अभी कुछ दिन पहले आपने संजय चतुर्वेदी की कविता 'दर्दपुर' पर चुप्पी देखकर> पढ़ी थी. इस कविता में कश्मीरी कवयित्री क्षमा कौल के उपन्यास दर्दपुर का हवाला देते हुए हिन्दी आलोचना की पोल खोली गई थी. क्षमा कौल ने कविताएं भी लिखी हैं और उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं - बादलों में आग और समय के बाद.
आज आपको इस कवयित्री की एक कविता पढ़वाता हूं -
बरास्ते
बरास्ते माँ की कोख
मैं आई इस गली
उस गली में थी पुरुष
यहाँ स्त्री हूँ
वहाँ थी मुसलमान
यहाँ हिन्दु हूँ
वहाँ कल जो मातम हुआ मेरी मृत्यु का
सो यहाँ कोई खुशी न हुई
मेरे जनम की !
तो जिनाब !
बरास्ते मातृभूमि
मैं आई हूँ इस शहर में
यहाँ मुर्दा हूँ
वहीं थी जिन्दा
मैं यहाँ काफिर हूँ
बरास्ते यहाँ
मैं वापस जा रही हूँ जिनाब
उस गली
जहाँ होंगी फिर खुशियाँ
मेरे होने की
बेहतरीन !
ReplyDeleteजहाँ होंगी फिर खुशियाँ
ReplyDeleteमेरे होने की massom si khvahish...sunder rachana..
संवेदनशील कविता।
ReplyDeleteआदमी अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुसार ही जाना पहचाना जाता है। चाहे जिस रास्ते से चलकर आये। उसकी जात जरूर पूछी जाती है।
ReplyDeleteक्षमा जी बेहद श्रेष्ठ लेखिका हैं और कश्मीर का दर्द जो उनके बसा है उसकी अभिव्यक्ति तो बेमिसाल है।
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