Monday, January 31, 2011

गट्टू भाई की नजर



गट्टू भाई अभी काहिरा हवाई अड्डे के बाहर मिल गए बैठने के लिए इतने बवाल के बीच पिरामिड बुक कराने आए थे।

न जाने कहां से आ या जा रहे थे वही जाने। वे जो कहते हैं मान लेता हूं क्योंकि वे समान्तर दुनिया के बाशिन्दे हैं जो इस दुनिया से कम असली नहीं है।

मैं उनसे कभी मिला नहीं लेकिन देखते आंखों से पहचान गया। पता ही होगा कि किसी की बात बहुत अचरज भरे ध्यान से सुनी जाती है तो उसकी आंखों में खिंचाव आ जाता है और वे बाहर की तरफ लटक आती हैं। अच्छा! ..हां!!! अब समझे तो हां आंखों से गट्टू भाई को पहचान गया। हमारे पुराणों में आंखे तो सुंदरी को देख के खिंचती हुई घुटनों तक आती पाई गई हैं। बाद में वही सुंदरी विरह में सांस के धक्कों से कई योजन फारवर्ड-बैकवर्ड मूवमेन्ट में दोलायमान पाई जाती है।

दुआ सलाम के बाद गट्टू भाई ने बताया कि उन्हें भारत सरकार सबसे अधिक उपभोक्ताओं को जागरूक करने के वास्ते भारत रत्न देने वाली है। किस खुशी में, तो बोले कि दारू की बोतल को कई साल देखके हैरान होने के वास्ते। आपकी हैरानी से भारत रत्न का क्या लेना देना होगा भाई साब तो बोले, जे ल्लो इस दुनिया में कुछ भी हैरानी से ही पैदा होता है। जे भारत रतन भला किस खेत की मूली हुआ।

अभी हाल के हाल फ्लाइट में पोन्टी चड्ढा और विजय माल्या मिल गे। पोन्टी तो अपने ह्यां का ठैरा। उसे तो मैं पैचान गया क्योंकि वो कमाए चाहे जितना लेकिन गिन नहीं सकता। और मालिया से उनने मिलवा दिया के जे अपने उत्तराखंड के ठाकुर साब हुए, बगैर इनके सपोट के तेरी ब्रेवरी चल नी सकती।

मैंने कई कि दोनों पढ़े लिखे लगते हो सबसे पैले जे बताओ कि एक लीटर में कितनी बूंदे अटा करे हैं। माल्या ने दाढ़ी पे हाथ फेर के कई कि ठाकुर साब, इतना महीन पीसना तो कभी हुआ नीं लेकिन समझ लो कि आजकल एक लीटर में हजार मिलीलीटर का आंकड़ा पूरे बल्ड में चल रहा हैगा। मैने पूछी के आधा लीटर में उनने कई के पान सौ मिलीलीटर। क्वाटर में उनने कई के यही कोई दो सौ पचास मिलीलीटर।

मेरा पारा थरमामीटर ऊपर। तब मैने कई के बौब्लेन्डर के दुस्मनों जे बताओ के फुल में सातसोपचास, अद्धी में तीनसोसाठ और पौव्वे में सिरफ एकसोअस्सी देके किसे चूतिया बना रै तुम एक जमाने से।

व्हईं बैठा एक उब्भोक्ता मामले सुलटाने वाला एक कानदार मंत्री हमारी बात सुन रिया था, उनने मेरा नाम पूछा तो हमने कहा पोन्टी बता देगा और उनने मोबाइल मिला के राष्टरपति के ह्वां सिपारिश कर दी।
मंत्री ने अपना कार्ड भी दिया था लेकिन उसके आगे ही खिड़की के बाहर हवा में पारसल कर दिया। जो सरकार खुद ही इतने दिनों से घटतोली करा रई हो उसके हाथ से रतन-वतन क्या लेना।

फारम हाउस पर अईयो पाल्टी करेंगे। उन्होंने चलते-चलते कहा, असोक भाई के दोस्त हो आना लगे हाथ बाघ की खाल भी दिखा देंगे जो लोटे का पानी छलक जाने से जरा और घैरी कलर की हो गई है।

गट्टू भाई का सांप



कल एक दोस्त की दुकान के उद्घाटन में बहुत दिनों बाद गट्टू भाई से मुलाकात हुई.

गट्टू भाई हद दर्जे के गपोड़ी हैं. और मुझे उनका साथ अच्छा लगता है. दारू पीते हैं तो उनका तकिया कलाम "ज़रा बनइयो एक बौव्लेंडर बेटे" होता है. बताता चलूँ की जनाब बौव्लेंडर का पूरा नाम फ्लोरिस फौन बौव्लेंडर था. ये साहब हौलैंड के नामी हॉकी खिलाडी थे और उनके पेनाल्टी कॉर्नर पर गोल ठोकने की विशेषज्ञता के कारण समूचा हॉकी जगत कोई डेढ़ दशक तक खौफ में रहा था. भारत के खिलाफ एक ओलिम्पिक मैच में उन्होंने हमारी खाल में खासा भुस भरा था. गट्टू भाई एक ज़माने में हॉकी खेलते थे ऐसा मैंने सुना है. बौव्लेंडर द्वारा भारत को ध्वस्त किये जाने के बाद से ही गट्टू भाई इस खिलाड़ी के ऐसे फैन बने कि पीते ही टल्ली बना देने वाले अचूक पैग का नामकरण उसके नाम पर कर दिया. यानी जिस तरह पेनाल्टी कॉर्नर मिलते ही बौव्लेंडर सीधे गोल ठोक दिया करता था उसी भांति पहला पैग पीते ही आदमी को टुन्नावस्था तक पहुँच जाने का सद्प्रयास करना चाहिए.

खैर.

गट्टू भाई बढ़िया टैट थे. और गप्प मरने के मूड में भी.

गट्टू भाई द्वारा उनके फार्म हाउस में पानी से भरे लोटे से बाघ को मार देने का किस्सा हल्द्वानी शहर के अधिकाँश लोगों को मालूम है. बात कब उनके फार्म हाउस पर पहुंची मुझे याद नहीं पर उस के बाद उन्होंने जो गप्प मारी वो उन्ही की ज़बानी पेश करता हूँ,

अशोक भाई परसों फारम पे गया था. दिन में एक संपेरा घर के भार आ के तमाशा दिखने लगा. संपेरा बीन बजाये और सांप नाचा करें. आठ दस डलिया में से सांप लिकाल्लिये उन्ने और सारे के सारों के फन हिलवा हिलवा के डांस करवाने लगा. एक सांप तो मिथुन चक्कर्बरती से भी बढ़िया डिस्को कर रया था. बड़ी मौज का समां बन्निया था जब मेरे एक नौकर ने पीछे से कान में आके कुछ कया.

संपेरा बोरी में एक डलिया छुपा के बैठा हुआ था. मैंने उस से कई की बेटे जे डलिया का सांप भी भार लिकाल तो बो बोला कि ठाकुर साब जे सांप बीमार चल्लिया आज कल. मैंने कई कि ढक्कन तो खोल. बिचारे को भी हवा पानी खान दे. तो साब उन्ने बड़ी मान मनव्वल के बाद जो डलिया का ढक्कन खोला तो एक धाँसू टैप का सांप अपनी मुंडी भार कर के मुझे देखने लगा. मैंने दिमाग पे जोर डाला तो याद आया की जे सांप तो जाना - पैचाना दिक्खे. मैंने नौकर से पूछी के बेटे ज़रा देख के बतइयो तो. नौकर तुरंत पैचान गया. बोला के मालिक जे तो अपना नीम के पेड़ के नीचे रेने वाला सांप हैगा.

मैंने फिर देखा तो वो सांप अशोक भाई बोई था. मैंने थामी ससुरे संपेरे कि गर्दन और पिछाड़ी पे दी दो लात कि साले हमारे फारम का सांप हमेंई दिखा रया. अपने फारम के एक एक सांप को जाना करूं मैं. जा दूकान से दूध की थैली ला एक. कितना दुबला बना दिया तैने इसे साले. और खबरदार जो हमारे फारम के एक भी सांप पे आगे से निगाह डाली तो ... और दूध पिला के इस बच्चे को व्हंई छोड़ के आईयो फ़ौरन से जल्दी ...


... इस के आगे का किस्सा आप अपने आप गढ़ सकते हैं क्यूंकि इस के बाद कि डिटेल्स मुझे याद नहीं रही. ऐसी बौव्लेंडर गप्प सुन चुकने के बाद होश में रह पाना नामुमकिन होता है.

पुनश्च: गट्टू भाई चरस के नियमित सेवन पर बहुत जोर देते हैं. अगर कभी कोई बढ़िया क्वालिटी का माल उन तक पहुँचता है तो मुझे फ़ोन कर के न्यौतना नहीं भूलते कि "अशोक भाई सांप के बांये कान के नीचे का बौफ्फाइन माल आया है. स्याम को आ जाओ अड्डे पे."

Friday, January 28, 2011

पूछो सूरज से क्या वह आएगा



श्श्श्श्श्श्श्श्श्श................. यह चन्द्र भागा नदी है। कभी इस के किनारे किन्नर रहते थे...........आज कल इस नदी मे शीत सो रहा है. .............

अभी सात दिन और सोया रहेगा ...... ५ फरवरी तक लाहुल में सब से ठन्डे दिन होते है ।यह फोटो मुझे छोटे भाई दिनेश से प्राप्त हुआ. कल वे लोग सामने दिख रहे पीर पंजाल की तलहटी में स्कींईग के लिए गए थे. इस ठण्ड मे अपनी एक पुरानी कविता याद आ रही है :




ठिठुरते मौसम की धार
छील छील ले जाती है त्वचाएं
बींधती हुई पेशियां
गड़ जाती हिड्डयों मे
छू लेती मज्जा को
स्नायुओं से गुज़रती हई
झनझना दे रही तुम्हें आत्मा तक...................

सूरज से पूछो, कहां छिपा बैठा है

बर्फ हो रही संवेदनाएं
अकड़ रहे शब्द
कंपकपाते भाव
नदियां चुप और पहाड़ हैं स्थिर!

कूदो
अंधेरे कुहासों में
खींच लाओ बाहर
गरमाहट का वह लाल-लाल गोला

पूछो उससे, क्यों छोड़ दिया चमकना

जम रही हैं सारी ऋचाएं
जो उसके सम्मान में रची गई
तुम्हारी छाती में
कि टपकेंगी आंखों से
जब पिघलेगी
जब हालात बनेंगे पिघलने के

कहो उससे, तेरी छाती में उतर आए!

छाती में उतर आए
कि लिख सको एक दहकती हुई चीख
कि चटकने लगे सन्नाटों के बर्फ
टूट जाए कड़ाके की नीन्द
जाग जाए लिहाफों में सिकुड़ते सपने
और मौसम ठिठुरना छोड़
तुम्हारे आस पास बहने लगे
कल-कल
गुनगुना पानी बनकर

पूछो उससे क्या वह आएगा ?

Thursday, January 27, 2011

ओसियां



जोधपुर से करीब साठ ही किलोमीटर का फासला है ओसियां कस्बे का, पर अभी कुछ दिनों पहले ही पहली बार वहाँ जाने का अवसर मिला. क़स्बा पुराना है ये पहले से ही जानता था और उसमें पहुँचने पर कोई भी, इन दिनों चल पड़े मुहावरे का सहारा लूँ तो, बिना रॉकेट साइंस पढ़े भी, कह सकता है कि जगह काफी क़दीम है. यहाँ जैन तीर्थ यात्री ख़ूब आते है. हिन्दुस्तान के कई हिस्सों में बरसों से अपना ठिकाना किये मारवाड़ी जैन भी. और इसका असर देखिये, जोधपुर से ओसियां के रास्ते पर बना एक मशहूर ढाबा ' शेरे पंजाब ' से 'शुद्ध वैष्णव' हो गया.

ओसियां कस्बे में ख़ास मारवाड़ी सूखे साग की हर चप्पे पर दुकानें है जो 'देस' से बाहर बसे मारवाड़ियों को तेज़ धूप में सुखाई गयी देसी सब्जियों का स्वाद बेचने के लिए खुली रहती है. सांगरी, कैर, कूमटा, काचरा जैसी सूखी सब्जियां कई महीनों तक खराब नहीं होती. ये अलग बात है कि आज मारवाड़ के शहरों में भी ये रोज़मर्रा की बात न होकर कौतुहल के बायस बरती जाने वाली वस्तुएँ हो गयी हैं. खैर.

कई पुराने मंदिरों की जर्जर देह धारे ये गाँव एक आम श्रद्धालु के लिए आज सच्चियाय माता मंदिर और जैन मंदिर के लिए ज़्यादा जाना जाता है. इन दिनों कुछ सैलानी यहाँ के रेतीले टीले और उस पर ऊँट सवारी के आनंद के लिए भी आते हैं.

तो देखें, ओसियां के चित्रों की एक झांकी. मेरी ख़ास कोशिश इनके ज़रिये आपको ये दिखाने की है कि किस तरह पुराने मंदिरों में, जीर्णोद्धार के बहाने,पुराने और नए वक्त के टुकड़ों को जोड़ने की बेढंगी कोशिश की जाती है.

Wednesday, January 26, 2011

कबीर-गायन के शिखर टिपानियाजी को पद्मश्री






आज पूरा मालवा का मन-मयूर आनंद से थिरक रहा है ! हाँ हुज़ूर ये पल और समाचार ही कुछ ऐसा है जिस पर मन का तंबूरा ख़ुशी से झनझना गया है.हमारे अपने लोकगीत गायक प्रहलादसिंह टिपानिया का नाम नागरिक अलंकरणों की उस सूची में शुमार है जो आज गणतंत्र-दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भवन से जारी हुई है. उज्जैन ज़िले के ग्राम लूनियाखेड़ी का लाल प्रहलादसिंह टिपानिया जिसने पिछले पच्चीस बरस में कबीरी पदों का जादू पूरी दुनिया में जगाया है अब पद्मश्री प्रहलादसिंह टिपानिया कहलाएंगे.म.प्र.के शिखर सम्मान और संगीत नाटक अकादमी के सम्मान से नवाज़े जाने के बाद प्रहलादसिंहजी ज़िन्दगी का यह अनमोल अलंकरण है. यूँ वे जिस कबीरी तबियत और फ़क्कड़पन में जीते हैं;उन्हें इन सम्मानों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. जब उनसे मैंने बात की तो बोले दादा यो म्हारो नीं आखा माळवा को सम्मान हे. और साँची कूँ म्हारे कबीर नी मिलता तो म्हने कूँण पूछतो....तो यो कबीरदासजी को सम्मान पेलाँ हे,म्हारों बाद में. (ये मेरा नहीं पूरे मालवा का सम्मान है.और सच कहूँ ? मुझे कबीर नहीं मिलते तो मुझे कौन पूछता,ये सम्मान कबीर के नाम पहले है,मेरे नाम बाद में) मैंने जब पूछा कि आपने गाने की तरबियत किससे पाई तो पहलादसिंह जी ने विनम्रता से कहा कि “सब काहू से लीजिये;साँचा शब्द निहार” मैंने हर अच्छी शैली से कुछ न कुछ पाया है और उसमें सचाई के शब्दों की थाह पाने की कोशिश की है. पूरी दुनिया जानती है कि प्रहलादसिंह टिपानिया नाम के गुदड़ी के लाल और कबीर पर स्टेनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की शोधार्थी लिंडा हैस लगातार काम कर रही है और इस मालवी पूत को अमेरिका भी आमंत्रित कर चुकीं है. बैंगलोर की शबनम विरमणी का कबीर फ़ाउण्डेशन प्रहलादसिंह टिपानिया के काम का दस्तावेज़ीकरण कर उसे विस्तार देने में ख़ासी मशक़्कत कर रहा है. प्रहलादसिंहजी की इस क़ामयाबी में मालवा हाउस (आकाशवाणी इन्दौर ) का भी बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि ग्रामीण परिवेश के इस खाँटी गायक की रचनाओं को सबसे पहले पूरे मध्यप्रदेश की गाँव-गलियों में प्रचारित करने का काम उसी ने किया है. राग-रागिनियों की तालीम और शास्त्र से परे प्रहलाद दादा का काम ख़ालिस रूप से रूहानी है और उसमें मालवा के गाड़ी-गड़ारों से उड़ती धूल की आत्मीय ख़ुशबू आन समाई है. वे कहते हैं कबीर का राग तो बेराग है उसमें उन सारी कुरीतियों पर कुठाराघात है जो बुराई से अच्छाई की ओर ले जाती है. कबीरी गायन का मतलब ही है हद के बाहर जाकर गाना...हद में बंधा वह कबीरी छाप वाला नहीं.बनारस के कबीरचौरा से मालवा के ओटलों पर कबीरी जाजम बिछाने वाले प्रहलादसिंह टिपानिया ने मालवी लोक-संगीत की धजा को आज वाक़ई जगमग दे दी है.

हाँ ये भी बताना मुनासिब होगा कि इस आलेख के साथ जारी तस्वीर जानेमाने छायाकार तनवीर फ़ारूक़ी की खींची हुई है. कबाड़ख़ाना पर जारी करने की इजाज़त देने के लिये तनवीर भाई का शुक्रिया.

परम पद पा गया वह पहाड़ी स्वर !




कुछ सुरों की ताब श्रोता के मानस में ऐसा घर कर लेती है कि वह सामने हो न हो कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता.किराना घराने के शीर्षस्थ स्वर साधक पं.भीमसेन जोशी ने पिछले पचास बरसों में कुछ ऐसी ही मुकम्मिल जगह बना ली थी. वे शरीरी लोक के बाहर के वासी हो गये थे और पुरी दुनिया में फ़ैले उनके मुरीदों की संख्या शायद उनके परिजनों से कहीं अधिक और लाखों में थी. पहाड़ी आवाज़ के धनी पं.भीमसेन जोशी की क़ामयाबी का सिलसिला कुछ देरी से शुरू हुआ क्योंकि जिस कालखण्ड में वे युवा थे उस समय कई दिग्गज स्वर परिदृश्य पर सक्रिय थे. ख़ुद उनके घराने की हीराबाई बड़ोदेकर और गंगूबाई हंगल महफ़िलों की शान बढ़ा रहीं थीं और पं.ओंकारनाथ ठाकुर,उस्ताद अमीर ख़ाँ,उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ,उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ,पं.विनायकराव पटवर्धन जैसी आवाज़ों का जलवा सर्वत्र मौजूद था. भीमसेनजी के करियर का फ़ैलाव भी कुछ वैसे विलम्बित गति में ही हुआ जैसी कि उनकी गायकी का होता रहा है. लेकिन जैसे ही वे उसकी गायकी लय पा लेती थी वैसे ही भीमसेनजी की शख़्सियत का पाया भी गढ़ता गया.ख़रामा-ख़रामा पं.भीमसेन जोशी पूरे देश में संगीत समारोहों की क़ामयाबी का अचूक फ़ार्मूला बन गये.
पं.भीमसेन जोशी की स्वर-यात्रा ख़ालिस तौर तपस्या का का जगमगाता दस्तावेज़ है.
पण्डितजी को जब जब भी सुना गया ; कभी ऐसा नहीं लगा कि आज कोई कोर-कसर बाक़ी रह गई. इसकी ख़ास वजह यह थी कि वे उस पीढ़ी के नुमाइंदे थे जो गायकी को एक इबादत की तरह लेती थी और मानती थी कि आयोजक से बड़ी ज़िम्मेदारी कलाकार की होती कि वह वह अपना १००% देकर अपना फ़र्ज़ ही पूरा कर रही है.

पण्डित भीमसेन जोशी के जाने के बाद एक सितारा चला गया, मैं तो उनसे बहुत प्रभावित थी और उन्होंने मुझे हमेशा आशीर्वाद दिया, वो तो मेरे लिये गुरू जैसे ही थे ऐसे कई वक्तव्य आपको अख़बारों और टीवी चैनल्स पर पढ़ने को और सुनने को मिलने वाले हैं लेकिन समझने की बात यह है कि यह समय पं.जोशी से रिश्तेदारी और अपनापा दिखाने का नहीं उनकी गायकी के उस स्वर-वैभव को अपने भीतर महसूस करने का है.नई पीढ़ी के कई कलाकार भीमसेन जोशी गायकी का अनुसरण करते हैं और नक़ल भी करना चाहते हैं लेकिन मुझे लगता है कि वे यहीं ग़लती करते हैं. स्वयं भीमसेनजी ने अपने गुरू सवाई गंधर्व की गायकी के अनूठेपन को आत्मसात किया,उनकी आवाज़ को नहीं.रचनाधर्मिता को लेकर आज संगीत जगत में हमेशा बड़-चढ़ कर बातें की जाती रहीं हैं.लेकिन भीमसेनजी को याद करें तो लगता है कि शास्त्र की मर्यादा में रहकर भी उन्होंने फ़िल्म संगीत,अभंग,नाट्य-संगीत और भक्ति पद गाने से गुरेज़ नहीं किया.और तो और उन्होंने दूरदर्शन के लिये बनाए गये वृत्तचित्र मिले सुर मेरा तुम्हारा और देसराग में भी अपना स्वर दिया. इन्दौर के पचकुईया शिव मंदिर में वे बरसों तक आते ही रहे और अपनी स्वरांजली पेश करते रहे. शास्त्र के लिहाज़ से देखें तो तीनों सप्तकों में सहजता से फ़िरता पण्डितजी का स्वर एक विशिष्ट टैक्चर का बना हुआ था और उसमें मौजूद ठोस खरज नाभि से उठकर ब्रह्मनाद बन जाया करता था. आकार की तानों के साथ खेलने का उनका एक बेजोड़ अंदाज़ था सुरों के साथ वे मनचाही लयकारी से समाँ बांध देते थे.संगीत की धजा को हमेशा ऊँचा रखने फ़हराने वाले महान साधक के रूप में भारतरत्न पण्डित भीमसेन जोशी का नाम उस फ़ेहरिस्त में शुमार हो गया है जिसका आग़ाज़ तानसेन,बैजूबावरा,भातखण्डे,पलुस्कर,सवाई गंधर्व,अलादिया ख़ाँ,रहमत अली ख़ाँ जैसे नामों का शुमार है.देह से ज़रूर पण्डित भीमसेन जोशी हमसे विलग हुए हैं लेकिन उनकी गायका का वितान मनुष्यता को एक सुरीली छाँह देता रहेगा जिससे हम मनुष्य बने रहें.

(इन्दौर के प्राचीन शनि मंदिर में अपनी सुर-सखी स्व.वत्सलाताई के साथ पण्डितजी..तस्वीर तक़रीबन सन चौरासी की है)

Tuesday, January 25, 2011

पांच उसाँसे रेगिस्तानों की



भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा पंडित भीमसेन जोशी को श्रद्धांजलिस्वरूप आज वीरेन डंगवाल के नवीनतम कविता-संग्रह ’स्याहीताल’ से प्रस्तुत है एक कविता

भीमसेन जोशी

मैं चुटकी में भर के उठाता हूँ
पानी की एक ओर-छोर डोर नदी से
आहिस्ता
अपने सर के भी ऊपर तक

आलिंगन में भर लेता हूँ मैं
सबसे नटखट समुद्री हवा को

अभी अभी चूम ली हैं मैंने
पांच उसाँसे रेगिस्तानों की
गुजिश्ता रातों की सत्रह करवटें

ये लो
यह उड़ चली 120 की रफ़्तार से
इतनी प्राचीन मोटरकार

यह सब रियाज़ के दम पर सखी
या सिर्फ रियाज़ के दम पर नहीं!

Monday, January 24, 2011

एक ठेठ भारतीय रोमान की शास्त्रीय आवाज़ का अवसान



नहीं रहे पंडित भीमसेन जोशी

शिवप्रसाद जोशी


हिंदुस्तानी संगीत की ख़्याल गायकी में किराना घराना एक उफनती हुई नदी की तरह मौजूद था. और उसमें अपने संगीत की नाव को खे रहे थे भीमसेन जोशी. वह अब नहीं रहे. किराना घराने की आखिरी लौ जैसा हिंदी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने कहा है, वो भी अब बुझ चुकी. संगीत और शोर के इस विराट अंधकार में भीमसेन जोशी को याद करना जैसे एक पहाड़ पर लालटेन लेकर चलने सरीखी उदासी और उम्मीद और अवसाद का मिला जुला अनुभव है.

कलाकार के रूप में वो कौन सा सबसे बड़ा मूल्य है जिसकी हिफ़ाज़त करनी चाहिए. उनका कहना था-ईमानदारी. यही एक चीज़ है. पंडित भीमसेन जोशी अपनी इसी गहन ईमानदारी भरी सुर साधना के साथ लगभग एक सदी तक संसार में रहे और अब वह अपनी देह से विरत हो गए हैं. भीमसेन जोशी अपनी आवाज़ में अमर हैं लिहाज़ा उनके लिए श्रद्धांजलि जैसी चीज़ें भी कमतर और ग़ैर ज़रूरी सी जान पड़ती है.

हिंदुस्तानी ख्याल गायकी के किराना घराने के स्तंभ भीमसेन जोशी निर्विवाद रूप से सबसे बड़े और शीर्षस्थ गायक थे. बीसवीं सदी के महान भारतीय शास्त्रीय गायकों की अगर कोई त्रयी बनती हो तो उसमें एक नाम हमेशा उनका है.

अपने समकालीनों में वह किसे महान मानते थे, किससे प्रभावित थे तो भीमसेन जोशी बेहिचक उस्ताद अमीर ख़ान साहब का नाम लेते थे. ज़ाहिर है अपने गुरू सवाई गंधर्व को वो सर्वोपरि मानते थे. अपनी अक्का और किराना घराने की एक और सशक्त आवाज़ गंगूबाई हंगल से भी वो प्रेरित थे और केसरबाई केरकर से भी.

भीमसेन जोशी को जब भारत रत्न सम्मान मिला तो उन्होंने विनम्रता से इतना ही कहा कि समस्त भारतीय संगीत की ओर से वो इस सम्मान को लेते है. यह संगीत का सम्मान है. उन्हें अपने नाम के आगे पंडित का संबोधन कहे जाने से भी विरक्ति थी.

फ़रवरी 1922 को कर्नाटक के गडग में जन्में भीमसेन जोशी 11 साल के थे जब कानों में उस्ताद अब्दुल क़रीम ख़ान की ठुमरी पड़ी. पिया बिन नहीं चैन आवत...बस यही गाना है और ऐसा ही गाना है. भीमसेन विचलित हो गए और घर से भाग खड़े होने को तत्पर.

जगह जगह भटके. बंबई पहुंच गए. वहां से न जाने कहां कहां.पंजाब, रामपुर, कलकत्ता. गुरू नहीं मिला. पिता ने बेटे को ढूंढ निकाला ग्वालियर में और ले गए धारवाड़ रामभाऊ कुंडगोलकर यानी सवाई गंधर्व के पास. कि इसे शिष्य बनाइये. सवाई गंधर्व अब्दुल क़रीम ख़ान के शिष्य थे.

बस भीमसेन को दिशा मिल गई, एक महान गुरू का सान्निध्य. 20 20 घंटे रियाज़. एक धुन एक लगन असंभव को संभव बनाने की. और फिर एक आवाज़ टूटने लगी और एक आवाज़ बनने लगी. किराना घराने की गायकी में नया सितारा प्रकट हो गया.

मसेन जोशी के पास एक सधी साफ़ खनक भरी आवाज़ थी. उस आवाज़ को उसकी चट्टानी फांकों में देखा जा सकता था. किराने घराने की विशिष्टता ने उसमें और रंग भर दिए. स्वर लगाव, बंदिश का एक शुद्ध, अनुशासित उठान, लयकारी की विभिन्न छटाएं और वे बेमिसाल तानें. वे मुरकियां.

किराना घराने की शुद्धता के प्रति आसक्ति को भीमसेन ने कभी नहीं छोड़ा अपने तमाम प्रयोगों के बावजूद. कथक के बिरजू महाराज का कहना है कि भीमसेन एक सांस में एक पूरी तान को अभिव्यक्त कर सकते थे. मंद्र, मध्य और तार सप्तक सभी ऊंचाइयों तक उनकी आवाज़ जा सकती थी. भीमसेन जोशी को गाते हुए सुनना और देखना एक विरल और बड़ा अनुभव इसीलिए बन जाता है वे लय के भीतर छिपी कविता को जैसे रेशा रेशा बाहर लाते हैं. वो उसे एक ऐसी मीठी संरचना में गूंथ देते हैं कि आप बस एक बेकली में इंतज़ार करते हैं कि कब वो उसे छोड़ेगें, कब वो पलटे पर जाएंगें, कब वो उसे अपनी तिलस्मी मुरकी में छिपा लेगें और कब सहसा एक तड़प भरी तान से रोमांचित कर देंगे.

भीमसेन जोशी की गाई बंदिशों में एक है बोले न बोल वो हमसे पिया. राग भैरवी में. उसकी छवियां इतनी निराली और इतनी बेचैन कर देने वाली हैं कि आप सुध बुध खोकर ही उसे सुन सकते हैं. उनका गाया राग मालकौंस पग लगन दे अद्भुत है. पुरिया धनश्री के तो वो महाराज हैं हीं. उनका गाया शिव की स्तुति पर आधारित राग शंकरा बेजोड़ है. और हिंदुस्तानी ख्याल गायकी का कैसा निराला और अवर्णनीय सेक्यूलरिज़्म है कि राग शंकरा में युवा राशिद ख़ान के साथ उनकी एक क्लासिक जुगलबंदी मील का पत्थर मानी जाती है. भीमसेन जोशी ने अपने समकालीनों के साथ काफ़ी जुगलबंदियां की. ऐसी ही एक प्रसिद्ध जुगलबंदी उनकी कर्नाटक संगीत के पुरोधा एम बालमुरलीकृष्ण के साथ है. इस रिकॉर्डिंग को देखना जैसे दो महा नक्षत्रों का विलय देखने सरीख़ा है. भीमसेन इसमें किसी बच्चे जैसी झूम के साथ गाते हैं और एक उद्दाम सरलता में.

बालमुरली के आलाप पर अपना आलाप पिरोते हुए, उनकी तानों और उनके तरानों पर जैसे मुग्ध भाव से झूमते और चहकते हुए और एक रहस्य भरे सांगीतिक वार्तालाप को संभव करते हुए दोनों साधक.

गायन में तानों की लपेट और विलय और बंदिशों के स्पर्शों से सजी ऐसी बातचीत एक बड़ा अनुभव बनाती है. भीमसेन जोशी इसी अनुभव का सृजन करते रहे. टच एंड गो का ये मुहावरा जो यूं टीवी और रेडियो जैसे माध्यमों में काम करते हुए बरता हुआ जाता है शायद संगीत में सबसे पहले और सबसे विश्वसनीय ढंग से मौजूद है. भीमसेन जोशी जैसे गायक इसे समझाते हुए गाते हैं.

भीमसेन जोशी अपने ड्राइविंग के शौक के लिए भी जाने जाते थे. कार चलाने का उनका बीहड़ शौक था और जवानी के दिनों में वो रफ़्तार के कायल थे. भीमसेन जोशी को इंटरव्यू देना पसंद नहीं था. उनके बहुत कम इंटरव्यू हैं. कला और कलाकार के बारे में वो क्या सोचते थे इसकी एक बानगी देखिए.

- नकल करना आसान है लेकिन नकल को असल करके अपनी गायकी में ढालना मुश्किल है
- मेरा गायन मेरे व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है. मै अपने शार्गिदो से कहता हूं मेरे जैसा नहीं अपने जैसा गाओ. अपने गले का धर्म निभाओ.
- आज कलाकार को सब कुछ मालूम होना चाहिए. कलाकार आटे दाल की कीमत, परिवार के प्रेम, देश की हालत से सबसे जुड़ा हुआ है.
- कला तो यात्रा है और यही अनथक यात्रा उसकी मंजिल है सागर की गहराई, आकाश की ऊंचाई किसने नापी है.
अच्छा संगीत जानने के लिए तीन चीज़ें ज़रूरी हैं-अच्छा गुरु, अच्छा रियाज़ और अच्छी वाणी.
- कलाकार एक चोर की तरह होता है वह सब जगह से कुछ ले लेता और अपनी गायकी में समा लेता है.
- संगीत का धर्म संगीत होता है इसमें जात पात नहीं होती

भीमसेन जोशी के न रहने पर इन सब चीज़ों का याद आना लाज़िमी है. किराना घराना सूना हो गया है और ख्याल गायकी का आंगन भी. लेकिन हमारे समय और आने वाले वक़्तों के लिए यह एक बहुत बड़ी और शायद गिनती की दुर्लभ नेमतों में से एक है कि भीमसेन जोशी की आवाज़ यहीं हैं. एक ठेठ भारतीय रोमान की शास्त्रीय आवाज़.

उस वतन के एक गोशे में सुनहरा गाँव है



डॉ. अवस्थी हिमाचल की वरिष्ठ पीढ़ी के उन गिनती के साहित्यकारों में से हैं जिन्हो ने हिन्दी साहित्य का गंभीर और विधिवत अध्ययन किया है। मेरी इन से जान पहचान अग्रज कवि अनूप सेठी जी के मार्फत है। उन की यह ताज़ी कविता आज की बीहड़ गद्य़कविता के बरक्स कुछ अलग सा स्वर लिए जान पड़ती है। कल और परसों मैं नेट पर नही हूँ। अतः आज ही पोस्ट किए दे रहा हूँ
[26 जनवरी की दहलीज़ पर]

एक ही पहचान है

अब नहीं मिलते कहीं भी

पिघलते-से लोग --

धड़कनों की थाप पर वे थिरकते-से लोग --

वे खुले-से लोग, रसभोक्ता-से लोग --

ख़ुशबुओं के पारखी वे कुशल गंधी लोग

जो समन्वित चेतना से अति सहज ही

कन्याकुमारी के नवोदित सूर्य-थालों में

सूँघते थे काश्मीरी गंध केशर की ,

और कस्तूरी-मृगों के दूर पर्वत-प्रान्तरों से

देख लेते थे बँधा रामेश्वरम पर पुल 1

क्या फलक था ! क्या परख थी !! क्या नज़र थी !!!

फ़ासलों को भाव-यानों से सहज में पाट लेते थे ,

कि हर अलगाव को वे

सोच के व्यवहार से ही काट देते थे 1

सच, नहीं मिलते हमें वे लोग, वे पुलों-से लोग;

जी, बहुत नायाब हैं वे विश्व-दर्शक लोग,

राष्ट्रचिन्तक, राष्ट्रजीवी लोग –

राष्ट्र था पहचान जिन की ,

और जिन से राष्ट्र पहचाना गया 1



अर्थ-खोजी उन रसज्ञों की जगह अब

एक सड़िय़ल बेसरोकारी

महज़ आलोचना में बोलती है,

स्वार्थ से सब नापती है, अहम् से सब तोलती है ;

गोदरा से, अवधपुर से, गुलमरग से, मुम्बई से,

जहां से भी छिद्र मिलता है, वहीं से

रोज़ कोई ज़हर जल में घोलती है 1

पोथियों के , जातियों के , बोलियों के नाम पर वह

नफ़रतों को पालती है, आफ़तों को खोलती है 1



बंधुओ ! अंदाज़ उस का फ़लसफ़ाना है,

तर्क घटिया बूर्जवाना है,

कर्म छद्मों से भरा है, क़ातिलाना है,

चलन उस का भीड़ को पीछे चलाना है,

आदमी को रेत कर के शहर को मरुथल बनाना है 1

वह तमिस्रा को हमारे सूर्य-मुखियों पर

स्वयं ही तानती है ,

और फिर ख़बरें बनाती

कि उन्हें अंधा बनाया जा रहा है 1




तुम मगर उस के इरादों को कभी फलने न देना ,

इन विषैली आँधियों को बेधड़क चलने न देना ;

क्योंकि तुम इन से बड़े हो ,

क्योंकि तुम इन से लड़े हो ,

क्योंकि तुम टोपी नहीं हो ,

क्योंकि तुम कुल्ला नहीं हो ,

तुम महज़ वोटर नहीं हो

और कठमुल्ला नहीं हो 1



बस तुम्हारी एक ही पहचान है –

और वह व्यापक वतन है , जो कि शतरंगा वतन है ,

उस वतन के एक गोशे में सुनहरा गाँव है

वह तुम्हारा गाँव है, वह हमारा गाँव है ,

गाँव में पोखर किनारे पितर-पीपल है

जो तुम्हारी आत्मा को उस समूची आत्मा से जोड़ता है 1

उस समूची आत्मा की एक ही प्रतिबद्धता है ;

और वह हर ज़हर को धिक्कारना है ,

और वह अन्याय को ललकारना है 1



तुम जहां भी हो तुम्हें ट्रैक्टर चलाना है,

तुम्हें खेती उगाना है ,

फिर पसीने से नवांकुर सीँचना है 1






--[डॉ.] ओम् अवस्थी
(से.नि. प्रोफ़ेसर-अध्यक्ष एवं डीन)
शारदा निवास, लोअर रामनगर, धर्मशाला.
फ़ोन: 9418218149, 9625727378 , 01892-222536

Sunday, January 23, 2011

कदम कदम बढ़ाये जा



ब्लॉगजगत पर मैं काफी लेट आया हूँ , इसलिए कॉपीराईट पर एक पुरानी बहस आज जाकर पढ़ी | बहरहाल, इस कविता के रचनाकार का नाम मुझे नहीं पता है , जो भी हो वे मुझे अदालत में नहीं ले जाएँगे , ऐसा मैं सोचता हूँ | ये मेरे देश की कविता है | आज़ाद हिंद फौज का प्रयाण गीत, 'दिल्ली चलो' आह्वान के साथ 'तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा' जैसे नारों से देश के युवाओं के प्रेरणाश्रोत बने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस | उन्हें प्रणाम |



कदम कदम बढ़ाये जा, खुशी के गीत गाये जा
ये जिन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा

शेर-ए-हिन्द आगे बढ़, मरने से फिर कभी ना डर
उड़ाके दुश्मनों का सर, जोशे-वतन बढ़ाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा ...

हिम्मत तेरी बढ़ती रहे, खुदा तेरी सुनता रहे
जो सामने तेरे खड़े, तू ख़ाक मे मिलाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा ...

चलो दिल्ली पुकार के, क़ौमी निशां सम्भाल के
लाल किले पे गाड़ के, लहराये जा लहराये जा
कदम कदम बढ़ाये जा...

 Kadam Kadam Badhaye Ja .mp3
Found at bee mp3 search engine

Saturday, January 22, 2011

ही वाज़ अ फ्रेंड ऑव माइन



इस पोस्ट को लिखने के लिए मैंने तीन महीने इंतज़ार किया है | सच बताऊँ तो अपनी बात कहने के लिए मैंने डेढ़-दो साल इंतज़ार किया है कि मुझे कभी कबाडखाना जैसा मंच मिल जाए | हरदम इसी ख्यालों में डूबा तो नहीं रहता, या ऐसा भी कोई जिंदगी का लक्ष्य नहीं बनाया इसे, बस ऐसे ही कभी अकेले में रहकर 'Jack, I Swear ' करता हूँ |


एडलैब्स से कल्याणी वेज वाले रास्ते पर चले जाइए, बिग बाजार से भी आगे, एच एस बी सी के ऑफिस की तरफ, तो बारहवीं तक का एक स्कूल सड़क के दायीं तरफ उन्नीस सौ सैंतालिस से शान से खड़ा है | वहाँ पर अक्सर शाम सड़क किनारे एक बेंच पे बैठा हुआ मैं, जिंदगी को शुक्रिया अदा करता हुआ मिलता हूँ | पुणे जैसे व्यस्त शहर के कल्याणी नगर जैसे इलाके में इस तरह का अकेलापन बहुत किस्मत से मिलता है | हल्का अँधेरा घिरने वाला होता है, और मैं पास्ट को लगातार रीवाइंड करता हुआ सुनता रहता हूँ | पच्चीससाला जिंदगी यकायक बहुत बड़ी लगने लगती है | कितने सारे अफ़सोस, इसी उम्र में ? कितने सारे पाप और प्रायश्चित ... बहुत तलब लगती है उस वक़्त सिगरेट पीने की, जब तक खुद बुझ नहीं जाता (अफ़सोस, मैं सिगरेट नहीं पीता) | २२ जनवरी २००८, तीन साल पहले जब दवाओं के घातक मिश्रण मेरे लिए संजीवनी बूटी साबित हो रहे थे, किसी और दुनिया का बेहद अनजान आदमी इन्ही दवाओं से मर चुका था | न मेरे आयुष से उसे फर्क पड़ना था, न उसके मरने से मुझे फर्क पड़ा | दिन में पंद्रह घंटे अँधेरे कमरे में टी वी देखने में गुजार दिया करता | बीच बीच में माँ जरूर आकर परदे हटाती, खाना खिलाती, बिस्तर की चादर, तकिये के कवर बदलती | सिर्फ उसी वक़्त मयूर विहार के उस छोटे से कमरे में धूप साँस लेती थी | माँ के जाते ही कमरा फिर से अँधेरे जैसा हो जाता |


हीथ लेजर और मेरी जिंदगी में कोई समानता नहीं है, सिवाय इसके कि मुझे भी लगता है कि मेरा दिमाग मुझे सोने नहीं देता | जब दिमाग ख़याल बुनने लगता है, जब आंखें बन्द करने के लिए सोचना पड़ता है, रात का वो पहर बिलकुल निर्जन, अकेला होता है | अक्सर बिना सोये, दो-तीन दिन बीत जाते हैं | डॉक्टर अटेन 25 एम जी से 50 एम जी कर देता है | 'गेट सम स्लीप, बी पी नोर्मल हो जाएगा' दवाइयां लिखते हुए वो कहता है | २२ जनवरी २००८ को २८ साल की उम्र में वो इस दुनिया से रुखसत कर गया |


जो बोलना चाहता हूँ, जब वो नहीं बोल पाता हूँ तो बहुत चिढ़ होती है | ये महज चिढ़ नहीं , बल्कि एक सेल्फ-डेस्ट्रक्टिव फीलिंग है | जिसमें सिर्फ आप अपनी साँसों की आवाज सुन रहे होते हैं | बहरहाल, हीथ लेजर मेरे लिए वही मुकाम रखते है जो प्रेम कवियों के लिए जॉन कीट्स का है | जॉन कीट्स भी फ़क़त पच्चीस साल ही जिया था, कवियों के बारे में मुझे ज्यादा पता नहीं है | लेकिन हीथ के बारे में कह सकता हूँ कि बेशक वो मार्लन ब्रांडों नहीं है, लेकिन सिर्फ दो किरदारों के लिए सब याद रखेंगे उसे, 'जोकर' और दूसरा 'एनिस डेल मार' | 'यू नो हाव आई गोट दीज़ स्कार्स' पहली बार ही मैं उसे देखके मन्त्रमुग्ध सा हो गया था | लेकिन उसका फैन बना तो 'ब्रोकबैक माउन्टेन' के उसके किरदार 'एनिस डेल मार' के लिए | 'ब्रोकबैक माउन्टेन' ने उस संवेदनशील विषय को छुआ था जिसे हमारे फ़िल्मकार मजाक उड़ाने के लिए भुनाते हैं, समलैंगिकता | जब आखिरी दृश्य में 'एनिस डेल मार' अल्मिरा में एक ओर चिपकाये ब्रोकबैक माउन्टेन के पोस्टकार्ड को देखता है, हल्के हाथों से अपनी और जैक की शर्ट को छूता है, जो उसने एक के अन्दर एक रखी है और... और हल्के हल्के बन्द लफ़्ज़ों में अपने आंसुओं से लड़ता है, "Jack ... I swear", तब महसूस होता है कि खोना क्या होता है | 'ही वाज़ अ फ्रेंड ऑव माइन' पृष्टभूमि में बजता है |


मैं उसी बेंच पर पिछले तीन घंटों से घुमा फिरा के वही दृश्य याद कर रहा हूँ |


एक छोटा सा किस्सा हीथ के लिए ,
मैं मुंबई से दिल्ली आ रहा था | और मेरे साथ ट्रेन में सफ़र कर रहा था, बालाजी टेलीफिल्म्स का क्रू; एक लेखक कोई अफज़ल अहमद जैसा कोई नाम | उसने मुझे स्क्रीनप्ले लिखना सिखाया, और अपना स्क्रीनप्ले भी पढ़ाया | बात चलते चलते फिल्मों तक पहुंची, और हम दोनों साथ साथ 'दि डार्क नाईट' देखने लगे | उसने आधे में मूवी बन्द कर दी, कि बहुत साधारण फिल्म है | जाते हुए उसने मुझे अपना कार्ड दिया, ट्रेन से बाहर निकलते ही मैंने वो कार्ड फाड़ दिया |

Friday, January 21, 2011

सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन




वर्ष २०११ : हिन्दी साहित्य संसार में  प्रयोगवाद एवं नई कविता को  प्रतिष्ठित करने वाले कवि- कविनायक अज्ञेय (७ मार्च, १९११- ४ अप्रैल, १९८७) का जन्म शताब्दी वर्ष। आज साझा करते हैं उनकी तीन कवितायें।


तीन कवितायें : अज्ञेय

०१- जाड़ों में


         लोग बहुत पास आ गए हैं।
पेड़ दूर हटते हुए
कुहासे में खो गए हैं
और पंछी ( जो ऋत्विक है )
चुप लगा गए हैं।

०२- अलाव

        माघ : कोहरे में अंगार की सुलगन
अलाव के घेरे के पार
सियार के आँखों की जलन
सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन
सब मुझे याद है : मैं थकता हूँ
पर चुकती नहीं मेरे भीतर की भटकन।

०३- धूप

      सूप - सूप भर
धूप कनक
यह सूने नभ में गई बिखर
चौंधाया
बीन रहा है
उसे अकेला एक कुरर।

Thursday, January 20, 2011

मेले में : एक यायावर



ख़लील ज़िब्रान के कहानी संग्रह 'The Wanderer' का हिंदी अनुवाद करना भा रहा है | प्रतिक्रियाओं से अंदाजा लगाता हूँ कि पाठकों को भी पसंद आ रहा होगा | टिप्पणियां पढ़ के अलग मजा आ रहा है, उपरवाले ने कई भांति के मनुष्य बनाये हैं | इस सिलसिले में कुछ ईमेल भी मिली हैं , जिन्होंने काम की तारीफ की है | कह नहीं सकता कि कितनी ख़ुशी मिल रही है, यकीन जानो मेरे अन्दर लेखकों का कोई और गुण हो न हो, अपने काम की तारीफ सुनने के लिए कान खड़े करने वाला गुण जरूर है |  'भगवान का पहला विचार एक देवदूत था, भगवान का पहला शब्द एक इन्सान ' इस प्रकार की बेहतरीन सत्संगी विचारों वाले ख़लील ज़िब्रान साहेब की कुछ और कहानियों का आनन्द लें |

छोटे कस्बे की बेहद खूबसूरत एक लड़की, मेला देखने के लिए आई | उसके गालों पर गुलाब की लालिमा थी , सूर्यास्त मानों उसके बालों में होता हो, और भोर उसके होंठों में मुस्कुराती हो |

इक खूबसूरत अजनबी के निगाह में आते ही सारे नवयुवक तरह तरह के बहानों से उससे मिलने आने लगे | कोई उसके साथ नाचना चाहता था, कोई दूसरा उसके सम्मान में केक काटना चाहता था | सभी उसके कुमुदनी जैसे गालों को चूमना चाहते थे, आखिर ऐसा कौन होगा जो ये नहीं चाहेगा |

बेचारी लड़की को युवकों का व्यवहार देखकर सदमा सा लगा, और उसे सारे लड़के बुरे से मालूम हुए | उसने उन्हें डांटा, कुछेक को थप्पड़ भी मारा | उसके बाद वह वहाँ से भाग गयी |

और घर आते हुए, उस शाम रोते हुए उसने अपने दिल में कहा, "घृणा होती है मुझे, कितने अशिष्ट और असभ्य लोग हैं | बरदाश्त की हर हद से बाहर |"

साल गुजरा , इस दौरान उस खूबसूरत लड़की ने बहुत से मेलों और उन युवकों के बारे में सोचा | एक दिन वह फिर से उस मेले को देखने गयी | आज भी वह उतनी ही खूबसूरत लग रही थी, जैसे गुलाब की लालिमा उसके गालों पर, सूर्यास्त उसके बालों पर होता हो , और जैसे भोर उसके होंठों पर मुस्कुराती हो |

लेकिन इस बार लड़कों ने उसे देखने के बाद सर झुका लिया , देखकर अनदेखा करने लगे | और पूरा दिन उस लड़की ने अपने को काफी अनचाहा और अकेला महसूस किया |

सांझ के झुटपुटे में घर की ओर जाने वाले रास्ते पर वह लड़की अपने दिल में बहुत रोई, "मुझे घृणा होती है, कितने अशिष्ट और असभ्य लोग है | बर्दाश्त की हर हद से बाहर |"

प्रेमगीत, आँसू और हँसी : एक यायावर



प्रेमगीत

कवि ने प्रेमगीत लिखा, बेहद खूबसूरत, और उसने इसकी कई सारी नक़ल तैयार की, और अपने दोस्तों और जानने वालों को, पुरुष और स्त्री दोनों को, यहाँ तक कि एक लड़की जिससे वह सिर्फ एक ही बार मिला था और जो पहाड़ों के दूसरी ओर रहती थी उसे भी, वो गीत भेज दिया |

और एक-दो दिन बाद एक संदेशवाहक उस लड़की की ओर से एक पत्र लेकर आया | पत्र में उसने लिखा था, "मैं तुम्हें यकीन दिलाना चाहती हूँ, कि जो प्रेमगीत तुमने मेरे लिए लिखा है, उसने मेरे दिल को छू लिया है | आओ, और मेरे माता पिता से मिलो, और उसके बाद हमें अपनी सगाई की तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए |"

कवि ने जवाबी पत्र लिखा, और उसमे उसने कहा, "मेरे दोस्त, यह एक कविह्रदय से निकला सिर्फ एक प्रेमगीत है, जो हर पुरुष द्वारा हर स्त्री के लिए गाया गया है |"

तब उस लड़की ने कवि को दुबारा पत्र लिखा और कहा, "झूठे और मक्कार ! शब्दों का पाखण्ड करने वाले ! आज से क़यामत के दिन तक मैं सभी कवियों से नफरत करती रहूंगी |"

आँसू और हँसी

नील नदी के किनारे, सांझ के झुटपुटे में, सियार घड़ियाल से मिला और उन्होंने रूककर एक दूसरे को नमस्ते किया |

सियार ने कहा, "सब कैसा चल रहा है, जनाब ?"

घड़ियाल ने जवाब दिया, "बहुत बुरा वक़्त है | कभी कभी अपने दुख दर्द से मैं रोने लगता हूँ, और बाकी लोग कहते हैं, 'ये कुछ नहीं बस घडियाली आँसू हैं |' ये बात मुझे इतनी चुभती है कि क्या बताऊँ |"

तब सियार ने जवाब दिया, "तुम अपने दुख, दर्द की बात करते हो पर एक बार जरा मेरे बारे में भी तो सोचो | मैं इस दुनिया की खूबसूरती, इसके अचरजों, और इसके चमत्कारों को निहारता हूँ, और बहुत खुश होता हूँ | हँसता हूँ, बेहद जोर जोर से, जैसे दिन का उजाला चारों ओर फैलता है | और बाकी लोग कहते हैं, 'ये कुछ नहीं बस सियार की हुआं-हुआं है |'"

Wednesday, January 19, 2011

इस ‘खोगला’ पर गाँव नहीं जा पाऊँगा






आज देसी नव वर्ष की पहली पूर्णिमा है. यानि कि ‘खोगला’ .
पिछ्ले पोस्ट पर मैने जानकारी दी थी कि यह आग का त्यौहार है.इन दिनों लाहुल मे शीत देवता का प्रकोप पूरे ज़ोर पर है. केलंग का न्यूनतम तापमान शून्य से 25 डिग्री सेल्श्यस नीचे जा रहा है. ऊँचाई पर स्थित गाँवों मे तो 35 दिग्री भी पार कर जाता है. ज़ाहिर है ऐसे मे लोग आग की बातें कर के भीतर ऊष्णता महसूस करते हैं. इसी लिए बर्फीले क्षेत्रों मे आग और उस से जुड़े मिथकों का बड़ा महत्व है. आज तो आग सुलगाने के कई तरीक़े हैं, लेकिन पुराने दिनों मे बर्फ के इन विशाल रेगिस्तानों मे आग को ज़िन्दा रखना निश्चय ही चुनौतीपूर्ण काम रहा होगा. हम जानते हैं चिंगारियों को तब ऊपलों मे ही जीवित रखने का रिवाज़ था. युगों और पीढ़ियों तक वह आग ज़िन्दा रहती थी. इस भीषण सर्दी मे आग को इस तरह ज़िन्दा रखने की बात एक रोमाण्टिक गप्प सी लग रही है. लेकिन वह ऐसे ही ज़िन्दा रखी जाती रही है, और गाँव में आज भी ऐसे ही रखी जाती है. कभी कभी मैं अपने गाँव वाले चूल्हे की आग की उम्र के बारे सोचता हूँ तो आदमी के बचपने पर तरस आ जाता है. लगता है अभी कल ही तो पैदा हुआ है आदमी....
खैर आदमी की स्मृति ज़रूर पुरातन है. अपनी स्मृतियों मे आदमी आग को अलग अलग रूपों में सँजोये हुए है. रमेशचन्द्रशाह बता रहे थे कि ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी बाक़यदा आग का सन्धान करते हैं . और यह अनुष्ठान वे लोग नृत्य के रूप में पर्फॉर्म करते थे. कवि अग्निशेखर ने बताया कि काश्मीर मे मान्यता है कि मकर् संक्रांति की रात को आकाश से एक चिंगारी गिरती है.... जिसे लोग अपनी काँगड़ी मे सहेज रखते हैं . इस दिन वहाँ अग्निदान की प्रथा भी है . उन के अनुसार सूर्यपूजा भी इसी पुरातन परम्परा का अंग है. एक समय में मुलतान के बाद काश्मीर सूर्यपूजकों का बड़ा केन्द्र था. वहाँ इस कल्ट के अवशेष खण्डहरों, रिवाज़ों , आदि के रूप मे मौजूद हैं.
हिमालय के भीतरी हिस्सों में आग से जुड़े अनेक अनुष्ठान और उत्सव हैं. हमारा खोगला भी उन्ही मे से एक है.
मैं चाह रहा था कि इस बार मशालों के इस त्यौहार की कुछ ताज़ी तस्वीरें यहाँ पोस्ट करूँ. लेकिन हाल ही में हुई भारी बरफबारी के कारण इस खोगला पर मैं गाँव नहीं जा पाऊँगा. क्यों कि पिछले चार दिनों से रास्ते बन्द हैं. आज आकाश एक दम निम्मळ है.सूरज अपनी पूरी ताक़त से च्मक रहा है. लेकिन उस की कुल ऊष्मा का एक खरबवाँ हिस्सा भी शायद ही यहाँ पहुँच पा रहा हो. हेलिकॉप्टर ने चार चक्कर लगाएं हैं.... स्तींगरी –भूंतर—स्तींगरी....... हर बार बाहर निकल कर एक हसरत भरी निगाह से उसे देखलेता हूँ. मैं पैसे खर्च कर के कुल्लू जा सकता हूँ, लेकिन यहाँ से फक़त 10 किलोमीटर दूर अपने पुरखों के गाँव जा कर यह आग का उत्सव नहीं मना सकता.
गाँव से अभी अभी भाई का फोन आया है. उन्हों ने पवित्र शुर की लकड़ियाँ चीर कर ब्यूँस की लचीली टहनियों से हाल्डा बाँधना शुरू कर दिया है. मेरे नाम से भी एक हाल्डा बाँधा जाएगा. शाम ढलते ही हम सामने वाले पर्वत पर सिद्ध घण्टा पा के साधना स्थल पर नज़र टिकाए रहें गे. ज्यों ही लामा जी अपना हाल्डा देव प्राँगण मे निकालेंगे, हम भी चूल्हे मे अपना हाल्डा सुलगाएंगे और शोर मचाते हुए गाँव के बाहर ले जाएंगे. शुर(जुनिपर), जलती हुई घी और तैल की सौंधी महक मेरे चारों ओर फैलने लगी है. दिन भर मारचू तले गए हैं. भाभी ने आज बासमती पकाई है और दूसरे कूकर मे गोश्त उबल रहा है. दादी ने अपने नक्काशी दार सन्दूक से ऊनी जुराबों जोड़ा निकाला है और रात की मशाल यात्रा के लिए मुझे गिफ्ट किया है. सलेटी जुराबों में से एक सूखा हुआ सुनहला गेंदा झाँक रहा है. इस उपहार से फिनायल की गोलियों की तीखी गन्ध निकल रही है. जो वे ऊनी कपड़ों की हिफाज़त के लिए सन्दूकची मे डाले रखतीं हैं. दादी की गाँठदार उँगलियाँ इस बार कुछ ज़्यादा ही ठण्डी लग रहीं हैं. उन्हे दमा की शिकायत थी. इस बार मैंने उन की दवा की खुराक़ भिजवा दी थी क्या? “दादी को देसी वैद की दवा ही ज़्यादा कर के शूट करती है.” दुम्का नौकर देबाशीष किस्कू ने कहा था...... त्सेरिङ वैद को फोन लगाऊँ ?
दफ्तर का फोन चीख चीख कर चुप हो जा रहा है. फिर- फिर बज कर चुप हो जा रहा है. शिमला वाले 20 सूत्री कार्यक्रम की त्रैमासिक रिपोर्ट माँग रहे हैं. ऐसी की तैसी तुम्हारी और तुम्हारे वाहियात कार्यक्रमों की.
आह गाँव !

उकाब और अबाबील



एक अबाबील और एक उकाब (गरुड़) पहाड़ी चोटी पर मिले | अबाबील ने कहा, "आपका दिन शुभ हो, श्रीमान !" और उकाब ने उसकी ओर हिकारत भरी नजरों से देखा और धीमे से कहा, "दिन शुभ हो |"

और अबाबील ने कहा, "मुझे आशा है कि आपकी जिंदगी में सब ठीक चल रहा है |"

"हाँ" उकाब ने जवाब दिया "हमारे साथ सब सही चल रहा है | लेकिन क्या तुम जानते नहीं कि हम चिड़ियों के राजा हैं, और तुम्हें तक तक हमसे मुखातिब नहीं होना चाहिए जब तक हम खुद तुम्हें इजाज़त न दें ?"

अबाबील ने कहा, "मेरे ख़याल से हम सब एक ही परिवार से हैं |"

उकाब ने नफरत से उसे देखा और कहा, "ये तुमसे किसने कहा कि हम और तुम एक ही परिवार से हैं ?"

तभी अबाबील ने जवाब दिया, "और मैं आपको बता दूँ, कि मैं आपसे कहीं अधिक ऊंचा उड़ सकता हूँ, मैं गा सकता हूँ तथा दुनिया के बाकी प्राणियों को ख़ुशी दे सकता हूँ | और आप न तो सुकून देते हैं , न ख़ुशी |"

उकाब को गुस्सा आ गया, और उसने कहा, "सुकून और ख़ुशी ! क्षुद्र अहंकारी जीव | अपनी चोंच के एक हमले से मैं तुम्हारा नामोनिशान मिटा सकता हूँ | आकार में मेरे पंजों के बराबर भी नहीं हो तुम |"

यह सुनते ही अबाबील उड़ कर उकाब की पीठ पर बैठ गया | और उसके पंख नोचने लगा | उकाब अब परेशान हो गया था, और तेज़ी से ऊंची उड़ान भरने लगा ताकि अपनी पीठ पर बैठे अबाबील से छुटकारा पा सके | लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली | आख़िरकार, हारकर वह उसी पहाड़ी चोटी की चट्टान पर गिरकर अपने भाग्य को कोसने लगा | 'क्षुद्र जीव' अभी भी उसकी पीठ पर सवार था |

उसी समय वहाँ से एक छोटा कछुआ गुजरा, ये दृश्य देखकर वह जोर से हँसा, और इतनी जोर से हँसा कि दोहरा होकर पीठ के बल गिरते गिरते बचा |

उकाब ने कछुए की तरफ नीचे देखा और कहा, "जमीन पर रेंग के चलने वाले, तुम्हें किस बात पर इतनी हँसी आ रही है ?"

और तब कछुए ने जवाब दिया, "मैं देख रहा हूँ कि तुम घोड़े बन गए हो , और वो छोटी चिड़िया तुम पर सवारी कर रही है, छोटी चिड़िया तुम दोनों में बेहतर साबित हो रही है |"

ये सुनकर उकाब ने उससे कहा, "जाओ , जाओ , अपना काम करो | ये मेरे भाई अबाबील और मेरे बीच की बात है | ये हमारे परिवार का मामला है |"

Tuesday, January 18, 2011

ख़लील ज़िब्रान : एक यायावर



छोटे हों तो उम्र बताने में कोई हर्ज नहीं , इसी तर्ज पर मैं ये साफ़ कर दूँ कि अनुवाद की ये मेरी पहली कोशिश है | अशोक भाई के आह्वान पर कल थोड़ा सोचकर मैंने पाया कि ख़लील ज़िब्रान साहब के लिखे से मैं काफी प्रभावित हूँ | फौरी तौर पर उनकी बिलकुल अलहदा सोच से, जो किसी लेखक के बनिस्बत सूफी संतों के ज्यादा करीब लगती है |

यायावर
चौराहे पर वह मुझे मिला, चोगा पहने हुए, और छड़ी का सहारा लिए | उसके चेहरे पर दर्द साफ़ नुमांया हो रहा था | हमने एक दूसरे का अभिवादन किया, और तब मैंने उससे कहा, "कृपया मेरे घर आकर कुछ दिन मेरे मेहमान बनें |"

उसने स्वीकार किया |

मेरी पत्नी और बच्चे, घर की देहरी पर ही उससे मिले | उन्हें देखकर वह मुस्कुराया, मेरे घरवालों को भी उसका आना भला लगा |

उसके बाद हम लकड़ी के एक तख्ते पर बैठ गए | उसकी शांति और रहस्यमयता की वजह से हमें उसके साथ बैठकर काफी सुकून महसूस हुआ |

रात्रिभोज के बाद हम अलाव के पास बैठ गए, और मैंने उससे उसकी पिछली यात्राओं के बारे में पूछा |

उस रात और उसके अगले दिन उसने हमें कई किस्से सुनाये, लेकिन जो कहानियाँ मैं अभी लिख रहा हूँ वे उसके कडुवे अनुभव के किस्से हैं , हालांकि वो खुद बहुत दयालु था | ये किस्से उसके रास्तों की गर्द और धैर्य के किस्से हैं |

और तीन दिन बाद वो चला गया तो उसका जाना हमें किसी मेहमान का जाना नहीं लगा, बल्कि किसी अपने का ही थोड़ी देर के लिए बगीचे में सैर के लिए जाना जैसा लगा, जो अभी तक वापस नहीं आया है |


लिबास
एक बार सुन्दरता और कुरूपता समंदर के किनारे मिले, उन्होंने एक दूसरे से कहा , "चलो , थोड़ा समंदर में नहा लें |"

उन्होंने अपने कपडे उतारकर एक जगह रखे और पानी में तैरने लगे | और कुछ देर बाद, कुरूपता तट पर वापस आकर और खुद को सुन्दरता की पोशाक में संवारकर और चुपके से वहाँ से चला गया |

और कुछ समय बाद सुन्दरता भी समंदर से बाहर आई, अपनी पोशाक उसे वहाँ पर नहीं मिली | उसे अपनी अवस्था पर काफी शर्म आ रही थी , इसलिए उसने कुरूपता की ही पोशाक पहन ली | और वह अपने रास्ते चली गयी |

और उस दिन के बाद से लोग उन दोनों में , एक को दूसरा समझने की ग़लती करते हैं |

फिर भी कुछ है जिन्होंने सुन्दरता के चेहरे को ध्यान से देखा है और उसके कपड़ों के बावजूद वे उसे पहचान लेते हैं | और कुछ हैं जिन्होंने कुरूपता के चेहरे को जाना है, और उसके कपडे भी उनकी आँखों में धूल नहीं झोंक पाते |

कल्चर शॉक वाया टोक्यो फ्रॉम कावासाकी




अपना देस फिर अपना होता है ,

अपनी बोली-बानी,भेस,पुरवा-बसन्ती ,

मालपुवा, चिवड़ा, भाजी, दिवाली, घरवाली , तरकारी,

कपास की कमीज़ अंगरेजी काट की

और क्या बात है साहब कुतुब की लाट की

अपना देस फिर अपना होता है

लेकिन क्यों नहीं होतीं सब सड़कें धुली-पुछी सी ,

थूकते क्यों है लोग इतना के अरब सागर में पानी जितना ,

लाइन में खड़े होना या के फिर साइकिल ही चलाना

या पैदल ही चल लेने में आबरू क्यों डाउन जाती है

और वो झंडु बाम वाली पतुरिया काहे इतना कमर हिलाती है

और क्यों कभी संझा के झुटपुटे में झोला उठाए दफ़्तर छोड़ने से पहले ६० डिग्री नमकर

क्यों नहीं कहते कबहुँ, कभी, किसी भी रोज़ मेरे देसवासी भी

---– ओस्कारे समादेश्ता.... ओस्कारे समा.....यानि आपने आज जो मेहनत की बाउजी उसका धन्यवाद ।

बहरहाल अपना देस फिर अपना होता है......


Monday, January 17, 2011

एक चीनी लोककथा - २




जो भी हो वाई था तो मूर्ख ही. अगर वह झांग हाओगु की परीक्षा लेना ही चाहता था तो उसने उसे इम्तहान में बैठने की अनुमति दे देनी थी. उसे अपना व्यक्तिगत कार्ड देने की क्या ज़रूरत थी? कार्ड हाथ में थामे झांग हाओगु जब परीक्षास्थल पहुंचा तो एक अधिकारी उसे बाकायदा अपने साथ भीतर तक ले गया.

भीतर पहुँचने के बाद उसने कार्ड दिखाया. वाई का कार्ड देखते ही दोनों मुख्य परीक्षक अपनी जगह से उछल पड़े. एक बोला: "यह आदमी राजकुमार वाई का भेजा हुआ है. ज़रूर उसका नज़दीकी रिश्तेदार होगा. हम उसे इम्तहान देने से नहीं रोक सकते." "नहीं" दुसरे ने प्रतिवाद किया. "सारे कमरे भरे हुए हैं."

"जो भी हो हमें उसके लिए ख़ास इंतज़ाम करने होंगे. वह राजकुमार वाई का करीबी है. वरना इतनी रात को वह अपना कार्ड देकर इसे यहाँ क्यों भेजते? हमें जल्द उसके वास्ते एक कमरा ख़ाली करना होगा. ऐसा तो हर हाल में करना होगा. चाहे हमें रात भर बाहर रहना पड़े." झांग हाओगु को भीतर बुला लिया गया. कुछ समय सोचने के बाद दोनों परीक्षक यह तय करने में जुट गए कि उन्हें करना क्या है.

एक बोला: "चलो उसे परचा दे दें."

"नहीं" दूसरा बोला."हमें तो ये भी नहीं मालूम कि इस ने कौन सी किताबें पढी हैं. मान लिया हमारे सवालों का यह सही जवाब न दे सका तो फ़ेल हो जाएगा और राजकुमार नाराज़ हो जाएंगे."

"तो क्या किया जाए."

"ऐसा करते हैं कि उसका परचा हम ही लिख देते हैं. मैं उत्तर बोलता हूम तुम लिखते जाओ."

सो उन्होंने झांग हाओगु का परचा पूरा किया. फिर उन्होंने सोचा - "अगर हम उसे अव्वल स्थान दे देते हैं तो यह कुछ ज़्यादा ही ज़ाहिर हो जाएगा. दूसरा स्थान देना उचित रहेगा."

इस तरह बिना एक भी शब्द लिखे झांग हाओगु ने दूसरा स्थान पा लिया.

दो दिन बाद सारे सफल परीक्षार्थी दोनों परीक्षकों को धन्यवाद देने पहुंचे. लेकिन झांग हाओगु नहीं आया. उसे इस तरह के किसी प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं थी.

दोनों परीक्षक सोच में पड़ गए. एक बोला - "ऐसा लगता है झांग हाओगु को नियमों की जानकारी नहीं है. हालांकि वह राजकुमार वाई का रिश्तेदार है लेकिन अगर हमने उसकी मदद न की होती तो वह दूसरे नम्बर पर कभी नहीं आ सकता था.यह कोई उचित बात तो नहीं लगती कि वह हमें धन्यवाद देने तक नहीं आया." "खैर छोड़ो हम तो यह सब राजकुमार केलिए कर रहे हैं. उन्होंने ही झांग हाओगु को आधी रात अपने कार्ड के साथ भेजा था. झांग हाओगु अवश्य कोई रिश्तेदार होगा या काफ़ी नज़दीकी दोस्त. जब वह बड़ा अफ़सर बन जाएगा हमें उसकी ज़रूरत पड़ेगी. सो हमें बुरा मानने के बजाय ख़ुद उससे मिलने जाना चाहिए."

झांग हाओगु के पास पहुंच कर दोनों परीक्षक उस से बोले - " अगर उस रात आप राजकुमार का कार्ड लेकर नहीं आते तो आपको इम्तहान में बैठने नहीं दिया जाता." उनका मन्तव्य न समझते हुए झांग हाओगु ने कुछ अनर्गल सा जवाब दिया. उनके जाने के बाद उसे बतलाया गया कि राजकुमार वाई असल में कौन है. तब जा कर उसकी समझ में सारी बात आई. उसने राजकुमार वाई के पास पहुंच कर उसे धन्यवाद देना तय किया. उसने बहुट सारे महंगे उपहार खरीदे और वाई के दरवाज़े पर पहरेदार को अपना कार्ड और उपहारों की सूची प्रस्तुत की. वाई ने झांग हाओगु का नाम कभी सुना तक नहीं था और वह उस से मिलना भी नहीं चाहता था लेकिन चूंकि उपहारों की सूची ख़ासी प्रभावशाली थी उसने झांग हाओगु को भीतर बुलवा लिया. झांग हाओगु ने वाई से कहा - "अगर उस दिन आप मुझे अपना कार्ड न देते तो मैं इम्तहान में नहीं बैठ सकता था. यह आपका अहसान था कि मैं दूसरे स्थान पर आया हूं. मैं दिल से आपका धन्यवाद करता हूं."

"ओह! यह तो वा़कई ख़ासा पढ़ा-लिखा आदमी निकला!" वाई ने सोचा. "इसी लिए यह उस रात इस तरह बात कर रहा था.आगे जब मैं राजा बन जाऊंगा यह मेरे काम आने वाला है.." वाई ने अपने सेवकों से झांग हाओगु की शान में एक आलीशान भोज तैयार करने को कहा. झांग हाओगु के खूब खा-पी चुकने के बाद वाई उसे छोड़ने बाकायदा दरवाज़े तक आया. यह समाचार जल्द ही समूचे बीजिंग में फैल गया और अफ़सरान में खलबली मच गई.

उन्होंने आपस में कहा - "जब हम राजकुमार के पास गए थे हमें तो वे छोड़ने दरवाज़े तक नहीं आए थे. और झांग हाओगु जैसे नौसिखिए के साथ ऐसा दोस्ताना सुलूक किया गया. अवश्य ही वह या तो राजकुमार का रिश्तेदार है या निकट का दोस्त." "जब वे दोनों दरवाज़े पर थे राजकुमार झांग हाओगु के साथ काफ़ी इज़्ज़त से पेश आ रहे थे. हो सकता है झांग हाओगु राजकुमार का सीनियर हो." "अगर वह इतना ही वरिष्ठ है तो हमें मिलकर सम्राट से सिफ़ारिश करनी चाहिये कि झांग हाओगु को कोई बड़ा पद दिया जाए. आगे जा कर वह हमारी मदद ही करेगा."

(कहानी का समापन कल. कहीं जाना पड़ रहा है अभी. एक इमरजेन्सी आन पड़ी है.)

एक चीनी लोक कथा - १



परसों रात एक दोस्त के कबाड़ख़ाने में एक दुबली सी किताब मिली - ट्रेडीशनल कॉमिक टेल्स. पांडा बुक्स के इस प्रकाशन में चीन की चुनिन्दा पारंपरिक लोकगाथाएं एकत्र की गयी हैं. कल दिन-रात इसे पढ़ते हुए प्रसन्न हुआ किया. सोचता हूँ मौका मिलते ही इस किताब का अनुवाद कर दूंगा. हम लोग बस हिंदी-हिंदी करते रहते हैं. बाकी भाषाओँ के लिए उनके लोगों ने कैसी कैसी चीज़ें जुटायीं. यह मुझे इस पुस्तक को पढ़ते हुए अहसास हुआ. ऐसा ही कुछ इतालो काल्विनो द्वारा इकठ्ठा की गयीं इतालवी लोक कथाओं के खासे वृहद् संग्रह का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ते हुए लगा था. मुझे हिंदी प्रदेश की सबसे युवा पीढ़ी से उम्मीद है की अनुवाद के क्षेत्र में वह बड़ा काम करने को आगे आएगी. समकालीन हिंदी का परिदृश्य इस कदर उचाट और नाउम्मीद करने वाला है कि मुझे उस में कुछ नया पा सकने कि संभावनाएं फिलहाल नज़र नहीं आतीं.

छोड़िये! चीनी लोक कथाओं के इस संग्रह से आप के लिए एक कथा का अनुवाद करना शुरू कर रहा हूँ. दोएक दिन लगेंगे. मौज आएगी. लपूझन्ने की तर्ज़ पर मनी बैक गारंटी.



तीन पदोन्नतियां

जो क़िस्सा मैं बताने जा रहा हूँ , मिंग साम्राज्य के दौर में घटा था. शांदोंग प्रदेश के लिंकिंग जिले में एक रईस आदमी अपने परिवार के साथ रहा करता था. इस परिवार के इकलौते बेटे झांग हाओगु को बहुत लाड़ के साथ पाला-पोसा गया था. झांग हाओगु कभी स्कूल भी नहीं गया. जब वह बड़ा हुआ, उसके पास फ़ालतू की चीज़ों में समय जाया करने के आलावा कोई काम नहीं होता था. हर रोज़ भरपेट खाना - पीना के चुकने के बाद वह पिंजरे में बंद अपनी पालतू चिड़िया थामे शहर की गलियों में घूमा करता था. लोगों ने उसका मज़ाक बनाने की नीयत से उसका नामकरण 'पिल्ला' कर दिया.

एक दिन ऐसे ही घूमते हुए उसने किसी चौराहे पर एक भविष्यवक्ता को देखा. भीड़ उसे घेरे हुए थी. झांग हाओगु ने उसके पास जाने का फैसला किया. जैसे ही भविष्यवक्ता ने झांग हाओगु को देखा, उसने जान लिया कि आज इस रईसजादे से मोटी रकम ऐंठी जा सकती है. वह भीड़ की अनदेखी करता हुआ झांग हाओगु के पास जाकर बोला - " बड़े भाई! आपकी आँखें बेहद तीखी हैं और भौहें मुड़ी हुईं. आप तो बहुत बड़े अफसर बनेंगे. आपका चौड़ा माथा बतला रहा है कि आप राजदरबार में कोई बड़ा काम सम्हालने वाले हैं. इस के लिए आपने इतना करना है कि बीजिंग में होने वाली एक परीक्षा में बैठना है. जब आप उस में सफल हो कर आयेंगे तो आपको बधाई देने वाला मैं पहला आदमी होऊंगा."

अगर झांग हाओगु होशमंद इंसान होता तो इस चापलूसी को सुनकर भविष्यवक्ता को पीट-पीट कर अधमरा कर देता. उसे न पढ़ना आता था, न लिखना. वह इम्तहान देने बीजिंग कैसे जा सकता था? मगर उसने इस बाबत बिलकुल नहीं सोचा. उस के मन में बस यह आया: मेरे बाप के पास बहुत पैसा है और मैं आसानी से बड़ा अफसर बन सकता हूँ. सो नाराज़ होने के बजाय उसने खुश होते हुए कहा - "क्या तुम्हें पक्का यकीन है कि मैं इम्तहान में सफल हो जाऊंगा?"

"इसमें ज़रा भी शक नहीं बड़े भाई. आप तो उत्तीर्ण होने वालों की सूची में शुरू के तीन लोगों में होने वाले हैं."

"ये लो. अभी मेरे पास चांदी के यही दो सिक्के हैं. अगर मैं पास हो गया तो तुम्हें और दूंगा. नहीं हुआ तो हिसाब बाद में बराबर किया जाएगा."

भविष्यवक्ता ने मन ही मन सोचा - "पिल्ले, तब तक तो मैं पता नहीं कहाँ होऊंगा."

घर पहुँच कर झांग हाओगु ने सामान बाँधा, कुछ रकम और सोना साथ लिया और बीजिंग की राह लग लिया. उस के दिमाग में एक बार भी नहीं आया की वह अनपढ़ है और किसी इम्तहान में बैठना तक उस के लिए मुमकिन नहीं. खैर, बखत बखत की बात!

जब वह बीजिंग पहुंचा, इम्तहान का आखिरी दिन था. शहर का पश्चिमी द्वार बंद हो चूका था पर उसकी किस्मत थी की उसे शहर में पानी की सप्लाई करने वालों का साथ मिल गया. मिंग और क़िंग साम्राज्यों के दौरान राजा लोग बीजिंग के बाहरी छोर पर अवस्थित प्राकृतिक स्रोत का पानी पिया करते थे और हर शाम को घोड़ा गाड़ियाँ पानी लेकर शहर आया करती थीं. झांग हाओगु को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था. वह इस गाड़ियों के पीछे-पीछे चलता हुआ शहर में प्रविष्ट हो गया. पहरेदारों ने भी उस पर यह सोच कर कोई ध्यान नहीं दिया की वह भी पाने सप्लाई करने वाली टीम का सदस्य होगा.

शहर के भीतर झांग हाओगु को ज़रा भी गुमान नहीं था कि इम्तेहान कहाँ हो रहा है. वह ऐसे ही गलियों में भटकता रहा. एक चौराहे पर उसने देखा कि कुछ लोग दो लालटेनें लिए चले आ रहे हैं. इस समूह के बीच में रात की पहरेदारी पर निकला एक अफसर था - राजकुमार वाई झोन्ग्ज़िआन. इस समूह को देख कर झांग हाओगु का घोड़ा बेकाबू हो गया और अफसर के घोड़े से जा भिड़ा. पुराना कोई दिन होता तो वाई ने झांग हाओगु को मरवा दिया होता क्योंकि वह सम्राट झियोंग का पसंदीदा हिजड़ा था और उसे सम्राट ने यह अनुमति दे रखी थी कि बिना रपट के वह किसी को भी मरवा दे. लेकिन आज वह जानना चाहता था कि यह अजनबी दिख रहा आदमी है कौन. उस ने अपने घोड़े कि लगाम खींचते हुए चीख कर कहा - "क्या तू जीने से थक है बे?" झांग हाओगु को क्या पता कि उस के सामने कौन है.उस ने चिल्ला कर कहा - "मुझ से इस अंदाज़ में बात न कर. मुझे एक ज़रूरी काम पर जाना है."

"क्या काम है?"

"मैं शांदोंग से यहाँ तक सिर्फ इस लिए आया हूँ कि राजकीय परीक्षा में बैठ सकूं. अगर मुझे देर हो गयी तो मैं शुरू के तीन सफल लोगों में कैसे आ पाऊंगा?"

"क्या तुम्हें पका यकीन है कि तुम शुरू के तीन में आ जाओगे?"

"अगर ऐसा न होता तो मैं यहाँ आता ही क्यों."

"मगर परीक्षा-कक्ष तो बंद हो गया होगा अब तक."

"कोई बात नहीं. मैं खटखटा कर दरवाज़े खुलवा लूँगा."

वाई ने सोचा - यह आदमी कह रहा है कि वो शुरू के तीन लोगों में होगा. क्या यह वाकई इस कदर पढ़ा-लिखा है? या सिर्फ गप्प मार रहा है.सो उस ने चीखते हुए कहा - " ठीक है! इसे मेरा कार्ड दे दो और इम्तहान में बैठने दो." वाई यह देखना चाहता था कि यह आदमी कितना काबिल है.

(अगला हिस्सा रात तक)

पंचतंत्र से एक कहानी - चतुर खरगोश




एक वन में हाथियों का एक झुंड रहता था | झुंड के सरदार को गजराज कहते थे | वो विशालकाय, लम्बी सूंड तथा लम्बे मोटे दाँतों वाला था | खंभे के समान उसके मोटे मोटे पैर थे | जब वो चिंघाड़ता था तो सारा वन गूँज उठता था |
गजराज अपने झुंड के हाथियों से बड़ा प्यार करता था | स्वयं कष्ट उठा लेता था, पर झुंड के किसी भी हाथी को कष्ट में नहीं पड़ने देता था | और सारे के सारे हाथी भी गजराज के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे |
एक बार जलवृष्टि न होने के कारण वन में जोरों का अकाल पड़ा | नदियां, सरोवर सूख गए | वृक्ष और लताएँ भी सूख गयी | पानी और भोजन के अभाव में पशु-पक्षी वन को छोड़कर भाग खड़े हुए | वन में चीख-पुकार होने लगी, हाय-हाय होने लगी |
गजराज के झुंड के हाथी भी अकाल के शिकार होने लगे | वे भी भोजन और पानी न मिलने से तड़प-तड़पकर मरने लगे | झुंड के हाथियों का बुरा हाल देखकर गजराज बड़ा दुखी हुआ | वह सोचने लगा, कौन सा उपाय किया जाए, जिससे हाथियों के प्राण बचें |
एक दिन गजराज ने तमाम हाथियों को बुलाकर उनसे कहा, "इस वन में न तो भोजन है, न पानी है ! तुम सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाओ, भोजन और पानी की खोज करो |"
हाथियों ने गजराज की आज्ञा का पालन किया | हाथी भिन्न-भिन्न दिशाओं में छिटक गए |
एक हाथी ने लौटकर गजराज को सूचना दी, "यहाँ से कुछ दूर पर एक दूसरा वन है | वहाँ पानी की बहुत बड़ी झील है | वन के वृक्ष फूलों और फलों से लदे हुए हैं |"
गजराज बड़ा प्रसन्न हुआ | उसने हाथियों से कहा, "अब हमें देर न करके तुरंत उसी वन में पहुँच जाना चाहिए, क्योंकि वहां भोजन और पानी दोनों हैं |"
गजराज अन्य हाथियों के साथ दुसरे वन में चला गया | हाथी वहां भोजन और पानी पाकर बड़े प्रसन्न हुए |
उस वन में खरगोशों की एक बस्ती थी | बस्ती में बहुत से खरगोश रहते थे | हाथी खरगोशों की बस्ती से ही होकर झील में पानी पीने के लिए जाया करते थे |
हाथी जब खरगोशों की बस्ती से निकलने लगते थे, तो छोटे-छोटे खरगोश उनके पैरों के नीचे आ जाते थे | कुछ खरगोश मर जाते थे, कुछ घायल हो जाते थे |
रोज-रोज खरगोशों के मरते और घायल होते देखकर खरगोशों की बस्ती में हलचल मच गयी | खरगोश सोचने लगे, यदि हाथियों के पैरों से वे इसी तरह कुचले जाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब उनका खात्मा हो जायेगा |
अपनी रक्षा का उपाय सोचने के लिए खरगोशों ने एक सभा बुलाई | सभा में बहुत से खरगोश इकट्ठे हुए | खरगोशों के सरदार ने हाथियों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए कहा, "क्या हममें से कोई ऐसा है, जो अपनी जान पर खेलकर हाथियों का अत्याचार बंद करा सके ?"
सरदार की बात सुनकर एक खरगोश बोल उठा, "यदि मुझे खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेजा जाये, तो मैं हाथियों के अत्याचार को बंद करा सकता हूँ |"
सरदार ने खरगोश की बात मान ली और खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेज दिया |
खरगोश गजराज के पास जा पहुंचा | वह हाथियों के बीच में खड़ा था | खरगोश ने सोचा, वह गजराज के पास पहुंचे तो किस तरह पहुंचे | अगर वह हाथियों के बीच में घुसता है, तो हो सकता है, हाथी उसे पैरों से कुचल दें |
यह सोचकर वह पास ही की एक ऊँची चट्टान पर चढ़ गया | चट्टान पर खड़ा होकर उसने गजराज को पुकारकर कहा, "गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं | चंद्रमा के पास से तुम्हारे लिए एक संदेश लाया हूं |"
चद्रमा का नाम सुनकर, गजराज खरगोश की ओर आकर्षित हुआ | उसने खरगोश की ओर देखते हुए कहा, "क्या कहा तुमने ? तुम चद्रमा के दूत हो ? तुम चंद्रमा के पास से मेरे लिए क्या संदेश लाये हो ?"
खरगोश बोला, "हां गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं | चद्रमा ने तुम्हारे लिए संदेश भेजा है | सुनो, तुमने चंद्रमा की झील का पानी गंदा कर दिया है | तुम्हारे झुंड के हाथी खरगोशों को पैरों से कुचल-कुचलकर मार डालते हैं | चंद्रमा खरगोशों को बहुत प्यार करते हैं, उन्हें अपनी गोद में रखते हैं | चंद्रमा तुमसे बहुत नाराज हैं | तुम सावधान हो जाओ | नहीं तो चंद्रमा तुम्हारे सारे हाथियों को मार डालेंगे |"
खरगोश की बात सुनकर गजराज भयभीत हो उठा | उसने खरगोश को सचमुच चंद्रमा का दूत और उसकी बात को सचमुच चंद्रमा का संदेश समझ लिया | उसने डर कर कहा, "यह तो बड़ा बुरा संदेश है | तुम मुझे फ़ौरन चंद्रमा के पास ले चलो | मैं उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करूँगा |"
खरगोश गजराज को चंद्रमा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गया | उसने कहा, "मैं तुम्हें चंद्रमा के पास ले चल सकता हूं, पर शर्त यह है कि तुम अकेले ही चलोगे |"
गजराज ने खरगोश की बात मान ली |
पूर्णिमा की रात थी | आकाश में चंद्रमा हँस रहा था | खरगोश गजराज को लेकर झील के किनारे गया | उसने गजराज से कहा, "गजराज, मिलो चंद्रमा से |"
खरगोश ने झील के पानी की ओर संकेत किया | पानी में पूर्णिमा के चंद्रमा की परछाईं को ही चंद्रमा मान लिया |
गजराज ने चंद्रमा से क्षमा मांगने के लिए अपनी सूंड पानी में डाल दी | पानी में लहरें पैदा हो उठीं, परछाईं अदृश्य हो गई |
गजराज बोल उठा, "दूत, चंद्रमा कहां चले गए ?"
खरगोश ने उत्तर दिया, "चंद्रमा तुमसे नाराज हैं | तुमने झील के पानी को अपवित्र कर दिया है | तुमने खरगोशों की जान लेकर पाप किया है इसलिए चंद्रमा तुमसे मिलना नहीं चाहते |"
गजराज ने खरगोश की बात सच मान ली | उसने डर कर कहा, "क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे चंद्रमा मुझसे प्रसन्न हो सकते हैं ?"
खरगोश बोला "हां, है | तुम्हें प्रायश्चित करना होगा | तुम कल सवेरे ही अपने झुंड के हाथियों को लेकर यहाँ से दूर चले जाओ | चंद्रमा तुम पर प्रसन्न हो जायेंगे |"
गजराज प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो गया | वह दूसरे दिन हाथियों के झुंड सहित वहां से चला गया |
इस तरह खरगोश की चालाकी ने बलवान गजराज को धोखे में डाल दिया | और उसने अपनी बुद्धिमानी के बल से ही खरगोशों को मृत्यु के मुख में जाने से बचा लिया |

Sunday, January 16, 2011

सीखना



अमेरिकी कवि जेराल्ड स्टर्न(जन्म - १९२५) की कविता 'व्हैन आई हैव रीच्ड द पौइंट ऑफ सफोकेशन' से एक टुकड़ा आप लोगों के वास्ते:


सालों लग जाते हैं यह शऊर पाने में
कि सुन्दर चीज़ों के तबाह हो चुके होने को कैसे देखा जाए
यह सीखने में कि
उस जगह को कैसे छोड़ दिया जाना चाहिए
जहाँ आप पर ज़ुल्म हो रहे हों लगातार
और यह जान सकने में
कि निपट ख़ालीपन
के बीच से कैसे निर्मित किया जा सकता है
अपना पुनर्जीवन.

Saturday, January 15, 2011

क्या तुमने फिल्म '300' देखी है ?





एक छोटी सी जगह है पाकिस्तान में, सारागढ़ी | ऐसा ज्यादा कुछ एतिहासिक नहीं है उसमे | महाराज रणजीत सिंह ने अपने राज में कई दुर्ग बनाये थे | तो ऐसे ही दो दुर्ग गुलिस्तान और लोखार्ट के बीच संचार व्यवस्था बनाये रखने के लिए सारागढ़ी दुर्ग बनाया गया | लेकिन इतिहास में उस जगह का नाम एक ख़ास वजह से दर्ज है | 12 सितम्बर 1897 को 10 हजार अफगान और पश्तून लड़ाकों और संख्या में महज 21 सिखों के बीच हुए मुकाबले की वजह से |

अफगान विद्रोह 1897 में अपने चरम पे था | गुलिस्तान दुर्ग पर हमले की कई कोशिशों को नाकाम किया जा चुका था | अफगान लड़ाकों ने अब अपना ध्यान सारागढ़ी पर किया, क्योंकि सारागढ़ी सूचना केंद्र था जिसे तबाह करना जरूरी था | पूरी घटना का ब्यौरा कुछ यों था |

1. सुबह 9 बजे करीब दस हज़ार अफगान लड़ाकों ने सारागढ़ी दुर्ग को घेर लिया |
2. सरदार गुरमुख सिंह ने लोखार्ट दुर्ग पर कर्नल हौटन को सूचना भेजी कि उन्हें घेर लिया गया है |
3. कर्नल हौटन ने मदद भेजने से हाथ खड़े कर दिए |
4. भगवान सिंह सबसे पहले घायल हुए, लाल सिंह गंभीर रूप से घायल हुए |
5. लाल सिंह, जीवा सिंह भगवान सिंह के मृत शरीर को अफगान फौज से लड़ते हुए अन्दर के सुरक्षा घेरे तक लाये |
6. दुर्ग के खुले दरवाजे से प्रवेश करने के अफगान फौजों के दो प्रयासों को विफल कर दिया गया |
7. अफगान फौजों ने कई बार आत्मसमर्पण करने को कहा, मुमकिन है कई प्रलोभन भी दिए हों |
8. दीवार में सेंध लगाने में अफगान फौजें कामयाब हुई |
9. उसके बाद आमने सामने के युद्ध की भूमिका बननी शुरू हो गयी |
10. ईशर सिंह ने अपने आदमियों को आंतरिक सुरक्षा घेरे में चले जाने का हुक्म दिया और खुद अफगान फौजों पर टूट पड़े |
11. लेकिन सुरक्षा घेरा टूट चुका था , 'जो बोले सो निहाल , सत श्री अकाल' के जयघोष के साथ सिखों ने आखिरी युद्ध के लिए तलवारें खींच ली |
12. सारे सिख कई सारे पश्तून सिपाहियों के साथ मारे गए |

सारागढ़ी को अंग्रेजों ने अगले दिन अपने कब्जे में ले लिया था | पश्तून सिपाहियों ने बाद में स्वीकार किया कि उनके 180 सिपाही मारे गए और कई सारे घायल हुए हैं | दुर्ग में हमले के बाद करीब ६०० लाशें बरामद हुई थी | तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन लड़ाकों को श्रद्धांजलि देने के लिए हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मन्दिर) के पास गुरुद्वारा सारागढ़ी साहिब बनाया है | ब्रिटिश संसद ने खड़े होकर इस युद्ध में वीरगति पाए सिपाहियों को सम्मान दिया था | संसद ने वक्तव्य जारी करते हुए कहा - 'ब्रिटिश, साथ ही भारतीय भी, 36 सिख रेजीमेंट की बहादुरी पर गर्व महसूस करते हैं | ये कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि दुनिया में वो सेना कभी हार नहीं सकती जिसके पास ऐसे बहादुर सिख जान की बाजी लगाने को तैयार हों |'

बहरहाल, महत्वपूर्ण ये नहीं कि कब क्या हुआ, या घटनाएं किस क्रम में हुई | महत्वपूर्ण ये भी नहीं कि वो लड़ किससे रहे थे, किसके लिए रह थे, क्यों लड़ रहे थे | महत्वपूर्ण ये है कि वे लड़े, उन्हें झुकना नहीं था | महत्वपूर्ण ये है कि उन्हें पता था कि 'खालसा' क्या होता है, वे खालिस लोग थे | ये सिर्फ कागजी विवरण हैं, लेकिन इन्हें पढ़ते हुए भी सर में खून जम जाता है | क्या तो जिगर रहा होगा उन इक्कीस लोगों का, जिन्हें सामने दस हजार लोग नजर आ रहे होंगे | उनके पास समय नहीं था रूककर अपनी भावनाएं देखने का | उनके सामने बस एक ही लक्ष्य था, वो लक्ष्य भी उन्होंने सोचकर नहीं लिया होगा | लोग उन्हें पागल कहें, सिरफिरा कहें, या आगे उनके लिए स्मारक बनायें, ये भी कह सकते हैं कि आत्मसमर्पण कर सकते थे, ये सब भी उन्हें सोचने का वक़्त नहीं मिला होगा | बात यहाँ पर इस चीज़ की भी नहीं है, कि लड़ाई से कभी भला हुआ या नहीं | अगर उनके पास वक़्त रहता तो इस तरह की बौद्धिक बहस वे भी करते | देश भर में हडतालें, आन्दोलन कर सकते थे | शांति मार्च करते, दांडी में नमक क़ानून तोड़ते | आजादी के बाद शायद चुनाव लड़ते, या देश की बसें फूंकते | वे लोग किसी विचारधारा के तहत ऐसा नहीं कर रहे थे | न उन लोगों को गुरु गोबिंद सिंह की बात याद रही होगी कि 'चिड़ियों से मैं बाज तुडाऊं' | दिल में कहीं ग्रन्थ साहिब पर ऐतबार, ऐतराज का सवाल भी न आया हो | लेकिन उनके पास मौत का सिर्फ एक सेकंड था, और उस पल में उन्हें जिंदगी से ईमानदार होना था |

कौन सही है कौन गलत, ये तुम लोग करते रहो | लेकिन वादों, इज्मों और त्वों को परे रखकर बस एक बार खुद से ईमानदार बनो | महज सौ-सवा सौ साल पुरानी इस घटना को हम यों ही भूल गए हैं | क्यों नहीं इसे साहित्य कला या सिनेमा में जगह मिलती | आज लोहड़ी , मकर संक्रांति की शुभकामनाएं देते हुए ये कबाड़ी उन लोगों को, बस उन्ही पलों को याद रखना चाहता है |

Friday, January 14, 2011

मैं मीर मीर कह उस को बहुत पुकार रहा




गली में उसकी गया सो गया न बोला कुछ
मैं मीर मीर कह उस को बहुत पुकार रहा

कल देर रात एक मित्र से ख़ुदा-ए-सुखन मीर तकी मीर की शायरी पर चर्चा होती रही.

कहना ने होगा मीर को मैं दुनिया का महानतम प्रेम कवि मानता हूँ. मीर से यह लगाव बरसों पुराना है और हमारी यह पहचान उत्तरोत्तर गहरी होती चली गयी है.

मीर की बात करूं और उनका कोई शेर न पेश किया जाए ऐसा मुमकिन नहीं. सिरहाने मीर के अहिस्ता बोलो, अभी टुक रोते-रोते सो गया है कहने वाले मीर का एक पसंदीदा शेर इस तरह है:

या रोये या रुलाया, अपनी तो यूँ ही गुज़री
क्या ज़िक्र हमसफीरां यारान-ए-शादमां का

बाबा मीर की कविता ये लगाव मेरे प्रिय समकालीन हिंदी कवियों में एक आलोक धन्वा का भी शगल है. उनकी एक कविता मीर को समर्पित है और बहुत सादा शब्दों में मीर की शायरी पर एक ज़रूरी कमेन्ट कराती है और अहसास कराती है की मीर को समझने के लिए तबीयत में एक फक्कड़पन और सीने में गहरे ज़ख्मों का होना बुनियादी ज़रूरत है. कविता प्रस्तुत है:

मीर

मीर पर बातें करो
तो वे भी उतनी ही अच्छी लगती हैं
जितने मीर

और तुम्हारा वह कहना सब
दीवानगी की सादगी में
दिल-दिल करना
दुहराना दिल के बारे में
जोर देकर कहना अपने दिल के बारे में की
जनाब यह वही दिल है
जो मीर की गली से हो आया है.

शीत के आगमन का पर्व -- 'उतना'



आज मकर संक्राँति है. हमारी (लाहुल की पटनी समुदाय की) परम्परा में नव वर्ष का पहला दिन।
मुझे लगा कि अपने नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ आज कबाड़खाने के पाठकों को अपनी आदिम परम्पराओं की एक एक हल्की सी झलक दिखा दूँ. और उन्हे उस भारत से अवगत कराऊँ, जो किताबी, फिल्मी और शहरी दुनिया मे प्राय: दिखाई नही देती।
कहते हैं आज सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है. शायद इसी लिए इस पर्व का नाम ‘उतना’ है. इस पर्व का आयोजन बहुत साधारण सा होता है . घर का सब से बड़ा पुरुष सुबह सवेरे उठ कर स्नान करता है, और घर की छत पर जा कर (लाहुल मे पारम्परिक रूप से समतल छतों का प्रचलन है. ) ग्राम देवता और कुलदेवता को भोग अर्पित करता है. भोग मे सत्तू का शंकवाकार पिण्ड (टोटु) तथा मक्खन का बना दंज़ा (बनबकरा /आईबेक्स) अर्पित किया जाता है. साथ में पवित्र लकड़ी शुर (सरू/ जुनिपर) की धूणी निकाली जाती है. और पुरखों के लिए सत्तू और तेल पिण्ड दान दिया जाता है. उतना पर्व के साथ एक रोचक मिथक यह जुड़ा है कि आज के दिन शीत देवता ऊंचे हिमनदों से उतर कर चन्द्रभागा संगम मे स्नान करता है. साक्षात यक (आईस) का बना वह देव इक्कीस दिनो तक नदी मे ही निवास करता है. और इन दिनो नदी जम जाती है।
२२ वे दिन वह बाहर निकलता है।
२३ वे दिन खेत पर आता है ।
२४ वे दिन चूल्हे मे घुस जाता है। कहते हैं इस दिन आग मे ताप ही नही होता. और यह सबसे ठंडा दिन होता है. 25वे दिन वह प्रस्थान करता है . उस दिन स्त्रियाँ और बच्चे उसे गीत गा कर विदाई देते हैं. भुर्ज की टहनियों से मवेशियों की पीठ् झाड़ते हैं.... कहते है वह किसी किसी मवेशी से चिपका रह जा सकता है। :-
लीह्ज़ु डेला रे थग्ज़ुईं
डेहलो फुङ रे लेह्तुईं .........
यक की डलियाँ तोड़ो , डेहला के हार पहनो ,
हे शीत देवता अपने ठार जाओ, इन बेज़ुबानो को छोड़ो.....
शीत इली रीत अति.... अर्थात शीत चला गया अब ठंड से राहत मिलेगी।
कहते हैं कि 14 फरवरी को वह अपने मूल स्थान (ग्लेशियर) मे चला जाता है. और तापमान के उतार चढ़ाव के बावत आदिवासियों की यह गणना एक दम सटीक होती है।
उतना मेरे क़बीले मे एक महत्वपूर्ण पर्व है, वर्ष के तमाम बड़े उत्सवों की तिथि उतना के आधार पर ही तय होती है। उतना के बाद जो पहली पूर्णिमा आएगी वह खोगला का दिन होगा. खोगला आग का त्योहार है. इस दिन शुर की मशालें बाँधी जाती जातीं हैं. इन मशालों को हाल्डा कहा जाता है. रात को नियत समय पर घर के सभी पुरुष इन मशालों को ले कर गाँव के बाहर एक स्थान तक ले जातें हैं, वहाँ इकट्ठे हो कर अलाव जलाते हैं तथा पड़ोसी गाँव का हाल्डा भी देखते हैं।
इस के अगले अमावस्य को कुँस त्योहार आता है जो कि सर्दियों का मुख्य त्योहार है. यह वर्ष भर मे वह अकेला दिन होता है जब लाहुल के लोग एक दूसरे का अभिवादन करते हैं. जौ की कोंपले जो अँधेरे मे उगाई जाती हैं, तथा पीली हो जाती हैं इन्हें यौरा कहा जाता है. अभिवादन के दौरान परस्पर यौरा बाँटा जाता है, एक दूसरे के पैर छुए जाते हैं और कुशल मंगल सुख साँत पूछा जाता है. इस उत्सव मे बलराज की पूजा होती है. जो कि समृद्धि और बरक़त के देवता माने जाते हैं . लोक गाथाओं मे इसे बळिदानो तिहार कहा गया है . यह भी मान्यता है कि यह त्योहार पौराणिक राजा बलि अथवा वैदिक असुर बल की स्मृति मे मनाया जाता है. यह उत्सव कई दिनों तक चलता है. खूब माँस एवम मदिरा का सेवन होता है. ( विस्तार से फिर कभी)

Thursday, January 13, 2011

सरोज स्मृति



(महाप्राण पर लिखी पिछली पोस्ट पर कमेन्ट में गिरिजेश जी, अरुण जी ने पूरी कविता देने की बात की थी , तो साहेबान लीजिये पूरी कविता का आनन्द लीजिये |)




सरोज स्मृति

ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!" --


अशब्द अधरों का सुना भाष,
मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश
मैंने कुछ, अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर।
जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर
छोड़ कर पिता को पृथ्वी पर
तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --
"जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,
तारूँगी कर गह दुस्तर तम?" --

कहता तेरा प्रयाण सविनय, --
कोई न था अन्य भावोदय।
श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार
शुक्ला प्रथमा, कर गई पार!


धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।
शुचिते, पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अत: दधिमुख।
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख न सका वे दृग विपन्न;
अपने आँसुओं अत: बिम्बित
देखे हैं अपने ही मुख-चित।

सोचा है नत हो बार बार --
"यह हिन्दी का स्नेहोपहार,
यह नहीं हार मेरी, भास्वर
यह रत्नहार-लोकोत्तर वर!" --
अन्यथा, जहाँ है भाव शुद्ध
साहित्य-कला-कौशल प्रबुद्ध,
हैं दिये हुए मेरे प्रमाण
कुछ वहाँ, प्राप्ति को समाधान

पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त
गद्य में पद्य में समाभ्यस्त। --
देखें वे; हसँते हुए प्रवर,
जो रहे देखते सदा समर,
एक साथ जब शत घात घूर्ण
आते थे मुझ पर तुले तूर्ण,
देखता रहा मैं खडा़ अपल
वह शर-क्षेप, वह रण-कौशल।
व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल
क्रुद्ध युद्ध का रुद्ध-कंठ फल।
और भी फलित होगी वह छवि,
जागे जीवन-जीवन का रवि,
लेकर-कर कल तूलिका कला,
देखो क्या रँग भरती विमला,
वांछित उस किस लांछित छवि पर
फेरती स्नेह कूची भर।


अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
कुछ दिन को, जब तू रही साथ,
अपने गौरव से झुका माथ,
पुत्री भी, पिता-गेह में स्थिर,
छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर।
आँसुओं सजल दृष्टि की छलक
पूरी न हुई जो रही कलक

प्राणों की प्राणों में दब कर
कहती लघु-लघु उसाँस में भर;
समझता हुआ मैं रहा देख,
हटती भी पथ पर दृष्टि टेक।

तू सवा साल की जब कोमल
पहचान रही ज्ञान में चपल
माँ का मुख, हो चुम्बित क्षण-क्षण
भरती जीवन में नव जीवन,
वह चरित पूर्ण कर गई चली
तू नानी की गोद जा पली।
सब किये वहीं कौतुक-विनोद
उस घर निशि-वासर भरे मोद;
खाई भाई की मार, विकल
रोई उत्पल-दल-दृग-छलछल,
चुमकारा सिर उसने निहार
फिर गंगा-तट-सैकत-विहार
करने को लेकर साथ चला,
तू गहकर चली हाथ चपला;
आँसुओं-धुला मुख हासोच्छल,
लखती प्रसार वह ऊर्मि-धवल।
तब भी मैं इसी तरह समस्त
कवि-जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त
लिखता अबाध-गति मुक्त छंद,

पर संपादकगण निरानंद
वापस कर देते पढ़ सत्त्वर
दे एक-पंक्ति-दो में उत्तर।
लौटी लेकर रचना उदास
ताकता हुआ मैं दिशाकाश
बैठा प्रान्तर में दीर्घ प्रहर
व्यतीत करता था गुन-गुन कर
सम्पादक के गुण; यथाभ्यास
पास की नोंचता हुआ घास
अज्ञात फेंकता इधर-उधर
भाव की चढी़ पूजा उन पर।
याद है दिवस की प्रथम धूप
थी पडी़ हुई तुझ पर सुरूप,
खेलती हुई तू परी चपल,
मैं दूरस्थित प्रवास में चल
दो वर्ष बाद हो कर उत्सुक
देखने के लिये अपने मुख
था गया हुआ, बैठा बाहर
आँगन में फाटक के भीतर,
मोढे़ पर, ले कुंडली हाथ
अपने जीवन की दीर्घ-गाथ।
पढ़ लिखे हुए शुभ दो विवाह।
हँसता था, मन में बडी़ चाह
खंडित करने को भाग्य-अंक,
देखा भविष्य के प्रति अशंक।

इससे पहिले आत्मीय स्वजन
सस्नेह कह चुके थे जीवन
सुखमय होगा, विवाह कर लो
जो पढी़ लिखी हो -- सुन्दर हो।
आये ऐसे अनेक परिणय,
पर विदा किया मैंने सविनय
सबको, जो अडे़ प्रार्थना भर
नयनों में, पाने को उत्तर
अनुकूल, उन्हें जब कहा निडर --
"मैं हूँ मंगली," मुडे़ सुनकर
इस बार एक आया विवाह
जो किसी तरह भी हतोत्साह
होने को न था, पडी़ अड़चन,
आया मन में भर आकर्षण
उस नयनों का, सासु ने कहा --
"वे बडे़ भले जन हैं भैय्या,
एन्ट्रेंस पास है लड़की वह,
बोले मुझसे -- 'छब्बीस ही तो
वर की है उम्र, ठीक ही है,
लड़की भी अट्ठारह की है।'
फिर हाथ जोडने लगे कहा --
' वे नहीं कर रहे ब्याह, अहा,
हैं सुधरे हुए बडे़ सज्जन।
अच्छे कवि, अच्छे विद्वज्जन।
हैं बडे़ नाम उनके। शिक्षित
लड़की भी रूपवती; समुचित
आपको यही होगा कि कहें
हर तरह उन्हें; वर सुखी रहें।'


आयेंगे कल।" दृष्टि थी शिथिल,
आई पुतली तू खिल-खिल-खिल
हँसती, मैं हुआ पुन: चेतन
सोचता हुआ विवाह-बन्धन।
कुंडली दिखा बोला -- "ए -- लो"
आई तू, दिया, कहा--"खेलो।"
कर स्नान शेष, उन्मुक्त-केश
सासुजी रहस्य-स्मित सुवेश
आईं करने को बातचीत
जो कल होनेवाली, अजीत,
संकेत किया मैंने अखिन्न
जिस ओर कुंडली छिन्न-भिन्न;
देखने लगीं वे विस्मय भर
तू बैठी संचित टुकडों पर।


धीरे-धीरे फिर बढा़ चरण,
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारुण्य सुघर
आईं, लावण्य-भार थर-थर
काँपा कोमलता पर सस्वर
ज्यौं मालकौस नव वीणा पर,
नैश स्वप्न ज्यों तू मंद मंद
फूटी उषा जागरण छंद
काँपी भर निज आलोक-भार,
काँपा वन, काँपा दिक् प्रसार।
परिचय-परिचय पर खिला सकल --
नभ, पृथ्वी, द्रुम, कलि, किसलय दल
क्या दृष्टि। अतल की सिक्त-धार
ज्यों भोगावती उठी अपार,
उमड़ता उर्ध्व को कल सलील
जल टलमल करता नील नील,
पर बँधा देह के दिव्य बाँध;
छलकता दृगों से साध साध।
फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर
माँ की मधुरिमा व्यंजना भर
हर पिता कंठ की दृप्त-धार
उत्कलित रागिनी की बहार!
बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि,
मेरे स्वर की रागिनी वह्लि
साकार हुई दृष्टि में सुघर,
समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।
शिक्षा के बिना बना वह स्वर
है, सुना न अब तक पृथ्वी पर!
जाना बस, पिक-बालिका प्रथम
पल अन्य नीड़ में जब सक्षम
होती उड़ने को, अपना स्वर
भर करती ध्वनित मौन प्रान्तर।
तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि,
जागा उर में तेरा प्रिय कवि,
उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज
तरु-पल्लव कलिदल पुंज-पुंज
बह चली एक अज्ञात बात
चूमती केश--मृदु नवल गात,
देखती सकल निष्पलक-नयन
तू, समझा मैं तेरा जीवन।


सासु ने कहा लख एक दिवस :--
"भैया अब नहीं हमारा बस,
पालना-पोसना रहा काम,
देना 'सरोज' को धन्य-धाम,
शुचि वर के कर, कुलीन लखकर,
है काम तुम्हारा धर्मोत्तर;
अब कुछ दिन इसे साथ लेकर
अपने घर रहो, ढूंढकर वर
जो योग्य तुम्हारे, करो ब्याह
होंगे सहाय हम सहोत्साह।"


सुनकर, गुनकर, चुपचाप रहा,
कुछ भी न कहा, -- न अहो, न अहा;
ले चला साथ मैं तुझे कनक
ज्यों भिक्षुक लेकर, स्वर्ण-झनक
अपने जीवन की, प्रभा विमल
ले आया निज गृह-छाया-तल।
सोचा मन में हत बार-बार --
"ये कान्यकुब्ज-कुल कुलांगार,
खाकर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
इस विषय-बेलि में विष ही फल,
यह दग्ध मरुस्थल -- नहीं सुजल।"
फिर सोचा -- "मेरे पूर्वजगण
गुजरे जिस राह, वही शोभन
होगा मुझको, यह लोक-रीति
कर दूं पूरी, गो नहीं भीति
कुछ मुझे तोड़ते गत विचार;
पर पूर्ण रूप प्राचीन भार
ढोते मैं हूँ अक्षम; निश्चय
आयेगी मुझमें नहीं विनय
उतनी जो रेखा करे पार
सौहार्द्र-बंध की निराधार।

वे जो यमुना के-से कछार
पद फटे बिवाई के, उधार
खाये के मुख ज्यों पिये तेल
चमरौधे जूते से सकेल
निकले, जी लेते, घोर-गंध,
उन चरणों को मैं यथा अंध,
कल ध्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऐसी नहीं शक्ति।
ऐसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह!"
फिर आई याद -- "मुझे सज्जन
है मिला प्रथम ही विद्वज्जन
नवयुवक एक, सत्साहित्यिक,
कुल कान्यकुब्ज, यह नैमित्तिक
होगा कोई इंगित अदृश्य,
मेरे हित है हित यही स्पृश्य
अभिनन्दनीय।" बँध गया भाव,
खुल गया हृदय का स्नेह-स्राव,
खत लिखा, बुला भेजा तत्क्षण,
युवक भी मिला प्रफुल्ल, चेतन।
बोला मैं -- "मैं हूँ रिक्त-हस्त
इस समय, विवेचन में समस्त --
जो कुछ है मेरा अपना धन
पूर्वज से मिला, करूँ अर्पण
यदि महाजनों को तो विवाह
कर सकता हूँ, पर नहीं चाह
मेरी ऐसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूं यह नहीं सुघर,
बारात बुला कर मिथ्या व्यय
मैं करूँ नहीं ऐसा सुसमय।
तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम,
लग्न के; पढूंगा स्वयं मंत्र
यदि पंडितजी होंगे स्वतन्त्र।
जो कुछ मेरे, वह कन्या का,
निश्चय समझो, कुल धन्या का।"

आये पंडित जी, प्रजावर्ग,
आमन्त्रित साहित्यिक ससर्ग
देखा विवाह आमूल नवल,
तुझ पर शुभ पडा़ कलश का जल।
देखती मुझे तू हँसी मन्द,
होंठो में बिजली फँसी स्पन्द
उर में भर झूली छवि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर
तू खुली एक उच्छवास संग,
विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग,
नत नयनों से आलोक उतर
काँपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैनें वह मूर्ति-धीति
मेरे वसन्त की प्रथम गीति --
श्रृंगार, रहा जो निराकार,
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग --
भरता प्राणों में राग-रंग,
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदल कर बना मही।
हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन
कोई थे नहीं, न आमन्त्रण
था भेजा गया, विवाह-राग
भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;
प्रिय मौन एक संगीत भरा
नव जीवन के स्वर पर उतरा।
माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में, "वह शकुन्तला,
पर पाठ अन्य यह अन्य कला।"

कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यों अपार;
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त,
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;
वह लता वहीं की, जहाँ कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली,
अंत भी उसी गोद में शरण
ली, मूंदे दृग वर महामरण!

मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!

Share It