Friday, June 15, 2012
सूनी हो गई ग़ज़ल की सुरीली ड्योढ़ी !
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साल रहा होगा १९८७-८८.मुकाम इन्दौर.म.प्र.सरकार के प्रतिष्ठा प्रसंग लता अलंकरण समारोह के अंतर्गत आयोजित सुगम समारोह में प्रस्तुति देने तशरीफ़ ल...
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Wednesday, June 13, 2012
मेहदी हसन साहब की कक्षा में जानिये "आवारा गाना" क्या होता है
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मेरे पास मेहदी हसन साहब का एक तीन सीडी वाला सैट है. विशुद्ध शास्त्रीय शैली में गाई उस्ताद की ग़ज़लों की इस पूरी श्रृंखला के नगीने मैं, ...
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तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे - उस्ताद मेहदी हसन खान का प्रयाण
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बहुत अफ़सोस की खबर है. बहुत लंबे समय से बीमार चल रहे गज़ल गायकी के शहंशाह उस्ताद मेहदी हसन खान साहेब नहीं रहे. कबाड़खाने की विनम्र श्...
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Tuesday, June 12, 2012
पटिलाया घराने के रंग में पगी उस्ताद की भूपाली.
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पटिलाला के उस्ताद बड़े गु़लाल अली ख़ाँ साहब संगीतप्रेमियों के चहेते कलाकार हैं.अपनी स्थूल काया से वे जिस तरह के मुलायम स्वर बिखेरते थे वह सुनन...
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भारतवासी होने का सौभाग्य तो आम से भी बनता है : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - ५
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आम के बाग़ आम के फले हुए पेड़ों के बाग़ में कब जाऊँगा? मुझे पता है कि अवध, दीघा और मालदह में घने बाग़ हैं आम के लेकिन अब क...
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Monday, June 11, 2012
एक बार और मिलने की इच्छा पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - ४
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भूल पाने की लड़ाई उसे भूलने की लड़ाई लड़ता रहता हूँ यह लड़ाई भी दूसरी कठिन लड़ाइयों जैसी है दुर्गम पथ जाते हैं उस ओर उसके सा...
Sunday, June 10, 2012
एक रीपोस्ट - गर्मियां - ऐन्तिनियो विवाल्दी
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मौसमों पर आधारित चार कम्पोज़ीशन्स का निर्माण १७१७-१७२० के दौरान विवाल्दी द्वारा मानतूआ में बिताए दोएक सालों की वजह से सम्भव हो पाया था. मान...
क्या तुम श्रृंगार को फिर से बसाना चाहती हो : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - 3
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श्रृंगार तुम भीगी रेत पर इस तरह चलती हो अपनी पिंडलियों से ऊपर साड़ी उठाकर जैसे पानी में चल रही हो! क्या तुम जान बूझ कर ऐसा ...
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Saturday, June 9, 2012
मीर के सिरहाने आहिस्ता बोलने की रात : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - २
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सवाल ज़्यादा हैं पुराने शहर उड़ना चाहते हैं लेकिन पंख उनके डूबते हैं अक्सर खून के कीचड़ में! मैं अभी भी उनके चौराहों पर कभी ...
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Friday, June 8, 2012
पहाड़, गर्मी, मच्छर और सुबह के नौ बजे जमी हुई रेड वाइन
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इस साल पड़ी ऐतिहासिक गर्मी ने जब खाल में पर्याप्त भूसा भर दिया तब जाकर दिल्ली से मित्र आशुतोष बरनवाल ने रानीखेत जाकर दो-एक दिन ठण्ड में का...
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कोयल उस ऋतु को बचा रही है : आलोक धन्वा की नई कविताएं - १
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तकरीबन डेढ़ दशक तक आलोक धन्वा ने कविता नहीं लिखी. पिछले साल उनकी कुछ नई कवितायेँ पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के ज़रिये लोगों तक पहुँची थीं. उन्...
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Thursday, June 7, 2012
आदमी को गौर से देखो
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मई सन २००५ की गर्मियों में बाबा त्रिलोचन से हरिद्वार में अंतिम मुलाक़ात हुई थी. तखत पर लेते-अधलेटे बाबा के सिरहाने निराला रचनावली के आठ ...
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