Monday, July 20, 2009

यादें जगन्नाथ पुरी की

अपनी उड़ीसा यात्रा की तीन पोस्ट मैं यहाँ लगा चुका हूँ , लीजिये ये अंतिम है.......

जब हम कोणार्क से निकले तो अच्छा खासा उजाला था मगर खरामा-खरामा रुकते-रुकाते जब पुरी पहुंचे तो दिन ढल रहा था . ये पूरी सड़क समंदर के साथ साथ चलती है और बाइक दौडाने के लिए बढ़िया है . मॉडल के हिसाब से २०० से ३०० रुपैये किराये पर बाइक पुरीसे मिल जाती है . गणेश बाइक वाले का नंबर -- 09238817520 .

जगन्नाथ पुरी अपने प्राचीन मंदिर और शानदार सी- बीच के लिए विश्व प्रसिद्द है . हर साल यहाँ विशाल रथ यात्रा का आयोजन होता है . अंग्रेज़ी शब्द -- Juggernaut इसी से प्रेरित है . मंदिर के बाहर एक विशाल गरुड़ स्तम्भ है जिसे देखते ही प्रोफ़ेसर ने पहचान लिया और चिहुंक कर बोली '' "0! the official carrier of Indonesia " , दरअस्ल इंडोनेशिया की सरकारी एयर लाइन का नाम गरुड़ ही है . मंदिर में विदेशी नागरिकों के प्रवेश की मनाही है सो प्रोफ़ेसर को उनके डेरे पे छोड़ा और मंदिर आ गया .
संयोग से उस दिन जन्माष्टमी का पर्व था सो वहां खूब चहल -पहल थी . जगन्नाथ की छवि अद्भुत है . बहन सुभद्रा और कृष्ण-बलराम . इन श्री विग्रहों के हाथ पूरे बने हुए नहीं हैं . कहते हैं वो प्रभु ने इंसान को दे दिए . कहावत मशहूर है 'अपना हाथ जगन्नाथ' . फिर देर रात तक वहीँ बीच पर टहलता रहा. जिस होटल में ठहरा था उसके सारे यात्री लगता है रात मंदिर में ही बिताने वाले थे सो वहां बेहद सन्नाटा था . पुराना बंगाली काट का फ़र्नीचर और हिलते हुए परदे माहौल को एक अजब सा 'गॉथिक - लुक' दे रहे थे . नींद नहीं आ रही थी . वापस बीच किनारे के बाज़ार आया , ले-दे के एक कल्याणी ब्लैक लेबल नामक बीयर ही थी जो चिल्ड मिल रही थी, दो बोतल गटकीं ! ईश्वर से माफ़ी मांगी और एक घुटे हुए पाखंडी की तरह तान कर सो गया .

Sunday, July 19, 2009

मेरी कोणार्क यात्रा

अब तक मैं अपनी उडीसा यात्रा की तस्वीरें दो किस्तों में आपकी नज़र कर चुका हूँ और अब बात कोणार्क की।

कोणार्क का मंदिर जब तक आपको नज़र न आ जाए आपको लग सकता है की आप किसी ग़लत रस्ते आ गए हैं चूंकि इतनी मशहूर वर्ल्ड हेरिटेज साईट के आस-पास कोई ख़ास बसावट नहीं है जैसी अक्सर मंदिरों के पास होती है . शायद इसलिए की यहाँ पूजा-पाठ नहीं होता है बस मंदिर देख कर लोग निकल लेते हैं . मैं कह चुका हूँ की हम जब वहां गए तो ऑफ सीज़न चल रहा था सो दूर- दूर तक पर्यटकों का अता-पता न था और इसीलिए पूरा माहौल अद्भुत ,आश्चर्यलोक सरीखा लग रहा था . जब भी 'भारत में पर्यटन' पर कोई लेख विदेशी पत्रिका में छपता है तो सूर्य मंदिर के एक विशाल पहिये की आकृति ज़ुरूर छाप दी जाती है .

बहरहाल, मेरे मन में इसकी जो छवि थी उस से ये काफी विशाल था जबकि खँडहर बता रहे थे की एक ज़माने में ये उस से भी बहुत विशाल क्षेत्र में फैला होगा . मुख्य मंदिर की बात करें तो बाहरी दीवारों पर उकेरी गयी मूर्तियों के तीन स्तर थे . सबसे नीचे विचित्र आकृतियों वाले पशु-पक्षी थे , मध्य में सम्भोग रत मानवाकृतियाँ थीं और सबसे ऊपर वाद्य यंत्रों के साथ भक्ति भाव में झूमते नर-नारी थे . ये तीन स्तर क्रमशः बचपन, यौवन और प्रौढावस्था का अंकन माने जाते हैं . हालाँकि इस यात्रा में मेरी हमसफ़र रहीं प्रोफ़ेसर शिनावात्रा को इस बारे में पहले से जानकारी थी मगर मेरे लिए ये सब काफी अनोखा था चूंकि मेरी सीमित जानकारी में सम्भोग आकृतियाँ सिर्फ खजुराहो में थीं .


पुरातत्व विभाग के एक कर्मचारी ने हमें बताया की इन मूर्तियों के बारे में एक थ्योरी ये है की वर्षा का देवता इन्द्र इन दृश्यों को देख कर प्रसन्न होगा और समयानुकूल वर्षा होगी , दूसरी थ्योरी ये है की कलिंग युद्ध में हुए भीषण रक्त-पात के बाद आम-जन में वैराग्य व्याप गया और जनसँख्या में हो रही गिरावट से परेशान होकर तत्कालीन राजाओं ने जनता को विवाह संबंधों के लिए प्रेरित करने के मकसद से इन्हें बनवाया , तीसरा मत ये है की मूर्तिकारों को १२ वर्ष तक पूरी रचनात्मक छूट दी गयी मगर परिवार से दूर रखा गया और ये उनकी दमित आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति है , एक मत इन चित्रणों को जीवन की पूर्णता का गान मानता है . बहरहाल , भारत के गौरवमयी अतीत को जान पाना इस मंदिर को देखे बिना असंभव है ।

प्रोफ़ेसर शिनावत्रा काफी समय तक अपने अकादमिक मकसद से वहां विडियो शूट करती रहीं और इस बीच मुझे कर्मचारियों से बात करने का काफी समय मिल गया . उनका कहना था की लोग यहाँ बाल बच्चों समेत आ तो जाते हैं मगर फिर किसी तरेह जल्दी से निकलने की कोशिश करते हैं . मुझे लगा ये स्वाभाविक भी है .



शाम को हम फिर जगन्नाथ पुरी लौट आये जिसका ज़िक्र अगली बार करूंगा .

Saturday, July 18, 2009

रात में श्मशान और बाक़ी तस्वीरें

हिमालय के तो कई रंग देखे थे मगर बंगाल की खाड़ी में हरहराता हिंद महासागर पहली बार देख रहा था . अलबत्ता, अरब सागर पहले भी देखा मगर ये तो महा- समुद्र था और उस पर जगन्नाथ पुरी का वो साहिल जो दुनिया के दस सबसे आला 'सी-बीचेज़' में शुमार होता है !! सो देर रात तक मैं वहीं टहलता रहा । समंदर के किनारे खासी रौनक थी , एक छोटा सा बाज़ार भी करीब दस बजे तक सजा रहा । ये पुरी में ऑफ़-सीज़न का वक़्त है मगर फ़िर भी सैलानी तो वहां रहते ही हैं चाहे हज़ार से कम ही सही । रेत में सजे बाज़ार में घूमते -घामते कुछ दूर निकल गया जहाँ से उठती आग की लपटें बड़ी ड्रामाई लगती थीं , ऐसे की जैसे वो आँच का कोई स्पेशल -इफेक्ट हो..... जैसे स्टेज के ड्रामों में दिया जाता है । पास पहुँचा तो पता लगा पुरी में श्मशान आधी रात तक जागता है ताकि हमेशा के लिए सो चुके जल्द उस पार हों ....उस पार जहाँ जाने क्या है ये कोई नहीं जानता ! बहरहाल ,जी कुछ बुझ सा गया मगर भीतर छिपा कमीना फोटोग्राफर वहां भी बाज़ न आया और तस्वीरें लेने को मजबूर करता रहा । इसके बाद , सुबह जब दोबारा वहां पहुँचा तो उसी समंदर के किनारे जहाँ रात में जलती चिता थी , बाज़ार था वहां अठखेलियाँ करते एक बच्चे को देखा और अगर वो रात कैमरे में क़ैद न होती तो मुझे भी यही लगता की कोई सपना देखा । सुनी भी ये देख कर हैरान थी , .... प्रोफ़ेसर सुश्री सुनी शिनावात्रा जो मिथुन -मूर्तियों के बारे में जानने अपने मुल्क थाई लैंड से हिन्दोस्तान आई हैं और जिनकी इल्तजा है के मैं उनका दुभाषिया बन जाऊं । उन्हें अब कोणार्क जाना है चूंकि वो मूर्तियाँ तो वहीं मिलेंगी और मेरे पास भी इनकार की कोई ख़ास वजह नहीं है सो अढाई सो रुपल्ली पर- डे के किराये पे एक फटफटी ले हम निकल जाते हैं कोणार्क जिसके बारे में अगली मर्तबा ..........



























हमारे सामने जो पड़ा है मलबा नहीं, ढहे हुए हमारे शिखर हैं.

श्री राम कुमार तिवारी की कविताओं को आपने काफ़ी सराहा था. उनके काव्य संग्रह 'कोई मेरी फ़ोटो ले रहा है' से आज पढ़िये उनकी कुछ और कविताएं.




कितनी अकेली है

लगा गया
सिर के बल डुबकी
किनारे खड़ा पहाड़

यह झील कितनी गहरी है

उड़ रही चिड़िया
आकाश है अंदर

जिसने भी झांका
अपने को देखा

है तो बात
पर कितनी अकेली है

इतना नशा तो चाहिये

शाम के धुंधलके में
पुल पर खड़ा देखता हूं
उस पार से दारू पीकर लौटते
कुली, कबाड़ी, ड्राइवर खलासियों को

नशे में धुत्त
न जाने क्या-क्या बकते हैं
किसी को नहीं छोड़ते
वो साला!सूदख़ोर
मेरी घरवाली की हंसुली पचा गया
खाने दो सालों को
कुत्ते की मौत मरेगा

वह दरोगा
नकली मूंछों वाला
जब देखो तब घर में घुस आता है
लम्बी पूंछ वाला
कहता है दारू बनाते हो
सौ का महीना दो

वह बांधकर ओसियर
साला! बीस में ठप्पा लगवा कर दस देता है

उसकी बातें सुनकर
मुझे डर होता है
अगर किसी ने सुन लिया
तो क्या होगा इनका
खाल खींच ली जाएगी

लेकिन तभी डर में से
आवाज़ आई, नहीं
इतना नशा तो हर आदमी में
हर समय होनी चाहिये.

हमारे शिखर

स्खलित हुआ पहाड़
अवरुद्ध हो गया रास्ता
हमारे सामने जो पड़ा है
मलबा नहीं
ढहे हुए हमारे शिखर हैं.

जल्दी-जल्दी रास्ता

रास्ते में पेड़ मिला
देखते ही पहचान गया

पुरखों की बात करते समय
उसकी आंखें चमक रही थीं

मेरे पुरखों के बारे में
बहुत कुछ बताना चाहता था
मुझे पहुंचने की जल्दी थी

आजकल जल्दी पहुंचने के लिए
जल्दी-जल्दी रास्ता बदल रहा हूं

(इसी संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर खींची गई रामकुमार जी की तस्वीर अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ से श्री महेश वर्मा द्वारा भेजी गई है. उनका आभार)

Friday, July 17, 2009

सपने में आग और पानी से बनाया गया था रसूल हम्ज़ातोव के मुल्क को

[रसूल हमज़ातोव (गमज़ातोव) को कौन नहीं जानता होगा! उनकी किताब 'मेरा दाग़िस्तान' के पहले खण्ड की रेकॉर्डतोड़ प्रतियां बिक्री और तमामतर ज़बानों में उनका तर्ज़ुमा हुआ. उसका एक हिस्सा कबाड़ख़ाने पर लगाया गया था. दूसरा खण्ड कुछ सालों बाद आया जो दुर्भाग्यवश बहुत ज़्यादा लोगों तक हिन्दी में पहुंच न सका. दूसरे खण्ड की शुरूआत विलक्षण है. हिन्दी अनुवाद डॉ. मदनलाल मधु का है. पेश है:]

छोटी सी चाबी से बड़ा सन्दूक खोला जा सकता है - मेरे पिता जी कभी कभी ऐसा कहा करते थे. अम्मां तरह तरह के क़िस्से-कहानियां सुनाया करती थीं - "सागर बड़ा है न? हां बड़ा है. कैसे बना सागर? छोटी सी चिड़िया ने अपनी और भी छोटी चोंच ज़मीन पर मारी - चश्मा फूट पड़ा. चश्मे से बहुत बड़ा सागर बह निकला."

अम्मां मुझ से यह भी कहा करती थीं कि जब काफ़ी देर तक दौड़ लो - तो दम लेना चाहिये, बेशक तब तक, जब तक कि हवा में ऊपर को फेंकी गई टोपी नीचे गिरती है. बैठ जाओ, सांस ले लो.

आम किसान भी यह जानते हैं कि अगर एक खेत में, वह चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, जुताई पूरी कर दी गई हो और दूसरे खेत में जुताई शुरू करनी हो तो ज़रूरी है कि इसके पहले मेड़ पर बैठकर अच्छी तरह से सुस्ता लिया जाए.

दो पुस्तकों के बीच का विराम - क्या ऐसी ही मेड़ नहीं है? मैं उस पर लेट गया, लोग क़रीब से गुज़रते थे, मेरी ओर देखते थे और कहते थे - हलवाहा हल चलाते चलाते थक गया, सो गया.

मेरी यह मेड़ दो गांवों के बीच की घाटी या दो घाटियों के बीच टीले पर बसे गांव के समान थी.

मेरी मेड़ दागिस्तान और बाक़ी सारी दुनिया के बीच एक हद की तरह थी. मैं अपनी मेड़ पर लेटा हुआ था, मगर सो नहीं रहा था.

मैं ऐसे लेटा हुआ था, जैसे पके बालों वाली बूढ़ी लोमड़ी उस समय लेटी रहती है, जब थोड़ी ही दूरी पर तीतर के बच्चे दाना-दुनका चुग रहे होते हैं. मेरी एक आंख आधी खुली हुई थी और दूसरी आधी बन्द थी. मेरा एक कान पंजे पर टिका हुआ था और दूसरे पर मैंने पंजा रख लिया था. इस पंजे को मैं जब तब ज़रा ऊपर उठा लेता था और कान लगाकर सुनता था. मेरी पहली पुस्तक लोगों तक पहुंच गई या नहीं? उन्होंने उसे पढ़ लिया कि नहीं? वे उसकी चर्चा करते हैं या नहीं? क्या कहते हैं वे उसके बारे में?

गांव का मुनादी करने वाला, जो ऊंची छत पर चढ़कर तरह तरह की घोषणाएं करता है, उस वक़्त तक कोई नई घोषणा नहीं करता जब तक उसको यकीन नहीं हो जाता कि लोगों ने उसकी पहले वाली घोषणा सुन ली है.

गली में से जाता हुआ कोई पहाड़ी आदमी अगर यह देखता है कि किसी घर में से कोई मेहमान नाक-भौं सिकोड़े, नाराज़ और झल्लाया हुआ बाहर आता है तो क्या वह उस घर में जाएगा?

मैं पुस्तकों के बीच की मेड़ पर लेटा हुआ था और यह सुन रहा था कि मेरी पहली पुस्तक के बारे में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया हुई है.

यह बात समझ में भी आती है - किसी को सेब अच्छे लगते हैं और किसी को अखरोट. सेब खाते वक्त उसका छिलका उतारा जाता है और अखरोट की गिरियां निकालने के लिए उसे तोड़ना पड़ता है. तरबूज़ और खरबूज़े या सरदे में से उनके बीज निकालने पड़ते हैं. इसी तरह विभिन्न पुस्तकों के बारे में विभिन्न दृष्टिकोण होने चाहिए. अखरोट तोड़ने के लिए खाने की मेज़ पर काम आने वाली छुरी नहीं, मुंगरी की ज़रूरत होती है. इसी तरह कोमल और महकते सेब को छीलने के लिए मुंगरी से काम नहीं लिया जा सकता.

किताब पढ़ते हुए हर पाठक को उसमें कोई न कोई खामी, कोई त्रुटि मिल ही जाती है. कहते हैं कि ख़ामियां-कमियां तो मुल्ला की बेटी में भी होती हैं, फिर मेरी किताब की तो बात ही क्या की जाए.

खैर, मैंने थोड़ा सा दम ले लिया है और अब मैं अपनी दूसरी किताब लिखना शुरू करता हूं.

...

बड़े बूढ़ों ने हमें यह सीख दी थी - "सभी कुछ तो केवल सभी बता सकते हैं. लेकिन तुम वह बताओ जो बता सकते हो और तभी सभी कुछ बता दिया जाएगा. हर किसी ने अपना घर बनाया और नतीज़ा यह हुआ कि गांव बन गया. हर किसी ने अपना खेत जोता और नतीज़े के तौर पर सारी पृथ्वी ही जोती गई."

तो मैं तड़के ही उठ गया. आज मैं पहली हल रेखा बनाऊंगा. नए खेत में नई हल रेखा. प्राचीन परम्परा के अनुसार एक ही अक्षर से शुरू होने वाली सात चीज़ें मेज़ पर होनी चाहिये. मैं अपनी मेज़ पर नज़र दौड़ाता हूं और मुझे सातों चीज़ें वहां दिखाई देती हैं. ये हैं वे चीज़ें -

१. कोरा कागज़
२.अच्छे ढंग से गढ़ी हुई पेन्सिल
३. मां का फ़ोटो
४. देश का नक्शा
५. दूध के बिना तेज़ कॉफ़ी
६. उच्चतम कोटि की दाग़िस्तानी ब्रान्डी
७. सिगरेटों का पैकेट

अगर अब भी मैं अपनी किताब नहीं लिख सकूंगा तो कब लिखूंगा?



आज पहाड़ों में वसन्त है - वसन्त का पहला दिन है. मेरी तरह वह भी आज पहली हल रेखा बनाना शुरू कर रहा है.

"दागि़स्तान के वसन्त, यह बताओ कि तुम्हारे पास ऐसे कौन से सात उपहार हैं जो एक ही अक्षर से शुरू होते हों?"

"मेरे पास ऐसे उपहार हैं" वसन्त ने उत्तर दिया, "दागिस्तान ने ही उन्हें मुझे भेंट किया है. मैं अपनी भाषा में, इन उपहारों के नाम लूंगा और तुम उंगलियों पर उन्हें गिनते जाना.

१. त्सा - आग. ज़िन्दगी के लिए. प्यार और नफ़रत के लिए.
२. त्सार - नाम. इज़्ज़त के लिए. बहादुरी के लिए. किसी को नाम से पुकारने के लिए.
३. त्साम - नमक. ज़िन्दगी के ज़ायके के लिए, जीवन की मर्यादा के लिए.
४. त्स्वा -सितारा. उच्चादर्शों और आशाओं के लिए. उज्ज्वल लक्ष्यों और सीधे मार्ग के लिए.
५. त्सूम -उकाब. उदाहरण और आदर्श के लिए.
६. त्स्मूर - घण्टी, बड़ा घण्टा ताकि सभी को एक जगह पर एकत्रित किया जा सके.
७. त्सल्कू - छाज, छलनी, ताकि अनाज के अच्छे दानों को निकम्मी और हल्की भूसी-करकट से अलग किया जा सके."

दाग़िस्तान! ये सात चीज़ें तुम्हारे मज़बूत जड़ वाले वृक्ष की सात शाखाएं हैं. इन्हें अपने सभी बेटों को बांट दो, मुझे भी दे दो. मैं आग, और नमक, उकाब और सितारा, घण्टा और छाज-छलनी बनना चाहता हूं. मैं ईमानदार आदमी का नाम पाना चाहता हूं.

मैं नज़र ऊपर उठाकर देखता हूं और वहां मुझे सूरज और बारिश, आग और पानी से बुना हुआ आसमान दिखाई देता है. अम्मां हमेशा कहा करती थीं कि सपने के समय ही आग और पानी से दाग़िस्तान बनाया गया था.

आवाज़ों के आइने और चांद की गिटार...



(यह बेहतरीन आलेख सुशोभित सक्तावत ने तैयार कर के भेजा है. सुशोभित भी कबाड़ियों की पांत में शामिल हैं)

ये अफ़वाहों और अंधड़ों की एक कहानी है...

अजीब बात है, लेकिन इस कहानी की शुरुआत एक जवान मौत के इर्द-गिर्द होती है... और एक क़त्‍ल के भी. गोया ये अपने आपमें एक 'थ्रिलर' हो. लेकिन सचाई ये ही है कि इस पूरी कहानी पर एक अजब तरह का स्‍याह रंग छाया हुआ है और इससे भी बड़ी सचाई ये है कि एक निहायत उजले इलाक़े तक भी इस कहानी की तफ़सीलें पहुंचती हैं...दरअसल, ये स्‍याह और उजले की आपसी कशमकश वाली एक कहानी है, जिसमें शोहरत के नश्‍तर हैं, तो प्रतिमाओं का धुंधलका भी...ये अफ़वाहों की क़तरनें जोड़कर बनाई गई एक अजीबोग़रीब कहानी है.

इस कहानी की शुरुआत अटलांटिक के उस तरफ़ से होती है...

जबकि समंदर के इस तरफ़ बीटल्‍स का वो मशहूर शीराज़ा तक़रीबन बिखर चुका था...योरोप में सन्‍नाटा था, अमरीका में नई आहटों की महज़ दबी-घुटी आवाज़ें... 'रॉक' संगीत के गिटार की भर्राई हुई आवाज़ मद्धम पड़ती जा रही थी, और 'रिदम एंड ब्‍ल्‍यूज़' की अफ्रीकी-अमरीकी ध्‍वनियों को नई पहचान की तलाश थी. जॉन लेनॅन के क़त्‍ल की ख़बर तो बाद में आती है, लेकिन ऐल्विस प्रेस्‍ली की मौत का अफ़सोसनाक वाक़या दुनियाभर के उन लोगों के कलेजे में गड़ा हुआ था, जो मौसिक़ी से मोहब्‍बत करते हैं...

ऐन इसी दौरान अटलांटिक के उस तरफ़ जैक्‍सन फ़ाइव के कमसिन लड़कों ने गाना-गुनगुनाना शुरू किया था... वे लोग 'न्‍यू जैक स्विंग' के ताज़ातरीन शगूफ़े में पूरी ताक़त से शुमार थे... इस अफ़साने में डायना रॉस शुरू से ही शामिल रहीं, और एक वक्‍़त के बाद पॉल मैकॉर्टनी भी इसमें शरीक़ होते नज़र आते हैं...

ये कहानी तब शुरू होती है जब जोसेफ़ जैक्‍सन की बीवी एक दोपहर उसे आकर बताती है कि बग़ल वाले कमरे में माइकल कुछ गुनगुना रहा है... जोसेफ़ एक ठंडी मुस्‍कराहट के साथ कहते हैं- हां, मैंने देखा... जरमाइन से कह दो कि उसे गिटार सौंप दे.

बहुत शुरुआत में इस कहानी में जैक्‍सन फ़ाइव के लड़कों की मासूम आवाज़ें शामिल थीं, जो 'एबीसी', 'आई वांट यू बैक', और फिर 'द लव यू सेव' में नुमायां हुईं. बिलबोर्ड ने इन नवागतों को टॉप चार्ट से नवाज़ा, लेकिन इस ग्रुप के कुल जमा ग्‍यारह बरस उम्र वाले 'लीड वोकल' को एक नई ज़मीन गढ़ना थी, जिस पर उसे नए क्षितिज रखने थे. 'ऑफ़ द वॉल' तो ख़ैर बाद में आया, लेकिन उसके पीछे की बुनावटें उसके लड़के के ज़ेहन में तरतीब लेने लग‍ी थीं. वो 70 के सालों की आखिरी सुगबुगाहटें थीं.

'रॉक विद यू' सुनकर स्‍टीफ़न स्पिलबर्ग ने एक नए चमत्‍कार के साक्षी होने की बात कही थी, अगरचे वो भी एक दूसरी कहानी मानी जाए, तब भी 'थ्रिलर' तक आते-आते उस चमत्‍कार को हक़ीक़त में तब्‍दील होते सभी ने देखा. 82 के साल में सामने आया 'थ्रिलर' कई मायनों में एक फ़ि‍नामिना था, और उसने पॉपुलर संगीत की पिछली तमाम परिभाषाएं बदलकर रख दीं. 'थ्रिलर' के साथ ही 'न्‍यू जैक स्विंग' का परचम भी फहरा गया. अब इसमें रॉक, या जैज़, या ब्‍ल्‍यूज़ का इकहरापन नहीं था...इसमें शामिल थीं फ़ंक, सोल, गोस्‍पेल और बैलेड तक की‍ ख़राशें. बीटल्‍स के सॉफ़्ट रॉक और हार्ड रॉक भी इसमें शुमार थे. फिर, इसमें हिपहॉप भी जुड़ा... पॉप के साथ पॉपिंग आई... अब चौबीस बरस के हो चुके उस लड़के के क़दमों के नीचे से ज़मीन को फिसलते हुए 'मोटाउन 25' में पूरी दुनिया ने देखा. उसके पैरों में बिजलियां थीं... और उसने 'ज़ीरो ग्रेविटी' को झुठला दिया था. इस कहानी में 80 के दशक का गर्म ख़ून और मांस के दरिया की मचलती मछलियां शामिल थीं. 'बिली जीन' और 'बीट इट' पश्चिमी पॉप के नए सूत्रगान बन चुके थे. लड़के की आवाज़ के पीछे म्‍यूजिक वीडियोज़ के तिलिस्‍मी परदे लहराते रहे... देखने-सुनने वालों ने अचरज के साथ ये तमाम नई चीज़ें देखीं... और उस सितारे का नाम अच्‍छी तरह से अपने ज़ेहन में टांक लिया.

'वी आर द वर्ल्‍ड' के साथ उसने बहुत शुरुआत में ही दुनिया-जहान की आदमियत से एक वादा कर लिया था. उसके बाद उसने उस वादे को हर बार निभाया. रियो-डी-जेनेरियो की संकरी गलियों में बच्‍चों के साथ और उनके लिए 'दे डोंट केयर' गाते-गुनगुनाते हुए हमने उसे देखा था, तो नेवरलैंड के परियों के संसार में भी वो हमें मिला. 'मैन इन द मिरर' के बाद वो 'हील द वर्ल्‍ड' लेकर आया, तो सबसे आख़ि‍र में आत्‍मा की अतल गहराइयों से उपजा हुआ 'अर्थ सॉन्‍ग'...जिसके बाद अब उसका कोई अंत नहीं था. उसे सुनने वाली अवाम अपनापे से भरे उस चेहरे को हमेशा पहचानती रही...आंसुओं में सबसे ज्‍़यादा.

उसका संगीत वक्‍़त के साथ गाढ़ा होता गया. 'यू आर नॉट अलोन' को उसने एक अनचीन्‍हीं मिठास से भर दिया, तो 'रिमेंबर द टाइम' में उसने गति और ठहराव के नए आयाम खोजे. 'जैम' और 'डर्टी डायना' में उसने अपनी उद्दाम कामुकता को उघाड़कर सामने रख दिया था, तब भी, 'स्‍ट्रेंजर इन मॉस्‍को' की बेपनाह तनहाइयों में उसकी रूह तड़कती रही. वो पिघला हुआ शीशा सभी ने देखा... ये शीशा उसके गले में शहद बन जाया करता था...और उसकी आवाज़ हमारा आइना. 'बैड' और 'डेंजरस' के साथ वो आवाज़ों के नए-नए मौसम गढ़ता रहा, और 'हिस्‍ट्री' तक पहुंचते-पहुंचते उसका संगीत एक लाजवाब शराब बन गया.

ये शोर और भीड़ के बीचोबीच वाले अकेलेपन की एक कहानी है... ये लांछन, पराजय और अफ़वाहों से भरा एक अफ़साना है, जिसमें रोशनी के तेज़गाम साये सरकते रहे, बेलगाम चीख़ें और बेहोशियां गुमी रहीं... वो चमत्‍कार हमारी नज़रों के सामने ही हुआ, वो मिथक उठा, और फिर उसे कीचड़ में लथपथ होते देख एक चीप और मीडि‍याकॅर क़ि‍स्‍म की ख़ुशी भी हमने ही हासिल की.

वो उस सब के लायक़ था, जो कुछ उसने हासिल किया... और जो कुछ उसे मिला.

ये सनसनीख़ेज़ ख़बरों सरीखी दिलचस्‍प तफ़सीलों वाली कहानी है, जिससे सालोंसाल अख़बारनवीसों की रूहें तस्‍क़ीन पाती रहीं... और फिर उसकी मौत के बाद भी. सुइयों से छिदी उसकी देह दवाइयों की तेज़ गंध में गुमती रही...'इनविंसिबल' के बाद वो जो डूबा, तो फिर उबर नहीं सका... उसकी आख़ि‍री मेहफ़ि‍लों के लिए मेहमान सब जुट चुके थे, लेकिन वो ग़ैर-मौजूद रहा... वो अब वहां कभी नहीं पहुंच सकेगा.

ये एक बहुत-बहुत स्‍याह, और एक बहुत-बहुत उजली कहानी है...उसकी चमड़ी के बदलते रंग सरीखी... जैसे दिन और रात के एकसाथ सच होने की कोई तिलिस्‍माई तरक़ीब हो...बहरा कर देने वाले उन्‍मादी शोर के बीच हम उसे देख रहे हैं...सुन रहे हैं... और वक्‍़त? वो कहीं नहीं है...

ये मौत के आख़ि‍री दरवाज़े के पीछे से झांकते माइकल जैक्‍सन की कहानी है, जिसने कभी चांद पर चलने की कोशिश की थी...वो आज भी चुपचाप चांद की वो गिटार बजा रहा है- जो जरमाइन ने एक बहुत पुरानी दोपहर आंसू और ख़ून के वि‍रसे के साथ उसे सौंपी थी...

(माइकेल के अल्बम 'ऑफ़ द वॉल' से सुनिये उसका शुरुआती हिट 'डॉन्ट स्टॉप टिल यू गैट एनफ़'. इसके बोल भी माइकेल के लिखे हैं)

Michael Jackson - Don't Stop Till You Get Enough
Found at bee mp3 search engine

Thursday, July 16, 2009

सारे कबाड़ियों से एक व्यक्तिगत अनुरोध

१. उदय प्रकाश जी वाले मसले पर अब इस ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं लगेगी. लगेगी तो उसे हटा दिया जाएगा. इस पर काफ़ी चर्चा हो चुकी है. कुछ सवाल थे जिनका जवाब, मुझे उम्मीद थी कि मिल जाएगा. पर ऐसा नहीं हुआ. उल्टे कुछ ऐसे ग़ैरज़रूरी सवालात उठाए गए जिनका कोई मतलब मुझे तो नज़र नहीं आता.

२. कुछेक टिप्पणियां ऐसी भी आईं जिनकी भाषा अमर्यादित थी और उन्हें हटाना पड़ा.

३. आज और अभी से कमेन्ट मॉडरेशन चालू किया जा रहा है. बेनामी कमेन्ट्स को हटा दिया जाएगा.

४. सभी कबाड़ी भाइयों से उम्मीद करता हूं कि कोई भी पोस्ट लगाने से पहले पिछली पोस्ट का समय देख लें. दो पोस्ट्स के बीच कम से कम आठ घन्टे का अन्तराल रहे, इतनी कृपा करें (बशर्ते कोई इमरजेन्सी न आन पड़ी हो).

५. ऐसा अनुरोध इस लिए भी किया जा रहा है कि कबाड़ख़ाने का मॉडरेटर होने के नाते मैं चौबीस घन्टे चूहा थामे कम्पूटर की स्क्रीन पर आंखें फ़ोड़ने का महाकार्य नहीं करते रह सकता. रोटी मुझे भी खानी होती है और उसके वास्ते काम करना होता है और ब्लॉगिंग से कानी कौड़ी नहीं मिलती.

६. कोई किसी से सम्मान ले, अब कोई फ़र्क नहीं पड़ना. लिखना बहुत कुछ चाहता था पर पंचदिवसीय भूसीकरण के उपरान्त अब हिम्मत नहीं बची. गुडनाइट!

भुवनेश्वर का एक पेशाबघर और दीगर अहवाल

किसी इंसान की फितरत उसके जूतों से और किसी इमारत के बाशिंदों की असल औक़ात टॉयलेट के रख-रखाव से पता चलती है ,ऐसा मेरे दोस्त मेजर किशनपाल के मरहूम ददा -जानी का फरमाना था! मैं उनके इस क़िस्म के ओब्ज़ेर्वेशन्स का बड़ा कायल रहा , सो भुवनेश्वर के रेलवे प्लेटफार्म नम्बर एक पे मौजूद इस टॉयलेट की तस्वीर लेना मैंने ज़ुरूरी समझा! पाँच सितारा होटलों , दिल्ली में वाक़े NGOs के आलिशान दफ्तरों और दूतावासों को छोड़ दें तो मुल्क में ये शोवा आज भी फनकारों की नज़रे-इनायत से महरूम है । बहरहाल, इस पेशाबघर में फूल- दार टाइल्स के अलावा फूलों के गुच्छे भी किसी अनाम फनकार ने इस खूबी से सजाये थे के क्या कहिये और ये सब महज़ एक रुपये की रूटीन प्राइस पर ! इधर सुनते हैं की हाल ही में किसी ने कबाड़खाने को पाखाना कह डाला था ,दरअस्ल कब्ज़ ज़ियादे हो जाय तौ इंसान बागे-बहिश्त में भी यही देखता है ! सो जिन्हें हाजत रफ़ा करनी है उन्हें ऐसे पेशाबखाने औ' पाखाने नसीब हों ऐसी दुआ ये कबाड़खाना करता है. बाकी तस्वीरें पुरी के सी बीच की हैं ,कहते हैं तमाम समंदर अगस्त्य ऋषि का पेशाब है ,आपकी क्या राय है दोस्तो ?






महामंत्री - तस्लीम said...

दोनों ही जगहें लाजवाब हैं।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

July 16, 2009 10:35 AM

Blogger अंशुमाली रस्तोगी said...

उम्दा।

July 16, 2009 11:08 AM

Blogger अंशुमाली रस्तोगी said...

उम्दा।

July 16, 2009 11:08 AM

Blogger शिरीष कुमार मौर्य said...

कहते हैं तमाम समंदर अगस्त्य ऋषि का पेशाब है - क्या बात है मुनीश जी. जी खुश का दिया आपकी तस्वीरों के क्रम ने ! और हाँ, आपको कबाड़ी की भूमिका में देख कर भी अच्छा लगा.

July 16, 2009 11:13 AM

Blogger शिरीष कुमार मौर्य said...

एक बात और - आपको कविता-फविता से कोई लेना देना नहीं पर ये तस्वीरें भी दरअसल एक कविता ही हैं ! मानेंगे मेरी बात?

July 16, 2009 11:21 AM

Blogger Nanak said...

चलो बात निकली है तो थोड़ी दूर तक जाने दो. अगर तमाम समंदर अगस्त्य ऋषि का पेशाब है तो हम मनु या आदम के ....? खैर, तस्वीरे लाजवाब हैं और उनसे अपनी बात जोड़ने का फ़न कोई आपसे सीखे. बीती काली रात के बाद आपकी पोस्ट उगते सूरज की तरह है.

July 16, 2009 11:35 AM