखो क्षीरसागर की तलहटी में
नरसी की लाश सड़ रही है.

Tuesday, June 1, 2010

याद पिया की आए



उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान (१९०२ –२५ अप्रैल १९६८) पटियाला घराने की शान थे. उनकी गायकी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई बुलन्दियों तक पहुंचाया था.

अपने गायन में खान साहेब ने अपनी जन्मभूमि कसूर - पटियाला घराने की मौसीक़ी में ध्रुपद अंग को तो आत्मसात किया ही, जयपुर और ग्वालियर घरानों की विशेषताओं को भी उसका हिस्सा बनाया.

विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए लेकिन जल्द ही लौटकर वापस आ गए. बताते हैं कि वे कहा करते थे - "अगर हर खानदान में एक बच्चे को भारतीय शास्त्रीय संगीत सिखाया गया होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन कभी न होता."

ठुमरी नामक विधा, ऐसा लगता है कि उस्ताद के लिए ही बनाई गई थी. उनकी गाई एक ठुमरी है हरि ओम तत्सत. इसके साथ एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है. किसी एक समारोह में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने ख़ानसाहेब के बाद गाना था. जब पंडिज्जी समारोह में पहुंचे तो उन्होंने खानसाहेब को गाते हुए देखा. इस बारे में उन्हें पहले नहीं बताया गया था. तनिक गुस्साए पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने यह कहते हुए वापस जाना शुरू किया किया कि वे किसी मुसलमान गवैये के साथ एक ही मंच पर नहीं गा सकते. खानसाहेब ने तुरन्त हरि ओम तत्सत गाना शुरू किया और बताया जाता है कि पंडिज्जी पूरे समय उन्हें सुनते रहे और बाद में उस्ताद के गले लग कर उनसे अपनी हरकत के लिए माफ़ी भी मांगी.

पहले यूट्यूब पर सुनिये हरि ओम तत्सत:



जिन दो ठुमरियों ने उस्ताद को बहुत बहुत ज़्यादा शोहरत दिलाई वे थीं याद पिया की आए और का करूं सजनी. खास तौर पर याद पिया की आए गाते समय वे जिस नाज़ुकी के साथ शब्दों को आकार देते हैं, वह उल्लेखनीय है. ऐसा लगता है कि वाकई कोई बिरहन अपने पिया को बेतरह याद कर रही है. यह ठुमरी उनकी गायकी का प्रतिनिधित्व करती है. पेश हैं ये दोनों अलौकिक रचनाएं -



(यूट्यूब का सहारा इस लिए लेना पड़ रहा है कि मेरे पास ये दोनों ठुमरियां .flac फ़ॉर्मैट में हैं और उन्हें मैं divshare पर अपलोड तो कर चुका हूं मगर वहां एम्बैड करने का विकल्प नहीं आ रहा. आप चाहें तो उन्हें डाउनलोड ज़रूर कर सकते हैं. डाउनलोड लिंक्स ये रहे - http://www.divshare.com/download/11553452-2d1 और http://www.divshare.com/download/11553451-b7d)