Wednesday, July 3, 2013

उसका लेखन लावा के महान प्रवाह जैसा होता था

आज फ्रान्ज़ काफ़्का का जन्मदिन है. इस युगदृष्टा लेखक को याद करते हुए पिएत्रो सिताती की किताब 'काफ़्का' से एक अंश जिसमें उसकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक की रचना प्रक्रिया को पकड़ने की कोशिश की गयी है.


...‘हिस्ट्री ऑफ़ द डेविल’ में उसने पढ़ा था कि वर्तमान कैरिबियन में रात में काम करने वाले को संसार का सृष्टा माना जाता है. उसके पास संसार की रचना या पुनर्रचना करने की ताक़त नहीं थी; लेकिन अगर उसने रातों को जगा रहना था तो वह उस सब को प्रकट कर सकता था जिसे उसके अजाने देवता ने उसे बताया था. सो उसने अपने ऊपर यह अनुशासन लागू किया : वह रात दस बजे अपनी डेस्क पर बैठता था और वहां से तीन या कभी कभी छः बजे उठता था. वह अंधेरे, एकान्त और ख़ामोशी में लिखता था जबकि बाक़ी सारे सोए होते थे : फ़ेलीस जिसे वह मिलना नहीं चाहता था; उसके मां-बाप जिनके साथ वह बस बहुत थोड़े शब्द साझा करता था; और उसके दोस्त - तब भी उसे लगता था कि रात अभी पूरी तरह से रात नहीं होती थी. वह चाहता था कि दिन और गर्मियों, सूर्योदय और सूर्यास्त को ख़त्म कर समय को एक अंतहीन शरद की रात में बदल देता. उसके चारों तरफ़ एक धीरगंभीर गतिहीनता होती और ऐसा लगता था मानो संसार उसे भूल गया था.

रात उसके लिए काफ़ी नहीं होती थी. चूंकि उसकी प्रेरणा ऊपर स्वर्ग से नहीं बल्कि पाताल से आती थी उसे भी नीचे धरती के गर्भ में उतरना होता था और एक बार वहां पहुंच जाने पर अपने आप को ताले में बंद कर लेना होता था. वह सबसे दूर एक कोठरी में रहना चाहता था. पर कोई न कोई आवाज़ तब भी उसकी कोठरी तक पहुंच सकती थी; शायद उसका अदृश्य साथी या फ़ेलीस या कोई दोस्त सारी बाधाओं को पार कर उसके एकान्त में दख़ल देने आ जाता. उसे इस एकान्त से ज़्यादा कुछ चाहिए था : उसे मृत्यु की गहरी नींद चाहिए थी और कब्र की निर्बाध शान्ति जहां किसी भी तरह का मानवीय संपर्क असंभव होता है. तो आख़िरकार एकाकी और मृत हो चुकने के बाद काफ़्का के पास लिखने के लिए आदर्श परिस्थितियां थीं. दफ़्तर की चिन्ताओं से दूर, मानवीय संपर्क और विवाह जैसे झमेलों से दूर, उसके पास सारा समय अपने लिए था; समय का एक अनन्त विस्तार क्योंकि समुद्र जैसी सीमाहीन प्रेरणा को बांधा नहीं जा सकता.

रात की गहराई में अकेले लिखते हुए अपने भीतर छिपी हुई और जड़ हो गई हर चीज़ को मुक्त किया और इस तरह उसे एक ऐसी ख़ुशी मिलती थी जो उसके बर्फ़ जैसे हाथों और कांपते दिल को गरमा देती थी. शाम को जैसे ही वह अपनी डेस्क पर पहुंचता था फ़ेलीस को लिखे पत्रों का वह तूफान और हिंसा कहीं दूर चले जाते थे. वहां न कोई आईना था, न मनुष्य, न ही ख़ुद वह जिसे कोई बात समझाई जानी हो. दिन भर की मानसिक यातना और हिस्टीरिया के बाद वह महामानवीय शान्ति का एक कोना खोज लेता था. उस जगह उसने एक भी टूटी पंक्ति नहीं लिखी : उसकी भीषण शान्ति और वह कोमल स्पर्श तब भी बने रहते हैं जब ग्रेगोर साम्सा और जोसेफ़ के को उनकी मौत की तरफ ले जाया जाता है. कहानी वह जगह थी जहां हर चीज़ नियत और सही राह पर रखी जाती थी. इस दौरान रात को उस जगह पर अंधेरे का कायाकल्प हुआ करता था. उसे भली तरह पता था कि अचेतन में इस क़दर पूरी तरह डूब जाने में बहुत सारे ख़तरे हैं : इसमें अपनी खोज से कभी वापस न आ सकने का ज़ोखिम शामिल था या पागलों जैसी विकृत वापसी का.

लेकिन उसे यह भी मालूम था कि अगर वह अंधकार को तर्क के सामने लाएगा और इसे किसी बौद्धिक खेल में बदलेगा जैसा कि पो ने किया था उसका सारा काम व्यर्थ हो जाएगा. सो उन रातों को वह जादू हुआ करता था जो काफ़्का को आधुनिक लेखकों के बीच अद्वितीय बनाता है. रात अपना गाढ़ा अंधेरापन नहीं खोती थी; अचेतन का कायान्तरण होता था पर वह अचेतन बना रहता था; तर्क कभी ख़ुद को चीज़ों पर नहीं लादता था; तो भी समूचा अजाना द्वीपसमूह रोशन हो कर सामने आता था बिना किसी परछाई या अपरिभाषित के जैसे कि वह दिन की रचना हो. हमें एक अद्वितीय अनुभव होता हैः हम एक साथ अचेतन और रोशनी की लहर में डूब जाते हैं.

उसके महान उपन्यास बेहद जटिल हैं : उनके भीतर हजारों संबंध और अन्दरूनी संपर्क दौड़ा करते हैं; कोई भी घटना सैकड़ों पन्नों की दूरी के बाद संशोधित की जाती है; हर आकृति का सिर्फ़ एक अर्थ होता है जब वह बाक़ी आकृतियों के रू-ब-रू होती है; हर वाक्य को स्वतंत्र तरीके से समझा जा सकता है चाहे उसे किताब की संपूर्णता से अलग कर के ही क्यों न देखा जाए. ऐसे में हम यह सोच ही सकते हैं कि वह श्रमपूर्वक अपनी किताबों की योजना बनाता था और उन्हें लगातार संशोधित करता चलता था जैसा कि दोस्तोव्स्की और ताल्सताय किया करते थे. यह कतई सच नहीं है. अपनी कोठरी में ‘अमेरिका’ या ‘द कासल’ या ‘द ट्रायल’ लिखते हुए काफ़्का ने कभी किसी किताब का खाका नहीं बनाया. लेखन के वास्तुशिल्प की किसी भी समस्या का अस्तित्व नहीं था. किसी अतिप्रेरित व्यक्ति की तरह वह अपनी असीम लहरदार कल्पना के आगे समर्पित हो जाता था जो उसके भीतर रातों को बहा करती थी. और इस रात्रिकालीन प्रेरणा के लिए सारा संरचनात्मक ज्ञान उसे मिला हुआ था.

उसका लेखन लावा के महान प्रवाह जैसा होता था जिसमें न अध्याय होते थे, न पैराग्राफ, न विराम चिन्ह - उन्हें बाद में जोड़ा जाता था. वह बहुत कम संशोधन किया करता था. 1912 के पतझड़ के समय के ये दिन काफ़्का के जीवन में निणार्यक बने. ‘डैस्क्रिप्शनऑफ़ अ स्ट्रगल’ और ‘मेडिटेशन’ के जोकरपन के बाद उसने पाया कि वह वैसा कारीगर लेखक नहीं है जैसा वह सोचा करता था. अचेतन की छायाओं ने उस पर आक्रमण कर दिया था; ‘मेटामारफ़ॉसिस’ ‘अमेरिका’ और फ़ेलीस को लिखे पत्रों के दौरान, जो अनन्त तक लिखे जा सकते थे, काफ़्का को आभास हुआ कि उसके पास कल्पना का उद्दाम ख़ज़ाना है. सब कुछ जैसे उसके काबू में था. अगर उसने चाहा होता तो वह दूसरा दोस्तोव्स्की बन सकता थाः ऐसी रचनाओं का लेखक जिनसे केवल प्रकृति ही टक्कर ले सकती है. मुझे यह कहने में मुश्किल हो रही है कि काफ़्का ने कितना जानबूझ कर ऐसा किया होगा. जैसा उसने कहीं लिखा है कि वह अपनी कल्पना के बड़े हिस्सों को संकरे रास्तों और संकरी सीमाओं में भेजा करता था. क़ैद काफ़्का की महानता का स्रोत थी. उसके बिना वह रह ही नहीं सकता था. लेकिन इस जीवन के लिए उसे एक पाप किए जाने का पछतावा रहा; उसने अपने अजाने देवता द्वारा प्रस्तुत की गई संभावना को नकार दिया था.

उसे और शंकाएं भी थीं. किसी भी बाधा के सामने हार जाना उसके लिए बहुत त्रासद होता था¸ और वह दो दिनों के लिए लिखना छोड़ देता था क्योंकि उसे भय होता था कि वह सदा के लिए अपनी प्रतिभा खो चुका है. वह अपनी प्रेरणा पर विश्वास नहीं करता था. उसे लगता था कि वह बिना रुके किसी पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाता था पर वहां एक पल को भी नहीं ठहर पाता था. एक तरह से इन संशयों को समझा जा सकता है : वह उन लेखकों में नहीं था जो हर सुबह अपने काम की मेज़ पर बैठा करते हैं - प्रेरणा आती थी और चली जाती थी. वह शान्त होकर वर्षों तक के लिए उसे छोड़कर जा सकती थी जिसके कारण वह बेहद दुखी हो जाता था. और इसके अलावा अगर हर चीज़ उसका ख़्वाब भर थी तब? मान लिया कोई महाशक्ति अपने मक़सद के लिए उसका इस्तेमाल कर रही थी तब? और अन्त में अगर अपने को कोठरी में बंद कर लिखते रहना ही सब से बड़ा पाप होता तब ? क्या फ़र्क पड़ता है कि उसने सारे नियमों को अस्वीकृत कर दिया? वह साहित्य से प्रेम करता था लेकिन वह सौन्दर्यवादी का विलोम था. उसका मानना था कि मनुष्य के सबसे महान कर्म दानशीलता से प्रेरित होना चाहिए जैसा कि ग्रेगोर अपने परिवार के लिए ख़ुद को जला कर करता है.

काफ़्का जो इस क़दर अध्यात्मिक आदमी था - सारी ज़िन्दगी अपनी देह को लेकर आब्सेस्ड रहा. उसका शरीर, जो उसे उसके जन्म के साथ किसी ने उसे ऐसे ही या नफ़रत के साथ दिया था, लगातार उसके बौद्धिक और अध्यात्मिक विकास लिए बाधाएं खड़ी करता रहा : उस शरीर के साथ वह अपने भविष्य में केवल त्रास देख पाता था. वह काफी ज़्यादा लम्बा और कोणों से भरा हुआ था. वह उन सुन्दर देहों की तरह एक सीधी रेखा में बड़ा नहीं हुआ जिन्हें वह इस क़दर सराहा करता था. उसके शरीर ने उसे झुकने और गिरने पर विवश किया. उसकी सारी नैसर्गिकता उस के साथ समाप्त हो गई. उसका कमज़ोर दिल लगातार दुखता था और उसकी धमनियों में पर्याप्त रक्त प्रवाहित नहीं कर पाता था जिस के कारण उस के हाथ पैर ठण्डे रहते थे. उसके भीतर ज़रा भी अन्दरूनी आग नहीं थी; न वह न्यूनतम चर्बी जो उसकी आत्मा के लिए भोजन बनती. बहुत जल्दी उसे अपने दुबलेपन का रहस्य समझ आ गया था. उसकी सारी शक्तियां साहित्य में केंद्रित हो गई थीं; उसने उन सारी ताकतों का दमन किया था जो और लोगों को खाने, पीने, संगीत सुनने और दर्शनशास्त्र के बारे में लिखने के लिए प्रेरित करती हैं; और उसका शरीर बेतरह दुबला हो गया था.

सबसे गंभीर बात यह थी कि उसका शरीर उस के लिए अजनबी था; एक अविवाहित के तौर पर उसकी प्रकृति को ढालने वाला सबसे बड़ा कारक. कौन सी आक्रामक शक्ति थी जिसने उसे ऐसे खोल में ढाला था ? “जो भी मेरे पास है वह मेरे खिलाफ है और जो मेरे खिलाफ है वह मेरा नहीं रह गया है. मिसाल के लिए अगर मेरा पेट दुखता है तो वह मेरा पेट नहीं है. वह किसी भी उस बाहरी आदमी जैसा है जो मेरी ठुकाई करना चाहता ह. और सब कुछ ऐसा ही है. मेरा पूरा अस्तित्व कांटेदार बाड़ से बना हुआ है जो मुझे चुभती हैं और अगर मैं ताक़त लगाकर उनसे लड़ना चाहूं तो वे और गहरे मेरे भीतर धंस जाती हैं.” उसके शरीर के भीतर क्या था ? शायद धागे का एक गोला जिसमें अनन्त सिरे थे और जो लगातार खुलता रहता था. और क्या इस बात का ख़तरा नहीं था कि दुश्मन की फौजें जो दुनिया के अजनबी कोनों से आ रही थीं उसे कुचल दें ? इसलिए बीमारी के वर्षों से पहले काफ़्का ने अपनी देह पर काबू करने का फ़ैसला किया. वह घंटों टहला करता था तैरता था. तमाम शारीरिक अभ्यास करता था, खुली हवा में आधे कपड़ों में रहता था और उम्मीद करता था कि प्रकृति उसे उसके साथ रहने देने में मदद करेगी.

उसे लगता था उसके भीतर कोई पशु है. बार बार अपने अचेतन की आकृतियों में से जो मध्यकाल की पशुओं के चित्रों वाली किसी किताब की तरह विराट थीं वह अपने भीतर किसी सोते हुए गुबरैले को महसूस करता था; ज़मीन में सुरंगें खोदते किसी छछूंदर को; उस चूहे को जो आदमी के आते ही भाग जाता है; एक फड़फड़ाते चमगादड़ को; हमारे रक्त पर पलने वाले किसी परजीवी कीट को; एक भुतहा जानवर को जो हताश किसी गड्ढे में या अपनी मांद में पड़ा होता है; राख के रंग के कौए को जिसके पंख पूरी तरह विकसित नहीं होते; एक गुर्राते हुए कुत्ते को जो उसके चैन में ख़लल डालने वाले हर शख़्स को दांत दिखाता है या एक बुत के चारों तरफ परेशान भौंकता दौड़ता रहता है; कभी दो जानवरों से बने जीव को जिसका शरीर भेड़ का है और सिर और पंजे बिल्ली के और जिसकी आंखों में दोनों की मिलीजुली चमक है; या उन घृणित दुष्ट और परजीवी आदमियों में से एक को जिन्हें उसने अमेरिकाके आख़िरी  हिस्से में दिखलाया है. वह कई जानवरों से बेतरह डरता था. जब वह ज़ुराउ में था वह चूहों के बीच रहा था. उसे उस शान्त पशु शक्ति से डर लगता था जो कहीं घात लगाए बैठी होती थी. पर साथ ही उसे लगता था कि वे ही पाशविक शक्तियां उसके भीतर भी छिपी बैठी हैं. उसे अपने भीतर के पशुओं से इसलिए डर लगता था कि उसे खौफ़ था वे कभी भी अपने आप को प्रकट कर सकते थे और उसके हाथ पैर बालों से ढंक सकते थे और उसकी आवाज़ ने चहचहाहट में बदल जाना था जैसा कि उसने ओविड की ‘मेटामारफ़ॉसिस’ में पढ़ा था. उसे पता था कि ऐसा होने पर वह मानवीय स्तर से नीचे उतर जाएगाः उस अंधकार में जो हमारी चेतना के नीचे वास करता है; लेकिन वह इससे डरता नहीं था क्योंकि ऐसा होने पर उसका स्तर इस मायने में ऊंचा उठ जाना था कि वह अब तक न जीती गई रोशनी और संगीत को जीत सकता था.

तब उसे अपनी सिहरनें समझ में आईं. उसके भीतर रहने वाला पशु उसकी आत्मा और लेखक के उसके शरीर के अलावा कुछ न था जो हर रात अपने को प्रेरणा की आवाज़ की आज्ञा का पालन करता हुआ कोठरी में बन्द कर लेता था ठकि उसी तरह जैसे कुछ जानवर जाड़े का सारा मौसम खोहों में सोते हुए बिताया करते हैं. 17 नवम्बर 1912 को वह अपने कमरे में बन्द बिस्तर पर लेटा हुआ था. इतवार था. पिछली रात ‘अमेरिका’ लिखता हुआ वह संतुष्ट नहीं थाः उसे लग रहा था कि उपन्यास बदतर होता जा रहा था; फिर उसने सपना देखा कि एक जादुई डाकिए ने उसे फ़ेलीस के लिखे दो अन्तहीन पत्र ला कर दिए. अब बिस्तर में बैठा वह फ़ेलीस के वास्तविक पत्रों की प्रतीक्षा कर रहा था. उसने पौने बारह तक इन्तज़ार किया और इन्तज़ार के उन दो भीषण घन्टों में उस पर बार बार होने वाला नैराश्य का वह आक्रमण हुआ - उसे लगा कि वह कोई ऐसा परजीवी पशु है जिसे दुनिया से बहिष्कृत कर दिया गया है और बाक़ी लोग जिसे कुचल सकते हैं या लतिया सकते हैं. संपूर्णता के साथ अपना मानवीय आयाम खोए हुए वह पूरी तरह बेहोशी और स्वप्नावस्था से गुजरा होगा और उसने एक कहानी सोची जिसे वह शब्दों में ढालना चाहता होगा. हमेशा की तरह उसने समय बरबाद नहीं किया. ‘अमेरिकाको किनारे रख कर उसी शाम उसने उसे लिखना शुरू कियाः कहानी उसके हाथों में विस्तार लेने लगी. यह ऐसी कहानी थी जो हर दिशा में बढ़ रही थी और उसके और बाक़ी लोगों के जीवन की जटिलता को अपने भीतर समोए हुए थी. वह चाहता था उसके सामने एक न खत्म होने वाली रात होती जिसमें वह इस कहानी को पूरी तरह प्रकट कर पाता. उसने 7 दिसम्बर को उसे पूरा किया. वह ‘द मेटामारफ़ॉसिस’ थी.


निकलाशश्ट्रासे के छोटे से कमरे में उन दिनों एक दोहरा कायान्तरण हुआ. रात की अपनी मांद में काफ़्का उन गहराइयों में उतर गया जहां अब तक कोई नहीं गया था. सभी सर्जकों की तरह उसने सभी चीज़ों में बदल सकने और सारे रूप धर पाने की अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. महीने भर से कम समय में एक ठण्डी बेहोशी के बीच उसने एक नया शरीर धारण किया और बेहद चौकन्नी निगाहों के साथ उसने अपनी कहानी के पात्र के कायान्तरण का अनुसरण भी किया मानो काग़ज़ पर लिखते हुए वह भी एक विशाल परजीवी कीड़े में बदल रहा हो. ताल्सताय भी अपने आप को ब्रहमाण्ड की विराटता में एकरूप करते हुए कीड़े घोड़े या चिड़िया में तब्दील कर सकते थे; लेकिन काफ़्का ऐसा अपनी गहराइयों को खोजने के लिए कर रहा था. निकलाशश्ट्रासे के उस छोटे से कमरे को जहां वह अपने मां बाप के साथ रहता था उसने ग्रेगोर साम्सा के अपार्टमेन्ट में बदल दिया. हर चीज़ सही सही थी : कपड़ों से भरी अल्मारियां, डेस्क और पलंग, खिड़की के बाहर अस्पताल, कमरे के ऊपरी हिस्से में प्रतिविम्बित होती गली की रोशनियां, दरवाज़े, अपार्टमेन्ट के बाक़ी कमरों की व्यवस्था. इस तरह एक महीने के लिए उसका कमरा उस त्रासदी का रंगमंच बन गया था जिसने पूरे जाड़ों भर चलते जाना था. ...

1 comment:

Neeraj Basliyal said...

Oh, plenty of hope, an infinite amount of hope-but not for us.