Tuesday, February 7, 2012

इन बेहूदगियों से बच निकलना कितना अच्छा है

नाडिया अंजुमन की एक और कविता


उड़ान

दर्द और गरीबी से थक गए हैं हमारे दिल
बिल आखीर धूल और अँधेरे में खो गईं हम
हम जा रही हैं अब और दोबारा लौट कर नहीं आयेंगी
इन बेहूदगियों से बच निकलना कितना अच्छा है
दुनिया के जाल में हम थीं बगीचे की गौरैयें
हमें फंसाया गया बेवजह और हम अटकी हुई हैं इस गंदगी में
हर कोई बींधता है हमारे नन्हे पंखों को अपने तीरों से
अगली दफ़ा हमें नहीं झेलने होंगे ये अत्याचार
हम नहीं कर रहीं किसी भी तरह की कोई कोशिश
दर्द और गरीबी से थक चुके हैं हमारे दिल.

1 comment:

Ek ziddi dhun said...

मार्मिक कविता। और सिर्फ मार्मिक नहीं बल्कि बेबसी लगने वाले इस प्रतिरोध को पढ़कर इस क्रूर समाज के पर शर्म, लानत और गुस्सा पैदा होता है।