Tuesday, June 30, 2015

स्टिल अलाइव स्टिल एलिस


उसे वह नहीं बनना था जिससे लोगों को भय लगता है और जिसे मिलने से वे कतराने लगते हैं. उसे अपनी बेटी अन्ना के होने वाले बच्चे को गोद में लेकर नानी होने का अहसास करना था. वह चाहती थी उसकी छोटी बेटी लीडिया स्तरीय अभिनेत्री बने. वह चाहती थी पढ़ चुकने लायक न रह सकने से पहले अपनी पसंद की सारी किताबें पढ़ सके.
एलिस हॉलैंड ने अपने जीवन के निर्माण में बहुत श्रम किया है और वह उस पर गर्व करती है. हारवर्ड में पढ़ाने वाली एलिस का पति भी एक सफल व्यक्ति है और उसके बच्चे बड़े हो चुके हैं. जब वह शुरू शुरू में चीज़ों को भूलना शुरू करती है वह इस बात पर ध्यान नहीं देती लेकिन जब वह अपनी पड़ोस में ही खो जाती है, उसे अहसास होता है कि सब कुछ सही नहीं चल रहा. मेडिकल जांच से पता चलता है कि वह अल्ज़ाइमर्स की बीमारी से ग्रस्त है. कुल पचास साल की आयु में.
एक तरफ एक ख्यात शिक्षाविद और प्रोफ़ेसर के रूप में उसकी इमेज संकट में पड़ने लगती है, स्वयं अपने और अपने परिवार के साथ उसे अपने सम्बन्ध को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता पड़ती है.
अपने बीते हुए कल को खो चुकी एलिस की स्मृति एकाध झीने धागों से उसे अपनी ज़िन्दगी से बांधे रहती है. वर्तमान के पलों को भरसक जी लेने का प्रयास करती एलिस अब भी एलिस बनी रहती है.
'स्टिल एलिस' के एक दृश्य में जूलिएन मूर (बाएँ)  
लिसा जेनोआ की किताब ‘स्टिल एलिस’ पर बनी हालिया फिल्म आपको थर्रा कर रख देती है. इसे देखने के लिए खासी हिम्मत और धैर्य की ज़रूरत होगी. ‘अ ब्यूटीफुल माइंड’ और ‘आर्डिनरी पीपल’ जैसी किताबों/ फिल्मों से तुलना की जा सकती है ‘स्टिल एलिस’ की. किसी व्यक्ति की बीमारी को कितनी संवेदना के साथ ट्रीट किया जाना चाहिए, यह अहसास ‘स्टिल एलिस’ दिलाती है.

किताब पढ़ने का धैर्य आपमें न भी हो तो फिल्म तो देखी ही जानी चाहिए. उपन्यास 2007 में आया था जबकि फिल्म 2014 में बनी. वॉश वेस्टमोरलैंड द्वारा निर्देशित फिल्म में जूलिएन मूर में एलिस हॉलैंड की भूमिका निभाई है जबकि एलेक बाल्डविन उनके पति बने हैं. टोरंटो के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर हुआ. जूलिएन मूर को उनके अभिनय के लिए ढेरों इनामात हासिल हुए हैं जिनमें बेस्ट ऐक्ट्रेस का ऑस्कर शामिल है.

Monday, June 29, 2015

एक पेंटिंग एक सौ बारह मुहावरे


पीटर ब्रूगेल द एल्डर की पेंटिंग नीदरलैंडिश प्रोवर्ब्सखासी दिलचस्प है. 1559 में देवदार के पैनल पर ऑइल मीडियम में बनी यह पेंटिंग उस ज़माने के डच समाज में प्रचलित  मुहावरों और कहावतों को अभिव्यक्ति देने की सफल कोशिश है.

एक नितांत ग्रामीण दृश्य में आप तकरीबन एक सौ बारह मुहावरों को चिन्हित कर सकते हैं. इनमें से कुछ तो आज भी लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं जैसे "swimming against the tide," "the big fish eats the little fish," "banging one's head against a brick wall," और "armed to the teeth."  

बाकी की कहावतें मानवीय मूर्खताओं की तरफ़ इशारा करती हैं.कुछेक मानवाकृतियां एक से अधिक उपमाओं का प्रतिनिधित्व करती दीखती हैं. मिसाल के तौर पर पेंटिंग के सबसे निचले हिस्से के बाएँ हिस्से में भेड़ के बाल उतारता आदमी. वह सूअर के बाल उतार रहे एक आदमी की बगल में बैठा दिखाया गया है. मुहावरा है “one shears sheep and one shears pigs," यानी हर किसी को एक ही तरह का काम करने से बराबर फायदा हो, ज़रूरी नहीं. इसमें एक दूसरे मुहावरे की तरफ़ भी इशारा किया गया है - "shear them but don't skin them," यानी आपने अपने संसाधनों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करना चाहिए. बिल्ली के गले में घंटी बांधता हुआ दिखाया गया एक योद्धा किस मुहावरे की तरफ ध्यान खींच रहा है, बताने की ज़रुरत नहीं.








चित्र पर क्लिक कर के देखें, आनंद आएगा. 

देखिये इस पेंटिंग को समझाता हुआ एक छोटा सा वीडियो - 

Saturday, June 27, 2015

प्रफुल्ल बिदवई के न रहने का अर्थ


प्रफुल्ल बिदवई ज़िंदाबाद

- शिवप्रसाद जोशी

प्रफुल्ल बिदवई से छात्र राजनीति के दिनों में पहचान हुई थी! फ़्रंटलाइन में उनका कॉलम आता था. पर्यावरण, एटमी राजनीति और कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, पूंजीवादी वर्चस्व की होड़, विश्व तापमान, ग्लोबल वॉर्मिंग की पॉलिटिक्स, विश्व शक्तियों की ख़ुराफ़ातें आदि ऐसी कई बातें थी जो हमें प्रफुल्ल बिदवई के लेखों से पता चलती थी और एक विचार बनता जाता था.

आपको वैचारिक रूप से सजग और तैयार करने वाले ऐसे कितने लेखक हैं. भारतीय भाषाओं में? प्रफुल्ल अंग्रेज़ी में लिखते थे और दिल और दिमाग के इतने क़रीब थे. अरुंधति रॉय से पहले अंग्रेज़ी में हम उन्हें ही जानते आए थे. उनका लिखना कभी ग़लत ही नहीं होता था इतनी अकाट्य प्रामाणिक और नपीतुली राईटिंग थी उनकी. अपनी वाम वैचारिकी के साथ उनके पास एक सजग और नैतिक अंतदृष्टि भी थी जिसके भरोसे वो वाम दलों को उनकी सुस्ती, बौद्धिक तंगहाली, और दिल्ली केंद्रित नज़रिए के लिए फटकारते रह पाए थे. वे उन तमाम सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में एक थे जो पिछले साल हिंदूवादी रथ की दिल्ली आमद पर विचलित थे. सब लोग इससे ज़्यादा विचलित वाम दलों की निष्प्राणता से थे. वो कील इन वाम दुर्गपतियों को कब चुभेगी.

प्रफुल्ल बिदवई से नाता कभी नहीं टूटा. उनके लेखों का संग्रह करते आए. लेखन में उनसे टिप्स लिए, उनकी बातें कोट की. मेहनत और नज़रिया बनाना सीखा. कभी सीधा वास्ता नहीं हुआ लेकिन जर्मनी के बॉन शहर से 2007 के दिनों में फ़ोन पर बातें हुईं, गाहेबगाहे उनका इंटरव्यू करते थे, पर्यावरण, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय परमाणु कार्यक्रम पर. वो इतनी प्यारी भाषा बोलते थे. बोलने में भी एक शब्द अतिरिक्त नहीं. इतने अलर्ट. इतने समय के पाबंद. और आवाज़ में ऐसी गतिशीलता और तीव्रता और ज़ोर- जैसे कितनी छटपटाहट है इस आदमी में कि सब कुछ ठीक क्यों नहीं हो जाता. और इधर उनका ब्लॉग. कितना जीवंत और शोधपरक आलेखों से भरा हुआ. ये वैचारिक और ज़मीनी लड़ाइयों के लिए मानो तैयारी की एक पाठशाला सी है. आख़िरी पोस्ट एक मई 2015 की है. मई दिवस. लेखन के श्रमिक ही तो थे प्रफुल्ल.

प्रफुल्ल बिदवई के निधन से बहुत तक़लीफ़ होती है. बहुत निजी तक़लीफ़. वे हम सबको छात्र के रूप में स्कॉलर के रूप में लेखक के रूप में ऐक्टिविस्ट के रूप में लीडर और पॉलिटिक्ल बिरादरी के रूप में जगाते आ रहे थे. कहां जगे हम. अभी मौत हुई है तो हड़बड़ा कर उठे हैं. फिर सो जाएंगे.

Friday, June 26, 2015

लागी लगन - राग हंसध्वनि, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान



उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान से सुनिए राग हंसध्वनि में एक द्रुत कम्पोज़ीशन -

Thursday, June 25, 2015

मगर हीरो का बचना लाजिमी होता है

प्रमोद सिंह का गद्य पिछले बरस ‘अजाने मेलों में’ नामक किताब की सूरत में सामने आया था. हिन्दी ब्लॉग जगत में वे एक जाना माना नाम हैं. आज उन्हीं के ब्लॉग से एक उम्दा पोस्ट शेयर करने का मन है -  

फोटो www.youthkiawaaz.com से साभार

कुत्‍तों से भरी दुनिया में हीरो..

 -प्रमोद सिंह

एक हीरो के समर्थन व बचाव में ऐसे ज़ोर मारते निर्दोष प्रेम के खिलाफ़ आख़ि‍र कुछ धृष्‍ठ तत्‍व हैं इतनी छाती क्‍यों पीट रहे हैं? स्‍कूलों में जो भी पढ़ाया जाता हो, समाज में कदम रखते ही बच्‍चा दनाक् से अपना सबक सीख लेता है कि कैसा भी सामुदायिक जोड़ हो, उसमें एक, या कुछ हीरो होंगे और बाकी जो भी होंगे उन्‍हें उनका लिहाज करने के लिए भले जुनियर आर्टिस्‍ट्रस बोला जाता हो, होते वो कुत्‍ते ही हैं, तो इस सामुदायिक जोड़ का बच्‍चे के लिए कामकाजी तोड़ यही होता है कि वह हीरो का करीबी होने की कोशिश करे और कुत्‍तों से अपनी दूरी बनाकर चले. समाज में सहज साफल्‍य का सामयिक सर्वमान्‍य नियम है, परिवार से शुरु होकर जीवन व समाज के सभी क्षेत्रों में हम रोज़ न केवल उसका पालन होता देखते हैं, खुद लपक-लपककर उसका हिस्‍सा होते रहते हैं. नहीं होते तो समाज हंसते हुए दूर तक हमें कुत्‍ता पुकारता चलता है. 

परिवार का कोई ताक़तवर सदस्‍य हो, सबके उससे अच्‍छे संबंध होंगे. थोड़ा नीच व अपराधी प्रकृति का हुआ तोउसके चहेते होने में इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा. उसी परिवार में कोई दुखियारी विवाहित, प्रताड़ि‍त, रोज़ लात खाती एक गरीब बहन हो, आप थोड़ा याद करने की कोशिश कीजिये, कोई उस बहन की ख़बर नहीं रखता होगा. परिवार की यह बेसिक कहानी समाज के लगभग सभी क्षेत्रों की कहानी है, और बिना किसी अपवाद के आपको हर क्षेत्र में सघनभाव क्रियारत मिलेगा. आदर्शवादी जोड़-तोड़ में लगे किसी फ़ि‍ल्‍म प्रोड्यूसर के पास जाइये, उसे अपने गरीब एक्‍टरों की याद नहीं होगी, वह उसी बड़े सितारे के सपनों में तैरता मिलेगा जिसने कभी उसके लिए एक दिन शूटिंग का समय निकालकर उपकृत किया था. प्रोड्यूसर के फेसबुक वाले पेज़ पर सितारे की महानता की संस्‍तुति में आपको ढेरों स्‍मरणीय पंक्तियां मिलेंगी. यही कहानी थोड़े बदले शक्‍लों में किसी प्रकाशक की, कॉलेज अध्‍यापक की, मीडिया में सक्रिय किन्‍हीं और आदर्शवादी तोप के संबंधों के नेटवर्क में उसी सहजभाव से आपको घटित होता दिखेगी. उसमें ज़रा सा भी अतिरेक न होगा. सामाजिक परिवर्तन के लिए सबकुछ दावं पर लगाने का मूलमंत्र जपनेवाले समूहों के बीच भी. 

तब जब पूरे समाज का यही एक इकलौता मूल्‍य है तो बेचारे एक बड़े सितारे की जान को क्‍यूं आनापिये में एक ज़रा ग़लती हो गई, तो आप क्‍या करोगे, उसके लिए बेचारे नन्‍हीं सी जान को फांसी पर चढ़ाओगेउससे कुत्‍तों का जीवन किसी भी तरह संभल जायेगाकल को आप मुहब्‍बत भरे कुत्‍तों को अंकवार लेने लगोगेअब आप तुनककर न्‍याय-स्‍याय मत बोलने-बकने लगियेगा. लोकतंत्र हो या कोई तंत्र हो, न्‍याय ही नहीं, जीवन का सबकुछ वहां गैर-बराबरी पर चलता है. आप बहुत भोले होंगे तब भी इतना जानते होंगे. नहीं जान रहे हैं तो फालतू मेरा और अपना समय ज़ाया कर रहे हैं. सड़क पर सो रहा और समाज में बिना किसी हैसियत का बच्‍चा क्‍या खाकर कल को समाज में आपके बच्‍चे की बराबरी, या उससे मुकाबला करेगाकरने को खड़ा हुआ तो सबसे पहले आप ही कुत्‍ता-कुत्‍ता का रौर उठाना शुरु करेंगे.

सारी हिन्‍दी फिल्‍में मुंबई, पंजाब, दिल्‍ली और फिरंगी हवाइयों में ही घूमती फिरती है और हीरो हमेशा इन्‍हीं जगहों के होते हैं, और जाने कितने ज़माने से यही सब देख-देखकर आपकी आत्‍मा तृप्‍त होती रही है. इस दुनिया का नियम इसके सिर रखकर किसी फ़ि‍ल्‍म में हीरो का त्रिपुरा, मेघालय या झारखंडी किसी प्रदेश का बनाकर एक मर्तबा देखिये, या हिरोईन ही को, देखिये, कैसी वितृष्‍णा में आपका मुंह टेढ़ा होता है. उसके हिक़ारत में इस तरह तिरछा होने में कुछ भी अनोखा नहीं है. आप सिर्फ़ समाज में बड़े व्‍यापक और घर, तकिये और आपके चप्‍पल तक में घुसे वही इकहरे इकलौते अनूठे हीरोगिरी वाले वैल्‍यू को सब्‍सक्राइब कर रहे हैं- जिसमें बहुत थोड़े लोग ही हैं जो हीरो हैं, बाकी समाज का लातखाया, हाशिये पर छूटा, दुनिया से भुलाया तबका अपने घर में अपने को चाहे जो समझता हो, आपकी नज़रों में कुत्‍ता ही है. अपने जीवनरक्षा या अधिकार के लिए उसके ऐसे, या कैसे भी फुदकने का बहुत औचित्‍य नहीं है. फ़ि‍ल्‍म के आख़ि‍र में यूं भी कुत्‍तों की किसे याद रहती है, मगर हीरो का बचना, किसी भी सूरत में, लाजिमी होता है. हीरो बचेगा ही. समाज में जब तक ऐसे गहरे धंसे कुत्‍ता मूल्‍य हैं, हीरो का कौन बाल बांका करनेवाला हुआ. हीरो जिंदाबाद.  

गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम- पाकिस्तान से आधुनिक कवितायेँ - 12


 दश्त-ए-तन्हाई में
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लरजां हैं
तेरी आवाज़ के साये तेरे होंठों के सराब
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले
खिल रहे हैं तेरे पहलू के समन और गुलाब


उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तेरी साँस की आँच
अपनी ख़ुश्ब में सुलगती हुई मद्धम-मद्धम
दूर् उफ़क़ पर चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम

उस क़दर प्यार से ऐ जान-ए जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़सार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ
यूँ गुमाँ होता है गर्चे है अभी सुबह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात


(दश्त-ए-तन्हाई - वीरान जंगल में,  लरज़ा हैं - कम्पित हो रहे हैं,  सराब - मरीचिका, ख़स-ओ-ख़ाक तले -घास और मिट्टी के कणों के नीचे, समन -  चमेली, क़ुर्बत -  नज़दीकी, उफ़क़ आकाश, शबनम - ओस, रुख़सार - गाल, गुमाँ  - शक)

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म सियालकोट में १९११ में हुआ. शिक्षा दीक्षा लाहौर में हुई जहाँ से १९३४ में उन्होंने एम.ए. की डिग्री हासिल की. पहले वे एक कॉलेज में अंग्रेज़ी के अध्यापक हुए उसके बाद फ़ौज में भरती हो गए. वहां उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल तक का ओहदा मिला और युद्ध की सेवाओं के एवज़ में एम.बी.ई. का तमगा. देश के विभाजन के बाद उन्हें पाकिस्तान टाइम्स का संपादक नियुक्त किया गया. रावलपिन्डी केस में उन्हें जेल की सज़ा काटनी पडी. कालान्तर में उन्होंने एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की पत्रिका ‘लोटस’ का लेबनान से सम्पादन किया. १९८४ में वे पाकिस्तान लौटे और उसी साल उनका निधन हो गया. प्रगतिशील लेखक संघ के महत्वपूर्ण साहित्यकारों में उनकी गिनती होती है लेकिन दरअसल वे एक ऐसे शायर हैं जिनके यहाँ संवाद और कला का अनूठा सामंजस्य पाया जाता है. शायरी की उनकी सात किताबें छपीं और उन्हें अनेक सम्मान मिले जिनमें लेनिन शांति पुरुस्कार सबसे महत्वपूर्ण है.

Wednesday, June 24, 2015

मीशा शफ़ी की आवाज़ में दश्त-ए-तन्हाई


मीशा शफ़ी की आवाज़ में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर नज़्म दश्त-ए-तन्हाई -

जब कोई बात बनाये न बने, पास रहो - पाकिस्तान से आधुनिक कवितायेँ - 11


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म सियालकोट में १९११ में हुआ. शिक्षा दीक्षा लाहौर में हुई जहाँ से १९३४ में उन्होंने एम.ए. की डिग्री हासिल की. पहले वे एक कॉलेज में अंग्रेज़ी के अध्यापक हुए उसके बाद फ़ौज में भरती हो गए. वहां उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल तक का ओहदा मिला और युद्ध की सेवाओं के एवज़ में एम.बी.ई. का तमगा. देश के विभाजन के बाद उन्हें पाकिस्तान टाइम्स का संपादक नियुक्त किया गया. रावलपिन्डी केस में उन्हें जेल की सज़ा काटनी पडी. कालान्तर में उन्होंने एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की पत्रिका ‘लोटस’ का लेबनान से सम्पादन किया. १९८४ में वे पाकिस्तान लौटे और उसी साल उनका निधन हो गया. प्रगतिशील लेखक संघ के महत्वपूर्ण साहित्यकारों में उनकी गिनती होती है लेकिन दरअसल वे एक ऐसे शायर हैं जिनके यहाँ संवाद और कला का अनूठा सामंजस्य पाया जाता है. शायरी की उनकी सात किताबें छपीं और उन्हें अनेक सम्मान मिले जिनमें लेनिन शांति पुरुस्कार सबसे महत्वपूर्ण है.

तुम मेरे पास रहो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मर्हम-ए-मुश्क लिये नश्तर-ए-अल्मास चले
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले
दर्द के कासनी, पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की,
रह तकने लगे, आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह, क़ुल-क़ुल-ए-मय
बहर-ए-नासुदगी मचले तो मनाये न मने
जब कोई बात बनाये न बने
जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुन-सान, सियह रात चले
पास रहो

मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
(सियहकाली, मर्हम-ए-मुश्क - कस्तूरी मलहम, नश्तर-ए-अल्मास - हीरे की छुरी)

Tuesday, June 23, 2015

पर झूठ के तो पांव थे - एदुआर्दो गालेआनो का गद्य - 7

गालेआनो का गद्य - 7

अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

एदुआर्दो गालेआनो लातिन अमेरिका की ऐतिहासिक और समकालीन यातना को दुनिया के सामने लाने वाले लेखक पत्रकार हैं. वे जितना अपने पीड़ित भूगोल के दबेकुचले इतिहास के मार्मिक टीकाकार हैं उतना ही भूमंडलीय सत्ता सरंचनाओं और पूंजीवादी अतिशयताओं के प्रखर विरोधी भी. उनका लेखन और एक्टिविज़्म घुलामिला रहा है. इसी साल 13 अप्रेल को 74 साल की उम्र में कैंसर से उनका निधन हो गया.

प्रस्तुत गद्यांश एडुआर्दो गालेआनो की किताब, मानवता का इतिहास, मिरर्स (नेशन बुक्स) से लिया गया है. हिंदी में इसका रूपांतर गुएर्निका मैगज़ीन डॉट कॉम से साभार लिया गया है. अंग्रेज़ी में इनका अनुवाद मार्क फ़्राइड ने किया है.

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7.
युद्धों के झूठ

एडवर्टाइज़िंग अभियान, मार्केटिंग योजनाएं. टार्गेट है जनमत- पब्लिक ओपनियन. युद्ध वैसे ही बेचे जाते हैं जैसे कारें, झूठ बोलकर.

अगस्त 1964 में, राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने वियतनामियों पर टोन्किन खाड़ी में दो अमेरिकी युद्धपोतों पर हमले का आरोप लगाया था.

उसके बाद राष्ट्रपति ने वियतनाम पर हमला कर दिया, विमान और सेना भेजकर. उन्हें पत्रकारों और राजनीतिज्ञों से शाबासियां मिली और उनकी लोकप्रियता बुलंदी छूने लगी. सत्ता में डेमोक्रेट और सत्ता से बाहर रिपब्लिकन एक पार्टी बन गए, कम्युनिस्ट अतिक्रमण के ख़िलाफ़.

युद्ध में बड़े पैमाने पर वियतनामियों के संहार के बाद, जिनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे थे, जॉनसन के रक्षा मंत्री रॉबर्ट मेकनमारा ने स्वीकार किया कि टोन्किन खाड़ी हमला कभी हुआ ही नहीं था.

जो मर गए थे वे फिर से जीवित नहीं हो गए.

मार्च 2003 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इराक़ पर अपने जनसंहार के हथियारों से दुनिया को लगभग तबाह कर देने का आरोप लगाया था, बेहद घातक अभूतपूर्व हथियार.

फिर राष्ट्रपति ने इराक़ पर हमला कर दिया, विमान और फ़ौज भेजकर. उन्हें पत्रकारों और नेताओं से प्रशंसाएं मिलीं. और उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी. सत्ता में रिपब्लिकन और सत्ता से बाहर डेमोक्रेट एक दल बन गए, आतंकवाद के हमले के ख़िलाफ़ एकजुट.

बड़े पैमाने पर जब युद्ध ने इराक़ियों का संहार कर दिया, जिनमें ज़्यादातर औरतें और बच्चे थे, बुश ने स्वीकार किया कि व्यापक जनसंहार के हथियार कभी थे ही नहीं. बेहद घातक अभूतपूर्व हथियार उनके अपने भाषण थे.

आने वाले चुनावों में वो दूसरी बार के लिए फिर से जीत गए.


मेरे बचपन में, मां बताती थी कि झूठ के पांव नहीं होते. वो ग़लत थी. 

Monday, June 22, 2015

पर झूठ के तो पांव थे - एदुआर्दो गालेआनो का गद्य - 6

गालेआनो का गद्य - 6

अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

एदुआर्दो गालेआनो लातिन अमेरिका की ऐतिहासिक और समकालीन यातना को दुनिया के सामने लाने वाले लेखक पत्रकार हैं. वे जितना अपने पीड़ित भूगोल के दबेकुचले इतिहास के मार्मिक टीकाकार हैं उतना ही भूमंडलीय सत्ता सरंचनाओं और पूंजीवादी अतिशयताओं के प्रखर विरोधी भी. उनका लेखन और एक्टिविज़्म घुलामिला रहा है. इसी साल 13 अप्रेल को 74 साल की उम्र में कैंसर से उनका निधन हो गया.


प्रस्तुत गद्यांश एडुआर्दो गालेआनो की किताब, मानवता का इतिहास, मिरर्स (नेशन बुक्स) से लिया गया है. हिंदी में इसका रूपांतर गुएर्निका मैगज़ीन डॉट कॉम से साभार लिया गया है. अंग्रेज़ी में इनका अनुवाद मार्क फ़्राइड ने किया है.

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6.
युद्ध पर जाती बार्बी

कोई एक अरब से ज़्यादा बार्बी होंगी. सिर्फ़ चीनी ही उनसे ज़्यादा हैं.

इस ग्रह पर सबसे प्यारी स्त्री हमें कभी नीचा नहीं दिखाएगी. अच्छाई के ख़िलाफ़ बुराई की लड़ाई में, बार्बी का नाम लिस्ट में आया, उसने सैल्यूट किया और वो इराक़ की ओर बढ़ गई.

वो मोर्चे पर पहुंची. ज़मीन, समुद्र और हवा की नपीतुली पोशाकें पहने जिन्हें पेंटागन ने देखा था और मंज़ूरी दी थी.
बार्बी पेशे बदलने की आदी है. बालों की स्टाइल, और कपड़े भी. वो गायिका रही है, एक एथलीट, फ़ॉसिलविज्ञानी, एक दंत चिकित्सक, एक अंतरिक्षयात्री, अग्निशमन कर्मी, एक बैले डांसर और भी न जाने क्या. हर नये काम के लिए एक नई लुक और एक पूरी तरह से नया वार्डरोब अपरिहार्य है जो दुनिया की हर लड़की ख़रीदने को बेताब है.

फ़रवरी 2004 में, बार्बी अपने बॉयफ़्रेंड भी बदलना चाहती थी. आधा सदी से ज़्यादा समय तक वो केन के साथ ठीक थी, जिसकी नाक उसके शरीर में इकलौता उभार है, लेकिन तभी एक ऑस्ट्रेलियाई सर्फ़र ने उसे फुसलाया और प्लास्टिक का अपराध करने पर विवश किया.

बार्बी की निर्माता मैंटल ने एक आधिकारिक सेपरेशन का ऐलान किया.

ये एक तबाही थी. बिक्री तेज़ी से गिरी. बार्बी पेशे और पोशाक बदल सकती थी, लेकिन उसे एक बुरी मिसाल पेश करने का कोई हक़ नहीं था.

मैटल ने एक आधिकारिक सुलह का ऐलान किया. 

Sunday, June 21, 2015

पर झूठ के तो पांव थे - एदुआर्दो गालेआनो का गद्य - 5

गालेआनो का गद्य - 5

अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

एदुआर्दो गालेआनो लातिन अमेरिका की ऐतिहासिक और समकालीन यातना को दुनिया के सामने लाने वाले लेखक पत्रकार हैं. वे जितना अपने पीड़ित भूगोल के दबेकुचले इतिहास के मार्मिक टीकाकार हैं उतना ही भूमंडलीय सत्ता सरंचनाओं और पूंजीवादी अतिशयताओं के प्रखर विरोधी भी. उनका लेखन और एक्टिविज़्म घुलामिला रहा है. इसी साल 13 अप्रेल को 74 साल की उम्र में कैंसर से उनका निधन हो गया.


प्रस्तुत गद्यांश एडुआर्दो गालेआनो की किताब, मानवता का इतिहास, मिरर्स (नेशन बुक्स) से लिया गया है. हिंदी में इसका रूपांतर गुएर्निका मैगज़ीन डॉट कॉम से साभार लिया गया है. अंग्रेज़ी में इनका अनुवाद मार्क फ़्राइड ने किया है.

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5.
दीवार

बर्लिन दीवार हर रोज़ ख़बर बनती थी. सुबह से रात हम पढ़ते थे, देखते थे, सुनते थेः शर्म की दीवार, बदनामी की दीवर, लौह पर्दा...

आख़िरकार, एक दीवार जो गिरने के ही क़ाबिल थी. लेकिन अन्य दीवारें उग आईं और दुनिया भर में उनका उगना जारी है. हालांकि वे बर्लिन की दीवार से कहीं बड़ी है, फिर भी उनके बारे में हम बहुत कम सुनते हैं.

आख़िर क्यों कुछ दीवारें इतना शोर मचाती हैं और कुछ क्यों इतनी ख़ामोश होती हैं?

बहुत कम उस दीवार के बारे में कहा जाता है जो अमेरिका, मेक्सिको की सीमा के पास बना रहा है, और उससे भी कम उस कंटीली दीवार के बारे में सुनते हैं जो अफ़्रीकी तट पर स्पेन के एनक्लेवोः स्युटा और मेलिला को घेर कर बनाई जा रही है.

व्यवहारिक तौर पर पश्चिमी तट की दीवार के बारे में कुछ नहीं कहा जाता है, जो फ़लिस्तीनी ज़मीनों पर इस्राएली क़ब्ज़ों को क़ायम रखे हुए है और बर्लिन दीवार से जो 15 गुना लंबी होगी. और उस दीवार के बारे में कुछ नहीं, कुछ भी नहीं कहा जाता जो मोरक्को की दीवार है, जो मोरक्को साम्राज्य का सहारा होमलैंड पर क़ब्ज़ा दिखाती है, और बर्लिन की दीवार से 60 गुना लंबी है.

आख़िरकार क्यों कुछ दीवारें इतनी ऊंची और अन्य इतनी बौनी रह जाती हैं?

Saturday, June 20, 2015

पर झूठ के तो पांव थे - एदुआर्दो गालेआनो का गद्य - 4

गालेआनो का गद्य - 4

अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

एदुआर्दो गालेआनो लातिन अमेरिका की ऐतिहासिक और समकालीन यातना को दुनिया के सामने लाने वाले लेखक पत्रकार हैं. वे जितना अपने पीड़ित भूगोल के दबेकुचले इतिहास के मार्मिक टीकाकार हैं उतना ही भूमंडलीय सत्ता सरंचनाओं और पूंजीवादी अतिशयताओं के प्रखर विरोधी भी. उनका लेखन और एक्टिविज़्म घुलामिला रहा है. इसी साल 13 अप्रेल को 74 साल की उम्र में कैंसर से उनका निधन हो गया.


प्रस्तुत गद्यांश एडुआर्दो गालेआनो की किताब, मानवता का इतिहास, मिरर्स (नेशन बुक्स) से लिया गया है. हिंदी में इसका रूपांतर गुएर्निका मैगज़ीन डॉट कॉम से साभार लिया गया है. अंग्रेज़ी में इनका अनुवाद मार्क फ़्राइड ने किया है.

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4.
कम्प्यूटर के पिता

एलन ट्यूरिंग की खिल्ली उड़ाई जाती थी कि वो कड़ियल इंसान नहीं है, ही मैन सरीखे नहीं है जिसके सीने पर बाल हों.

बेल्ट की जगह वो एक पुरानी नेकटाई लगाते थे. बामुश्किल सोते थे और कई कई दिन तक शेविंग नहीं करते थे. और वो शहर में एक छोर से दूसरे छोर तक भागते ही रहते थे, दिमाग भी दौड़ता रहता था, जटिल गणितीय सूत्रों को हल करने में.

ब्रिटिश खुफ़िया विभाग के लिए काम करते हुए, दूसरे विश्व युद्ध की अवधि कम करने में उन्होंने भी मदद की थी. उन्होंने एक मशीन का आविष्कार किया था जो जर्मन हाईकमान के अबूझ सैन्य कोड को क्रैक कर सकती थी.
उस मोड़ पर पहुंचने से पहले ही वो इलेक्टॉनिक कम्प्यूटर के प्रोटोटाइप के बारे में सोच चुके थे. और आज के सूचना तंत्रों की सैद्धांतिक ज़मीन भी तैयार कर चुके थे. बाद में, इंटिग्रेटेड प्रोग्रामों की मदद से चलने वाले पहले कम्प्यूटर का निर्माण करने वाली टीम की उन्होंने अगुवाई की थी.

वो उसके साथ कभी न ख़त्म होने वाली शतरंज की बाज़ियां खेलते थे और उससे ऐसे सवाल पूछते कि मशीन के नटबोल्ट हिल जाएं. उन्होंने ज़ोर दिया को वो उन्हे प्रेमपत्र लिखे, इस पर मशीन ने कुछ ऐसे संदेश निकाले जो समझ से परे थे.

1952 में आला दर्जे की अशालीनता के लिए उन्हें मानचेस्टर पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया.

होमोसेक्सुअल होने का मुक़दमा उन पर चला.

जेल से निकलने के लिए उन्हें इस लगाव के चिकित्सकीय इलाज के लिए हामी भरनी पड़ी. दवाओं की बमबारी ने उन्हें नपुंसक कर दिया, उनकी छातियां उग आईं. वो कमरों में बंद हो गए, यूनिवर्सिटी फिर कभी नही गए. उन्होंने अपने बारे में फुसफुसाहटें सुनी, नज़रों को अपनी पीठ पर गढ़ा हुआ महसूस किया.

बिस्तर पर जाने से पहले उनकी एक सेब खाने की आदत थी.

एक रात उन्होंने सेब में साइनाडड का इंजेक्शन भर दिया. 

पर्याप्त मौसम नहीं होते आदमी के पास


आदमी के पास इतना समय नहीं होता
-येहूदा आमीखाई

आदमी के पास इतना समय नहीं होता
कि हरेक चीज़ के वास्ते समय हो सके
उसके पास पर्याप्त मौसम नहीं होते
कि हर उद्देश्य के लिए मौसम हो
धर्मोपदेशक ग़लत थे इस बारे में

आदमी को ज़रूरत होती है एक ही पल प्यार करने और नफ़रत करने की
एक ही आंख से हंसने और रोने की
एक ही हाथ से पत्थर फेंकने और उन्हें इकठ्ठा करने की
युद्ध में प्रेम और प्रेम में युद्ध करने की

और नफ़रत करने और माफ़ करने की, और याद रखने और भूल जाने की
व्यवस्थित करने और गड़बड़ा देने की, खाने और पचाने की -
जिसे करने में इतिहास को सालों-साल लग जाते हैं
समय नहीं होता आदमी के पास
जब वह खो देता है वह ढूंढता है
जब वह पा लेता है, भूल जाता है
जब वह भूलता है वह प्यार करता है
जब वह प्यार करता है वह भूलना शुरू करता है

और उस की आत्मा बहुत अनुभवी और पेशेवर है
केवल उसकी देह ही बनी रहती है शौकिया हमेशा
वह कोशिशें करता है,
हारता है
भटकता है
कुछ नहीं सीखता -
अपनी खुशियों और पीड़ाओं में
धुत्त और अंधा

वह शरद में मरेगा जैसे पत्तियां मरती हैं सिकुड़ी हुईं
और भरा होगा अपने आप से और मीठे से


मैदान पर पत्तियां सूख रही हैं
नंगी शाखें अभी से उस जगह की ओर इशारा कर रही हैं
जहां हर चीज़ के लिए समय है

एक मेरी ही नेकी से क्या होता है - पाकिस्तान से आधुनिक कवितायेँ - 10

१९१४  में झंग में जन्मे मजीद अमजद ने लाहौर में शिक्षा पाई. एक पत्रकार के रूप में उन्होंने अपना करियर शुरू किया. कुछ दिन तक उरूज का सम्पादन किया. फिर सरकारी नौकरी की और असिस्टेंट फ़ूड कंट्रोलर के पद से रिटायर हुए. चौथे दशक के उर्दू कवियों की फेहरिस्त में उनका नाम काफी ऊपर है. जीवनकाल में उनका एक संग्रह शबे रफ़्ता प्रकाशित हुआ. संकलित रचनाएं १९७४ में उनकी मृत्यु के बाद छप कर आईं.  

स्वीडिश चित्रकार पिया एरलांदसन के पेंटिंग


फ़र्द

-मजीद अमजद 

इतने कड़े वसीअ निजाम निज़ाम में सिर्फ़ एक मेरी ही नेकी से क्या होता है
मैं तो इससे ज़्यादा कर ही क्या सकता हूँ
मेज़ पर अपनी सारी दुनिया - काग़ज़ और क़लम और टूटी फूटी नज़्में 
सारी चीज़ें बड़े क़रीने से रख दी हैं
दिल में भरी हुई हैं इतनी अच्छी अच्छी बातें:
उन बातों का ध्यान आता है तो ये सांस बड़ी ही बेशबहा लगती है
मुझको भी तो कैसी कैसी बातों से राहत मिलती है
मुझको इस राह में सादिक़ पाकर
सारे झूठ मेरी तसदीक़ को आ जाते हैं
एक अगर मैं सच्चा होता 
मेरी इस दुनिया में जितने क़रीने सजे हुए हैं
उनकी जगह बेतरतीबी से पड़े हुए कुछ टुकड़े होते
मेरे जिस्म के टुकड़े, काले झूठ के चलते आरे के नीचे!
इतने बड़े निज़ाम से मेरी नेकी टकरा सकती थी 
अगर इक मैं सच्चा होता!

(फ़र्द: एक आदमी, वसीअ: फैला हुआ, बेशबहा: मूल्यवान, तसदीक़: पुष्टि)  

Friday, June 19, 2015

एंड्रू साल्गादो के चित्र

१९८२ में कनाडा के रेजीना में जन्मे एंड्रू साल्गादो फिलहाल सबसे तेज़ी से उभरते नौजवान कलाकारों में शुमार किये जाते हैं. सितम्बर २००७ में संसार की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनियों में से एक साची एंड साची ने उन्हें "One to invest today" वाली चित्रकारों की अपनी लिस्ट में खासी ऊपर जगह दी.