Saturday, May 5, 2012

पवित्रता का दौरा - हरिशंकर परसाई जी की रचनाएँ - १


सुबह की डाक से चिट्ठी मिली, उसने मुझे इस अहंकार में दिन-भर उड़ाया कि मैं पवित्र आदमी हूं क्योंकि साहित्य का काम एक पवित्र काम है. दिन-भर मैंने हर मिलने वाले को तुच्छ समझा. मैं हर आदमी को अपवित्र मानकर उससे अपने को बचाता रहा. पवित्रता ऐसी कायर चीज है कि सबसे डरती है और सबसे अपनी रक्षा के लिए सचेत रहती है. अपने पवित्र होने का एहसास आदमी को ऐसा मदमाता है कि वह उठे हुए सांड की तरह लोगों को सींग मारता है, ठेले उलटाता है, बच्चों को रगेदता है. पवित्रता की भावना से भरा लेखक उस मोर जैसा होता है जिसके पांव में घुंघरू बांध दिए गए हों. वह इत्र की ऐसी शीशी है जो गंदी नाली के किनारे की दुकान पर रखी है. यह इत्र गंदगी के डर से शीशी में ही बंद रहता है.

वह चिट्ठी साहित्य की एक मशहूर संस्था के सचिव की तरफ से थी. मैं उस संस्था का, जिसका लाखों का कारोबार है, सदस्य बना लिया गया हूं. स्थायी समिति का सदस्य हूं. यह संस्था हम लोगों को बैठकों में शामिल होने का खर्च नहीं देती क्योंकि पैसा साहित्य के पवित्र काम में लगे हुए पवित्र पदाधिकारियों के हड़पने में ही खर्च हो जाता है. सचिव ने कि साहित्य भवन के सामने एक सिनेमा बनाने की मंजूरी मिल रही है. सिनेमा बनने से साहित्य भवन की पवित्रता, सौम्यता और शांति भंग होगी. वातावरण दूषित होगा. हम मुख्यमंत्री को सिनेमा निर्माण न होने देने के लिए ज्ञापन दे रहे हैं. आप भी इस पर दस्तखत कर दीजिए.

इस चिट्ठी से मुझे बोध हुआ कि साहित्य पवित्र है, हम साहित्यकार पवित्र हैं और साहित्य की यह संस्था पवित्र है. मेरे दुष्ट मन ने एक शंका भी उठाई कि हो सकता है किसी ऐसे पैसेवाले ने, जिसे उस जगह दुकान खोलनी है, हमारे पवित्र साहित्य के पवित्र सचिव को पैसा खिला दिया हो कि सिनेमा न बनने दो. पर मैंने इस दुष्ट शंका को दबा दिया. नहीं, नहीं, साहित्य की संस्था पवित्र है, सिनेमा अपवित्र है. हमें अपवित्रता से अपना पल्ला बचा लेना चाहिए.

शाम की डाक से संस्था के विपक्षी गुट के नेता की चिट्ठी आई जिसमें संस्था में किए जा रहे भ्रष्टाचार का ब्यौरा दिया गया था.

इस पत्र ने मुझे झकझोरा. अपनी पवित्रता पर मुझे शंका हुई. साहित्य के काम की पवित्रता पर शंका हुई. साहित्य की संस्था की पवित्रता की मेरी उठान शांत हुई और मैं नार्मल हो गया.

इतने साल साहित्य के क्षेत्र में हो गए. मैं कई बार पवित्र होने की दुर्घटना में फंसा, पर हर बार बच गया. मुझे लिखते जब कुछ ही समय हुआ था, तभी बुजुर्ग साहित्यकार मुझसे कहते थे- आपने साहित्य रचना का कार्य अपने हाथ में लिया है. माता वीण-पाणि के मंदिर की पवित्रता बनाए रखिए. मैं थोड़ा फूलता था. सोचता था, सिगरेट पीना छोड़ दूं क्योंकि इस धुंए से देवी के मंदिर के धूप की सुगंध दबती होगी. पर मैं उबर आया. वे बुजुर्ग कहते- मां भारती ने आपके सामने आंचल फैलाया है. उसे मणियों से भर दीजिए. (वैसे कवि ‘अंचल’ उस दिन कह रहे थे कि हम तो अब ‘रजाई’ हो गए). जी हां, मां भारती के अंचल में आप कचरा डालते जाएं और उसी में मैं मणि छोड़ता जाऊं. ये पवित्र लोग और पवित्र ही लिखने वाले लोग बड़े दिलचस्प होते हैं. एक मुझसे बार-बार कहते- आप अब कुछ शाश्वत साहित्य लिखिए. मैं तो शाश्वत साहित्य ही लिखता हूं. वे सट्टे का फिगर रोज नया लगाते थे, मगर साहित्य शाश्वत लिखते थे. वे मुझे बाल्मीकि की तरह दीमकों के बमीठे में दबे हुए लगते थे. शाश्वत साहित्य लिखने का संकल्प लेकर बैठने वाले मैंने तुरंत मरते देखे हैं. एक शाश्वत साहित्य लिखने वाले ने कई साल पहले मुझसे कहा था- अरे, आप स्कूल मास्टर होकर भी इतना अच्छा लिखते हैं. मैं तो सोचता था, आप प्रोफेसर होंगे. उन्होंने स्कूल-मास्टर लेखक की हमेशा उपेक्षा की. वे खुद प्रोफेसर रहे. पर आगे उनकी यह दुर्गति हुई कि उन्हें कोर्स में लगी मेरी ही रचनाएं कक्षा में पढ़ानी पड़ीं. उनका शाश्वत साहित्य कोर्स में नहीं लगा.

सोचता हूं, हम कहां के पवित्र हैं. हममें से अधिकांश ने अपनी लेखनी को रंडी बना दिया है, जो पैसे के लिए किसी के भी साथ सो जाती है. सत्ता इस लेखनी से बलात्कार कर लेती है और हम रिपोर्ट तक नहीं करते. कितने नीचों की तारीफ मैंने नहीं लिखी. कितने मिथ्या का प्रचार मैंने नहीं किया. अखबारों के मालिकों का रुख देखकर मेरे सत्य ने रूप बदले हैं. मुझसे सिनेमा के चाहे जैसे डायलाग कोई लिखा ले. मैं इसी कलम से बलात्कार की प्रशंसा में भी फिल्मी गीत लिख सकता हूं और भगवद् भजन भी लिख सकता हूं. मुझसे आज पैसे देकर मजदूर विरोधी अखबार का संपादन करा लो और कल मैं उससे ज्यादा पैसे लेकर ट्रेड-यूनियन के अखबार का संपादन कर दूं. इसी कलम से मैंने पहले ‘इंदिरा गांधी जिंदाबाद’ लिखा था, फिर ‘इंदिरा गांधी मुर्दाबाद’ लिखा था, और अब फिर ‘इंदिरा भारत है’ लिख रहा हूं.

क्या हमारी पवित्रता है? साहित्य भवन की पवित्रता को सिनेमा भवन क्या नष्ट कर देगा? पर होता तो है पवित्रता, शराफत, चरित्र का एक गुमान. इधर ही एक मुहल्ले में सिनेमा बनने वाला था, तो शरीफों ने बड़ा हल्ला मचाया- यह शरीफों का मोहल्ला है. यहां शरीफ स्त्रियां रहती हैं और यहां सिनेमा बन रहा है. गोया सिनेमा गुंडों के मोहल्ले में बनना चाहिए ताकि इनके घरों की शरीफ औरते सिनेमा देखने गुंडों के बीच जाएं. मुहल्ले में एक आदमी रहता है. उससे मिलने एक स्त्री आती है. एक सज्जन कहने लगे- यह शरीफों का मुहल्ला है. यहां यह सब नहीं होना चाहिए. देखिए, फलां के पास एक स्त्री आती है. मैंने कहा- साहब, शरीफों का मुहल्ला है, तभी तो वह स्त्री अपने पुरुष मित्र से मिलने बेखटके आती है. क्या वह गुंडों के मुहल्ले में उससे मिलने जाती?

पवित्रता का यह हाल है कि जब किसी मंदिर के पास से शराब की दुकान हटाने की मांग लोग करते हैं, तब पुजारी बहुत दुखी होता है. उसे लेने के लिए दूर जाना पड़ेगा. यहां तो ठेकेदार भक्ति-भाव में कभी-कभी मुफ्त भी पिला देता था.

मैं शाम वाले पत्र से हल्का हो गया. पवित्रता का मेरा नशा उतर गया. मैंने सोचा, साहित्य भवन के सचिव को लिखूं- मुझे दूसरे पक्ष का पत्र भी मिल गया है जिसमें बताया गया है कि अपनी संस्था में कितना भ्रष्टाचार है. अब तो सिनेमा-मालिक को ही मांग करनी चाहिए कि यह साहित्य की संस्था यहां से हटाई जाए, जिससे दर्शकों की नैतिकता पर बुरा असर न पड़े. इसमें बड़ा भ्रष्टाचार है.

एक संगीतमय किस्सा



उस्ताद नसीरुद्दीन सामी साहब की एक संगीतमय महफ़िल से पहले अनाउंसर एक बेहतरीन किस्सा बयां करते हैं. क्या ज़माना रहा होगा, कैसे कैसे तो वो लोग रहे होंगे. भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक और आयाम देखिये. लुत्फ़ की गारंटी -

और शाम बस एक और शाम है


पृथ्वी की कविता
 

महमूद दरवेश 

तहसनहस किये जा चुके एक गांव में एक जड़ शाम
आंखें अधसोईं
मैं याद करता हूं तीस साल
और पांच युद्ध
मैं क़सम खाता हूं भविष्य धरे हुए है
मक्के के मेरे दाने
और गायक गाता जाता है
एक आग और कुछ अजनबियों की बाबत
और शाम बस एक और शाम है
और गायक गाता जाता है

और उन्होंने उस से पूछा:
तुम क्यों गाते हो?
उसने जवाब दिया:
मैं गाता हूं क्योंकि मैं गाता हूं...

और उन्होंने उसके सीने की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ उसका दिल मिल सका
और उन्होंने उसके  दिल की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ उसके जन मिल सके
और उन्होंने उसकी आवाज़ की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ उसका दुःख मिला
और उन्होंने उसके दुःख की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ उसका क़ैदख़ाना मिला
और उन्होंने उसके क़ैदख़ाने की तलाशी ली
लेकिन उन्होंने वहां सिर्फ़ ख़ुद को पाया बेड़ियों में

(एक लम्बी कविता का यह टुकड़ा तीस मार्च को मनाए जाने वाले फ़िलिस्तीनी पृथ्वी दिवस को सन्दर्भित करता है और १९७६ में इज़राइली सेना द्वारा मार डाली गई पांच युवा लड़कियों की स्मृति में मनाया जाता है.)

Friday, May 4, 2012

दूजे के संग नहिं जाऊंगी


वीणा सहस्त्रबुद्धे के स्वर में कबीरदास जी का भजन -

मेरा चेहरा गोलियों के खेत में गेहूं से बना हुआ एक टेलीग्राम


इब्राहीम मारज़ूक के लिये

*
महमूद दरवेश 

भोर के शुरू से ही अबूझ था दिन
सूरज दिखना शुरू हुआ, हमेशा की तरह अलसाया
पूर्व की तरफ़, किसी खनिज की राख क्षितिज की राह रोकती है ...
कठोर था पानी
बादलों की नसों में
घरों के पाइपों में ...
बेरूत के जीवन में एक आशाहीन शरद

---

मृत्यु फैलती गई महल से
रेडियो तक, वहां से सैक्स के सेल्समैन तक
वहां से सब्ज़ीमण्डी तक

---

यह क्या है जो तुम्हें जगा रहा है अभी?
ठीक पांच बजे
और तीस लोग मारे जा चुके
दोबारा सो जाओ
यह समय है मृत्यु का और आग का

---

एक चित्रकार था इब्राहीम
वह पानी के चित्र बनाया करता था
वह लिली के फूलों के उगने के लिए एक चबूतरा
भोर के वक़्त जगा दिया जाता तो भीषण ग़ुस्सैल

---

लेकिन उसके बच्चे बुने हुए थे लाइलैक के फूलों और धूप से
उन्हें दूध चाहिये था और डबलरोटी
---

अबूझ दिन. मेरा चेहरा
गोलियों के खेत में गेहूं से बना हुआ एक टेलीग्राम
यह क्या है जो तुम्हें जगा रहा है अभी?
ठीक पांच बजे
और तीस लोग मारे जा चुके

 ***

डबलरोटी में कभी नहीं था यह स्वाद

यह रक्त यह फुसफुसाहट यह महान भय यह सम्पूर्ण अर्थ यह आवाज़ यह समय यह रंग यह कला यह मानव ऊर्जा यह रहस्य यह तिलिस्म यह अद्वितीय क्षण प्रारम्भ की खोह से
गैंगवार तक और बेरूत की त्रासदी तक

---

ठीक पांच बजे
कौन मर रहा है?

---

अपने हाथों में आख़िरी रंग लिया इब्राहीम ने
तत्वों के रहस्यों का रंग
एक चित्रकार और विद्रोही
उसने चित्र बनाया
एक धरती का जो भरी हुई लोगों, बांज के पेड़ों, और युद्ध
और समुद्री लहरों, कामगारों, खोमचे वालॊं और ग्रामीण इलाक़े से

---

और वह बनाता है चित्र
डबलरोटी के चमत्कार में 

(इब्राहीम मारज़ूक एक चित्रकार थे, बुधवार ८ अक्टूबर १९७५ को वे लेबनानी गृहयुद्ध में एक बेकरी से डबलरोटी खरीदते समय मारे गए. चित्र - इसी कलाकार की एक पेंटिंग.)

Thursday, May 3, 2012

रघुवर तुमको मेरी लाज


पंडित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत है गोस्वामी तुलसीदास जी का एक भजन –

 

 चाहता था इसका ऑडियो लगाना पर डिवशेयर आज अपलोडिंग में दिक्कत कर रहा है. परेशानी दूर होते ही ऑडियो लगा दिया जाएगा. तब तक यूट्यूब पर आनंद लीजिए –

नहीं, मैंने वह टाफी खाई ही नहीं बाहर फेंक दी.


इधर के दिनों आपने पिताओं के लेकर दो उम्दा संस्मरण पढ़े - एक शम्भू राणा का दूसरा लक्ष्मीधर मालवीय का. उसी सीरीज़ में आज पेश कर रहा हूँ लाल्टू की संस्मरणात्मक कहानी. 

टॉफी

उन दिनों जहां हम रहते थेअब वहाँ एक बहुमंजिला इमारत है। बांग्ला में उस तरह के इलाके को 'बस्तीकहते हैं। बस्ती का मतलब झुग्गी झोंपड़ियों वाला इलाका सा होता हैहालांकि हमारी उस बस्ती में पक्के मकान थे। हमारे घर में दो कमरे थे। एक कमरे में एक कोने में रसोई इंतजाम था। कोई दस परिवारों के लिए चार पाखाने थे। दो पानी के नलजिनमें सुबह शाम पानी दो बार आता और पानी के लिए झगड़ा होता।

पिताजी सुबह सुबह उठतेमुझे भी उठा देते। जल्दी जल्दी नित्य कर्म करने के बाद दोनों मिलकर नाश्ता तैयार करते। पिताजी स्टोव जलाते ओर मैं टीन से आटा थाली में डालताजब तक चाय का पानी गर्म होतापिताजी जल्दी से आटा गूँथ लेते। मेरे लिए दूध गर्म करकेउसी में से एक दो चम्मच अपनी चाय में डालकर फिर चाय पीते पीते मेरे लिए परांठे सेंकते। खुद कभी खातेकभी नहीं । फिर पगड़ी जमाने में आधा घंटा लगा देते।

अधिकतर सुबहों में एक बूढ़ा आदमी एकतारा बजाता हुआ आता और दर दर जाकर गाता, 'हरि की मिश्री घोल मनवाराम नाम नित बोल।पिताजी उसे देखते ही डाँटकर कहते, “कभी कुछ काम धाम भी कररोज आ जाता है।” फिर उसे एक परांठा दे देते। मुझे ऐसा दिन याद नहीं आताजब वह आदमी खाली हाथ लौटा हो।

स्कूल अधिक दूर न था। हम पैदल जाते। अकेले जाने की कल्पना भी मैं नहीं कर पाता। जाने किसने मुझे कह दिया था कि स्कूल के सामने से जो सड़क कोयला डीपो की ओर जाती थीउसकी दूसरी छोर पर बाघ और चीते मिलते थे। पिताजी के साथ चलते चलते कई बार मैं सोचता कि अगर कोई शेर आ ही गया तो वे उसे मार डालेंगे।

स्कूल पहुंचते ही मैं अपनी कक्षा के बच्चों के साथ घुलमिल जाता और पिताजी अपने साथी शिक्षकों के साथ। उनको देखते ही बाकी शिक्षक कहते, “सरदारजी नमस्कार !” यह मुझे बाद में पता चला था कि उनका नाम गुरप्रीत सिंह भले थालोग उन्हें सरदार जी ही कहते थेक्योंकि उन दिनों सभी सिखों को सरदारजी ही कहते थे।

कलकत्ता का एक साधारण म्युनिसिपालिटी स्कूल। बहुत ही ग़रीब और साधारणहिंदी माध्यम। टिफिन के वक्त बच्चों को दूधब्रेड और कभी कभी फल या मिठाई बँटती। यह सरकारी राहत थी। पिताजी ने कह रखा था कि मैं दूध कभी न पिऊँ और केला सड़ा हो तो न खाऊँ। उनकी इच्छा के खिलाफ दूध पीने या सड़ा केला खाने की हिम्मत मैंने कभी नहीं की।

मुझे यह याद नहीं कि वे क्या पढ़ाते थे। शायद उस स्कूल का हर शिक्षक हर विषय पढ़ाता था। मेरे प्रति सभी शिक्षकों की अलग कृपा दृष्टि थी। यह केवल इसलिए नहीं कि मेरे पिता उनके साथी थेबल्कि इसलिए भी कि माँ का न होना उनको मेरे जीवन की बहुत बड़ी दुर्घटना लगती थी।

माँ की हल्की हल्की याद मन में है। वह कब मेरे जीवन से विलुप्त हो गईयह मुझे याद नहींशायद मुझे कभी बतलाया ही न गया हो कि माँ का चला जाना क्या होता है और मैं उसके न होने का आदी हो गया था। अब मैं जानता हूँ कि मुझे जन्म देकर सत्रह साल की उम्र में ही मां गुजर गई थी। कभी कभी अचानक ही माँ का चेहरा मुझे दिख जाता हैपर शायद वह उसके एक पीले पड़ गए फोटेग्राफ को देखने की वजह से होगाजो हमारे सबसे पुराने एलबम के पहले पन्ने पर जड़ा है। फोटोग्राफ में वह इतनी सुंदर नहीं हैजितनी कल्पना में दिखती है। उसकी शक्ल से भी अधिक उसके स्पर्श की एक अनुभूति मन और शरीर की अनजान प्रक्रियाओं में अचानक ही कभी उभरती है और मैं देर तक सोचता रह जाता हूँ।

स्कूल शायद सुबह सात बजे से दिन बारह बजे तक चलता। भरी दोपहर लौटकर पिताजी फिर एक बार मुझे नहाकर – जाड़ों में हाथ पैर धुलाकर – खाना बनाते। बचपन के उन दिनों में खाए खाने का स्वाद अभी तक मेरी जीभ पर है। शायद पिताजी पंजाब से लाए देशी घी का बहुत उपयोग किया करते। साल में एक महीना आमतौर से गर्मियों में हम पंजाब जाते। वहां दादी मां देशी घी का पीपा तैयार रखतीं। साल भर में एक दस किलो का पीपा हम दोनों मिलकर ख़त्म करते।

दोपहर में आराम करने के बाद पिताजी ट्यूशन करने निकलते। आमतौर से मैं घर पर ही खेलता रहता या उनकी दी हुई हिदायत के अनुसार पढ़ता लिखता। कभी कभार उनके साथ भी चल पड़ता। अब सोचता हूँ तो लगता है कि कई बच्चों को वे मुफ्त पढ़ातेपर कुछेक जगहों पर उन्हें दस रुपये के आस पास महीने में मिलता। उनके साथ चलने पर स्टेशन तक मुझे ले जाते और रेलगाड़ी के बारे में समझाते। अवाक् नेत्रों से मैं धुंआ छोड़ते उन दानवों को देखता और पिताजी भाप का इंजन और पिस्टन वगैरह के बारे में मुझे बतलाते।

कभी कभी कुछ बच्चे घर आकर उनसे पढ़ते। शाम होते ही वे चले जाते। शाम को पिताजी अक्सर दारू पी लेते और ज़रा ज़रा सी गल्ती पर मुझे पीटते। कभी कभी पड़ोसी आकर मुझे छीन ले जाते और बाद में उनके पास सुला जाते। बड़ा आश्चर्य होता है कि उनके पीटने के बावजूद मुझे उन्हीं के पास लेटने में सबसे अधिक सुरक्षा महसूस होती। दूसरे दिनों वे देर रात तक बैठ किताबें पढ़ते रहते।

जिस दिन की याद मुझे सबसे अधिक आती हैउस दिन भी उन्होंने दारू पी थी और खूब शोर मचाया था। उस दन दोपहर को राजकिशोर नाम का एक लड़का घर पर पढ़ने आया था। गर्मी के दिन थे। राजकिशोर को सवाल करवाने में पिताजी परेशान हो रहे थे। अचानक बिजली चली गई। कमरे में एक पंखा था। डी.सी.करेंट से चलता। पंखा बंद हो जाने से उमस बढ़ गई और पिता जी बार बार गर्दन हिलाने लगे। एक बार उन्होंने कहा, “बहुत गर्मी है....पंखा भी बंद हो गया।” उन्होंने पगड़ी भी उतारकर रख दी थी।

राजकिशोर मुस्करा रहा था। पिताजी झल्ला उठे, “हँसने की क्या बात है रे ?”

वह बिना घबराए बोला, “हमारे घर तो पंखा है ही नहींसरजी !”

पिताजी थोड़ी देर उसकी ओर देखते रहे ओर बोले, “जाओआज जाओकल आ जाना।” उसके चले जाने के बाद भी पिताजी देर तक वहीं बैठे रहे।

उस शाम वे मुझे साथ लेकर किसी के घर गए। ट्राम पर चढ़कर थोड़ी दूर। ट्राम का किरया उन दिनों पाँच पैसे था। कुछ सालों बाद सरकार ने एक पैसा किराया और बढ़ाया तो शहर भर में दंगे हुए थे। जिस घर में हम पहुंचेवहां भी एक सिख परिवार रहता था। हट्ठे कट्ठे कद के एक सज्जन शानदार पगड़ी पहने एक बड़ी कुर्सी पर बैठे थे। पिता जी ने पहुंचते ही कहा, “सत् श्री अकाल !”

मुझे ”सत् श्री अकाल” कहना सिखाया गया थापर मैं भूल गया था और हाथ जोड़ते ही मुँह से निकलता, “नमस्कार ”। मुझे एक चाकलेट टॉफी दी गई और फिर मेरा होना जैसे वे लोग भूल ही गए। पता नहीं उस घर में बच्चे थे या नहीं। मैं इधर उधर रखा सामानदीवार पर लटका गुरुनानक की तस्वीर वाला कैलेंडर वगैरह देखता और रुक रुक कर पिताजी की ओर देखता। कैलेंडर के पन्ने पंखे की हवा में फड़फड़ाते हुए बिखरने की कोशिश करते और कोई अदृश्य हाथ उन्हें वापस संजोता रहता।

एक बार उन सज्जन ने उनका नाम शायद हरभजन सिंह था कहा, “गुरप्रीत तू अकेला सरदार होगा सारे बंगाल मेंजो इस तरह प्राइमरी के बच्चों को पढ़ाकर जी रहा है। यारकुछ और कर ले। हमारी टैक्सी चला ले। कुछ कमाके पिंड लै जा।”

तभी मैंने पिताजी की ओर देखा। दाढ़ी से ढके गालों के ऊपर उनकी आँखें फीकी होती जा रही थीं। उन्होंने शायद कुछ कहने की कोशिश कीपर अब याद नहीं आता।

फिर हरभजन बोले, “यारआजकल मिल्ट्री में भर्ती हो रही है। लड़के को गाँव में रख और भर्ती हो जा। जंग कुछ महीनों में ख़त्म हो जाएगी तेरी अच्छी नौकरी रह जाएगी।” पिताजी उन दिनों सत्ताईस साल के होंगे। मैंने वर्दी पहने सिख सैनिक देखे थे। मेरे मन में पिताजी को वर्दी पहने देखने की एक तीव्र इच्छा होने लगी।

वह चीन की लड़ाई थी। १९६२ की। पिताजी अचानक बोले, “ मिल्ट्री का सवाल ही नहीं उठतादुनिया में कोई मिल्ट्री नहीं होनी चाहिए।”

हालांकि यह बड़ी अज़ीब बात थीपर मुझे उन पर इतना भरोसा था कि अचानक लगने लगा कि वर्दी पहनने पर आदमी कोयला डीपो के पास रहने वाला बाघ बन जाता है।

हरभजन बोले - “तेरा तो किताबों ने सिर खा लिया है। हर देश की अपनी सेना होनी जरूरी है। नहीं तो चीन आज हमला करके यहां तक पहुंच जाए।”

पिताजी बोले, “आज ही मेरे पास एक लड़का आया थाइस बड़े शहर में भी उनके घर बिजली नहीं है। उसे क्या फ़र्क पड़ेगा कि कोई बंगाल आता है या हुनान इतने लोगों की मौत किसी के भी हित में नहीं है।”

हरभजन उनकी ओर देखते रह जाए। फिर अचानक बोले, “तेरा इलाज़ हमें पता है। अब कई साल हो गए गुरप्रीत। तू अब फिर से घर बसा। बेटे को भी सही परवरिश मिलेगी।”

पिता जी सिर झुकाए बैठे रहे। कुछ नहीं बोले। थोड़ी देर हरभजन बोलते रहे। फिर औपचारिक बातें कहकर पिताजी उठ पड़े और हम वापस आ गए।

उस साल मुहल्ले में किसी दे दीवाली न मनाई थी। ब्लैक आउट होता तो मैं पिताजी के साथ चिपका बैठा रहता। उनकी तड़प का अहसास मुझे अभी तक होता है। उन दिनों शहर की रातें सुनसान होती थीं। ब्लैक आउट से वे और भी भयावह लगतीं ।

हरभजन के घर से लौटकर उस दिन उन्होंने फिर दारू पी। पर उस दिन मेरी पिटाई नहीं हुई। पास बुलाकर बड़े प्यार से कहा, “क्यों रेतुझे वो टॉफी अच्छी लगी थी ?”

मैं कहना चाहता था कि वह टॉफी बहुत अच्छी लगी थीपर उनकी शक्ल की ओर देखते ही होंठों से निकला था, “नहींमैंने वह टाफी खाई ही नहीं। बाहर फेंक दी।”

उनके चेहरे पर तब मुस्कान आ गई थी। इसके बाद वे चीखने लगे थे।

आज मैं जहां रहता हूं वहां हमारा अपना बाथरूम है। दो कमरों में अलग अलग पंखे लगे हैं। पिताजी की बहुत बाद की तस्वीर फ्रेम में बँधी एक दीवार पर लगी है। दूरदर्शन पर बोस्निया में चल रही लड़ाई की खबरें सुन रहा हूँ। मेरी पत्नीजिसका नाम भी गुरप्रीत है रसोई में पानी भरते हुए मुझसे कह रही है - “इस बार कूलर लगवा ही लोगर्मी बहुत पड़ रही है।”

कूलर लगवा ही चाहिएसोचते हुए गर्दन मोड़ते ही चौंक उठता हूँ। दीवार के सामने पिताजी खड़े मुस्करा रहे हैँ। प्यार से पूछते हैं, “तूने वो टॉफी खाई थी न ?”

Wednesday, May 2, 2012

एक कवयित्री ऐसी भी


अमेरिकी लिरिक कवयित्री सारा टीसडेल (८ अगस्त १८८४ – २९ जनवरी १९३३) आजीवन खराब स्वास्थ्य और अकेलेपन की शिकार रहीं. स्कूल जाना तक वे चौदह की आयु में शुरू कर सकीं.

उनकी पहली कविता एक स्थानीय अखबार ‘रीडीज़ मिरर’ में छपी.उसी साल उनका पहला संग्रह ‘सौनेट्स टू ड्यूज़ एंड अदर पोयम्स’ छाप कर आया.

उनका दूसरा संग्रह ‘हेलेन ऑफ ट्रॉय’ १९११ में प्रकाशित हुआ जिसे आलोचकों ने खासा पसंद किया. १९११ से १९१४ के दरम्यान सारा की जिंदगी में कई पुरुष आए जिनमें वैकल लिंडसे नामक कवि भी थे. लिंडसे सारा की मोहब्बत में आकंठ डूबे थे लेकिन उन्हें लगता था की वे सारा को पर्याप्त सुविधाएँ और स्थिरता उपलब्ध नहीं करा सकेंगे. १९ दिसम्बर १९१४ को सारा ने एर्न्स्ट फिल्सिंगर से विवाह किया. फिल्सिंगर सारा की कविताओं के प्रशंसक थे.

सारा का तीसरा संग्रह ‘रिवर्स टू डी सी’ १९१५ में छपा और खूब बिका. एक साल बाद वे न्यूयॉर्क चले आए.

१९१८ में छपे उनके कविता संग्रह ‘लव सॉंग्स’ को तीन प्रतिष्ठित सम्मान मिले. इनमें १९१८ का पुलित्जर सम्मान भी शामिल था.

फिल्सिंगर अक्सर धंधे के सिलसिले में बाहर रहते थे और सारा को बहुत सारा अकेलापन झेलना होता था. जब सारा ने फिल्सिंगर से तलाक की अर्जी दाखिल की तो फिल्सिंगर हैरान और परेशान हो गए थे.

तलाक के बाद सारा ने लिंडसे से अपनी पुरानी दोस्ती को पुनर्जीवित किया. लिंडसे तब तक शादी कर बाकायदा बाल-बच्चेदार आदमी बन चुके थे.

१९३३ में सारा ने ढेर सारी नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली. लिंडसे ने दो साल पहले आत्महत्या कर ली थी.

पेश  हैं सारा टीसडेल की तीन कवितायेँ -



मैं परवाह नहीं करूंगी

जब मैं मर चुकी होउंगी और चमकीला अप्रैल मेरे ऊपर
पसरा देगा बारिश से सराबोर अपने केश
अलबत्ता तुम मेरे ऊपर झुकोगे टूटे दिल के साथ
मैं परवाह नहीं करूंगी.

मेरे पास शांति होगी जिस तरह शांत होते है पत्तियों से लदे पेड़
जब बारिश झुकाती है उन्हें.
और तब मैं होउंगी उससे ज्यादा खामोश और पत्थर-दिल
जितने तुम हो इस वक्त.

एक रुलाई

उफ़, उसके पास आँखें हैं जिन्हें वह देख सकता है,
और हाथ जो बनाते हैं उसके हाथों को प्रसन्न
लेकिन अपने प्रेमी के लिए
मुझे होना होगा फकत एक आवाज़.

उफ़, उसका सर थमने को स्तन हैं
और होंठ उसके होंठों को धरने के लिए
लेकिन मुझे होना होगा फकत एक रुलाई
जब तक कि मर न जाऊं मैं.

भूल जाया जाए

भूल जाया जाए, जैसे भुला दिया जाता है एक फूल
जैसे  भुला दी जाती है एक आग जो कभी सोना बन कर गा रही थी
भुला दिया जाए हमेशा के लिए
समय एक उदार दोस्त होता है, वह हमें बूढा बनाएगा

अगर कोई पूछे तो उसे कहना
उसे भुलाया जा चुका कब का
एक फूल की तरह, एक आग की तरह
बहुत पहले भुला दी गई एक बर्फ में एक निस्तब्ध पदचाप की तरह

काया नहिं तेरी


पंडित भीमसेन जोशी से सुनिए कबीरदास जी का एक भजन -


Tuesday, May 1, 2012

बाबू - ५


(पिछली किस्त से आगे)

मैं भूल से ऐसा सोचता था कि यह असाधारण उन्माद बहुआ के रक्त से हमारे परिवार में आया. नहीं, हमारे ही रक्त में लाल कणों के साथ सफ़ेद कणों के स्थान पर घुला हुआ है, गंधक का तेज़ाब. बाबूजी, बलदेव ताऊ और चाचा को छोड़ (स्वयं मुझे भी शामिल करते हुए!) कोई चैथा व्यक्ति ऐसा नहीं जो जीकल और हाइड न हो. इस परिवार के लोग मुझे कारामज़ोव के भारतीय अवतार लगते हैं! कारामज़ोव की 'उत्पत्ति' पूर्वी आर्थोडाक्स रूसी गिरजे द्वारा प्रचारित 'पाप' चेतना से हुई - जितना अधिक 'पाप' करोगे, गिरजे के पादरी के माध्यम से वह सब ईश्वर अपने ऊपर ओढ़ लेगा. मेरे परिवार में भी घोर असाधारणता - उसे चाहें तो पागलपन भी कह सकते हैं! - धार्मिकता के अतिरेक का परिणाम है. है कोई एक भी मारवाड़ी व्यापारी जिसने बाबू के समान बंबई में रहते हुए मालगाड़ी से मँगाकर पिया है सिर्फ़ संगम का गंगा जल - हफ़्ते दस दिन नहीं, तेरह साल! कितने सौ कि हज़ार भारतीय उच्च शिक्षा पाने को इंग्लैंड या अन्य देशों में गए, वहाँ रहे, मगर उनमें से कितने ऐसे थे जो वहाँ अपने आहार के लिए अन्न ही नहीं पीने के लिए गंगा जल तक ले गए होंगे. यह अति तीव्र प्रखर धार्मिक ज्योति, चंद्रमा के पीछे के सुई से भी न भेदा जा सकने वाला गाढ़ा अंधकार पैदा करती है. द्रौपदी घाट की एकड़ों लंबी चैड़ी ज़मीन कृष्णा ताऊ को कैसे मिली, मैंने माँ के मुँह से सुना है. ब्रजमोहन मामा ने ग़लत न कहा था, "बेटा, तुम्हारे परिवार में सब आधे पागल पैदा होते हैं, महामनाजी से लेकर छोटा बच्चा तक. तुम आधे से ज़्यादा पागल हो." क्योंकि मैं रामकुमारजी से लड़कर इलाहाबाद युनिवर्सिटी को लात मार, जयपुर जा रहा था.

मालाबार हिल से शुरू कर, मोती बाग़, दिल्ली में सेक्रिटेरियट क्लर्क के घर (उनका पता जो मधु को बचपन में कंठस्थ था, अब तक मेरे पास नोट है, लक्ष्मी देवी, एफ़ 42 मोती बाग़ 2, दिल्ली 21) और यहाँ से शिमला की अनाम धर्मशाला तक.

अपने पिता के जीवन पर हमेशा भर्तृहरि का यह श्लोक मेरे ध्यान में आता है -

शिरः शार्वं स्वर्गात्पतति शिरसस्तत्क्षितिधरम्
महीध्रादुत्तुंगादवनिमनेश्चापि जलधिम्..
अधो गंगा सेयं पदमुपगता स्तोकमथवा
विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः..

(गंगा नदी स्वर्ग से गिरी शिव के मस्तक पर, वहाँ से हिमालय की चोटी पर, फिर मैदान में नीचे, और भी नीचे बहती हुई कम होती गई और अंत में सैकड़ों धाराओं में टूटकर खारे समुद्र में मिल कर ग़ायब हो गई. जो व्यक्ति विवेक बुद्धि खोता है, उसका पतन भी ऐसे ही सौ रास्ते से होता है. )

आगरे में मेरे पास करने को कुछ था नहीं. एक बार गोकुल मामा ने अस्पताल अपने साथ घुमाया. अपना क्लास दिखलाया. सिनेमा हालनुमा क्लास, सामने की दीवार पर बड़ा-सा ब्लैकबोर्ड. एक कमरे में टेबुलों पर पूरे-आधे शव; कुछ पर अस्थि खंड.

दिन भर शहर में पैदल घूमता. आगरा कालेज से लेकर क़िले और ताज महल तक. एक बार सिकंदरा तक गया था. एक बार यमुना पार जाकर, लंबे रास्ते घूम कर ताज महल के दूसरी ओर के किनारे तक. लौटते समय बीच में शाम हो गई. अस्पताल पहुँचने पर माँ की डाँट खाई.
कोई एक माह बाबू वहाँ रहे होंगे. स्वस्थ होकर वहाँ से इलाहाबाद आए, कुछ दिन घर रहे. फिर कहीं चले गए ...

एक बूढ़ा जहाज़ तख़्तों की सारी हड्डी पसलियों से चर चर चरमराता हुआ भी ऊँची समुंदरी लहर के सामने अपना माथा एकदम ऊपर उठाकर लहर पर सरकता हुआ चढ़ता, हाँपता हुआ उस पर से उतरता है, फिर अगली ऊँची लहर ... ऐसी ही रही मेरे पिता की जीवन यात्रा, अंत तक!

जयपुर में था, उनका पोस्टकार्ड मिला कि वह अमुक तारीख़ को जयपुर आ रहे हैं. जानता था, घर वह न आएँगे. मैं युनिवर्सिटी की नौकरी करने चला, वह नौकरी करने के सख़्त खि़लाफ़, लगे हवाले देने. खीझकर मैंने उनकी बात काटी, "तुम्हारे बाप जितने बड़े आदमी थे, मेरे बाप उतने बड़े आदमी नहीं हैं." इसका बदला लेने के लिए मेरे घर वह एक बार भी न आए - जयपुर में आने पर भी. वह जिन वैद्यजी के यहाँ ठहरते थे, वह ठिकाना मुझे मालूम था. मिलने गया. पिछली बार दिल्ली में मिला था, तब की तुलना में काफ़ी दुबले हो गए थे; दायाँ पैर फ़ाइलेरिया का, अधिक फूला हुआ. हाल पूछने पर बोले, सब ठीक है.

पाँचवें रोज़ पहली तारीख़ को मुझे युनिवर्सिटी से वेतन मिला, साढ़े चार सौ रुपए. अगले दिन सुबह-सुबह राजस्थान बैंक जाकर वह सब निकाला. फिर क्लर्क से पूछा खाते में और कितना बचा है. दो सवा दो सौ रुपए थे. दस रुपए छोड़ सारा पैसा निकलवा लिया.

यह तुम्हारे इकलौते बेटे की मेहनत की कमाई है. तुम ग़ैरों के आगे हाथ क्यों फैलाओ, यह ले लो, और घर चल कर गृहस्थी सम्हालो - यह घर गृहस्थी तुम्हारी नहीं तो और फिर किसकी है! मधु चार साल की हो गई. उसका नाम तुम्हीं ने तो रखा था न!

रास्ते भर मन ही मन गुनता रहा, मिलने पर उनसे कहने को. घाट दरवाज़े के अंदर दाएँ हाथ दूसरी कि तीसरी गली में घुसते ही एक मंदिर, उसके बग़ल वाला घर वैद्यजी का. बैठक में वह थे, वैद्यजी, और उनके चार पाँच मरीज़. मेरे नमस्कार के उत्तर में वह बोले, "पंडितजी तो चले गए, कल रात की गाड़ी से." मैंने यह भी न पूछा कि कहाँ!

हर साल 20 नवंबर आने पर मैं याद करता हूँ, आज के पाँचवें रोज़ मैं आख़िरकार उन्हें पकड़ पाया, जब वह अपनी निष्प्राण देह शिमला, स्नोडेन हास्पिटल की मार्चुअरी में छोड़कर फिर चले गए थे. मार्च सन् 41 में भी, जब मैं सात साल का था, उन्होंने घर छोड़ा था. रात 1 बज चुका था, फिर भी मैं जाग रहा था.

यह पिता के साथ मेरी दौड़ है, समानांतर और मरण पर्यंत ...

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यह संस्मरण यूं तो 1953 के आसपास से शुरू होता है और 1961 में बाबू की आत्महत्या पर आकर ठहर जाता है, लेकिन हरदम इस कालावधि के पार - आगे और पीछे - झाँकता रहता है. इसमें आने वाले व्यक्तियों के हवाले यहाँ साफ़ किये जाते हैं:


बाबूजी : पं. मदन मोहन मालवीय, बाबू के पिता और मेरे दादा 
बहुआ : बाबूजी की पत्नी, मेरी दादी 
चाचा : राधाकांत मालवीय, बाबूजी के दूसरे बेटे, मेरे चाचा
बाबू : मुकुंद मालवीय, बाबूजी के तीसरे बेटे, मेरे पिता 
छोटचा : गोविन्द मालवीय, बाबूजी के चौथे और सबसे छोटे बेटे, पूर्व सांसद, उपकुलपति, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी
कृष्णा ताऊ : कृष्णकांत, बाबूजी के भतीजे, लेखक व सम्पादक
बलदेव ताऊ : क़रीबी रिश्तेदार, नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य के. डी. मालवीय के पिता
दिद्दी : मेरी बड़ी बहन, आयु में 18 साल बड़ी
मधु : मेरी तीन बेटियों में सबसे बड़ी
ब्रजमोहन मामा : मेरे बड़े मामा, एग्जे़क्यूटिव ऑफ़िसर (1921-43) के बतौर क़रीब चौथाई सदी तक इलाहाबाद के बेताज बादशाह कहलाए
गोकुल मामा : गोकुल नारायण, आगरा मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल व गवर्नर जनरल के निजी चिकित्सक

करो मन राम नाम रसपान


वीणा सहस्त्रबुद्धे की आवाज़ में एक भजन -

बाबू - ४


(पिछली किस्त से आगे)

मेरे पिता थे वह, और मैं 7 साल का हुआ था, तब से मेरे प्रथम दीक्षा गुरु! पिता-पुत्र के नाते बाबू के जीवन को यादकर दुःख होता है, एक मनुष्य के नाते घोर आश्चर्य. विश्वास ही नहीं होता कि अपने जीवन में एक बार भी उन्होंने यह न सोचा कि यह कैसा जीवन जी रहा हूँ मैं! मैं जा किधर रहा हूँ?

कानपुर में सिंघानिया के साझे में दूकान कोई मामूली बात नहीं. बंबई के आठ एजेंसियाँ थीं, जिनमें एक खटाऊ कपड़ा मिल की थी. जर्मन क्रुप उद्योग समूह की एजेंसी - वहाँ की बनी काँच की डिबिया अब भी यहाँ घर में कहीं पड़ी होगी. उमाशंकर दीक्षित, मेहर अली और एस के पाटिल आदि के साथ कंधा से कंधा जोड़कर काम करते कांग्रेस कार्यकर्ता थे. मालाबार हिल, विले पार्ले और जुहू के बँगलों में रिहाइश - घर में नौकर-चाकर से लेकर हज्जाम और रसोइया तक - लड़कियों को घर ही में पढ़ाने के लिए एमिली, ईसाई गवर्नेस. असाधारण रूप से धनी न हो तो ऐसा जीवन 13 बरस की कौन कहे, एक माह भी नहीं बसर किया जा सकता! एक दिन घर परिवार, सब कुछ छोड़कर लापता हो गए, ऐसे कि पीछे पलटकर न देखा.

स्वर्ग से गिरे तो भी बाप का बड़ा नाम था, उन्हें धन उधार लेने में कभी कठिनाई न हुई होगी. कुछ वर्ष के दिन वह राजस्थान के छोटे-बड़े राजा-महाराजा के मेहमान रहे. बीकानेर, चुरू, भरतपुर, डूँगरपुर आदि रजवाड़ों से मेरे नाम उनकी चिट्ठियाँ आई हैं. कई माह वह श्रीनगर रहे, महाराज के अतिथि ही रहे होंगे. काफ़ी दिन काठमांडो में. नेपाल नरेश का उन्हें भेंट किया हुआ बाघंबर उनका पूजा का आसन था. एक माह के क़रीब रामकृष्ण डालमिया के इंडिया गेट के निकट की कोठी में - वहाँ बाबू के साथ कुछ दिन मैं भी रहा हूँ. डालमियाजी हमें अपने बग़ल में बैठाकर भोजन करते थे.

बड़ा अचंभा होता है, परिचितों से धन उधार लेकर बाद में उसे न लौटाने में उन्हें संकोच भी कैसे न होता! वह भीख तो न माँगते थे, दान भी वह न था. उधार के नाम वे वह परोपजीवी जीवन जी रहे हैं, इस पर क्या उनका ध्यान न जाता रहा होगा!

उनके देहांत के बाद घर में जमा उनके काग़ज़ात, (हज़ार की संख्या में तो चिट्ठियाँ ही रही होंगी.) जो वह परदेश से घर लौटने पर छोड़ जाया करते थे, मैं जयपुर उठा ले गया. सैकड़ों व्यक्तियों के, जिनसे वह मिले होंगे, नाम-पते की कापियाँ. उत्तर भारत का कोई ही भाग ऐसा था जहाँ का पता उसमें न रहा हो.

साधारण पत्र थे, उनसे हुई भेंट अथवा उनके उपदेशों के लिए आभार जताते हुए. कुछ उलाहना देने वाले भी ख़त - उनके जिनसे लिया हुआ उधार इन्होंने लौटाया न था. ऐसों में से कुछ के नाम देख कर मेरा सारा शरीर लज्जा से थर्रा उठा.

जानसेनगंज में फ़ोटोग्राफ़र पी एन वर्मा की दूकान का क़र्ज़ 23 या 24 सौ रुपए का, बीसियों साल पुराना. पी एन वर्मा को मैं जानता था. उनका बेटा जगदीश मेरे बराबर का रहा होगा. मैं अपनी फ़िल्म वहीं धुलवाया करता था.

अगली बार जयपुर से इलाहाबाद जाने पर वर्माजी की दूकान पर जाकर इसकी चर्चा छेड़ी तो वर्माजी हँसकर बोले, "मकुंद भाई का हिसाब आप करियेगा! अरे, उनका और मेरा हिसाब तो वहाँ जाकर होगा!" छत की ओर तर्जनी दिखाते हुए वह हँसे.

एक पोस्टकार्ड था, प्रो. शिवाधारजी का. उन्होंने लिखा था कि थोड़ी सी पेंशन पर वह जीवन बसर करते हैं, 200 की राशि उनके लिए भारी रक़म है. शिवाधारजी म्योर कालेज में बाबू के अध्यापक थे - उन्होंने अँग्रेज़ी में मेरे लिखे हुए निबंध सुधारे थे. देव पर रीसर्च के दौरान दर्जनों बार उनसे मदद ली थी. इलाहाबाद जब-जब जाता, उनके दर्शन अवश्य करता. उनका उधार चुकाने को कहते हुए मेरा गला भर आया. शिवाधारजी जैसा कोई भी उत्तर देने के पहले हँस पड़ने वाला व्यक्ति, मेरा प्रस्ताव सुन कुछ देर तक वह सिर झुकाए हुए अपनी बँधी मुट्ठी को ताकते रहे, फिर इनकारी में हिलाते हुए कहा, "नहीं, जाने दीजिए."

एक कार्ड था डॉ. धीरेन्द्र वर्मा का, 300 रुपयों के उधार की वापसी के लिए. बाबू के वह पुराने सहपाठी थे. दस वर्ष उन्होंने मुझे पढ़ाकर नौकरी लायक़ बनाया. मैंने उनसे कहा, "आपके आर्शीवाद से मैं अब कमाने लगा हूँ, यह ऋण मुझे उतारने दीजिए."

सदा की-सी अपनी लेसर दृष्टि से मुझे देखते हुए थिराए स्वर में धीरेन्द्रजी ने कहा, “I don't see, how you are related with this matter.”

(जारी)