Wednesday, February 1, 2012

अफ़गानिस्तान की शहीद कवयित्री नाडिया अंजुमन की कविता - कहाँ गया तुम्हारा जहाज़, कहाँ गया तुम्हारा चांदी का चंद्रयान


२००५ में नाडिया अंजुमन (१९८०-२००५)का पहला कविता संग्रह छपा था - उनकी कविताओं की ताज़गीभरी ऊष्मा और दृष्टिकोण ने उन्हें तुरंत ख़ासा लोकप्रिय बना दिया. उनकी ग़ज़लों को ख़ास तौर पर बहुत सराहना मिली. लेकिन दुर्भाग्यवश किताब के प्रकाशन के कुछ ही दिनों बाद नाडिया की पीट पीट कर हत्या कर दी गयी. अफगानिस्तान में आज भी कई लोग मानते हैं की उनकी हत्या उनके पति और उसके परिवार वालों ने मिल कर की थी - नाडिया का ज़ुर्म सिर्फ़ यह था की उसने शायरी लिखने का पाप किया था.

एक बड़े परिवार की छठी संतान थीं अंजुमन. उन्होंने तालिबानी शासन के व्यवधान के बावजूद हाईस्कूल पास किया. इस दौरान उन्होंने साहित्य के एक प्रोफ़ेसर के घर पर होने वाली गुप्त साहित्यिक सभाओं में भाग लेना शुरू किया और बाकायदा साहित्य का अध्ययन भी. बाद में उन्होंने हेरात विश्वविद्यालय से डारी साहित्य का अध्ययन किया और लगातार अव्वल छात्रों की लिस्ट में सब से ऊपर आती रहीं.

लेखन में आने वाले तमाम ख़तरों के बावजूद अंजुमन को कविता के प्रति एक गहरा समर्पण महसूस होता था. "जहाँ तक मुझे याद पड़ता है," उन्होंने लिखा था "मुझे कविता हमेशा पसंद थी, और छः सालों के तालिबानी शासन ने जिन ज़ंजीरों से मेरे पैर बाँध दिए थे उन्हीं ज़ंजीरों ने मेरी कलम के हिचकभरे पैरों की मदद से मुझे कविता के मैदान में पहुँचाया. मेरे दोस्तों ने मुझे इस राह पर चलने का हौसला दिया, लेकिन आज भी पहला कदम लेते हुए मेरी कलम की नोंक कांपती है क्योंकि इस राह पर ठोकर खाकर गिर पड़ने का डर लगा रहता है क्योंकि रास्ता बहुत मुश्किल है और मेरे कदम डगमग."

अपनी कविता 'हल्की नीली स्मृतियाँ' में, जिसे २००१ में तालिबान के पतन के बाद लिखा गया था, अंजुमन राजनैतिक तरीके से लागू की गयी ख़ामोशी के शिकार हुए लोगों को संबोधित करती हैं और पूछती हैं की ज़ुबान के खो जाने पर क्या क्या खो जाता है. कविता की शुरुआत में वे अपने देश की बेनाम नागरिकों यानी स्त्रियों को संबोधित करती हुईं उनकी अंदरूनी जिंदगी को तबाह करने वालों शिनाख्त करने की बात करती हैं.

नाडिया अंजुमन की त्रासद नियति उनकी कविताओं के और भी गहरा अर्थ देती हैं. अंजुमन की कविताओं के हजारों प्रशंसकों ने हेरात में उनकी शवयात्रा में हिस्सा लिया था और आज फ़ारसी भाषा पढने-लिखने वाले युवाओं में वे एक अज़ीम नाम हैं.

वे अपने पीछे एक पुत्र बेहराम सईद को छोड़ गयी थीं.

आज आपको पढ़वा रहा हूँ अफ़गानिस्तान की इस शहीद कवयित्री की दो कवितायेँ
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हल्की नीली* स्मृतियाँ

ओ गुमनामी के पर्वत के निर्वासनो!
ओ ख़ामोशी के कीचड़ में सो रहे तुम्हारे नामों के जवाहरातो!
ओ तुम्हारी पोंछ दी गयी स्मृतियो,
विस्मृति के समुद्र की एक लहर के गाद-भरे दिमाग में
ओ तुम्हारी हल्की नीली स्मृतियो
कहाँ है, वह साफ़, बहती हुई धारा तुम्हारे विचारों की?
किन चोर हाथों ने तुम्हारे सपनों की निखालिस सोने की बनी मूर्तियों को तहस-नहस कर डाला?
दमन को जन्म देने वाले इस तूफ़ान में
कहाँ गया तुम्हारा जहाज़, कहाँ गया तुम्हारा चांदी का चंद्रयान?
मौत को जन्म देने वाले इस कड़ियल जाड़े के बाद -
अगर शांत हो जाये यह समुद्र
अगर बादल मुक्त कर दे ह्रदय के गाँठ-लगे दुखों को
अगर चांदनी का कौमार्य लेकर आये प्रेम, प्रस्तुत करे एक मुस्कान
अगर अपने दिल को मुलायम बना ले पहाड़, सजा ले अपने को हरे से,
फल देने लगे-
क्या तब, चोटियों के ऊपर तुम्हारा एक नाम
सूरज जितना चमकीला बनेगा?
क्या तुम्हारी स्मृतियों का
तुम्हारी हल्की नीली स्मृतियों का ज्वार
उम्मीद का प्रतिविम्ब बनेगा
दमन की बारिश से डरी हुई
बाढ़ के पानी से थकी हुई मछलियों की आँखों में?
ओ गुमनामी के पर्वत के निर्वासनो!

(* हल्का नीला महान आशाओं का रंग माना जाता है.)

नवम्बर - दिसंबर २००१

एक बेआवाज़ रुलाई

हरे कदमों की आहट है बारिश.
वे आ रही हैं सड़क पर से, अब
रेगिस्तान से लाई गयी प्यासी रूहें और धूलभरे लहंगे
जलती हुई उनकी साँसें, मृगतृष्णा में मिली-घुलीं
सूखे मुंह, पपडाए हुए धूल से
वे आ रही हैं सड़क पर से, अब
यातना पाए बदन, दर्द पर पली हुईं लडकियाँ,
खुशी बिछड़ी हुई उनके मुखों से
पुराने पड़ चुके झुर्रीदार दिल
उनके होठों के काले समुद्रों के किनारों पर नहीं उभरती कोई मुस्कराहट
उनकी आखों की सूख चुकी नदियों के तलों से नहीं निकलता एक भी आंसू
या ख़ुदा!
क्या मैं नहीं जान सकती कि उनकी दर्दभरी रुलाइयां बादलों तक
मेहराबदार जन्नतों तक पहुँचती भी हैं या नहीं?
हरे कदमों की आहट है बारिश.

जुलाई-अगस्त २००२

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(यह पोस्ट नाडिया अंजुमन पर आखिरी नहीं है.)

3 टिप्पणियां:

Ek ziddi dhun said...

अफगानिस्तान इलाका हमेशा ही लड़ाकू रहा है प्रतिरोधी लेकिन स्त्रियों के मामले में वही कोरा मर्दवाद। जाहिर है कि कहीं ज्यादा मुश्किल और सतत संघर्ष तो नाडिया की जाति करती है हर कहीं। उनका परिचय, उनके गद्य के टुकड़े और उनकी कविताएं गहरा असर छोड़ती हैं। उनकी शहादत को सलाम, पर काश वे होतीं और अपनी कलम की कांपती नोंक से लिखती रहतीं। अगली पोस्टों का लगातार इंतजार रहेगा।

प्रवीण पाण्डेय said...

शारीरिक बद्ध आत्माओं की फड़फड़ाहट का स्वर है इन पंक्तियों में।

vidya said...

अदभुद भावाव्यक्ति...
जानकारी हेतु शुक्रिया..