Sunday, April 27, 2014

दिन में चाँद निकल भी आये तो रात को सूरज नहीं निकलेगा


नसरीन अंजुम भट्टी पकिस्तान की चंद महिला रचनाकारों में गिनी जाती हैं जिन्होंने जनरल ज़िया के शासनकाल के अँधेरे दिनों में भी राजनीतिक प्रतिबद्धता को जिलाए रखा. उनकी पहली किताब जो ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के वक़्त छपी थी, खासी चर्चित हुई.

मातृभाषा की कट्टर पक्षधर नसरीन पंजाबी, अंग्रेज़ी और उर्दू में सामान अधिकार से लिखती रही हैं. चीनी और रूसी साहित्य की ज्ञाता हैं.

१९६० के दशक से ही प्रगतिशील साहित्यिक इदारों में उनकी उपस्थिति रही है. जब पुलिस को पता चला कि वे भुट्टो पर एक किताब लिखने जा रही हैं, उनकी तलाश ज़ोरशोर से होने लगी. नतीज़तन कोई भी प्रकाशक उन्हें छापने को तैयार न था.

नसरीन ने रेडियो पाकिस्तान में एक ब्रॉडकास्टर की नौकरी भी की. रिटायरमेंट के बाद वे फिलहाल इस्लामाबाद में रहती हैं.

औरतों की तकलीफें उनकी कविता का प्रतिनिधि स्वर हैं और उनका अंदाज़ सबसे निराला होता है. आज उनकी एक कविता.

हुकुम का इक्का

-नसरीन अंजुम भट्टी

कोई दावा न करो कि तारीख़* दावेदारों के साथ नहीं होती
दुःख में तवानाई* घटती है!
नहीं तो! ये दुःख कम हैं – इस से बड़ा दुःख पैदा करो
पहला दुःख अपने आप कम हो जाएगा
मैंने अपना आसमान देखा!
मैंने अपनी ज़मीन देखी!
आसमान पर सितारे नहीं थे, ज़मीन पर फ़सल नहीं
ये मेरी नस्ल है
ये मेरी नस्ल नहीं
बन्दूकों की नालियां कैसी नींदें लाती हैं मन्फ़ी-मन्फ़ी* सी
दिन में चाँद निकल भी आये
तो रात को सूरज नहीं निकलेगा
सज़ा-ए-मौत से बड़ा हुक्म, मांगे की ज़िन्दगी है
हुकुम का इक्का खेल को आगे नहीं बढ़ाता   

हुकुम का इक्का खेल को आगे नहीं बढ़ाता - ख़त्म कर देता है
सब दावे ख़त्म कर देता है
तारीख़ ने अपनी आंखें लिखीं, जुगराफ़िया ने अपने हाथ फैलाए
इश्क़ कहां मुक़य्यद* है
गन्ने का बूटा, मेरा महबूबऔर मेरी पोरें पांव के नाख़ूनों तक
ज़ख़्म, ज़ख़्म,ज़ख़्म,ज़ख़्म
ज़ख़्म घुंघरू, गन्ना गुदाज़शहद शीरीं*

कौन सा हुक्म लगाता है
हुकुम का इक्का

(तारीख़इतिहास, तवानाई: ताक़त, मन्फ़ी मन्फ़ीनकारात्मक, मुक़य्यदकैद, शीरींमीठा)

No comments: