Tuesday, April 14, 2009

इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि रात हो चुकी थी



फ़्रांसीसी कवि पॉल एलुआर (१४ दिसम्बर १८९५-१८ नवम्बर १९५२) आन्द्रे ब्रेतॊ और लुई अरागों के साथ सर्रियलिस्ट आन्दोलन के संस्थापकों में से एक थे. उनका वास्तविक नाम यूजीन एमीले पॉल ग्रिन्देल था. निम्न मध्य वर्ग में एक बुककीपर के घर जन्मे एलुआर को बचपन में टीबी हो गई थी जिसके कारण १६ की आयु में उन्हें स्विटज़रलैण्ड के एक सेनेटोरियम में भेजना पड़ा था. इन्हीं दिनों उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया थी.अगले साल उन्होंने फ़ौज में काम किया जहां जहरीली गैसों के सम्पर्क में आने के बाद उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया. फ़ौज से लौटने के बाद १९१७ में उनका पहला काव्य संग्रह छपकर आया.

सर्रियल आन्दोलन से जुड़ जाने के बाद उनके जीवन में एक विचित्र घटना घटी. १९२४ के आसपास वे सार्वजनिक जीवन से कुछ समय ग़ायब हो गए थे. पहले अफ़वाहें उड़ीं और बाद में सच मान लिया गया कि उनकी मौत हो चुकी है. सात माह बाद वे वापस लौट आए और उन्होंने लोगों को बताया कि वे ताहिती, इन्डोनेशिया और श्रीलंका की यात्राओं पर निकल गए थे. यह बात बाद में पता लगी कि उनकी यात्राओं की वजह यह थी कि उनकी पत्नी गाला उन्हें छोड़ कर कलाकार साल्वादोर दाली के साथ चली गई थी.

१९४३ में उन्होंने फ़्रांस की कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली जिसके बाद उन्होंने सर्रियलिस्ट आन्दोलन से अपने सम्बन्ध तोड़ लिए.

अन्तर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट आन्दोलन के सांस्कृतिक मोर्चे पर लगातार काम करते हुए एलुआर ने ब्रिटेन, बेल्जियम, चेकोस्लोवाकिया, मैक्सिको और रूस की यात्राएं कीं. वे चाह कर भी अमरीका नहीं जा सके क्योंकि उनकी वीज़ा की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी गई थी.

पाब्लो पिकासो के घनिष्ठतम मित्रों में से एक थे एलुआर. उनका मानना था कि कविता का उद्देश्य भाषा का नवीनीकरण होना चाहिये ताकि मानव अस्तित्व के हर क्षेत्र में उसका अर्थवान योगदान हो सके. उनकी कविता में सामाजिक चेतना, प्रेम, बिछोह और दर्द के सूत्र इस कदर आपस में गुत्थमगुत्था रहते है कि यह तय कर पाना मुश्किल होता है कि उनका कौन सा कवि रूप अधिक बड़ा है.

आज उनकी तीन कविताएं - अलग अलग मूड्स कीं:


सत्य

दुख के पंख नहीं होते
न ही प्यार के
न कोई चेहरा
वे बोलते नहीं.
मैं हिलता-डुलता नहीं
मैं उनकी ओर टकटकी लगाए नहीं देखता
मैं उनसे बात नहीं करता
लेकिन मैं अपने दुख और प्यार की तरह वास्तविक हूं.


नदी

मेरी जीभ ने नीचे वो नदी
अकल्पनीय जल, मेरी नन्ही नाव
और खिंचे हुए परदे, चलो बातें करें

कर्फ़्यू

इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि दरवाज़ों पर पहरेदार थे,
इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि उन्होंने क़ैद कर लिया था हमें,
इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि हमें निषिद्ध था सड़क पर जाना,
इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि शहर सोया हुआ था,
इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि वह भूखी थी और प्यासी थी,
इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि हम निहत्थे थे,
इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि रात हो चुकी थी,
इसके अलावा और क्या कर सकते थे हम, क्योंकि हम मुब्तिला थे मोहब्बत में?

(जल्द ही उनकी एकाध लम्बी कविताएं लगाऊंगा)

Monday, April 13, 2009

काला धन और भाजपा का कनकौव्वा

चुनाव प्रचार में भाजपा काला धन वापस लाने का कनकौव्वा उड़ा रही है. जबकि भाजपा अच्छी तरह जानती है कि विदेशों में जमा काला धन यज्ञ-हवन करके वापस नहीं लाया जा सकता है. हाँ, धर्मगुरुओं के आशीर्वाद से धन जमा करने वालों का पता अवश्य लगाया जा सकता है. काला धन विदेश में रखने वाले भी उन्हीं के चेले होते हैं और आशीर्वाद लेकर चुनाव जीतने वाले भी. आडवाणी जी ने अभी कहा भी था कि वह साधु-संतों और धर्मगुरुओं से मार्गदर्शन लेते रहेंगे. कुछ वर्ष पहले धर्मगुरुओं के मार्गदर्शन में 'काले' को 'सफेद' बनाया जा रहा था जिसका स्टिंग ओपरेशन हुआ था, पता नहीं लोग उसे क्यों भूल गए? उसका कोई नामलेवा नहीं! बाबा रामदेव भी चुनाव के समय वह मामला नहीं उठाते जबकि 'राष्ट्र का जिम्मेदार नागरिक' होने के नाते काला धन वाले मुद्दे पर उन्होंने कांग्रेस की कम घेराबंदी नहीं कर रखी है.


ताजा हल्ला के अनुसार भारतीयों के १४५६ अरब डॉलर नकद रूप में स्विस बैंकों में रखे हुए हैं. यह सफ़ेद नहीं काला धन है. एक आँकड़ा और है- अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देश की अर्थव्यवस्था में थोड़ी जान फूंकने के लिए जो ताज़ा स्टिम्युलस पैकेज मंजूर करवाया है वह राशि है ८३० अरब डॉलर. इसका अर्थ यह हुआ कि सिर्फ स्विस बैंकों में जमा भारतीयों का काला धन अमेरिकी स्टिम्युलस पैकेज से ६२५ अरब डॉलर अधिक है. रेखांकित करने वाली बात यह है कि यह मात्र स्विस बैंक में जमा काला धन है. भारतीयों के लिए मॉरीशस तो काला धन गलाने और कर चोरी का स्वर्ग है. वहां का पिटारा खुले तो क्या हाल हो!

अगस्त 1982 में भारत और मॉरीशस के साथ एक कर संधि हुई थी जिसको 'डबल टैक्सेशन एवोइडेन्स ट्रीटी' कहा जाता है. भारत ने इस संधि के तहत मॉरीशस निवासियों को भारत में शेयर की खरीद बिक्री पर हुई कमाई पर टैक्स न लेने का वचन दिया था. इसी तरह की छूट मॉरीशस ने भी दी.. भारतीय निवेशक राउंड ट्रिपिंग करते हैं. इसके तहत निवेशक विदेश में जाकर मॉरीशस के रास्ते धन वापस भारत ले आते हैं.

काला धन छिपाने के धरती पर जो अन्य स्वर्ग हैं- जैसे मलयेशिया, फिलीपीन्स, उरुग्वे, कोस्टारिका, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, बहामा, बरमुडा, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड और केमैन आइलैंड आदि- इनके नाम तो सब बता देंगे, लेकिन यहाँ कितने भारतीयों का कितना काला धन छिपा है, और इन भारतीयों में कितने कांग्रेसी हैं, कितने भाजपाई, कितने हिन्दू, कितने मुसलमान, कितने सिख, कितने ईसाई और इस मामले में ये सब हैं कितने बड़े मौसेरे भाई, यह कौन बताएगा?

ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनामिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने काले धन की निकासी में सहयोग न करने वाले देशों की काली सूची जारी की है और अनुमान व्यक्त किया है कि काले धन की सैरगाह बने देशों में १७०० अरब डॉलर से ११५०० अरब डॉलर मूल्य के दायरे में परिसंपत्तियाँ जमा हैं. यहाँ आप गणित लगा लीजिये कि यह काला धन 'जी-२०' नेताओं द्वारा वैश्विक अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए प्रस्तावित की जाने वाली राशि के मुकाबले दस गुना से भी अधिक है.

स्विस बैंकों का तो हाल यह है कि वहां खातादार का नाम पता होता ही नहीं, एक कोड नंबर होता है. यह कोड नंबर खातादार की धर्मपत्नी और धर्मबच्चों तक को वे नहीं बताते. आपका तलाक हो जाने अथवा वसीयत जैसे कानूनी मामले में भी ये बैंक आपके खाते की गोपनीयता भंग नहीं करते. और नाम खुल जाने के भय से खातादार भी भला क्यों किसी को बताएगा. इतना जरूर होता है कि खातादार की मौत के बाद अगर जमा राशि पर ७ से १० वर्ष के बीच किसी ने दावा नहीं किया तो वह पूरी राशि बैंक की हो जाती है. क्या पता कुछ पूज्य महात्मा अपनी नश्वर किन्तु पार्थिव देह का परित्याग करने से पूर्व अपने बीवी-बच्चों को वह कोड नंबर बता भी जाते होंगे!

स्विट्ज़रलैंड में दुनिया भर का काला धन छिपाने के कारोबार में एक-दो नहीं पूरे ४०० बैंक लगे हुए हैं. इनमें से करीब ४० शीर्ष बैंक बेनामी खाता खोलने की सुविधा देते हैं. यूबीएस और एलटीजी ऐसे ही बाहुबली स्विस बैंक हैं. खाता खोलने के लिए आप एक पत्र भेज दें, बस हो गया काम. बेनामी खाता खुलवाने के लिए सिर्फ एक बार आपको व्यक्तिगत रूप से बैंक में उपस्थित होना पड़ता है. फिर आप चाहें तो खाता ऑनलाइन संचालित करें या फ़ोन पर आदेश देकर. आपके खाते की गोपनीयता कायम रखने के लिए स्विस सरकार ने ऐसे नियम बनाए हैं कि अगर किसी बैंक अधिकारी या कर्मचारी ने राज खोला तो उसे सश्रम कारावास दिया जा सकता है. स्विस बैंकों के लिए यह कोई गुनाह ही नहीं है कि खातादार ने अपने देश में कर चोरी करके पैसा उनके यहाँ जमा किया है. स्विस कानून में आपके लिए कमाई और संपत्ति का ब्यौरा देने की भी कोई बाध्यता नहीं है.

सन् १९३४ के बाद से बैंकिंग गोपनीयता का कानून स्विस सरकार ने दीवानी से बदलकर फौज़दारी कर दिया था. इसके तहत हथियारों की अवैध बिक्री और नशीली दवाओं की तस्करी के जरिए हुई कमाई के मामलों में गोपनीयता के नियम थोड़े शिथिल किये गए थे. लेकिन सवाल यह है कि किस मुद्रा में लिखा होता है कि वह किस ढंग से कमाई गयी है. करोड़ों-अरबों के भारतीय रक्षा सौदों तथा उनमें वसूला गया कमीशन किस रास्ते से कहाँ पहुंचा, कोई इसका माई-बाप आज तक पता चला है क्या? क्वात्रोची का ही कोई क्या उखाड़ पाया?

विदेशों से काला धन वापस लाने की एक सूरत हो सकती है. जिस तरह कुछ वर्ष पहले 'ब्लैक' को 'व्हाइट' करने के लिए केंद्र सरकार ने देश में एमनेस्टी स्कीम चलायी थी उसी तरह काला धन वापस लाने वालों के लिए एमनेस्टी स्कीम चलाये और उनकी पहचान स्विस बैंकों की ही तरह गुप्त रखे. तब संभव है कि कुछ धर्मात्मा भारतीय जीव भारत के भूखों-नंगों पर तरस खाकर अपना धन यहाँ लगा दें. गणित लगाइए कि अगर एक प्रतिशत काला धन भी लौट आया तो वह कितने खरब होगा?

गाबो से सुनिये क्या है कोलम्बियाई साहित्य का रहस्य


गाब्रिएल गार्सीया मारकेज़ ने एक इन्टरव्यू में यूं बतलाया था कि दरअसल है क्या कोलम्बियाई साहित्य के जादुई यथार्थवाद का वह रहस्यमय नुस्ख़ा़. माफ़ करेंगे इन पंक्तियों का अनुवाद मुझसे मुमकिन नहीं है:

Now, the bark has dogged
Now, the sing has cocked
Now, have chimed the great rings belled
And the bray has donkeyed
And the screech has birded
And the grunt has pigged
I grief you my window
Songs onto your intimacy.

... That is Columbian literature.

Saturday, April 11, 2009

मार्लो की एक कविता - सय्यद अली हामिद


कुमायूं विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के विभागाध्यक्ष तथा इस समय सोबन सिंह जीना परिसर अल्मोडा में कार्यरत हामिद सर एक अद्भुत अध्यापक होने के साथ-साथ विलक्षण अनुवादक तथा कवि भी हैं। उन्होंने उर्दू कवियों के अंग्रेज़ी अनुवाद किए हैं, जो अकादमिक रूप से अत्यन्त मूल्यवान माने जाते हैं। इधर उन्होंने ब्लॉगजगत में अपनी शानदार आमद दर्ज़ की है। कबाड़खाना परिवार इस आभासी दुनिया में बहुत आदर के साथ उन्हें ख़ुशआमदीद कहता है। यहाँ प्रस्तुत है उनके ब्लॉग की नवीनतम प्रविष्टि !

मार्लो की कविता का अनुवाद

आओ रहो मेरे साथ
मेरी महबूबा बनके
और हम वो सारी खुशियाँ आज़माएँगे
जो पहाड़ों, वादियों, खेतो
और खड़ी चट्टानों से
मिल सकती है
हम सुक़ून से एक पत्थर पर बैंठे
देखा करेंगे करेंगे चरवाहों को
अपने मवेशियों को चराते हुए
छिछली नदियों के किनारे
जहाँ झरनों के साथ
सुर मिला कर परिंदे
प्यार के नग्मे सुनाते हैं !

मूल कविता

Come live with me and be my love
And we will all the pleasures prove
That hills and valleys,dale and field
And all the craggy mountains yield.
There we will sit upon the rocks
And see the shepherds feed their flocks,
By shallow rivers, to whose falls
Melodious birds sing madrigals.

...इस दुनिया को बस अब बदलना चाहिए

इतिहास और भूगोल कभी भी न तो मेरे पाठ्यक्रम में शामिल थे न मेरे पसंदीदा विषयों की सूची में, लेकिन अब मुझे लगता है कि ये दोनों महत्वपूर्ण विषय अगर मैंने पढे होते तो समाज के बारे में, दुनिया के बारे में मेरी समझ बहुत बेहतर होती। तब शायद अफगानिस्तान मेरे लिए पाकिस्तान की सीमा से लगा एक मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों वाला, अलकायदा को पनाह देने वाले एक मुसलिम देश के अलावा कुछ और भी होता। तब शायद मैं जान पाती कि वहां पारदर्शी पानी से भरी नदियां भी हैं और लहलहाते खेत भी थे। इतिहास मुझे बताता कि कैसे ताकतवर देश अपनी बादशाहत के लिए किसी दूसरे देश को बरबादी की किस हद तक ले जा सकते हैं। कट्ठरवादिता कैसे मासूम बच्चों को तालिबान बना देती है, मुजाहिदीन बना देती है, जिंदा बम बना देती है यह सब मुझे बेहतर तरह से मालूम हो पाता।


तब शायद मुझे यह बात समझनी ज़्यादा आसान लगती कि किसी भी देश में ज़्यादातर आम लोग होते हैं जो गिने-चुने लोगों की सियासतों के बीच जीते हैं। यह भी पता होता कि वहां कट्ठरपंथियों की दहशत तले भी लङकियां प्यार करती हैं, परिवार बनाती हैं। वहां भी लाल-लाल गालों वाले खूबसूरत बच्चे गलियों में वही खेल खेलते हैं जो सारी दुनिया के सारे बच्चे खेलना जानते हैं। शायद तब ये सोचना ज़्यादा स्वाभाविक लगता कि वहां भी बच्चे मां की आंख का तारा होते हैं और जब वो किसी और की लङाई कि ज़िहाद समझ कर लङते हुए जवान होने से पहले ही मर जाते हैं तो उस मां का दुख दुनियां में किसी भी मां के दुख जैसा होता है।


पिछले दिनों अफगानी लेखक खालिद हुसैनी की दूसरी किताब a Thousand splendid suns पढने के बाद मुझे शिद्धत से इस बात का अहसास हुआ कि अखबारी खबरों से किसी समाज को किसी खास छवि में बांध देना कितना गलत है। पेशे से डॉक्टर खालिद हुसैनी अफगानिस्तान में पैदा हुए और अस्सी के दशक में उनका परिवार शरणार्थी के रूप में अमेरिका जा बसा। दो-ढाई साल पहले उनकी पहली किताब the kite runner पढी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी। यह एक मर्मस्पर्शी कहानी है सत्तर के दशक में काबुल में रहने वाला १२ साल का बिन मां का आमिर अपने प्रभावशाली पिता की नजर में खुद को बहादुर साबित करना चाहता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर होने वाले पतंगबाजी मुकाबले को जीतना उसका लक्ष्य है। आमिर यह मुकाबला जीत जाता है लेकिन उसी दिन उसके खास दोस्त हसन के साथ हुआ हादसा उसे गहरी आत्मग्लानी से भर देता है। अपनी कमतरी को छिपाने के लिए वह हसन पर चोरी का आरोप लगा कर अपने अहाते में बने नौकरों वाले घर से निकलवा देता है। आगे चल कर दोनों की जिंदगियां क्या मोङ लेती हैं, वो है इस उपन्यास की कहानी। हालांकि आमिर और हसन दोनों में से कोई भी नायक नहीं है, इसका मुख्य पात्र है दिनों दिन बद से बदहाल होता अफगानिस्तान। बदलते राजनीतिक हालत किस तरह से आम आदमियों की जिंदगियों की दशा दिशा कैसे बदलते हैं, इसे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी के जरिए कहा गया है the kite runner में।

पिछले दिनों जब मैंने खालिद हुसैनी की a thousand splendid suns पढी तो ज्यादातर हिस्सा डबडबाई आंखों से ही पढा गया। ये बहुत उदास लेकिन बहुत खूबसूरती से लिखी गई किताब है। यहां भी कहानी का मुख्य पात्र अफगानिस्तान ही है। लेकिन यहां औरतों की दुनिया में झांका गया है। इस कहानी में एक मरियम है और एक लैला है। एक अमीर बाप की अवैध संतान है और एक तरक्कीपसंद पिता की लाङली। एक अपने पिता को शर्मिंदगी को छिपाने की मजबूरी में और दूसरी बम विस्फोट में परिवार को खो देने के बाद बने हालातों में एक ही आदमी की बीबी बनती हैं। 15 साल की मरियम से जब राशिद ने शादी की तो उसकी उम्र थी लगभग 45 साल और 27 साल बाद जब उसने दूसरी शादी की तो लैला की उम्र भी 15 ही साल थी। ये अफगानिस्तान की औरतों की बेबसी और उससे मुक्त होने की उनकी कोशिशों की कहानी है।

ये बिल्कुल संयोग ही था कि इस किताब के बाद मैंने जो फिल्म देखने के लिए चुनी वो थी पाकिस्तान के फिल्मकार सोएब मंसूर की 'खुदा के लिए' । संयोग इसलिए कि खालिद हुसैनी की दोनों किताबें और यह फिल्म एक सी नहीं तो काफी मिलती जुलती सी परिस्थितियों की कहानी कहती हैं । फिल्म 'खुदा के लिए' बहुत तर्कसंगत रूप से पाकिस्तान के बारे में आम आदमी की गलतफहमियों को दूर करती है। यह 9/11 के बाद पाकिस्तान के आम तरक्की पसंद मुसलमान की कशमकश को बयान करती एक बढिया फिल्म है । इस फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वो है जहां ब्रिटेन में रह रहा एक पाकिस्तानी अपने दीन की हिफाज़त के लिए बेटी मरियम को धोखे से पाकिस्तान ले जा कर उसे बिना बताए उसकी शादी कर अफगानिस्तान के एक गांव में छोङ आता है। यह एक रोंगटे खङे कर देने वाला दृश्य है। यह फिल्म इस्लाम के नाम पर फैले बहुत से भ्रमों को बहुत खूबसूरती के साथ दूर करती है।

एक खालिद की मरियम है जो कुरान के कुछ अक्षर बांच पाती है और जो दुनिया के बारे में बस उतना ही जानती है जितना बचपन में उसके पिता ने और शादी के बाद उसके पति ने बताया। सोएब मंसूर की मरियम इंग्लैंड में पली बङी आज़ाद खयाल लङकी है। लेकिन विडंबना देखिए कि दोनों के बाप उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी जबरन उनकी शादियां करवाते हैं। आखिर क्यों होता है औरतों के साथ ‌ऐसा हर कहीं?

ये दोनों किताबें और यह फिल्म काफी पहले आ चुके हैं लेकिन चूंकि मैंने ये अब पढीं और देखी और मन किया कि लिखूं सो लिख डाला। सो गर बात पुरानी लगे तो माफी के सिवा क्या?

Friday, April 10, 2009

भाजपा का 'भय हो' और हमारे-आपके लल्लू मामा

कांग्रेस ने ख़रीदा ऑस्कर विजेता 'जय हो' तो भाजपा ने रिकॉर्ड करवा लिया 'भय हो'. जय हो पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से लेकर कांग्रेसी कार्यकर्ता तक टीवी पर नाचते दिख रहे हैं. लेकिन भाजपा ने अपने भय हो को इतना दयनीय बना दिया है कि अगर यह गाना टीवी के विज्ञापनों और चुनावी सभाओं में बजता रहा तो ख़ुद लोग उसका मज़ाक उड़ाने लगेंगे

जय हो ऑस्कर विजेता एआर रहमान का ऑस्कर विजेता गाना है. सुना है कांग्रेस ने इसकी बड़ी ऊंची बोली लगाई. लेकिन भाजपा ने भय हो कुछ बच्चों को लोकल ट्रेन में भीख मांगता दिखाकर फिल्मा लिया. खर्च तो इसमें भी आया होगा लेकिन अपनी-अपनी सोच की बात है.

भय हो जिन बच्चों पर फिल्माया गया है वे कहीं से भिखारी नहीं लगते. क्या भाजपा वालों ने कभी भिखारी नहीं देखे! हो सकता है जिन लोगों ने ये फिल्मांकन किया है उन्होंने भिखारी न देखे हों. लेकिन क्या कास्टिंग करने वालों ने भी लोकल के भिखारी नहीं देखे! या भाजपा के प्रचार संचालकों ने भिखारी नहीं देखे? सच है, ऐसी हवा में उड़ने वाली राजनीतिक पार्टियों का जनता से वास्ता ही क्या रह गया है. ये अति पर जाते हैं. एक तरफ 'इंडिया शायनिंग' तो दूसरी तरफ 'इंडिया डिक्लायानिंग.'

आइये देखते हैं गाने के बोल. भय हो दरअसल जय हो की पैरोडी है. लेकिन इस पैरोडी को सुनकर माथा पीटने को जी करता है. फिल्मी पैरोडियों का तो यह पासंग भी नहीं है. भाजपा का यह 'भय हो' सुनकर तो मैं सचमुच भयभीत हो गया. आखिर यह पार्टी मतदाताओं से कहना क्या चाहती है? गाना ख़ुद कहता है कि भय हो मंदी हो, भूख हो वगैरह वगैरह...गाना कहीं से पैरोडी नहीं लगता बल्कि एक धमकी लगता है. गाना धमकाता है कि डरो, गाना जैसे यही मनाता है कि मंदी हो, भय हो, भूख हो! व्यंग्य इस पैरोडी को छू तक नहीं गया.

इस पैरोडी को लिखने वाले से तो अधिक प्रतिभावान थे हमारे लल्लू मामा. वह पंचायत के चुनाव से लेकर संसद के चुनाव तक ऐसी पैरोडियाँ लिखते थे कि बस सुनते रहिये. सरपंची के चुनाव में विरोधी का नाम ले-ले कर उसकी चाल, चरित्र और चेहरे की पैरोडियाँ लिखवाने के लिए उनके घर के सामने लाइन लगती थी. फीस होती थी महकौवा जरदे वाला पान. लल्लू मामा अब नहीं रहे. अगर ज़िंदा होते तो भय हो सुनते और पान की बह आयी पीक 'पिच्च' से थूकते हुए कहते- 'इससे अच्छा तो बड़े भाई अपन बना सकते थे.'

मुझे यकीन है कि आप सुधी पाठक अपने-अपने इलाकों के लल्लू मामाओं को अवश्य याद करेंगे.

Wednesday, April 8, 2009

वे चिर - कुमार स्वर थे !



कविता लिखना मुझे कभी नहीं आया.
पं.कुमार गंधर्व का जन्मदिन (8 अप्रैल)
आया
और फूट पड़े ये शब्द.


कभी कभी सोचता हूँ
की-बोर्ड,इंटरनेट,मोबाइल
और मॉल्स में
तब्दील हो रहे समय
और परिवेश में जब
लोग बौरा गए हैं
पं.कुमार गंधर्व
होते तो क्या कर रहे होते ?

वे भानुकुल के बरामदे
के झूले पर बैठे
अपने सरोते से सुपारी कतर रहे होते

निरगुणी पद गा रहे भुवनेश
के साथ डग्गे पर संगत दे रहे होते

कलापिनी को तानपुरा मिलाने की
बारीकी बता रहे होते

वसु ताई से कह रहे होते
बहुत दिन हो गए
वह मालवी गीत सुना दो
"या मटकी सोरमजी से भरी हे
या मटकी गंगाजी से भरी हे

ये सब इसलिये हो रहा होता
क्योंकि कुमार गंधर्व समय
और घड़ी से बहुत आगे के थे
वे ज़माने के चोचलों से
से बहुत परे थे
वह "चिर"कुमार स्वर थे.



कबाड़खाना के दर्दियों के साथ बहुत दिनों मुलाक़ात हो रही है सो इसे विशिष्ट बनाने के लिये अशोक भाई की भेंट की हुई सी.डी में से कुमारजी का गाया राग मालकौंस सुना रहा हूँ.ध्यान से सुनियेगा इस छोटी सी द्रुत बंदिश में कुमारजी की बलखाती तानों का वैभव क्या कमाल कर रहा है.

पं.कुमार गंधर्व जैसे महान स्वर-साधक इस फ़ानी दुनिया से कभी रूख़सत नहीं होते.आइये कुमारजी को जन्म दिन की बधाई देते हुए उत्सव मनाएं.




भानुकुल:कुमारजी का देवास स्थित निवास
भुवनेश:कुमारजी के प्रौत्र और पं.मुकुल शिवपुत्र के पुत्र
कलापिनी:कुमारजी की सुपुत्री.
वसुताई:कुमारजी की सुर-संगीनी श्रीमती वसुंधरा कोमकली

Tuesday, April 7, 2009

दुनिया का सबसे बड़ा 'कबाड़खाना' हमारा दिल है !

हमारे परम कबाड़ी मित्र और युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य अपनी कलम और कीबोर्ड का कमाल दिखलाते हुए अब 'देशबंधु' अखबार में 'ब्लाग कही शीर्षक से स्तंभ भी लिखने लगे हैं।अभी हाल ही में उनका नया संग्रह भी आया है-'पृथ्वी पर एक जगह'. शिरीष ने हिन्दी ब्लॉग पर बतकही के मुताल्लिक पहली कड़ी 'कबाड़खाना' पर लिखी है. इसे अपने ही घर पर कुछ लिखा -पढ़ा न समझा जाय. 'कबाड़खाना' हमारा साझे का घर है और हम इससे बहुत प्यार करते हैं. इस आलोक में शिरीष की बतकही को मैं एक तरह से आत्मावलोकन भी मानता हूँ। अपने मुखिया अशोक पांडे और बाकी साथियों से अनुमति की प्रत्याशा में शिरीष की बतकही को यथावत प्रस्तुत कर रहा हूँ-

इस
बार की ब्लागकही 'कबाड़खाना' पर केन्द्रित है। पहला सवाल उठता है कि आंखिर है क्या ये कबाड़खाना? अड़तीस-चालीस लोगों का अपना एक आत्मीय अड्डा या इससे आगे एक समूचा विचार? जाहिर है कि ब्लाग का नाम ज्ञानरंजन की प्रसिद्ध पुस्तक 'कबाड़खाना' से लिया गया है लेकिन हमारे 'कबाड़खाना' ने अपनी एक सैद्धान्तिकी भी दी है! वरिष्ठ कबाड़ी और 'हिंदुस्तान' अख़बार में कार्यरत आशुतोष ने इस सैद्धान्तिकी को इन शब्दों में जाहिर किया -


''दुनिया के सबसे खादू और बरबादू देश अमेरिका की कोख से जन्मा है कबाड़वाद (फ्रीगानिज़्म) और बनाना चाहता है इस दुनिया को सबके जीने लायक और लंबा टिकने लायक. कबाड़वादी मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था में उत्पादित चीजों को कम से कम इस्तेमाल करना चाहते हैं. फर्स्ट हैण्ड तो बिल्कुल नहीं. ये लोग प्राकृतिक संसाधनों से उतना भर लेना चाहते हैं, जितना कुदरत ने उनके लिए तय किया है. कबाड़वाद के अनुयायी वर्तमान व्यवस्था की उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद, प्रतिद्वंद्विता और लालच जैसी वृत्तियों के बरक्स समुदाय, भलाई, सामाजिक सरोकार, स्वतंत्रता, साझेदारी और मिल बांटकर रहने जैसी बातों में विश्वास करते हैं. दरअसल कबाड़वाद मुनाफे की अर्थव्यवस्था का निषेध करता है और कहता है इस धरती में हर जीव को अपने हिस्से का भोजन पाने का हक है. इसलिए कबाड़वादी खाने-पीने, ओढ़ने बिछाने, पढ़ने-लिखने सहित अपनी सारी जरूरतें कबाड़ से निकाल कर पूरी करते हैं. मैं समझता हूं हम कबाड़खाने के कबाड़ियों में भी ऐसा कोई नहीं, जो कबाड़वाद की भावना की इज़्ज़त न करता हो. कबाड़वादी बनना आसान नहीं लेकिन हम सब उसकी स्पिरिट के मुताबिक बड़ा बनने की लंगड़ीमार दौड़ से बाहर रहने के हिमायती रहे हैं.


तो हे कबाडियो! आज कसम खाएं, कबाड़खाने में सहृदयता के बिरवे को हरा-भरा रखने के लिए अपनी आंखों की नमी को सूखने नहीं देंगे. आमीन!''


पाठक समझ सकते हैं कि यह एक गम्भीर विचारकर्म और पहलकदमी थी, जिसे जाहिरा तौर पर एक मस्ती के साथ अंजाम दिया जाना था. इस ब्लाग के संचालक सुपरिचित अनुवादक अशोक पांडे की अपनी एक जीवन शैली है और उनकी शख्सियत के बारे में एक पंक्ति में कहा जा सकता है कि "अजब आज़ाद मर्द है"! अशोक ने आजादी चुनी है. वे खुद से जुड़ी सभी चीजों को उसी आजादी के साथ अंजाम देते है. उन्होंने जब ब्लाग बनाना तय किया तो अकेलेपन के निषेध के साथ. उन्होंने मुझे, सिद्धेश्वर सिंह, आशुतोष उपाध्याय आदि मित्रों को जोड़ा और हमें मजबूर किया कि हम इस ब्लाग की स्पिरिट को समझें और इस कुनबे को आगे बढ़ाएं. ऐसा हुआ भी - आज इस ब्लाग में उस्ताद कबाड़ी विख्यात कवि वीरेन डंगवाल के साथ-साथ पंकज श्रीवास्तव, महेन मेहता, मीत, विजयशंकर चतुर्वेदी, अनिल यादव, राजेश जोशी, रवीन्द्र व्यास, गीत चतुर्वेदी, संजय पटेल, अजित वडनेरकर, आनन्द स्वरूप वर्मा, उदयप्रकाश, दिलीप मंडल आदि कई नाम है. कबाड़खाने के सदस्यों में एक अद्भुत विविधता है. अनिल यादव पत्रकार हैं तो आदरणीय साथी आनन्दस्वरूप वर्मा की एक उग्रवामपंथी पृष्ठभूमि रही है. गीत चतुर्वेदी विख्यात युवा कवि और कहानीकार हैं. महेन बैंगलोर में रहते हैं अजित वडनेरकर भोपाल में. रवीन्द्र व्यास पेंटर हैं. राजेश जोशी 'बी।बी.सी. लंदन' जैसे वैश्विक माध्यम में हैं और विनीता यशस्वी नैनीताल के पाक्षिक पत्र 'नैनीताल-समाचार' में! यह परिचयमाला बहुत लम्बी है, इसलिए मैं विस्तार में नहीं जाऊंगा.


कबाड़खाना के सदस्य एक स्वर में कहेंगे कि इसमें विभिन्न माध्यमों में हम जिंदगी के लिए ज़रूरी चींजों की तलाश करते हैं, जिसमें हर सदस्य का अपना योगदान होता है. हम किसी एक चट्टान से चिपक कर खड़े नहीं हैं बल्कि जीवन की राहों के कंकर चुन रहे हैं. सबकी अपनी विधाएं हैं और अपनी वैचारिकी. ऐसा बहुत कम देखने में आता है कि इस तरह के उच्च वैचारिक स्तर के इतने लोग बिना आपस में टकराए एक साथ एक काम को मिशन के तौर पर अंजाम दे रहे हों. कबाड़खाना में आपको साहित्य और उसकी सैद्धान्तिकी मिलेगी. राजनीति तथा आर्थिक विश्लेषण भी मिलेंगे. यहाँ आपको रवीन्द्र व्यास की खूबसूरत हरी पेंटिग्स के साथ गुलजार की नज़्मों की व्याख्या मिलेगी. अशोक, सिद्धेश्वर सिंह, मीत, एस. बी. सिंह आदि साथियों द्वारा उपलब्ध कराया गया संगीत भी विपुल मात्रा में मिलेगा, जिसमें शास्त्रीय, कव्वाली आदि से लेकर पुराने सपनीले फिल्मी गीत तक शामिल है. इसमें भारत से लेकर सुदूर यूरोप तक की यात्राओं के विवरण हैं और हमारे आभ्यंतरीकृत संसार के कई अनोखे दृश्य भी. कई लम्बी राजनीतिक- साहित्यिक बहसें हैं, जिन्हें शातिर लोग 'विमर्श' कहेंगे पर एक कबाड़ी शातिर हो ही नहीं सकता - वह बहस ही कहेगा और बहस ही करेगा. हाल की प्रविष्टियों पर निगाह डालें तो राजनीति के बाहुबलीकरण पर पंकज श्रीवास्तव और अनिल यादव ने एक सार्थक मुहिम छेड़ रखी है.

अनिल का कहना सही है कि किसी गदगदायमान कविता या ऐसी ही किसी और सुन्दर शाकाहारी पोस्ट पर टिप्पणियों की बाढ़ आ जाती है पर हमारे जीवन से जुडें सबसे कड़वे सचों से हम यँ ही ऑंख चुराते हैं. इसी बहस के बीच की जगहों में आप अनीता वर्मा की कविताएँ देख सकते हैं, जो उनके खराब स्वास्थ्य के बीच जिजीविषा की अद्भुत अभिव्यक्ति हैं. इधर अशोक और अनिल ने मिलकर भारत के महानायक पर एक चुटीली व्यंग्य श्रृंखला शुरू की है, जिसे पढ़कर अनायास ही शरद जोशी का याद आ जाती है.


'कबाड़खाना' हमारे जीवन के उत्तरआधुनिक अंधेरे में कबाड़ समझ ली गई कई जरूरी चींजों की शिनांख्त कर रहा है और उन्हें हमारे समने रख रहा है. और जाहिर है कि दुनिया का सबसे बड़ा कबाड़खाना आदमी के दिल में होता है. हमें हमारे दिलों में झांकने की आदत डालने वाले अशोक पांडे के 'कबाड़खाना' को सलाम!


-शिरीष कुमार मौर्य
(लेखक हिंदी के चर्चित युवा कवि और ब्लागर हैं)

Monday, April 6, 2009

हवा में पिरोता रोशनी के फूल


इसकी भाषा सपनों की है
चला जाता है दूर
दूसरे हृदयों की खोज में
अदृश्य खिड़कियां खोलता हुआ
दुख की छाया में बैठकर सुस्ताता
हवा में पिरोता रोशनी के फूल

अभी यह मेरे भीतर था
ब्रह्मांड से एकाकार बजता हुआ
टिक-टिक टक-टक मेरा समय

अब यह टेबल पर रखा है
मुझसे बाहर और अलग
कुछ अनजान हाथों में
दिल के माहिर रफ़ूगरों के बीच

जीवन की आभा दमकती है
इसके रक्तहीन मुख पर
इस तरह वह जीता है मेरे बग़ैर
खुली हवा में सांस लेता हुआ
देखता हुआ रंग, स्पर्श और चेहरे

किसी टेबल पर रखा है मेरा अकेलापन
मैं एक कोने में वह दूसरे कोने में
बेसुध होते हुए भी मैं इन्तज़ार करती हूं
उसके लौटने का
अंधेरे में टटोलती हूं अपना आसपास
वह भेजता है अपनी धड़कन
दूर कहीं ब्रह्मांड से.



(पहली बार अनीता वर्मा की हृदय शीर्षक की यह कविता कबाड़खाना पर भाई अशोक पांडे के जरिये ही पढ़ी थी लिहाजा यह पोस्ट कबाड़खाना पर फिर से मेरी पेंटिंग के साथ)

Sunday, April 5, 2009

लंगड़ा आम कि लूला पान- क्या है रजा बनारस


नेट पर वह बनारस कहीं नहीं है जो मणिकर्णिका और गोदौलिया पर पान घुलाता मिलता है। वहां तो उसकी अतीत की भुस भरी खाल है। रंगीन तस्वीरों और छींटदार अंग्रेजी में वह मोक्ष का धर्मालोकित शहर है जहां प्राचीनता की छांव में एकमेक हो गए धर्म, संस्कृति और इतिहास को ड़ॉलरदाता पर्यटक कैमरे में बंद कर मुफ्त अपने घर ले जा सकता है। तांत्रिक, मांत्रिक और अघोरी हैं, शास्त्रार्थ करते विद्वान हैं, मठों और अन्नक्षेत्रों में धर्म संरक्षित है। कंपूटर पर वह मूषक चालित आभासी तीर्थ है। तीर्थयात्री वे हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय एयरलाइन्स और वातानूकूलित बसें ढोकर यहां तक लाती हैं।

सर्च इंजन पर काशी नाम का कोई डिब्बा जोड़िए गाड़ी सीधे किसी पुराणकालीन स्टेशन पर जाकर रूकती है। वहां वही काल्पनिक पुरातन शहर है जिसे हम मेले-ठेले पर पटरी साहित्य उर्फ काशी महात्मय जैसी पुस्तकों में पढ़ते आए हैं। सिर्फ भाषा बदल गई है।

वेबसाइटें बता रही हैं कि भारत में जैसे लोग खुलेआम शौच करते हैं वैसे ही मृत्यु भी सार्वजनिक ढंग से देह से स्खलित होती है। मुर्दों को चांडाल (परिजन नहीं) कंधों पर ढोकर मणिकर्णिका लाते हैं। पवित्र अग्नि डोम राजा के हाथ सुरक्षित रहती है और जो कभी नहीं बुझती। बच्चों की एक इलेक्ट्रानिक मैगजीन में बताया गया है कि इस पवित्रतम शहर में पंडे गंगा के किनारे खड़े रहते हैं और वे थोड़ा सा पैसा या अनाज लेकर श्रद्धालुओं को भोजन, फूल और प्रार्थना की कोचिंग देते हैं। ऐसे चांडाल और कोच यहां कहां हैं, किसी ने देखे हैं?

एक तरफ ये मूषक-चालित तीर्थ है दूसरी तरफ विदेशी सैलानियों के ट्रैवलाग हैं जो बनारस की ज्यादा सटीक तस्वीर पेश करते हैं। एक यात्री फिलिप बी आईवार्ड जूनियर लिखता है- सौ साल से पुरानी एक अंधेरी गली में गली में घूमते मुझे लगा कि मैं पंद्रहवीं शताब्दी में हूं। एक अंधेरी दुकान में मैने दो बनारसियों को, पच्चीस इंच के सोनी टीवी पर वीडियो गेम खेलते देखा। किताबी कल्पना से बनाया मेरा रोमांटिक संसार भरभरा कर ढह गया। एक संगीत समारोह में मुझे महसूस हुआ जैसे किसी खास गर्मी से ब्याकुल बिल्लियां आपस में लड़ रही हों। रात सपने में मुझे लगा जैसे तुरही बजाते लोगों, सांप, गोबर के बीच उठता गिरता भटक रहा हूं। शोर-शराबा इतना था कि भगवान शिव भी घबरा कर ईयर प्लग लगा लेते हैं।

एक और यात्रिन सोफिया स्मिथ लिखती है- रिक्शा, साईकिल, और टैंपो से भरे ट्रैफिक में हजारों लोग रेंग रहे थे। भैंसे बीच सडक में ढिठाई से खड़ी थीं और सांड़ एक दूसरे को चुनौती दे रहे थे। शोर पागल कर देने वाला था। गलियां और सड़कें पान की पीक से लाल थीं। फिर भी इस शहर पर कोई पवित्र आभा है जिसे बनारस कहते हैं।

बनारस पता नहीं क्या है, कैसा शहर है- मुझे अचरज है कि इस लोकसभा चुनाव में पतंगी हिंदू नेता मुरली मनोहर जोशी और खांटी माफिया मोख्तार अंसारी पर कोई ढंग का कोई नारा क्यों नहीं आया अब तक? ध्यान रहे जिस वीपी सिंह को बनारस ने राजर्षि की उपाधि दी थी उसी ने, राजा नहीं फकीर है देश का बवासीर है लंठारक्षणी नारा भी दिया था।

क्यों कहा जाता है- चना, चबैना, गंगजल जो पुरवै करतार - काशी कबहूं न छोड़िए विश्वानाथ दरबार। चना चबैना की जगह इडली-बर्गर है, गंगजल झंडूबाम हो चुका है और विश्वनाथ दरबार का सरकारी अधिग्रहण हो चुका है और वहां पारदर्शी दान-पेटिका लग चुकी है ताकि माल तिड़ी करे तो अफसर नीचे का कोई पंडा-पुजारीनुमा आदमी न कर पाए।

हमेशा कुछ दिन बाद लगने लगता है कि पता नहीं आजकल बनारस क्या है? रांड, सांड, सीढ़ी, सन्यासी के उस पार क्या है। आप जानते हैं? है कोई बनारसी।

Wednesday, April 1, 2009

या करीब आ के ये अमरित मुझे पी लेने दे

पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए पेश है एक और कविता का अनुवाद. मूल रचना अंग्रेज़ी के बड़े कवि विलियम कूपर की है. अनुवाद किया है मुरादाबाद में रहने वाले गणित के अवकाशप्राप्त प्रोफ़ेसर जनाब रोलैन्ड लॉरेन्स ने. अनुवाद उर्दू में है और उनकी पुस्तक 'गाहे-गाहे' का हिस्सा है, जिसे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ था. हिन्दी लिप्यान्तरण हमारे बरेली निवासी कबाड़ी जनाब योगेश्वर सुयाल के सौजन्य से.



और ख़लिश बढ़ने दे

वो तेरी जुल्फे-परीशां वो निगाहे-मग़मूम
वो अलामात गरांबारिए-खातिर जिनको
मेरी महबूब तेरी कोशिशे-नाकाम कभी
यूं पसेपरद-ए-जुल्मात न रख पाएगी

जबकि हसरत को जनम देते हों नाज़ुक जज्बे
तू भी दो-चार घड़ी अश्क रवां रहने दे

नीम शफ़्फ़ाक वो मोती वो लरजते आंसू
जिनसे इक सिलसिल-ए-रब्त-ए-मुहब्बत है मुझे
इससे पहले कि मिले उनको जमीं की आगोश
या करीब आ के ये अमरित मुझे पी लेने दे

फासले लाख बढ़ें पर ये वफा के अंदाज
है इन्हीं पर मिरी उम्मीद की दुनिया कायम
इतनी पुरसोज़ है जब अपनी जुदाई की घड़ी
हर तरफ कैफ़ लिए अपना मिलन आएगा

किस कदर सख़्त है पत्थर की गरां सिल की तरह
दिल कि जो नाजुकिए सोज से मानूस नहीं
जिसमें बर्फ़ाब फिजाओं का फसूं तारी है
जिसमें इक रंजिशे-बेजा के सिवा कुछ भी नहीं

तू मगर दर्द को उलफत का सहारा दे दे
और इजहार जब अहसास का दामन थामे
तू भी हर सूजशे पिनहां को फरोजां करदे
हां अभी और अभी और खलिश बढ़ने दे.

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यह रही मूल अंग्रेज़ी कविता:

ON HER ENDEAVOURING TO CONCEAL
HER GRIEF AT PARTING


Ah! wherefore should my weeping maid suppress
Those gentle signs of undissembled woe?
When from soft love proceeds the deep distress.
Ah! why forbid the willing tears to flow?

Since for my sake each dear translucent drop
Breaks forth, best witness of thy truth sincere,
My lips should drink the precious mixture up,
And 'ere it falls, receive the trembling tear.

Trust me, these symptoms of thy faithful heart,
In absence, shall my dearest hopes sustain,
Delia! since such thy sorrow that we part,
Such when we meet thy joy shall be again.

Hard is that heart and unsubdued by love
That feels no p ain, nor ever heaves a sigh,
Such hearts the fiercest passions only prove,
Or freeze in cold insensibility.

Oh! then indulge thy grief, nor fear to tell
The gentle source from whence thy sorrows flow!
Nor think it weakens when we love to feel,
Nor think it weakness what we feel to show.


[पेन्टिंग: फ़्रान्सीसी मूल के ब्रिटिश चित्रकार फ़िलिप हर्मोजीन्स काल्डेरॉन (1833-1898) की पेन्टिंग 'रूथ एंड नेओमी']

कबाड़ख़ाने में जल्दी ही आपको कीट्स, शैली, बायरन और विलियम वर्ड्सवर्थ के दुर्लभ अनुवाद भी देखने को मिलेंगे.

Tuesday, March 31, 2009

मायावती से भयभीत कौन?

इन दिनों जारी राजनीतिक गहमा-गहमी के बीच तमाम लोग एक अजब समस्या से जूझ रहे हैं। उन्हें डर है कि अगली लोकसभा के त्रिशंकु होने पर कहीं जोड़-तोड़ करके मायावती प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ना पहुंच जाएं। ऐसा सोचने वालों में सिर्फ राजनीतिज्ञ नहीं, बुद्धिजीवी, पत्रकार और जनता का एक मुखर भी हिस्सा है। हाल ये है कि एक सर्वे के जरिये ये भी बता दिया गया है कि देश की 74 फीसदी से ज्यादा लोगों को मायावती का प्रधानमंत्री बनना पसंद नहीं। उन्हें लगता है कि इससे देश की प्रतिष्ठा घटेगी। ये अलग बात है कि हिंदुस्तान अमेरिका नहीं कि 622 लोगों के बीच हुए ऐसे सर्वेक्षणों के जरिये जमीनी हकीकत का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जा सके। बहरहाल चिंता में दुबले हो रहे इन लोगों की समस्या के निदान के लिए जरूरी है कि मायावती के गुनाह और खतरे को समझा जाए।
मायावती को लेकर पहली चिंता ये है कि वे ऐसी दलित नेता हैं जो सामाजिक ताना-बाना को छिन्न-भिन्न करना चाहती हैं। लेकिन ये सब पुरानी बाते हैं। मायावती ने यूपी की सत्ता पर पहुंचते ही सर्वसमाज का नारा दिया था। और अगर डीएस-4 या बीएसपी के शुरूआती दौर में वर्णव्यवस्था को खत्म करने के इरादे रहें भी हों, तो मायावती इससे बहुत दूर निकल आई हैं। डा.अंबेडकर के ब्राह्मणवाद विरोधी अभियान से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम या नारा आज बीएसपी के एजेंडे में नहीं है। यही नहीं, दलितों को बौद्ध बनाने के अभियान को भुलाकर अब वे गणेश वंदना में व्यस्त हैं। “हाथी नहीं, गणेश है- ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” का नारा ही अब उस बीएसपी की पहचान है जो जातिव्यवस्था को तोड़कर नहीं, जातियों को जोड़कर वोटों का हिसाब करती है। बीएसपी के हर नेता के लिए एक ही फरमान है कि वो अपनी जाति को बीएसपी के पीछे गोलबंद करे। उसकी यही सफलता बीएसपी में उसके करियर ग्राफ को तय करता है। यानी, उन लोगों को डरने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है जो इस सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं।
मायावती पर दूसरा आरोप भ्रष्टाचार का है। कहा जाता है कि उन्होंने राजनीति के जरिये जमकर कमाई की है। पर इस आरोप से देश का कौन सा नेता या पार्टी बची है। क्या स्विस बैंक में रखे भारतीयों के 1456 अरब रुपयों में मायावती के उदय से पहले के राजनीतिज्ञों का योगदान नहीं है। छोटी पार्टियों को छोड़िये, क्या कांग्रेस या बीजेपी जैसी पार्टियां भी दावा कर सकती हैं कि वे जनता से चंदा मांगकर सारा खर्चा चलाती हैं। उनकी गाड़ियां और हैलीकाप्टर उसी के दम पर उड़ते हैं। आखिर उनके नेताओं की आलीशान जीवनशैली का राज क्या है? बीएसपी तो खेल के उन्हीं नियमों का पालन कर रही है जो इन पार्टियों ने तय किए हैं। आजादी के तुरंत बाद सामने आए जीप खरीद कांड से लेकर बोफोर्स और तहलका तक जो भी खेल हुए उसमें मायावती या बीएसपी का कोई योगदान नहीं रहा। वैसे, आयकर विभाग की ओर से 2007-2008 के लिए जारी शीर्ष आयकरदाताओं की लिस्ट में मायावती पहले 20 में और राजनेताओं में पहले नंबर पर हैं। 200 लोगों की इस लिस्ट में बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ तो छोड़िए, दुनिया के चुनिंदा अमीरों में शुमार किए जाने वाले मुकेश अंबानी या उनके भाई अनिल अंबानी भी नहीं थे।
तीसरा आरोप ये है कि मायावती अविश्वसनीय हैं। कब,कैसे,कहां, किससे गठबंधन कर लें कोई नहीं जानता। यही वजह है कि प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित न करने पर तीसरे मोर्चे को भी घास नहीं डाली। तो चलिए उस पार्टी को खोजिए जो विश्वसनीय हो। जो बता सके कि वो चुनाव बाद किन लोगों से हर हाल में दूर रहेगी, चाहे सत्ता मिले या ना मिले। जाहिर है, इस कसौटी पर कोई खरा नहीं उतरेगा। फिर चाहे चरण सिंह और चंद्रेशखर को तुरत-फुरत औकात बताने वाली कांग्रेस हो या मंडल से खीझकर वीपी सिंह से पीछा छुड़ाने के लिए मंदिर दांव खेलने वाली बीजेपी। वैसे, इन पार्टियों ने अतीत में मयावती से समर्थन लेने में कभी परहेज नहीं किया। उधर, आजकल बीएसपी के दुश्मन नंबर एक बने मुलायम सिंह ने तो राजनीति की दूसरी पारी ही बीएसपी के बल पर शुरू की थी। साथ मिलकर चुनाव लड़ा। सरकार बनाई, पर संबंध बिगड़े तो उनके गुर्गे मायावती की जान लेने पर उतारू हो गए। गेस्ट हाउस कांड को कौन भुला सकता है।
एक और गंभीर चिंता ये है कि मायावती प्रधानमंत्री बन गईं तो देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी। ये बड़ी दूर की कौड़ी लगती है। मायावती डा.अंबेडर की मूर्तियां लगाने का अभियान जरूर चला रही हैं लेकिन उनके विचारों के अनुरूप राजकीय समाजवाद या तानाशाही विहीन साम्यवाद की वे कतई प्रशंसक नहीं लगतीं। न उन्हें पूंजीपतियों से कोई तकलीफ है और न ही पूंजीवाद से। ये संयोग नहीं कि ‘जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है’ का नारा देने वाली बीएसपी अब उसे याद भी नहीं करना चाहती। वे उदारवाद या बाजारवादी अर्थव्यवस्था की वैसी ही समर्थक हैं जैसा मनमोहन, आडवाणी या कोई और। वैसे भी इसी व्यवस्था को थोड़े किंतु, परंतु के साथ समर्थन देकर अगर साढ़े चार साल तक वामपंथी सरकार चला सकते हैं तो फिर मायावती से भला क्या खतरा हो सकता है।
कुछ लोगों की ये भी शिकायत है कि मायावती लोगों से काफी दूरी बनाकर रखती हैं। यहां तक कि पत्रकारों को भी जल्दी समय नहीं देतीं। पर देश के जितने बड़े नेता हैं उन सबके साथ कमोबेश ऐसा ही है। सभी के इर्दगिर्द एक कोटरी है जिसकी कृपा से ही आप उन तक पहुंच सकते हैं। याद कीजिए, कुछ दिन पहले दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी के घर के बाहर हुआ तमाम पत्रकारों का हंगामा। वजह ये थी कि आडवाणी ने घरेलू समारोह में चुनिंदा पत्रकारों को ही न्यौता था। हो सकता है कि मायावती इस मामले में दूसरों से बीस हों, पर क्या इसी वजह से वे प्रधानमंत्री पद के अयोग्य हो जाती हैं?
अब थोड़ा उन बातों पर भी विचार कर लिया जाए जिसके लिए मायावती की तारीफ की जा सकती है। वे अकेली नेता हैं जिनकी वजह से करोड़ों दलितों में लोकतंत्र पर विश्वास जगा है। जो न कभी मायावती से मिले, न उन्हें देखा, फिर भी इस नाम पर वे आंख मूंद कर विश्वास करते हैं। उन्हें यकीन हुआ है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के हाथ में सत्ता की लगाम आ सकती है। दलित शीर्ष पर पहुंच सकता है। सदियों से सताए गए दलितों के अंदर ऐसा विश्वास भरना वाकई ऐतिहासिक काम है। फिर मायावती प्रधानमंत्री तभी बनेंगी जब सांसदों का गणित उनके पक्ष में हो। तराजू उनके पक्ष में भी वैसे ही झुक सकता है जैसे देवगौड़ा या गुजराल के पक्ष में झुका था। फिर, मायावती से डरने का मतलब क्या है। क्या इस वजह से कि उनकी शक्ल-सूरत ऐसी नहीं है जो किस्से-कहानी के राजा-रानियों की होती है। ये सही है कि टी.वी.पर उनके चेहरे में वैसा रक्ताभ सम्मोहन नहीं दिखता जैसा गांधियों या आडवाणियों में है, पर ओबामा पर बलिहारी जाने वालों को इससे तकलीफ क्यों नहीं होनी चाहिए। मायावती उसी रूप रंग की हैं जो इस देश के नब्बे फीसदी लोगों को मिला है। और इसके लिए वे बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं हैं। कुरूप समझे जाने वाले मलिक मोहम्मद जायसी बहुत पहले लिख गए हैं.-“मोपे हंस्यो या हंस्यो कुम्हारा” (मुझ पे हंस रहे हो या कुम्हार पर जिसने मुझे रचा है यानी भगवान)।
तो क्या मायावती प्रधानमंत्री पद के सर्वाधिक योग्य हैं। कतई नहीं। वे उतनी ही योग्य या अयोग्य हैं जितना कोई गांधी, आडवाणी, वाजपेयी या यादव है। न कम न ज्यादा। मायावती समेत सभी इस व्यवस्था को बनाए रखने के हामी हैं। इसलिए मायावती को वही खारिज करे जो इस व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था का सपना देखता हो। जिसके पास कोई बड़ी लकीर खींचने का खाका हो। वरना माना जाएगा कि ‘मायावती विरोध’ दिमाग में जड़ जमाए बैठे ब्राह्मणवाद (ब्राह्मण नहीं) की खीज भरी चीख से ज्यादा कुछ नहीं है।