मरहूम उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर को याद कर रहे हैं शिवप्रसाद जोशी
रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर नई दिल्ली के एक आलीशान इलाक़े की बरसाती पर रहते थे उन दिनों. साल 1998 था या 99 जब उनसे मुलाक़ात हुई थी. ज़ी न्यूज़ के लिए उन पर एक स्पेशल रिपोर्ट करने गया था. मेरे साथ चीफ़ कैमरामैन मैथ्यु थे. जो धुरंधर टीवी कैमरामैन रहे हैं. कैमरा ही उस बरसाती के उस एक कमरे में बैठे उस परिवार उस साजोसामान उस बेरौनकी के बीच की रौनक और उस ज़िंदगी की कठिनाई को सामने ला पाता.
रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर, ध्रुपद के बेजोड़ गायक तो थे ही वो एक बहुत विनम्र और धैर्य भरे इंसान भी थे. उनकी शख़्सियत ही लगता था धीरज का एक बहुत निराला थाट था. उनके मुंह में पान था, उनकी पत्नी पलंग के एक कोने पर बैठी थीं. सामान एक के ऊपर एक रखा था, कुछ बिखरा हुआ था और न जाने क्यों उस बिखराव में भी एक करीनापन सा दिखता था. एक कोने में तानपुरा था. ऐसा लगता था कि संगीत ने जैसे उस कमरे को एक जादू में बांधा हुआ है. उन्होंने कहा तक़लीफ़ के लिए माफ़ करेंगे पर क्या करें यही इंतज़ाम है.
क्यों है. वो इन हालात में क्योंकर हैं. सब कुछ पूछा था. वे जवाब याद नहीं आते. बहुत ज़ोर डालने पर भी कुछेक बातें याद रह गई हैं. उस ढेरों सामान और सम्मान के बीच उनकी उपस्थिति उनका बैठना और आवाज़ की विराटता ही याद है. अंततः सब कुछ संगीत में ही घुलमिल कर एक बहुत विशिष्ट अनुभव का हिस्सा बन गया है. फ़हीम जी से कुछ गाने का अनुरोध भी किया गया था. उन्होंने बताया था कि सरकार को अर्ज़ियां आदि दी गई हैं. ढंग के मकान की ज़रूरत भी शायद बताई गई थी.
वे शायद बरसात के दिन थे. बारिश कुछ ही देर पहले छूटी थी और छत पर इधर उधर पानी पसरा हुआ था. गोल गोल इकट्ठा हुआ पानी. उस घर में एक टूटा हुआ आईना भी था. बरसाती के बाहर खुले में एक झूला भी पड़ा था. उसका पेंट उखड़ा हुआ था और लोहा काला पड़ गया था. लेकिन उस पर करीने से गद्दी और मसनद रखी थी. फ़हीम जी को उस पर भी बैठने की ग़ुज़ारिश की गई. और मैथ्यु ने बेमिसाल कटअवेज़ बनाए. उनके हावभाव और मुद्राएं आसमान में इधर उधर फैले बादलों और उस नीलेपन के नीचे जैसे नाद को ही खोजती थीं. उन कटअवेज़ में फ़ॉर्मुले नहीं थे, वे उनके आसपास वंदना भाव से जमा नहीं किए गए थे. इस अनुशासन के लिए मैंने बाद में मैथ्यु को बधाई दी. वो सीखने लायक काम था.
हम संगीत के साथ जीवन की संगति के बारे में अपनी रिपोर्ट बनाना चाहते थे. इस संगति में शख़्सियत को भी आना था. फ़हीम जी का चौड़ा ललाट ऊपर की ओर काढ़े बाल और होंठो के कोनों पर पान की लाली और आवाज़ में पैनापन, और पारदर्शिता और बहाव.
रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर के बाज़ार में कम कैसेट दिखते हैं. उनमें एक बात ये थी संकोच की. दूर रहने की. लोकप्रियता की डगर पर वो कम ही दिखे. उनके लिए स्वर आत्मा का ही एक रूप था. वो उसे तलाश करते रहते थे. शायद मुश्किलों के बीच उस बरसाती में रहना भी उस विकट तलाश की एक एक्सरसाइज़ ही थी.
डागर घराने की ध्रुपद गायकी पर रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर की मुस्तैदी कुछ वैसी ही थी जैसी ख़्याल गायकी में किराना घराने की शास्त्रीयता के प्रति गंगूबाई हंगल की.
फ़हीमजी उन साधकों में से हैं जिनसे हिंदुस्तानी तहज़ीब की बुनियादी संरचना बड़े से बड़े झटके सहती और मानवीय सहिष्णु और साहसी बनी रहती आई है.
Sunday, August 7, 2011
Saturday, August 6, 2011
पत्थर चाहता है अनन्त तक पत्थर बने रहना, और बाघ बाघ
बोर्हेस की यह रचना साहित्य की किस विधा या धारा से जोड़ कर देखी जानी चाहिये, मैं नहीं जानता, पर इसे पढ़ना मुझे बार-बार एक थर्राहट से भर देता है.
बोर्हेस और मैं
वह है दूसरा बोर्हेस जिस के साथ चीज़ें घटती हैं. मैं भटकता फिरता हूं बूएनोस आयरेस में और आजकल तकरीबन मिकानीकी तरीक़े से ठहरकर प्रवेशद्वार पर मेहराबदार हॉल और लोहे के गेट की जालियों को निहारता हूं - मुझे डाक की मार्फ़त बोर्हेस की ख़बरें मिलती है, मैं उसका नाम पढ़ता हूं प्रोफ़ेसरों की जीवनियों वाली एक सूची में. मुझे पसन्द हैं रेतघड़ियां,नक्शे, अट्ठारहवीं शताब्दी की मुद्रण कला, शब्द व्युत्पत्तिशास्त्र, कॉफ़ी का स्वाद और स्टीवेन्सन का गद्य - दूसरा बोर्हेस भी यही सब पसन्द करता हैं लेकिन एक अर्थहीन तरीक़े से - वह उन्हें किसी अभिनेता के औज़ारों में तब्दील कर देता है. यह अतिकथन होगा कि हमारा सम्बन्ध आक्रामक है; मैं जीवित रहता हूं, बना रहता हूं ताकि बोर्हेस अपना साहित्य बुन सके. और वह साहित्य मुझे न्यायोचित ठहराता है. मुझे यह स्वीकार करने में कोई तकलीफ़ नहीं कि उसके कुछ पन्ने ठीकठाक हैं लेकिन वे मुझे बचा नहीं पाएंगे, सम्भवतः इसलिए कि अच्छे लेखन पर किसी का अधिकार नहीं होता, उस दूसरे का भी नहीं, अधिकार सिर्फ़ भाषा और परम्परा का होता है. बाक़ी यह कि मेरा अदृश्य हो जाना पूर्वनियत है, निश्चित, और मेरा कुछ अंश दूसरे वाले में बच रहेगा. धीरे-धीरे मैं उसके आगे समर्पण कर रहा हूं हालांकि हेरफ़ेर और अतिरंजना की उसकी विकृत प्रवृत्ति को मैं साफ़-साफ़ समझता हूं. स्पिनोज़ा समझ गया था कि सारी चीज़ें वैसे ही रहना चाहती हैं जैसी वे हैं - पत्थर चाहता है अनन्त तक पत्थर बने रहना, और बाघ बाघ. मैं बना रहूंगा बोर्हेस में, स्वयं में नहीं (अगर मैं स्वयं कुछ हूं तो), तो भी मैं अपने को उसकी किताबों में कम बाक़ी चीज़ों में ज़्यादा पहचानता हूं, गिटार की परिश्रमी झंकार से भी कम. कई साल पहले मैंने स्वयं को उस से मुक्त करना चाहा था और उपनगरीय मितकों से मैं जा पहुंचा समय और अनन्त के खेल में, लेकिन अब वे बोर्हेस के खेल हैं और मुझे कुछ नई चीज़ों की बाबत सोचना पड़ेगा. इस तरह एक उड़ान है मेरा जीवन और मेरा सब कुछ बिसर जाएगा सब कुछ हो जाएगा विस्मृति का या उस दूसरे का.
हम दोनों में से किस ने लिखा है इस पन्ने को, मैं नहीं जानता.
बोर्हेस और मैं
वह है दूसरा बोर्हेस जिस के साथ चीज़ें घटती हैं. मैं भटकता फिरता हूं बूएनोस आयरेस में और आजकल तकरीबन मिकानीकी तरीक़े से ठहरकर प्रवेशद्वार पर मेहराबदार हॉल और लोहे के गेट की जालियों को निहारता हूं - मुझे डाक की मार्फ़त बोर्हेस की ख़बरें मिलती है, मैं उसका नाम पढ़ता हूं प्रोफ़ेसरों की जीवनियों वाली एक सूची में. मुझे पसन्द हैं रेतघड़ियां,नक्शे, अट्ठारहवीं शताब्दी की मुद्रण कला, शब्द व्युत्पत्तिशास्त्र, कॉफ़ी का स्वाद और स्टीवेन्सन का गद्य - दूसरा बोर्हेस भी यही सब पसन्द करता हैं लेकिन एक अर्थहीन तरीक़े से - वह उन्हें किसी अभिनेता के औज़ारों में तब्दील कर देता है. यह अतिकथन होगा कि हमारा सम्बन्ध आक्रामक है; मैं जीवित रहता हूं, बना रहता हूं ताकि बोर्हेस अपना साहित्य बुन सके. और वह साहित्य मुझे न्यायोचित ठहराता है. मुझे यह स्वीकार करने में कोई तकलीफ़ नहीं कि उसके कुछ पन्ने ठीकठाक हैं लेकिन वे मुझे बचा नहीं पाएंगे, सम्भवतः इसलिए कि अच्छे लेखन पर किसी का अधिकार नहीं होता, उस दूसरे का भी नहीं, अधिकार सिर्फ़ भाषा और परम्परा का होता है. बाक़ी यह कि मेरा अदृश्य हो जाना पूर्वनियत है, निश्चित, और मेरा कुछ अंश दूसरे वाले में बच रहेगा. धीरे-धीरे मैं उसके आगे समर्पण कर रहा हूं हालांकि हेरफ़ेर और अतिरंजना की उसकी विकृत प्रवृत्ति को मैं साफ़-साफ़ समझता हूं. स्पिनोज़ा समझ गया था कि सारी चीज़ें वैसे ही रहना चाहती हैं जैसी वे हैं - पत्थर चाहता है अनन्त तक पत्थर बने रहना, और बाघ बाघ. मैं बना रहूंगा बोर्हेस में, स्वयं में नहीं (अगर मैं स्वयं कुछ हूं तो), तो भी मैं अपने को उसकी किताबों में कम बाक़ी चीज़ों में ज़्यादा पहचानता हूं, गिटार की परिश्रमी झंकार से भी कम. कई साल पहले मैंने स्वयं को उस से मुक्त करना चाहा था और उपनगरीय मितकों से मैं जा पहुंचा समय और अनन्त के खेल में, लेकिन अब वे बोर्हेस के खेल हैं और मुझे कुछ नई चीज़ों की बाबत सोचना पड़ेगा. इस तरह एक उड़ान है मेरा जीवन और मेरा सब कुछ बिसर जाएगा सब कुछ हो जाएगा विस्मृति का या उस दूसरे का.
हम दोनों में से किस ने लिखा है इस पन्ने को, मैं नहीं जानता.
उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर को श्रद्धांजलि
ख़लीफ़ा उस्ताद अलाहबन्दे रहीमुद्दीन ख़ान डागर के सुपुत्र पद्मभूषण उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर साहब का बीती 27 जुलाई को इन्तकाल हो गया. ध्रुपद गायन में शीर्ष स्थान रखने वाले इस ख़ानदान के इस वरिष्ठ पुरोधा के जाने से जो जगह ख़ाली हुई है उसे भरा जा सकना नामुमकिन है.
२ फ़रवरी १९२७ को राजस्थान के अलवर में जन्मे डागर साहब को पांच साल की आयु में उनके चाचा उस्ताद नसीरुद्दीन ख़ान डागर ने संगीत के शुरुआती पाठ सिखाए, उसके बाद चला पैंतीस सालों की कठिन साधना का दौर. इन पैंतीस सालों के बारे में एक दफ़ा उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर ने स्वयं कहा था "इस वक़्फ़े में मुझे सारे के सारे बावन अलंकारों, नाद योग, रुद्र वीणा और संस्कृत पर महारत हासिल करने के साथ साथ ध्रुपद-धमार को पूरी तरह साध लेना था.
ध्रुपद के बारे में वे कहा करते थे - "मेरे पूर्वज शत शास्त्री बाबा बेहराम ख़ान डागर के शाब्दों में ध्रुपद, जैसा कि हमारी डागर वाणी में प्रस्तुत किया जाता है, रागात्मक-स्वरात्मक-शब्दात्मक-वर्णात्मक-लयात्मक और रसात्मक होना चाहिए."
यकीन जानिए ध्रुपद गायकी ऐसी ही जटिल और श्रमसाध्य होती है. उस्ताद को श्रद्धांजलि के साथ उनका गाया राग शुद्ध सारंग -
बारिश एक ऐसी चीज़ है जो अतीत में घटती है - होर्हे लुई बोर्हेस
बारिश
होर्हे लुई बोर्हेस
आख़िरकार उजली हो गई दोपहर
क्योंकि बारिश गिर रही है, औचक और बारीक.
गिर रही है या गिर चुकी. इसमें कोई विवाद नहीं
कि बारिश एक ऐसी चीज़ है जो अतीत में घटती है.
इसे गिरता हुआ सुनने वाला लौटा लाता है एक समय जो खो गया था
जब एक विकट हवा उसके सामने खोलने ही को थी
एक फूल को जिसका नाम ग़ुलाब
और उसके लाल रंग के पेचीदा लालपन को
गिरती हुई जब तक कि खिड़की के हर एक शीशे को अन्धा न बना दे
एक भटके हुए उपनगर में यह बारिश
भीतर एक लता पर जीवन भर देगी काले अंगूरों में
एक आंगन था अब नहीं है.
बारिश की झड़ी से गुज़रकर आती बहुप्रतीक्षित एक आवाज़
मेरे पिता की है. कभी नहीं हुई थी उनकी मृत्यु.
Friday, August 5, 2011
ग्रेटा गार्बो की एक फ़ोटो, एक पोस्टर और होर्हे लुई बोर्हेस का एक बयान
मैं उस (ग्रेटा गार्बो) से मोहब्बत करता था जैसा कि मेरे समय का हर आदमी करता था. "अन्ना क्रिस्टी" में ग्रेटा रात और कोहरे से निकल कर आती थी और नाविकों के एक शराबख़ाने में प्रवेश करती थी. बार का काउन्टर लम्बा था. उसने हौले हौले चलना शुरू किया ... और दुनिया भर के हम सारे पुरुष जानते थे कि उस के रुकने के बाद हम पहली दफ़ा ग्रेटा गार्बो की आवाज़ सुनेंगे, और वह ऐसा होगा मानो ख़ुद ईश्वर बोलने वाला हो. काउन्टर वाक़ई काफ़ी लम्बा था. जब वह उसके आख़िरी छोर पर पहुंची उसने अपनी ऊबड़खाबड़ आवाज़ में सिर्फ़ इतना कहा - "आई वॉन्ट अ स्कॉच ..." ... हम सब के भीतर एक झुरझुरी सी मची.
- होर्हे लुई बोर्हेस
(पोस्टर वाला फ़ोटो मशहूर फ़ोटोराफ़र इल्से बिंग का खींचा हुआ, १९३३. यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि अन्ना क्रिस्टी ग्रेटा गार्बो की पहली बोलती फ़िल्म थी.)
कला वही हरी अनन्तता है - होर्हे लुई बोर्हेस
कविता की कला
-होर्हे लुई बोर्हेस
समय और पानी से बनी एक नदी को निहारना
और याद करना समय एक और ही नदी है.
जानना कि हम भटकते फिरते हैं एक नदी की तरह
और पानी की तरह अदृश्य हो जाते हैं हमारे चेहरे.
महसूस करना कि जागना एक दूसरा ही सपना है
कि सपना न देखने के सपने और मौत
जिसका भय हमें हड्डियों में महसूस होता है वह मौत है
जिसे हर रात हम एक सपना कहते हैं.
हर दिन और बरस में देखना एक प्रतीक
आदमी के सारे दिनों और उसके बरसों का,
और बरसों की नाराज़गी को तब्दील कर देना
एक संगीत में, एक ध्वनि और एक प्रतीक में.
मौत में देखना एक सपना, सूर्यास्त में
एक सुनहली उदासी, ऐसी होती है कविता
विनम्र और अमर, कविता,
लौटती हुई, भोर और सूर्यास्त की मानिन्द.
कभी-कभी शाम को एक चेहरा होता है
ज देखता है हमें एक आईने की गहराइयों से.
कला ने होना चाहिए उसी तरह का आईना
हम में से हरेक को उसका चेहरा दिखलाता हुआ.
कहते हैं, चमत्कारों से ऊबा हुआ यूलीसिस
प्रेमातिरेक में हरे और विनम्र इथाका को देख कर
रो पड़ा था. कला वही इथाका है
एक हरी अनन्तता, न कि चमत्कार.
अन्तहीन होती है कला बहती नदी जैसी
गुज़रती हुई, तो भी बनी हुई, उसी
अधीर हेराक्लिटस के लिए एक आईना, जो है तो वही
तो भी कोई दूसरा ही, बहती हुई नदी की तरह.
(यूलीसिस - यूलिसिस ओडीसियस नामक मिथकीय यूनानी सम्राट का दूसरा नाम था. महाकवि होमर के महाकाव्य ओडिसी का नायक यूलीसिस इथाका का राजा था, इथाका - यूनान के आयोनियाई समुद्र में अवस्थित एक सुन्दर द्वीप, हेराक्लिटस - सुकरात से पहले के एक यूनानी दार्शनिक जो ब्रह्माण्ड में बदलाव को सबसे केन्द्रीय तत्व मानते थे और उन्हें अपने इस कथन के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है कि "आप एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते")
क्या कभी नहीं मिटेगी समय की भूख?
पीयर पाओलो पासोलोनी (मार्च ५ १९२२ - नवम्वर १६, १९७५) इटली की सबसे बहुमुखी प्रतिभाओं में थे. वे फ़िल्म निर्देशक, कवि, लेखक, दार्शनिक, भाषाविद, स्तम्भकार, चित्रकार और राजनैतिक कार्यकर्ता थे. ऐसी अद्वितीय सांस्कृतिक योग्यताओं से भरपूर पासोलिनी अपने समय के सबसे विवादास्पद लोगों में भी थे.’
पासोलिनी की एक कविता आप को इस लिए पढ़ा रहा हूं कि "इल पोस्तिनो" फ़िल्म के नायक और मेरे प्रियतम अभिनेताओं में से एक मासीमो त्रोइसी ने एकाधिक साक्षात्कारों में पासोलिनी को अपना पसन्दीदा कवि बताया था. आज पासोलिनी की कविता की एक झलक. लम्बी पोस्ट शीघ्र -
चुराए गए दिन
हम जो निर्धन हैं, बहुत कम वक़्त होता है हमारे पास
यौवन और सौन्दर्य के लिए
वैसे आप लोगों का काम हमारे बग़ैर भी चल सकता है.
ग़ुलाम बना देता है हमारा जन्म हमें!
तितलियां जिनका सारा सौन्दर्य नोच लिया
और दफ़ना दिया गया समय की कोष में
धनवान कोई हरज़ाना नहीं देते हमारे समय का
सौन्दर्य से चुराए गए वे दिन
जो हमारे थे और हमारे पुरखों के
क्या कभी नहीं मिटेगी समय की भूख?
Thursday, August 4, 2011
मैं धन्धे का भविष्य बचा रहा हूं
यह वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की ताज़ातरीन कविता है और अब तक अप्रकाशित. एक ऐसे पहलू को छूती जिस से आम तौर पर हमारे कविगण अक्सर बच कर निकल जाना बेहतर समझते हैं.
धन्धे का भविष्य
बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाते आतंकी से
आतंकी दोस्त ने कहा - "अपना अन्त बेहद क़रीब समझो
तुम अपने धर्म से भटक गए हो"
बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाते आतंकी ने कहा -
"धन्धा सब सिखा देता है
मैं इन्सानियत फैलाने के लिए औलादें नहीं बचा रहा."
"बच्चे नहीं होंगे तो मानव-बम किसे बनाओगे
मैं धन्धे का भविष्य बचा रहा हूं."
धन्धे का भविष्य
बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाते आतंकी से
आतंकी दोस्त ने कहा - "अपना अन्त बेहद क़रीब समझो
तुम अपने धर्म से भटक गए हो"
बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाते आतंकी ने कहा -
"धन्धा सब सिखा देता है
मैं इन्सानियत फैलाने के लिए औलादें नहीं बचा रहा."
"बच्चे नहीं होंगे तो मानव-बम किसे बनाओगे
मैं धन्धे का भविष्य बचा रहा हूं."
निज़ार क़ब्बानी की एक और प्रेम कविता
जब मैंने तुमसे कहा था
जब मैंने तुमसे कहा था
"मैं तुमसे प्यार करता हूं"
मैं जानता था
कि मैं एक कबीलाई कानून के ख़िलाफ़
तख़्तापलट का नेतृत्व कर रहा था,
कि मैं बजा रहा था बदनामी की घन्टियां.
मैं सत्ता हथियाना चाहता था
ताकि जंगलों में
पत्तियों की संख्या बढ़ा सकूं
मैं सागर को बनाना चाहता था और अधिक नीला
बच्चों को और अधिक निष्कपट.
मैं बर्बर युग का ख़ात्मा करना चाहता था
और क़त्ल करना आख़िरी ख़लीफ़ा का.
जब मैंने तुम्हें प्यार किया
मेरी मंशा यह थी
कि हरम के दरवाज़ों को तहस-नहस कर डालूं
स्त्रियों के स्तनों की रक्षा कर सकूं
पुरुषों के दांतों से:
ताकि उनके कुचाग्र
हवा में ख़ुश होकर नाच सकें.
जब मैंने तुमसे कहा था
"मैं तुमसे प्यार करता हूं"
मैं जानता था
आदिम लोग मेरा पीछा करेंगे
ज़हरीले भालों के साथ
धनुष-बाणों के साथ.
मेरी फ़ोटो चस्पां कर दी जाएगी हर दीवार पर
मेरी उंगलियों के निशान बांट दिए जाएंगे
तमाम पुलिस स्टेशनों में,
बड़ा ईनाम दिया जाएगा उसे
जो मेरा सिर पहुंचाएगा उन तलक
जिसे वे शहर के प्रवेशद्वार पर टांगेंगे
एक फ़िलिस्तीनी सन्तरे की तरह
जब तुम्हारा नाम लिखा था मैंने
ग़ुलाबों की कापियों में
सारे अनपढ़ों
सारे बीमार और नपुंसक पुरुषों ने
उठ खड़े होना था मेरे ख़िलाफ़
जब मैंने तय किया आख़िरी ख़लीफ़ा का क़त्ल करना
घोषणा करने को
प्यार के राज्य की स्थापना की
जिसकी मलिका का ताज तुम्हें पहनाया
मैं जानता था
सिर्फ़ चिड़ियां
गाएंगी मेरे साथ क्रान्ति के बारे में.
Wednesday, August 3, 2011
एक पुरानी किताब की कविताएँ...(१) (राजेश जोशी)
इस बार छुट्टियों में घर पर हमेशा की तरह पुरानी अलमारियां टटोलते हुए एक किताब हाथ लगी.."आठवें दशक के सशक्त जनवादी कवि और प्रतिबद्ध कविताएँ' -सम्पादक स्वामी शरण स्वामी। (अगस्त 1982)अब चूंकि इधर कुछ दिनों से कबाड़खाना पर आकर कविताएँ पढ़ने लगा हूँ, इसलिए माँगकर किताब साथ दिल्ली ले आया। १५५ कवियों की कविताएँ हैं इसमें... कुछ नामी और कुछ जिन्हें नहीं जानता। वैसे इसमें समकालीन कविता पर एक लेख हैं उसे पढ़कर अच्छा नहीं लगा..(अपनी समझ कोई बहुत तगड़ी नहीं है लेकिन रघुवीर सहाय, धूमिल और कुंवर नारायण को एक झटके में रिजेक्ट कर देना हजम नहीं हुआ) लेकिन कुछ अच्छी कविताएँ इसमें मिली। अभी अभी राजेश जोशी जी की एक जबरदस्त कविता अनुनाद पर पढी थी, इसलिए कुछ उसी धरातल पर उनकी एक कविता इस संग्रह से लगा रहा हूँ...
बिजली सुधारने वाले
- राजेश जोशी
अक्सर झड़ी के दिनों में
जब सन्नाट पड़ती है बौछार
और अंधड़ चलते हैं
आपस में गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं
कई तार या कोई नंगा तार
बिजली के खम्बे पर पानी में भीगता
चिंगारियों में चटकता है
एक आग के फूल-सा झरता है
अचानक
उमड़ आयी अँधेरे की नदी में
मोहल्ले के मोहल्ले
घुप्प अँधेरे में डूब जाते हैं
वे आते हैं
बिजली सुधारने वाले
पानी से तरबतर टोप लगाए।
पुरानी बरसाती की दरारों और कालर
से रिसता पानी उन्हें अन्दर तक
भिगो चुका होता है।
भींगते-भागते वे आते हैं
अँधेरे की दीवार में
अपनी छोटी-सी टार्च से
छेद करते हुए।
वे आते हैं
हाथों पर रबर के दास्ताने चढ़ाए
साइकिल पर लटकाए एल्युमिनियम की
फोल्डिंग नसैनी लकड़ी की लम्बी छड़
और एक पुराने झोले में
तार,पेंचकस,टेस्टर
और जाने क्या-क्या भरे हुए-वे आते हैं
खम्बे पर टिकाते हैं
अपनी नसैनी को लंबा करते हुए
और चीनी मिट्टी के छोटे-छोटे कानों को
उमेठते एक-एक कर खींचते हैं
देखते हैं, परखते हैं
और फिर क़स देते हैं
किसी में एक पतला-सा तार
और एक बार फिर
जगमग हो जाती है
हर एक घर की आँख
वे अपनी नसैनी उतारते हैं
और बढ़ जाते हैं
अगले मोहल्ले की तरफ
अगले अंधेरों की ओर
अपनी सूची में दर्ज शिकायतों पर
निशान लगाते हुए....
(पुनश्च: जब 'नसैनी' जैसे शब्द, जो अपने मध्य-प्रदेशीय बचपन का एक हिस्सा है, को कविता में देखता हूँ, तो अनायास ही अपनी लगने लगती है, आश्चर्य है॥ :))
बिजली सुधारने वाले
- राजेश जोशी
अक्सर झड़ी के दिनों में
जब सन्नाट पड़ती है बौछार
और अंधड़ चलते हैं
आपस में गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं
कई तार या कोई नंगा तार
बिजली के खम्बे पर पानी में भीगता
चिंगारियों में चटकता है
एक आग के फूल-सा झरता है
अचानक
उमड़ आयी अँधेरे की नदी में
मोहल्ले के मोहल्ले
घुप्प अँधेरे में डूब जाते हैं
वे आते हैं
बिजली सुधारने वाले
पानी से तरबतर टोप लगाए।
पुरानी बरसाती की दरारों और कालर
से रिसता पानी उन्हें अन्दर तक
भिगो चुका होता है।
भींगते-भागते वे आते हैं
अँधेरे की दीवार में
अपनी छोटी-सी टार्च से
छेद करते हुए।
वे आते हैं
हाथों पर रबर के दास्ताने चढ़ाए
साइकिल पर लटकाए एल्युमिनियम की
फोल्डिंग नसैनी लकड़ी की लम्बी छड़
और एक पुराने झोले में
तार,पेंचकस,टेस्टर
और जाने क्या-क्या भरे हुए-वे आते हैं
खम्बे पर टिकाते हैं
अपनी नसैनी को लंबा करते हुए
और चीनी मिट्टी के छोटे-छोटे कानों को
उमेठते एक-एक कर खींचते हैं
देखते हैं, परखते हैं
और फिर क़स देते हैं
किसी में एक पतला-सा तार
और एक बार फिर
जगमग हो जाती है
हर एक घर की आँख
वे अपनी नसैनी उतारते हैं
और बढ़ जाते हैं
अगले मोहल्ले की तरफ
अगले अंधेरों की ओर
अपनी सूची में दर्ज शिकायतों पर
निशान लगाते हुए....
(पुनश्च: जब 'नसैनी' जैसे शब्द, जो अपने मध्य-प्रदेशीय बचपन का एक हिस्सा है, को कविता में देखता हूँ, तो अनायास ही अपनी लगने लगती है, आश्चर्य है॥ :))
Monday, August 1, 2011
मुहम्मद उमर मुकरी
एक ज़माने तक बम्बई के फ़िल्म संसार का अपरिहार्य हिस्सा रहे कैरेक्टर आर्टिस्ट्स पर आज से कबाड़ख़ाना एक नई सीरीज़ शुरू कर रहा है.
हिन्दी फ़िल्मों में काम करने से पहले मुहम्मद उमर मुकरी बाक़ायदा एक क़ाज़ी हुआ करते थे. यूसुफ़ ख़ान यानी दिलीप कुमार उनके साथ ही स्कूल जाया करते थे और दोनों ने अपने फ़िल्म करियर का आग़ाज़ सन १९४५ में बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्म प्रतिमा से किया था. छः सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में काम करने वाले मुकरी ५ जनवरी १९२२ को जन्मे थे. ४ सितम्बर २००४ को दिल का दौरा पड़ने से उनका देहान्त हुआ.
उनकी सुपुत्री नसीम बॉलीवुड में डॉयलॉग और स्क्रीनप्ले राइटिंग के अलावा अभिनय भी करती हैं.
देखिये फ़िल्म बॉम्बे टू गोआ से एक दृश्य - मुकरी के साथ में बेजोड़ महमूद भी हैं
हिन्दी फ़िल्मों में काम करने से पहले मुहम्मद उमर मुकरी बाक़ायदा एक क़ाज़ी हुआ करते थे. यूसुफ़ ख़ान यानी दिलीप कुमार उनके साथ ही स्कूल जाया करते थे और दोनों ने अपने फ़िल्म करियर का आग़ाज़ सन १९४५ में बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्म प्रतिमा से किया था. छः सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में काम करने वाले मुकरी ५ जनवरी १९२२ को जन्मे थे. ४ सितम्बर २००४ को दिल का दौरा पड़ने से उनका देहान्त हुआ.
उनकी सुपुत्री नसीम बॉलीवुड में डॉयलॉग और स्क्रीनप्ले राइटिंग के अलावा अभिनय भी करती हैं.
देखिये फ़िल्म बॉम्बे टू गोआ से एक दृश्य - मुकरी के साथ में बेजोड़ महमूद भी हैं
मैं तुम्हारा शरणार्थी चन्द्रमा हूं
निज़ार क़ब्बानी की एक ख़ासी लम्बी कविता पेश कर रहा हूं जिसे उन्होंने लन्दन में लम्बे प्रवास के बाद वापस अपने नगर दमिश्क पहुंचने पर दमिश्क पर ही लिखा था. इस कविता को समकालीन अरब कविता में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है -
ये मेरे साथ क्या कर रहे हो, दमिश्क?
एक
इस दफ़ा मेरी आवाज़ गूंजती है दमिश्क से
वह गूंजती है शाम में
मेरे मां और पिता के घर से. मेरी देह का भूगोल बदलता है.
मेरे रक्त की कोशिकाएं हरी हो जाती हैं.
हरी है मेरी वर्णमाला
शाम में. मेरे मुंह के लिए उभरता है एक नया मुंह
मेरी आवाज़ के लिए उभरती है एक नई आवाज़
और एक कबीला बन जाती हैं
मेरी उंगलियां.
दो
बादलों की पीठ की सवारी करता
मैं लौटता हूं दमिश्क
दुनिया के सबसे सुन्दर दो घोड़ों की सवारी करता
जुनून का घोड़ा
कविता का घोड़ा.
मैं लौटता हूं साठ साल बाद
अपनी गर्भनाल खोजने
दमिश्क के उस नाई को खोजने जिसने मेरा ख़तना किया था,
उस दाई को खोजने जिसने पलंग के नीचे चिलमची में उछाला था मुझे
और मेरे पिता से पाया था सोने का एक सिक्का,
मार्च १९२३ के उस दिन
उसने छोड़ा था हमारा घर
उसके हाथ सने हुए थे कविता के रक्त से ...
तीन
मैं लौटता हूं उस गर्भ तक जिसमें मेरा निर्माण हुआ था ...
पहली किताब तक जिसे मैंने पढ़ा था ...
पहली स्त्री तक जिसने मुझे पढ़ाया था ...
प्रेम के भूगोल तक ...
और स्त्रियों के भूगोल तक ...
चार
मैं लौटता हूं
तमाम महाद्वीपों में मेरे हाथ-पैरों के बिखर चुकने के बाद
तमाम होटलों में मेरा कफ़ छितर चुकने के बाद
मेरी मां की चादरों को सदाबहार के साबुन से खुशबूदार बना लिए जाने के बाद
मुझे सोने के लिए और कोई पलंग नहीं मिला
और तेल और अजवाइन की उस "दुल्हन" के बाद
जिसे वह बिछा देगी मेरे सामने
अब दुनिया की और कोई "दुल्हन" मुझे ख़ुश नहीं करती
और बेल के उस मुरब्बे के बाद, जिसे वह अपने हाथों बनाएगी
मैं सुबह नाश्ते को ले कर अब उतना उत्साहित नहीं रहता
और काली बेरियों के शरबत के बाद जिसे वह तैयार करेगी
किसी और शराब से नहीं होता नशा मुझे ...
पांच
मैं दाख़िल होता हूं उमय्याद की मस्जिद के अहाते में
और वहां मौजूद हर शख़्स से दुआसलाम करता हूं
एक कोने से ... कोने तक
एक खपरैल से ... खपरैल तक
फ़ाख़्ते से... फ़ाख़्ते तक
मैं कूफ़ी लिखावट के बग़ीचों में टहलता हूं
और ईश्वर के शब्दों के सुन्दर फूल तोड़ता हूं
और अपनी आंखों से सुनता हूं पच्चीकारी की आवाज़
और अकीक की तस्बीहों का संगीत
इलहाम और परमानन्द की अवस्था मुझे अपने आग़ोश में ले लेती है
सो मैं अपने सामने पड़ने वाली पहली मीनार की सीढ़ियां चढ़ना शुरू करता हूं
जो पुकार रही -
"चमेली के पास आओ"
"चमेली के पास आओ"
छः
अपनी इच्छाओं की बारिशों के दाग़ लिए
तुम तक लौटता हुआ
लौटता हुआ
अपनी ज़ेबों को
मेवों, हरे आलूचों, और हरे बादामों से भरने
लौटता हुआ घोंघे के अपने कवच में
लौटता हुआ अपने जन्म के पलंग तक
क्योंकि वर्साय के फ़व्वारे
फ़ाउन्टेन कैफ़े के सामने कुछ भी नहीं
और पेरिस का ले हाल
शुक्रवार की बाज़ार के सामने कुछ भी नहीं
और लन्दन का बकिंघम पैलेस
आज़म पैलेस के सामने कुछ भी नहीं
और वेनिस में सान मारको के कबूतर
उमय्याद की मस्जिद के फ़ाख़्तों से ज़्यादा भाग्यवान नहीं
और लेस इन्वेलिदेस में नेपोलियन की कब्र
सालाह अल-दिन अल-अय्यूबी के मकबरे से ज़्यादा शानदार नहीं
सात
मैं टहलता हूं दमिश्क की तंग गलियों में
खिड़कियों के पीछे, जागती हैं शहदभरी आंखें
और मुझे सलाम करती हैं ...
सोने के अपने कंगन पहने हैं सितारे
और मुझे सलाम करते हैं ...
अपनी बुर्जियों से उतरते हैं कबूतर
और मुझे सलाम करते हैं ...
और साफ़-सुथरी शामी बिल्लियां बाहर निकल आती हैं
जो हमारे साथ जन्मी ...
हमारे साथ बड़ी हुईं ...
और हमारे साथ उनके निकाह हुए ...
मुझे सलाम करने ...
आठ
मैं ख़ुद को डुबो लेता हूं बुज़ुर्रिया सौक में
मसालों के एक बादल पर तान देता हूं एक पाल
लौंग ...
और दालचीनी ...
और
कैमोमाइल के बादल
मैं ग़ुलाब के पानी से नहाता हूं एक दफ़ा
और भावनाओं के पानी से कई बार
और मैं भूल जाता हूं - जब मैं सौक अल-अत्तारीन में होता हूं -
नीना रिकी और
कोको चैनल के तमाम मिश्रण
मेरे साथ क्या कर रहे हो, दमिश्क?
क्या तुमने मेरी संस्कृति बदल दी है? मेरा सौन्दर्यबोध?
क्योंकि मुझे भुला दी गअई है लिकरिश के प्यालों की खनक
राख्मानिनोफ़ की पियानो क्न्सर्ट ...
शाम के बग़ीचे किस तरह रूपान्तरित कर देते हैं मुझे?
क्योंकि मैं बन गया हूं दुनिया का पहला संगीत संचालक
जो राह दिखा रहा है
बेंत के पेड़ों के एक ऑर्केस्ट्रा को.
(नीना रिकी और कोको चैनल - बहुत महंगी ख़ुशबुओं के ब्रान्ड)
नौ
मैं तुम तक आया हूं
दमिश्क के ग़ुलाब के इतिहास से
जो खुशबू के इतिहास को घनीभूत बना देता है ...
अल-मुतनब्बी की स्मृति से
जो कविता के इतिहास को घनीभूत बना देती है ...
मैं तुम तक आया हूं ...
कड़वे सन्तरे की बौरों से ...
और नारसिसस से ...
और "अच्छे बच्चे" से ...
उस पहले से जिसने मुझे चित्र बनाना सिखाया ...
मैं तुम तक आया हूं ...
शाम की स्त्रियों की हंसी से ...
जिन्होंने मुझे सबसे पहले संगीत सिखाया ...
हमारी गली की टूटी टोंटियों से
जिन्होंने मुझे सबसे पहले रोना सिखाया
और अपनी मां की प्रार्थना करने वाली दरी से
जिसने मुझे सबसे पहले सिखाया
ईश्वर को जाने का रास्ता ...
दस
मैं याददाश्त की दराज़ें खोलता हूं
एक ... फिर दूसरी
मुझे याद आती है ...
मुआविया गली की अपनी वर्कशॉप से बाहर आते हुए अपने पिता की
मुझे इक्के याद आते हैं ...
और कंटीली नाशपातियां बेचने वाले ...
और अल-रुब्वा के कहवाघर
जो अरक़ की पांच कुप्पियों के बाद - करीब करीब
नदी में गिर जाया करते थे
मुझे रंगबिरंगे तौलिये याद आते हैं
जब वे नृत्य कर रहे होते थे हमाम अल-खैय्यातिन के दरवाज़े पर
मानो वे मना रहे हैं अपना राष्ट्रीय अवकाश.
मुझे दमिश्क के घर याद आते हैं
तांबे के उनके दरवाज़ों के हत्थे
और चमकीली खपरैलों से सजी हुई उनकी छतें
और उनके भीतरी अहाते
जो आपको स्वर्ग के विवरणों की याद दिलाते हैं ...
ग्यारह
दमिश्क का मकान
वास्तुशिल्प के सिद्धान्तों से परे है
हमारे घरों की बनावट ...
एक भावुक नींव पर आधारित होती है
क्योंकि हर घर टेक लेता है ... दूसरे घर के कूल्हे की
और हर छज्जा
अपना हाथ सामने वाले छज्जे की तरफ़ हाथ बढ़ाता है
प्यारभरे होते हैं यहां के घर ...
सुबह अभिवादन करते हैं आपस में
और मुलाकातें उनकीं
गुप-चुप - रात में ...
बारह
तीस बरस पहले
जब मैं ब्रिटेन में एक कूटनीतिज्ञ था
वसन्त की शुरूआत में मेरी मां मुझे चिठ्ठियां भेजा करती थी
हरेक चिठ्ठी के भीतर ...
टेरागॉन की एक पोटली ...
और जब अंग्रेज़ों को मेरी चिठ्ठियों पर शक होता था
वे उन्हें प्रयोगशाला में ले जाया करते थे
और वहां से उन्हें थमा देते थे स्कॉटलैण्ड यार्ड को
और विस्फोटक-विशेषज्ञों को.
और जब वे मुझ से ... और मेरे टेरागॉन से थक जाते
वे मुझ से पूछते - ख़ुदा के लिए बता दो ...
इस जादुई जड़ी का नाम क्या है जिसने हमें उनींदा बना दिया है?
क्या यह कोई ताबीज़ है?
दवा?
या कोई गुप्त कोड?
इसे अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं?
मैं उनसे कहता - यह समझा पाना मेरे लिए मुश्किल होगा ...
क्योंकि टेरागॉन एक भाषा है जिसे सिर्फ़ शाम के बग़ीचे बोलते हैं
यह हमारी पवित्र जड़ी है ...
हमारी सुगन्धित वक्तृता
और अगर आपके महान कवि शेक्सपीयर ने जाना होता टेरागॉन के बारे में
तो उसके नाटक बेहतर होते ...
संक्षेप में ...
मेरी मां एक शानदार महिला है ... वह मुझे बेहद प्यार करती है ...
और जब भी उसे मेरी याद आती है
वह मेरे लिए टेरागॉन का एक गुच्छा भेज देती है
क्योंकि टेरागॉन उसके लिए "मेरे प्यारे" शब्दों का
भावनात्मक समतुल्य है
और जब अंग्रेज़ मेरे काव्यात्मक तर्क का एक शब्द भी नहीं समझ पाते थे ...
वे मुझे लौटा देते थे मेरा टेरागॉन और जांच बन्द कर देते थे ...
तेरह
ख़ान असद बाशा से
उभरता है अबू ख़लील अल-क़ब्बानी ...
दमश्क के बने अपने लिबास में ...
और अपनी ज़रीदार पगड़ी में ...
और उसकी आंखें सवालों से अभिशप्त ...
हैमलेट की आंखों जैसी
वह एक अवां-गार्द नाटक पेश करने की कोशिश करता है
लेकिन लोग कारागोज़ के तम्बू की मांग करते हैं
वह कोशिश करता है शेक्सपीयर का एक टुकड़ा पेश करने की
लोग उस से अल-ज़िर की ख़बरों की बाबत सवाल करते हैं
वह कोशिश करता है एक इकलौती स्त्री-स्वर ढूंढने की
जो उसके साथ "ओ शाम" गा सके
लोग अपनी ऑटोमन राइफ़लों में गोलियां भर लेते हैं
और पेशेवर गाने वाले
ग़ुलाब के हर पौधे पर गोलियां दागते हैं ...
वह कोशिश करता है एक इकलौती स्त्री ढूंढने की
जो उसके पीछे पीछे दोहरा सके -
"ओ चिड़ियों की चिड़िया, ओ फ़ाख़्ते"
वे अपने चाकू बाहर निकाल लेते हैं
और फ़ाख़्तों की तमाम सन्ततियों का कत्ल कर देते हैं ...
और स्त्रियों की तमाम सन्ततियों का ...
सौ बरस बाद
दमिश्क ने अबू ख़लील अल-क़ब्बानी से माफ़ी मांगी
और उसके नाम पर खड़ा कर दिया एक भव्य थियेटर.
चौदह
मैंने मुह्यी अल-दिन इब्न अल-अरबी का लबादा पहना
मैं उतरा कैसिउन पहाड़ की चोटी से
नगर के बच्चे ...
आड़ू
अनार
और तिल का हलवा थामे हुए ...
और उसकी स्त्रियों के लिए ...
फ़ीरोज़े के हार ...
और प्यार की कविताएं ...
मैं प्रवेश करता हूं ...
गौरैयों की एक लम्बी सुरंग
जिलीफ़्लावर ...
गुड़हल ...
चमेली के गुच्छे ...
और मैं प्रवेश करता हूं ख़ुशबू के सवालों में ...
और मेरा स्कूल का बस्ता खो गया है
और तांबे का बना लंचबॉक्स ...
जिसमें मैं अपना खाना ले जाया करता था ...
और वे नीले मनके
जिन्हें मेरी मां टांग दिया करती थी मेरी छाती पर
सो शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे खोज ले
उसने मुझे लौटा देना चाहिये उम्म मुआताज़ को
और ईश्वर उसका भला करेगा
मैं तुम्हारी हरी गौरैया हूं ... शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे खोज ले ...
उसने चुगाना चाहिए मुझे गेहूं का एक दाना ...
मैं दमिश्क का ग़ुलाब हूं तुम्हारा ... शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे खोज ले ...
उसने सजा देना चाहिए मुझे पहले फूलदान में
मैं तुम्हारा पागल कवि हूं ...शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे देखे
उसने खींच लेना चाहिए याद के वास्ते मेरा एक फ़ोटो
इसके पहले कि मैं अपने जादुई पागलपन से बाहर निकल आऊं
मैं तुम्हारा शरणार्थी चन्द्रमा हूं शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे देखे
उसने मुझे दान में देना चाहिए एक पलंग ... और एक ऊनी कम्बल ...
क्योंकि सदियों से नहीं सोया हूं मैं.
ये मेरे साथ क्या कर रहे हो, दमिश्क?
एक
इस दफ़ा मेरी आवाज़ गूंजती है दमिश्क से
वह गूंजती है शाम में
मेरे मां और पिता के घर से. मेरी देह का भूगोल बदलता है.
मेरे रक्त की कोशिकाएं हरी हो जाती हैं.
हरी है मेरी वर्णमाला
शाम में. मेरे मुंह के लिए उभरता है एक नया मुंह
मेरी आवाज़ के लिए उभरती है एक नई आवाज़
और एक कबीला बन जाती हैं
मेरी उंगलियां.
दो
बादलों की पीठ की सवारी करता
मैं लौटता हूं दमिश्क
दुनिया के सबसे सुन्दर दो घोड़ों की सवारी करता
जुनून का घोड़ा
कविता का घोड़ा.
मैं लौटता हूं साठ साल बाद
अपनी गर्भनाल खोजने
दमिश्क के उस नाई को खोजने जिसने मेरा ख़तना किया था,
उस दाई को खोजने जिसने पलंग के नीचे चिलमची में उछाला था मुझे
और मेरे पिता से पाया था सोने का एक सिक्का,
मार्च १९२३ के उस दिन
उसने छोड़ा था हमारा घर
उसके हाथ सने हुए थे कविता के रक्त से ...
तीन
मैं लौटता हूं उस गर्भ तक जिसमें मेरा निर्माण हुआ था ...
पहली किताब तक जिसे मैंने पढ़ा था ...
पहली स्त्री तक जिसने मुझे पढ़ाया था ...
प्रेम के भूगोल तक ...
और स्त्रियों के भूगोल तक ...
चार
मैं लौटता हूं
तमाम महाद्वीपों में मेरे हाथ-पैरों के बिखर चुकने के बाद
तमाम होटलों में मेरा कफ़ छितर चुकने के बाद
मेरी मां की चादरों को सदाबहार के साबुन से खुशबूदार बना लिए जाने के बाद
मुझे सोने के लिए और कोई पलंग नहीं मिला
और तेल और अजवाइन की उस "दुल्हन" के बाद
जिसे वह बिछा देगी मेरे सामने
अब दुनिया की और कोई "दुल्हन" मुझे ख़ुश नहीं करती
और बेल के उस मुरब्बे के बाद, जिसे वह अपने हाथों बनाएगी
मैं सुबह नाश्ते को ले कर अब उतना उत्साहित नहीं रहता
और काली बेरियों के शरबत के बाद जिसे वह तैयार करेगी
किसी और शराब से नहीं होता नशा मुझे ...
पांच
मैं दाख़िल होता हूं उमय्याद की मस्जिद के अहाते में
और वहां मौजूद हर शख़्स से दुआसलाम करता हूं
एक कोने से ... कोने तक
एक खपरैल से ... खपरैल तक
फ़ाख़्ते से... फ़ाख़्ते तक
मैं कूफ़ी लिखावट के बग़ीचों में टहलता हूं
और ईश्वर के शब्दों के सुन्दर फूल तोड़ता हूं
और अपनी आंखों से सुनता हूं पच्चीकारी की आवाज़
और अकीक की तस्बीहों का संगीत
इलहाम और परमानन्द की अवस्था मुझे अपने आग़ोश में ले लेती है
सो मैं अपने सामने पड़ने वाली पहली मीनार की सीढ़ियां चढ़ना शुरू करता हूं
जो पुकार रही -
"चमेली के पास आओ"
"चमेली के पास आओ"
छः
अपनी इच्छाओं की बारिशों के दाग़ लिए
तुम तक लौटता हुआ
लौटता हुआ
अपनी ज़ेबों को
मेवों, हरे आलूचों, और हरे बादामों से भरने
लौटता हुआ घोंघे के अपने कवच में
लौटता हुआ अपने जन्म के पलंग तक
क्योंकि वर्साय के फ़व्वारे
फ़ाउन्टेन कैफ़े के सामने कुछ भी नहीं
और पेरिस का ले हाल
शुक्रवार की बाज़ार के सामने कुछ भी नहीं
और लन्दन का बकिंघम पैलेस
आज़म पैलेस के सामने कुछ भी नहीं
और वेनिस में सान मारको के कबूतर
उमय्याद की मस्जिद के फ़ाख़्तों से ज़्यादा भाग्यवान नहीं
और लेस इन्वेलिदेस में नेपोलियन की कब्र
सालाह अल-दिन अल-अय्यूबी के मकबरे से ज़्यादा शानदार नहीं
सात
मैं टहलता हूं दमिश्क की तंग गलियों में
खिड़कियों के पीछे, जागती हैं शहदभरी आंखें
और मुझे सलाम करती हैं ...
सोने के अपने कंगन पहने हैं सितारे
और मुझे सलाम करते हैं ...
अपनी बुर्जियों से उतरते हैं कबूतर
और मुझे सलाम करते हैं ...
और साफ़-सुथरी शामी बिल्लियां बाहर निकल आती हैं
जो हमारे साथ जन्मी ...
हमारे साथ बड़ी हुईं ...
और हमारे साथ उनके निकाह हुए ...
मुझे सलाम करने ...
आठ
मैं ख़ुद को डुबो लेता हूं बुज़ुर्रिया सौक में
मसालों के एक बादल पर तान देता हूं एक पाल
लौंग ...
और दालचीनी ...
और
कैमोमाइल के बादल
मैं ग़ुलाब के पानी से नहाता हूं एक दफ़ा
और भावनाओं के पानी से कई बार
और मैं भूल जाता हूं - जब मैं सौक अल-अत्तारीन में होता हूं -
नीना रिकी और
कोको चैनल के तमाम मिश्रण
मेरे साथ क्या कर रहे हो, दमिश्क?
क्या तुमने मेरी संस्कृति बदल दी है? मेरा सौन्दर्यबोध?
क्योंकि मुझे भुला दी गअई है लिकरिश के प्यालों की खनक
राख्मानिनोफ़ की पियानो क्न्सर्ट ...
शाम के बग़ीचे किस तरह रूपान्तरित कर देते हैं मुझे?
क्योंकि मैं बन गया हूं दुनिया का पहला संगीत संचालक
जो राह दिखा रहा है
बेंत के पेड़ों के एक ऑर्केस्ट्रा को.
(नीना रिकी और कोको चैनल - बहुत महंगी ख़ुशबुओं के ब्रान्ड)
नौ
मैं तुम तक आया हूं
दमिश्क के ग़ुलाब के इतिहास से
जो खुशबू के इतिहास को घनीभूत बना देता है ...
अल-मुतनब्बी की स्मृति से
जो कविता के इतिहास को घनीभूत बना देती है ...
मैं तुम तक आया हूं ...
कड़वे सन्तरे की बौरों से ...
और नारसिसस से ...
और "अच्छे बच्चे" से ...
उस पहले से जिसने मुझे चित्र बनाना सिखाया ...
मैं तुम तक आया हूं ...
शाम की स्त्रियों की हंसी से ...
जिन्होंने मुझे सबसे पहले संगीत सिखाया ...
हमारी गली की टूटी टोंटियों से
जिन्होंने मुझे सबसे पहले रोना सिखाया
और अपनी मां की प्रार्थना करने वाली दरी से
जिसने मुझे सबसे पहले सिखाया
ईश्वर को जाने का रास्ता ...
दस
मैं याददाश्त की दराज़ें खोलता हूं
एक ... फिर दूसरी
मुझे याद आती है ...
मुआविया गली की अपनी वर्कशॉप से बाहर आते हुए अपने पिता की
मुझे इक्के याद आते हैं ...
और कंटीली नाशपातियां बेचने वाले ...
और अल-रुब्वा के कहवाघर
जो अरक़ की पांच कुप्पियों के बाद - करीब करीब
नदी में गिर जाया करते थे
मुझे रंगबिरंगे तौलिये याद आते हैं
जब वे नृत्य कर रहे होते थे हमाम अल-खैय्यातिन के दरवाज़े पर
मानो वे मना रहे हैं अपना राष्ट्रीय अवकाश.
मुझे दमिश्क के घर याद आते हैं
तांबे के उनके दरवाज़ों के हत्थे
और चमकीली खपरैलों से सजी हुई उनकी छतें
और उनके भीतरी अहाते
जो आपको स्वर्ग के विवरणों की याद दिलाते हैं ...
ग्यारह
दमिश्क का मकान
वास्तुशिल्प के सिद्धान्तों से परे है
हमारे घरों की बनावट ...
एक भावुक नींव पर आधारित होती है
क्योंकि हर घर टेक लेता है ... दूसरे घर के कूल्हे की
और हर छज्जा
अपना हाथ सामने वाले छज्जे की तरफ़ हाथ बढ़ाता है
प्यारभरे होते हैं यहां के घर ...
सुबह अभिवादन करते हैं आपस में
और मुलाकातें उनकीं
गुप-चुप - रात में ...
बारह
तीस बरस पहले
जब मैं ब्रिटेन में एक कूटनीतिज्ञ था
वसन्त की शुरूआत में मेरी मां मुझे चिठ्ठियां भेजा करती थी
हरेक चिठ्ठी के भीतर ...
टेरागॉन की एक पोटली ...
और जब अंग्रेज़ों को मेरी चिठ्ठियों पर शक होता था
वे उन्हें प्रयोगशाला में ले जाया करते थे
और वहां से उन्हें थमा देते थे स्कॉटलैण्ड यार्ड को
और विस्फोटक-विशेषज्ञों को.
और जब वे मुझ से ... और मेरे टेरागॉन से थक जाते
वे मुझ से पूछते - ख़ुदा के लिए बता दो ...
इस जादुई जड़ी का नाम क्या है जिसने हमें उनींदा बना दिया है?
क्या यह कोई ताबीज़ है?
दवा?
या कोई गुप्त कोड?
इसे अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं?
मैं उनसे कहता - यह समझा पाना मेरे लिए मुश्किल होगा ...
क्योंकि टेरागॉन एक भाषा है जिसे सिर्फ़ शाम के बग़ीचे बोलते हैं
यह हमारी पवित्र जड़ी है ...
हमारी सुगन्धित वक्तृता
और अगर आपके महान कवि शेक्सपीयर ने जाना होता टेरागॉन के बारे में
तो उसके नाटक बेहतर होते ...
संक्षेप में ...
मेरी मां एक शानदार महिला है ... वह मुझे बेहद प्यार करती है ...
और जब भी उसे मेरी याद आती है
वह मेरे लिए टेरागॉन का एक गुच्छा भेज देती है
क्योंकि टेरागॉन उसके लिए "मेरे प्यारे" शब्दों का
भावनात्मक समतुल्य है
और जब अंग्रेज़ मेरे काव्यात्मक तर्क का एक शब्द भी नहीं समझ पाते थे ...
वे मुझे लौटा देते थे मेरा टेरागॉन और जांच बन्द कर देते थे ...
तेरह
ख़ान असद बाशा से
उभरता है अबू ख़लील अल-क़ब्बानी ...
दमश्क के बने अपने लिबास में ...
और अपनी ज़रीदार पगड़ी में ...
और उसकी आंखें सवालों से अभिशप्त ...
हैमलेट की आंखों जैसी
वह एक अवां-गार्द नाटक पेश करने की कोशिश करता है
लेकिन लोग कारागोज़ के तम्बू की मांग करते हैं
वह कोशिश करता है शेक्सपीयर का एक टुकड़ा पेश करने की
लोग उस से अल-ज़िर की ख़बरों की बाबत सवाल करते हैं
वह कोशिश करता है एक इकलौती स्त्री-स्वर ढूंढने की
जो उसके साथ "ओ शाम" गा सके
लोग अपनी ऑटोमन राइफ़लों में गोलियां भर लेते हैं
और पेशेवर गाने वाले
ग़ुलाब के हर पौधे पर गोलियां दागते हैं ...
वह कोशिश करता है एक इकलौती स्त्री ढूंढने की
जो उसके पीछे पीछे दोहरा सके -
"ओ चिड़ियों की चिड़िया, ओ फ़ाख़्ते"
वे अपने चाकू बाहर निकाल लेते हैं
और फ़ाख़्तों की तमाम सन्ततियों का कत्ल कर देते हैं ...
और स्त्रियों की तमाम सन्ततियों का ...
सौ बरस बाद
दमिश्क ने अबू ख़लील अल-क़ब्बानी से माफ़ी मांगी
और उसके नाम पर खड़ा कर दिया एक भव्य थियेटर.
चौदह
मैंने मुह्यी अल-दिन इब्न अल-अरबी का लबादा पहना
मैं उतरा कैसिउन पहाड़ की चोटी से
नगर के बच्चे ...
आड़ू
अनार
और तिल का हलवा थामे हुए ...
और उसकी स्त्रियों के लिए ...
फ़ीरोज़े के हार ...
और प्यार की कविताएं ...
मैं प्रवेश करता हूं ...
गौरैयों की एक लम्बी सुरंग
जिलीफ़्लावर ...
गुड़हल ...
चमेली के गुच्छे ...
और मैं प्रवेश करता हूं ख़ुशबू के सवालों में ...
और मेरा स्कूल का बस्ता खो गया है
और तांबे का बना लंचबॉक्स ...
जिसमें मैं अपना खाना ले जाया करता था ...
और वे नीले मनके
जिन्हें मेरी मां टांग दिया करती थी मेरी छाती पर
सो शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे खोज ले
उसने मुझे लौटा देना चाहिये उम्म मुआताज़ को
और ईश्वर उसका भला करेगा
मैं तुम्हारी हरी गौरैया हूं ... शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे खोज ले ...
उसने चुगाना चाहिए मुझे गेहूं का एक दाना ...
मैं दमिश्क का ग़ुलाब हूं तुम्हारा ... शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे खोज ले ...
उसने सजा देना चाहिए मुझे पहले फूलदान में
मैं तुम्हारा पागल कवि हूं ...शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे देखे
उसने खींच लेना चाहिए याद के वास्ते मेरा एक फ़ोटो
इसके पहले कि मैं अपने जादुई पागलपन से बाहर निकल आऊं
मैं तुम्हारा शरणार्थी चन्द्रमा हूं शाम के लोगो
तुम में से जो भी मुझे देखे
उसने मुझे दान में देना चाहिए एक पलंग ... और एक ऊनी कम्बल ...
क्योंकि सदियों से नहीं सोया हूं मैं.
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