Wednesday, February 10, 2016

निदा फ़ाज़ली की एक और नज़्म


ये खेल होगा नहीं दुबारा 

-निदा फ़ाज़ली

बदलती शक्लों 
बदलते जिस्मों में 
चलता-फिरता ये इक शरारा 
जो इस घड़ी 
नाम है तुम्हारा 
इसी से सारी चहल-पहल है 
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ 
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक 
है खेल सारा

ये खेल होगा नहीं दुबारा 
ये खेल होगा नहीं दुबारा

5 comments:

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11-02-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2249 पर दिया जाएगा
धन्यवाद

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11-02-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2249 पर दिया जाएगा
धन्यवाद

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 11 फरवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Rajendra kumar said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (12.02.2016) को "विचार ही हमें बदल सकते हैं" (चर्चा अंक-2250)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

Unknown said...

लाजवाब ।