Friday, June 15, 2012

सूनी हो गई ग़ज़ल की सुरीली ड्योढ़ी !





साल रहा होगा १९८७-८८.मुकाम इन्दौर.म.प्र.सरकार के प्रतिष्ठा प्रसंग लता अलंकरण समारोह के अंतर्गत आयोजित सुगम समारोह में प्रस्तुति देने तशरीफ़ लाए हैं ग़ज़ल के शहंशाह मेहदी हसन साहब. तब का इन्दौर न तो चमकीली और महंगी गाडियों से लकदक था और न ही मॉल कल्चर इसकी फ़िज़ाओं में शरीक हुआ था .मेहदी हसन का आना एक बड़ी ख़बर ज़रूर थी लेकिन आज जनता-जनार्दन में सितारा कलाकारों को लेकर जिस तरह की बेसब्री होती है या अख़बारों के चिकने पन्ने सजे होते हैं;ऐसा कुछ था नहीं.बालों में सुफैदी की आमद हो चुकी थी और ख़ाँ साहब उसे ढँकने के लिये मेहंदी रंगे हुए थे.मेहदी साहब चूड़ीदार पजामा और लख़नवी कुर्ता पहने हुए थे.उंगलियों में हर वक़्त धुँआ छोड़ती एक सिगरेट . साथ में कामरान आया था जो उनका बेटा है और बेहतरीन की-बोर्ड बजाता है. दो दिन की मेहमाननवाज़ी थी हमारे ज़िम्मे और लग रहा था कि बाज़ मौक़ों पर लटके-झटके दिखाने वाले कलाकारों की तरह ही होगा इनका बर्ताब भी.एयरपोर्ट से लेकर होटल और फिर प्रोग्राम के लिये आयोजन स्थल तक जब भी उनके साथ रहने का मौक़ा आया पर लगा ही नहीं कि हम किसी अंतरराष्ट्रीय कलाकार से रुबरू हैं. हर लम्हा मुस्कुराते और अनौपचारिक होकर बतियाते मेहदी हसन साहब को जानना इस बात से बाख़बर होना भी था कि किसी कलाकार के महान होने के लिये रियाज़,घराना,विरासत,उस्तादों के बड़े बड़े नाम से भी बड़ी बात होती है उसकी विनम्रता,इंसानी पहलू और बोल-व्यवहार.बमुश्किल आधे घंटे में वे हमसे बेतक़ल्लुफ़ हो गये थे.जब उन्हें बताया कि राजस्थानी और मालवी संस्कृति में बोली,पहनावे,खानपान और रिवाजों का आत्मीय राब्ता है तो वे बेधड़क राजस्थानी में शुरू हो गये और दोनो दिन मीठी राजस्थानी में बतियाते रहे.
दिन में उन्होंने फ़रमाइश कर दी थी कि उनके लिये पान का इंतज़ाम करना होगा.मैंने उनके लिये बनारसी पान जुगाड़ लिये जो होल्कर रियासत के पनवाड़ी सरकारी तम्बोली की दुकान से लिये गये थे. मेहदी हसन साहब पान खाकर ऐसे चहक उट्ठे जैसे मैं उनके लिये आसमान से तारे तोड़ लाया हूँ.

दोपहर के खाने के बाद मैंने कहा अब आप आराम कीजिये तो बोले आराम के लिये ज़िन्दगी पड़ी है बरख़ुरदार.आपके शहर में पहली बार गा रहे हैं और वह भी कोई ऐसा-वैसा नहीं,उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब और लता बाई का शहर.दोपहर में तक़रीबन दो घंटे मेहदी हसन साहब ने रियाज़ किया.जब मैं उनसे विदा लेने लगा तो पूछने लगे शाम को प्रोग्राम का टाइम क्या है.मैंने कहा सात बजे; कितने बजे लेने आएँ आपको.बोले हम छह बजे हॉल पर पहुँच जाना चाहते हैं.शाम को ठीक वक़्त पर उस्तादजी तैयार थे. ग्रीन रूम में उन्हें ले जाकर इत्मीनान से बैठाया तो उन्होंने कामरान और साज़िन्दों को बैलेंसिग के लिये भेज दिया.

इन्दौर में शास्त्रीय संगीत की मह्फ़िलों का बड़ा अनुष्ठान अभिनव कला समाज और उसके दफ़्तर में बैठे हैं ग़ज़ल के शहंशाह.उस्तादजी ने कहा कि इस कमरे का दरवाज़ा बंद कर लो और कोई दस्तक भी दे तो मत खोलना.मैंने सोचा कि शायद रियाज़ करेंगे. मेहदी हसन एक तखत जिस पर गाव-तकिया लगा हुआ था; वज्रासन में बैठ गये.आँखें बंद हैं. और ख़ामोशी से ध्यान मग्न हैं..तक़रीबन दस मिनट बाद उनकी आँखों से आँसू झर रहे हैं. फिर बड़ी बड़ी भूरी आँखें खुलीं और ख़ाँ साहब ने आसमान की ओर देखा..मैंने पूछा इबादत चल रही थी ? उस्तादजी ने मुझे अपने उत्तर से एक लम्हा रोमांचित कर दिया और आज जब ये स्मृति चित्र लिख रहा हूँ तो मैं उसी ग्रीन रूम में पहुँच गया हूँ और मेरी मन:स्थिति ठीक वैसी ही है (फ़र्क़ बस इतना है कि उस दिन उनकी आँखों में आँसू थे;आज मेरी). मेहदी हसन बोले अरे नहीं भाई दर-असल मैं अपने उस्तादों को याद करने के बाद अपनी सारी ग़ज़लों के शायरों को शुक्रिया अदा कर रहा था कि उनके करिश्माई अल्फ़ाज़ों की वजह से ही तो मुझे दाद मिलती है. साथ ही मैं सभी कम्पोज़िशन को गाने के पहले एक बार रवाँ भी कर लेता हूँ इससे रागों का इंतेख़ाब भी हो जाता है .मैं सोच रहा था बरसों से ग़ज़ल को पालने-पोसने वाला यह नामचीन गुलूकार कितना विनम्र है. फिर मैंने कहा ख़ाँ साहब बताइये तो आँखों में आँसू क्यों कर आ गये.तो मेहदी हसन बोले भाई अल्लाताला का शुक्रिया अदा कर रहा था कि उन्होंने मुझे मौसीक़ी की ख़िदमत का ज़िम्मा जो सौंप रखा है. उसकी नेमतों को याद कर के थोड़ा जज़बाती हो गया था. चूँकि मैं उनका शो एंकर कर रहा था सो मैंने पूछा आज कंसर्ट की इब्तेदा कैसे करेंगे.बोले तुम बताओ क्या सुनोगे ? मैंने कहा ख़ाँ साहब आपका ताल्लुक़ राजस्थान से है और फ़िलवक़्त आप मालवा में हैं क्यों न आप आज माँड गाकर आमद लें.ख़ाँ साहब ने कहा आज ऐसा ही सही.और मालवा की वह शाम मेहदी हसन की माँड का मादक स्वर का स्पर्श पाकर 'केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस' से गमक उठी.


मेहदी हसन की गायकी का खूँटा तक़रीबन साठ बरसों तक जमा रहा. इसमें कोई शक नहीं कि उनके पहले बरकत अली खाँ,के.एल.सहगल,बेगम अख़्तर,मास्टर मदन,तलत मेहमूद ग़ज़ल की दुनिया में अपनी पहचान मुकम्मिल कर चुके थे और ग़ज़ल को मनचाही परवाज़ मिल भी रही थी लेकिन उसे अवाम की ज़द में लाने का काम तो मेहदी हसन ने ही किया. क्लासिकल मौसीक़ी को आधार बनाकर ज़्यादातर ग़ज़लें उन्होंने हारमोनियम,तबला की संगति में गाई.इस बात को ज़्यादातर संगीतकार और संमीक्षक तस्लीम कर लें तो बेहतर होगा कि उस्ताद मेहदी हसन के बाद री-पैक हुई है बिशा शक फली-फूली भी है.

ग़ालिब,फ़ैज़,फराज़,हफ़ीज़ जलंधरी,से लेकर क़तील शिफ़ाई तक तमाम शायरों के अशआर उनकी सुनहरी आवाज़ से झरे.पाकिस्तानी फ़िल्मों में भी उनकी सक्रियता बनी रही. लेकिन उनका ख़ास इलाक़ा तो ग़ज़ल ही था. ख़ुद बेजोड बाजा बजाते हुए उनका स्वर षडज लगता तो शाएरों के क़लम का रुतबा बढ़ जाता. 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ' को उन्होंने ख़ुसूसी अंदाज़ में यमन में बांधा और परिणाम यह हुआ कि यह एक ग्लोबल गज़ल बन गई.यक़ीनम अहमद फराज की अपार लोकप्रियता का श्रेय काफी हद तक मेहदी हसन साहब की गई इस ग़ज़ल को भी दिया जाना चाहिये. ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ,मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो,गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले,चराग़े तूर जलाओ बड़ा अंधेरा है,अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबो में मिले,दिल की बात लबों तक लाकर,गुलशन गुलशन शोला ए गुल की,पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है; ऐसी रचानाएँ हैं जो आम आदमी में इसलिये लोकप्रिय हुईं क्योंकि उसे मेहदी हसन जैसा अमृत-स्वर मिला.उन्होंने रागदारी का दामन कभी न छोड़ा और अपने उस्तादों की तालीम का तेवर क़ायम रखा.इत्मीनाम और तसल्ली से विस्तार पाती उनकी पेशकश में ठुमरी का रंग नुमाया होता तो कभी लगता आलाप,तान और मुरकियाँ अपना तिलिस्म बता रहीं हैं.यहाँ यह कहना भी प्रासंगिक होगा कि रेडियो(भारत-पाकिस्तान दोनो) का जो सुगम-संगीत था उसे निखारने और सँवारने में उस्ताद मेहदी हसन का योगदान कभी भुलाया न जा सकेगा.इस विधा ने बहुतेरे गायक दिये,लेकिन ये सिलसिला अब थम सा गया है.


बहरहाल, मेहंदी हसन के पहले भी थी और बाद में भी जारी रहेगी लेकिन उसे बरतने का जो सलीक़ा इस फ़नक़ार ने दिया वह उसी के साथ रुख़सत हो गया है. यूँ बीते दस-बारह वर्षों से मेहदी हसन बीमार थे लेकिन ये तकनीक का ही कमाल है कि वह हमारे घर-आँगन का लाड़ला स्वर बने रहे. नई आवाज़ों के लिये आज भी मेहदी हसन ग़ज़ल का विद्यापीठ बने रहेंगे. पाकिस्तान में उनके चाहने वालों की कमीं नहीं लेकिन बिला शक हिन्दुस्तान के संगीतप्रेमी उनकी महफ़िलों के लिये हमेशा बेसब्र रहे.यह उनकी गायकी का जादू ही है कि सुकंठी लता मंगेशकर तनहाई में सिर्फ़ मेहदी हसन को सुनना पसंद करती हैं.इसे भी तो एक महान कलाकार का दूसरे के लिये आदरभाव ही माना जाना चाहिये. हम सब की ज़िन्दगी यथावत चलती रहेगी लेकिन मेहेदी हसन के जाने से ग़ज़ल की ड्योढ़ी तो सूनी हो गई है. समय बेरुख़ी से संगीत को बेसुरा बनाने पर आमादा है लेकिन जब कभी इंसान की रूह को सुरीलेपन की तलाश होगी,मेहदी हसन की आवाज़ ही उसे आसरा देगी.

Wednesday, June 13, 2012

मेहदी हसन साहब की कक्षा में जानिये "आवारा गाना" क्या होता है


मेरे पास मेहदी हसन साहब का एक तीन सीडी वाला सैट है. विशुद्ध शास्त्रीय शैली में गाई उस्ताद की ग़ज़लों की इस पूरी श्रृंखला के नगीने मैं, जब-तब एक-एक कर आपकी खि़दमत में पेश करूंगा. आज आप बस उस्ताद को बोलते हुए सुनिए. महफ़िल शुरू करने से पहले वे अपने गायन का संक्षिप्त इतिहास बताते हुए ग़ज़ल-गायकी और शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को तो बताते ही हैं, उर्दू शायरी के बड़े नामों का ज़िक्र भी बहुत अदब और मोहब्बत के साथ करते हैं.

मेहदी हसन साहब को श्रद्धांजलि के तौर पर यह बहुत ख़ास प्रस्तुति:


तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे - उस्ताद मेहदी हसन खान का प्रयाण


बहुत अफ़सोस की खबर है. बहुत लंबे समय से बीमार चल रहे गज़ल गायकी के शहंशाह उस्ताद मेहदी हसन खान साहेब नहीं रहे.

कबाड़खाने की विनम्र श्रद्धांजलि.

Tuesday, June 12, 2012

पटिलाया घराने के रंग में पगी उस्ताद की भूपाली.


पटिलाला के उस्ताद बड़े गु़लाल अली ख़ाँ साहब संगीतप्रेमियों के चहेते कलाकार हैं.अपनी स्थूल काया से वे जिस तरह के मुलायम स्वर बिखेरते थे वह सुनने वाले को किसी दूसरी दुनिया की सैर करवा देते थे. कहते हैं ख़याल के महान गायक उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब में अपनी गायन शैलियों को लेकर एक तरह का द्वंद था. एक था धीर गंभीर गायक और गहरी तानों का सम्राट तो दूसरा ठुमरी का ऐसा बेजोड़ साधक जो बिजली की गति से अपनी तानों को यहाँ से वहाँ कब ले जाता मालूम ही नहीं पड़ता. भारत-रत्न पं.भीमसेन जोशी ने एक मुलाक़ात के दौरान बताया था कि दोनो महान गायकों में किसी तरह की कटुता नहीं थी और उन्होंने अपनी अपनी तरह से गायकी का मोर्चा संभाल रखा था. पण्डितजी का कहना था कि मूलत:दोनो एकदूसरे के हुनर के प्रशंसक थे और इस बात से वाक़िफ़ थे कि दोनो के गायन से मौसीक़ी की ख़िदमत ही हो रही है.

इन दिनों विविध भारती पर संगीत सरिता कार्यक्रम सुबह ७.३० बजे पं.अजय चक्रवर्ती उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब की गायकी की सुरीली यात्रा करवा रहे हैं. इस कार्यक्रम में अजयजी से बातचीत कर रहे हैं विख्यात उदघोषक मरहूम क़ब्बन मिर्ज़ा साहब. मैंने आज अपने मोबाइल से राग भूपाली में निबध्द विलम्बित और द्रुत दो रचनाओं को रेकॉर्ड कर लिया था जो आप रसिकों से साझा कर रहा हूँ.हो सकता है रेकॉर्डिंग क्वालिटी संतोषजनक न हो;क्षमा करें.ख़ाँ साहब की गायकी को सुने तो वह ज़माना याद आ जाता है जब जीवन में तसल्ली थी. आप सुनिये और महसूस कीजिये कि किस तसल्ली से ख़ाँ साहब राग को बढ़त दे रहे हैं और छोटी छोटी मुरकियों से राग का विस्तार किस ख़ूबसूरती से करते हैं. वे कब नीचे वाले षडज से तार-सप्तक पर चले जाएँगें;बस सोचा नहीं जा सकता,महसूस किया जाता है. बलखाती तानों का ये लावण्य अब कहाँ...सबरंग उपनाम से बंदिशें रचने वाले इस महान स्वर-साधक को सुनना ख़ला से उपज रहे रुहानी जादू को महसूस करना है.

भारतवासी होने का सौभाग्य तो आम से भी बनता है : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - ५



आम के बाग़

आम के फले हुए पेड़ों
के बाग़ में
कब जाऊँगा?

मुझे पता है कि
अवध, दीघा और मालदह में
घने बाग़ हैं आम के
लेकिन अब कितने और
कहाँ कहाँ
अक्सर तो उनके उजड़ने की
ख़बरें आती रहती हैं।

बचपन की रेल यात्रा में
जगह जगह दिखाई देते थे
आम के बाग़
बीसवीं सदी में

भागलपुर से नाथनगर के
बीच रेल उन दिनों जाती थी
आम के बाग़ों के बीच
दिन में गुजरो
तब भी
रेल के डब्बे भर जाते
उनके अँधेरी हरियाली
और ख़ुशबू से

हरा और दूधिया मालदह
दशहरी, सफेदा
बागपत का रटौल
डंटी के पास लाली वाले
कपूर की गंध के बीजू आम

गूदेदार आम अलग
खाने के लिए
और रस से भरे चूसने के लिए
अलग
ठंढे पानी में भिगोकर

आम खाने और चूसने
के स्वाद से भरे हैं
मेरे भी मन प्राण

हरी धरती से अभिन्न होने में
हज़ार हज़ार चीज़ें
हाथ से तोड़कर खाने की सीधे
और आग पर पका कर भी

यह जो धरती है
मिट्टी की
जिसके ज़रा नीचे नमी
शुरू होने लगती है खोदते ही !

यह जो धरती
मेढक और झींगुर
के घर जिसके भीतर
मेढक और झींगुर की
आवाज़ों से रात में गूँजने वाली

यह जो धारण किये हुए है
सुदूर जन्म से ही मुझे
हम ने भी इसे संवारा है !

यह भी उतनी ही असुरक्षित
जितना हम मनुष्य इन दिनों

आम जैसे रसीले फल के लिए
भाषा कम पड़ रही है
मेरे पास

भारतवासी होने का सौभाग्य
तो आम से भी बनता है!

( चित्र में पाश के साथ आलोक धन्वा.)

Monday, June 11, 2012

एक बार और मिलने की इच्छा पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - ४



भूल पाने की लड़ाई

उसे भूलने की लड़ाई
लड़ता रहता हूँ
यह लड़ाई भी
दूसरी कठिन लड़ाइयों जैसी है

दुर्गम पथ जाते हैं उस ओर

उसके साथ गुजारे
दिनों के भीतर से
उठती आती है जो प्रतिध्वनि
साथ-साथ जाएगी आजीवन

इस रास्ते पर कोई
बाहरी मदद पहुँच नहीं सकती

उसकी आकस्मिक वापसी की छायाएँ
लंबी होती जाती हैं
चाँद-तारों के नीचे

अभिशप्त और निर्जन हों जैसे
एक भुलाई जा रही स्त्री के प्यार
के सारे प्रसंग

उसके वे सभी रंग
जिनमें वह बेसुध
होती थी मेरे साथ
लगातार बिखरते रहते हैं
जैसे पहली बार
आज भी उसी तरह

मैं नहीं उन लोगों में
जो भुला पाते हैं प्यार की गई स्त्री को
और चैन से रहते हैं

उन दिनों मैं
एक अख़बार में कॉलम लिखता था
देर रात गए लिखता रहता था
मेज पर
वह कबकी सो चुकी होती
अगर वह अभी अचानक जग जाती
मुझे लिखने नहीं देती
सेहत की बात करते हुए
मुझे खींच लेती बिस्तर में
रोशनी गुल करते हुए

आधी नींद में वह बोलती रहती कुछ
कोई आधा वाक्य
कोई आधा शब्द
उसकी आवाज़ धीमी होती जाती
और हम सो जाते

सुबह जब मैं जगता
तो पाता कि
वह मुझे निहार रही है
मैं कहता
तुम मुझे इस तरह क्या देखती हो
इतनी सुबह
देखा तो है रोज़
वह कहती
तुम मुझसे ज़्यादा सुंदर हो
मैं कहता
यह भी कोई बात हुई

भोर से नम
मेरे छोटे घर में
वह काम करती हुई
किसी ओट में जाती
कभी सामने पड़ जाती

वह जितने दिन मेरे साथ रही
उससे ज़्यादा दिन हो गए
उसे गए!

मुलाक़ातें

अचानक तुम आ जाओ

इतनी रेलें चलती हैं
भारत में
कभी
कहीं से भी आ सकती हो
मेरे पास

कुछ दिन रहना इस घर में
जो उतना ही तुम्हारा भी है
तुम्हें देखने की प्यास है गहरी
तुम्हें सुनने की

कुछ दिन रहना
जैसे तुम गई नहीं कहीं

मेरे पास समय कम
होता जा रहा है
मेरी प्यारी दोस्त

घनी आबादी का देश मेरा
कितनी औरतें लौटती हैं
शाम होते ही
अपने-अपने घर
कई बार सचमुच लगता है
तुम उनमें ही कहीं
आ रही हो
वही दुबली देह
बारीक चारखाने की
सूती साड़ी
कंधे से झूलता
झालर वाला झोला
और पैरों में चप्पलें
मैं कहता जूते पहनो खिलाड़ियों वाले
भाग दौड़ में भरोसे के लायक

तुम्हें भी अपने काम में
ज़्यादा मन लगेगा
मुझसे फिर एक बार मिलकर
लौटने पर

दुख-सुख तो
आते जाते रहेंगे
सब कुछ पार्थिव है यहाँ
लेकिन मुलाक़ातें नहीं हैं
पार्थिव
इनकी ताज़गी
रहेगी यहीं
हवा में !
इनसे बनती हैं नई जगहें
एक बार और मिलने के बाद भी
एक बार और मिलने की इच्छा
पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी



Sunday, June 10, 2012

एक रीपोस्ट - गर्मियां - ऐन्तिनियो विवाल्दी

मौसमों पर आधारित चार कम्पोज़ीशन्स का निर्माण १७१७-१७२० के दौरान विवाल्दी द्वारा मानतूआ में बिताए दोएक सालों की वजह से सम्भव हो पाया था. मानतूआ में राजकुमार फ़िलिप ने विवाल्दी को बतौर संगीत निर्देशक अपने दरबार में काम करने को बुलावा भेजा था.

मानतूआ के आसपास का ग्राम्य जीवन विवाल्दी की इन कालजयी रचनाओं की प्रेरणा बना. बहती धाराएं, अलग-अलग तरह से गाती चिड़ियां, भौंकते कुत्ते, भिनभिनाते मच्छर, रोते हुए चरवाहे, धुत्त नाचनेवाले, शिकार-पार्टियां, बर्फ़ में जमे लैंडस्केप, आइस-स्केटिंग करते बच्चे और अलाव - ये सब विवाल्दी के लिए संगीत के अजस्र स्रोत थे. इन चारों कॉन्चियेर्तोज़ के मूल में छिपी प्राकृतिक-दृश्यावली को समझाने के उद्देश्य से उन्होंने बाक़ायदा कविताएं भी लिखीं.

आज पेश है गर्मियों पर आधारित रचना -




बहुत मुश्किल मौसम है, सूरज का तपाया हुआ
एक आदमी काम से थक कर चूर, भेड़ें त्रस्त और जलते हैं चीड़
हमें सुनाई देती है कोयल; फिर बाक़ी चिड़ियों का कलरव.
मुलायम झोंका हल्के से हिलाता है हवा को ... लेकिन डराती हुई उत्तरी हवा अचानक उन्हें उड़ा ले जाती है.
कांपता है चरवाहा, डरता हुआ कि उसके भाग्य में बस चिंघाड़ते तूफ़ान ही हैं.

बिजली और तूफ़ान का खौफ़
छीन लेता है उसके थके तन का सुकून
और पतंगे-मक्खियों की भिनभिन चालू.

आह! उसका डर सही था
आसमानी बिजलियां और तूफ़ान का भीषण शोर
गेहूं की बालियों को बरबाद कर देता है

क्या तुम श्रृंगार को फिर से बसाना चाहती हो : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - 3



श्रृंगार

तुम भीगी रेत पर
इस तरह चलती हो
अपनी पिंडलियों से ऊपर
साड़ी उठाकर
जैसे पानी में चल रही हो!

क्या तुम जान बूझ कर ऐसा
कर रही हो
क्या तुम श्रृंगार को
फिर से बसाना चाहती हो?


नन्हीं बुलबुल के तराने
एक नन्हीं बुलबुल
गा रही है
इन घने गोल पेड़ों में
कहीं छुप छुप कर
गा रही है रह-रह कर

पल दो पल के लिए
अचानक चुप हो जाती है
तब और भी व्याकुलता
जगाती है
तरानों के बीच उसका मौन
कितना सुनाई देता है !

इन घने पेड़ों में वह
भीतर ही भीतर
छोटी छोटी उड़ानें भरती है
घनी टहनियों के
हरे पत्तों से
खूब हरे पत्तों के
झीने अँधेरे में
एक ज़रा कड़े पत्ते पर
वह टिक लेती है

जहाँ जहाँ पत्ते हिलते हैं
तराने उस ओर से आते हैं
वह तबीयत से गा रही है
अपने नए कंठ से
सुर को गीला करते हुए
अपनी चोंच को पूरा खोल कर

जितना हम आदमी उसे
सुनते है
आसपास के पेड़ों के पक्षी
उसे सुनते हैं ज़्यादा

नन्हीं बुलबुल जब सुनती है
साथ के पक्षियों को गाते
तब तो और भी मिठास
घोलती है अपने नए सुर में

यह जो हो रहा है
इस विजन में पक्षीगान
मुझ यायावर को
अनायास ही श्रोता बनाते हुए

मैं भी गुनगुनाने को होता हूँ
पुरानी धुनें
वे जो भोर के डूबते तारों
जैसे गीत!

Saturday, June 9, 2012

मीर के सिरहाने आहिस्ता बोलने की रात : आलोक धन्वा की नई कवितायेँ - २



सवाल ज़्यादा हैं

पुराने शहर उड़ना
चाहते हैं
लेकिन पंख उनके डूबते हैं
अक्सर खून के कीचड़ में!

मैं अभी भी
उनके चौराहों पर कभी
भाषण देता हूँ
जैसा कि मेरा काम रहा
वर्षों से
लेकिन मेरी अपनी ही आवाज़
अब
अजनबी लगती है

मैं अपने भीतर घिरता जा रहा हूँ

सवाल ज़्यादा हैं
और बात करने वाला
कोई-कोई ही मिलता है
हार बड़ी है मनुष्य होने की
फिर भी इतना सामान्य क्यों है जीवन?

रात

रात
रात
तारों भरी रात

मीर के सिरहाने
आहिस्ता बोलने की रात


उड़ानें
कवि मरते हैं
जैसे पक्षी मरते हैं
गोधूलि में ओझल होते हुए!

सिर्फ़ उड़ानें बची रह
जाती हैं

दुनिया में आते ही
क्यों हैं
जहाँ इंतज़ार बहुत
और साथ कम

स्त्रियाँ जब पुकारती हैं
अपने बच्चों को
उनकी याद आती है!

क्या एक ऐसी
दुनिया आ रही है
जहाँ कवि और पक्षी
फिर आएंगे ही नहीं!


गाय और बछड़ा
एक भूरी गाय
अपने बछड़े के साथ
बछड़ा क़रीब एक दिन का होगा
घास के मैदान में
जो धूप से भरा है

बछड़ा भी भूरा ही है
लेकिन उसका नन्हा
गीला मुख
ज़रा सफेद

उसका पूरा शरीर ही गीला है
गाय उसे जीभ से चाट रही है

गाय थकी हुई है ज़रूर
प्रसव की पीड़ा से बाहर आई है
फिर भी
बछड़े को अपनी काली आँखों से
निहारती जाती है
और उसे चाटती जा रही है

बछड़े की आँखें उसकी माँ
से भी ज़्यादा काली हैं
अभी दुनिया की धूल से अछूती

बछड़ा खड़ा होने में लगा है
लेकिन
कमल के नाल जैसी कोमल
उसकी टाँगें
क्यों भला ले पायेंगी उसका भार !
वह आगे के पैरों से ज़ोर लगाता
है
उसके घुटने भी मुड़ रहे हैं
पहली पहली बार
ज़रा-सा उठने में गिरता
है कई बार घास पर
गाय और चरवाहा
दोनों उसे देखते हैं

सृष्टि के सबक हैं अपार
जिन्हें इस बछड़े को भी सीखना होगा
अभी तो वह आया ही है

मेरी शुभकामना
बछड़ा और उसकी माँ
दोनों की उम्र लम्बी हो

चरवाहा बछड़े को
अपनी गोद में लेकर
जा रहा है झोपड़ी में
गाय भी पीछे-पीछे दौड़ती
जा रही है.



Friday, June 8, 2012

पहाड़, गर्मी, मच्छर और सुबह के नौ बजे जमी हुई रेड वाइन

इस साल पड़ी ऐतिहासिक गर्मी ने जब खाल में पर्याप्त भूसा भर दिया तब जाकर दिल्ली से मित्र आशुतोष बरनवाल ने रानीखेत जाकर दो-एक दिन ठण्ड में काटने का कार्यक्रम तय किया. एक और शानदार मित्र बंटी बख्शी ने रानीखेत से कोई पन्द्रह किलोमीटर दूर मजखाली में अपनी कॉटेज में रहने का निमंत्रण पहले से दिया हुआ था.

इस दफा एक नई बात यह हुई है कि पहाड़ों की हवा में धूल, धुएँ और धुंध का एक स्थाई परदा पड़ा रहता है और हिमालय तो क्या सामने की पहाड़ी तक ठीक से नज़र नहीं आती. रात को सुदूर पहाड़ियों पर जलती हुई लाल बल्बों की माला दरअसल चीड़ के जंगलों में धधकती हुई आग होती है जो उक्त परदे के पीछे एक बड़ी वजह मानी जा सकती है. इस वजह से हमारे इलाके के सारे ग्रीष्मकालीन पर्यटन स्थल अब “तथाकथित” रह गए हैं.

पंखे वगैरह लगाने की बात पहाड़ों पर ज़्यादातर लोगों ने सोची भी नहीं थी सो कॉटेज में पहुँचते ही हम जान गए कि आधी रात तक तो गर्मी से छुटकारा मिलने से रहा. ये अलग बात थी कि यहाँ की गर्मी मैदानों की गर्मी से कहीं फर्क और झेली जाने लायक थी. ऊपर से हम दोनों के कमरों में एक-एक संगीतकार मच्छर भी था. गुडनाईट के असर को पूरी तरह नकारते हुए ये दोनों सज्जन हमारा खून चूसते रहे और भोर होने पर ही चैन आया. कुछेक घंटे सोने के बाद हल्की हल्की गर्मी लगना शुरू हो गयी सो पतली जयपुरी रजाई ओढ़े सोना नामुमकिन था. रसोई में नाश्ते की जुगत चल रही थी और आशुतोष मेरी ही बाट देख रहे थे. दिल्ली से लाई गयी नफीस फ्रेंच रेड वाइन को रास्ते की धूप में गर्म हो जाने की वजह  से पिछली रात से फ्रीजर में रखा दिया गया था. इस बात का विशेष ध्यान धरा जाना था कि उसे सोने से पहले फ्रीज़र से निकाल लिया जाए. पता नहीं थकान थी या जापानी व्हिस्की सुन्तोरी का असर कि मैं इस काम को करना भूल गया. मैं बालकनी में आकर पहली सिगरेट सुलगा ही रहा था कि अपनी मुक्त हंसी हँसते हुए आशुतोष नमूदार हुए.

फ्रीजर में धरी वाइन जम चुकी थी और उसका कॉर्क बिलकुल सटीक अनुशासन के साथ बाकायदा बाहर आ चुका था. अगर कोई पूरे होश में भी उस बोतल को ज़रूरी उपकरणों की मदद से भी खोलता तो इतनी सफाई से इस काम को अंजाम नहीं दे सकता था. लगता था जैसे किसी ने बोतल के भीतर घुसकर पिस्तौल से कॉर्क की कनपटी पर घोड़ा लगाकर “ढिचक्याऊं” कर दिया हो. यह खुला निमंत्रण था. धूप में धरकर वाइन को बाकायदा पिघलाया गया और फिर अंडे परांठे के नाश्ते के साथ एक शर्मीली गौरैया की उत्सुकताभरी उपस्थिति में उसका भोग.

इस दरम्यान भोपाल पहुंचे ज्ञानरंजन जी का फोन आया बरास्ते जनाब राजकुमार केसवानी. और बरेली फोन करके वीरेन डंगवाल साहेब को थोडा जलाया गया. उन्होंने आदतन हमारी वाइन में मक्खियों द्वारा एक नंबर कर देने की बद् दुआ दी.

दिन को मित्र प्रभात मेहरा के घर ठेठ कुमाऊंनी खाने की व्यवस्था पहले ही बनाई जा चुकी थी. एक बोतल बीयर सूतने के उपरान्त कोई तीन बजे खाने का लुत्फ़ उठाया गया. अजगरावस्था पहुँच चुकी थी सो एक लंबा वॉक ज़रूरी था. रानीखेत की लोअर मॉल रोड में टहलना आज भी मेरी निगाह में महानतम कार्यों में से एक है. घने और विविधता भरे जंगल से लबालब इस रास्ते पर कोई डेढ़ सौ साल पुराने यूकेलिप्टस के शानदार पेड़ हैं. नीचे एक तस्वीर में आपको आशुतोष उस से लिपटे नज़र आ रहे हैं और आखिरी फोटू उनके अतिप्रमुदित हो चुकने का सबूत है.

फोटू देखी जाएँ और जो जैसा महसूस करना चाहें करें.






 








कोयल उस ऋतु को बचा रही है : आलोक धन्वा की नई कविताएं - १


तकरीबन डेढ़ दशक तक आलोक धन्वा ने कविता नहीं लिखी. पिछले साल उनकी कुछ नई कवितायेँ पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के ज़रिये लोगों तक पहुँची थीं. उन्हीं को यहाँ लगाने का मोह-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ.

चेन्नई में कोयल

चेन्नई में कोयल बोल रही है
जबकि
मई का महीना आया हुआ है
समुद्र के किनारे बसे इस शहर में

कोयल बोल रही है अपनी बोली
क्या हिंदी
और क्या तमिल
उतने ही मीठे बोल
जैसे अवध की अमराई में!

कोयल उस ऋतु को बचा
रही है
जिसे हम कम जानते हैं उससे!


ओस

शहर के बाहर का
यह इलाक़ा

ज़्यादा जुती हुई ज़मीन
खेती की

मिट्टी की क्यारियाँ हैं
दूर तक
इन क्यारियों में बीज
हाथ से बोये गए हैं

कुछ देर पहले ज़रा-ज़रा
पानी का छिड़काव किया गया है!

इन क्यारियों की मिट्टी नम है

खुले में दूर से ही दिखाई
दे रही शाम आ रही है

कई रातों की ओस मदद करेगी
बीज से अंकुर फूटने में!


फूलों से भरी डाल
दुनिया से मेरे जाने की बात
सामने आ रही है
ठंडी सादगी से

यह सब इसलिए
कि शरीर मेरा थोड़ा हिल गया है
मैं तैयार तो कतई नहीं हूँ
अभी मेरी उम्र ही क्या है!

इस उम्र में तो लोग
घोड़ों की सवारी सीखते हैं
तैर कर नदी पार करते हैं
पानी से भरा मशक
खींच लेते हैं कुएँ से बाहर!

इस उम्र में तो लोग
किसी नेक और कोमल स्त्री
के पीछे-पीछे रुसवाई उठाते हैं
फूलों से भरी डाल
झकझोर डालते हैं
उसके ऊपर!

बारिश
बारिश एक राह है
स्त्री तक जाने की

बरसता हुआ पानी
बहता है
जीवित और मृत मनृष्यों के बीच

बारिश
एक तरह की रात है

एक सुदूर और बाहरी चीज़
इतने लंबे समय के बाद
भी
शरीर से ज़्यादा
दिमाग़ भीगता है

कई बार
घर-बाहर एक होने लगता है!

बड़े जानवर
खड़े-खड़े भींगते हैं देर तक
आषाढ़ में
आसमान के नीचे
आदिम दिनों का कंपन
जगाते हैं

बारिश की आवाज़ में
शामिल है मेरी भी आवाज़!


Thursday, June 7, 2012

आदमी को गौर से देखो



मई सन २००५ की गर्मियों में बाबा त्रिलोचन से हरिद्वार में अंतिम मुलाक़ात हुई थी. तखत पर लेते-अधलेटे बाबा के सिरहाने निराला रचनावली के आठ खंड सहेज कर धरे हुए थे. उनकी स्मृति कुछ क्षीण हुई तो थी पर आंखों में वही सवाल पूछने वाली गहराई बची हुई थी.


उस दिन बाबा ने मुझे २००४ में किताबघर से छाप कर आए अपने कवितासंग्रह जीने की कला उपहार के तौर पर दी थी. 


पता नहीं क्यों मुझे बार बार इस संग्रह के नज़दीक जाना अच्छा लगता है. इसकी कविताओं में एक सादगी तो है ही एक ढीठ खिलंदड़ कवि की जिद भी साफ़ नज़र आती है.


ज़्यादा ज्ञान बघारने से परहेज़ करता हुआ मैं सीधे सीधे उस संग्रह की एक कविता आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ -

जीने की कला

भूख और प्यास
आदमी से वह सब कराती है
जिसे संस्कृति कहा जाता है.

लिखना पढना पहनना ओढना
मिलना झगड़ना चित्र बनाना मूर्ति रचना
पशु पालना और उन से काम लेना यही सारे
काम तो इतिहास है मनुष्य के सात द्वीपों और
नौं खंड़ों में.

आदमी जहाँ रहता है उसे देश कहता है। सारी
पृथ्वी बँट गई है अनगिनत देशों में। ये देश अनेक
देशों का गुट बना कर अन्य गुटों से अक्सर
मार काट करते हैं.

आदमी को गौर से देखो. उसे सारी कलाएँ विज्ञान
तो आते हैं. जीने की कला उसे नहीं
आती.