Saturday, May 9, 2009

वापस करो गोली मार दी गई उम्मीदों के मेरे चीथड़े



२९ जून १९२२ को जन्मे सर्बियाई कवि वास्को पोपा (मृत्यु ५ जनवरी १९९१) दूसरे विश्वयुद्ध के बाद साहित्य में आये प्रगतिशील यथार्थवाद से कहीं अधिक सर्रियलिज़्म और सर्बियाई लोक-परम्पराओं से प्रभावित रहे. पोपा के कुछ अनुवाद 'नन्हीं डिबिया' (वाणी प्रकाशन १९८८) के नाम से ख्यात अनुवादक श्री सोमदत्त ने किये थे.

पोपा की कविताओं पर एक कोलाज मैंने कुछ समय से सम्हाला हुआ था. आयरिश-फ़्रांसीसी मूल के कवि-अनुवादक एन्थनी वाईर द्वारा पोपा की अपेक्षाकृत नई कविताओं से बना यह कोलाज कुल ग्यारह कविताओं और कवितांशों से बना है. कोलाज के अन्त में पोपा को याद करते हुए एन्थनी वाईर एक छोटी कविता में कहते हैं:

और सब के अलावा
मैं कौवों को सुनता हूं
और अप्रैल के महीने में खिले
सुर्ख़ लाल जापानी फूलों को निहारता हूं

सर्बियाई दांतों वाला
लम्बा लबादा पहने एक नर्तक
हंसता है
जबकि मैं रियाज़ करता हूं भेड़िये की आवाज़ निकालने का

जो कि कविता है.


कहना न होगा भेड़िये की इमेज समूचे सर्बियाई लोक साहित्य में सबसे सशक्त मानी जाती है. स्लाविक गाथाओं में व्सेलाव नामक एक राजकुमार का ज़िक्र आता है जो कई नगरों में राज्य करता था. रात को वह भेड़िये में बदल जाया करता था. वहीं सर्बियाई देवता दाबोग जो अन्डरवर्ल्ड का बादशाह था, मान्यताओं के मुताबिक भेड़ियों का एक लंगड़ा गड़रिया था. वही संभवतः इस कोलाज में बार-बार अलग अलग रूपों में आता है. स्लोवाक-सर्बियाई लोकसंसार के अधिक विस्तार में जाने की फ़िलहाल मेरी कोई मंशा नहीं लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि कविता और ख़ासतौर पर बड़ी कविता आमतौर पर अपने आप से बाहर होती है और वहीं उसे खोजा जाना होता है. और यह कार्य थोड़ा श्रम और अध्ययन तो मांगता ही है.

प्रस्तुत है एन्थनी वाईर के कोलाज 'भेड़ियों का गड़रिया' का अनुवाद. मुझे पता है कि एक ही पोस्ट में एक साथ ग्यारह कविताएं या उनके टुकड़े लगाना कई मित्रों को नागवार भी गुज़र सकता है पर इसे दो या अधिक पोस्ट्स में लगाना रचना के साथ अन्याय हो जाएगा.

भेड़ियों का गड़रिया



१. इसके पहले कि तुम खेलना शुरू करो

अपनी एक आंख बन्द करो.
झांक कर देखो अपने भीतर
देखो हरेक कोने में
सुनिश्चित कर लो कि वहां न कोई नाख़ून हों, न चोर
न गौरैया के अण्डे

फिर बन्द करो अपनी दूसरी आंख भी
थोड़ा झुको और छलांग लगाओ
छलांग लहाओ ऊंचे, ऊंचे, ऊंचे
जब तक कि ख़ुद अपने से ऊपर न पहुंच जाओ

तब तुम्हारा भार तुम्हें नीचे घसीटेगा
तुम दिनों तक नीचे गिरते जाओगे नीचे
अपने पाताल की तली तक

अगर तुम चकनाचूर न हो चुके हो
अब भी अगर बचे हो एकमुश्त और खड़े हो सकते हो एकमुश्त
तो शुरू कर सकते हो खेलना.

२. घर

पहले झूठे सूरज के साथ
हमसे मिलने आया एगिम
प्रिश्तीना के नज़दीक रहने वाला वह लकड़हारा.

वह हमारे वास्ते लाया था दो लाल सेब
स्कार्फ़ में तहाए हुए
और एक समाचार कि आख़िरकार उसका भी एक घर है अब.

आख़िरकार तुम्हारे ऊपर भी एक छत है अब, एगिम.

न, छत नहीं
हवा उड़ा ले गई उसे

तो तुम्हारे पास दरवाज़े और खिड़कियां हैं.

न दरवाज़े हैं न खिड़कियां
जाड़े ले गए उन्हें दूर अपने साथ

चार दीवारें तो हैं न कम से कम
मेरे पास चार दीवारें भी नहीं
जैसा मैंने कहा मेरे पास एक घर के अलावा कुछ नहीं

बाक़ी सब तो बहुत आसान होता है.

(एगिम: एक अल्बानियाई नाम जिसका अर्थ होता है भोर. प्रिश्तीना: कोसोवो में एक जगह)

३. पागल प्रस्थान

उन्होंने मुझे यह कहकर डराना शुरू किया
कि मेरे दिमाग का एक पुर्ज़ा ढीला है

उन्हें मुझे और डराया यह कहकर
कि वे मुझे दफ़ना देंगे
ढीले पुर्ज़ों वाले एक बक्से में

वे मुझे डराते हैं लेकिन उनकी समझ में नहीं आता
कि असल में मेरे ढीले पुर्ज़ों से
डर लगता है उन्हें

हमारी गली का प्रसन्न पागल
मेरे आगे शेखी बघारता है.

४. रास्को पेत्रोविच की कब्र

गांव में कपड़े धोने वाली एक स्त्री ने सुना
कि मैं होकर कर आया हूं
वॉशिंगटन के रॉक क्रीक कब्रिस्तान में
रास्को की कब्र देखकर

वह बोली पुराने देश के अपने मृतकों के वास्ते
मैं हर उत्सव के दौरान
केक बनाती हूं
और मोमबत्तियां जलाती हूं

और उन इंडियन आदिवासियों के लिए भी
क्योंकि मेरे पड़ोसी बताते हैं कि
उनका कब्रिस्तान हुआ करता था
इन मकानों के ठीक नीचे

और अब मैं उस सर्बियाई कवि के लिए भी
सारे ज़रूरी जतन करूंगी

उसका कोई नहीं हैं यहां.

५. पुरखों के गांव में

एक मुझे गले लगाता है
एक देखता है मुझे भेड़िये सी निगाहों से
एक अपना हैट उतारता है
ताकि मैं उसे ठीक से देख सकूं

उनमें से हर एक पूछता है
जानते हो मैं कौन हूं.

अजनबी पुरुष और स्त्रियां
उन लड़के-लड़कियों के नाम
धारण कर लेते हैं जो दफ़्न हैं मेरी स्मृति में

और मैं उनमें से एक से पूछता हूं
मुझे बतलाइये सम्मानित महोदय
क्या जॉर्ज वोल अब भी ज़िन्दा है

मैं हूं जॉर्ज, वह उत्तर देता है
किसी दूसरे संसार की आवाज़ में

मैं उसका गाल सहलाता हूं हाथों से
और आंखों से उससे याचना करता हूं
कि मुझे बताए क्या मैं भी ज़िन्दा बचा हूं.

६.

निकल जाओ चहारदीवारों से घिरे मेरे अनन्त से
मेरे सिर के गिर्द सितारों वाले गोले से
मुंह में भरे मेरे सूरज से
मेरे रक्त के भीतर के हास्यास्पद समुन्दर से
मेरे बहाव से, मेरे उतार से
समुद्रतट जैसी मेरी ख़ामोशी से
मैंने कहा न, निकल जाओ
मेरे जीवन की खोह से
मेरे भीतर के निर्वसन पितृ-वृक्ष से
निकल जाओ, मुझे कब तक चीखना पड़ेगा निकल जाओ
निकल जाओ मेरे फटते सिर से
निकल जाओ
निकल जाओ बस!

७.

एक क्षितिज से दूसरे तक पसरे इस्पाती जबड़ों वाली
मादा भेड़िये को वे फंसा लेते हैं

वे उसकी थूथन से निकाल लेते हैं सुनहरा नकाब
और उसकी टांगों के बीच से
उखाड़ डालते हैं गुप्त घास को

वे उसे बांध देते हैं
और श्डिकारी कुत्तों को लगा देते हैं
उसकी इज़्ज़त के पीछे

वे उसके टुकड़े कर देते हैं
और छोड़ देते हैं
गिद्धों के वास्ते

बादलों के जबड़ों से ज़िन्दा पानी को पकड़ लेती है वह
अपनी जीभ के ठूंठ की मदद से
और इकठ्ठा करती है अपने को दोबारा से

८. छोटे डिब्बे के क़ैदी

खुलो छोटे डिब्बे!

हम चूम रहे हैं तुम्हारा तला और तुम्हारा ढक्कन
तुम्हारी चाभी और उसका छेद
सारा संसार अट गया है तुम्हारे भीतर
और अब यह दिखता है
जैसा है ही नहीं
शान्ति, इसकी अपनी माता
भी नहीं पहचान सकती अब इसे
ज़ंग तुम्हारी चाभी को खा जाएगी
फिर हमारे संसार को और हमें
और आख़िर में तुम्हें भी
हम तुम्हारी चारों सतहों को चूम रहे हैं
और तुम्हारी चौबीस कीलों को
और उस सब को जो तुम्हारे पास है

खुलो न छोटे डिब्बे!

९.

वापस करो मेरे चीथड़े
विशुद्ध स्वप्नों के मेरे चीथड़े
रेशम मुस्कान के
धारीदार अपशकुनों के
मेरे लेसदार कपड़े के
चकत्तेदार उम्मीदों के मेरे चीथड़े
गोली मार दी गई उम्मीदों के
खानेदार नक्श के
मेरे चेहरे की त्वचा के
वापस करो मेरे चीथड़े
इतने अच्छे से मांग रहा हूं, वापस करो!

१०.

लंगड़ा भेड़िया घूमता है संसार में
एक पंजा नापता है आसमान
दूसरा धरती
वह पीछे की तरफ़ चलता है
पंजों के पुराने निशान मिटाता हुआ
वह चलता है आधा अन्धा
उसकी आंखें भयानक लाल
मरे सितारों और जीवित परजीवियों से भरी
वह चलता है और उसकी गरदन पर
जबरन बंध दिया गया है चक्की का पाट
टिन का एक पुराना डिब्बा बंधा हुआ उसकी पूंछ पर
वह चलता है बिना थमे
कुत्तों के सिरों से बने एक वृत्त से
दूसरे में
वह चलता है बारह मुंह वाले सूर्य के साथ
एक जीभ के सहारे जो लटकी हुई ज़मीन की तरफ़.

११. ईश्वर से नफ़रत करने वाला एक सुन्दर आदमी

स्थानीय शराबख़ाने का एक पुराना ग्राहक
अपनी ख़ाली आस्तीन लहराता है
अपनी अनुशासनहीन दाढ़ी में से बुरा भला कहता है
हमने दफ़ना दिया है देवताओं को
और अब बारी आई है पुतलों की
जो खेल रहे हैं देवताओं से.

तम्बाकू के बादलों में छुप गया है पुराना ग्राहक
चमकता हुआ अपने शब्दों से
बांज के किसी पुराने पेड़ के तने से तराशा हुआ
वह किसी देवता की तरह सुन्दर है
जिसे हाल ही में आसपास खोद निकाला गया हो.

हुआ नहीं है, बस होने ही को है अन्धेरा



बॉब डिलन के तीसवें अल्बम 'टाइम आउट ऑफ़ माइन्ड' (१९९७) का गीत 'नॉट डार्क येट' अपने गहरे राजनैतिक अर्थों की वजह से मुझे हमेशा बहुत आकर्षित करता रहा है और डराता भी रहा है. एक -दो दिन पहले ही पंकज श्रीवास्तव और अनिल यादव ने एक ही समय में सुन्न कर देने और थर्रा देने वाली दो पोस्ट्स गंगा और भारतीय राजनीति को लेकर लगाई हैं. दोनों को एकाधिक बार पढ़कर मैं यह गाना लगाने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूं.

Bob Dylan - Not Dark Yet
Found at bee mp3 search engine


Shadows are falling and I've been here all day
It's too hot to sleep and time is running away
Feel like my soul has turned into steel
I've still got the scars that the sun didn't heal
There's not even room enough to be anywhere
It's not dark yet, but it's getting there

Well my sense of humanity has gone down the drain
Behind every beautiful thing there's been some kind of pain
She wrote me a letter and she wrote it so kind
She put down in writing what was in her mind
I just don't see why I should even care
It's not dark yet, but it's getting there

Well, I've been to London and I've been to gay Paree
I've followed the river and I got to the sea
I've been down on the bottom of a world full of lies
I ain't looking for nothing in anyone's eyes
Sometimes my burden is more than I can bear
It's not dark yet, but it's getting there

I was born here and I'll die here against my will
I know it looks like I'm moving, but I'm standing still
Every nerve in my body is so vacant and numb
I can't even remember what it was I came here to get away from
Don't even hear a murmur of a prayer
It's not dark yet, but it's getting there.

Thursday, May 7, 2009

हाय सदानीरा, खाओ खीरा, वाटर बना रहेगा


बेशुमार गंदगी। कूड़ा-कतवार, गदहे, कुत्ते, गायें और आदमी की भी लाश...ऐन सामने, कई दिन से सड़ती हुई। पानी की लहरों से उसके चीथड़े कट-कट कर बह रहे हैं।
शून्य में अटकी आंखों वाले बदहवास लगते (होते नहीं) कपड़े और चप्पल किसी की निगरानी में देकर आते हैं। कुछ बुदबुदाते हुए कूड़ा और लाशों के चीथड़े ठेल कर कोई ढाई-तीन फीट का गोल दायरा बनाते हैं। फिर पांच डुबकियां। बाहर निकल कर घंटे-घड़ियाल के शोर के बीच ढेरों रस्में फिर दबा के कचौड़ी-जलेबी और घर की ओर प्रस्थान।
उनकी कल्पना में यह बात, किसी भी तरह समाती ही नहीं कि वे गंगा के लिए कुछ कर सकते हैं। कुछ करना चाहिए।
वे एक अदृश्य मोक्षदायिनी नदी में नहाते हैं जो स्मृति में बहती है। जिसका सचमुच कोई अस्तित्व नहीं है।
भगीरथ तपस्या कर रहे हैं, साठ करोड़ पुरखे कोढ़ियों की तरह कुलबुलाते हुए मोक्ष की याचना कर रहे हैं। शिव की जटा में, चंद्रमा से सट कर पानी की धवल धार खेलती है और मोक्ष देने के लिए बह निकलती है।
वे गंगा से सिर्फ लेना जानते हैं, देना नहीं। देने की तो सोच भी नहीं सकते। कल्पना में ही नहीं समाती यह बात।
कल हर शहर में बहते सबसे उपेक्षित और गंदे नाले को गंगा बताया जाएगा और लोग उसमें अटूट श्रद्धा से बुदबुदाती आभा वाले अपने चेहरे गोत देंगे। हर-हर गंगे। कल्याण करो मां।
यह गंगा है। ये उसके घाट हैं। यह अपना शहर है। यह अपना कस्बा है। यह अपना सूबा है। यह अपना देश है। यह हमारा समाज है। यह सबकुछ सचमुच है और हम इसी के हिस्से हैं। हम चाहें तो इसमें हस्तक्षेप कर हालत को बदल सकते हैं। ये फर्जी बातें हैं। ऐसा भला संभव है क्या। ये सब कहीं कुछ नहीं है। हम भी नहीं है। सब माया है। माया में बड़ा मजा है। सब लूट रहे हैं हमारे हिस्से भी थोड़ा सा। क्या हर्ज है। ईश्वर हमारा भी है। जैसे उसने औरों को हरामीपन की छूट दे रखी है हमें भी दे। नहीं देता तो काना है। एक आंख देखता है। बीच-बीच में देखता है। जरा दयालु है। उसी की कृपा से यह जीवन चल रहा है।
औसत भारतवासी एक ईश्वर के रचे अमूर्त (उसके लिए प्रत्यक्ष) लोक में रहता है जहां वह सिर्फ आदेश ग्रहण कर सकता है, कहीं हस्तक्षेप नहीं कर सकता। उसके आत्मविश्वास को बुरी तरह कुचल दिया गया है, ये सपने ही उसे कुछ करने की पीड़ा से मुक्ति देकर, ईश्वर की कुटिल-स्नेहिल छांव में सुलाए रखते हैं। यही जादई यथार्थवाद है कि आदमी यहां रहते हुए भी यहां और यहां का नहीं है।
Now, the bark has dogged
Now, the sing kas cocked
Now, have chimed the great rings belled
And the bray has donkeyed
And the screech has birded
And the grunt has pigged
I grief you my window
Songs onto your intimacy.

... That is the journey in to an Indian mind.
पंकू, ऐसे में कहां गंगा, कहां रंगा, कहा बिल्ला, कहां चिल्ला, कहां पोहा, कहां कबाब, कहां मालपुआ, कहां भाई मोख्तार, कहां मायावती बुआ, जीमो हलुआ सोहन, बिना चुनाव लड़े पीएम अपना मनमोहन। शस्यश्यामला हरी गोली को नमन।

काशी, गंगा और मुख्तार

एक विवाह समारोह में शामिल होने काशी गया था। रास्ते में इलाहाबाद पड़ा। वहां शास्त्री ब्रिज से गुजरते हुए गंगा का हाल देखा तो दिल धक से रह गया। मुख्य शहर के किनारे को छोड़, किलोमीटर भर फैली रेत के बाद झूंसी के करीब गंदले पानी की किसी छोटी नहर जैसी लग रही थी गंगा। संगम से महज कुछ फर्लांग पहले का ये हाल था। इसी शहर में मेरा दूसरा जन्म हुआ था। संगम में सरस्वती के लोप की भरपाई जिस विश्वविद्यालय ने की थी, उसी गुरुकुल में दुनिया को देखने की नई दृष्टि मिली थी। गंगा के किनारे रसूलाबाद घाट पर बरसों बिताए थे। महादेवी के साहित्कार संसद वाले टीले के नीचे, चंद्रशेखर आजाद की समाधिस्थल के पास रात को एक-दो बजे मित्रों के साथ भूतों को चिल्ला-चिल्लाकर बुलाने का खेल खेला था। पास ही चिताएं सुलगा करतीं थीं, पर कभी डर नहीं लगा, जैसे बच्चे मां के करीब होने से नहीं डरते। उस गंगा का हाल देखकर दिल डूब सा गया।

पर बनारस पहुंचकर इस जख्म को और भी गहरा होना था। रामनगर से राजघाट तक बीच गंगा में जगह-जगह टापू नजर आ रहे थे। भविष्य का भयावह संकेत! कुछ दिन पहले ही पढ़ा था कि गंगा अधिक से अधिक 25 बरस की मेहमान है। तो क्या लुप्त हो जाएगी गंगा! फिर कैसी होगी उत्तराखंड से लेकर बंगाल तक की भूमि! कैसे बचेगा पहाड़ का हरापन, कैसे होगी खेती, कैसे चलेगा जीवन। क्या फतेहपुर सीकरी की तरह दिल्ली भी उजड़ जाएगी जिसे पानी देने के लिए टेहरी नाम का शहर कुर्बान कर दिया गया। गाजियाबाद से लेकर कोलकाता तक उग रहे कंक्रीट के जंगलों में क्या सियार हुँआं-हुँआ करेंगे? इन्हीं के लिए लोग बैंकों से लाखों का कर्ज लेकर ईएमआईग्रस्त हो रहे हैं!

कहते हैं कि ये सब ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है। पर ये वार्मिंग किसी देवता का श्राप तो नहीं। हिमालय के ग्लेशिय़रों का पिघलना हमारे ही (कु)कर्मों का फल है। हजारों साल से मनुष्य और गंगा में मां-बेटे का संबंध बना रहा। पर औद्योगिक विकास के बमुश्किल सौ साला सफर ने इस मां को बेटों के हाथ जहर दिला दिया। दुर्भाग्य ये है कि इस मुद्दे पर सोचने की किसी को फुर्सत नहीं। लोकसभा चुनाव में चाहे जितनी बातें हुई हों, गंगा मुद्दा नहीं रही। न पार्टियों के लिए, न लोगों के लिए। भूले भटके किसी ने नाम लिया भी होगा तो गंगा की गंदगी का। अरे, क्या साफ करोगे? पानी या रेत!.

संवेदनहीनता या कहें बेजारी का ये आलम ही इस चुनाव की मुख्य धारा है। आखिर पचास फीसदी से ज्यादा लोगों ने वोट न देकर और क्या साबित किया है। न उन्हें प्रत्याशी वोट देने के लिए प्रेरित कर पा रहे हैं और न पार्टियां। वोट दे दिया तो भी ठीक, न दिया तो भी। एक सघन स्वप्नहीनता चहुंओर।

बहरहाल, काशी में था तो पप्पू की चाय की दुकान पर पहुंचना ही था। गंगा का हाल हो या चुनाव का गणित, अपनी समझ के कील-कांटे दुरुस्त करने के लिए इससे बढ़िया जगह कोई नहीं। अस्सी मुहल्ले की इस दुकान के बारे में हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं। काशीनाथ सिंह ने अपने संस्मरणों से इसे अमर कर दिया है। उनके तमाम पात्र वहां मंडराते रहते हैं और पप्पू की वायु विमोचनी चाय के साथ देश दुनिया पर बहस करते हैं। नींबू की इस चाय में हाजमोला भी पीस कर डाला जाता है जिससे वात से राहत मिल जाती है और चर्चा में रस घुलता रहता है। वैसे, भट्ठी के करीब ही शिवजी की बूटी भी सहज उपलब्ध रहती है।

चर्चा चुनाव की हो रही थी। बनारस में 30 अप्रैल को मतदान हो चुका था। सत्तारूढ़ बीएसपी के उम्मीदवार मुख्तार अंसारी और बीजेपी की त्रिमूर्ति में से एक डा.मुरली मनोहर जोशी के बीच मुकाबला माना जा रहा है। मुख्तार पूर्वांचल का बाहुबली है और इस समय जेल में है। उस पर हत्या, डकैती जैसे कितने ही संगीन मुकदमे दर्ज हैं। और अस्सी पर चर्चा थी कि डा.जोशी फंस गए हैं। मुख्तार अंसारी जीत सकता है। वजह? मैंने भी पूछा। जवाब अलग-अलग कोण से अलग-अलग लोगों ने दिया। सुनिए (पढ़िए)

सवाल--इतना बड़ा माफिया, वोट कैसे मिला होगा?

जवाब--अरे वो सब बड़े लोगों की लड़ाई है। ठेका लेने की, ठसक बनाने की। मरता-मारता तो वही है, जो इसमें पड़ता है। आम लोगों को क्या मतलब।

सवाल--अरे,लेकिन काशी है, सर्विवद्या की राजधानी। यहां से मुख्तार सांसद होगा! अखबारों और चैनलों से रोज ही अपील की जा रही है कि बाहुबलियों को हराइये। क्या असर नहीं होगा?

जवाब-- अरे, डा.जोशी की पार्टी ने दंगे कराके जितने मरवाए हैं, उसके सामने तो मुख्तार का अपराध छोटा ही है। फिर किस मीडिया की बात कर रहे हैं आप। यहां बाकायदा पैसे लेकर खबरें छापी जा रही हैं। खुला खेल फर्रुखाबादी। असर क्या पड़ेगा..खाक।

सवाल---लेकिन काशी तो धार्मिक नगरी है। हिंदुओं की आबादी को देखते हुए एक मुस्लिम प्रत्याशी से कैसे नहीं जीतेंगे डा.जोशी?

जवाब--भइया, चुनाव में धरम नहीं, जाति चलती है। सीधा गणित है। मुसलमान और दलितों ने मुख्तार को जमकर वोट दिया। सपा प्रत्याशी अजय राय से कोलअसला क्षेत्र के कुर्मियों का झगड़ा था। वो भी अजय राय को हराने के लिए मुख्तार के समर्थन में आए। करीब साव दो लाख वोट तो सीधे गिन लो।

सवाल--और बाकी..?

जवाब--बाकी क्या। कुल साढ़े छह लाख वोट ही पड़े हैं। एक तिहाई मिल गया तो जीत ही जाएगा मुख्तार। हालांकि दोपहर बाद हिंदू-मुस्लिम भी चलाने की कोशिश हुई, लेकिन कुल 43 फीसदी वोट ही पड़ा। फिर मौजूदा सांसद कांग्रेस के राजेश मिश्र भी खड़े हैं। सपा के अजय राय हैं, वो भी तो कम हिंदू नहीं। फंस गए है डा.जोशी। जीत जाएं तो किस्मत।

मन अभी भी नहीं मान रहा कि मुख्तार काशी से सांसद बनकर दिल्ली की गोल इमारत में पहुंचेगा। पर ऐसा हुआ तो अचरज नहीं होगा। पप्पू की दुकान से मिले ज्ञान ने आंखें कुछ और खोल दी हैं। वहां तमाम बातें और भी हुईं जिन्हें बताने लगूं तो पोथा लिखना पड़ेगा। बहरहाल, कुछ निष्कर्ष पेश हैं--

1. लोग ऐसा प्रतिनिधि नहीं चुनते जो संसद में बैठकर कानून बनाने पर बहस करे। लोग चुनते हैं ऐसे शख्स को जो उन्हें संरक्षण दे। उनके अच्छे-बुरे काम में साथ दे। उनकी पहुंच में हो। जाति-धरम का प्रत्याशी होना अपनापन पैदा करता है।

2.पार्टियों के पास कोई ऐसा सपना नहीं है जो लोगों को आकर्षित कर सके। यानी जाति-धरम को छोटा करने वाली बड़ी रेखा खींच सके। ऐसे में निजी हित ही महत्वपूर्ण है। वो ही जनप्रतिनिधि अच्छा जो विकास योजनाओं के लिए आवंटित सरकारी धन की लूट में हिस्सेदार बनाए। जैसे ठेका वगैरह दिलाए, जो उद्योग विहीन इलाकों का एकमात्र उद्योग है।

3.बीजेपी अगर उत्तर प्रदेश में वोटों की फसल नहीं काट पा रही है तो उसकी वजह किसी धर्मनिरपेक्ष विचार के प्रति लोगों का आग्रह नहीं है। उसकी राह में सबसे बड़ा कांटा निम्न और पिछड़ी जातियां हैं जो बीएसपी, समाजवादी पार्टी, अपना दल, भारतीय समाज पार्टी जैसे दलों के साथ जुड़कर सत्ता में भागीदारी का सपना देखती हैं। बीजेपी उनकी नजर में सवर्ण हिंदुओं की पार्टी है। वर्ण व्यवस्था इस लिहाज से उन लोगों के लिए बूमरैंग साबित हुई है जो वर्ण व्यवस्था को बनाए रखते हुए हिंदुओं की एकता का ख्वाब देखते हैं।

4.लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी मीडिया की साख रसातल मे चली गई है। लोगों की नजर में वो पूंजी का गुलाम है। चुनाव बात हिंदी पट्टी में पत्रकारों की बड़े पैमाने पर पिटाई हो सकती है। पैसा न देने की वजह से अखबारों ने जिनकी खबरों का लगभग बहिष्कार किया वे प्रत्याशी और उनके समर्थक चुनाव बाद बदला लें तो आश्चर्य नहीं। अफसोस की बात ये है कि इस नीति पर कुछ बड़े अखबार भी सीना ठोंककर चले हैं।

5.मतदान के प्रेरित करने के लिए चले राष्ट्रीय अभियान के बावजूद लोगों में वोट देने की खास इच्छा नहीं नजर आई। कभी ट्रेड यूनियन, छात्रसंघ , सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन लोगों का राजनीतिक प्रशिक्षण करते थे। पर जबसे अराजनीतिक होना बेहतर माना जाने लगा है, लोग मतदान के प्रति भी उदासीन हो गए हैं। पप्पू की दुकान पर ऐसे लोग भी मिले जो मुख्तार के खिलाफ थे, लेकिन डा.जोशी की राजनीति को भी खतरनाक मानते थे। उनके सामने कोई विकल्प नहीं था। लिहाजा घर बैठ गए।

इस पाठ को पढ़कर मैं पप्पू की दुकान से वापस आ गया। लेकिन एक बार देर तक सालती रही कि गंगा के किनारे बहसबाजी के इस अड्डे पर गंगा की दुर्दशा का सवाल एक बार भी नहीं उठा। काशी में गंगा के घाट, मंदिर, शमशान आदि एक अर्थव्यवस्था भी रचते हैं। लाखों लोगों का पेट भरता है। लेकिन गंगा का हाल चुनावी मुद्दा नहीं बनता। आस्था जबरदस्त है और आंखे बंद। ऐसा लगता है कि गंगा हमारी हवस का शिकार हुई है। हम सब गंगा के हत्यारे हैं और एक हत्यारे समाज में गंगा को क्यों बहना चाहिए। भूपेन हजारिका का ताना उसने दिल पर ले लिया है--


विस्तार है अपार, प्रजा दोनो पार,

करे हाहाकार, नि:शब्द सदा

ओ गंगा तुम, बहती हो क्यों.......?

अनपढ़ जन, अक्षर हीन,

अनगिन जन खाद्यविहीन

नेतृत्व विहीन देख मौन हो क्यों?

ओ गंगा तुम बहती हो क्यों......?


जिस समाज को गंगा के लुप्त होने का दर्द नहीं, उसे मुख्तार जैसा प्रतिनिधि मिले तो बुरा क्या है। ये तो प्राकृतिक न्याय है।

राहुल तुम सचमुच 'राहुल बाबा' हो!

राहुल गांधी की इस समय प्रेस कांफ्रेंस सीरीज दरअसल कांग्रेस के चंद चापलूस नेताओं की वेवकूफी है. सरकार के पांच सालों के बीच इस तरह की कान्फ्रेंसें चला करती हैं. यह आगे हो सकती थी. उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की तारीफ़ की, नितीश की शान में कसीदे काढ़े, जयललिता को महान बताया. ये सभी कांग्रेस के विरोधी लोग हैं और एनडीए का हिस्सा रहे हैं; अथवा हैं. चुनाव बाद गठबंधन की मजबूरी समझ में आती है लेकिन चुनाव के बीच इस तरह की बातों से यूपीए के सहयोगी माने जाने वाले लालू, पासवान, करूणानिधि और मुलायम छिटक नहीं जायेंगे?

जैसे मैंने भाजपा के 'भय हो' का शव परीक्षण डंके की चोट पर किया उसके बाद वह विज्ञापन बंद हो गया. उसी तरह राहुल गांधी और उनके अशुभचिंतकों को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि बड़े से बड़े और बहुत भावनात्मक लगनेवाले मुद्दे पर वह चुनाव पूरा होने तक इस तरह की वकवास नहीं करेंगे. हालांकि अब बहुत देर हो चुकी है.

७ मई के मतदान में फंसी ८५ सीटों पर यूपीए ने अगर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो चुनाव बाद कांग्रेस को पता नहीं किसका-किसका दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा. राहुल गांधी ने यह काम चुनाव से पहले करके बहुत गलत संकेत दे दिया है.

देखने की बात यह भी है कि राहुल की इस असमय हुई महान प्रेस कांफ्रेंस के बाद अब यूपीए कितना बचेगा! राहुल ने कुल्हाड़ी पर पाँव दे मारा है. राहुल तुम सचमुच 'राहुल बाबा' ही हो!

Wednesday, May 6, 2009

जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा

जिन चीजों ने 'बरबाद' करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है उनमें से एक इब्ने इंशा (१९२७-१९७८) की शायरी भी है. इंशा खुद कहते हैं - 'एक जरा से किस्से को अब देते क्या हो तूल मियाँ ' इसलिए लिखत - पढ़त ज्यादा नहीं !

जब शायरी के पक्षी को संगीत के पंख मिल जायें तो क्या कहने ! आइए सुनते हैं इंशा साहब की एक कालजयी रचना - स्वर है आबिदा परवीन का -

कल चौदहवीं की रात थी, शब-भर रहा चर्चा तेरा.
कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

हम भी वहीं मौजूद थे, हमसे भी सब पूछा किये,
हम हँस दिये, हम चुप रहे, मंज़ूर था पर्दा तेरा।

इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटीं महफ़िलें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।

कूचे को तेरे छोड कर जोगी ही बन जायें मगर,
जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा।

बेदर्द सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा , रुस्वा तेरा, शाइर तेरा 'इंशा' तेरा।




(मन करे तो इंशा और आबिदा को यहाँ भी सुन सकते हैं. चाँद की तस्वीर इंटरनेट से, गूगल बाबा की जय )

Tuesday, May 5, 2009

चप्पल पर भात

चप्पल पर भात

-वीरेन डंगवाल

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क़िस्सा यों हुआ
कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण
गिर गए थे
जो जल्दबाज़ी में दिखे नहीं.

फिर तो काफ़ी देर
तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट
चढ़ी रहीं
तमाम महान चिन्ताएं.

Monday, May 4, 2009

साथियो, बेटे का नाम रख दिया गया है

बात निजी है लेकिन फिर आसमान किसलिए है?... और मेरा निजी है ही क्या?
(गलाफाड़ आवाज़ में) साथियो, बेटे का नाम रख दिया गया है. ४ मई को वह २ माह का हो गया.

बेटी का नाम रखते समय मैंने ज्ञानरंजन जी से पूछा था. उन्होंने अपनी शैली में (जो लोग उनकी इस अद्भुत अदा को जानते हैं; उनके लिए) कहा था- 'विजय, जल्दी से बिटिया का कोई प्यारा-सा नाम रख लो वरना तरह-तरह के नाम चलने लगते हैं.'

उन्हीं दिनों कवि निलय उपाध्याय मुंबई आये थे. आजाद मैदान (तबके वीटी स्टेशन के सामने) की घास पर हम लोग लगभग लेटे हुए थे. चर्चा फंसी तो उन्होंने कहा कि उनके मन में एक नाम है अगर मैं पसंद करुँ! उन्होंने नाम सुझाया 'उदिता'. मैंने उनका शुक्रिया अदा करते हुए फ़ौरन स्वीकार कर लिया क्योंकि यह शमशेर जी की एक कविता और आगे को संग्रह का शीर्षक था. ख़ैर, वह आज से 14 वर्ष पहले की बात है.

गुजिस्ता २९ अप्रैल को मैं जबलपुर में था. वहाँ एक आत्मीय कार्यक्रम के दौरान नामकरण समारोह संपन्न हुआ. वहाँ भी नाम रखे जाने को लेकर बड़ी हील-हुज्जत हुई. आखिरकार मैं रूठ गया. चूँकि मामला दामाद जी का था इसलिए मेरी ही चली और मैंने नाम रखा- 'विश्वप्रिय'.

यह नाम सुनते ही करीब ४-५ सौ लोग मुझे बधाई देने दौड़ पड़े. ये सब मेरे ससुर जी के सहकर्मी, अफसरान, व्यौहारीजन, संबंधीजन थे. बड़ा जंका-मंका था.

पता चला कि प्रियजन मेरा रूठना देखना चाहते थे (शादी में दामाद जी घड़ी तक के लिए नहीं रूठे थे; कलेऊ में हमने चीलगाड़ी यानी हवाई जहाज माँगा था; वरना उन्होंने तो पहले ही तय कर रखा था कि नामकरण दामाद जी ही करेंगे और जो नाम वह रखेंगे वह सबको स्वीकार्य होगा).यह बाद को जाहिर हुआ. अब लो, सभी विश्वप्रिय बोलने का अभ्यास कर रहे हैं. उनकी सुविधा के लिए मैंने लाड़ का नाम 'विशु' रख दिया है.

उम्मीद ही नहीं यकीन है कि 'विश्वप्रिय' कबाड़ियों और अन्य आत्मीयों को पसंद आयेगा. आप सबके शुभासीष का एक अर्थ होगा.

ख़ता मु'आफ: टिप्पणियों में से एक टिप्पणी शिरीष के प्रसंग में मुझे बहुत नागवार गुज़री है उसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं. लोग चाहते हैं कि यह ब्लॉग भी उनकी तरह हो जाए! मुझपे अनेक वार करके अपना ब्लॉग कितने लोगों ने चमका लिया यह कोई छिपी बात नहीं. कृपया इस महत्वपूर्ण ब्लॉग को भाजपा की तरह दुष्प्रचार (हिटलर का सूक्त) करके अनर्गल न बनाएं. मेरे दादा जी कहते थे 'ह्वा परोसिन हमरी साही.'

शिरीष को मैं एक कवि के रूप में जानता हूँ. 'कबाड़खाना' से वह तभी हटेंगे जब वह कोई निजी कारण देंगे. अन्यथा शिरीष हम सबके चहेते हैं. वह कोई बटमारी या डाकाजनी नहीं करते. वह शब्दों की साधना में तल्लीन है. उन्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं.

...अब एक बात शिरीष के लिए, मुनीष की टिप्पणी में ऐसा कुछ भी नहीं था कि इतना बड़ा निर्णय लिया जाए. या तो आप उस समय उद्विग्न थे या कोई और कारण होगा. बहस की बात तो मैं कर सकता हूँ. लेकिन नशे में भी मैं कभी 'कबाड़खाना' से अलग होने की बात नहीं सोच पाया. इस ब्लॉग से जुड़कर कोई किसी पर अहसान नहीं कर रहा है. अशोक भाई पर तो हरगिज नहीं. एक सदस्य होने के नाते मैं फिर कहता हूँ कि मुनीष की टिप्पणी शिरीष आप फिर पढ़ें. और कोई वजह होने का अंदेशा शायद इसलिए नहीं है कि उसकी बाकायदा वजह आपने पोस्ट के तौर पर स्पष्ट छापी है... जो कहीं से कोई छोटी-मोटी वजह भी नहीं लगती. बहरहाल...

गाना नहीं सुन पा रहा हूँ!

देह महजिद मन मौलाना: कुमार गन्धर्व की आवाज़ में सन्त नामदेव का भजन


कल सिद्धेश्वर बाबू ने शुभा मुद्‌गल की मधुर वाणी में कबीरदास जी का एक भजन सुनवाया था. मैं चाहता था इसी श्रृंखला को जारी रखता हुआ कबीरदास जी का हॊ कोई और भजन आपको सुनवाऊं.

फिर जमा किये गए कबाड़ में खोजते बीनते निगाह एक भजन पर अटक गई. सो पहले वाला निश्चय बरकरार रखते हुए भी मैं पहले इसे पोस्ट कर पाने के लालच से नहीं बच सका.

सुनिये पंडित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में सन्त नामदेव का भजन "आव कलन्दर केशवा".



यहां से डाउनलोड करें: आव कलन्दर केशवा

(पंडितजी का चित्र: अनवर हुसैन की कलाकृति)

Sunday, May 3, 2009

सुर तैंतीसों कौतिग आए

बचपन से ही कबीर की रचनाओं को पढ़ने - सुनने का क्रम जारी है और हमेशा लगता रहा है कि 'मसि कागद' न छूने वाला यह इंसान आम भाषा में कितना सटीक और हर लिहाज से मौजूं अभिव्यक्तियाँ कर गया है कि कुछ कहते नहीं बनता। कबीर और उनकी कविता पर इतना कुछ कहा जा चुका हि कि मेरे कहने का कोई नहीं रह जाता ।
आज कोई टीप-टिप्पणी न करते हुए बस कबीर का यह बहुश्रुत पद सुना जाय-

दुलहिनी गावहु मंगलचार.
हम घर आए हो राजा राम भरतार.

तन रति करि मैं मन रति करिहौं पंचतत्त बाराती
रामदेव मोहे पाहुनैं आए मैं जोबन मैंमाती
सरीर सरवर वेदी करिहौं ब्रह्मा वेद उचारैं
रामदेव संग भाँवर लेहौं धन -धन भाग हमार
दुलहिनी गावहु मंगलचार.

सुर तैंतीसों कौतिग आए मुनिवर सहस अठासी
कहै कबीर हम ब्याहि चले हैं, पुरुष एक अविनासी.....
दुलहिनी गावहु मंगलचार.
हम घर आए हो राजा राम भरतार.



रचना - कबीर
स्वर - शुभा मुदगल

Friday, May 1, 2009

सिकन्दर, जंगली मुर्गी का शिकार और एक नशीली पिकनिक - आखिरी हिस्सा

(पिछली पोस्ट से जारी)

किलबरी से एक किलोमीटर पहले नरदा बुरांश के एक पेड़ की छांह में लधरा हुआ था. पास पहुंचे तो देखा नरदा ने अपना पिठ्ठू तकिये जैसा बनाया हुआ था और बाकायदा ख़र्राटों की बहार छाई पड़ी थी. मैं और लल्तू दाज्यू भी वहीं बैठ गए. ढाई-तीन बज चुका था. हमें जगतदा और राजेशदा का इन्तज़ार करना ही श्रेयस्कर जान पड़ा ताकि आगामी कार्यक्रम को चॉक आउट किया जा सके.

करीब आधे घन्टे बाद खरामा खरामा डोलते, किसी बात पर ठठाकर हंसते दोनों का आगमन हुआ. राजेशदा का पीठ्ठू सबसे बड़ा था और संभवतः सबसे भारी भी क्योंकि ठोस और द्रव दोनों तरह की रसद उसमें लदी हुई थी. उन्होंने बेहोश सोये नरदा को देखा और हंसने के क्रम को जारी रखते हुए नरदा की पिछाड़ी पर लात लगाई. किसी दुस्वप्न से जैसा जागे नरदा ने "अबे इत्ती मत पिया करो सालो!" कहकर हमें हड़काया और चलने की हमारी रफ़्तार का मज़ाक बनाया. नरदा अपना पिठ्ठू थामकर उठने को हुआ तो नीचे बैठता हुआ जगतदा बोला कि किलबरी आ ही गया है ऐसी क्या जल्दी है. राजेशदा से बोतल निकालने को कहा गया और एक-एक शॉर्ट खींचा गया. मुझ नए नए शराबी की आंखें मुंद जैसी रही थीं और दाल-भात खाने की इच्छा हो रही थी. लेकिन मेरे वरिष्ठ साथी उतने ही ऊर्जावान लग रहे थे जैसे वे लगा करते थे.

बुरांश के पेड़ के नीचे दारूवन का निर्माणकार्य पूरा करने के उपरान्त करीब पन्द्रह मिनट में हम किलबरी डाकबंगले के भीतर थे. आलीशान ब्रिटिशकालीन बंगला जिसमें कभी जिम कॉर्बेट तक आकर रहा करते थे आज जगतदा जैसे शिकारी के नेतृत्व में आए कलाग्रस्त शराबियों की सोहबत पाकर अपने को धन्य समझ रहा होगा, ऐसा कुछ कहकर ललतू दाज्यू ने समां बांधने कि कोशिश की. हमने उन्हें बहुत तवक्को नहीं दी और अपने झोले-झिमटे नीचे धरे. चौकीदार ने चाय के बारे में पूछा तो जगतदा ने उसे प्यार से लताड़ा कि गुरू क्या हम यहां चाय पीने आए हैं. पानी, कांच के गिलास वगैरह मंगाए गए और चौकीदार को भुजिया इत्यादि तैयार करने का निर्देश देते हुए इत्तला दी गई कि हम लोग आधे घन्टे के भीतर शिकार पर निकलने वाले हैं. महौल बनाने में उस्तादी रखने वाले लल्तू दाज्यू ने इस बार अपने टू इन वन पर "आए कुछ अब्र कुछ शराब आए" लगाया तो जगतदा बोला कि यार लल्तू बैटरी खत्म हो जाएगी तो रात में दारू कैसे पिएंगे बिना म्यूज़िक के.

सभी ने इस बारे में हामी भरी तो टेप बन्द कर दिया गया. मैं अलबत्ता अब हैरत कर रहा था कि राजेशदा कितनी दारू लाया होगा और अगर शराब रात को पी जाएगी तो अब तक क्या किया गया और क्या किया जाने वाला है.

शिकार पर निकले तो नरदा के और मेरे पैर डगमग करने लगे थे. हमें चुपचाप पीछे आने का निर्देश देकर जगतदा बन्दूक थामे मुर्गियों की टोह ले रहे थे. चार-पांच बजे से करीब साढ़े छह बजे तक उन्होंने तीन जगह मुर्गियां देखकर फ़ायर किये पर कुछेक पंखों को छोड़कर हाथ कुछ नहीं आया. इस बीच राजेशदा और लल्तू दाज्यू ने भी हाथ आजमाए पर कुछ मिला नहीं. हल्का अंधेरा घिरने को हुआ तो जगतदा बोला कि छर्रे बहुत कम बचे हैं और अब डाकबंगले जाने में ही भलाई है. रात को आसानी से मुर्गियां मारी जा सकती हैं ऐसा उन्होंने किसी किताब में पढ़ रखा था.

डाकबंगले पहुंचकर और टुन्न होने की प्रक्रिया में इस बार चौकीदार को भी शरीक किया गया क्योंकि शिकार करने के उपरान्त उसी ने मुर्गियां छीलनी थीं और उन्हें पकाना भी था. चौकीदार अकेला रहता था और मुकेश के गानों का शौकीन था. जगतदा के टू इन वन की बैटरी घुस गई थी और तीन-चार पैग खेंच लेने के बाद चौकीदार ने "एक धनवान की बेटी ने निरधन का दामन छोड़ दिया" की कराहनुमा तान छेड़ी हुई थी.

समय बीतता जा रहा था. रात बाकायदा हो चुकी थी. डाकबंगले में लाइट नहीं थी पर चौकीदार ने दो पैट्रोमैक्स जलाकर अच्छी रोशनी कर दी थी. पहले तो सब ने जगत दा के असफल शिकार अभियान को लेकर उनकी खूब ऐसीतैसी की. जल्द ही महफ़िल अपने उरूज पर आ गई और मेरे वरिष्ठ पथप्रदर्शक ऐसी ऐसी बातों से माहौल को जमाए हुए थे कि भूख अब किसी ब्लैक होल में तब्दील होकर पेट के किसी गुप्त हिस्से में छुप चुकी थी. इन लोगों के अनुभव का संसार इस कदर भरपूर था कि मुझे उनसे ईर्ष्यापूर्ण मोहब्बत हो चुकी थी जो किसी चस्के की तरह आज तरह लगी हुई है.

खा़स 'पीने' के साथ के वास्ते लाया गया सामान अब राजेशदा के थैले से एक एक कर बाहर निकल रहा था. रेडीमेड कवाब, काजू, पिस्ते और पापड़ इत्यादि. इन्हें खाना शुरू किया तो मेरी भूख का दैत्य एक बार फिर बड़ा होना शुरू हो गया. गप्पों के बाद अब गायन का सत्र चालू हुआ. गायन के उपरान्त पुनः गप्पें और फिर वही रिपीट.

चौकीदार अब ऊंघ रहा था और नरदा ने सबको लातें रसीद करना चालू कर दिया था. जगतदा ने मुझसे मेरे अपेक्षाकृत ज़्यादा चुपचुप रहने का सबब पूछा तो मैंने भूख की बात बताई. भूख का नाम लेते ही सबकी भूख जाग गई. घड़ी साढ़े ग्यारह बजा रही थी. शिकार का कार्यक्रम रद्द करने में ही भलाई समझी गई क्योंकि किलबरी के आसपास का जंगल बाघों और भालुओं का घर भी हुआ करता था. चौकीदार को हिलाकर जगाया गया और खाने के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि उसके पास मुठ्ठी भर दाल के अलावा कुछ नहीं. जगतदा ने उससे कहा कि हमारे लाए चावल को मसालों और नमक के साथ उबाल दे. चौकीदार पता नहीं घाघ था या हमारा हितैषी. बोला:"नीचे झोपड़ी में शेरसिंह ने मुर्गे पाले हुए हैं. वो बेच देगा तो साब लोगों की दावत पूरी हो जाएगी."

"चलो" कहकर राजेशदा और जगतदा ने चौकीदार के साथ नीचे शेरसिंह की झोपड़ी का रुख़ किया. करीब बीस मिनट बाद जगतदा पैर बंधा हुआ एक आलीशान और तन्दुरुस्त मुर्गा थामे अन्दर घुसे. "जै हो!" कहते हुए लल्तू दाज्यू ने जगतदा के गले से लिपटकर मुर्गे का मुआयना किया. "बहुत हैल्दी है साला. दो किलो से कम तो मीट क्या ही निकलेगा."

"दो सौ रुपए ले लिये साले ने बेटा. अब कुछ माल तो निकलना ही चाहिये ना!" पीछे से आते राजेशदा बोले.

भोजन आ चुका था, यह तथ्य हमारी भूख को बैकग्राउन्ड में धकेलने को पर्याप्त था. जगतदा अपनी शिकार न कर पाने की शर्म से अभी तक उबर नहीं पाया था ऐसा लगा. उन्होंने और रम खेंची. हाहाहीही का सिलसिला जो फिर चालू हुआ तो समय को जैसे पंख लग गए. जगतदा अपने रंग में आ गया था और नाटकों के अपने डायलॉग्स बोलने लगा था. किसी ज़माने में जगतदा ने सिकन्दर का पार्ट खेला था. वह अक्सर रमातिरेक में इसी पारसी स्टाइल नाटक के अपने संवाद बोला करता था. इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का समय परम्परा से ही सोने से ठीक पहले का नियत था. जगतदा को दारू लग जाने का मतलब यह माना जाता था कि अब कोटा निबट गया और शरीफ़ लोगों की तरह जल्दी से खाना खा कर सो जाने का बखत आ चुका.

सिकन्दर के संवाद बोलते जगतदा अपनी रौ में आ गया था और हम बहुत ज़्यादा लुत्फ़ लूट रहे थे. इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का एक अहम हिस्सा यह होता था कि सामने वालों में से किसी एक ने पोरस बन जाना होता था और हां-हूं की टेक लगाते रहना होती थी. किलबरी के डाकबंगले में यह काम लल्तू दाज्यू ने सम्हाला हुआ था. लेकिन सुबह सात बजे से दारू पीते पीते उनका भूसा भर चुका था और हां-हूं करते किसी क्षण उनकी आंख लग गई.

मैं बीच बीच में एक निगाह उल्टा कर धरे गए पैर बंधे जीवित डिनर की तरफ़ डालकर यह जान गया था कि खाना तो अब कल सुबह ही मिलेगा. मुर्गा इस असुविधापूर्ण पोज़ीशन के बावजूद माहौल का मजा ले रहा लगता था. चौकीदार ने एक नींद निकाल ली थी और आंखें खोले वह यकीन करने का प्रयास कर रहा लगता था कि ये जीवित दैत्य भी इसी धरती के बाशिन्दे हैं.

लल्तू दाज्यू के इस तरह सो चुकने को संभवतः जगतदा ने अपना अपमान समझा और एक निर्णायक क्षण में वे लपक कर मेज़ पर खड़े हो गए. उन्होंने एक द्रवित दृष्टि बंधे हुए मुर्गे पर डाली और उनकी आंखों से टपटप आंसुओं की धारा बहने लगी. भावातिरेक में उन्होंने मुर्गे को संबोधित किया: "मेरे भाई तेरा यह अपमान सिकन्दर से और बरदाश्त नहीं होता. सिकन्दर के सामने पोरस को इस तरह बांध दिया जाए, ऐसा यूनान के खून में नहीं होता, मेरे दोस्त!"

वहां से जगतदा ने छलांग सी मारी और मुर्गे के सामने बैठ कर सुबकते हुए उसे देखने लगे. हकबकाया मुर्गा भी उन पर निगाहें डाले था. अचानक जगतदा दहाड़ा: "सेनापति! कहां हो सेनापति!"

काफ़ी देर से चुपचाप बैठा नरदा झटके से उठा और उनके पास जाकर बोला: "आदेश विजेता सिकन्दर! आदेश!"

"बन्दी को मुक्त किया जाए!"

बन्दी को मुक्त किया गया. "सुनो पोरस! सिकन्दर किसी को इस तरह की नाइन्साफ़ी बरदाश्त नहीं!" नरदा से मुख़ातिब होकर सिकन्दर महान ने आदेश दिया: "बन्दी को खुले आकाश ने नीचे ले जाया जाए!"

बन्दी को खुले आकाश के नीचे ले जाया गया. राजेशदा और लल्तू दाज्यू आंखें मूंदे मरे का अभिनय कर रहे थे. मैंने पहली बार इस कोटि के सांस्कृतिक कार्यक्रम को देखने का सौभाग्य पाया था. नरदा सेनापति थे सो उन्हें तो बाहर जाना ही था. मैं और चौकीदार दोनों अधमरे हो चुके थे लेकिन इस नाटक को देखने का लोभ संवरण नहीं कर सके. जगतदा अपनी बन्दूक में छर्रे भर कर बाहर आ गए थे. बाहर अंधेरी रात थी. चौकीदार ने एक पैट्रोमैक्स बरामदे में धर दिया. बरामदे के आगे थोड़ी सी खुली जगह थी. मुर्गे को जगतदा के आदेसानुसार उसी जगह पर धर दिया गया. बेचारा मुर्गा अब भी डरा हुआ था और हम दानवों को हैरानी से देख रहा था.

"लैट्स हैव अ डुएल ओ नाइट ऑव द ब्लू कासल! हेयर कम्स किंग आर्थर ऑव कैमेलॉट!" बरामदे के खम्भे के पीछे पोज़ीशन लेते हुए सिकन्दर अब किंग आर्थर में तब्दील हो गया था. पैट्रोमैक्स की भकभक रोशनी काफ़ी मन्द पड़ चुकी थी. बन्दूक से धांय की आवाज़ आई और हवा में बारूद की गन्ध फैल आई. हमारा डिनर गायब था.

जगतदा वापस जगतदा बन गया था. और काफ़ी पशेमानी झेल चुकने के बाद अब और डायलॉग बोलने की स्थिति में नहीं बचा था.

हम भूखे ही जाकर सोने की जुगत में लग गए. नींद आने को ही थी कि दरवाज़े पर साहब! साहब! की आवाज़ आई. मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा चौकीदार था. "शेरसिंह आया है साहब. मुर्गा वापस लाया है. कह रहा था कि आप लोगों ने उसे खाया क्यों नहीं. वो तो वापस घर आ गया."

जगतदा जगे हुए थे शायद. वहीं से झेंपते-झींकते बोले: "यार इसे कह दो कि काट वाट के पका दे! भूख से आंतें चिपक गईं साली!"

करीब साढ़े तीन बजे चौकीदार ने खाना पक चुकने की सूचना दी. भोर साढ़े चार-पांच बजे तक हमारा भोज चला. दारू कब की निबट चुकी थी. भरपेट मुर्गा-भात ठूंसकर हम बिस्तर की तरफ़ जा रहे थे. बाहर परिन्दे फड़फड़ाने-गाने वगैरह लगे थे.

"बाहर जंगली मुर्गियां फड़फड़ाने लग गई हैं शायद! चलता है बेटा शिकार पे?" कोने के एक बिस्तर पर लेटे नरदा ने डकार लेते हुए जगतदा को छेड़ा.

सिकन्दर, जंगली मुर्गी का शिकार और एक नशीली पिकनिक - भाग एक



दारू पीना सीखे हुए साल भर हो गया था. नैनीताल शहर की रोमान्टिकपन्थी के चक्कर में मोफ़्फ़त की मार भी पड़ चुकी थी. घर से मिलनेवाली पाकेटमनी हम मित्रों के मिलौचा-प्रोग्रामों की भेंट चढ़ जाया करती थी और पन्द्रह तारीख़ आते ने आते फ़ोकट दारू पिलाने वाले महात्माओं की खोज शुरू हो जाती.

इस संकटपूर्ण समय में शहर में मेरा जलवा एक प्रतिभावान छोकरे के रूप में क्या फैलना चालू हुआ कि कई सारे नौकरीपेशा, बिजनेसरत लोगों से दोस्ती हो गई. ये सब किसी न किसी रूप से कला-साहित्त के मारे थे.

इनकी संगत में होता यूं था कि रोज़ फ़ोकट दारू पीने को मिल जाती थी और झील किनारे देर रात टहलते आवारागर्दी और मौज के अनन्त सेशन्स चलते थे. मेरी अपनी कैपेसिटी अब पव्वे के आसपास पहुंचा चाहती थी.

एक दिन इन्हीं पुरोधाओं द्वारा नैनीताल से दसेक किलोमीटर दूर किलबरी नामक स्थान पर पिकनिक का प्लान बनाया गया. किलबरी में वन विभाग का गेस्ट हाउस है जिसे बाकायदा बुक करा लिया गया था.

पिकनिक पार्टी में जगतदा बतौर लीडर शामिल थे. जगतदा ज़बरदस्त एक्टर थे और सारा शहर उन्हें इस वजह से ज़्यादा जानता था बजाय इस के कि वे बड़े अफ़सर भी थे. पार्टी के अन्य सदस्यों में नरेश जोशी यानी नरदा, राजेशदा, लल्तू दाज्यू और मैं थे.

नरदा का यू.एस.पी. यह था कि वे दारू पीने के बाद मस्ती के पहले दौर में दोस्तों को बहुत दर्दनाक चिकोटियां काटते थे, दूसरे दौर में मां-बहन की गालियां सुनाते हुए शहर भर की सुन्दरियों पर लानत भेजते और तीसरे में लुढ़क जाने से पहले उपस्थित मित्रों को प्रसाद के तौर पर एक एक लात रसीद किया करते. नरदा वकील भी थे.

राजेशदा भांग और चरस को भी दारू के बराबर सम्मान दिये जाने के हिमायती थे, सो नैसर्गिक था वे बहुत कम बोलते थे. अच्छी कदकाठी वाले राजेशदा दारू-सत्रों के उपरान्त पूर्णटुन्नों को घर पहुंचाने का कार्य बचपन से ही करते आए थे, ऐसा कहा जाता था. नैनीताल में उनका अपना पैतृक बिजनेस था.

लल्तू दाज्यू के तो क्या कहने - हारमोनियम थाम लेते तो पानी जैसा बहा देते सुरों को, और पक्के राग गाते हुए ऐसी ऐसी तानें छेड़ा करते कि उफ़! वे नौकरी करते थे कहीं.

ये चारों चालीस-पैंतालिस के फेरे में थे - चारों शादीशुदा थे, उनके बच्चे थे. बस कला-साहित्त के कीड़े ने उन्हें ऐसा काटा था कि मुझ बीसेक साल के लौंडे को बड़ा कलापारखी समझते थे जबकि मुझे सिवाय बात-बात पर मीर और चचा ग़ालिब के शेर सुनाने और छात्र संघ के चुनावों के पोस्टर बनाने के अलावा कुछ नहीं आता था. नहीं, नहीं! ऐसा नहीं है कि मैं कुछ और नहीं करता था. मैं दारू भी पीता था. और एक तरह से दारु और कला-साहित्त की ऐसी संगत बैठती कि अपने से दूनी उमर के इन महानुभावों की निस्बत में बहुत अपनापन महसूस होता था. भाग्यवश ये सब आज भी मेरे अंतरंग मित्र हैं.

सुबह सात बजे तल्लीताल रिक्शा स्टैंड पर इकठ्ठा हुए सारे - पिकनिक वाली पोशाकों में - यानी स्पोर्ट शूज़, जीन्स, टी शर्ट, हैट, काले चश्मे, पिठ्ठु, टू इन वन, कैसेट वगैरह. जगतदा के कन्धे पर भरवां बन्दूक लगी हुई थी. प्लान यह था कि जल्द से जल्द किलबरी पहुंचकर शिकार पर निकला जाएगा - पांचेक जंगली मुर्गियां चित्त की जाएंगी, लकड़ियां वगैरह इकठ्ठा करके खाना बनेगा, दारू पी जाएगी और मौज के समुन्दर में गोता लगाया जायेगा.

रसद के नाम पर चावल और मसाले ले जाए जा रहे थे. किलबरी में सिवाय गेस्ट हाउस और कुछ नीचे एक बेहद छोटे गांव के कुछ नहीं था.

तल्लीताल से किलबरी जाने के लिए पहले स्नोव्यू चढ़ना पड़ता है. सात बजकर सात मिनट पर जगतदा ने ओल्ड मॉंक की बोतल खोल ली ताकि चढ़ने में ताकत मिले. रिक्शा स्टैण्ड जैसे सार्वजनिक जगह पर ही बोतल मुंह में लगाकर एक-दो जलते हुए पैग हलक में ठूंसे गए, बन-आमलेट का भोग लगाया गया और अजगर जैसी मरियल चाल से चढ़ना शुरू किया गया. हर मोड़ पर बोतल पास-ऑन की जाती और करीब नौ बजे तक घिसटते चलते, लतीफ़ों और किस्सों की मौज के बीच पहली बोतल निबट गई. मैंने इस से पहले प्रभाती कभी नहीं की थी सो अभी यह समझ पाने की स्थिति में नहीं था कि अच्छा लग रहा है या नहीं. उतना नशा भी नहीं हो रहा था. मुझे उम्मीद थी जगतदा रात के वास्ते एक बोतल से ज़्यादा माल लाया होगा क्योंकि मैं अपनी कैपेसिटी भी चैक करना चाहता था इस पिकनिक में.

स्नोव्यू पहुंचते पहुंचते दस बज गया. हमें पूर्वनिर्धारित प्लान के मुताबिक अब तक किलबरी का आधा रास्ता तय कर लेना था पर नरदा सब को चिकोटियां काट काट कर बता रहा था कि कोई जल्दी नहीं है और शिकार के लिए चार-एक बजे के बाद का समय सबसे उत्तम होता है. स्नोव्यू आते आते भूख लग आई थी. कुछ नाश्ते का ऑर्डर दिया गया और देखते न देखते दुसरी बोतल मेज़ पर थी. आधी पौनी बोतल सूती जा चुकी थी जब मुझे अपने पेट की तरफ़ से "हो गया!" की पुकार आ गई. मेरा फ़िलहाल का कोटा पूरा निबट चुका था लेकिन मेरे बहादुर वरिष्ठ साथियों द्वारा पी गई रम ऐसा लगता था उनकी ऐड़ियों या हद से हद घुटनों को भिगा सकी. दूसरी बोतल निबटी और हम रस्ता लग लिये. दारू और भोजन की मात्रा ज़्यादा हो गई थी और हमारा टल्लीदल सुस्त चाल से मंज़िल-ए-मकसूद की जानिब रेंग रहा था.

सबने अपने अपने हिसाब से अपनी गति निर्धारित कर ली थी. नरदा बहुत तेज़ तेज़ चलता हुआ हमारी निगाहों से ग़ायब हो चुका था. मैं और लल्तू दाज्यू साथ साथ थे जबकि तीसरी सब - पार्टी में जगतदा और राजेशदा "हम आ रहे हैं एक एक लगा के" कह कर चरसठुंसी सिगरेट बनाने के उद्देश्य से कुछ पीछे रुक गए थे. रास्ता वीरान था, सिवाय एकाध दूधियों के जो नैनीताल में दूध बांटकर अपने टट्टुओं को हांकते अपने घर लौट रहे थे. लल्तू दाज्यू इन दूधियों से कुमाऊंनी में कुछ चुहल करते और देर तक हंसते जाते. अपने टू इन वन पर उन्होंने मेहदी हसन की कोई ग़ज़ल लगा ली थी और सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं टाइप माहौल की सर्जना होने लगी थी. दोपहर का करीब एक बजा था, सूरज सिर पर था पर उसकी टक्कर का सूरज हम उदरस्थ कर चुके थे और मौज आनी शुरू हो गई थी.

(अगली किस्त में तमाम)