Thursday, July 14, 2011

सात सौ साल पुराना छंद

प्रिय कवि आलोक धन्वा की एक कविता -



सात सौ साल पुराना छंद

पृथ्वी घूमती हुई गयी किस ओर
कि सेब में फूल आने लगे

छोटे-छोटे शहरों के चाँद
अलग-अलग याद आये
बारिश से ऊपर उठते हुए उनका क़रार

घास की पत्तियों में ठहर गयी बूँदें
बिखरने लगीं तमाम नींद में

धूप उतरी नींबू में

पहला प्यार जब राख हो गया
ख़ुद को बचाया उस साँवली नृत्य शिक्षिका ने
दंगे के ख़िलाफ़ दिखी वह प्रभातफेरी में फिर
शरीर और समुदाय एक हुआ

लंबी छुट्टी बीच में हीं ख़त्म कर
लौटी वह फिर काम पर
आयी अपनी छात्राओं के बीच
अभ्यास कराने सात सौ साल पुराने छंद का

Wednesday, July 13, 2011

बरखा रितु आई



अल्बम "मानसून" से सुनिये संजीव अभ्यंकर की आवाज़ में एक शास्त्रीय रचना -



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आज का फ़ोटो


उन्नीस सौ तीस के दशक का एक फ़ोटो. घर लौटते हुए मां-बच्चे. फ़ोटोग्राफ़र - फ़र्नान्द ट्रियोल

बस कर्ज़ी हूं बस कर्ज़ी


एक और शानदार संगीत चरना वडाली बन्धुओं के स्वर में



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बुल्ला की जाणां


वडाली बन्धु गा रहे हैं बाबा बुल्ले शाह की एक लोकप्रिय रचना -




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क्रिस तुसा की कविता


१९७२ में जन्मे क्रिस तुसा न्यू ऑरलियन्स के रहने वाले हैं और समकालीन अमरीकी कवियों में खासे प्रतिभाशाली माने जाते हैं. अमरीका और यूरोप की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने के बाद उनका पहला संग्रह "डर्टी लिटल एन्जेल्स" हाल ही में आया है.

लूसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी पढ़ाने के अलावा वे पोएट्री साउथ ईस्ट के मैनेजिंग डाइरेक्टर भी हैं.

उनकी एक कविता पेश है -

मार्डी ग्रास* के दौरान मेरी मां का किन्डरगार्टन पोर्ट्रेट

दर असल वह दयनीय लग रही है, वाकई,
काली हवा का सहारा लिए
उसके बांए हाथ की तीन ऊंगलियां
थामे हुए एक पीला पर्स
उसकी दांई बांह सिर के ऊपर उठी हुई
जैसे वह बचा रही हो
खुद पर गिरते चांदी के सितारों की
बारिश से

एक दरार जैसा उसका मुंह
उगा हुआ उसकी नाक के नीचे
छेदों जैसे दो
उसके गालों पर गड्ढे. उसकी ठोड़ी से लटक रहा
एक गुलाबी कान.

इस समय इसे देखना, हां स्पष्ट है.
लेकिन सम्भवतः तब कौन जानता था
उसके चेहरे की छाया में मौजूद
अर्थ के उन घने रंगों को,
उसकी गरदन के गिर्द तैरती मोतियों की माला
की खामोश प्रासंगिकता,
उसके ऊपर उड़तीं नारंगी चिड़ियां
प्रश्नचिन्हों जैसीं?

या यह कि बीस साल बाद
इस सब का कोई मतलब होगा -
जिस तरह आसमान की तरफ़ देखती हैं उसकी आंखें,
जिस तरह मेरे पिता खड़े हैं उसके पीछे
भीड़ में, हवा में बांहें हिलाते,
जैसे वे डूब रहे हों धीरे धीरे
चेहरों के काले समन्दर में.

(मार्डी ग्रास: एक ईसाई परम्परा के अनुसार जनवरी - फ़रवरी के बीच एपीफ़ेनी और ऐश वैडनेसडे के दौरान पड़ने वाला समय जब खासतौर पर युवा और बच्चे खूब उत्सव मनाते हैं.)

Tuesday, July 12, 2011

ओ मेरे पिता, मैं यूसुफ़ हूं

फ़िलिस्तीनी महाकवि महमूद दरवेश की एक और कविता प्रस्तुत है -

ओ मेरे पिता, मैं यूसुफ़ हूं

पिता! मैं यूसुफ़ हूं
ओ पिता!
मेरे भाई न मुझे प्यार करते हैं
न चाहते हैं मैं उनके बीच रहूं.
ओ पिता, वे मुझ पर आक्रमण करते हैं
मुझ पर पत्थर फेंकते हैं
और मुझ पर करते हैं गालियों की बौछारें.
मेरे भाई चाहते हैं मैं मर जाऊं
ताकि वे मेरी झूठी तारीफ़ें कर सकें.
वे मेरे आगे बन्द कर देते हैं तुम्हारा द्वार
और मुझे निर्वासित कर दिया गया
तुम्हारे खेतों से.

उन्होंने मेरी अंगूर की बेलों में ज़हर भर दिया
ओ पिता!

जब बहती हुई बयार
खेला की मेरे बालों से
वे सब भर गए डाह से
उन्होंने तुम पर और मुझ पर बेतरह ग़ुस्सा किया.
मैंने उनके साथ क्या किया है, पिता?
और क्या नुकसान पहुंचाया है उन्हें?
तितलियां आराम करती हैं मेरे कन्धों पर.
गेहूं झुकते हैं मेरी तरफ़
और चिड़िया मंडराती हैं मेरे हाथों के ऊपर
तब क्या बुरा किया मैंने, पिता?
और मैं ही क्यों?
तुम ही ने मेरा नाम धरा था यूसुफ़
उन्होंने मुझे कुंए में धकेला
और भेड़िये पर उसका इल्ज़ाम लगाया.
ओ पिता!
भेड़िया अधिक दयालु होता है
मेरे भाइयों से
क्या मैंने किसी का बुरा किया
जब मैंने बताया अपने स्वप्न के बारे में?
मैंने सपना देखा, ग्यारह नक्षत्रों का
और सूरज का और चन्द्रमा का
वे सब झुके हुए थे मेरे सामने.

आज का फ़ोटो

दैट डॉन्ट मेक इट जंक


लेनर्ड कोहेन मेरे पसन्दीदा गायक-गीतकारों में काफ़ी ऊंची पायदान पर हैं. कोई तीन साल पहले मैंने उनका एक गीत यहां लगाया था. कोहेन का परिचत उसी पोस्ट से लगाता हुआ आज आपके लिए लेकर आया हूं उनका एक गीत दैट डॉन्ट मेक इट जंक.

कैनेडियन मूल के लेनर्ड कोहेन (जन्म:१९३४) पिछले चालीस सालों से हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण गीतकारों में रहे हैं: समय बीतने के साथ साथ उनका कार्य उत्तरोत्तर रहस्यवादी होता चला गया है. अपनी गम्भीरता और विषयवस्तुओं की रेन्ज के फैलाव के चलते समूचे पश्चिमी संगीतजगत में उनका काम अपनी ख़ास जगह बनाए हुए है. मानव जीवन से रू-ब-रू सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियां उनके गीतों के विषय रहे हैं - अध्यात्म, धर्म, इतिहास, सत्ता, सैक्स - और इन सब पर उन्होंने बहुत निर्ममता से विचार किया है.

गीतकार होने के साथ-साथ कोहेन स्वयं अपने लिखे गीतों को गाते हैं और उनका संगीत भी रचते हैं। वे एक अच्छे उपन्यासकार भी हैं।

एक कवि के रूप में वे पहले ही अपनी जगह बना चुके थे। तीन कविता संग्रह प्रकाशित कर चुकने के बाद १९६७ में उन्होंने अपना पहला अल्बम रिलीज़ किया। 'सॉंग्स ऑफ़ लेनर्ड कोहेन' नामक इस अलबम के बाज़ार में आने के साथ ही विश्व संगीत-जगत को एक नया और अलग क़िस्म का स्वर मिला। अपने संगीत को कोहेन 'यूरोपियन ब्लूज़' का नाम देते हैं

कोहेन के बारे में अधिक जानकारी आपको किसी भी वैबसाइट पर मिल जाएगी. फ़िलहाल आज जो गीत* आप सुनने जा रहे हैं उसे कोहेन ने महान कवि फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का की एक विख्यात कविता से प्रेरित होकर लिखा था. यहां यह बात भी गौरतलब है कि कोहेन ने अपनी बेटी का नाम भी लोर्का रखा है.



ये रहे गीत के बोल -

I fought against the bottle,
But I had to do it drunk –
Took my diamond to the pawnshop –
But that don’t make it junk.

I know that I’m forgiven,
But I don’t know how I know
I don’t trust my inner feelings –
Inner feelings come and go.

How come you called me here tonight?
How come you bother
With my heart at all?
You raise me up in grace,
Then you put me in a place,
Where I must fall.

Too late to fix another drink –
The lights are going out –
I’ll listen to the darkness sing –
I know what that’s about.

I tried to love you my way,
But I couldn’t make it hold.
So I closed the Book of Longing
And I do what I am told.

How come you called me here tonight?
How come you bother with my heart at all?
You raise me up in grace,
Then you put me in a place,
Where I must fall.

I fought against the bottle,
But I had to do it drunk –
Took my diamond to the pawnshop –
But that don’t make it junk.

(यहां जिस गीत की बात की जा रही है उसका लिंक यह रहा - टेक दिस वॉल्ज़)

मेरी बुक्कल दे विच चोर


बरकत सिद्धू से सुनिये बाबा बुल्ले शाह की रचना - मेरी बुक्कल दे विच चोर, मैं किस नूं कूक सुणावां नी. यह रचना आप पहले नुसरत अली ख़ान साहेब की आवाज़ में कबाड़ख़ाने पर सुन चुके हैं -



डाउनलोड लिंक -

http://www.divshare.com/download/15291541-842

अलिफ़ अल्लाह चम्बे दी बूटी - बरकत सिद्धू


"अलिफ़ अल्लाह चम्बे दी बूटी" आपने आरिफ़ लोहार और मीशा शफ़ी की आवाज़ों में सुना था कुछ अर्सा पहले. आज इसी सूफ़ी रचना को स्वर दे रहे हैं बरकत सिद्धू. सन १९४६ में जन्मे बरकत सिद्धू पटियाला घराने से ताल्लुक रखते हैं -



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जब भी क़ैद संकरी होने लगती है मैं हर चीज़ में पसर जाता हूं

महमूद दरवेश की एक कविता -


एक रहस्यमय घटना की तरह

प्रशान्त महासागर के तट पर, पाब्लो नेरूदा के घर में
मुझे यान्निस रित्सोस की याद आई.
एथेन्स उनका स्वागत कर रहा था जो समुद्र से आए थे
रित्सोस की चीख से चमकते एक एम्फ़ीथियेटर में:
"ओ फ़िलिस्तीन
मिट्टी के नाम
और आकाश के नाम
विजयी होओगे तुम ..."

और उसने मुझे गले लगाकर, विजय का संकेत बनाते हुए मेरा परिचय कराया:
"यह मेरा भाई है,"

तब मुझे लगा कि मैं जीत गया, और यह कि टूट गया
किसी हीरे की मानिन्द, और रोशनी के सिवा मेरा कुछ बचा नहीं.

एक आरामदेह रेस्त्रां में, हमने अपने दो पुराने देशों
को लेकर कुछ अंतरंग बातें कीं, और आने वाले कल की बात
कुछ स्मृतियों को लेकर: एथेन्स ज़्यादा ख़ूबसूरत था.
जहां तक याबनूस की बात है, उस में कुछ और समा ही नहीं सकता था, जनरल
ने रोने और शिकार हुओं के आंसू चुराने के वास्ते
पैग़म्बर का मुखौटा उधार ले लिया था: "मेरे प्रिय शत्रु!
मैंने तुम्हें बिना जाने-बूझे मारा था, मेरे प्रिय शत्रु,
क्योंकि तुम मेरे टैंक को तंग कर रहे थे."

रित्सोस बोले: लेकिन स्पार्टा ने
एथेन्स की कल्पना की उठान को तोड़ डाला. सत्य
और न्याय दो जुड़वां भाई हैं जो साथ जीतते हैं. कविता में
मेरे भाई! कविता बीते और आने वाले कल के
दरम्यान एक पुल होती है. हो सकता है थके हुए मछेरे
मिथकों से बाहर जा रहों के साथ घुलमिल जाएं.
और साझा करें थोड़ी वाइन.

मैंने कहा: कविता क्या है ... थोड़े शब्दों में है क्या कविता?
उन्होंने कहा: यह एक रहस्यमय घटना होती है, कविता
मेरे दोस्त, वह अबूझ उत्कंठा होती है
जो किसी चीज़ को बदल देती है इन्द्रजाल में, और
इन्द्रजाल को बना देतॊ है कोई चीज़. तो भी यह सार्वजनिक सौन्दर्य को
साझा करने की हमारी ज़रूरत को समझा सकती है ...

पुराने एथेन्स में उनके घर में कोई समुद्र नहीं,
जहां देवियां जीवन के कामकाज सम्हालती हैं
दयालु मनुष्यों के साथ-साथ, और जहां युवा इलेक्ट्रा
बूढ़ी इलेक्ट्रा को बुलाकर उस से पूछती है: क्या तुम
वास्तव में मैं हो?

और उनके संन्यासियों जैसे संकरे कमरे में छतों के ऊपर
कोई रोशनी नहीं धातु को जंगल को देखती हुई.
उनके चित्र कविताओं की तरह पानी के रंग होते हैं, और मेहमानों के उनके कमरे के
फ़र्श पर चुने हुए कंकड़ों की तरह मढ़ी हुई किताबें.

उन्होंने मुझसे कहा: जब कविता ज़िद्दी हो जाती है, मैं तीतर को
पकड़ने के लिए चट्टानों पर कुछ जालों के चित्र खींच देता हूं.

मैंने कहा: आपकी आवाज़ में समुद्र कहां से आता है, जबकि समुद्र
तो मेरे दोस्त, पहले से ही घेरा जा चुका है?

उन्होंने कहा: स्मृतियों की दिशा से, हालांकि
"मुझे याद नहीं कि कभी युवा था मैं भी."
मैं दो शत्रु भाइयों के साथ जन्मा था:
मेरी क़ैद और मेरी बीमारी.

और आपने अपना बचपन तब कहां खोजा, मैंने पूछा?
अपनी भावुक आन्तरिकता में. मैं बच्चा हूं
और उम्रदराज़ भी. मेरा बच्चा मुझे सिखाता है मेरी उम्रदराज़ उपमाएं.
और मेरा उम्रदराज़ मेरे बच्चे को मेरी वाह्यता में चिन्तन करना सिखाता है.
मेरा वाह्य है मेरा अन्तर
जब भी क़ैद संकरी होने लगती है मैं हर चीज़ में पसर जाता हूं,
और जब जब रात अपनी गश्त पर होती है
मेरी भाषा किसी मोती की तरह चौड़ी हो जाती है

और मैंने कहा: मैंने आपसे बहुत कुछ सीखा. मैंने अपने आप को
जीवन से प्रेम करने को
प्रशिक्षित करना सीखा और यह कि सफ़ेद भूमध्यसागर में
कैसे चलाए जाएं चप्पू रास्ता या घर या
रास्ते और घर के द्वैत को खोजते हुए.
उन्होंने इस तारीफ़ पर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने मुझे कॉफ़ी प्रस्तुत की.
तब कहा: तुम्हारा ओडीसियस सुरक्षित वापस लौट आएगा,
वह औट आएगा ...


प्रशान्त महासागर के तट पर, पाब्लो नेरूदा के घर में
मुझे अपने घर में मौजूद यान्निस रित्सोस की याद आई.
वे प्रवेश कर रहे थे उस वक़्त अपनी एक मिथक में,
देवियों में से एक से कहते हुए: अगर होनी ही है यात्रा,
तो होना चाहिये उसने अनन्त!

(यान्निस रित्सोस - पिछली सदी के महान यूनानी कवि. पाब्लो नेरूदा - अब क्या परिचय दूं. अगर उनका नाम नहीं जानते तो कृपया इस पोस्ट को कूड़ा जान कर छोड़ दें.)