Sunday, November 10, 2013

नहीं रहे बिज्जी



विजयदान देथा नहीं रहे. देश के इस इकलौते बड़े किस्सागो को उनके चाहने वालों ने बिज्जी के नाम से जाना.

उन्हें श्रद्धांजलि. एक बार किसी इंटरनेट साइट पर उनकी कही यह बात मैंने बचा कर रख ली थी. फ़िलहाल वही –

''लोककथाओं को शब्दों में पिरोना अपने आपमें एक कठिन काम था. मैं वह करता रहा. कई लोग मेरी इस शैली की आलोचना करते हैं लेकिन मेरा कहना है कि अगर मैं मौलिक कहानियाँ लिखता तो चालीस-पचास कहानियों के बाद उनमें भी दोहराव या एकरूपता आ ही जाती. सभी कहानियों में बार-बार वही-वही कथानक घूमता रहता. एक कहानी पढ़ो चाहे पचास कहानी पढ़ो, वही एकरूपता दिखती रहती. हमारे राजस्थानी में हजारों, लाखों लोककथाएं हैं. इसलिए मैंने लोककथाओं को आधुनिक रूप में लिखने का फैसला किया.''


बयालीस सालों में फाड़ा हुआ कागज़ है मेरी ज़िन्दगी


वह जानती है

- येहूदा आमीखाई

मैं जानता हूँ कि वह जानती है.
वे सोचते हैं कि वह नहीं जानती, जानती है वैसे
अलबत्ता.

इस खेल में फटता जाता है मेरा दिल
और रात में इसका खून सुनता है कराहों को
जैसे मेरे जीवन के बयालीस सालों के आरपार
फाड़ा जा रहा काग़ज़ रो रहा हो.

घर के अहाते में,
चौड़ी बेल के नीचे,
हिन्नोम की घाटी में,
एक बूढ़ी औरत ने एक बार मुझे बताया था:
“उसका सिर बर्फ़ की तरह सफ़ेद पड़ गया था
क्योंकि उसे भीतर से जलाया गया था!”
मैं भूल जाता हूँ वह क्या कह रही है
या किस से कह रही है –

बयालीस सालों में फाड़ा हुआ कागज़ है मेरी ज़िन्दगी.

Saturday, November 9, 2013

सरकार को विरोध बर्दाश्त नहीं

सरकार को बरेली बड़ा बाईपास का विरोध बर्दाश्त नहीं

- कुशल प्रताप सिंह

बरेली जिले में बड़े बाइपास का मुद्दा एक बड़े किसान संघर्ष के रूप में उभरा है. बाइपास का निर्माण बरेली की आवश्यकता है ताकि शहर को भारी ट्रैफिक से मुक्ति मिले. इसके लिए किसानों से ज़मीन ली जानी थी. जनहित कार्य के लिए किसानों को अपनी पुश्तैनी जमीन देने से गुरेज़ नहीं है, वे उचित मुआवज़े कि मांग कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं. उचित मुआवज़ा किसानों का अधिकार है. वे इसी कारण आंदोलित हैं. प्रशासन हठयोग कि मुद्रा में है, वो जोर दे रहा है किसान उसे स्वीकार करें और अपनी पुश्तैनी जमीनें छोड़ दें. इन्हीं बातों का नतीजा रही 22 अक्टूबर की भूड़ा गांव की घटना जिसमें किसानों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ.

बरेली जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 24 के मुरादाबाद-बरेली सेक्शन तक के भूखंड के निर्माण (चौड़ा करने/चार लेन का बनाने, बाइपास बनाने आदि) का कार्य चल रहा है. बरेली में बनने वाले 29 किलोमीटर के इस बाइपास में 33 गाँव आते हैं. इस कार्य के लिए जमीनों का अधिग्रहण दो अधिनियमों के अंतर्गत किया गया है. पहला भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 और दूसरा राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956.

मुख्यतः जो किसान आंदोलित हैं उनकी भूमि का अधिग्रहण भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के आशय कि अधिसूचना दिनांक 20.12.2003 को उक्त अधिनियम कि धारा 4 (1) के अंतर्गत की गयी थी. दिनांक 09.12.2004 को अधिनियम कि धारा 6 के अंतर्गत एक और अधिसूचना जारी की गयी जिसमें कहा गया कि धारा 11 के अंतर्गत अभी किसी अवार्ड कि घोषणा नहीं की गयी है और अधिनियम की धारा 17 (1) के अत्यवाश्यकता खंड के अंतर्गत भूमि का अधिग्रहण किया जा सकेगा. 

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने नेशनल हाइवे डेवलपमेंट प्रोग्राम फेज III के अंतर्गत राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 24 (मुरादाबाद-बरेली) के 121 किलोमीटर खंड के निर्माण (चौड़ा करने/चार लेन का बनाने, बाइपास बनाने आदि) का कार्य दिसम्बर 2009 से प्रारम्भ किया था. दिनांक 16.02.2010 को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बाइपास निर्माण का कार्य भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को हस्तांतरित कर दिया गया.

2003 से 2010 तक उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग द्वारा कोई निर्माण कार्य प्रारम्भ नहीं किया गया. जमीन किसानों के पास ही रही और वे पूर्व कि भांति खेती करते रहे. इस दौरान भूमि अधिग्रहण का कार्य पूरा नहीं हो पाया था और बाइपास का निर्माण सरकारी फाइलों में ही हो रहा था.

निर्माण कार्य राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के पास पहुँचने के बाद इस पूरे मामले में तेजी आई और प्रशासन ने भूमि अधिग्रहण का कार्य तेज कर दिया. भूमि अधिग्रहण 1894 के अधिनियम और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई करार नियमावली-1997 के तहत किया गया. करार नियमावली कहती है कि करार अर्जन निकाय और किसानों के मध्य होना चाहिए. यहाँ अर्जन निकाय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण है अतः समझौता प्राधिकरण और किसानों के मध्य होना चाहिए था जिसमें मुआवज़ा, अन्य लाभ व विस्थापन से जुड़ी बातें आपसी सहमति से तय होनी थी. किसानों का आरोप है कि करार नियमावली-1997 की अवहेलना कर किसानों के साथ प्राधिकरण का समझौता न करा कर जिलाधिकारी बरेली ने अपने नेतृत्व में प्रतिकार निर्धारण समिति बनाकर एक तरफा ढंग से मुआवज़े कि राशि तय कर दी. इस प्रकार किसानों को मिल सकने वाले अन्य लाभों से वंचित कर दिया गया. 

प्रतिकार निर्धारण समिति का गठन की व्यवस्था किसानों के हित के लिए है. यदि मुआवज़े की दर कम रहती है या किसान संतुष्ट नहीं होते तो ये समिति किसानों और अर्जन निकाय से बात कर के मुआवज़े कि दर इस तरह तय करवाये कि किसान संतुष्ट हो सके. स्पष्ट है कि प्रशासन द्वारा नियमों का उल्लंघन किया गया है. अभी भी किसानों की मूल मांग यही है कि अर्जन निकाय के साथ हमारे करार, मुआवज़े की दर, विस्थापन की दरें आदि तय करायी जायें. 

प्रशासन द्वारा मुआवज़े की दर 2010 के सर्किल रेट को आधार मानकर तय की गयी है. किसानों का आरोप है कि रेट तय करने के बाद भी उनके साथ भेदभाव किया गया. उनका आरोप है कि 2010 में ट्यूलिया धन्तिया गांवों में, जो कि भाजपा के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के गाँव हैं, 28 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर सर्किल रेट था जिसका मुआवज़ा 61 और 65 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर कि दर से दिया गया. वहीं सैदपुर चुन्नीलाल का सर्किल रेट 25 लाख प्रति हेक्टेयर व मुड़िया अहमद नगर का 30 लाख प्रति हेक्टेयर से अधिक था फिर भी इन गांवों में मुआवज़ा 25 लाख प्रति हेक्टेयर की दर से दिया गया. प्रशासन कहता है कि ट्यूलिया गाँव राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट स्थित है इस कारण इसकी मुआवज़े की दर अधिक है जबकि किसानों का कहना है कि ट्यूलिया गाँव की दूरी राष्ट्रीय राजमार्ग से एक किलोमीटर से भी अधिक है. वहीं मुड़िए, अहमद नगर, बेलवा, नगरिया गोपालपुर, रजउपरसपुर तो राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही स्थित हैं फिर इन गाँवों में मुआवज़े कि दर ट्यूलिया गाँव के बराबर क्यों नहीं है. 

तकरीबन 67 हेक्टेयर ज़मीन ऐसी थी जिसके मालिक किसानों ने करार नहीं किया था, वह दी जाने वाली दरों से संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उन्होंने सामान्य की तरह अपनी ज़मीन पर धान गणना व अन्य फसलें बो रखी थीं. 21 अक्टूबर को इन गाँवों में आर.ए.एफ. पहुँच गई. आर.ए.एफ. को खेतों में देख कर किसान अचंभित हुए. किसानों का कहना है कि उन्हें बिना कोई मोहलत दिए उनकी करीब एक हज़ार बीघे में खड़ी फसलों पर जेसीबी और ग्रेडर मशीनें चला दी गईं उनके खेतों को रौंद दिया गया. इस प्रकार प्रशासन द्वारा बिना मुआवज़ा दिए उनकी पुश्तैनी ज़मीनों को जबरन कब्ज़ा लिया गया. प्रतिरोध करने पर किसानों, महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह पीटा गया. 

अगले दिन 22 अक्टूबर को भूड़ा गाँव में ग़दर हो गया. वहाँ भी किसान जेसीबी और ग्रेडर मशीनों के आगे खड़े हो कर अपनी फसल काट लेने कि मोहलत मांग रहे थे, लेकिन प्रशासन ने उनकी एक नहीं सुनी. गांववालों को बेरहमी से पीटा गया. एक 80 साल के बुज़ुर्ग के पैर टूट गए. उस दिन कोई बचा नहीं. गाँव वालों से मिलने आये उनके रिश्तेदार, सड़क पर चलते राहगीर पुलिस प्रशासन का कहर सब पर सामान रूप से गिरा. अगले दिन अमर उजाला ने लिखा था कि क्राइम-ब्रांच कि टीम में शामिल नए सिपाहियों ने किसानो पर खूब डंडे बरसाए. पुलिस का कहना था कि गाँव वालों ने हथियारों से लैस हो कर उनपर हमला किया इस कारण उन्हें रक्षात्मक कार्यवाही करनी पड़ी. इस घटना में पुलिस कर्मी भी घायल हुए. 

बड़ा बाइपास किसान आंदोलन का समर्थन रुहेलखंड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. इसरार खान कर रहे थे. भूड़ा गाँव की घटना के बाद पुलिस ने डॉ. इसरार खान समेत 40 लोगों के विरुद्ध नामज़द और 50-60 अज्ञात लोगों के विरुद्ध आईपीसी कि विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज़ किया था. पुलिस द्वारा 23 अक्टूबर को डॉ. इसरार खान को कुछ अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था.


(भड़ास से साभार)

यहां कायरता के चेहरे पर सबसे ज्यादा रक्त है


धूमिल को उनके जन्मदिन पर याद करते हुए उनकी एक कविता 'कुहासे में देश'. भाई आनंद प्रधान की फ़ेसबुक-वॉल से - 

हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है

अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है

हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है.

नवम्बर का नैनीताल

पता नहीं कितनी सारी यादों को जगाता यह फ़ोटो मुझे फेसबुक पर देखने को मिला. नैनीताल में रहने वाले अमित साह ने इसे खींचा है. और इसे यहाँ लगाने की इजाज़त मुझे दी है -


ये रहे अमित - 



ज़ाहिर है नर्सें उन पर मुग्ध हुईं


अन्ना कामीएन्स्का की डायरी से पुनः -

मेरे दादाजी स्तानिस्लाव शिपिलो का नब्बेवां जन्मदिन. वे अब भी युवा हैं, असाधारण. बड़ी बड़ी सफ़ेद मूंछें. वे अब भी अपना सैनिक व्यवहार बनाए हुए हैं और बालसुलभ शरारतें करते रहते हैं. हाल ही में वे नालेक्जोवा के सैनेटोरियम से वापस लौटे हैं. ज़ाहिर है नर्सें उन पर मुग्ध हुईं. वहाँ पहुँचने से पहले उन्होंने पता लगा लिया था कि टेबल पर उनकी बगल में कौन बैठने वाला है, और उन्होंने अपने आसपास बैठे हुओं को बताया कि दूसरा वाला बहरा है. सो हर किसी ने बैठते ही चिल्लाना शुरू कर दिया. दादाजी बहुत खुश हुए. दीवारों पर लिखे इन शब्दों ने उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा दी थी: “शान्ति उपचार करती है.”

तुम उसे ढंकते हो स्वर्ग जैसे एक कम्बल से


चंद्रमा था मैं

-येहूदा आमीखाई

बहुत उदास है मेरा बच्चा.

जो भी उसे पढ़ाता हूँ मैं
प्रेम का भूगोल
दूरी की वजह से
न सुनी जा सकने वाली अजनबी आवाज़ें –
रात अपना नन्हा पलंग मेरी तरफ झुलाता है मेरा बच्चा
मैं कौन हूँ?
विस्मृति से अधिक.
भुला दी जाती है ख़ुद भाषा ही.
और जब तक वह समझेगा कि मैंने क्या किया
मैं हो चुका होऊंगा मृतकों जैसा.

क्या कर रहे हो तुम हमारे शांत बच्चे के साथ?
तुम उसे ढंकते हो स्वर्ग जैसे
एक कम्बल से, बादलों की परतों से –
मैं चन्द्रमा हो सकता था.

क्या कर रहे हो अपनी उदास उँगलियों से?
तुम उन्हें पहनाते हो दस्ताने
और बाहर चले जाते हो.


चंद्रमा था मैं.

कः भेद पिककाकयो


Friday, November 8, 2013

मैं अपनी युवावस्था से इस तरह बच भागा जैसे आप एक पागलखाने से भागते हैं

अन्ना कामीएन्स्का की डायरी से 

यानूस कोरचाक

अपनी एक रेडियो वार्ता में यानूस कोरचाक ने कहा : “मैं अपनी युवावस्था से इस तरह बच भागा जैसे आप एक पागलखाने से भागते हैं.” [यानूस कोरचाक (१८७८-१९४२) पोलैंड के मशहूर शिक्षाशास्त्री, बच्चों की किताबों के लेखक और बाल चिकित्सा विशेषज्ञ थे. पोलैंड में इस लाजवाब शख्सियत को “मिस्टर डॉक्टर या ओल्ड डॉक्टर के नाम से याद किया जाता है.]

***
कोरचाक – “छोटी छोटी दिक्कतें इस लायक नहीं होतीं कि उनके लिए रोया जाए. जब बड़ी दिक्कतें आती हैं आप रोना भूल जाते हैं.”

***
मैं कोरचाक के सपने देखती हूँ. उस से ऑब्सेस्ड हूँ. मैं रोज उसके शब्दों और उसके बारे में बनाई जाने वाली कहानियों के मार्फ़त उस से मिलती हूँ. मुझे उसकी उपस्थिति वैसे ही महसूस होती है जैसे मेरे अपने प्रिय मृतकों की. और इस सारे पर फक़त एक कविता.

***
यानूस कोरचाक (“ईश्वर के साथ दो-दो हाथ”):

धन्यवाद, सर्जक, कि तुमने सूअर बनाए और लंबी सूंड वाले हाथी, कि तुमने पत्तियों और दिलों को रेशा-रेशा कर दिया, कि तुमने जड़ों को मिठास दी. कोयलों और पिस्सुओं के लिए धन्यवाद. कि लड़कियों के पास स्तन होते हैं, कि मछलियाँ सांस लेती हैं हवा में, कि हमारे पास बिजलियाँ और चेरियाँ हैं. कि तुमने हमें आदेश दिया कि हम तमाम सनकभरे तरीकों से कई सारे हो जाएँ, कि तुमने पत्थरों, समुद्रों और मनुष्यों को विचार प्रदान किये.

***
एल. आर. के साथ कोरचाक के ‘सीनेट ऑफ मैडमैन’ के मंचन की बाबत वार्तालाप: हम उस सब को छाँटेंगे जिसका कोई विरोध न करे – सलेटी और फीका. हम खुद अपनी कैद में हैं. हम अपने मूल्यों को न तो छाँटेंगे न उनसे जुड़े रहेंगे, इस की जगह हम विचार करेंगे – क्या हम कर सकेंगे ऐसा? सेंसर वाले क्या कहेंगे? सो हमारे हाथ बंधे हुए हैं और हमारी संस्कृति मर रही है.

शर्म - ताकि सनद रहे


बरेली बड़े बाईपास रोड के नाम पर किसानों से उपजाऊ जमीन छीनने के खिलाफ प्रतिरोध संगठित करने के जुर्म में रूहेलखंड विश्विद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर इसरार खान को इस तरह जेल ले जाए जाने पर देखें आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है. 

मुझे याद आ रहा है एक गीत जो चला गया ...


नेत्र- परीक्षण

- येहूदा आमीखाई

थोड़ा पीछे जाओ. बाईं आँख बंद करो,
अभी भी?
थोड़ा और पीछे जाओ. दीवार आगे चली गयी है,
क्या दिख रहा है तुम्हें?
क्या पहचानने में आ रहा है धुंधलेपन में?
मुझे याद आ रहा है एक गीत जो चला गया ...
अब? अब क्या दिख रहा है तुम्हें?
अभी भी? – हर समय.
मुझे छोड़कर मत जाओ. प्लीज़. प्लीज़.
तुम नहीं जा रहे हो न?
नहीं जा रहा.
एक आँख बंद करो. जोर से बोलो.
सुनाई नहीं दे रहा – मैं अभी से जा चुका दूर,
क्या पहचानने में आ रहा है? अब क्या दिख रहा है तुम्हें?
एक उदास आँख बंद करो.
हां.
अब दूसरी उदास आँख बंद करो. हां.
देख सकता हूँ अब.

और कुछ नहीं,

Thursday, November 7, 2013

अपनी बीवियों की पहरेदारी में लेखकगण सुरक्षित होते हैं



अन्ना कामीएन्स्का की डायरी से एक टुकड़ा - 

अपनी बीवियों की पहरेदारी में लेखकगण सुरक्षित होते हैं, अपनी ही रचनाओं का आनंद लेते हुए. मेरे लिए हर चीज़ का ज़्यादा महत्व है – कपडे धोना, घरेलू खरीदारी, कोई मुझे ठहरने को कहता है, पावेल की पतलून पर इस्त्री की जानी है. फिर मैं अपनी डेस्क पर बैठती हूँ और भूल जाती हूँ यह सब कैसे किया जाता है.जब-तब मांसाहारी परिंदों की मानिंद पंक्तियाँ हमला बोल देती हैं; कभी भी, कहीं भी. और मांग करती हैं कि उन्हें लिखा जाए.