Thursday, January 1, 2009

आके सीधी लगी




कबाड़खाना है इसलिए भी ....और कुछ कबाड़ भी है अपने पास ......

नए साल को कुछ इस अंदाज़ में शुरू करें तो क्या बुरा हो ?

एक ये GENIUS है जिस के बारे में कुछ भी कहना अपने बस में नहीं .....

आप भी सुनें .... ये यक़ीन करना भी मुश्क़िल सा लगता है कि इस गीत के संगीतकार "सलिल चौधरी" हैं और गीतकार "शैलेन्द्र" ..... फ़िल्म का नाम है : "हाफ़ टिकट"

Wednesday, December 31, 2008

नया साल बचे झूठ की कहानी से

मैं हूं सदी 21 का गुजरता हुआ आठवां बरस
मैं गवाह हूं हिंदोस्तां की किस्मत का
रंग गिरगिट का दिखाती हुई सियासत का
उजले परदों के तले स्याह सब इरादों का

मैंने देखा है दहशत का खौफनाक मंजर
पानी की तरह बहता खून सड़कों पर
जिस्म को चिथड़ा बनाते, बारूदी दिमाग
दिल को चीरती चीखें और भड़कती आग
और जो जान दे बचा गए कई जानें
उनकी जांबाजी और हौसले के अफसाने

मैंने देखा है हिमालय को जार-जार रोते
उसके आंसू से लबालब हुईं नदियों का कहर
और शमशान में बदली हुई गौतम की जमीं
जश्न दिल्ली में मना देख के पटना की गमी
पी गए सब,उठी इमदाद की फिर जो भी लहर
लाल बत्ती में नजर आए सब घड़ियाल, मगर

मैंने देखे हैं पसीने में तर ब तर बच्चे
गमे रोजी पे न्योछावर जवानी की कसक
तेज रफ्तारी का दम निकालती हुई मंदी
सांय-सांय करती,लेबर चौराहे की सड़क

और देखा कामयाबी का नई राहें
चांद सीने से लगाने को मचलती बाहें
और वो सूरज भी देखा, जो उगा खेल के मैदानों से
एक मेडल ने कैसे अरब चेहरों को लौटा दी चमक
दांव कुश्ती का और मुक्के का हुनर ऐसा खिला
हर तरफ फैल गई गांव की मिट्टी की महक
और मंडी में सजे देव गेंद-बल्ले के
खेल के हुस्न पे भारी पड़ी सिक्कों की खनक

तमाम किस्सों को सीने में दबाए जाता हूं
गया वक्त हूं तो फिर से कहां आऊंगा,
अलविदा कहता हूं पर भूल नहीं पाऊंगा

अरे, उठो..ये उदासी कैसी
नजूमी देखो फिर बिल से निकल आए हैं
बमों पे बैठे हैं, मुस्तकबिल हरा बताए हैं
कोई टी.वी. पे,कोई छा गया अखबारों में
चमक चोले में,और हीरा जड़े हारों में
बहलाने वाले वही किस्से फिर दोहराए हैं
हंसो-हंसो कि लतीफा बड़ा सुनाए हैं
फिर वही नाजिर हैं,वही मंजर फिर
सुने मैंने भी थे, जब आया था, उठाए सिर

पर ऐसा भी क्या कि जश्न की बात न हो
जर्द पन्नों में गुलाबों से मुलाकात न हो
माना हर तरफ पसरा है ये अंधेरा घना
पर हमेशा के लिए कौन इस दुनिया में बना
जो भी आया है जहां में, वो जाएगा जरूर
तख्त ओ ताज गए,ये भी खतम होगा हुजूर

इसलिए उठो, सुनो दस्तक, खोलो किवाड़
दरीचों से फूट रहा है नई किरणों का जाल
इसे बचाओ बुरी नजरों से, लालच से, बेइमानी से
नया साल बचे,सब झूठ की कहानी से
इसका स्वागत करो... स्वागत करो...स्वागत करो...

(जब कोई खबरनवीस साल का लेखा-जोखा करता है तो कई बार कलम यूं ही बहक जाती है)

नया साल यानी नई कसमें खाने का बखत

नए साल की क़समें

क़सम खाता हूं शराब और सिगरेट पीना नहीं छोड़ूंगा
क़सम खाता हूं, जिन से नफ़रत करता हूं उन्हें नहला दूंगा नीच शब्दों से
क़सम खाता हूं, सुन्दर लड़कियों को ताका करूंगा
क़सम खाता हूं हंसने का जब भी उचित मौका होगा, खूब खुले मुंह से हंसूंगा
सूर्यास्त को देखा करूंगा खोया खोया
फ़सादियों की भीड़ को देखूंगा नफ़रत से
क़सम खाता हूं दिल को हिला देने वाली कहानियों पर रोते हुए भी सन्देह करूंगा
दुनिया औए देश के बारे में दिमागी बहस नहीं करूंगा
बुरी कविताएं लिखूंगा और अच्छी भी
क़सम खाता हूं समाचार संवाददाताओं को नहीं बताऊंगा अपने विचार
क़सम खाता हूं दूसरा टीवी नहीं खरीदूंगा
क़सम खाता हूं अंतरिक्ष विमान चढ़ने की इच्छा नहीं करूंगा
क़सम खाता हूं कसम तोड़ने का अफ़सोस नहीं करूंगा

इस की तस्दीक में हम सब दस्तख़त करते हैं.

(जापानी कवि शुन्तारो तानीकावा की यह अति प्रसिद्ध कविता 2008 में संवाद प्रकाशन से छ्पी उन के अनुवादों की पुस्तक 'एकाकीपन के बीस अरब प्रकाशवर्ष' का हिस्सा है.)

Tuesday, December 30, 2008

वह मुक्ति नहीं, इच्छा लेकर आती है


यहां आप अमीर ओर को पहले भी पढ़ चुके हैं. आज पेश है उनकी एक और कविता:

कुछ लोग कहा करते हैं

कुछ लोग कहा करते हैं ज़िन्दगी चलती जाती है विकल्प के रूबरू भी
कुछ कहते हैं: फ़तह; कुछ खींच देते हैं बराबर का चिन्ह

जीवन और उसकी अनुपस्थिति के दरम्यान; और कुछ ये कहते हैं कि जीवन
हमें उनकी सेवा करने को दिया गया था जिनका जीवन

जीवन नहीं है. मैं कहता हूं: आप.
और इसे बहुत आसानी से समझाया जा सकता है: एक बार फिर ढंकती है रात

जिस सब को देखा जा सकता है. दीये जला दिए गए हैं घर में. और कोई निगाह नहीं है रोशनी में
सिवा उसके जो आईने से आती है, सिवा उसके जो देखती है

मुझे उसे देखते हुए; और वह वह मुक्ति नहीं, इच्छा लेकर आती है, मौत नहीं
जीवन लाती है. और मैं हटाता हूं अपनी निगाह गर्म और ठण्डे से - रात ढंक लेती है हर चीज़ को

और मुझे इच्छा होती है उसकी जो मुझे छू कर देखता है
मुझे कुछ भी याद नहीं रहता. बस इतना ही.

बोरिस पास्‍तरनाक - व्‍यक्तित्‍व

बोरिस पास्तरनाक




कलम में एक जानवर की तरह, मैं कट गया हूं
अपने दोस्तों से, आज़ादी से, सूर्य से
लेकिन शिकारी हैं कि उनकी पकड़ मजबूत होती चली जा रही है।
मेरे पास कोई जगह नहीं है दौड़ने की
घना जंगल और ताल का किनारा
एक कटे हुए पेड़ का तना
न आगे कोई रास्ता है और न पीछे ही
सब कुछ मुझ तक ही सिमट कर रह गया है।
क्या मैं कोई गुंडा हूं या हत्यारा हूं

या कौन सा अपराध किया है मैंने
मैं निष्कासित हूं? मैंने पूरी दुनिया को रुलाया है
अपनी धरती के सौन्दर्य पर
इसके बावजूद, एक कदम मेरी कब्र से
मेरा मानना है कि क्रूरता, अंधियारे की ताकत
रौशनी की ताकत के आगे
टिक नहीं पायेगी।

कातिल घेरा कसते जा रहे हैं
एक गलत शिकार पर निगाहें जमाये
मेरी दायीं तरफ कोई नहीं है
न कोई विश्वसनीय और न ही सच्चा

और अपने गले में इस तरह के फंदे के साथ
मैं चाहूंगा मात्र एक पल के लिए
मेरे आंसू पोंछ दिये जायें
मेरी दायीं तरफ खड़े किसी शख्स के द्वारा

ये कविता है प्रख्यात कवि, उपन्यासकार और चिंतक बोरिस पास्तरनाक की जो उसने १९५९ में नोबेल पुरस्कार लेते समय रची थी।
कितनी तड़प, कितनी पीड़ा और कितनी बेचैनी है इन शब्दों में कि मन पढ़ कर ही बेचैन हो उठता है, और कितनी बड़ी त्रासदी है कि पास्तरनाक का पूरा जीवन ही इसी कविता के माध्यम से अभिव्यक्त हो जाता है।
यह कविता नहीं, उनका पूरा जीवन है जो उन्होंने भोगा और अपने आपको पूरी ईमानदारी से अभिव्यक्त करने के लिए वे हमेशा छटपटाते रहे।
अपने समकालीन दूसरे बुद्धिजीवी रचनाकारों की ही तरह पास्तरनाक हमेशा डर और असुरक्षा में सांस लेते रहे। सोवियत रूस की क्रांति के बाद के कवि के रूप में उन्हें भी शासन तंत्र के आदेशों का पालन करने और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन कर अपनी बात कहने की आजादी के बीच के पतले धागे पर हमेशा चलना पड़ा। उन्होंने उन स्थितियों में भी हर संभव कोशिश की कि कला को जीवन से जोड़ कर सामने रखें जब कि उस वक्त का तकाजा यह था कि सारी कलाएं क्रांति की सेवा के लिए ही हैं। अपनी सारी रचनाएं, कविताएं, संगीत लहरियां और लेखों के सामने आने में हर बार इस बात का डर लगा रहता था कि कहीं ये सब उनके लिए जेल के दरवाजे न खोल दें।
पास्तरनाक की बदकिस्मती कि वे ऐसे युग में और माहौल पर जीने को मजबूर हुए। उन्होंने कभी भी दुनिया को राजनीति या समाजवाद के चश्मे से देखा। उनके लिए मनुष्य और उसका जीवन कहीं आधक गहरी मानसिक संवेदनाओं, विश्वास और प्यार तथा भाग्य के जरिये संचालित था। उनका साहित्य कई बार कठिन लगता है लेकिन उसके पीछे जीवन के जो अर्थ हैं या मृत्यु का जो भय है, वे ही उत्तरदायी है। वे समाजवाद को तब तक ही महत्त्व देते हैं जब तक वह मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक होता है। उस वक्त का एक प्रसिद्ध वाक्य है कि आपकी दिलचस्पी बेशक युद्ध में न हो, युद्ध की आप में दिलचस्पी है।
पास्तरनाक अपने समय के रचनाकार नहीं थे और इसकी सजा उन्हें भोगनी पड़ी। वे इतने सौभाग्यशाली नहीं थे कि उस समय रूस में चल रही उथल पुथल के प्रति तटस्थ रह पाते। इसी कारण से बरसों तक उनका साहित्य रूस में प्रकाशित ही न हो सकता। क्योंकि अधिकारियों की निगाह में उनके साहित्य में सामाजिक मुद्दों को छूआ ही नहीं गया था। वे जीवनयापन के लिए गेटे, शेक्सपीयर, और सोवियत रूस के जार्जियन काल के कवियों के अनुवाद करते रहे। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद उन्होंने अपनी विश्व प्रसिद्ध कृति डॉक्टर जिवागो की रचना शुरू की जिसे उन्होंने १९५६ में पूरा कर लिया था। इसे रूस से बाहर ले जा कर प्रकाशित किया गया। १९५८ में उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया जो रूस के लिए खासा परेशानी वाला मामला था। यही कारण रहा कि यह किताब रूस में १९८८ में ही प्रकाशित हो सकी।
१८९० में जन्मे बोरिस पास्तरनाक की मृत्यु १९६० में हुई।
इतिहास की इससे बड़ी घटना क्या होगी कि जिस बोल्शेविक शासन तंत्र ने पास्तरनाक को आजीवन सताया और उसकी रचनाओं को सामने न लाने के लिए संभव कोशिश की, उसका आज कोई नाम लेवा भी नहीं है और पास्तरनाक का साहित्य आज भी पूरी दुनिया में पढ़ा जाता है और उसकी कब्र पर दुनिया से लोग फूल चढ़ाने आते हैं।

चला गया चटख रंगों का वह चितेरा


समकालीन भारतीय चित्रकला के अनूठे चित्रकार मनजीत बावा नहीं रहे। वे लंबे समय से कोमा में थे और कला जगत को आशा थी कि वे ठीक होकर फिर से उसी उर्जा के साथ काम कर सकेंगे लेकिन इस खबर से कला जगत का चटख रंगों का यह चितेरा दुःख और उदासी का धूसर रंग छोड़ गया लेकिन अपने कैनवास पर वह खास शैली में बने आकारों और मनोहारी रंगों में हमेशा सांस लेता रहेगा। उनके कैनवासों से पूरा भारतीय कला जगत दिपदिपाता रहेगा।
ख्यात कवि चंद्रकांत देवताले (बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कभी पेंटिंग भी किया करते थे) ने कहा कि वे घूमंतू चित्रकार थे और आधुनिक चित्रकला में उनका एक देशी अंदाज था। वे चैनदारी से अपना काम करते थे। उनकी चित्रकारी का किसी भी तरह की होड़ और बाजार से कोई रिश्ता नहीं था। कला उनके लिए जीवन और शुद्ध अभिव्यक्ति का मामला था। यही कारण है कि वे इतना अमूल्य चित्र - संसार रच पाए।
इंदौर के वरिष्ठ चित्रकार श्रेणिक जैन ने कहा कि मनजीत बावा अपने ढंग के मौलिक चित्रकार थे। उन्होंने मिनिएचर किए और उनकी कला लोक कला से खासी प्रभावित रही है। उनका जाना सचमुच कला जगत की अपूरणीय क्षति है। जबकि वरिष्ठ चित्रकार ईश्वरी रावल का मानना था कि उनका काम इतना सुंदर होता था कि देश के बाहर भी खूब पसंद किया जाता था। यह बहुत ही सराहनीय है कि उन्होंने पशु-पक्षियों के मूक संसार को अपने कैनवास पर खूबसूरती से जीवंत किया। वे उन चित्रकारों में से थे जो सतत काम कर रहे थे लेकिन पिछले तीन सालों से उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था। मूर्तिकार-चित्रकार संतोष जड़िया ने कहा कि पेंटिंग में उनका भारतीयता का अंदाज सबसे जुदा था। उन्होंने किसी की नकल नहीं की और अपनी मौलिक शैली ईजाद की। उन्होंने सुर्रियलिज्म को ठेठ भारतीय रंग देकर पुनर्परिभाषित करने का सुंदर प्रयास किया था। चित्रकार प्रभु जोशी ने कहा कि मनजीत बावा ने आकृतिमूलकता के साथ मिथकीय पात्रों को रेखांकन के स्तर पर सरलीकृत किया । वे मूलतः आध्यात्मिक थे और अपने तथा कला के बारे में मितभाषी भी। हालांकि अपनी कलाकृतियों को लेकर वे विवाद में भी रहे लेकिन अविचलित बने रहे। वे कला समीक्षकों, कलादीर्घाअों तथा कलाकारों के लिए भी सर्वाधिक उदार थे।
उन्होंने खूब ड्राइंग की। सालों तक की। उनके इसी ड्राइंग प्रेम से प्रभावित रहे हैं चित्रकार बीआर बोदड़े। वे कहते हैं उन्होंने कला में अपनी एक अलग राह और पहचान बनाई तथा शेरों को लेकर खूब काम किया। जबिक चित्रकार हरेंद्र शाह का मानना था कि उनके फिगरेटिव काम बहुत यूनिक हैं और उसमें भारतीयता झलकती है। उनके रंग आनंद देते हैं। अमूर्त चित्रकार अखिलेश का कहना था कि वे समकालीन चित्रकला में नरेटिव फिगरेटिव कला के बरक्स दूसरी दिशा की फिगरेटिव पेंटिंग के कलाकार थे। वे अपने रंगों के लिए प्रख्यात थे। रंगों का उनका बरताब उन्हें दूसरे चित्रकारों से अलग करता है। अब हम उनके रंगों से वंचित रहेंगे। सोचा था कि ठीक होकर वे फिर से रच सकेंगे लेकिन अब यह संभव न हो सकेगा। कवि नवल शुक्ल का मानना है कि वे देश के सर्वश्रेष्ठ चित्रकारों में एक थे और उनके चित्रों में भारतीयता की लालित्यपूर्ण झलक मिलती है। जबिक चित्रकाकर अक्षय आमेरिया का कहना था कि उनमें गहरी आध्यात्मिकता थी । युवा चित्रकार खांडेराव पंवार कहते हैं कि उनके चटख रंग गहरा प्रभाव छोड़ते हैं और उनके आकार लुभाते हैं।
वे हमेशा अपने चटख रंगों और अद्वितीय आकारों के लिए याद किए जाते रहेंगे।

कितना जानते हैं आप मंजीत बावा को

रंग के चितेरे और सूफियाना अंदाज के मालिक मंजीत बावा को जानना आसान नहीं है। उनकी पेंटिंग और सोच जिन्दगी के एक अलग ही मायने हैं। वह करीब तीन सालों तक कोमा में रहे। जहाँ तक मुझे याद है उनकी तबियत ख़राब होने से महज एक हफ्ते पहले उनसे अच्छी-खासी बातचीत हुई थी कई मुद्दों पर। जिन्दगी के फलसफे से लेकर भविष्य के योजनाएं बातचीत के मुद्दों में शामिल था। मेरी बातचीत का एक मुद्दा सेल्फ इम्प्रूवमेंट भी था जिस पर एक लेख चार जनवरी, २००६ को दैनिक जागरण के जोश में छपा था। शीर्षक था 'गढें कुछ नया। ' मैंने अपने ब्लाग पर भी इसी साल जनवरी में एक लेख भी लिखा था "अब तो जग जाओ बावा "। पर अपने धुन के पक्के न तो वह जगे और न ही किसी की बात ही मानी । आज उनको याद करते हुए क्यों न उस बातचीत को पढ़ें और गुने।... विनीत उत्पल
'गढें कुछ नया'

Monday, December 29, 2008

कला में एक ख़ास क़िस्म की ताज़गी और नयापन होना चाहिये



जाने माने चित्रकार मनजीत सिंह बावा की आज सुबह लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई. तीन साल से कोमा में चल रहे थे बावा.

१९४१ में पंजाब में जन्मे बावा ने कॉलेज ऑफ़ आर्ट से डिग्री हासिल की थी. लन्दन स्कूल ऑफ़ प्रिन्टिंग, एसेक्स में उन्होंने स्क्रीन प्रिन्टिंग का डिप्लोमा किया और १९६७ से १९७१ तक लन्दन में स्क्रीन प्रिन्टर का काम किया.

बावा कहा करते थे: "आपकी कला में एक ख़ास क़िस्म की ताज़गी और नयापन होना चाहिये, वरना कला से जुड़े रहने का कोई मतलब नहीं होता. अलग होने का मतलब हुआ कि आप कुछ ऐसा करते हैं जो आपने पहले कभी नहीं किया होता."

रंगों की चमक और चटख से प्यार करने वाले इस कलाकार के जाने से भारतीय कला-संसार की बड़ी हानि हुई है. कबाड़ख़ाना उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देता है.





(स्व. मनजीत बावा का फ़ोटो 'ट्रिब्यून' से साभार)

ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना







कल, या परसों था वो ..... सिद्धेश्वर भाई की पोस्ट पढ़-सुन कर मगन हो गया था.... तब से कुछ ग़ालिबमय भी हूँ.


"हमारे ज़ेह्न में इस फिक्र का है नाम विसाल
कि गर न हो तो कहाँ जाएँ, हो तो क्योंकर हो"



मुझे लिखना नहीं आता इस लिए सीधे मतलब की बात करुँ ...... पेश है एक ग़ज़ल ग़ालिब की ... आवाज़ रफ़ी की .... पेश कर रहे हैं कैफ़ी आज़मी .... पसंद आए तो बताइयेगा ....... एक और ग़ज़ल की गुंजाइश है ?






ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना
बन गया रकीब आख़िर, था जो राज़दाँ अपना

मय वो क्यों बहुत पीते, बज़्म-ए-गै़र में या रब
आज ही हुआ मंज़ूर, उन को इम्तिहाँ अपना

मंज़र इक बलंदी पर, और हम बना सकते
अर्श से इधर होता, काश कि मकाँ अपना

दे वो जिस क़दर ज़िल्लत, हम हँसी में टालेंगे
बार-ए-आशना निकला, उनका पासबाँ अपना

दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक, जाऊँ उनको दिखलाऊँ
उंगलियाँ फ़िगार अपनी, खा़मः खूँचकाँ अपना

घिसते घिसते मिट जाता, आपने अबस बदला
नंग-ए-सिज्दः से मेरे, संग-ए-आस्ताँ अपना

ता करे न गम्माज़ी, कर लिया है दुश्मन को
दोस्त कि शिक़ायत में, हम ने हमज़बाँ अपना

हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ ग़ालिब, दुश्मन आसमाँ अपना

Saturday, December 27, 2008

न: दे नामे को इतना तूल 'ग़ालिब' मुख़्तसर लिख दे


मैं चमन में क्या क्या गोया दबिस्ताँ खुल गया,
बुलबुलें सुनकर मेरे नाले ग़ज़लख़्वाँ हो गईं.

आज मिर्ज़ा असदु्ल्लाह खाँ 'ग़ालिब' की जयंती (२७ दिसंबर १७९६ - १५ फरवरी १८६९) है. इस महान साहित्यकार के बारे में क्या लिखा जाय ! इतना लिखा जा चुका है उसकी खोज -खबर लेने में सारा जीवन निकल जाएगा और पता चलेगा कि यह तो समुद्र की एक बूँद भर थी. यह भी मालूम कि आने वाले वक्तों में उन पर इतना कुछ और लिखा जाएगा कि आज कल्पना करना भी दुश्वार लगता है. हो सकता कि मेरी यह बात कुछ सहॄदयों को अतिशयोक्ति लगे लेकिन साहब मुझे ऐसा लगता है तो मैं क्या करूँ ! आप चाहें तो इसे भावुकता भी कह सकते हैं - ऐसी भावुकता : जिसका कि आजकल भाव गिरा हुआ है फिर भी वह बाजार में है और उसके भी खरीदार अलबत्ता कम नहीं हैं , खैर...

'ग़ालिब' बुरा न: मान जो वाइज बुरा कहें
ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे

आज क्या किया? वही रोज का किस्सा : 'होता है शबो -रोज तमाशा मेरे आगे' . दिन भर इस तमाशे में पार्ट अदा कर अपने घोंसले में पहुँचकर दोपहर में आया अंग्रेजी का अखबार देखा , टीवी पर थोड़ी देर समाचार और चाय के बाद ग़ालिब के साथ थोड़ी सैर.. ..'दीवाने ग़ालिब' (सं० साक़िब सिद्दीक़ी) , 'उर्दू साहित्य कोश' (कमल नसीम) और 'उर्दू भाषा और साहित्य' ( रघुपति सहाय 'फ़िराक़' गोरखपुरी) जैसी किताबों को उलट - पलटा , कुछ ग़ज़लें सुनीं... मन हुआ कि ग़ालिब पर कुछ लिखा जाय किन्तु ...लिखना हो नहीं पा रहा है -

'ग़ालिब' कर हुजूर में तू बार - बार अर्ज़,
जाहिर तेरा हाल सब उन पर कहे बगैर.

आइए सुनते हैं ग़ालिब की इस कालजयी ग़जल के कुछ शे'र -

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक.
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब ,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ूने जिगर होने तक ।

हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन ,
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक।

ग़मे-हस्ती का 'असद' किससे हो जुज़ मर्ग इलाज ,
शम्मा हर रंग में जलती है सहर होने तक ।

१- गुलजार की प्रस्तुति टीवी धारावाहिक 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में नसीरुद्दीन शाह और जगजीत सिंह -




२- सोहराब मोदी की प्रस्तुति फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में सुरैया -

Thursday, December 25, 2008

बड़ा दिन' पर बाँसुरी

(यह पोस्ट भाई अशोक पांडे से क्षमायाचना के साथ कि उनकी पोस्ट को 'ओवरलैप' करने की धॄष्टता कर रहा हूँ. क्या करूँ दोस्त ! ब्लागरी आपकी ही सिखाई हुई है , सो अब .. आप ही समझो!)

इंदौर नगर के वासी प्रिय भाई सलिल दाते हैं.
बाँसुरी बजाते नहीं , वह तो बाँसुरी में गाते हैं.
प्रेमी हैं मदन मोहन के और संगीत के मर्मज्ञ.
ईश्वर करे जारी रहे उनका विलक्षण वेणु-यज्ञ.
यह सुरमई सौगात भाई संजय पटेल ने भिजवाई है.
'कबाड़खाना' के प्रेमियों को 'बड़ा दिन' की बधाई है।




आइए आज सुनते हैं उर्दू कहानी को नई ऊँचाइयाँ बख्शने वाले मशहूर फिल्मकार राजेन्द्र सिंह बेदी की एक अद्भुत सिनेमाई कृति १९७० में रिलीज 'दस्तक' में संकलित मजरूह सुल्तानपुरी की यह कालजयी कविता - 'माई री...' जिसे अपनी बाँसुरी पर गा रहे हैं सलिल दाते.




माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की

ओस नयन की उनके मेरी लगी को बुझाए ना
तन - मन भिगो दे आके ऐसी घटा कोई छाए ना
मोहे बहा ले जाए ऐसी लहर कोई आए ना
ओस नयन की उनके मेरी लगी को बुझाए ना
पड़ी नदिया के किनारे मैं प्यासी....
माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की

पी की डगर में बैठे मैला हुआ रे मोरा आँचरा
मुखड़ा है फीका-फीका नैनों में सोहे नाहीं काजरा
कोई जो देखे मैया प्रीत का वासे कहूं माजरा
पी की डगर में बैठा मैला हुआ रे मोरा आँचरा
लट में पड़ी कैसी बिरहा की माटी.....
माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की

आँखों में चलते फिरते रोज मिले पिया बावरे
बैंयाँ की छैयाँ आके मिलते नहीं कभी साँवरे
दुख ये मिलन का लेकर काह करूँ कहाँ जाउँ रे
आँखों में चलते फिरते रोज मिले पिया बावरे
पाकर भी नहीं उनको मैं पाती....
माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की


(पुनश्च : 'दस्तक' फ़िल्म जब टीवी के परदे पर पहली बार देखी थी तो यह सिर्फ देखना भर नहीं था।उस अनुभव और इस फ़िल्म पर एक अलग पोस्ट जल्द ही... वैसे बेहद खुशी होगी कि कोई और सम्मानित 'कबाड़ी' यह काम कर देवे , अगर ठीक समझे तो !)

द लास्ट टैम्प्टेशन ऑफ़ क्राइस्ट: नुसरत



एक आदिम कराह! दर्द की! यह ईसा को सूली पर चढ़ाए जाते समय के दृश्य का संगीत है फ़िल्म 'द लास्ट टैम्प्टेशन ऑफ़ क्राइस्ट' से:



संगीत दिया है पीटर गाब्रीएल ने. बाकी मुख्य संगतकार ये रहे: पीटर गाब्रीएल (कई साज़), यूसू एन दूर और बाबा माल (नुसरत के अलावा वोकल्स), डेविड रोड्स (गिटार), वाचे हाउसपियन, अन्त्रानिक अस्कारियन (आर्मेनियाई डूडुक), शंकर (डबल वायलिन), कुडसी एरग्यूनर (ने फ़्लूट), रोबिन कैन्टर (ओबो), मुस्तफ़ा अब्दल अज़ीज़ और म्यूज़ीशियन्स ऑफ़ नाइल (आरगुल), जॉन हैसेल (ट्रम्पेट), नेथन ईस्ट (बास), मासाम्बा ड्लोप (टॉकिंग ड्रम), मैनी एलियास (ऑक्टोबैन्स, सुर्डू) वगैरह