Wednesday, December 31, 2014

क़समें नए साल की

वान गॉग की कृति 'विलोज़ एट सनसेट'

जापानी कवि शुन्तारो तानीकावा की यह अति प्रसिद्ध कविता कबाड़खाने पर ३१ दिसंबर के मौके पर एकाधिक बार पोस्ट की जा चुकी है. आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं देते हुए आज पुनः -


नए साल की क़समें 

क़सम खाता हूं शराब और सिगरेट पीना नहीं छोड़ूंगा
 
क़सम खाता हूं
, जिन से नफ़रत करता हूं उन्हें नहला दूंगा नीच शब्दों से
क़सम खाता हूं
, सुन्दर लड़कियों को ताका करूंगा
क़सम खाता हूं हंसने का जब भी उचित मौका होगा
, खूब खुले मुंह से हंसूंगा
सूर्यास्त को देखा करूंगा खोया खोया
फ़सादियों की भीड़ को देखूंगा नफ़रत से
क़सम खाता हूं दिल को हिला देने वाली कहानियों पर रोते हुए भी सन्देह करूंगा
दुनिया औए देश के बारे में दिमागी बहस नहीं करूंगा
बुरी कविताएं लिखूंगा और अच्छी भी
क़सम खाता हूं समाचार संवाददाताओं को नहीं बताऊंगा अपने विचार
क़सम खाता हूं दूसरा टीवी नहीं खरीदूंगा
क़सम खाता हूं अंतरिक्ष विमान चढ़ने की इच्छा नहीं करूंगा
क़सम खाता हूं कसम तोड़ने का अफ़सोस नहीं करूंगा

इस की तस्दीक में हम सब दस्तख़त करते हैं.

मोत्सार्ट की सातवीं सिम्फ़नी

वुल्फगांग आमाडियस मोत्सार्ट



रेगिस्तान में आंधी


रेगिस्तान में आंधी

-अजंता देव

अचानक तन जाती है
झीनी चादर
पृथ्वी से आकाश तक
उल्लास से नाचने लगती है रेत

फिर दूर तक भागता चला जाता है
अकेला ऊँट

Tuesday, December 30, 2014

भारत के चित्रकार - समीर मंडल - 3










भारत के चित्रकार - समीर मंडल - 2















भारत के चित्रकार - समीर मंडल - 1

१९५२ में जन्मे समीर मंडल हाल ही में फ्रांस से निकलने वाली पत्रिका L'art de l'aquarelle के कवर पर थे. आधुनिक भारतीय कला में समीर का योगदान यह रहा है कि उन्होंने अपने काम से वाटरकलर्स को आयल जैसी शोहरत दिलवाई. उनके काम में एक अद्वितीय लचीलापन है -  










मूस की लेड़ी, क‌नेर के पात, डाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट बात


२००५ में रिलीज़ हुई संजय झा की फ़िल्म 'स्ट्रिंग्स: बाउन्ड बाइ फ़ेथ' से बाबा नागार्जुन की यह अतिविख्यात कविता (रचनाकाल: १९६९) सुनिये. गाने वाले हैं असमिया मूल के ज़ुबीन गर्ग. यह पोस्ट मैंने कोई छह साल पहले लगाई थी. अब देखने पर पता चला उसका ऑडियो चलना बंद हो गया है. दोबारा लगा रहा हूँ बोल समेत–




ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..
ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द
ॐ प्रण‌व‌, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें
ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌गार्, ॐ घोष‌णाएं
ॐ भाष‌ण‌...
ॐ प्रव‌च‌न‌...
ॐ हुंकार, ॐ फ‌टकार्, ॐ शीत्कार
ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्कार, ॐ चीत्कार
ॐ आस्फाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इशारे
ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे 

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ
ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं
ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग
ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग
ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के पात
ॐ डाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट बात
ॐ कोय‌ला-इस्पात-पेट्रोल‌
ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, बाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌मान्नं, इमा आपः इद‌म‌ज्यं, इदं ह‌विः
ॐ य‌ज‌मान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ क‌विः
ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्यं क्रांतिः
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः स‌र्व‌ग्यं शांतिः
ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्यं भ्रांतिः
ॐ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ
ॐ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ
ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ॐ निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ 

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल,
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऐत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌

ॐ काली काली काली म‌हाकाली म‌हकाली
ॐ मार मार मार वार न जाय खाली
ॐ अप‌नी खुश‌हाली
ॐ दुश्म‌नों की पामाली
ॐ मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले का हार
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ॐ ह‌म च‌बायेंगे तिल‌क और गाँधी की टाँग
ॐ बूढे की आँख, छोक‌री का काज‌ल
ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, गंगाज‌ल
ॐ शेर के दांत, भालू के नाखून‌, म‌र्क‌ट का फोता
ॐ ह‌मेशा ह‌मेशा राज क‌रेगा मेरा पोता
ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट
ॐ श‌त्रुओं की छाती अर लोहा कुट
ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली
ॐ बंदूक का टोटा, पिस्तौल की न‌ली
ॐ डॉल‌र, ॐ रूब‌ल, ॐ पाउंड
ॐ साउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड 

ॐ ध‌रती, ध‌रती, ध‌रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌
ॐ अष्ट‌धातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे
ॐ म‌हाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे
ॐ दुर्गा, दुर्गा, दुर्गा, तारा, तारा, तारा
ॐ इसी पेट के अन्द‌र स‌मा जाय स‌र्व‌हारा
ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त, ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त‌

इन्होने ऊंटों की आँखों में आंसू देखे हैं

इस माह आप लगातार अजंता देव की कविताओं से रू-ब-रू होते रहे हैं. २००२ में वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर से आया ‘राख का क़िला’ अजंता देव का पहला कविता संग्रह है. उसी की शीर्षक रचना पेश है.


राख का क़िला

-अजंता देव 

किले के नीचे आधी रात
भोपा भोपी के कन्ठ खनखनाते हैं
खेजड़ी से टिका रहता है रावण हत्था

ऊंटनी का दूध दुहा जाता है
नीचे से ही
नज़र आते हैं नक्काशीदार कंगूरे
चमचमाती दीवारें
नीचे से भव्य लगती है
राजा की रिहाइश
नीचे ही बसी है बस्ती
नीचे ही रहते हैं लोग
जिन्हें याद हैं पुराने किस्से रियासत के

इन्होने देखा है
पागल रानी को
किले की दीवार पर बैठे
सुनी हैं इन्होने
रात भर चिल्लाने की आवाजें
ऊंटों की आँखों में आंसू देखे हैं
जो चलते थे शाही काफिलों में

रेगिस्तान के बीच
अचानक नहीं खड़ा है
सदियों से जलकर बना है
राख का किला 

Monday, December 29, 2014

इतने अच्छे क्यूँ लगते हो


ग़ज़ल पुरानी है. गुलाम अली भी पुराने हैं. उतनी ही पसंदीदा रही है स्कूल-कॉलेज के ज़माने से. पेश कर रहा हूँ - इतनी मुद्दत बाद मिले हो - 


भारत के चित्रकार - प्रदीप सेनगुप्ता - 2








भारत के चित्रकार - प्रदीप सेनगुप्ता