Saturday, January 28, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - तेरह



परमौत की प्रेम कथा - भाग तेरह

जीभ से होंठ चाटते हुए राका ने कैसेट मेज़ पर धरा और रज़ाई समेटकर चारों के वास्ते जगह बनाई. मसालों और सड़े हुए मोजों की ठोस गंध खोली की हवा में ठहरी हुई थी. अतिथिगण इधर-उधर देखते हुए इस अलौकिक कमरे का जायजा ले रहे थे जब सबसे पहले हरुवा भन्चक की जुबान खुली - "अरे राका गुरु, भीसीआर कां है भीसीआर? और तुमारे यहाँ तो टीवी भी नहीं दिखा रहा ... कहीं बेफालतू का टामा पिलाने को तो नहीं लाये हो अपने महल में?"

"सब इंतजाम है चचा. सब इंतजाम है. जरा बैठो तो सही आराम से. थोड़ा गला-हला तर कर लेते हैं पैले." राका त्वरित व्यवस्था करने में जुटा हुआ था. उसके पास दो ही गिलास थे. वो भी खद्दर यानी स्टील के. उसने खाट के नीचे एक परिचित पोटली में हाथ डालकर पान मसाले का एक बड़ा खाली डिब्बा निकाला और उसे गिरधारी को थमाता हुआ बोला - "मेरा इसी में बना देना यार उस्ताज. पानी की बाल्टी नीचे है ..."

राका ने खूंटियों पर टंगे चार-छः चीथड़ों को हटाया तो एक खिड़कीनुमा झिरी नमूदार हुई. झिरी पर मुंह लगाकर उसने आवाज़ दी - "तिलुवा! ओ तिलुवा! मर तो नहीं गया बे!"

अतिथि-समुदाय की निगाहें भी झिरी से लग गईं. एक-दो बार तिलुवा नामक अपने पड़ोसी को पुकारने के बाद भी जब उस पार से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो राका ने झुककर खाट के नीचे से एक लंबा सा बांस निकाला और उसे झिरी से घुसाकर नीचे करते हुए एक्सपर्ट की तरह किसी चीज़ को कोंचना शुरू किया.

उसके ऐसा करते ही उस पार से "ओईजा वे ..." की कराह निकली और उसके बाद राका को समर्पित प्रेमपूर्ण धाराप्रवाह गालियों का सिलसिला चला.

"पैले भीसीआर दे जरा फिर हो जाना टोटिल रे तिलुवा ... दाज्यू लोग आये रहे आज पाल्टी करने बेटे" अपनी सफलता पर मुदित राका ठठाकर हंसा.

कुछ और गाली-गलौज के उपरान्त झिरी से रामायण देखने की मशीन हस्तांतरित की गई और राका ने चीथड़ों को यथावत सजा दिया. पान मसाले के डिब्बे में भरे पेयपदार्थ को उदरस्थ करने के साथ ही वह "अभी आया" कहकर बाहर चला गया. हरुवा  भन्चक ने काफी देर तक बिना ढक्कन वाले इस वीसीआर को नज़दीक से देखा और कैसेट को थामे खाट के एक कोने पर लधर गया था जबकि परमौत और गिरधारी मधुबाला की धुंआई हुई फोटो का नज़दीकी मुआयना कर रहे थे.

दो या तीन मिनट बाद अपनी खोपड़ी पर शटरवाला काला-सफ़ेद टीवी लादे राका ने कमरे में एंट्री ली. टीवी को गैस-भट्टी के ऊपर टिकाकर उसने सूचित किया - "यहाँ जगह ही नहीं है तो इस चक्कर में गुसलखाने में फिट कर रखा है साले को ..."

अब उसने आलू-प्याज और आटे-बेसन वगैरह के बोरों को इस तरतीब में लगाया कि टीवी रखने को ठीकठाक साइज़ का ढुलमुल प्लेटफार्म जैसा बन गया. टीवी, वीसीआर और तार वगैरह का जोड़-जंतर करने में उसे कुल पांचेक मिनट और लगे. जिस विशेषज्ञता के साथ राका इस कार्य को अंजाम दे रहा था उस से ज़ाहिर होता था कि उसने इसकी प्रैक्टिस में कई सारे मंगलवार इन्वेस्ट किये होंगे. तीनों मेहमान उसके इस मशीनी अंदाज़ से बहुत ज़्यादा इम्प्रैस नज़र आ रहे थे और बहुत बारीकी से हर स्टेप को अपने दिमागों में दर्ज करते जाते थे.

राका ने "जयहो" का नारा बुलंद किया और कैसेट घुसाकर स्विच ऑन किया. टीवी चालू हो गया और साथ ही बहरा कर देने वाली आवाज़ के साथ उसकी नीली स्क्रीन पर ओलों की बरसात का मंजर भी. सबकी निगाहें टीवी पर थीं. वीसीआर से खटक-खटक की कुछ आवाजें निकलना शुरू हुईं और भीतर टेप घूमने लगा. स्क्रीन पर ओलों की बरसात बंद हो गयी और आवाज़ भी. इनकी जगह तेज़-तेज़ भागती चमकीली आड़ी लकीरों ने ले ली.

"आयेग ... अभी आयेगा ..." कहकर राका टीवी पर निगाहें गडाए तीनों मेहमानों को दिलासा देने लगा. जब दो मिनट तक आड़ी लकीरें आना बंद नहीं हुईं तो राका ने "ट्रेकिंग ठीक करनी पड़ेगी" कहकर स्विच ऑफ किया और कैसेट बाहर निकालकर पेंचकस खोजने लगा.

पेंचकस ढूँढने में पांच मिनट जाया हुए. पेंचकस मिला तो राका मिट्टी के तेल की बोतल खोजने लगा. वह मिली तो उसे रुई की दरकार हुई. दसेक मिनट में इस सब चीज़ों को इकठ्ठा करने के उपरान्त उसने मिट्टीतेल में भीगे रुई के फाहे से वीसीआर के हैड को काफी देर तक घिसा और फूफू कर उसे सुखाने का नाटक किया. कैसेट फिर से डाला गया. ओलों की बरसात ने फिर से दर्शकों का स्वागत किया.

"साला तार उखड़ गया लगता है" कहकर टीवी फिर से बंद हुआ. वीसीआर की लीड को काले-सफेद टीवी के लिए कम्पैटिबल बनाने के उदेश्य से आगे से काटकर उसके तारों के त्रिशूल को नंगा किया गया था ताकि वे टीवी के पीछे पेंचों में किसी तरह फंसाए जा सकें. तार वाकई उखाड़ गया था बल्कि टूट भी गया था और उसे दुबारा कारआमद बनाने के लिए ब्लेड की ज़रुरत हुई. राका फिर से भागकर गुसलखाने गया और ब्लेड लेकर आया. पंद्रह मिनट तक चले इस कार्यक्रम के बाद जब सब कुछ ठीकठाक जैसा हो गया, राका ने मेहमानों को आँख मारने की नीयत से पलटकर देखा. परमौत और गिरधारी ने खर्राटे मारने शुरू कर दिए थे. हरुवा भन्चक जगा हुआ था और विस्फारित नेत्रों से रामायण शुरू होने का इंतज़ार कर रहा था.

राका के कहनेपर परमौत और गिरधारी को जगाया गया. चारों चैतन्य हो गए तो टीवी चालू किया गया और उसमें बाकायदा रामायण सीरियल आने लगा था. कैसेट खासा घिसा हुआ था लेकिन पात्र पहचानने में आ रहे थे.

"आगे बढ़ा राका यार ..." कहता हुआ गिरधारी स्क्रीन के और नज़दीक पहुँचने की कोशिश करने लगा.

राका ने हामी भरते हुए सर हिलाया और फॉरवर्ड बटन दबा दिया. छवियों ने तेज़-तेज़ भागना शुरू कर दिया. एकाएक एक मुटल्ली सी अँगरेज़ महिला स्क्रीन में दिखनी शुरू हो गयी.

"रोक रोक यहीं रोक ..." गिरधारी के कहने से पहले ही राका ने बटन से हाथ हटा दिया. थोड़ी बहुत ट्रेकिंग आने लगी थी पर सब नज़र आ रहा था. लड़की एक बड़े से कमरे में बैठी ड्रायर से बाल सुखा रही थी. उसके सामने एक बोतल धरी थी और एक भरा हुआ नफीस गिलास भी. दो खाली गिलास मेज़ पर और थे. पार्श्व में अंग्रेज़ी गाना बज रहा था. परमौत और हरुवा का मुंह खुला हुआ था जबकि अनुभवी राका और गिरधारी एक दूसरे को इशारों में " सीन अभी शुरू होने वाला है " कह रहे प्रतीत होते थे.

लड़की उठाकर अपने लम्बे बालों को झटकती है और गिलास से एक घूँट पीती है.

"अंग्रेजों के मज़े हैं बाप कसम यार ... औरतें भी दारू हड़का लेने वाली ठैरीं. वैसे ये पी क्या रही होगी यार परमोदौ ..." हरुवा ने अपनी अनर्गल फुसफुस चालू कर दी थी.

दरवाज़ा खुलता है और डाक्टर जैसा दिख रहा एक लंबा तगड़ा आदमी भीतर घुसता है. डाक्टर औरत से हाय हूय करता हुआ उसे होंठों पर चूम लेता है.

"यौ ... देखो स्साले को ..."

फिर दोनों बैठ जाते हैं. औरत खाली गिलास में दारू भरकर डाक्टर को देकर कुछ कहती हुई हंसती है. डाक्टर भी पीने लगता है. उनको पीता देख तीनों ने अपने-अपने पात्रों को दुबारा भर लिया और आँखें टीवी पर चिपका लीं. डाक्टर और महिला अब नाचने लगते हैं.

"राजकपूर भी ऐसे ही नाचने वाला हुआ क्या नाम कहते हैं उस पिक्चर में राका गुरु ..."

महिला अपना सर डाक्टर के कंधे पर रख देती है. डाक्टर एक झटके में उसे अपनी बांहों में उठा लेता है. महिला की गाउननुमा पोशाक एक तरफ को हट जाती है और उसकी उघड़ी हुई एक जांघ सारी स्क्रीन पर क्लोज़ अप में आ जाती है.

"ओईजा ... अब ..." हरुवा की लार टपकने लग गयी.

महिला को वैसे ही उठाये डाक्टर एक दूसरे कमरे में जाता है और बड़े प्यार से महिला को बिस्तर पर लिटा देता है. डाक्टर महिला को थोड़ी देर तक चूमता है और उठकर अपना कोट उतारता है. लाईट चली गयी.

"हाट्ट पैन्चो ..." राका की खोली से सामूहिक आह निकली.   

उक्त आह को निकालने के बाद चारों कोई बीसेक सेकेण्ड तक सन्नाटे में बैठे रहे. तब राका ने कहा - "अपनी जगह बैठे रहना यार सब. देखता हूँ मोमबत्ती-फोमबत्ती कुछ. देखना बोतल नीचे ना गिर जाए साली कहीं ..." राका ने चीथड़ों वाली झिरी के पास जाकर आवाज़ दी - "तिलुवा! तिलुवा बे! लाइट चली गयी ..."

"तो सो क्यूँ नहीं जाता राका ..." उधर से उनींदी आवाज़ में उत्तर मिला.

"जरा देख के आ तो ... कहीं फ्यूज़ तो नहीं उड़ गया साला"

"फ्यूज़ तो अब है ही नहीं वहां दाज्यू. लाइनमैन डायरेक्ट नहीं बना गया था पिछले हफ्ते तुमारे कहने पर ... अब सो जाओ यार ... एक बज गया एक ..."

"मर साले ..." कहकर राका ज्यों ही पलटा उसका पैर बाल्टी से टकराया जिसे कुछ ही देर पहले हरुवा ने खाट के नज़दीक रख लिया था. बाल्टी के ज़मीन पर औंधे होने की आवाज़ आई और अचानक लगी टक्कर से राका का बैलेंस बिगड़ गया और वह "ओ बाबू ..." कहता हुआ खाट पर मौजूद अपनी अतिथित्रयी पर गिरा.  हरुवा हाथ में भरा गिलास लिए बैठा था जिसके भीतर का द्रव इस घटना की परिणति में सभी के ऊपर थोड़ा-थोड़ा गिर गया. चारों उठने को हुए तो घायल राका कराहता हुआ बोला - "अबे खाट पर ही बैठे रहो यार परमौद्दा ... नीचे सब पानी-पानी हो रहा साला. आ जाएगी लाइट भी ..."

बनी-बनाई पार्टी के यूं अचानक बिगड़ जाने और घटनास्थल के बदल चुके जुगराफिए से वाकिफ होने में सबको पांचेक मिनट का समय और लगा. राका ने मेज़ के किसी कोने पर धरी मोमबत्ती को ढूंढ कर जला लेने में भी सफलता हासिल कर ली थी.

"दस मिनट और देखते हैं यार राका. लाइट आई तो ठीक हुआ नहीं तो घर जाते हैं अपने-अपने. चचा साथ आया हुआ तो भन्चक भी लगनी ही हुई."   यह परमौत था.

"अरे घर-हर जाओगे बाद में परमौद्दा. अभी तो भौत माल बचा है ..."

परमौत ने राका द्वारा मोमबत्ती की रोशनी में पाल्टी दोबारा चालू करने के प्रयासों को ज्यादा उत्साहित नहीं किया और सावधानी से अपने पैर नीचे रखकर जूता तलाशने लगा. हरुवा भन्चक को काफी मज़ा आ रहा था और वह जल्दी निकालने के मूड में नहीं लगता था. वह काफी देर से चुप था सो कर्नल बन कर अचानक उसने अपनी अंडबंड शुरू कर दी - "माई डीयर भतीजा प्लीज़ डू सम मोर इंतज़ार ऑफ़ दी लाइट एंड लुक एट दिस फोटुक ऑफ़ दी गिरधारीज़ ब्वारी मल्लब होने वाली वाइफ ऑफ़ दी राका टीचर. व्हेयर इज दी फोटुक ऑफ़ माई ब्वारी मल्लब होने वाली वाइफ ऑफ़ दी यू? आई एम ए कन्नल हरीश चन्न टेलिंग यू दैट दिस इंग्लैण्डिया रामायण ऑफ़ दी टीवी-फीवी इज नॉट ए पोसिबुल विदाउट लभ ... एंड लभ इज दी टाइप ऑफ़ ए टू ... वन इज ऑफ़ पतंगा टाइप ..."

इस भौंरा-पतंगा दर्शन से अब तक चट चुके परमौत ने कोई जवाब न देते हुए जूते पहनते हुए सूचना दी कि वह घर जा रहा है, हरुवा चाहे तो वहीं रात गुज़ार सकता है. गिरधारी भी उठने लगा तो हरुवा को भी उठने की मजबूरी थी. राका के निर्देशन में तीनों गीले फर्श और गलियारे को पार कर सड़क पर आये ही थे कि लाइट आ गयी. इस आकस्मिक घटना के बाद एक छोटी-मोटी मीटिंग हुई जिसके बाद तय पाया गया कि हरुवा भन्चक रात बिताने के लिए राका के पास ही रह जाएगा. वह मुटल्ली अँगरेज़न और डाक्टर की कहानी के अगले एपीसोड को देखने पर अड़ा हुआ था.

दो से अधिक बज चुका था. परमौत और गिरधारी लम्बू डगमग मौज में कुछ गाते-गुनगुनाते अपने-अपने घर जा रहे थे. जिस जगह से गिरधारी के घर का रास्ता फटता था वहां सड़क किनारे पत्थर की एक पुरानी बेंच थी. मोबाइल पाल्टी के मौकों पर इस बेंच पर बैठकर सत्संग करना आवश्यक माना जाता था सो वे दोनों भी उसी पर बैठ गए. गिरधारी ने इत्मीनान से सुरती बनाई और उसे फांकने से पहले पिरिया का ज़िक्र छेड़ा - "भाबी के क्या हाल चल रहे यार परमौद्दा ... बहुत दिन से तूने बताया नहीं कुछ"

"कुच्छ नहीं. क्या चलता है! कम्प्यूटर जाना जब से बंद करा है तब से एक बार भी नहीं देखा है उसको. हफ्ता हो गया होगा ..." इतना कहते-कहते अचानक परमौत रुआंसा हो आया.

गिरधारी ने सुरती फांकने का कार्यक्रम मुल्तवी करते हुए गंभीर मुखमुद्रा बनाकर कहा - "देख यार परमौद्दा मैं तो एक बात जानने वाला हुआ. करना हुआ तो करना हुआ. नहीं करना हुआ तो नहीं करना हुआ. मल्लब कोई भी चीज. सादी करनी हुई तो सादी करनी हुई. प्यार करना हुआ तो प्यार करना हुआ. उस दिन बता नहीं रहा हुआ वो नबदा. बाकी मेरे लायक जो काम होगा वो करने को मैं हम्मेसा तैयार हुआ. तुजे पता ठैरा. मुझको एक बार भाबी दिखा दे परमौद्दा. जहाँ से कहेगा वहाँ से उठा के ले आया जाएगा फिर उसको. अब तेरा ऐसी सकल बनाना जो अच्छा लगता होगा मुझको ..." उसने परमौत का हाथ थाम लिया.

देह में घुसी दारू और गिरधारी के सहानुभूतिपूर्ण उदगारों का वही नैसर्गिक प्रभाव पड़ा जो पड़ना था. परमौत भीषण इमोशनल हो गया. उसकी आँखें डबडबा आईं और उसने गिरधारी के हाथ को और जोर से थामते हुए कहा - "अब मर जाता हूँ यार ... साली नरक बन गयी जिन्दगी गिरधारी गुरु! ... सुबे हो, साम हो, काठदाम जाओ, रुद्दरपुर जाओ, कहीं जाओ, जहाँ जाओ वही दिखती है यार हर जगे ... मल्लब यहाँ दिखती है ..." कहकर परमौत ने सीने पर हाथ लगाकर चेहरे पर एक पिक्चर में देखे गए नायक जैसे भाव लाने का प्रयास किया.

"हूँ ... यहाँ दिखना तो कोई भौत अच्छा नहीं हुआ परमौद्दा ... भाबी को देखना हुआ तो अपनी आँख से देखना हुआ ... ये कोई साला राजकपूर-दिलीपकुमार जैसा चूतिया बन के 'यहाँ दिखती है' 'यहाँ दिखती है' कह के डाड़ जो क्या मारते रहनी हुई हर बखत ..." परमौत की नक़ल जैसी बनाते हुए गिरधारी बोला.

"इतना सित्तिल थोड़ी होने वाला हुआ जैसा तू कह रहा है, गिरधारी ... आँख से देखने को चैये ठैरी ताकत और वो साली हो गयी ठैरी ख़तम ... कम्प्यूटर जाता था वहां जाना भी साला बंद करा दिया वो दो बौड़म छोकरियों ने ... कहीं से एक फोटुक ही मिल जाती पिरिया की यार गिरधर ... एक फोटुक ही तो मांग रहा हुआ मैं भगवान से ..."

"ल्ले ... अब भगवान जी जो क्या देने वाले हुए फोटुक परमौद्दा ... फोटुक देने वाला हुआ तुमारा लौंडा मल्लब ये गिरधर सिंग लम्बू ... पैले कैता तो जने कब ले आता भाबी की फोटुक तेरे लिए ... वो राका टाइप में फरेम कर के लगा लेना फिर ..." गिरधारी ने अपनी सेवाएं प्रस्तुत करने के बाद परमौत को पुनः छेड़ा - "फोटुक-होटुक से  सादी जो क्या कर सकने वाले हुए ददा. सादी तो भाबी से ही होने वाली ठैरी. और उसके लिए तूने मुझको बताना हुआ कि गिरधर ये है तेरी भाबी. जो तेरी सादी फिक्स नहीं करा दी एक हप्ते में गिरधर ने तब कहना परमौद्दा ..."

गिरधारी लम्बू के तमाम प्रस्ताव आकर्षक थे लेकिन परमौत को फिलहाल अपने सुकून के लिए एक अदद पिरियाचित्र चाहिए था जिसे वह एक बटुवा खरीदकर उसमें स्थापित करना चाहता था ताकि जब मन करे और जितना मन करे, उसके दीदार कर सके.

"फोटुक लाएगा कां से ...?"

"वो मेरा हैडेक हुआ ददा. पैले तो मुझको दिखाएगा ना कि गिरधर ये है तेरी भाबी. उसके बाद जो तेरी सादी फिक्स नहीं करा दी एक हप्ते में गिरधर ने तब कहना परमौद्दा ..." गिरधारी ने अपना डायलॉग रिपीट करते हुए परमौत को ढाढस दिया और आँख मारते हुए कहा "परमौद्दा, दो दिन में फोटुक और एक हप्ते में सादी ... चल अब उठके एक चक्कर रोडवेज जाते हैं. सिगरट की तलब लग रही बड़ी देर से ..."

एक दूसरे का हाथ थामे दोनों मित्र रोडवेज़ के रास्ते पर थे. योजना बनी कि अगले दिन कम्प्यूटर क्लास के समय गिरधारी और शेष गोदाममंडल को विधिवत पिरिया की झलक दिखला दी जाएगी और उसके अड़तालीस घंटों के बाद गिरधारी लम्बू अपना पहला वादा निभा देगा.


(जारी)  

Tuesday, January 24, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - बारह


(पिछली क़िस्त से आगे)

परमौत की प्रेम कथा - भाग बारह

चाभी के नब्बू डीयर के पास रह जाने के दुर्योग के लिए हरुवा के भन्चकत्व को ज़िम्मेदार बताने के उपरान्त परमौत ने रात के काफ़ी हो जाने और नब्बू डीयर के घर जाने में आने वाली दिक्कतों का हवाला देते हुए मोबाइल पाल्टी करने का प्रस्ताव दिया जिसे तुरंत मान लिया गया. मोबाइल पाल्टी का मतलब होता था गली-गली घूमकर नगर का अनुसंधान करना और मौज काटना. परमौत हरुवा द्वारा ऑलरेडी खोल ली गयी बोतल देखकर थोड़ा सा भड़का लेकिन गिरधारी ने यह कहकर मामला सम्हाल लिया कि उसका मंगल का व्रत था और वह पीने का इरादा नहीं रखता अर्थात उन दोनों के लिए पर्याप्त कोटा बचा हुआ था.

सब्ज़ीमंडी से लगी गली से बाहर आते ही उन्हें राका टकरा गया. ये सज्जन नाहिद पिक्चर हॉल के आगे दिन में आलू-छोले और शाम को मीट-भात का ठेला लगाते थे. मंगल होने के कारण उनकी शाम की छुट्टी थी. परंपरानुसार हल्द्वानी के मीटखोर उस दिन हनुमान जी के नाम पर नगर के मुर्गों-बकरों को एक दिन और जी लेने की मोहलत देकर अपना परलोक सुधारा करते हैं. परमौत को देखते ही राका उसके गले से लग गया. फिर वह गिरधारी लम्बू से लिपटा. उस पर पिछले चार महीने से मसालों की बकायेदारी ड्यू थी और उसने इस बाबत अपनी माली हालत और समाज में व्याप्त कलयुग के हवालों से परमौत की सहानुभूति पाने का प्रयास करना शुरू किया लेकिन पिरियाविरहग्रस्त परमौत की दिलचस्पी फिलहाल न राका से उगाही करने में थी न बिजनेस की बात करने में. वह सीधे मुद्दे पर आया - "पिएगा?"

"पिक्चर देखेगा परमौद्दा?" राका ने प्रस्ताव के उत्तर में प्रस्ताव प्रस्तुत किया.

"रात के ग्यारह बजे कौन सा पिक्चर हॉल जो खुल रहा होगा अभी ..." हरुवा भन्चक का अभी तक राका से परिचय नहीं करवाया गया था लेकिन किसी भी वार्तालाप में घुस जाने की उसे आदत थी.

राका ने हरुवा की तरफ एक उड़ती सी नज़र डाली और सवालिया तरीके से परमौत की तरफ देखते हुए पूछा - "ये दाज्यू कौन हुए?"

"अबे दाज्यू नहीं कका हैं कका. हरुवा कका."

"ओहो नमस्कार कका. मैं राका हुआ. छोटा-मोटा बिजनस चलने वाला ठैरा अपना परमौद्दा की दया से ... और पिक्चर हॉल भी अपना ही लगाओ ...." कहते हुए उसने अपनी कमीज़ के पेट के भीतर हाथ डालकर भीतर अड़ाया हुआ एक वीडियो कैसेट निकाला.

"कौन सी है राका भाई?"

"रामायण है और कौन सी." उसने आँख मारते हुए कहा. चेहरे पर हरामियत लाते हुए उसने जोड़ा - "वोई वाली है. मंगल के दिन यई चलने वाली हुई ... " 

यह धर्मसंकट की वेला थी. परमौत ने अभी-अभी बाजार में आई और सिर्फ वीसीआर में चलने वाली इस रामायण की बाबत नब्बू डीयर की रसीली रिपोर्टिंग सुन रखी थी और उसे देखकर आने वाली मौज को लेकर उसके मन में अभी असमंजस था. अलबत्ता गिरधारी दो-तीन बार इस कृत्य को कर चुका था. दोनों मन ही मन सोच रहे थे कि काश हरुवा भन्चक साथ न होता. राका का प्रस्ताव पर्याप्त ललचाने वाला था लेकिन रिश्ते के चाचा के साथ बैठकर दूसरी वाली रामायण देखना असुविधाजनक और अटपटा लगता. वे कुछ कह पाते उसके पहले ही हरुवा बोल पड़ा - "अहा रे. ये तो भीसीआर वाली कैसिट है. चल यार परमोदौ
, पिक्चर ही देख आते हैं ..."

"छोड़ यार कका, टाइम भौत लग जाएगा पिक्चर में. मुझे काम है सुबे-सुबे. काठगोदाम जाना है ..." मौके की नज़ाकत समझता हुआ बात टालने की नीयत से परमौत बोला.

"छोड़ यार ... जाता रहेगा काठगोदाम-हाठगोदाम. चलते हैं. येई दाज्यू के वहां जाके बैठते हैं. आराम से पाल्टी भी होगी और भीसीआर में रामायण भी देखी जाएगी. आज तो वैसे भी भौत्ती सुभ दिन ठैरा. ऊपर से ये बोतल भी चुभने लग गयी अब ..." हरुवा ने अपने पेट की तरफ इशारा करते हुए प्रतिवाद किया.

"तो निकालता क्यों नहीं बाहर साली को ... कोई पव्वा जो क्या पैदा हो रहा उसको पेट में अड़ाके रखने से. रात का टाइम हुआ. कौन साला देख रहा हमारी बोतल ... जरा दिखा तो एक मिनट ..."

हरुवा भन्चक ने बोतल बाहर निकालकर परमौत को दी. अपने चेहरों को यथासंभव विकृत बनाते हुए बारी-बारी से सबने उसमें से एक-एक नीट खेंचा और कुछ देर को पिक्चर पुराण बैकग्राउंड में चला गया. चारों की चाल में आत्मविश्वास की मात्रा में इजाफ़ा हुआ और वे राका के निर्देशन में खरामा-खरामा भुक्खन हलवाई वाले चौराहे की तरफ अग्रसर हुए.

रात के समय इस इलाके को देखना परमौत को सदैव आकर्षित करता था. दिन भर इस संकरी सड़क पर रिक्शों, स्कूटरों, साइकिलों, ग्राहकों, फल-सब्ज़ी-मसाले-चूरन-टॉर्च-लत्ते वगैरह बेचनेवालों और गाय-कुत्ते-सांडों के महती प्रयासों द्वारा जिस दृश्य की सर्जना होती थी उसे देखकर लगता था कि समूचे एशिया की आबादी को मार्शललॉ लगाकर यह आदेश दिया गया था कि वह दिन में कम से कम एक बार इस सड़क का फेरा लगाए.

फिलहाल सड़क पर फलों की पेटियों से निकली हुई फूस, सड़े-गले टमाटरों-सब्जियों और कीच की डेढ़-दो इंची बहार पसरी हुई थी. गतिविधि के नाम पर कोई आधा दर्ज़न कुत्तों की कुलेल और दिन भर की थकान के बाद खुद को उक्त कीच में स्थापित कर चुकी आराम करती गायों की पूँछें और कान थे. सार्वजनिक सुविधा के लिए खम्भों पर लगाए गए बल्बों को रात्रिचर मद्यपों और चोट्टों की सुविधा के लिए महात्माओं द्वारा गायब कर लिया गया था और समूचा इलाका उसी नीमअँधेरे की आगोश में था जो उर्दू के शायरों को सबसे ज्यादा पसंद आता है.

बोतल के बाहर आने के साथ ही वीसीआर की बात अपने आप दरकिनार हो गयी थी और भुक्खन हलवाई वाले चौराहे से लगे मुख्य रोड वाले अगले चौराहे तक आते आते बोतल को आधे से ऊपर निबटाया जा चुका था. देहों की हल्की उड़ान दे देने वाली मस्ती ने चारों के भीतर प्रवेश करना शुरू कर दिया था और वे बेबात ठहाके लगाने लगे. चौराहे पर एक दूकान की कुर्सी लगाए ऊंघता पुलिसवाला दिखा तो हरुवा ने हड़बड़ी में बोतल को वापस पेट में अड़ाने का प्रयास करना शुरू किया.

"कका डर किस से रहे हो यार फालतू में. दिल्ली-फिल्ली जो क्या है साली. हल्द्वानी है हल्द्वानी और यहाँ चलनेवाला हुआ तुम्हारे भतीजों का राज ... जरा लाओ तो ..."  कहकर राका ने बीच चौराहे पर बोतल खोली और एक लंबा खेंचकर "हंहो दीवानज्यू लगाते हो एक ..." कहकर पुलिसवाले को संबोधित किया. पुलिसवाले ने आँखें फैलाईं और श्रमपूर्वक राका को पहचाना.

"घर जाओ रे घर सालो." कहकर उसने हमें इशारे से अपने नज़दीक बुलाया. ज़ाहिर तौर पर राका पुलिसवाले का अन्तरंग पूर्वपरिचित था. इसकी पुष्टि करते हुए दोनों ने एक दूसरे का अभिवादन '' वाली गाली से किया. पुलिसवाले को ऐसा व्यवहार करता देखकर हरुवा की बंधी हुई घिग्घी खुल गयी और वह हैरान होकर राका द्वारा दीवानजी को बोतल पेश किया जाता देख रहा था.

"कहीं हमारी कम न पड़ जाए परमोदौ यार" हरुवा भन्चक ने फुसफुसाकर कान में कहा तो परमौत ने झिड़की लगाई - "रात भर जित्ती कहेगा उत्ती ले आऊँगा ... कोई गाँव जो क्या है यहाँ तेरा ...."

पुलिसवाला सज्जन और धर्मपरायण गृहस्थ निकला. उसने मंगलवार होने का हवाला देते हुए दारू पीने से मना कर दिया और राका समेत चारों को दुबारा से घर जाने की सलाह दी और सबसे हाथ भी मिलाया. इस संक्षिप्त लेकिन मानीखेज घटनाक्रम ने हरुवा भन्चक को राका के अच्छे खासे प्रभाव में ला दिया. जो आदमी पुलिस वाले के साथ गाली-गुप्ता कर सकता हो वह महामानव से कम नहीं था.

पांचेक मिनट के भीतर वे तेल मिल वाली गली में घुस गए. इस गली के बीच में एक दुमंजिला घर था जिसमें मीनानाम्नी गिरधारी लम्बू की काल्पनिक प्रेमिका रहती थी. हम लोगों ने मोबाइल पाल्टी के दौरान इस घर के बाहर दो बार सीटी बजाने का रिवाज़ कायम किया हुआ था जिसे परमौत और गिरधारी ने टूटने नहीं दिया. राका और हरुवा की समझ में कुछ नहीं आया तो गिरधारी ने तनिक झेंप के साथ कहा - "परमौद्दा की बहू का घर है वो उप्पर वाला."

गिरधारी द्वारा परमौत की बहू अर्थात अपनी होने वाली शरीके-हयात का ज़िक्र किये जाने से हरुवा भन्चक इमोशनल होता हुआ और गिरधारी को छेड़ता हुआ बोला - "मल्लब तू भी लभर ... गज्जब यार! लेकिन कौन सा वाला - पतंगा टाइप कि भौंरा टाइप? ...."  गिरधारी वाकई में छिड़ गया और शर्माता हुआ "छोड़ो यार चचा, कहाँ लगे हो ..." कहकर अपना पिंड छुड़ाने लगा..

पेट में घुसे जीवनजल ने राका के ज्ञानचक्षु भी खोल दिए थे और वार्तालाप में निहित गहराई समझकर वह खुद को शामिल होने से न रोक सका - "मैं तो एक बात जानता हूँ यार परमौद्दा. कुछ नहीं होने वाला हुआ साला ये प्यार-फ्यार. खाली आदमी को चूतिया बनाने का जुगाड़ बनाया ठैरा भगवान ने. मेरा तो तुमको मालूम ही हुआ वो स्कूल वाला. अभी तक चल रहा है साला. कभी हाँ कहने वाला हुआ अगले दिन फिर ना. फिर हाँ कहेगा फिर ना. कोई बात जो क्या ठैरी ... बताओ ..."

राका ने अपनी प्रेमिका का ज़िक्र पुल्लिंग में किया. यह भी नगर के शोहदों द्वारा स्थापित की गयी एक पुरातन परम्परा थी. खैर. राका की बात सुनते ही परमौत बोल उठा - "अबे वो मास्टर की लौंडिया ... अभी भी मल्लब ... तेरी तो शादी होने वाली थी बल उससे ..."

"घंटा शादी होती है यार परमौद्दा! बाबू नहीं मान रहे कहती है हर महीने ... तीन साल से चूरन काट रखा है पैन्चो ..."

"मतलब तेरी उससे बात होती है?"

"ल्ले ... बात क्यों नहीं होगी. बात तो हर हफ्ते. बस बाबू नहीं मान रहे, बाबू नहीं मान रहे कहने वाली हुई ..."      

राका जैसे बेमतलब इंसान के जीवन में एक ठोस प्रेमिका की उपस्थिति होने की सूचना ने परमौत को विह्वल कर दिया. उसे पिरिया की याद आने लगी थी और वह घर जाकर अपनी और पिरिया की पिक्चर को देखना जारी रखना चाह रहा था जिसे वह हरुवा भन्चक के चक्कर में बीच में छोड़ आया था.

"राका गुरु, वो रामायण का क्या करते हो कहा ...?" गिरधारी ने अपनी लपलप करती इच्छा के आगे परास्त होते हुए फिर से वीसीआर प्रकरण छेड़ दिया.

"अब जैसा परमौद्दा कहता है ... मेरे यहाँ तो सब व्यवस्था ठैरी ही मल्लब ..."

परमौत का विह्वल मन अब लालच की तरफ झुकने लगा. "चले तो जाते पर हरुवा चचा जाने क्या समझेगा ..."

"ल्ले ... क्या सोचता है हरीसचन्न. मैं तो कब से कै रा हूँ कि चलते हैं रामायण देखने ... "

"अरे यार चचा ये वैसी वाली रामायण नहीं है ..." हिम्मत करते हुए परमौत ने बोल दिया.

"अब वैसी वाली नहीं है तो फिर कैसी वाली हुई रामायण?" हरुवा ने विस्मय के साथ पूछा.

"मल्लब ... तुमारे मल्लब की नहीं है ... "

"मेरे मल्लब की नहीं है मल्लब?"

"अरे यार चचा, बड़ों वाली पिक्चर है वो अठार साल से जादे वाली ..."

"तो यार परमोदौ मैं तुझसे तो तीन-चार महीने बड़ा हुआ ... तू देख सकने वाला हुआ तो मैं क्यों नहीं ..."

"वो बात जो क्या कै रहा हूँ ... मल्लब गंदी वाली पिक्चर है यार चचा ... अब समझ लो"

"फिर क्या हुआ. पिक्चर तो पिक्चर ही हुई ..."

उर्दू में इस स्थिति को हमाम में सबका एक साथ नंगा हो जाना कहा जाता है. तो सब कुछ तय हो जाने के बाद जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर एक बार पुनः घंटी दबाकर एक और बोतल समझी गयी, रोडवेज़ जाकर एक-एक बन-आमलेट सूता गया और पर्याप्त मात्र में चना-चबेना लेकर चारों ने रामायण-सत्संग के उद्देश्य से राका गुरु के आस्ताने का रुख किया.

राका की खोली रहने की कम, रसद के भंडारण की जगह ज़्यादा थी. दीवार से लगाकर एक तरफ को आलू-प्याज के तीन-चार बोरे खड़े किये हुए थे, जिनकी बगल में आटा-बेसन और मसालों के कट्टे व्यवस्थित थे. एक कोने पर तेल और कालिख में सनी गैस-भट्टी थी. गैस भट्टी से सटाकर एक बड़ी सी मेज़ लगी थी जिस के ऊपर दुनिया भर की भांग बिखरी हुई थी. इस भांग के बीच धूल खाए और कांच लगे एक फ्रेम में मधुबाला जैसी दिखने वाली अलबत्ता तनिक ढैंणी अर्थात भैंगी अर्थात एलएलटीटी लड़की का फोटो चस्पां था. एक दीवार पर करीब दस लाख खूँटियाँ टंगी हुई थीं जिनपर तमाम पोंछे, गंदे तौलिये और राका की लॉन्जरी सजाये गए थे. राका की प्लास्टिक की निवाड़ वाली फोल्डिंग खाट ने खोली का अच्छा खासा क्षेत्रफल घेरा हुआ था जिसपर पड़ी बेतरतीब मटमैली रज़ाई  भुक्खन हलवाई की दुकान के आगे बैठी रहने वाली बछिया की तरह लग रही थी. खाट के नीचे से असंख्य लकड़ी-गत्ते की पेटियां और छोटी-बड़ी फांची-फुन्तरियाँ अर्थात पोटलियाँ आगंतुकों को बहुत लाड़ के साथ देख रही थीं.

पहली निगाह में ही यह खोली रामायण देखने के लिए आदर्श जगह नज़र आती थी.

(जारी)

Sunday, January 15, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - ग्यारह


(पिछली क़िस्त से आगे)

परमौत की प्रेम कथा - भाग ग्यारह

हरुवा भन्चक के एक स्टेटमेंट ने हमें सन्नाटे में डाल दिया था. इतनी आसान भाषा में इसके पहले मानव इतिहास में आशिकों को शायद ही कभी वर्गीकृत किया गया होगा. मिनट भर के भीतर परमौत की समझ में दो बातें आ गईं - पहली कि मोहब्बत एक ऐसी चीज़ का नाम है जिससे कोई भी अछूता नहीं  रह सकता. हरुवा जैसा घोषित निखट्टू और भन्चक चचा भी नहीं. दूसरी यह कि उसे पिरिया के साथ चल रहे अपने चक्कर को किसी भी निर्णायक बिंदु तक पहुंचाने के लिए उसे अपनी भूमिका छांट लेना होगी - पतंगा या भौंरा.

अपने घायल पैर को श्रमपूर्वक दूसरी तरफ रखकर हरुवा भन्चक ने कराहते हुए करवट बदली और कहना शुरू किया - "पतंगा टाइप इज ऑफ़ दी डैथ एंड भौंरा टाइप इज दी इन्जॉय ऑफ़ ए लाइफ. माई डीयर नब्बू डीयर प्लीज़ डोन्ट कन्फयूजिंग माई भतीजा विद दिस फुकसट नॉनसन. ... "

हरुवा भन्चक के इस असमय प्रत्याशित अंग्रेज़ी हमले ने नब्बू डीयर को ही नहीं हम सब को असमंजस में डाल दिया था. समझ में नहीं आ रहा था कि खुद को किस कैटेगरी में डाला जा सकता था. नब्बू डीयर का केस देखा जाय तो बिना नाम वाली काल्पनिक प्रेमिका चक्कर में मुकेशपीड़ा से ग्रसित हो चुके इस स्वार्थ के पुतले में पतंगा होने के सारे लक्षण मौजूद थे लेकिन तमाम लड़कियों को देखते ही जिस तरह सबसे पहले उसके मुंह से लार टपक जाती थी वह उसकी सतत भौंरावस्था का घोषित मैनिफेस्टो हुआ करता. गिरधारी लम्बू और मैं अभी तक पतंगे नहीं बने थे अलबत्ता एक भौंरे के सारे लक्षण हममें थे. बचा परमौत.

परमौत की मोहब्बत ही असली वाली मोहब्बत थी जिसने बकौल गिरधारी उसे "चूतियों का कप्तान" बना डाला था. पिरिया के प्रति अपने विकट अनुराग के चलते उसने मुटल्ली ससी और उसकी लम्बसखी के प्रेम-प्रस्तावों को तवज्जो न देने का महामानवीय कृत्य भी इन्हीं दिनों किया था जो बताता था कि भौंरा बनना उसके नेचर में था ही नहीं और वह पतंगा बनकर शमा के इर्दगिर्द मंडराते हुए अपने विध्वंस की तरफ तीव्रता से अग्रगामी था. यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं थी.

अगले कुछ दिन तक हरुवा भन्चक को हमारे अड्डे पर देखा नहीं गया क्योंकि परकास उसे हल्द्वानी में किसी बिजनेस में सैट कर देना चाहता था. वह क्या कर रहा था न हमें कोई खबर थी न उसमें हमारी कोई दिलचस्पी थी. उस रात उसने मोहब्बत को लेकर हमारे विचारों को सलीके से अलाइन कर दिया था और अब गोदाम में प्रेम की बाबत चलने वाले अधिवेशन शनैः-शनैः समाप्त होते गए. सच तो यह था कि उस रात के बाद हमारा अगला जमावड़ा लगने में हफ्ते से ऊपर का समय लगा.  

इस हफ्ते भर में परमौत ने पहला काम यह किया कि कम्प्यूटर की क्लास में जाना बंद कर दिया. चैंटू सेंटर में हुई उस घटना के बाद वह एक ही दिन क्लास करने गया था. घुसते ही उसने ससी और उसकी दो सखियों को लगातार पलट-पलट कर अपनी तरफ देखते पाया. उसे झेंप लगी. उसे भय लगा कि उसकी चुप्पी को ससी कहीं फ्रेण्डसिप के प्रस्ताव का स्वीकार न समझ ले. पिरिया की तरफ उसने एक बार भी नहीं देखा. हरुवा भन्चक ने घर पर मोहब्बत वाला पाठ उसे अलग से पढ़ा दिया था और "इसमें मिलने वाला कद्दू के टुक्के के अलावे कुछ नहीं परमोदौ" कहकर भरसक प्रिया से दूर रहने की सलाह दे दी थी. फिलहाल एक तरफ़ अभी वह पतंगे की नियति स्वीकार करने की इच्छा नहीं रखता था वहीं दूसरी तरफ़ अपने अरमानों को ईश्वर के भरोसे छोड़ देने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं दिखाई देता था.

जितना परमौत अपना ध्यान वापस मसालों के धंधे में लगाता, उतनी अधिक उसे विरह-वेदना होती. उसका मन प्रिया की एक झलक देखने का करता होता और सामने रुद्दरपुर के चाट और छोले-भटूरों के ठेलों की लाइन लगी होती. ठेलों के इर्दगिर्द चटोरी स्त्रियों-लड़कियों का सतत मेला लगा हुआ रहता लेकिन उसका मन उनमें से किसी एक की तरफ निगाह डालने का न होता. अपनी कल्पना के पटल पर वह पिरिया को इन्हीं में से एक ठेले पर कुछ खाते हुए देखता. पिरिया पेमेंट करने को पर्स में हाथ डालती और ठेलेवाले उससे "बहिनजी आपके पैसे हो गए" कह रहा होता क्योंकि दूर से यह देख रहे परमौत ने उसे इशारे से ऐसा करने को कह दिया था. असमंजस में पड़ी पिरिया जब ठेलेवाले द्वारा परमौत का सन्दर्भ लिए जाने पर पलटकर देखती - परमौत मोपेड की तरफ देख रहा होता. पिरिया नज़दीक आती और उससे थैंक्यू कहती. वह कहता कि थैंक्यू की क्या बात थी और फिर वे किसी बात पर मुस्कराने लगते. उफ़! कितनी अच्छी लगती है जब हंसती है पिरिया. उसके बाद वह उसे मोपेड पर बिठाकर हल्द्वानी उसके घर छोड़ने जाता. ... मतलब तीस-पैंतीस किलोमीटर का सफ़र पिरिया के साथ. पिरिया लम्बी उँगलियों वाले अपने सुन्दर मुलायम हाथों से उसकी कमर में कसकर घेरा बनाए बैठी होती. घर पहुंचकर पिरिया उसे चाय पीने को अन्दर बुलाती और दरवाज़े पर लगी घंटी बजाती. इस पॉइंट पर आकर उसका ख्वाब टूट जाता. कभी लम्बू अमिताब दरवाज़ा खोलता तो कभी चैंटू सेंटर वाला मुकेस.  

दिनभर खूब दौड़भाग से थके परमौत की थकन इन दिवास्वप्नों से दूनी हो जाया करती और उसका मन गोदाम जाने का भी नहीं होता. घर आकर बिस्तर पर लेटते ही पिरिया वाली पिक्चर फिर शुरू हो जाती. पिरिया उसका माथा दबा रही है. पिरिया उसके लिए चाय बना रही है. पिरिया उसकी बगल में लेटी है. मोहब्बत से झिड़कती पिरिया उसे मूंछों को बार-बार सहलाने की गंदी आदत छोड़ने को कह रही है. वह पिरिया के लम्बे बालों पर उंगलियाँ फिरा रहा है जैसे एक पिक्चर में उसने देखा था. फिर वह मनोज कुमार की तरह नदी किनारे एक पत्थर पर फुलवा की जगह पिरिया लिखकर 'चाँद सी मैबूबा' गाने लगता. मालासिन्ना की तरह दांतों में उंगली दबाये पिरिया शर्माने का नाटक करने लगती ... पिरिया! पिरिया! ... क्या मेरी मौत के बाद आएगी तू मेरे पास ... 

ऐसे ही एक रात वह अपना दिल भींचे पिरिया के साथ एक ड्रीम सीक्वेंस में था कि उसकी विचार-श्रृंखला को हरुवा चचा ने "सो गया रे परमोदौ" कहकर भंग किया.

हरुवा भन्चक ठीकठाक टैट होकर आया था. परकास ने उसे पुश्तैनी दूकान में मुनीमगीरी का काम सीखने में लगा दिया था. उसने मुनीमगीरी अच्छे से सीखनी शुरू कर दी थी जिसका प्रमाण यह था कि उसने तीसरे ही दिन से गल्ले पर इतना हाथ साफ़ करने के कला में निपुणता हासिल कर ली थी कि शाम का कोटा खरीदने लायक रकम बन जाए.

"ना बे चचा, सो कौन साला रहा है. दिमाग का मठ्ठा बना पड़ा है यार. तू बता कहाँ से आ रहा है कीटा फाइट करके ..." हल्द्वानी के रचनात्मक मद्यपों द्वारा दारु पार्टी के पर्यायवाची के तौर पर प्रचलन में लाये गए अनेक मुहावरों में से हरुवा भन्चक के सबसे प्रिय मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए परमौत ने अपने दिमागखाऊ चचा की नैसर्गिक प्रतिभा को सुलगाने का काम किया.

"तेरे हल्द्वानी वालों के बस की जो क्या होने वाली ठैरी साली कीटा फाइट ... उसके लिए तो हमारे वहां के खड़क दा, फतेसिंग हौलदार और गबरसिंग मास्साब जैसे बफौले चइये होने वाले हुए. तब होने वाली ठैरी असली कीटा फाइट साली. अभी परसों हौलदार साब के यहाँ उनके भतीजे का नामकन्द था. दो तो मारे बकरे और अट्ठार आई रही घोड़िया रम की बोतल. सुबे से लग गए ठैरे हम काटने-हाटने में. अरे भुटुवा गजब बनाने वाले हुए गबरसिंग मास्साब. अब वो बना रहे ठैरे भुटुवा और क्या नाम कहते हैं खड़क दा बना रहे ठैरे दारू के पैक. इतने में साला पारभिड़े का हरकुवा आ पड़ा वहां. मैंने सोचा आया होगा वो भी न्यौते में. पारभिड़े वाले भी फतेसिंग ज्यू के रिश्तेदारी में आने वाले ठैरे लेकिन पराड़के साल हमारे यहाँ से एक एक बरात गयी रही उनके वहां. खाना-हाना खाने में थोड़ी देर हो पड़ी और जब गरम रोटी नहीं मिली तो फतेसिंग जी वहां के चार-पांच लौंडों को फतोड़ आये ठैरे. एक तो उनका साला भी लगने वाला हुआ. तब से ज़रा हमारी इधर को कम आनेवाले हुए पारभिड़े के लोग ... परमोदौ तेरे पास कुछ धरा है माल-फाल यार? तीस लग री जरा ..." किस्से को क्षणिक विराम देकर हरुवा भन्चक ने शेष बची रात के लिए व्यक्तिगत मौज की संभावनाएं तलाशना शुरू किया.

"मेरे पास कहाँ से आई यार चचा. मैं घर में रखता नहीं तू जानने वाला हुआ. ऐसी तीस लग रई थी तो पैले से जुगाड़ कर के लाना चाइये था. अब ये आधी रात तेरे लिए दारू कहाँ से लाऊँ मैं ..."

अभी आधी रात नहीं हुई थी और परमौत जैसे काबिल भतीजे की इस बात से हरुवा भन्चक उखड़ गया.

"बड़ा साला रईस बनता है ... अभी इग्यारा भी नहीं बजे और तू ऐसे पौंक रहा है. चल मेरे साथ चल मैं दिखाता हूँ कां मिलेगी साली दारु तेरी हल्द्वानी में ... चल यार मेरा कोटा पूरा नहीं हुआ अभी ..."

परमौत के पास बिस्तर से उठकर हरुवा के साथ बाजार की राह लगने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं था. इसके अलावा खुद इतने दिनों से घर पर शामें बिताने की वजह से वह खुद ऐसे किसी एडवेन्चरनुमा बहाने की तलाश में था.

चचा-भतीजा रोड पर थे और नए उत्साह से ठुंसा हरुवा रौ में आ चुका था - "... त्तो हरकुवा को देखा तो फतेसिंग पर तो जैसे द्यप्ता आ गया. कैने लगे इन साले पारभिड़े वालों की हिम्मत देखो बिना न्यौते के हमारे गौं का माहौल खराब करने आ गए. खैर मैंने जैसे-तैसे उनको सांत कराया कि चचा नामकन्द के सुभ दिन किसी से लड़ाई करने का क्या फायदा हुआ करके और हरकुवा को अपनी बगल में बैठा लिया. तब जा के उसने बताया कि दिदी ने जिठानी ने ग्वेल द्यप्ता की कसम खिलाई हुई कि इस नामकन्द में जरूड़ी आना हुआ तुझको. दो चार पैक खींच के फतेसिंग भी राजा सिवी बन गए हुए. कैने लग गए और पिलाओ इस हरकुवा को. जो भी हुआ सालिगराम ठैरा हमारा. तो साब ... टैंकर होने हुए ये साले पारभिड़िये ... आधी बोतल ऐसेई हड़का जाने वाले हुए. बोतल-होतल, बकरा-हकरा साम तक सब्ब निबट गया तो खड़कदा तास की गड्डी निकाल लाया कहा ..."

ठेका आने को था और दूर से देखा जा सकता था कि वह बंद था. खबर हरुवा भन्चक अपनी शौर्यगाथा चालू रखे हुए था - " पारभिड़िये ऐसे हुए परमोदौ मल्लब समझ ले कि दहलपकड़ और सीप में उनको कोई नहीं हरा सकने वाला हुआ. तो खड़कदा ने ग्वांक्क जैसा करते हुए कहा कि पारभिड़े वालों में है हिम्मत तो सीप में हरा के दिखाओ सालो. अब पारभिड़े वाला वहां ठैरा कौन हरकुवा के अलावा. लौंडा ही हुआ बिचारा. पी-पा के टोटिल हुआ रहा एक कोने में. धो-धो करके साले को उठा-उठू के होस में जैसा लाये और कहा कि सीप खेल खड़कदा के संग ..."

परमौत ने ठेके के बंद शेयर शटर के बगल में लगे एक गुप्त बिंदु पर लगी घंटी बजाई तो शटर में से एक झिरी जैसी खुली और "क्या चाइये" की आवाज़ के साथ एक हथेली बाहर आई. परमौत ने कुछ नोट उस हथेली पर रखे और बीस सेकेण्ड के भीतर रम की एक पूरी बोतल उसके हाथ में थमा दी गयी. झिरी बंद हो गयी. अपना किस्सा रोक कर हरुवा भन्चक ने इस चमत्कार को देखा और अंग्रेज़ी मुहावरे में कहा जाय तो उसका जबड़ा नीचे गिर गया.

"गजब हुई साली हल्द्वानी यार परमोदौ. गजब्बी कहा ..."

बोतल हाथ में आते ही पीने के सुरक्षित अड्डे के नाम पर परमौत के गोदाम की याद आई और वे उसी दिशा में चल पड़े.

"हाँ चचा फिर बता क्या कै रा था तू ... क्या हुआ पारभिड़े वाले का?"

"हाँ हाँ ... फीर क्या हुआ कि परमोदौ लला उस साले छटांक भर के लौंडे ने एक के बाद एक तीन गेम पेल दिया खड़कदा को. दस-दस रुपये का एक गेम ठैरा. एक-एक गेम फतेसिंग हौलदार और गबरसिंग मास्साब ने भी हार दिया हुआ तब जा के खड़कदा ने मुझसे कहा कि हरुवा तू खेल एक हाथ इस साले के साथ. अब हमारा गेम चल रा हुआ और उस साले को लग गयी पिसाब. उसके हो रहे ठैरे बहत्तर पॉइंट और मेरे निल. जीतता तो मैं क्या ही ठैरा, मैंने लौंडे के गए हुए में जरा बेमांटी कर दी और हुकुम का बाश्शा छिपा के जेब में रख लिया. फतेसिंग हौलदार तीस रूपये हार के झंड जैसे हो रहे ठैरे तो अन्दर से दो घोड़िया बोतल और निकाल लाये और सबके लिए पैक बना दिए. लौंडा आया तो पत्ते बांटने लगा. पत्ते पूरे हुए ही नहीं ... कहाँ से होते ... मैं भी महीन-महीन हंस रहा ठैरा कि बेटा अब हरा के दिखा कन्नल हरीस चन को ... बहुत ढूंढ-ढांड के भी पत्ता नहीं मिला तो लौंडा बोलने लग गया कि तुम सब मिल के बेमांटी कर रहे हो कर के. उसने ऐसा कहना था और मारी साले के भेल में गबरसिंग मास्साब ने कि बेमांटी करते होंगे पारभिड़े वाले कि इकावन पत्तों वाली गड्डी से पांच बाजी जीत दीं. उसके बाद तो क्या खड़क दा, क्या फतेसिंह और क्या मैं ... हमने साले को आधी रात तक मुर्गा बना के बाहर खड़े करा दिया बाहर अरड़पट्ट में  ... उसके बाद जब तक उसने जीते हुए पैसे वापिस नहीं करे साले को जाने नहीं दिया ... उसके बाद जैसे ही जरा हमारी नजर इधर-उधर हुई वो बिचारा वापिस अपने घर को भाग गया रहा ... उसके बाद भतीजे क्या हुआ ... "

हरुवा ने परमौत की तरफ निगाह डालकर अपनी क़िस्सागोई के प्रति भतीजे का रेस्पोंस देखने का प्रयास किया. परमौत ने इस बात को ताड़ लिया और ठहरकर बोला - "तू बोर बहुत करनेवाला हुआ चचा यार. तीसरी बार सुना रहा है ये चूतियापन्थी का किस्सा तू ... ज़रा बोतल थाम तो देखूं चाबी कहाँ रखी है साली." वे गोदाम के बाहर खड़े थे. चारों तरफ वीरानी सी थी और कूड़े के ढेर पर बैठने वाले पुरातन लुरिया कुत्ते के अलावा जीवन का कहीं कोई लक्षण दिखाई नहीं देता था. नब्बू डीयर उस रात गोदाम की चाभी अड्डे पर रखना भूल उसे अपने साथ ले कर चला गया था. काफी देर अँधेरे में टटोलने पर जब चाभी नहीं मिली तो परमौत ने हरुवा चचा को वहीं खड़ा रहकर इंतज़ार करने को कहा और गोदाम के बगल वाली गली में घुस गया जहां गिरधारी लम्बू का घर था. भतीजे द्वारा हाल ही में अपमानित किये गए हरुवा भन्चक ने हाथ में धरी बोतल खोल ली और दो बड़े बड़े नीट घूँट गटककर बाकी का किस्सा कूड़े की बगल में बैठकर कुत्ते को सुनाना शुरू किया. अजनबी को इस तरह का व्यवहार करता देख कुत्ता सावधान हुआ और उसने अर्ध-गुर्राहट के साथ 'हू... हू...' शुरू कर दी. इस से हरुवा भन्चक हकबका गया और 'हट हट' करता खड़ा होने का प्रयास करने ही लगा था कि गली के भीतर से परमौत और गिरधारी लम्बू नमूदार हुए.


(जारी)