Monday, February 6, 2012

नाडिया अंजुमन पर दूसरी पोस्ट ... अलबत्ता मैं नज्मों और गीतों की बेटी हूँ


अपनी एक कविता में नाडिया अंजुमन ने लिखा था -

अगर मेरी किताब की आँखों में तुम पढ़ पाते हो सितारों को
तो फ़क़त एक दास्तान है वो मेरे अनंत सपनों की ...


अफगानिस्तान के दमनकारी समाज में जिस तरह की कविता लिखने का दुस्साहस अंजुमन ने किया उसके लिए इस्पाती हौसलों और यक़ीन की बुनियाद ज़रूरी थी. अफगानी स्त्रियों की सामाजिक परिस्थितियों को दुनिया के सम्मुख लाने वाली एक ख्यात पत्रकार क्रिस्टीना लैम्ब ने अपनी एक किताब में अंजुमन का ज़िक्र करते हुए लिखा है - "दोस्त बताते हैं की उसका (अंजुमन का) परिवार बेहद गुस्से में था की एक प्रेम और सौन्दर्य के बारे में लिखी एक औरत की कवितायेँ खौफ़नाक पशेमानी की वजह बनने जा रही थीं."

अंजुमन लिखती हैं -

मोहब्बत को लेकर सवाल न करो क्योंकि वह तुम्हारी कलम की प्रेरणा है
सबसे पहले मौत थी मोहब्बत में पेज मेरे शब्दों के दिमाग में ...


नाडिया के अपने शब्द उसकी मौत की वजह बने. उसके लिए जो कुछ प्रेम था उसे उसके परिवार ने सम्हालने के बजाय शर्म का विषय माना -

... अलबत्ता मैं नज्मों और गीतों की बेटी हूँ
नौसिखुवा और टूटी फूटी थी मेरी कविता
मेरी आज़ाद टहनी नहीं पहचान सकी बागबान के हाथ को ...


नाडिया की एक और कविता पेश है-


एक कविता

मुंह खोलने का कोई अरमान नहीं
किस बारे में गाऊंगी मैं ...?
मैं, जिसे नफ़रत करती है जिंदगी.
क्या फ़र्क़ पड़ता है मैं गाऊं या न गाऊं.
क्यों करूँ मिठास की बात
जब मुझे महसूस होती है फ़क़त तल्ख़ी?
उफ़! जालिमों की दावत ने
हरा दिया मेरे मुंह को.
कोई साथी नहीं मेरे जीवन में
किसे दूं अपनी मिठास?
कोई फ़र्क़ नहीं बोलने में, हंसने में,
मरने में, जीने में.
मैं और मेरा तनावभरा अकेलापन.
उदासी और ग़म के साथ जन्मी थी में
बिना किसी उद्देश्य के.
मोहर लगा दी जानी चाहिए मेरे मुंह पर.
ओ मेरे दिल, तू जानता है कि वसंत आ गया
उत्सव मनाने का समय.
जाल में फंसे एक पंख का क्या करूँ मैं
जो मुझे उड़ने ही नहीं देता?
लम्बे वक़्त से ख़ामोश हूँ मैं
मगर धुन को भूली नहीं थी कभी;
और हर वक़्त मैं फुसफुसाती रहती हूँ
अपने दिल के नगमे,
खुद को याद दिलाती हुई
कि एक दिन मैं तोड़ दूंगी पिंजरे को
उड़ जाऊंगी दूर इस अकेलेपन से
और गाती जाउंगी उदासी के गीत.
पोपलर का कोई कमज़ोर दरख्त नहीं हूँ मैं
जिसे हलकोर डाले कोई भी हवा.
मैं हूँ एक अफ़गान औरत
जायज़ है मेरा मातम मनाना.

1 comment:

Ek ziddi dhun said...

इस पोस्ट का इंतजार था। नाडिया अंजुमन की कविताएं पोस्ट करते रहिए। औऱ हो सके तो तनाव या किसी भी पत्रिका में पुस्तिका की तरह उनकी कविताएं उपलब्ध करा दीजिए।