Monday, August 10, 2009

प्रोफ़ेसर खान अब लिखते नहीं , पढ़ाते हैं

प्रोफ़ेसर तो वह पहले से ही थे. उनके भाषाविद पिता अपने बेटे को अध्यापक के रूप में ही देखना चाहते थे क्योंकि यह उनका पसंदीदा पेशा था. एक दिन इसी पसंदीदा और सम्मानित समझे जाने वाले पेशे में अपने बेटे को पूरी संजीदगी से उतरा हुआ देख पिता चुपके से कक्षा की पिछली कतार में बैठ जाया करते थे.
पुत्र झुँझलाकर पूछता - 'आप मेरी क्लास में क्यों आते हैं?'
पिता का जवाब होता - 'सीखने के लिए. सीखने की कोई उम्र नहीं होती , कहीं भी , कभी भी, कुछ भी सीखा जा सकता है. मैं यहाँ एक अच्छे अध्यापक से अध्यापन कला के गुर सीखने आता हूँ ।'

यह पुत्रमोह आबद्ध - अनुकूलित अभिव्यक्ति अथवा पितृत्व का सहज स्नेह - प्रदर्शन भर नहीं था. यह एक बुजुर्ग अध्यापक का युवा अध्यापक के प्रति सच्चा आभार प्रदर्शन था, परम्परा की प्रगतिगामी धारा के बहाव को देखकर कहा गया एक संतुष्टिपूर्ण वाक्य था. माँ ने छुटपन में कहा था - 'पढ़' और पिता ने बड़े होने पर कहा था -'पढ़ा'. प्रोफ़ेसर खान , माफ कीजिएगा प्रोफ़ेसर कादर खान की जिन्दगी का जितना भी हिस्सा सार्वजनिक तौर पर विद्यमान व उपलब्ध है उसमें मूलत: पढ़ने और पढ़ाने की ही बात है हालांकि उन्होंने लिखा खूब है - थोक के भाव से. चलिए अब दो के स्थान पर तीन शब्दों - पढ़ना, पढ़ाना और लिखना - के त्रिकोण से हिन्दी सिनेमा के इस धाँसू - धुरंधर लिक्खाड़ और हाजिर -जवाब हँसोड़ अभिनेता के व्यक्तित्व व कृतित्व के चौथे कोण पर निगाह डालने की कोशिश -सी करते हैं।

प्रोफ़ेसर कादर खान एक सिविल इंजीनियर हैं. मुंबई के कमाठीपुरा इलाके की तंग गलियों में पला एक नौजवान थिएटर करते - करते और कापी कागज के अभाव में एक कोठरीनुमा घर के फर्श पर गणित की गुत्थियाँ सुलझाते -सुलझाते न केवल सिविल इंजीनियर बन जाता है बल्कि भायखला के एक पालीटेक्निक कालेज में पढ़ाने भी लगता है. वह कक्षाओं में थ्योरी ऒफ स्ट्रुक्चर, हायड्रोलिक्स, स्ट्रेन्थ ओफ मेटेरियल , आरसीसी स्टील अदि पढ़ाता है किन्तु उसके पस्दंदीदा विषयों में शुमार होते हैं - थिएटर, स्तानिलावस्की, गोर्की, चेखव, दोस्तोवयस्की, ग़ालिब , कबीर आदि - आदि. एक तरफ अभियांत्रिकी के सिद्धान्त और प्रयोग - अनुप्रयोग तथा दूसरी ओर रंगमंच, साहित्य, सिनेमा, संगीत , शायरी... प्रोफ़ेसर साहब को बालीवुड से फिल्म लिखने के बुलावे आते हैं और वे प्रोफ़ेसर कादर खान के नाम से नरेन्द्र बेदी की फिल्म 'बेनाम' के डायलाग्स लिखते हैं. मामला चल निकलता है, गाड़ी दौड़ पड़ती है लेकिन खान साहब को लगता है कि इस चकाचौंध की मायानगरी में प्रसिद्धि है , पैसा है लेकिन अपने भीतर बैठे हुए उस अध्यापक का क्या करें जो बार - बार परेशान होता है कि उसकी क्लास उसे बुला रही है, हसरत से इंतजार कर रही है।

इसके बाद की कथा तो लगभग एक सीधी , सरल रेखा खीचने जैसी है. प्रोफ़ेसर कादर खान से फिल्म लेखक, अभिनेता , निर्माता, निर्देशक, टीवी कार्यक्रम प्रस्तोता कादर खान के बनने , सँवरने और बदलने की कथा . हिन्दी की मुख्यधारा के सिनेमा की कद्दावर शख्सियत मनमोहन देसाई की 'रोटी' (१९७४) के अतिरिक्त संवाद लेखक से शुरुआत कर कादर खान ने लगभग सौ फिल्मों के लिए लिखा जिनमें 'परवरिश', 'अमर अकबर अंथोनी', 'खून पसीना' , 'मुकद्दर का सिन्दर' , 'सुहाग' , 'लावारिस' ,देशप्रेमी' , 'शराबी' , 'पाताल भैरवी' ,'खून भरी मांग' ,'आंटी नंबर वन' , आदि -इत्यादि ने बाक्स आफिस पर टिकट बिक्री के झांडे गाड़े. हिन्दी उपन्यास जगत के जगमगाते सितारे गुलशन नंदा के उपन्यास पर बनी यश चोपड़ा की फिल्म 'दाग' (१९७३) से फ़िल्मी अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने वाले इस रंगमंच कलाकार ने तीन सौ से ज्यादा फिल्मों में काम किया जिनमें कुछ शुरुआती फिल्मों में वकील, पुलिसवाला, विलेन - खलनायक - गद्दार के रोल हैं किन्तु बाद में गोविन्दा, डेविड धवन, शक्तिकपूर और अरुणा ईरानी के साथ हास्य अभिनेता या कामेडियन की उनकी छवि खूब जमी. यह हास्य एक चलताऊ और भदेस किस्म का हास्य था जिसमें अभिनय के वाचिक और आहार्य रूप ही प्रमुखता से मुखर होते दिखाई दिए. भाषायी और शाब्दिक तोड़ - मरोड़ , अतिनाटकीय अंग संचालन, द्विअर्थी संवादों की अदायगी, नए मुहावरों की गढ़ाई आदि - इत्यादि नें उन्हें हिन्दी सिनेमा के कामेडियन की परिवर्तित छवि के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित किया. उनके इस रूप की आलोचना भी कम नहीं हुई है और प्राय: भौंड़े किस्म के हास्य को बढ़ावा देने के आरोप भी उन्हें कम नहीं झेलने पड़े हैं .उनकी हँसोड़ छवि को टेलीविजन वालों ने भी भुनाया और 'हँसना मत' जैसे सीरियल की आमद हुई.'बाप नंबरी बेटा दस नंबरी ' के लिए फिल्मफेयर और 'तकदीरवाला' के लिए स्क्रीन अवार्ड भी खान साहब को मिले .एक निर्माता के रूप में उन्होने गिरीश कर्नाड और शबाना आजमी जैसे कलाकारों को लेकर 'शमा' ( १९८१ ) जैसी सीरियस फिल्म का निर्माण किया किन्तु उसको मिले ठंडे रिस्पांस से वे आहत भी कम नहीं हुए.शायद अपनी इसी खीझ को निकालने के लिए उन्होंने 'उमर पचपन की दिल बचपन का ' ( १९९२ ) जैसी हल्की फुल्की फिल्म का निर्देशन भी किया. धीरे - धीरे उनका लिखना कम होता गया और अभिनय में सक्रियता बढ़ती गई और एक दिन कादर खान हिन्दी सिनेमा की दमकती हुई दुनिया को अलविदा कहकर अपने पसंदीदा पेशे अध्यापन की ओर मुड़ गए.फिल्मी दुनिया ने उन्हें काम , नाम , दाम , ईनाम - इकराम सब दिया लेकिन शायद वह संतुष्टि या आनंद नहीं दिया जो रंगमंच और अध्यापन से मिला था था या कि जिसकी कसक शेष रह गई थी।

तो किस्सा कोताह यह कि प्रोफ़ेसर खान अब फिल्मों के लिए लिखते नहीं , अब पढ़ाते हैं. लगभग एकाध बरस पहले अखबारों में यह पढ़ रखा था कि कादर खान दुबई में कहीं उर्दू और अरबी भाषा पढ़ा रहे हैं उनके विद्यर्थियों में ज्यादातर आप्रवासी , कामगार और अनुवाद के काम से जुड़े हुए लोग हैं. उनकी यह भूमिका कब तक जारी रहेगी , कहा नहीं जा सकता. सुनने - पढ़ने में तो यह भी आया है कि वे अब एक बार फिर अपनी रंगमंडली तैयार रहे हैं .ऐसे वक्त पर जब लोग शोहरत और दौलत कमा लेने के बाद अतीत की जुगाली करते हुए रिटायरमेंट की जिन्दगी जीना पसंद करते हैं तब अपने कादर भाई को पढ़ने - पढ़ाने - नाटक करने के काम में मुब्तिला देखना भला लगता है. कादर खान साहब को ग़ालिब से बेइंतहा मुहब्ब्त है , वे ग़ालिब के साहित्य के मशहूर टीकाकार भी हैं. अस्तु , उस्ताद, गुरुजी, मास्साब, सर, प्रोफ़ेसर कादर खान के पहले प्यारे पेशे की उन्नति , सफलता और बढ़ती के लिए ढ़ेर सारी शुभकामनाओं के साथ महाकवि ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल के ये चंद शेर -

फिर कुछ इस दिल को बेकरारी है.
सीन: जुया - ए- जख़्मे कारी है.

फिर जिगर खोदने लगा नाखून,
आमदे फ़स्ले लाल:कारी है .

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं.
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है।

Sunday, August 9, 2009

क्या ग़ज़ब का आदमी था वह



जब लोग मरते हैं तो उनके बारे में, उनके गुणों के वर्णन करने वाले भाषण देना आम बात है। लेकिन शायद ही कभी ऐसे मौकों पर किसी के बारे में ज्यादा ईमानदारी और सच्चाई से वह सबकुछ कहा जा सकता है जो हम चे के बारे में कहते हैं - 'वह क्रांतिकारी गुणों के विशुद्ध उदाहरण थे'। लेकिन उनमें एक और गुण था, बौद्धिकता या इच्छाशक्ति का गुण नहीं न ही अनुभवों से अर्जित कोई गुण अपितु उनके दिल के भीतर मौज़ूद एक गुण - वह अगाध मानवीय व्यक्ति थे, असाधारण रूप से संवेदनशील।

यही वज़ह है कि उनके जीवन के बारे में सोचते हुए हम महसूस करते हैं कि वह इस रूप में अकेले और असाधारण थे कि उनमें एक साथ एक कर्मशील व्यक्ति की, एक विचारवान निष्कलंक क्रान्तिकारी की और असाधारण मानवीय संवेदना से पूर्ण व्यक्ति की लाक्षणिकतायें समाहित थीं। साथ ही वह लौह चरित्र, दृढ इच्छाशक्ति और अदम्य संकल्पशीलता वाले भी थे।

( चे की स्मृति में दिये कास्त्रो के भाषण का एक अंश, चे की किताब ' क्यूबा के क्रांतियुद्ध की संस्मृतियां' से, अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य)

हद है! अब 'चरण दास चोर' पर प्रतिबंध

यह मेल मुझे अभी मिला है. सोने का बखत है और इसे पढ़कर नींद ग़ायब, चैन ग़ायब. ये मसला है क्या हम लोगों के साथ?

हबीब बाबा को गए अभी समय हुआ ही कितना है. मुझे पता है वे होते तो ऐसे में क्या करते. आप क्या करेंगे/कहेंगे, मुझे नही मालूम पर इस हादसे को सामने लाने के लिए सबसे पहले मैं श्री प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच का आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने निम्नलिखित विरोध ईमेल की सूरत में दर्ज़ कराया. इस के लिए प्रणय जी को सलाम.

यह पोस्ट लगाता हुआ मैं सन्न हूं!




छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी छवि के अनुकूल ही आचरण करते हुए १९७४ से खेले जा रहे हबीब तनवीर के अंतर्रष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नाटक 'चरणदास चोर' पर शनिवार ८ जुलाई से प्रतिबंध लगा दिया. मूलत: राजस्थानी लोककथा पर आधारित यह नाटक श्री विजयदान देथा ने लिखा था जिसका नाम था 'फ़ितरती चोर'. हबीब साहब ने इसे छ्त्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति, लोक नाट्य और संगीत परंपरा में ढालने के क्रम में मूल नाटक की पटकथा और अदायगी में काफ़ी परिवर्तन किये. 'चरणदास चोर' अनेक दृष्टियों से एक समकालीन क्लासिक है. एक अदना सा चोर गुरू को दिए चार वचन- कि सोने की थाली में वह खाना नहीं खाएगा, कि अपने सम्मान में हाथी पर बैठ कर जुलूस में नहीं निकलेगा, राजा नहीं बनेगा और किसी राजकुमारी से विवाह नहीं करेगा के अलावा गुरू द्वारा दिलाई गई एक और कसम कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, का पालन अंत तक करता है और इन्हीं वचनों को निभाने में उसकी जान चली जाती है. चरणदास को कानून और व्यवस्था को चकमा देने की सारी हिकमतें आती हैं. वह बड़े लोगों को चोरी का शिकार बनाता है. नाटक में चरणदास के माध्यम से सत्ता-व्यवस्था, प्रभुवर्गों और समाज के शासकवर्गीय दोहरे मानदंडों का खेल खेल मे मज़े का भंडाफ़ोड़ किया गया है. एक चोर व्यवस्था के मुकाबले ज़्यादा इंसाफ़पसंद, ईमानदार और सच्चा निकलता है. ज़ाहिर है कि यह नाटक लोककथा पर आधारित है, छ्त्तीसगढ़ मे चल रहे संघर्षों पर नहीं. फ़िर सत्ता को इस नाटक से कैसा खतरा महसूस होने लगा? यह नाटक तो १९७४ में पहली बार खेला गया जब छत्तीसगढ़ राज्य के गठन तक की संभावना दूर दूर तक नहीं दिखती थीं. छ्त्तीसगढ़ के आज के तुमुल-संघर्षों की आहटें भी नहीं थीं. नाटक न जाने कितनी भाषाओं में अनुवाद कर खेला गया, देश और विदेश में खेला गया. १९७५ में श्याम बेनेगल ने इसपर फ़िल्म भी बनाई. दरअसल क्लासिक की खासियत यही है कि वह अपने ऊपरी कथ्य से कहीं ज़्यादा बड़ा अर्थ संप्रेषित करती है. अपने ऊपरी कथ्य, पात्र, देश-काल को लांघ कर बिलकुल भिन्न युग-परिवेश में प्रासंगिक हो उठती है. क्यों महाभारत के तमाम द्वंद्व अलग अलग युग-परिवेश में बारंबार प्रासंगिक हो उठते हैं? फ़िर 'चरणदास चोर' तो हबीब साहब के हाथों पूरी तरह छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में ही ढल गया. कहीं यह नाटक छ्त्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से से ही उस राजसत्ता के चरित्र को तो ध्वनित नहीं कर रहा, जो उस प्रदेश के सारे ही प्राकृतिक संसाधनों के कार्पोरेट लुटेरॊं के पक्ष में आदिवासी जनता के खिलाफ़ युद्ध छेड़े हुए है? कहीं यह नाटक दर्शकों और पाठकों के अवचेतन में दबे व्यवस्था विरोधी मूल्यों और आकांक्षाओं को वाणी तो नहीं दे रहा? कहीं यह नाटक अपनी क्लासिकीयता के चलते एक बिलकुल अप्रत्याशित तरीके से आज के छ्त्तीसगढ़ की सता और लोक के बीच जारी संग्राम की व्यंजना तो नहीं कर करने लगा? यह सारे ही सवाल इस प्रतिबंध के साथ उठने स्वाभाविक हैं.

वे लोग भोले हैं जो छत्तीसगढ़ सरकार की इस दलील को मान बैठे हैं कि सतनामी गुरु बालदास की आपत्तियों के मद्देनज़र यह प्रतिबंध लगाया गया. बालदास जी की आपत्तियां अगर कुछ महत्व रखती हैं, तो उनपर 'नया थियेटर' के साथियों से बातचीत भी की जा सकती थी और आपत्तियों को दूर किया जा सकता था. संस्कृतिकर्मियों और सतनामी धर्मगुरुओं की पंचायत भी बैठ सकती थी, हल निकल सकता था. लेकिन सरकार की मंशा कुछ और थी. याद आता है कि किस तरह 'दलित अकादमी' नामक एक संस्था ने कुछ साल पहले प्रेमचंद की 'रंगभूमि' की प्रतियां जलाई थीं. बाद में बहुतेरे दलित लेखकों ने इसकी निंदा करते हुए इस बात का पर्दाफ़ाश किया कि यह सब संघ संप्रदाय द्वारा प्रायोजित था. धार्मिक और जातिगत अस्मिताओं का दमन और विद्वेष के लिए इस्तेमाल संघ-भाजपा की जानी पहचानी रणनीति है. खुद सरकार और बालदास के बयानों पर ध्यान दिया जाए तो सतनामी संप्रदाय ने इस नाटक पर २००४ से पहले कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं कराई थी, जबकि नाटक १९७४ से खेला जा रहा था और बहुधा इसके अभिनेता भी सतनामी संप्रदाय से आते थे.

छत्तीसगढ़ सरकार ज़बरदस्त तरीके से दुरंगी चालें खेल रही है. एक ओर तो 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान' के ज़रिए मुख्यमंत्री और संस्कृतिमंत्री के साथ तमाम जनवादी और प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों को बैठाया और दूसरी ओर महीना खत्म होते न होते 'चरणदास चोर' को प्रतिबंधित कर दिया. ज़ाहिर है कि बालदास जी की चिट्ठी ' प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान' से पहले की घटना है और प्रतिबंध का मन भी सरकार इस सम्मान समारोह से पहले ही बना चुकी थी. सम्मान समारोह का तात्कालिक उपयोग यह हुआ कि जिन हलकों से प्रतिबंध के विरोध की आवाज़ उठ सकती थी उन्हें इस आयोजन के ज़रिए 'डिफ़ेंसिव' पर डाल दिया गया. उन्हे सरकार ने इस स्थिति में ला छोड़ा है कि वे अगर इसका विरोध करें भी तो उस विरोध की कोई विश्वसनीयता लोगों की निगाह में न रह जाए.

हबीब साहब के नाटकों पर संघ-भाजपा का हमला कोई नया नहीं है. अपने जीते जी उन्होंने इसका बहादुरी से सामना किया था. महावीर अग्रवाल को दिये एक साक्षात्कार में हबीब साहब ने कहा, " 'नया थियेटर' की दुसरी चुनौतियों में प्रमुख है 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के खिलाफ़ कलात्मक संग्राम. आप जानते हैं फ़ासिज़्म का ही दूसरा नाम है 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'. नए छत्तीसगढ़ राज्य में २९ जून २००३ से २२ जुलाई २००३ तक 'पोंगवा पंडित' और 'जिन लहौर नई देख्या वो जन्मई नई' के २५ मंचन हुए... नाटक का केवल विरोध ही नहीं हुआ, वरन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सोची समझी रणनीति के तहत हमले किए गए हैं. संस्कृति के क्षेत्र में अपनी लाठी का प्रयोग संघ परिवार समय समय पर करता रहा है. ... हमले की शुरुआत १६ अगस्त २००३ को ग्वालियर में हुई. फ़िर १८ अगस्त को होशंगाबाद में, १९ अगस्त को सिवनी में, २० अगस्त को बालाघाट और २१ अगस्त को मंदला सहित अलग अलग शहरों में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और आर.एस.एस. के लोग उपद्रव करते रहे. २४ अगस्त २००३ को भोपाल के संस्कृतिकर्मियों ने भाजपा प्रदेश कार्यालय के ठीक सामने 'पोंगवा पंडित' पर संवाद करने की कोशिश की. वहां हमारे पोस्टर्स, बैनर छीनकर आग के हवाले कर दिए गए. गाली गलौज के साथ ईंट पत्थर फेंकने का काम फ़ासीवादी ताकतों ने किया.... मैनें उन्हें बारंबार समझाने की कोशिश की कि 'पोंगवा पंडित' कोई नया नाटक नहीं है. नाटक बहुत पुराना है और पिछले ७०-७५ वर्षों से लगातार खेला जा रहा है. १९३० के आसपास छ्त्तीसगढ़ के दो ग्रामीण अभिनेताओं ने इसे सबसे पहले 'जमादारिन' के नाम से प्रस्तुत किया था." (सापेक्ष-४७, पृष्ठ ३८-३९) क्या पता था हबीब साहब को कि उनकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद कोई अपनों में से ही गोरखपुर जाकर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के कसीदे पढ़ आएगा. 'छायानट' पत्रिका, अप्रैल,२००३ के अंक १०२ में मोनिका तनवीर ने महावीर अग्रवाल को दिए इंटरव्यू में कहा, "... १९७० में 'इंद्रलोक सभा' नाटक हमने तैयार किया तो जनसंघ के कुछ गुंडों ने हबीब पर हमला किया. और एक मुसलमान की पत्नी होने के कारण मुझे भी बहुत धमकाया गया." २६ सितम्बर, २००४ को 'दि हिंदू' को दिए एक इंटरव्यू में हबीब साहब ने एक और वाकया बयान किया है. कहा, " महज दो हफ़्ते पहले 'हरिभूमि' नामक रायपुर के एक दैनिक ने पूरे दो पन्ने 'बहादुर कलारिन' पर निकाले और मेरे खिलाफ़ तमाम तरह के आरोप लगाए. यह नाटक 'ईडिपल समस्या' पर आधारित एक लोक नाट्य है. हज़ारों छत्तीसगढ़ी नर=नारियों ने इसे दत्तचित्त होकर देखा, जबकि मुझे आशंका थी कि वे अगम्यागमन (इंसेस्ट) की थीम को ठीक समझेंगे कि नहीं. लेकिन भाजपा के दो सांसदों ने आपत्ति की कि मैनें यह थीम क्यों उठाई. ... मैनें कहा कि 'ईडिपल काम्पलेक्स' हमारे लोक ग्यान का हिस्सा है' ... वे बोले कि यदि ऎसा है भी, तो पूरी दुनिया में इसका ढिंढोरा पीटने की क्या ज़रुरत है? इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था."

दरअसल 'चरणदास चोर' पर प्रतिबंध को भाजपा सरकारों की 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादी' मुहिम का ही हिस्सा समझा जाना चाहिए, बहाना चाहे जो लिया गया हो. किसी भी लोकतंत्र में ऎसे फ़र्ज़ी आधारों पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटने की इजाज़त नहीं दी जा सकती.

मैं व्यक्तिश: और अपने संगठन जन संस्कृति मंच की ओर से सभी जनपक्षधर ताकतों से अपील करुंगा कि 'चरणदास चोर' पर प्रतिबंध पर चौतरफ़ा विरोध दर्ज़ कराएं.

प्रणय कृष्ण,
महासचिव,
जन संस्कृति मंच

Saturday, August 8, 2009

अकेलेपन में भी बहुत शोर है

चीनी भाषा के विद्वान के तौर पर प्रतिष्ठित श्री त्रिनेत्र जोशी ने कई महत्वपूर्ण रचनाओं को मूल चीनी भाषा से हिन्दी में अनुवाद किया है.

इधर काफ़ी अर्सा दुनिया-संसार-शहर-महानगर घूम चुकने के बाद साहब ने हमारे हल्द्वानी शहर को अपनी अगली पारी हेतु चुना है. यानी अब वे यहीं बसने जा रहे हैं. फ़िलहाल तो भवन निर्माण जैसा हरक्यूलियन कारनामा अंजाम देने में लगे हैं. इस बीच हुआ यह भी कि हल्द्वानी के ही आधारशिला प्रकाशन से उनकी कविताओं का पहला संग्रह प्रकाशित होकर आ गया. हालांकि इस पुस्तक को कई साल पहले आ जाना चाहिये था पर 'ऑल्स वैल दैट एन्ड्स वैल' वाली क्लीशेड कहावत साथ इस संग्रह के लिए उनका इस्तकबाल है. जै हो!



संग्रह का आत्मीय ब्लर्ब हिन्दी के बड़े कवि और त्रिनेत्र जी के अभिन्न मित्र ने लिखा है. जगूड़ी जी लिखते हैं:

"कुतुबनुमा की तरह घूमती आंखों वाले त्रिनेत्र जोशी की काव्यभाषा में विम्ब लोकोक्तियों की तरह आते हैं और झाड़ू पोंछा करने वाली आवाज़ों की तरह परिवेश में हमारा पीछा करते हैं. गरीबी की तरफ़ से पीठ फेरने को कवि गरीबों की तरफ़ से पीठ फेरना नहीं मानता -

'देश बड़ी चीज़ है यारो.
कहा उसने
और हुआ फ़रार
नम्स्कार, नमस्कार, नमस्कार!
...
गरीबी ने सभी के किये कई साल बेकार!'

त्रिनेत्र जोशी को हिन्दी कविता के सातवें दशक से इक्कीसवीं सदी के पहले दसक तक सक्रिय हस्तक्षेप बनाए रखने के लिए और पहले कविता संकलन के लिए बधाई."


चीनी कविताओं के उनके अनुवादों की श्रॄंखला कबाड़ख़ाने पर पहले लगाई जा चुकी है. आज त्रिनेत्र जी के काव्य की बानगी देखिये.


नेकांत

बादलों के बीच
आंखों के जोड़े
हंसों की तरह चलते हैं
गिरती है एक बूंद
आंगन में
सिहरते हैं पत्ते
एक लम्बी उदासी के बाद
फिसलती है एक चट्टान
बेहद अंधेरी रात में
झींगुरों की रुनझुन के साथ
आता है गन्ध का एक झोंका
आसमान के उस पार
बिगड़ैल नदी का है शोर
शहर में
बुझ गई हैं
लाल, हरी, पीली बत्तियां
बादलों के बीच
कड़कती है आवाज़
अकेलेपन में भी बहुत शोर है.

जाते हुए

यह
छायाओं का जुलूस है
सिर झुकाए हुए

एक ओर जाता है
समय
कसमसाती रात में
ब्याहता कुतिया की चीखें
और सुबह की ओर जाते
हवा के काफ़िले

एक जगमगाते खालीपन में
कुछ दूधिया लकीरें
और अचेत लेटी स्त्री का सपना

ये तख़्तियां लिए स्मृतियां
मौन छायाओं के जुलूस में
एक भी नारा नहीं लगातीं

यह डर है शायद
इक्कीसवीं सदी में जाता हुआ

शुभ रात्रि!

रोशनी

जिसके भी सितारे गर्दिश में हों
साथी!
वह तारों से सीखे
कैसी होती है तल्लीनता
और कैसे बचाई जाती है रोशनी!

बसंत में धूप के बहाने

पीठ से सेंकता है धूप
और आंख से देखता है धूप
रामरतन
बीड़ी फेंकती है धुंआं
जैसे बिना पंख उमंग
खांसते हैं फेफड़े
बालों को लहराती हैं
रंगीन हवाएं
धूप भी जैसे चली आती है पास
गौरैया के पंखों सी
हंसता है रामरतन बड़े जतन से
बीड़ी के अन्तिम हिस्से को चूसता हुआ
पूछता है एक अदद सूफ़ी सवाल
धूप और भूख में कितना फ़र्क़

ज़िन्दगी का हो बेड़ा गर्क़!

(संग्रह 'घूम गया कई मोड़', प्रकाशक: आधारशिला प्रकाशन,बड़ी मुखानी, हल्द्वानी, उत्तराखण्ड, 263 139, मूल्य: दो सौ रुपए)

Friday, August 7, 2009

एक दुनिया है असंख्य



सुन्दर चन्द ठाकुर की बेरोज़गार शीर्षक कविता-सीरीज़ को आप लोगों ने बहुत सराहा था. उन का दूसरा संग्रह कल ही प्रकाशित हो कर आया है. सुन्दर एक उम्दा कवि-कबाड़ी-कहानीकार-पत्रकार हैं और कम आयु में ही काफ़ी काम और नाम कमा चुके हैं. उन्हें बधाईयां. कबाड़ख़ाना उनके रचनात्मक भविष्य की कामना करता है. प्रस्तुत है संग्रह से उनकी तीन कविताएं.

इन दिनों प्रेम

अवसाद से
सोचते रहने की बीमारी से
अकेले होने की यंत्रणा से
नाकारा होने के आत्महंता अहसास से
क्रूर चीजों से बचने के लिए
प्रेम एक नैसर्गिक शरण है

हालांकि इन दिनों प्रेम भी अब अपने में क्रूर हो चुका है बहुत
वह हत्याएं करवाने पर आमादा दिखता है
इसे मगर अपवाद ही माना जाए
और कहा जाए कि पूरी दुनिया दरअसल प्रेम ही खोजती रहती है
युवा तो और भी ज्यादा
उन्हें ज्यादा अवसाद घेर सकता है
सोचने की ज्यादा भयानक बीमारी लग सकती है
नाकारा होने के ज्यादा गहरे अहसास में डूब सकते हैं वे

कभी ऐसा भी था कि पेड़ की छांव कल्पना न थी
पेड़ की छांव थी
बादलों की इच्छा न थी
बादल थे
एकान्त की चाहत न थी
एकान्त था
प्रेम का डर न था
प्रेम था

नदी का समूचा तट था प्रेम के वास्ते
बारिश और जंगल के सारे रास्ते
प्रेम का फल एकान्त में पकता है
प्रेम का बीज छांव में फूटता है
प्रेम की आग बारिश में जलती है

शहरों में कम बचा है नैसर्गिक एकान्त
बहुत कम छांव
बहुत कम बारिश

जमाने की ओर पीठ फेरकर बुनते एकान्त
कभी दिख जाते हैं प्रेमीजन यहां
उजाड़ होते किसी बागीचे की
उजड़ती किसी झाड़ी की छांव में
सटकर बैठे वे एक-दूसरे को चूमने को होते हैं
उनके प्रेम को प्रेम से कोई नहीं देखता
आपने भी देखा होगा पुलिस वाले
जिनमें कई बार महिला कर्मचारी भी शामिल होती हैं
अश्लील फ़ब्तियां कसते किस तरह बरसते हैं उन पर

कुछ बातें

ताकत कभी हक की बात नहीं करती
प्रेम की मांग नहीं करता भूखा आदमी
सूखा कंठ रक्त नहीं दो घूंट पानी मांगता है

विपदाओं को झेलने और खुशियों को जीने की कोई उम्र नहीं होती
अत्याचारों को सहने का कोई तजुर्बा नहीं होता
हम मरते हुए भी जीते हैं और जीते हुए भी मरते हैं

एक छोटा-सा अन्याय बच्चों की मासूमियत ले जाता है
एक नि:स्वार्थ उदारता मरने तक याद आती है
खुशी को रोशनी क्षणभंगुर साबित होती है
अपार बन जाती है मुसीबत की एक रात

परोपकार एक छलावा है मगर अत्याचार से बेहतर
अस्थायी लगाव एक धोखा है मगर नफरत से बेहतर
अंतिम सत्य मुत्यु नहीं वर्तमान क्षण होता है

मेरे गले में हिचकियां भर जाती हैं
देखता हूं अंधेरी दुनिया में सालों रियाज के बाद
एक अंधे को लेते कठिन सुर का सधा अलाप
एक बूढ़ा लड़खड़ाते शिशु की ओर सहारे के लिए बढ़ाता है हाथ
मैं रो पड़ता हूं
यह जानते हुए भी कि मारा जाएगा वह
एक शख्स उठाता है जब अन्याय के खिलाफ आवाज

मां का सपूत

जैसे मई के सूने आकाश में
कहीं से प्रकट होता है
पानी से भरा एक बादल
और उम्मीद बनकर छा जाता है

ढलती दुपहर में
आवाज लगाता दौड़ा आ रहा है
पहाड़ की ढलान पर
स्कूल से लौटता

घसियारन मां का सपूत

Thursday, August 6, 2009

गाबो बता रहे हैं कौन है शकीरा


आज से करीब नौ साल पहले अंग्रेज़ी अख़बार 'द गार्जियन' ने शनिवार ८ जून २००२ को गाब्रिएल गार्सीया मारकेज़ का यह आलेख प्रकाशित किया था. शकीरा के संगीत ने तमाम लातीन अमरीकी संसार को तब अपने जादू से बांध रखा था. तब से इतने साल बीत चुकने के बाद शकीरा का क़द लगातार बढ़ता चला गया है और संसार भर में उसके चाहने वालों की संख्या बढ़ती गई है.

जाहिर है अगर मारकेज़ जैसी शख़्सियत ख़ुद शकीरा का इन्टरव्यू लेती है तो कुछ तो बात होगी उस लड़की में. ख़ासतौर पर आप लोगों के लिए अनुवाद किया है इस आलेख का.


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शायर और शहज़ादी

वे दोनों महानतम कोलम्बियनों में शुमार हैं: शकीरा, पॉप की दुनिया का तहलका और गाब्रिएल गार्सीया मारकेज़, उपन्यासकार. नैसर्गिक था कि वे कहीं न कहीं मिलते - और यह जादुई यथार्थवादी लेखक शकीरा की असाधारण कार्य-क्षमता से चमत्कृत रह गया.
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एक फ़रवरी को शकीरा मायामी से बूएनोस आइरेस पहुंची, एक रेडियो प्रोग्राम के लिए उससे फ़क़त एक सवाल पूछने का इच्छुक एक पत्रकार उन का पीछा करता आ रहा था. कई वजूहात से वह ऐसा नहीं कर सका तो उसने अपनी रपट का शीर्षक रखा: "शकीरा तब क्या कर रही होती है जब उनसे कोई ढूंढ ही नहीं सकता?" हंसी से दोहरी होती हुई शकीरा हाथ में डायरी थामे समझाती है. "मैं ज़िन्दगी जी रही हूं."

वह एक फ़रवरी की शाम को बुएनोस आइरेस पहुंची थी, और अगले दिन वह दोपहर से लेकर आधी रात तलक काम करती रही; उस दिन उसका जन्मदिन था, लेकिन उसे मनाने को उसके पास समय ही नहीं था. बुधवार को वह वापस मायामी चल दी, जहां उसने एक लम्बे पब्लिसिटी शूट में हिस्सा लिया और कई घन्टे अपने ताज़ा अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण के लिए रेकॉर्डिंग की. शुक्रवार की दोपहर दो बजे से शनिवार की सुबह तक उसने दो गानों की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग पूरी की. उसके बाद वह तीन घन्टे सोई और दोबारा स्टूडियो पहुंची जहां उसने दोपहर तीन बजे तक काम किया. उस रात वह थोड़ा सोई और इतवार की भोर लीमा जाने वाले हवाई जहाज़ पर सवार हुई. सोमवार की पूर्वान्ह वह एक लाइव टीवी शो में उपस्थित थी; चार बजे उसका एक टीवी विज्ञापन शूट हुआ; शाम को वह अपने पब्लिसिस्ट द्वारा दी गई एक पार्टी में मौजूद थी जहां वह भोर तक जगी रही. अगले दिन यानी नौ फ़रवरी सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक को उसने रेडियो, टीवी और अख़बार के लिए आधे आधे घन्टे के ग्यारह इन्टरव्यू दिए. बीच में एक घन्टा लंच के लिए निकाला गया. उसे वापस मायामी पहुंचना था मगर अन्तिम क्षणों में उसने बोगोटा में ठहरना तय किया, जहां वह भूकम्प के शिकार लोगों तक अपनि सहानुभूति जताने पहुंची.

उसी रात वह किसी तरह मायामी जाने वालि आख़िरी फ़्लाइट पकड़ पाने में कामयाब हुई जहां अगले चार दिनों तक वह स्पेन और पेरिस में होने वाली अपनी कन्सर्ट्स के लिए रिहर्सल में व्यस्त रही. अपने अल्बमों के अंग्रे़ज़ी संस्करणों के लिए उसने शनिवार लंचटाइम से लेकर सुबह साढ़े चार बजे तक ग्लोरिया एस्टेफ़ान के साथ काम किया. दिन फटने पर वह वह अपने घर पहुंची जहां उसने एक कॉफ़ी पी, डबलरोटी का एक टुकड़ा खाया और पूरे कपड़ों में सो गई. मंगलवार सोलह तारीख़ को वह कोस्टा रिका में एक लाइव टीवी शो में मौजूद थी. बृहस्पतिवार को वह वापस मायामी पहुंची जहां उसने 'सेन्सेशनल सैटरडे' नाम के एक टीवी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था.

वह बमुश्किल सो पाई - २१ को उसने वेनेज़ुएला से लॉस एन्जेलीस पहुंचकर ग्रैमी समारोह अटैन्ड करना था. उसे विजेताओं की सूची में होने की उम्मीद थी पर अमरीकियों ने तमाम मुख्य पुरुस्कार जीत लिए. लेकिन इस से उसकी रफ़्तार में कोई कमी नहीं आई: २५ को वह स्पेन में थी जहां उसने २७ और २८ फ़रवरी को काम किया. एक मार्च तक आखीरकार वह मैड्रिड के एक होटल में पूरी रात सो पाने का समय निकाल सकी. उस समय तक वह एक महीने में एक पेशेवर फ़्लाइट अटैन्डेन्ट के बराबर यानी चालीस हज़ार किलोमीटर की यात्राएं कर चुकी थी.

ठोस धरती पर भी शकीरा का काम कोई कम मुश्किल न था. उसके साथ चलने वाली संगीतकारों, लाइट टैक्नीशियनों और साउन्ड इंजीनियरों इत्यादि की टीम किसी लड़ाकू दस्ते जैसी नज़र आती है. वह हर चीज़ पर ख़ुद निगाह रखती है. उसे संगीत पढ़ना नहीं आता पर उसकी विशुद्ध आवाज़ और पूरा फ़ोकस इस बात की गारन्टी करते हैं कि उसके संगीतकार एक-एक नोट को सही सही लगा सकें. अपनी टीम के हर सदस्य के साथ उसके व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं. वह अपनी थकान को जाहिर नहीं होने देती पर इस से आपको छलावे में नहीं पड़ना चाहिये. अर्जेन्टीना के चालीस कन्सर्ट्स वाले दौरे के आख़िरी दिनों में उसके एक सहायक को उसे बस में चढ़ने में मदद करनी पड़ी थी. कभी कभी उसकी धड़कनें बढ़ जाती हैं और उसे त्वचा की एलर्जी जैसी शिकायतें भी हो जाया करती हैं.

'दोन्दे एस्तान लोस लाद्रोनेस?' (सारे चोर कहां हैं?) अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण की तैयारी में एमीलियो एस्टेफ़ान और उसकी पत्नी ग्लोरिया के साथ की गई उसकी कड़ी मेहनत ने स्थिति को और भी मुश्किल बना दिया था. इस समय शकीरा को अपने जीवन के सबसे दबावभरे समय से जूझना पड़ा था: वह ठीकठाक अंग्रेज़ी बोल लेती है पर अपने उच्चारण को ठीक बनाने के लिए उसने इस कदर ऑब्सेशन की हद तक काम किया था कि वह सपने में भी कभी कभी अंग्रेज़ी बोला करती थी.

कोलम्बिया के बारान्कीया के एक जौहरी विलियम मेबारेक और उसकी पत्नी नाइदिया रिपोल के अरबी मूल के कलाप्रेमी परिवार में जन्मी थी शकीरा. उसकी कड़ी मेहनत और असाधारण बुद्धिमत्ता का परिणाम था कि अपने शुरुआती सालों में उसने इतना सारा सीख लिया जिसे सीखने में सामान्य लोग दसियों साल लगा देते हैं. सत्रह माह की आयु में वह अक्षरमाला सीखना शुरू कर चुकी थी और तीन साल की उम्र में गिनती करना. चार साल की आयु में बारान्कीया के अपने स्कूल में वह बैली-डान्सिंग सीख रही थी. सात साल की आयु में उसने अपना पहला गीत कम्पोज़ किया. आठ की आयु में कविता लिखनी शुरू की और दस की होते होते बाकायदा अपने ओरिजिनल गीत लिख और कम्पोज़ कर लिए थे. इसी दरम्यान उसने अटलांटिक के तट पर मौजूद 'एल कोर्रेहोन' कोयला खदानों के कामगारों के मनोरंजन हेतु अपने पहले कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त कर लिए थे. उसने अभी सेकेन्डरी स्कूल में दाख़िला लेना बाकी था जब एक रेकॉर्डिंग कम्पनी ने उसे पहला पेशेवर प्रस्ताव दिया.

"मुझे अपनी अपार रचनात्मकता के बारे में हमेशा मालूम था," वह कहती है. "मैं प्रेम कविताओं का पाठ किया करती थी, कहानियां लिखती थी और गणित को छोड़कर सारे विषयों में सबसे अच्छे नम्बर लाती थी." उसे बहुत खीझ होती थी जब घर पर आए मेहमान उस से गाने की फ़रमाइश किया करते थे. "मैं तीस हज़ार लोगों के सामने गाना पसन्द करती बजाय पांच गधों के आगे गाने और गिटार बजाने के." वह थोड़ा कमज़ोर दिखती है मगर उसे पक्का यकीन था कि एक दिन सारी दुनिया उसे जानेगी. किस बात के लिए और कैसे, यह उसे पता नहीं था पर उसका भरोसा मजबूत था. यही उसकी नियति भी होनी थी.

आज उसके सपने पूरे होने से कहीं ज़्यादा पूरे हो चुके हैं. शकीरा का संगीत किसी और के जैसा नहीं सुनाई पड़ता और उसने मासूम सेन्सुअलिटी का अपना एक ब्रान्ड भी बना लिया है. "अगर मैं गाऊंगी नहीं तो मर जाऊंगी!" यह बात अक्सर हल्के फ़ुल्के तरीके से कही जाती है लेकिन शकीरा के मामले में यह एक सच्चाई है: जब वह गा नहीं रही होती वह बमुश्किल ज़िन्दा रहती है. भीड़ के बीच रहने में ही उसके भीतर शान्ति उभरती है. स्टेज का डर उसे कभी महसूस नहीं हुआ. उसे स्टेज पर न होने से डर लगता है: "मुझे लगता है" वह कहती है "जैसे वहां मैं जंगल में किसी शेर जैसी हो जाती हूं." स्टेज पर ही वह शकीरा बन पाती है जो कि वह असल में है.





कई गायक स्टेज से परे तेज़ रोशनियों पर निगाहें गड़ा लेते हैं ताकि श्रोताओं की भीड़ की निगाहों का सामना न करना पड़े. शकीरा इसका ठीक उल्टा करती है; वह अपने टैक्नीशियनों से कहती है कि दर्शकों श्रोताओं पर सबसे तेज़ रोशनियां डालें ताकि वह उन्हें देख सके. "तब जा कर संवाद सम्पूर्ण बनता है" वह कहती है. वह एक अजानी अनाम भीड़ को अपनी सनक और प्रेरणा के हिसाब से जैसा चाहे वैसा ढाल लेती है. "गाते हुए मुझे लोगों की आंखों में देखना अच्छा लगता है." कभी कभी वह भीड़ में ऐसे चेहरे देखती है जिन्हें उसने कभी नहीं देखा होता लेकिन वह उन्हें पुराने दोस्तों की तरह याद करती है. एक बार तो उसने एक ऐसे आदमी को पहचान लिया जो कब का मर चुका था. एक बार उसे ऐसा महसुस हुआ जैसे कोई उसे किसी दूसरे जन्म के भीतर से देख रहा हो. "मैंने पूरी रात उस के लिए गाया." वह बताती है. इस तरह के चमत्कार कई महान कलाकारो के लिए महान प्रेरणा के और अक्सर महान विनाशों के कारण बनते रहे हैं

शकीरा के मिथक का सबसे बड़ा आयाम है बच्चों के भीतर उसकी इस कदर गहरी पैठ. जब उसका अल्बम 'पीएस देस्काल्ज़ोस' १९९६ में रिलीज़ हुआ तो उसके पब्लिसिस्ट्स ने तय किया कि उसे कैरिबियन लोकसमारोहों के इन्टरवलों में प्रमोट किया जाएगा. उन्हें यह नीति बदलनी पड़ी जब तमाम बच्चे "शकीरा! शकीरा!" के नारे लगाते हुए सारी शाम उस के गीतों को बजाने की मांग करने लगे. आज यह करिश्मा डॉक्टरेट के किसी महत्वपूर्ण विषय में तब्दील हो चुका है. हर सामाजिक तबके के प्राइमरी स्कूल की बच्चियां पहनावे, बोलने और गाने के अन्दाज़ में शकीरा की नकल करती हैं. छः साला बच्चियां उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिकाएं हैं.

इन्टरवल के दौरान उसके अल्बमों की सस्ती पाइरेटेड प्रतियों की अदलाबदली हुआ करती है. दुकानों में पहुंचते ही उसके आभूषणों की नकलें हाथोंहाथ निकल जाती हैं. बाजारों में हेयरडाईज़ की होलसेल बिक्री होती है ताकि लड़कियां शकीरा के हेयरस्टाइल की नकल कर सकें उसके नए अल्बम की पहली स्वामिनी स्कूल की सबसे लोकप्रिय लड़की बन जाती है. सबसे ज़्यादा पॉपुलर स्टडी-ग्रुप स्कूल के बाद किसी लड़की के घर में जमते हैं जहां पहले थोड़ा सा होमवर्क होता है और उस के बाद धमाल. जन्मदिन की दावतें नन्हीं शकीराओं का जमावड़ा हुआ करता है. बिल्कुल विशुद्धतावादी समूहों में - जिनकी संख्या बहुत ज़्यादा है - लड़कों को नहीं बुलाया जाता.

अपनी असाधारण संगीत प्रतिभा और मार्केटिंग के बावजूद शकीरा अपनी परिपक्वता के बगैर वहां हो ही नहीं सकती थी जहां वह अब है. यह यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि इस लड़की के भीतर इतनी ताकत आती कहां से है जो हर दिन अपने बालों का रंग बदल देती है - कल काला, आज लाल, कल हरा. कई उम्रदराज़ महिला गायकों से कहीं ज़्यादा ईनामात वह हासिल कर चुकी है. आप देख कर बता सकते हैं कि वह कहां पहुंचना चाहती है: बुद्धिमान, असुरक्षित, शालीन, मधुर, आक्रामक और सघन! अपने पेशे के चरम पर पहुंच चुकने के बाद भी वह बारान्कीया की एक लड़की भर है - जहां भी होती है उसे घर की मुलेट मछली और मैनियोक ब्रैड की याद आती है. अभी वह अपने सपनों का घर नहीं ले सकी है - समुद्र किनारे ऊंची छतों वाला एक शान्त मकान और दो घोड़े. उसे किताबें अच्छी लगती हैं - वह उन्हें खरीदती है उन्हें प्यार करती है अलबत्ता पढ़ने के लिए उसके पास उतना वांछित समय नहीं होता. एयरपोर्टों पर जल्दबाज़ी में विदा लेने के बाद उसे अपने दोस्तों की बहुत याद आती है मगर उसे मालूम होता है कि अगली मुलाकात होने में कितना वक़्त लग सकता है.

उसने कितना पैसा कमाया है, इस बाबत वह कहती है "जितना मैं बताती हूं उस से ज़्यादा मगर जितना लोग बताते हैं उस से कम." संगीत सुनने का उसका प्रिय स्थान होता है गाड़ी के भीतर पूरे वॉल्यूम में बजता प्लेयर - वह शीशे चढ़ा लिया करती है ताकि दूसरों को दिक्कत न हो. "ईश्वर से बात करने, अपने से बात करने और समझने का यह आदर्श स्थान होता है." उसे टीवी से नफ़रत है. उसके हिसाब से उसका सबसे बड़ा विरोधाभास है अनन्त जीवन पर उसका विश्वास और मृत्यु का असह्य खौफ़.

वह एक दिन में चालीस इन्टरव्यू तक दे चुकी है और उसने किसी भी बात को दोहराया नहीं. कला, जीवन. अगले जन्म, ईश्वर प्रेम और मत्यु को लेकर उसके अपने विचार हैं. लेकिन उसके इन्टरव्यू लेने वालों ने इन विषयों पर खुल कर बताने को उस से इतनी दफ़ा पूछ लिया है कि अब वह उन से बचकर निकलना सीख गई है. उसके उत्तर जितना बताते हैं उस से कम ही छिपाते हैं और यह सबसे उल्लेखनीय बात है. वह इस बात को सीधे सीधे खारिज कर देती है कि उसकी प्रसिद्धि अस्थाई है और यह कि ज़्यादा गाने से उसकी आवाज़ पर असर पड़ेगा. "भरी धूप के बीच में सूर्यास्त के बारे में नहीं सोचना चाहती." जो भी हो विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा संभव नहीं चूंकि उसकी आवाज़ की प्राकृतिक रेन्ज उसकी तमाम ज़्यादतियों के बावजूद बची रहेगी. बह बुखार और थकान से गा कर उबरी है. "गायक के लिए सबसे बड़ी कुंठा यह हो सकती है," हमारे इन्टरव्यू के आखीर में तनिक हड़बड़ी में वह कहती है "कि वह गाने को अपना कैरियर बना चुकने के बावजूद गा न सके."

उसके लिए सबसे रपटीला विषय होता है प्यार. वह उसका गुणगान करती है, वही उसके संगीत की प्रेरणा होता है पर बातचीत में वह उस पर अपने ह्यूमर की परत चढ़ा लेती है. "सच तो यह है कि मुझे मौत से ज़्यादा शादी से डर लगता है." यह आम जानकारी है कि उसके चार बॉयफ़्रैन्ड्स रह चुके हैं हालांकि वह शरारत के साथ बताती है कि तीन और थे जिनके बारे में किसी को मालूम नहीं. वे सब तकरीबन उसी की उम्र के थे पर उनमें से कोई भी उस जैसा परिपक्व नहीं था. शकीरा उन्हें बहुत अपनेपन और दर्द के साथ याद करती है. ऐसा लगता है वह उन्हें नश्वर प्रेतों की तरह देखा करती है जिन्हें उसने अपनी अल्मारी में टांग दिया है. भाग्यवश यह कोई बहुत हताशा की बात भी नहीं है: अगली दो फ़रवरी को वह फ़क़त छब्बीस साल की हो जाने वाली है.

('द गार्जियन' का आभार)


केवल नफ़रत के पास हैं सारे वांछित गुण

नोबेल पुरुस्कार विजेता पोलिश कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का की एक और कविता पेश है आज:



नफ़रत

देखो कितनी सक्षम है यह अब भी
बनाए हुए अपने आप को चाक-चौबन्द -
हमारी शताब्दी की नफ़रत।

किस आसानी से कूद जाती है यह
सबसे ऊंची बाधाओं के परे।
किस तेज़ी से दबोच कर गिरा देती है हमें।
बाकी भावनाओं जैसी नहीं होती यह।
यह युवा भी है और बुज़ुर्ग भी।
यह उन कारणों को जन्म देती है
जो जीवन देते हैं इसे।
जब यह सोती है, स्थाई कभी नहीं होती इसकी नींद
और अनिद्रा इसे अशक्त नहीं बनाती;
अनिद्रा तो इस का भोजन है।
एक या कोई दूसरा धर्म
इसे तैयार करता है - तैनात।
एक पितृभूमि या दूसरी कोई
इसकी मदद कर सकती है - दौड़ने में!
शुरू में न्याय भी करता है अपना काम
जब तक नफ़रत रफ़्तार नहीं पकड़ लेती।

नफ़रत, नफ़रत
एन्द्रिक आनन्द में खिंचा हुआ इसका चेहरा
और बाकी भावनाएं -कितनी कमज़ोर, किस कदर अक्षम।

क्या भाईचारे के लिए जुटी कभी कोई भीड़?
क्या सहानुभूति जीती कभी किसी दौड़ में?
क्या सन्देह से उपज सकता है भीड़ में असन्तोष?
केवल नफ़रत के पास हैं सारे वांछित गुण -
प्रतिभा, कड़ी मेहनत और धैर्य।
क्या ज़िक्र किया जाए इस के रचे गीतों का?
हमारे इतिहास की किताबों में कितने पन्ने जोड़े हैं इस ने?
तमाम शहरों और फ़ुटबाल मैदानों पर
आदमियों से बने कितने गलीचे बिछाए हैं इस ने?

चलें: सामना किया जाए इस का:
यह जानती है सौन्दर्य को कैसे रचा जाए।
आधी रात के आसमान पर आग की शानदार लपट।
गुलाबी सुबहों को बमों के अद्भुत विस्फ़ोट।
आप नकार नहीं सकते खंडहरों को देखकर
उपजने वाली संवेदना को -
न उस अटपटे हास्य को
जो उनके बीच महफ़ूज़ बचे
किसी मजबूत खंभे को देख कर महसूस होता है।

नफ़रत उस्ताद है विरोधाभासों की -
विस्फ़ोट और मरी हुई चुप्पी
लाल खून और सफ़ेद बर्फ़।
और सब से बड़ी बात - यह थकती नहीं
अपने नित्यकर्म से - धूल से सने शिकार के ऊपर
मंडराती किसी ख़लीफ़ा जल्लाद की तरह
हमेशा तैयार रहती है नई चुनौतियों के लिए।
अगर इसे कुछ देर इंतज़ार करना पड़े तो गुरेज़ नहीं करती

लोग कहते हैं नफ़रत अंधी होती है।
अंधी?
छिपे हुए निशानेबाज़ों जैसी
तेज़ इसकी निगाह - और बगैर पलक झपकाए
यह ताकती रहती है भविष्य को
-क्योंकि ऐसा बस यही कर सकती है।

Tuesday, August 4, 2009

इज़ ही अ ब्राउन बैड ऑ अ चाइना प्लेट

लोर्ना डून वाली पिछली पोस्ट में कॉक्नी अंग्रेज़ी का ज़िक्र करते हुए मुझे अपने ब्रिटिश दोस्त डेविड फ़ेयरब्रदर की याद आती रही थी. वह पिछले साल यहां था और उस के पिछले साल भी. उसका परिचय यह है कि वह भाषाशास्त्र पर पिछले बारह सालों से अनुसंधानरत है. यह पोस्ट उस से पाई गई सूचनाओं पर आधारित मानी जानी चाहिए.

इतिहास की दृष्टि से आमतौर पर मज़दूरों के साथ जोड़ कर देखा जाने वाला अंग्रेज़ी का यह संस्करण कहीं न कहीं पिछले सौ-पचासेक सालों से अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची आधुनिक ब्रिटिश विट की जड़ों में है.

लन्दन के ईस्ट एन्ड इलाके में रहने वाले कामगारों की भाषा के तौर पर वि/(कु) ख्यात इस ज़बान की जड़ों तक जाने का रास्ता चौदहवीं सदी के विलियम लैंगलैन्ड और ज्यौफ़्री चॉसर जैसे लोगों की रचनाओं में खोजा जा सकता है. दीगर है कि 'कैन्टरबरी टेल्स' लिख चुके ज्यौफ़्री चॉसर को अंग्रेज़ी कविता का पितामह माना जाता है. कॉक्नी शब्द का उद्‍गम coken (यानी मुर्गा) और ey (यानी अंडा) में निहित माना जाता है. इसका अर्थ होता था एक बेडौल और छोटा अंडा यानी कम ज्ञानी इन्सान.

औद्योगिक क्रान्ति के ज़माने में शहर से आए लोगों को गांवों में बहुत खराब और अनपढ़ माना जाता था क्योंकि वे न तो अपनी जड़ों से किसी भी स्तर पर जुड़े रह सके थे न कुछ नया सीख सके थे जो उन्हें 'जीने' में मदद करता. वे भाषाई तौर पर भी दीवालिया हो चुके थे. 'अ क्लासिकल डिक्शनरी ऑफ़ द वल्गर टंग' में फ़्रान्सिस ग्रोस एक क़िस्सा बयान करते हैं: "लन्दन का एक बाशिन्दा गांव पहुंचकर एक घोड़े को हिनहिनाता हुआ सुनता है और कहता है - 'आप ने सुना किस तरह हंसा यह घोड़ा?' एक राहगीर ने उसे ठीक करते हुए बताया कि घोड़ा हंसता नहीं 'हिनहिनाता' है. अगली सुबह कौवे की कांवकांव सुनकर ये लन्दननिवासी साहब बोल उठे - 'अरे सुनो कौवा हिनहिना रहा है'"

हो सकता यह एक फ़ैब्रिकेटेड क़िस्सा हो पर लब्बोलुबाब यूं है कि शहरों और ख़ासतौर पर लन्दन में रहने वालों की भाषा का क़स्बाई और ग्रामीण इंग्लैंड में बहुत मज़ाक उड़ाया जाता था.

कालान्तर में लन्दन के कुछेक हिस्सों में सीमित कॉक्नी भाषा बोलने वाले लोग शहर के अन्य हिस्सों में भी बसे और बीसवीं सदी की शुरुआत से एक विशिष्ट तबके में, प्रमुखतः युवाओं में यह भाषा चल निकली.

इसका व्याकरण बहुत विचित्र है लेकिन इस में जिस तरह के भाषाई प्रयोग होते हैं वे बचपन से अंग्रेज़ी पढ़्ने को अभिशप्त लोगों(उसे एक अलग तरह से पसन्द करने वालों) के लिए बेहद मनभावन और मनोरंजक होते हैं.

कुछ उदाहरण देखिये:

१. Would you Adam and Eve it? (क्या तुम इस बात पर यक़ीन करोगे?)

२. He's half-inched me motah (motor). (उस ने मेरी गाड़ी चुरा ली है.)

३. You are in a right old two and eight. (तुम बुरे फंस गए हो गुरू!)

४. He is a bit Radio rental. (वह पिकनिक के वास्ते कुछ सैन्डविच बना लाया है.)

५. He's lost his marbles. (उसका दिमाग फिर गया है.)

६. Let's go Dutch. (यारी पक्की खर्चा अपना अपना.)

७. Lets have a butchers at the paper. (ज़रा कगज़ पत्तरों पर निगाह मार ली जावे.)

८. Mom-in-law is brown bread now! (सासू लपक लीं! यानी स्वर्ग सिधार गईं!)

९. Why do you become Brahms and Liszt everytime we chillout? (हमारी हर दावत-पार्टी में तू टल्ली
क्यूं हो जाता है यार?)

१०. Who's that China Plate? (ये नया कौन है बे?)

(ज़रा भी मौज आए तो जनाब डेविड फ़ेयरब्रदर को थैंक्यू कहें, मा डिया फ़ैलाज़!)

फ़ुटनोट:

१. अर्ल स्टेनली गार्डनर के पाठक यहां कुछ और ऐसे ही शब्द-समूहों के बारे में बता कर अहसान कर सकते हैं और जॉर्ज माइक्स (कुछ लोग माइक्स को जन्म के समय की उसकी नागरिकता के आधार पर मिकेश भी कहते हैं) को जानने वाले भी.

२. समूचे मॉन्टी पाइथन और पी जी वुडहाउस मिथक पर कॉक्नी का कितना प्रभाव है, जानकार लोग जानते ही होंगे.

३. अभी ज़रा जल्दी है. घन्टी बज रही है, I have to take a dog and bone, guys! (फ़ोन आया है यार कॉक्नी में.)




लोर्ना डून की याद है किसी को?



आर. डी. ब्लैकमोर का उपन्यास 'लोर्ना डून' जीवन में पढ़ी गई पहली पूरी किताब बना था. मैं आठवीं में था. इसी किताब का एब्रिज्ड वर्ज़न मेरे पास पहले से था. नायिका के नाम में कुछ ऐसा सम्मोहन था कि जब पहली बार मैंने इस किताब को नैनीताल के आर. नारायण बुकस्टोर में देखा तो बिना दोबारा सोचे खरीद लिया. किताब की कीमत महीने की मेरी पूरी पॉकेटमनी से थोड़ा ही कम थी.

१८६९ में छ्पा यह टिपिकल ऐतिहासिक रोमान्स जॉन रिड नाम के एक युवा किसान की दास्तान है जो स्कॉटिश मूल के डून परिवार से लड़ता है. डून परिवार हत्यारों और अपराधियों से अटा होता है. अपनी लड़ाइयों के दौरान ही जॉन की मुलाकात लोर्ना डून से होती है जिसके सौन्दर्य और सादगी पर वह मर मिटता है. जाहिर है उनके बीच प्रेम पनपता है. थोड़े शब्दों में कहा जाए तो 'लोर्ना डून' मोहब्बत, हत्या, प्रतिशोध और निहायत अतिड्रामाई अन्त जैसे तत्वों से भरपूर एक क्लासिक है जैसा कि उस काल के अंग्रेज़ी उपन्यास हुआ करते थे.

मेरे लिए यह उपन्यास बहुत खास एक दूसरी वजह से भी है. उपन्यास का नायक ही कथावाचन का काम भी करता है. तो जॉन रिड स्वयं बताता है कि वह किस रोज़ पैदा हुआ था. इत्तफ़ाक़न ख़ाकसार भी उसी दिन पैदा हुआ था.

दरअसल दुछत्ती के पुराने सन्दूकों में कुछ खोजते हुए मुझे अपने बचपन की किताबों का अच्छा खासा संग्रह मिल गया जिसे वर्षों से मैं गुम हो गया मान रहा था. बाई द वे, लन्दन के कामगारों की विचित्र लेकिन कल्ट बन चुकी भाषा 'कॉक्नी' में लोर्ना डून का मतलब 'गुमशुदा' होता है.

पहला काम तो यह हुआ कि लोर्ना डून को आद्योपान्त पढ़ा गया. मुझे उम्मीद है आप में से कई लोगों ने इस किताब को देखा, पढ़ा होगा.

यह पोस्ट फ़क़त नॉस्टैल्जिया नामक असाध्य बीमारी को समर्पित है.



फ़ुटनोट्स:

१. 'लोर्ना डून' पर दस से ज़्यादा फ़िल्में और टीवी सीरीज़ बन चुके हैं.

२. इंग्लैंड के डल्वरटन में लोर्ना डून की प्रतिमा लगी हुई है, जिसे आप ऊपर देख सकते हैं.

३. बिस्कुट वगैरह बनाने वाली एक कम्पनी नेबिस्को के एक विशेष किस्म के बिस्कुटों के लोकप्रिय ब्रान्ड का नाम भी लोर्ना डून है. १९१२ से बनाए जा रहे इन बिस्कुटों के नामकरण के बारे में नेबिस्को के एक अधिकारी का बयान यूं है: "हमें सही सही तो नहीं मालूम कि यह नाम क्यों रखा गया लेकिन उन दिनों शॉर्टब्रैड बिस्किट्स को स्कॉटिश परम्परा से जोड़ कर देखा जाता था. और लोर्ना डून का नाम स्कॉटलैन्ड का प्रतिनिधित्व करता था."

Monday, August 3, 2009

मुझे अचानक दिखाई दिये कहीं खिले हुए कुछ फूल

कल की सीरीज़ को जारी रखते हुए आज पढ़वा रहा हूं आपको अनीता वर्मा जी के दूसरे संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' से एक और कविता.

अनिंदो दा के साथ

कल शाम अनिंदो दा आये थे
उनके साथ हमने बीते दिनों को याद किया
कैसे निवारणपुर का नाम पड़ा था निवारणचंद्र दासगुप्ता के नाम पर
जिन्होंने आजीवन स्कूल में ही पढ़ाने का व्रत लिया था
और उनकी बेटी बासंती देवीके पिता और भाई विभूतिभूषण के जेल जाने पर
उनके धर्मपिता बने थे राजेन्द्रप्रसाद और मां बनीं कस्तूरबा
वे वर्धा में रहीं 'बा' के पास, उन्हीं से सब कुछ सीखा
अभी कुछ समय पहले तक रहती थीं चांडिल के पास निमडी में
समाज सेवा करती थीं और उन्हें इस बुरे समय से कोई लेना-देना नहीं था
अनिंदो दा ने बताया, उनके नाना ने कभी पढ़ाया था इंदिरा गांधी को
एक बार जब उनकी चिट्ठी आई थी
तभी सबने इस बात पर विश्वास किया था
और उनके नाना ने तीस रुपये माहवार पाते हुए
अपने आश्रम में पढ़ाया था सात आदिवासी लड़कों को
वे सभी अनिंदो दा के मामा थे
और उनमें से एक उपेन किस्कू अभी हाल में मिले थे उनसे
पहचाना था उसी पुराने आत्मीय रिश्ते से

गांव में चार महीने पहले से होता था जात्रा का अभ्यास
दूर-दूर से इकट्ठे होते छोते-बड़े सभी दालान पर
अलग-अलग रिहर्सल होती, कहीं बकासुर वध
कहीं छोटे बच्चों का नाच गान
दोपहर होते ही घंटी बजती और सभी एक पांत में बैठकर खाते
मोटे चावल का दाल-भात और आलू-पोस्ते की सब्ज़ी
अगले इतवार फिर सब तैयार
तब तक कोई ब्रांड नहीं था
सभी सस्ता पहनते मामूली खाना खाते
एक दूसरे का संग-साथ निभाते ख़ुश रहते

एक लड़का था सुब्रतो बागची जिसके पिता छोटे अधिकारी थे
अब वह प्रबंधन का बड़ा अधिकारी है
उसने बताया प्रबंधन पास किये लड़कों को
कि उसने अपने पिता से कुछ बातें सीखी थीं
जिनमें एक था सबसे उम्र के अनुसार रिश्ते बनाना
चाहे वह घर में काम करने वाला नौकर हो या ड्राइवर
दूसरा, जिस घर में जाना वहां साफ़-सफ़ाई के बाद
द्वार पर मिट्टी ठीक कर उसमें फूल-पौधे लगाना
जैसे ही साल-भर में फूलों के खिलने का मौसम आता
पिताजी का तबादला हो जाता
अंततः सुब्रतो ने एक दिन कर दिया इन्कार
कहा क्या फ़ायदा इससे, हमें तो अब चले ही जाना है यहां से
तब पिता ने कहा, तुम अगर नयी जगह में दूसरे घर में जाओगे
और पाओगे उसे साफ़ और फूलों से भरा तो कैसा लगेगा तुम्हें

शाम गहरी हो गई थी जब हमारी बातें ख़त्म हुईं
मुझे अचानक दिखाई दिये कहीं खिले हुए कुछ फूल
और तभॊ कोई लालटेन का शीशा साफ़ कर
उसे जला कर रख गया था.

(कबाड़ख़ाने में अनीता जी की कविताएं यहां भी:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का)

Sunday, August 2, 2009

वे गाते हैं कई पुराने गीत, जिन में आज की कोई ख़ुदगर्ज़ आवाज़ नहीं

अनीता वर्मा की कविता 'झारखंड' दरअसल अकेले झारखंड की कविता नहीं है. यह हमारे स्वातंत्र्योत्तर समाज में आए एक व्यापक राजनैतिक-सामाजिक पतन का दस्तावेज़ है.



झारखंड

हमने अल्बर्ट एक्का को चौराहे का पहरेदार बना दिया है
वह देखता रहता है दिन-रात भीड़, जुलूस, धरने और प्रदर्शन
उसकी आत्मा वहीं ज़मीन पर बैठी सुनती रहती है
नेताओं के झूठे बोल और आश्वासन
धूल, गर्द, गर्मी और पसीने के बीच वह देखता है हमारी धरती का गौरव
बड़े-बड़े होर्डिंग्स और पोस्टर
लालची और बेईमान चेहरे
गांवों-जंगलों से हांक कर लाए गए आदिवासियों की भोली निष्पाप सूरतें
वे कुछ नहीं समझते उनके हक़ में क्या है
न्याय क्या है लड़ाई क्या है
वे तो बस हथियार और जयजयकार हैं
शाम होते लौट जाते हैं अपने गांव
दिन-भर गुड़, चना, सत्तू, दाल-भात खाकर
फिर सोचते भी नहीं कोई करेगा उनका भला

रोज़ रात वे सब मिलते हैं
एक जगह बैठते हैं सब
बिरसा मुंडा, अल्बर्ट एक्का,जतरा, बुधू भगत,
सिद्धू कान्हू, तिलकामांझी, नीलांबर पीतांबर
मशालों के बॊचोबीच बैठे करते हैं गुफ़्तगू
फिर धीरे-धीरे इकठ्ठे होते हैं ढेरों जा चुके लोग
अपने-अपने ताबूतों को उठाए तीर-धनिष हथियारों से लैस
गाते हैं कई पुराने गीत, जिन में आज की कोई ख़ुदगर्ज़ आवाज़ नहीं
वे सब अब लौट कर नहीं आएंगे
और हममें ऐसा कुछ नहीं रह गया
कि हम उनके गीतों के पीछे-पीछे जा सकें कुछ दूर तक.

(कबाड़ख़ाने में अनीता जी की कविताएं यहां भी:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का)

*अल्बर्ट एक्का चौक रांची की फ़ोटो www.ranchi.net से साभार.

Saturday, August 1, 2009

एक मछली, दो बातें


कलकत्ते में हिलसा या इलिश माछ पर इन दिनों बज्जर गिरा है। अंग्रेज इसे मैंगो फिश कहा करता था। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह आम के सीजन में इसकी आमद हुआ करती थी। एक बंगाली दोस्त ने बताया कि इस भरमार वाले समय में भी ५०० ग्राम का खोका (बच्चा)इलिश पांच-छह सौ रूपये किलो बिक रहा है।....और यह कोई नयी बात नहीं है।

मछुआरे अपनी परंपरा का पालन करते हुए आमतौर पर खोका इलिश नहीं पकड़ते। मछलियां जब तक प्रजनन की उम्र को न पहुंच जाएं उनका शिकार वर्जित है। दूसरी बात कि खोका इलिश में 'वह' स्वाद नहीं होता और कांटे बहुत होते हैं। स्वाद होता है दो से तीन किलो की हिलसा में। जब यह भाव मिल रहा है और नौदौलतिया खरीदारों की कोई कमीं नहीं है तो मछुआरे भी रूपये की तीन अठन्नी क्यों न बनाएं। हिलसा बंगाल का रास्ता भूल गई है सो वे भी अरंपरा-परंपरा छोड़ खोका पकड़ते भए पूर्वी भारत की संस्कृति का हिस्सा बन चुकी इस शानदार मछली के सफाए में अपना महती योगदान दे रहे हैं।

दुनिया के बड़े मछली निर्यातकों में से एक बांग्लादेश ने पिछले साल पश्चिम बंगाल को २१ लाख किलो इलिश माछ बेची थी लेकिन कीमत का टंटा हो गया। प. बंगाल चौदह रूपये किलो दे रहा था और ढाका वाले तेजी से वहां भी खत्म हो रही हिलसा की कीमत थोक में १७ रूपये किलो मांग रहे थे। खुदरा बाजार में पांच-छह सौ रूपये किलो और उस पर भी मारामारी को देखते हुए, यह सौदा बेहद सस्ता था लेकिन सरकारें अपनी ही चाल चलती है। इस या उस पार बांग्ला के किसी मंत्री या अफसर की धोती या पतलून में फाइल फंसी होगी। वैसे हिलसा का नदियों में घटना और कीमत का चढ़ना बीस साल पहले शुरू हो गया था।

हिलसा, प्रजनन के दिनों में समुद्र से धारा के विपरीत तैरते हुए नदियों में आती है। कुछ दशक पहले जब गंगा की यह दुर्गति नहीं हुई थी, हिलसा बंगाल की खाड़ी से निकल कर सुंदरबन डेल्टा होते कलकत्ता फलांग कर एक हजार किलोमीटर की लांग स्विम (बतर्ज लांग ड्राइव) करते हुए इलाहाबाद में नमूंदार हुआ करती थी। गंगा की इलिश स्वादिष्ट कि पद्मा की- इस पर बांग्ला साहित्य में लंबी चखचख हुई है।

फरक्का बांध के बाद गंगा की एक धारा हुगली बन कर दक्षिण की तरफ निकल लेती है। एक धारा पद्मा का नाम लेकर दक्षिण-पूर्व दिशा में बांग्लादेश जाकर मेघना (ब्रह्मपुत्र) में मिल जाती है। मछुआरे या बंगाली भद्रलोक भी नदी किनारे खड़े होकर इलिश का नाम नहीं लेते। कहा जाता है इलिश के कान बहुत तेज होते हैं अपना नाम सुनकर यह उस इलाके से ही चंपत हो जाती है। झीसी या रिमझिम बारिश में यह सतह पर खिलवाड़ करने आती है इसी कारण बांग्ला में धीमी बारिश के लिए एक शब्द है इलिशगुड़ी बृष्टि।

पर्यावरण में बदलाव, सुंदरबन के मैंग्रूव वनों का सफाया, प्रजनन के इलाकों में जहाजों की बढ़ती आवाजाही और सारी नदियों में बढती सिल्ट के काऱण हिल्सा का यह हाल हुआ है। वैसे पूरे उत्तर-पूर्व, बंगाल और बांग्लादेश का इको सिस्टम चौपट हो रहा है। यही अपने यहां भी कई उलटबांसियों के रूप में सामने आ रहा है। आजकल दाल मंहगी है और मुर्गा सस्ता है।

पुनश्चः इलिश से जुड़ा एक और किस्सा। दूसरे विश्वयुद्ध के समय बर्मा से काफी अमीर बंगाली भाग कर कलकत्ता पहुंचे। वे बाजार में हिलसा के दाम पूछ कर खांटी गोरा साब वाले अंदाज में कहते थे, "डैम चीप।"
उन्हें आया देख कर मछली बेचने वाले घेर लेते थे। "मेरी मछली ले लो डैमची साहेब। मेरी मछली ले लो डैमची साहेब।" नए दौलतियों की प्रजाति का नाम ही डैमची साब पड़ गया।