Sunday, February 22, 2009

घर में अकेली औरत के लिए - चंद्रकांत देवताले

तुम्हें भूल जाना होगा समुद्र की मित्रता और जाड़े के दिनों को
जिन्हें छल्ले की तरह अँगुली में पहनकर
तुमने हवा और आकाश में उछाला था
पंखों में बसन्त को बाँधकर
उड़ने वाली चिड़िया को पहचानने से
मुकर जाना ही अच्छा होगा...
तुम्हारा पति अभी बाहर है तुम नहाओ जी भर कर
आइने के सामने कपड़े उतारो
आइने के सामने पहनो
फिर आइने को देखो इतना कि वह तड़कने को हो जाए
पर तड़कने के पहले अपनी परछाई हटा लो
घर की शान्ति के लिए यह ज़रूरी है
क्योंकि वह हमेशा के लिए नहीं
सिर्फ़ शाम तक के लिए बाहर है
फिर याद करते हुए सो जाओ या चाहो तो अपनी पेटी को
उलट दो बीचोंबीच फ़र्श पर
फिर एक-एक चीज़ को देखते हुए सोचो
और उन्हें जमाओ अपनी-अपनी जगह पर
अब वह आएगा
तुम्हें कुछ बना लेना चाहिए
खाने के लिए और ठीक से
हो जाना होगा...सुथरे घर की तरह
तुम्हारा पति
एक पालतू आदमी है या नहीं
यह बात बेमानी है
पर वह शक्की हो सकता है
इसलिए उसकी प्रतीक्षा करो
पर छज्जे पर खड़े होकर नहीं
कमरे के भीतर वक़्त का ठीक हिसाब रखते हुए
उसके आने के पहले
प्याज मत काटो
प्याज काटने से शक की सुरसुराहट हो सकती है
बिस्तर पर अच्छी किताबें पटक दो
जिन्हें पढ़ना कतई आवश्यक नहीं होगा
पर यह विचार पैदा करना अच्छा है
कि अकेले में तुम इन्हें पढ़ती हो ...

Saturday, February 21, 2009

जयपुर का म्यूज़ियम, मिश्र की ममी, बारोक पेन्टिंग्ज़ और चोट्टे की जिज्ञासा



इस बार जयपुर में साथ में हमारी मित्र सोनिया भी थी. वियेना में रहने वाली पेशे से मानवशास्त्री सोनिया ने बाली और थाईलैंड की जनजातियों पर महत्वपूर्ण शोधकार्य किया है. उसका स्वाभाव एक नैसर्गिक घुमन्तू का है. तीन - चार दिन जयपुर और आसपास रहने - घूमने की योजना थी.

जयपुर में उस रोज़ सोनिया गांधी की रैली थी. हज़ारों-हज़ार स्त्री-पुरुष पैदल, बसों में लदे-ठुंसे सोनिया गांधी को देखने-सुनने की नीयत से राजस्थान के तमाम इलाकों से पहुंचे थे. जगह-जगह ट्रैफ़िक जाम. हमारी वाली सोनिया को कुछ फ़ोटू वगैरह लेने का अच्छा मौका मिल गया.

पहला भ्रमण म्यूज़ियम का तय हुआ क्योंकि वह रास्ते में पड़ गया.

संग्रहालय में प्रदर्शित की गई चीज़ें जाहिर है वैसी ही थीं जैसा उन्हें होना चाहिए था: कुछ परम्परा, कुछ इतिहास, पार्श्व में हल्का राजस्थानी संगीत वगैरह वगैरह. यह सब देखने में मसरूफ़ हो ही रहे थे कि दिल्लीवाली सोनिया के भक्तों का रैली से छूटा रेला किसी अंधड़ की तरह संग्रहालय में घुस आया. छः फ़ीट लम्बी ख़ूबसूरत हमारी वाली सोनिया उस रेले को संग्रहालय में प्रदर्शित अन्य दुर्लभ वस्तुओं जैसी ही प्रतीत हुई. मानवशास्त्री सोनिया के लिए भी घूंघट कढ़ी ग्रामीण महिलाओं की तनिक सकुचाई भीड़, भिन्न आकारों की मूंछों से सुसज्जित मर्दाना चेहरे और मांओं का हाथ थामे बड़ी-बड़ी आंखों से अगल-बगल देखते बच्चे, उसकी सतत -अनुसंधानरत जिज्ञासा के कारण बहुत दिलचस्प विषय थे. क़रीब दस मिनट चले इस पारस्परिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उपरान्त स्थितियों के सामान्य होने पर ही संग्रहालय दर्शन का कार्य पुनः चालू हुआ.

एक जगह बहुत सारी भीड़ जमा हो कर झुकी हुई कुछ देख रही थी. पास जाकर देखा तो वही चीज़ थी जो मुझे बचपन में तमाम संग्रहालयों में सबसे ज़्यादा आकर्षित करती थी. मिश्र की ममियां सम्भवतः हमारे देश के हर बड़े म्यूज़ियम में धरी हुई हैं. क्यों धरी हुई हैं और क्या वे असली हैं - ये सवाल हैं जो निवाड़ सरीखी पट्टियों में लिपटी सदियों से सुरक्षित मृत मानव देहों (अगर वे देहें ही हैं तो ... अपने मुल्क में अदरवाइज़ सब कुछ पॉसिबल है) को देखते हुए मुझे थोड़ा-बहुत परेशान करते हैं. यानी आप अभी अभी मीणा, भोपा, भील और लोहार इत्यादि जनजातियों की जीवनशैली का मुआयना कर रहे थे और अचानक यह ममी. ... क्या तमाशा है भाई!

इस से भी बड़ा तमाशा आगे आने को था. एकाध ख़ाली दीवारों को भर देने की नीयत से ब्रिटिश काल की कुछ बारोक पेन्टिंग्ज़ सजाई गई थीं. आप जानते हैं न विक्टोरियन काल की बारोक पेन्टिंग्ज़ कैसी होती थीं - किसी सुरम्य भारतीय लोकेशन पर कोई अंग्रेज़ पार्टी वगैरह हो रही होती थी जिस में लोगों की संख्या एक से लेकर दर्ज़नों तक हो सकती थी. हाथों में ट्रे लिये साफ़े-पगड़ियां बांधे भारतीय चाकरों की टोलियां होती थीं और हां इन चित्रों का सबसे ज़रूरी तत्व होता था कुछ गोरी महिलाओं की उपस्थिति. ये स्त्रियां आमतौर पर तनिक मुटल्ली होती थीं और इन्हें अपने ऊपरी बदन को ढंकने से किसी डॉक्टर ने मना किया होता था.

म्यूज़ियम के भीतर काफ़ी उमस लगने लगी थी और हम बाहर निकलना चाह रहे थे. सोनिया ने दबी सी मुस्कान से मुझे उधर देखने को कहा: मूंछों, नंगे पैरों और सूरज में तपी झुर्रियों वाले साठ-सत्तर की उम्र के कुछ बुज़ुर्ग ग्रामीण पुरुष उक्त पेन्टिंग्ज़ में पाई जाने वाली उक्त महिलाओं के अंगों के बारीक अनुसंधान में रत थे. दबे स्वरों में एक दूसरे से कुछ कहते भी जाते थे. हॉल के बीच में खड़ी महिलाओं के अब ऊबा हुआ दिखने लगे झुंड की तरफ़ चोर निगाह कर एक बुज़ुर्ग सम्भवतः अपनी पत्नी को ताड़ने की कोशिश करते दिखाई दिए कि कहीं उन्हें तो नहीं ताड़ा जा रहा. वे निश्चिन्त हो कर पुनः अपने अनुसंधान में लीन हो गए.

मेरे भीतर बैठा शरारती चोट्टा हंसता हुआ मुझसे पूछता है कि ताऊ जी क्या सोच रहे होंगे. "पधारो म्हारे देस" - चोट्टा ख़ुद ही जवाब भी देता है.

(अगली किस्त का इन्तज़ार कर सकते हैं)

Friday, February 20, 2009

हमें वहीं जाना होता है बार बार उन चेहरों का हिस्सा बनने

अनीता वर्मा की कविताओं से आप परिचित हैं ही. उनका पहला संग्रह 'एक जन्म में सब' बहुत चर्चित हुआ और सम्मानित भी. अभी दिल्ली में उनका नवीनतम संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' (२००८ में प्रकाशित) मिल गया. उनसे मेरी सिर्फ़ एक मुलाकात है. दो-तीन वर्ष पहले उनका एक बेहद जटिल ऑपरेशन हुआ था दिल्ली में - बहुत ही ख़तरनाक. मैं शाम को दिल्ली पहुंचा था. मुझे उसी रात यूरोप यात्रा पर निकल जाने की जल्दी थी. अनीता जी अस्पताल से वापस आकर मेरे होटल से नज़दीक मौजूद झारखण्ड भवन में स्वास्थ्यलाभ कर रही थीं.

एक संक्षिप्त मुलाकात के दौरान मुझे उनकी निश्छल पारदर्शिता और मजबूत ऑप्टिमिज़्म ने बांध कर रख लिया था. आज तक उनसे सम्पर्क बना हुआ है और यही दो उनकी ख़ूबियां आज भी मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित करती हैं. हां, बेहतरीन इन्सान तो ख़ैर वे हैं ही.

इस नए संग्रह में वे और अधिक आशाभरी मानवीय कविताओं के साथ आई हैं.

मेरा प्रयास रहेगा आप को इस संग्रह से चुनिन्दा रचनाएं पढ़वा सकूं. इस क्रम में आज प्रस्तुत है उनकी 'अस्पताल डायरी':




अस्पताल डायरी

१

शीशे के बाहर बैठा है
एक कबूतर और उसका बच्चा
यह अस्पताल बीमारों को जीवन देता है
कबूतर को भी देता है जगह

२

मृत्यु चली गई पुरानी चप्पलें पहनकर
मैं एक बार फिर लौट आई
अपने आप से कोई समझौता करने

३

दूर सड़क पर गाड़ियों की रोशनी
वहां गति है जीवन है
यहां दर्द की आंखें उन्हें देखती हुईं

४

वह मुझे उठाती है ज़मीन पर गिरे हुए
एक फूल की तरह
हमारे बीच दर्द की आवाज़ है.

५

मिज़ोरम की वह नर्स नीलांचली
मेरी हर बात दोहराती है
मैं कहती हूं बत्ती बन्द कर दीजिए
वह कहती है बत्ती बन्द कर दीजिए
और बुझा देती है बत्ती
मैं कहती हूं दूसरे बिस्तर की मरीज़ को
लगती है ठण्ड ए.सी. बन्द कर दीजिए
और वह बन्द कर देती है ए.सी.
मैं कहती हूं मुझे दर्द है
वह कहती है दर्द है और ला देती है दवा

६

बारिश भीतर उतरती रही
ज्यों ही उसे सुना
वह गुम हो गई.

७

रात की तरह मृत्यु की परछाईं नहीं होती
वह सिर्फ़ हमें आग़ोश में ले लेती है
हम छटपटाते हैं सिर धुनते हुए
वापस लौटने को तत्पर
सुरंग के दूसरे छोर पर
दिखता है एक हल्का प्रकाश
कुछ प्रिय चेहरे गड्डमड्ड
हमें वहीं जाना होता है बार बार
उन चेहरों का हिस्सा बनने.

८

वह रात भर रोता रहा
लौट आए उसकी प्रिय
लौट आए फिर एक बार.

९

मैं हर समय उसे याद करती हूं
जो इस नए संसार में बेहद शामिल है
जो कभी मुड़कर नहीं आएगा मेरी तरफ़

१०

मैं अपने ही विरुद्ध खड़ी थी
अपने विश्वासों के साथ
उनसे बचने को आतुर.

('रोशनी के रास्ते पर' - राजकमल प्रकाशन द्वारा २००८ में प्रकाशित. मूल्य रु. १५०)

कबाड़ख़ाने में अनीता जी की कविताएं यहां भी:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का

श्वेत.. धवल दिनों से वापसी और 'लाजो -लाजो'

लगता है कि पैरों में पहिये -से बँध गए हैं.नवंबर के महीने से सफ़र का जो सिलसिला चल निकला है , वह विराम नहीं ले रहा है. सफ़र पर जाने से पहले भाई विमल वर्मा जी की 'ठुमरी' पर उस्ताद शुजात हुसैन खान साहब को सुनकर गया था जो निरंतर भीतर गूँजता रहा. यह आवाज, यह सितार ,यह साज , यह सब कुछ एक सम्मोहन है. दरअसल यह वही आवाज थी जिसे सुनकर मेरे प्यारे कंप्यूटर जी अस्पताल की ओर जाने को तैयार हुए थे और मैं पैरों में पहिए बाँधकर औसत बर्फ़बारी के बाद श्वेत और धवल जैसे शब्दों को मूर्त करने का कारनामा करने वाले शहर में दाखिल होने के वास्ते चल पड़ा था .

अब लौट कर समस्या यह है कि रुटीन पर आने में कुछ रुकावट -सी आ रही है. क्या किया जाय ...सफ़र से लौटने के बाद ऐसा ही होता है अक्सर .. लगता है कि कुछ अच्छा , उम्दा , पसंदीदा सुने बिना 'शबो रोज का तमाशा' रास न आएगा. कंप्यूटर जी भी अस्पताल से लौट आये हैं.आइए आज एक बार फिर वही स्वर सुनते है..सम्मोहन से भरा.. उस्ताद शुजात हुसैन खान साहब की प्रस्तुति :'लाजो -लाजो'


Friday, February 13, 2009

मुरदा गधे पर लाठी चारज करने की भारतीय परम्परा अक्षुण्ण रहे अक्षुण्ण रहे


जैसा कि सर्वविदित है कल एक एतिहासिक दिवस है. कुछ जबरिया शादियां होनी हैं. कुछ ख़ास वैराइटी के कपड़े बंगलूर भेजे जाने हैं. सारा देश भूख-प्यास-भ्रष्टाचार-हत्या-कमीनपन-अकाल-मन्दी छोड़कर प्रेम में डूब जाएगा. सब अच्छा हो जाएगा.

हिन्दी ब्लॉग जगत ने इस एतिहासिक अवसर पर कुछ विशिष्ट वस्त्रों को ले कर जो अभूतपूर्व उत्साह दिखाया है, वह श्लाघनीय तो है ही अनुकरणीय भी है.

मिर्ज़ा कब्बन जब भी न्यूज़ चैनलों में ख़बरों को घन्टों बलत्कृत होता देखते हैं तो बेसाख़्ता कह उठते हैं : "मुरदा गधे पे लाठी चारज हो रिया मियां! ..."

पुनश्च: एक अच्छे भले मुद्दे का भुस भर देने वाले महात्माओं को शीश नवाता हूं. मैं कबाड़ख़ाने की तरफ़ से सुजाता, रचना और तमाम साहसी लोगों विशेषतः महिला-ब्लॉगरों को समाज के फ़र्जी दम्भ और पिलपिल मूल्यों के समक्ष लगातार डटे रहने के लिए बधाई भी देता हूं. आई मीन इट!

पुनश्च २: २० तारीख़ तक काफ़ी व्यस्त हूं. और इस विषय पर सोचते हुए भीतर उठ रही तमाम बातों पर उसके बाद ज़रूर लिखूंगा. अन्य कबाड़ियों से जागने और कुछ लिखने की विनती भी करता हूं.

ट्राफ़िक जाम कैसे-कैसे











इधर के सप्ताह भर के कुछ अनुभवों की तस्वीरें ही आपके साथ बांट रहा हूं फ़िलहाल. थोड़ा जल्दी में हूं. फ़ुरसत से तफ़सील बयान की जाएगी बाद में. इन तस्वीरों में जयपुर में सोनिया गांधी की रैली के दिन के ट्राफ़िक जाम का नज़ारा है, आमेर से आगे खेड़ी गेट पर स्थित अनोखी संग्रहालय में काम करता कारीगर है, गन्दगी और बदबू से बजबजाता, शर्मसार करता गलता धाम है, गलता धाम से लौटते एक बाबा के आश्रम का साइनबोर्ड है, सिसोदिया रानी का बाग है रानीखेत क्लब से रात को खींचा गया पूरा माहताब है, झूलादेवी मन्दिर की घन्टियां हैं और अचानक पड़ी बर्फ़ की वजह से रानीखेत-भवाली रोड पर लगा असम्भव-अकल्पनीय ट्राफ़िक जाम.

Thursday, February 12, 2009

मिसाल के तौर पर गिलास शराब से बात करने के लिये


अर्जेन्टीना के महाकवि रॉबेर्तो हुआर्रोज़ की किताब 'वर्टिकल पोइट्री' से प्रस्तुत हैं दो टुकड़े:

१.

हर चीज़ अपने लिये हाथ बनाती है।
मिसाल के तौर पर पेड़
हवा को बाँटने के लिये।

हर चीज़ अपने लिये पाँव बनाती है
मिसाल के तौर पर घर
किसी का पीछा करने के लिये।

हर चीज़ अपने लिये आँखें बनाती है
मिसाल के तौर पर तीर
निशाने पर लगने के लिये।

हर चीज़ अपने लिये जीभ बनाती है
मिसाल के तौर पर गिलास
शराब से बात करने के लिये।

हर चीज़ अपने लिये एक कहानी बनाती है
मिसाल के तौर पर पानी
दूर तक साफ़ बहने के लिये।

२.

पानी का एक गिलास
एक दोपहर के भीतर
इकट्ठा करता है दूसरी दोपहर को,
समय का एक अलग जमावड़ा।
और एक क्षण को समझ का दरवाज़ा खुलता है
वह दरवाजा जिसे बन्द करने के लिये
धक्का नहीं देना पड़ता।

और मैं पीता हूँ पानी के
उस गिलास को दो बार।

Sunday, February 8, 2009

कभी जल कभी जाल


कभी जल कभी जाल. यह नाम है हेमन्त कुकरेती के चौथे काव्य संग्रह का. इस संग्रह में प्रेम को लेकर बहुत सारी कविताएं हैं. इस विकट समय में प्रेम कविता लिख पाना और अच्छी प्रेम कविता लिख पाना बहुत मुश्किल काम लगता है मुझे. इस लिहाज़ से यह संग्रह बहुत मानवीय और ज़रूरी लगता है.

१३ मार्च १९६५ को जन्मे हेमन्त को हिन्दी की युवतर पीढ़ी में महत्वपूर्ण माना जाता रहा है. २००१ में भारतभूषण सम्मान, २००२ में कृति सम्मान, २००३ में हिन्दी अकादेमी और केदार सम्मान से नवाज़े जा चुके हेमन्त ने अपना यह संग्रह मुझे कुछ सप्ताह पहले कौसानी में दिया था. मैंने वायदा किया था कि कबाड़ख़ाने में उनकी कुछ रचनाएं लगाऊंगा.

आज वही वादा पूरा करता हुआ मैं आप को उनकी कुछ प्रेम कविताओं से रू-ब-रू करा रहा हूं:


आंख की तरह दिल
(कांगड़ा कलम का एक चित्र देख कर)

उसने आंख की जगह
निकाल कर रख दिया दिल
रुकी हुई दुनिया चलने लगी

वे यादें थीं
गाढ़े ख़ून-सी बूंद-बूंद टपकती
उसके सीने को ढंकते
नदी थे उसके बाल
जिसमें नहा रही थीं
बत्तख सी उंगलियां

हाथों में था एक फूल दहकता
जिससे कपटी मौसम में वह
अपनी इच्छाओं को कह रही थी

दुनिया झुकी हुई थी
उसके सामने हाथ फैलाए

वह धर ही देती
उसके हाथ पर अपनी आंखें
जो दिल की तरह उछल रही थीं
हर डर पर ...

प्रेम कविता में दरवाज़ा

उसने तय किया भूख मिट जाए
वह प्रेम की कविता लिखेगा
जिसमें प्रेम नामक शब्द कहीं नहीं होगा
अद्भुत प्रेम कविता होगी वह

इसके लिए नफ़रत और युद्ध
युद्ध और विनाश जैसे शब्द ज़रूरी थे

उसे बसों में भूल गए
रूमालों की बात नहीं करनी थी
उन चिठ्ठियों के बारे में भी
उसने नहीं सोचा
जो पीली पड़ती जा रही थीं

बच्चों को वह भूल गया
मिलने आए लोगों से मिलना
उसने ज़रूरी नहीं समझा
अब तक उसे सूझ नहीं रहा था
कि शुरू कैसे करे?

उसे दरवाज़े का ख़याल आया
यही है मुसीबतों की जड़
इसी रास्ते आते हैं कविता में ख़लल ...

उसकी प्रेम कविता में दरवाज़ा बन्द था
बन्द थे झरोखे

लिख-लिख कर वह शब्दों को
फेंक रहा था बियावान में.

जो डरा रहा था

उसकी कमर पर
वह अपने होठों की तितली
चिपकाना चाहता था
दुख हुआ कि कभी जो तितली से ज़्यादा सुन्दर थ
अब ठीक से होंठ भी नहीं थे

वह प्यार था
या उसका न होना
जो उन्हें डरा रहा था.

मिलने पर

मिटाया तो और उभर गया
जलाया तो पी गया आग को

पहले तो ऐसा नहीं था

मैं उससे मिला तो
अपने बारे में पता चला.

एक विदागीत की अधूरी पंक्तियां

चिड़िया तो तू मेरी ही ठहरी
मेरी आंखों में ही था
तेरा पहला घोंसला

मैंने ही सिखाया था
निडर उड़ना

लौटते कैसे हैं
बस यह सिखाना भूल गया ....

Saturday, February 7, 2009

गामा पहलवान को याद कीजिये



गामा पहलवान अब हमारे महादेश की किंवदन्तियों का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं. उन्हें याद करना एक अनन्त नोस्टैल्जिया को जगाता है. बचपन में मेरे पास एक छोटी सी किताब थी. इसमें भारत की चुनिन्दा विभूतियों के बारे में छोटे-छोटे आलेख थे. गामा पहलवान वाला टुकड़ा मुझे बेहद लुभाता था. किताब तो अब न जाने कहां की कहां गई. उसी को याद करते हुए मैंने यह आलेख कुछ समय पहले नवभारत टाइम्स के लिए लिखा था. आज आप के लिए पेश कर रहा हूं:

पहलवानों और उनकी ताक़त के बारे में तमाम झूठे-सच्चे क़िस्से हमारी भारतीय सांस्कृतिक-सामाजिक परम्परा के अभिन्न हिस्से हैं. मिसाल के तौर पर पंजाब के मशहूर पहलवान कीकर सिंह सन्धू को लेकर यह क़िस्सा चलता है कि एक बार उनके उस्ताद ने उनसे दातौन करने के लिए नीम की पतली टहनी मंगवाई. कीकर सिंह जैसे शक्तिशाली पहलवान को लगा कि गुरु के लिए एक टहनी लेकर जाना गुरु की और स्वयं उनकी तौहीन होगा. सो कीकर सिंह ने समूचा नीम का पेड़ जड़ से उखाड़ डाला और कांधे पर धरे उसे ले जा कर अखाड़े में पटक डाला.

इस क़िस्से में कितनी सच्चाई है, सबूतों के न मिलने के कारण कहा नहीं जा सकता लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप से उभरा पहला चैम्पियन पहलवान अब किंवदन्तियों और मुहावरों का हिस्सा बन चुका है. इस चैम्पियन का नाम था गामा पहलवान. कद्दावर पहलवान मोहम्मद अज़ीज़ के घर १८८२ में अमृतसर में जन्मे रुस्तम-ए-ज़माना गामा का असली नाम ग़ुलाम मोहम्मद था. गामा की असाधारण प्रतिभा का प्रमाण यह तथ्य है कि क़रीब पचास साल के पहलवानी करियर में उन्होंने कोई पांचेक हज़ार कुश्तियां लड़ीं और उन्हें कभी भी कोई भी नहीं हरा सका.

दस साल की आयु में गामा ने जोधपुर में आयोजित शक्ति-प्रदर्शन के एक मुकाबले में हिस्सा लिया. इस आयोजन में क़रीब चार सौ नामी पहलवानों ने भागीदारी की थी और गामा अन्तिम पन्द्रह में जगह बना सकने में क़ामयाब हुए. इस से प्रभावित जोधपुर के तत्कालीन महाराजा ने गामा को विजेता घोषित कर दिया. इस के बाद के कुछ साल गामा की कड़ी ट्रेनिंग का सिलसिला चला. उन्नीस साल की आयु में गामा ने भारतीय चैम्पियन रहीम बख़्श सुलतानीवाला को चुनौती दी और दो राउन्ड तक चले कड़े मुकाबले के बाद क़द अपने से कहीं बड़े रहीम बख़्श को धूल चटा दी.

इस कुश्ती के बाद गामा का रुतबा बढ़ता गया और १९१० के आते-आते भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद सारे पहलवान उनसे हार चुके थे. इसी साल आर. बी. बेन्जामिन नामक एक प्रमोटर गामा और उसके छोटे पहलवान भाई इमाम बख़्श को लेकर इंग्लैंड पहुंचा जहां यूरोप भर के पहलवानों गामा ने चुनौती दी कि वे तीस मिनट के भीतर किसी भी भार वर्ग के किन्हीं तीन पहलवानों को हरा देगा. इस चुनौती को किसी ने भी गम्भीरता से नहीं लिया. आख़िरकार गामा ने पोलैंड के विश्व चैम्पियन स्टेनिस्लॉस बाइज़्को और फ़्रैंक गोच को ललकारा. अन्ततः अमरीकी पेशेवर पहलवाम बेन्जामिन रोलर ने गामा की चुनौती स्वीकार की. १ मिनट ४० सेकेण्ड चले इस कुश्ती के पहले राउन्ड में गामा ने रोलर को चित कर दिया. इसके बाद गामा ने फ़्रांस के मॉरिस डेरिआज़, स्विट्ज़रलॅण्ड के जॉहन लेम और स्वीडन के जेस पीटर्सन को पटखनी दी.

अन्ततः गामा की चुनौती को स्टेनिस्लॉस बाइज़्को ने स्वीकार किया. १० सितम्बर १९१० को हुए इस एकतरफ़ा मुकाबले में गामा ने अपना झण्डा गाड़ दिया. १७ सितम्बर को इन्हीं दो के बीच एक और मुकाबला होना था पर बाइज़्को डर के मारे आया ही नहीं और गामा को विश्व-चैम्पियन की जान बुल बेल्ट से नवाज़ा गया. इसके बाद गामा ने कहा कि वह एक के बाद एक बीस पहलवानों से मुकाबला करना चाहता है. उसने शर्त रखी कि एक से भी हार जाने पर वह इनाम का सारा खर्चा देगा. लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई.

भारत वापस आने के कुछ समय बाद गामा का एक और मुकाबला रहीम सुलतानीवाला से हुआ. गामा ने यह मुकाबला जीता और रुस्तम-ए-हिन्द का अपना ख़िताब महफ़ूज़ रखा. इसके बाद उसने एक और बड़े पहलवान पंडित बिद्दू को मात दी. बाद के सालों में गामा के करियर का सबसे उल्लेखनीय साल है १९२७ जब उसने स्टेनिस्लॉस बाइज़्को को मात्र २१ सेकेन्ड में पराजित कर दिया था.

विभाजन के बाद गामा पाकिस्तान चला गया जहां १९६० में उसका देहावसान हुआ. मृत्यु के कुछ वर्ष पहले दिये गए एक इन्टरव्यू में गामा ने रहीम सुलतानीवाला को न सिर्फ़ अपना सबसे महान प्रतिद्वंद्वी बताया, उसने कहा: "हमारे खेल में अपने से बड़े और ज़्यादा क़ाबिल खिलाड़ी को गुरु माना जाता है. मैंने उन्हें दो बार हराया ज़रूर, पर दोनों मुकाबलों के बाद उनके पैरों की धूल अपने माथे से लगाना मैं नहीं भूला."

भारतीय का तराना गाता है पाक

भारत और पाक के बीच क्यों न कितनी भी बंदूकें तन जायें, लेकिन सच्चाई यह है कि जहाँ भारत पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि इकबाल का लिखा तराना 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान' गाता है, वहीं पाकिस्तान में एक भारतीय कवि की चार बंद वाली 'ए सरजमीने पाक' जमकर बजाई जाती है।

जब द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर देश का बंटवारा हुआ था तो पाकिस्तान के रेडियो पर डेढ़ महीने तक इसी तराने को बतौर राष्ट्रीय गीत सुना जाता था। इसका पहला बंद है;

ए सरज़मीन-ए-पाक
ज़र्रे तेरे हैं आज
सितारों से ताबनाक
रौशन है कहकशां से
कहीं आज तेरी ख़ाक
तुन्दही हासिदां पे है
ग़ालिब तेरा सवाक
दामन वो सिल गया
जो था मुद्दतों से चाक


इसके रचयिता कोई और नही बल्कि प्रोफेसर जगन्नाथ आजाद थे। प्रोफेसर जगन्नाथ आजाद और अल्लामा इकबाल राष्ट्रीय सीमाओं से परे उर्दू जगत में सर्वमान्य हैं। जब जगन्नाथ लाहौर में इकबाल की मजार पर गया तो बड़ी ही भावुक शैली में कुछ अपने दिल के दर्द को बयान किया :

मैं आ रहा हूँ दयारे मजारे गालिब से
तेरे मज़ार पे लाया हूं दिल का नज़राना
जदीद दौर का तेरे सिवा कोई न मिला
नज़र हो जिसकी हक़ीमाना बात रन्दाना
सलामी रूमचे असर जदीद तुझ पे सलाम
सलाम महरम राज़ दरूने मयख़ाना.


प्रोफेसर आजाद ने विश्व के करीब २५ विश्वविद्यालयों में अल्लामा इकबाल और उर्दू साहित्य से सम्बंधित अन्य विषयों पर लेक्चरर दिए। करियर की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में हुई और सूचना विभाग के अधिकारी और निदेशक भी रहे।

Thursday, February 5, 2009

वसंत : एक कोलाज़ उर्फ़ वसंत यों नहीं आता !

(भाई महेन जी की उम्दा पोस्ट 'वसंत आ गया है' को आगे बढ़ाने की कबाड़ - कोशिश करते हुए........)
१.
सबसे पहले एक किताब का कवर...














२.
दो रागिये—वैरागिये
हेमंत और शिशिर
अधोगति के तम में जाकर पता लगाते हैं उन
जड़ों का
जिनके प्रियतम—सा ऊर्ध्वारोही दिखता है अगला
वसंत

(लीलाधर जगूड़ी की कविता 'असंत-वसंत के बहाने' का एक अंश)

३.

यह कैसा वसन्त है जो शीत के डर से कांप रहा है? क्या कहा था विद्यापति ने-- ' सरस वसन्त समय भल पाओलि दछिन पवन बहु धीरे ! नहीं मेरे कवि, दक्षिण से मलय पवन नहीं बह रहा। यह उत्तार से बर्फ़ीली हवा आ रही है। हिमालय के उस पार से आकर इस बर्फ़ीली हवा ने हमारे वसन्त का गला दबा दिया है। हिमालय के पार बहुत- सा बर्फ बनाया जा रहा है जिसमें सारी मनुष्य जाति को मछली की तरह जमा कर रखा जायेगा। यह बड़ी भारी साजिश है बर्फ की साजिश ! इसी बर्फ क़ी हवा ने हमारे आते वसन्त को दबा रखा है। यों हमें विश्वास है कि वसन्त आयेगा। शेली ने कहा है, 'अगर शीत आ गयी है, तो क्या वसन्त बहुत पीछे होगा? वसन्त तो शीत के पीछे लगा हुआ ही आ रहा है। पर उसके पीछे गरमी भी तो लगी है। अभी उत्तार से शीत -लहर आ रही है तो फिर पश्चिम से लू भी तो चल सकती है। बर्फ और आग के बीच में हमारा वसन्त फॅसा है। इधर शीत उसे दबा रही है और उधर से गरमी। और वसन्त सिकुड़ता जा रहा है।मौसम की मेहरबानी पर भरोसा करेंगे, तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी। मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होगा। वसन्त अपने आप नहीं आता ; उसे लाया जाता है। सहज आनेवाला तो पतझड़ होता है, वसन्त नहीं। अपने आप तो पत्ते झड़ते हैं। नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं। वसन्त यों नहीं आता।

( हरिशंकर परसाई के निबंध 'घायल वसंत' का एक अंश )

४.
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Wednesday, February 4, 2009

वसंत आ गया है।

जिस स्थान पर बैठकर लिख रहा हूँ, उसके आस-पास कुछ थोड़े से पेड़ हैं। एक शिरीष है, जिस पर लम्बी-लम्बी सूखी छिम्मियाँ अभी लटकी हुई हैं। पत्ते कुछ झड़ गए हैं और कुछ झड़ने के रास्ते पर हैं। जरा-सी हवा चली नहीं कि अस्थिमालिकावाले उन्मत कापालिक भैरव की भांति खड-खड़ाकर झूम उठते हैं। "कुसुम जन्म ततो नव पल्लवा:" का कहीं नाम-गंध भी नहीं है। एक नीम है। जवान है, मगर कुछ अत्यन्त छोटी किसलायिकाओं के सिवा उमंग का कोई चिन्ह उसमें भी नहीं है। फिर भी यह बुरा मालूम नहीं होता। मसें भीगी हैं और आशा तो है ही। दो कृष्णचूडाएं हैं। स्वर्गीय कविवर रवींद्रनाथ के हाथ से लगी वृक्षावली में ये आखिरी हैं। इन्हें अभी शिशु ही कहना चाहिए। फूल तो उनमें कभी आए नहीं, पर वे अभी नादान हैं। भरे फागुन में इस प्रकार खड़ी हैं मानो आषाढ़ ही हो। नील मसृण पत्तियां और सूच्यग्र शिखान्त। दो-तीन अमरुद हैं, जो सूखे सावन भरे भादों कभी रंग नहीं बदलते- इस समय दो-चार श्वेद पुष्प इन पर विराजमान हैं; पर ऐसे फूल माघ में भी थे और जेठ में भी रहेंगे। जातीय पुष्पों का एक केदार है; पर इन पर ऎसी मुर्दनी छाई हुई है कि मुझे कवि-प्रसिद्धियों पर लिखे हुए एक लेख में संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई है। एक मित्र ने अस्थान में मल्लिका का एक गुल्म भी लगा रखा है, जो किसी प्रकार बस जी रहा है। दो करबीर और एक कोविदार के झाड़ भी उन्हीं मित्र की कृपा के फल हैं, पर वे बुरी तरह चुप हैं। कहीं भी उल्लास नहीं, उमंग नहीं और उधर कवियों की दुनिया में हल्ला हो गया, प्रकृति रानी नया श्रृंगार कर रही है, और फिर जाने क्या-क्या। कवि के आश्रम में रहता हूँ। नितांत ठूंठ नहीं हूँ; पर भाग्य प्रसन्न न हो तो कोई क्या करे? दो कांचनार वृक्ष इस हिन्दी-भवन में हैं। एक ठीक मेरे दरवाजे पर और दूसरा मेरे पड़ोसी के। भाग्य की विडम्बना देखिये कि दोनों एक ही दिन के लगाए गए हैं। मेरावाला ज्यादा स्वस्थ और सबल है। पड़ोसीवाला कमजोर, मरियल। परन्तु इसमें फूल नहीं आए और वह कमबख्त कंधे पर से फूल पड़ा है। मरियल-सा पेड़ है, पर क्या मजाल कि आप उसमें फूल के सिवा और कुछ देखें! पत्ते हैं ही नहीं और टहनियां फूलों से ढक गई हैं। मैं रोज़ देखता हूँ कि हमारेवाले मियां कितने अग्रसर हुए? कल तीन फूल निकले थे। उसमें दो तो एक संथाल-बालिका तोड़कर ले गई। एक रह गया है। मुझे कांचनार फूल की ललाई बहुत भाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन फूलों की पकोड़ीयां भी बन सकती हैं। पर दुर्भाग्य देखिये कि इतना स्वस्थ पेड़ ऐसा सूना पड़ा हुआ है और वह कमजोर दुबला लहक उठा है। कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
पढता-लिखता हूँ। यही पेशा है। सो दुनिया के बारे में पोथियों के सहारे ही थोड़ा-बहुत जानता हूँ। पढ़ा हूँ, हिन्दुस्तान के जवानों में कोई उमंग नहीं है, इत्यादि-इत्यादि। इधर देखता हूँ कि पेड़-पौधे और भी बुरे हैं। सारी दुनिया में हल्ला हो गया कि वसंत आ गया। पर इन कमबख्तों को ख़बर ही नहीं! कभी-कभी सोचता हूँ कि इनके पास तक संदेश पहुंचाने का क्या कोई साधन नहीं हो सकता? महुआ बदनाम है कि इसे सब के बाद वसंत का अनुभव होता है; पर जामुन कौन अच्छा है। वह तो और भी बाद में फूलता है। और कालिदास का लाड़ला यह कर्णिकार? आप जेठ में मौज में आते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि वसंत भागता-भागता चलता है। देश में नहीं, काल में। किसी का वसंत पन्द्रह दिन का है और किसी का नौ महीने का। मौजी है अमरुद। बारह महीने इसका वसंत ही वसंत है। हिन्दी-भवन के सामने गंधराज पुष्पों की पांत है। ये अजीब है, वर्षा में ये खिलते हैं, लेकिन ऋतु-विशेष के उतने कायल नहीं हैं। पानी पड़ गया तो आज भी फूल सकते हैं। कवियों की दुनिया में जिसकी कभी चर्चा नहीं हुई, ऐसी एक घास है - विष्णुकांता। हिन्दी-भवन के आँगन में बहुत है। कैसा मनोहर नाम है! फूल और भी मनोहर होते हैं। जरा-सा तो आकार होता है, पर बलिहारी है उस नील मदुर रूप की। बादल की बात छोडिये, जरा-सी पुरवैया बह गई तो इसका उल्लास देखिये। बरसात के समय तो इतनी खिलती है कि मत पूछिए। मैं सोचता हूँ कि इस नाचीज़ लता को संदेश कैसे पहुँचता है? थोड़ी दूर पर वह पलाश ऐसा फूला है कि ईर्ष्या होती है। मगर उसे किसने बताया कि वसंत आ गया है? मैं थोड़ा-थोड़ा समझता हूँ। वसंत आता नहीं ले आया जाता है। जो चाहे और जब चाहे अपने पर ले आ सकता है। वह मरियल कांचनार ले आया है। अपने मोटेराम तैयारी कर रहे हैं, और मैं?
मुझे बुखार आ रहा है। यह भी नियति का मजाक ही है। सारी दुनिया में हल्ला होने गया है कि वसंत आ rआहा है, और मेरे पास आया बुखार। अपने कांचनार की ओर देखता हूँ और सोचता हूँ, मेरी वजह से तो यह नहीं रुका है?

अब सुधिजन मुझे ये बताएं कि ये किसने लिखा है। चाहें तो हिन्दी का टेस्ट ही समझ लें और जबतक उत्तर ढूंढ रहे हों तबतक ये दादरा सुनिए बेग़म अख़्तर की आवाज़ में।