Monday, December 16, 2013

हम मारे जाएंगे अगर नहीं रचेंगे देवताओं को, हम मारे जाएंगे अगर हम उनकी हत्या नहीं करेंगे


सीरियाई कवि अदूनिस के संग्रह “दिन और रात के सफ़े” से कुछ और अनुवाद. काफ़ी समय पहले इसी ब्लॉग पर अदूनिस की कविता को लेकर एक छोटा परिचयात्मक लेख लगाया गया था. उसे दोबारा से लगा रहा हूँ.

अदूनिस - विडंबनाओं और पराकाष्ठाओं के कवि

सीरिया में १९३० में जन्मे सीरियाई – लेबनानी मूल के कवि, साहित्यालोचक, अनुवादक, और सम्पादक अदूनिस (मूल नाम अली अहमद सईद) अरबी साहित्य और कविता का एक अत्यंत प्रभावशाली नाम हैं. अपने राजनैतिक विचारों के लिए अदूनिस को अपनी ज़िन्दगी का एक हिस्सा जेल में बिताना पड़ा था. १९५६ में अपना मूल देश त्यागने के बाद अदूनिस लेबनान में रहने लगे. “मैं एक ऐसी भाषा में लिखता हूँ जो मुझे निर्वासित कर देती है,” उन्होंने एक दफा कहा था. “कवि होने का मतलब यह हुआ कि मैं कुछ तो लिख ही चुका हूँ पर वास्तव में लिख नहीं सका हूँ. कविता एक ऐसा कार्य है जिसकी न कोई शुरुआत होती है न अंत. यह असल में एक शुरुआत का वायदा होती है, एक सतत शुरुआत.” उनका नाम इधर अरबी कविता में आधुनिकतावाद का पर्याय बन चुका है. कई बार अदूनिस की कविता क्रांतिकारी होने के साथ साथ अराजक नज़र आती है; कई बार रहस्यवाद के क़रीब. उनका रहस्यवाद मूलतः सूफी कवियों के लेखन से गहरे जुड़ा हुआ है. यहाँ उनका प्रयास रहता है मनुष्य के अस्तित्व के विरोधाभासी पहलुओं के नीचे मौजूद एकात्मकता को और ब्रह्माण्ड के बाहर से अलग अलग दीखने वाले तत्वों की मूलभूत समानता को उद्घाटित कर सकें. लेकिन अलबत्ता उनकी कविता रहस्यवाद और क्रान्ति के दो ध्रुवों के बीच की चीज़ नज़र आती है, ये दोनों ध्रुव उस में घुलकर एक सुसंगत निगाह में बदल जाते हैं और यही उनके कविकर्म की विशिष्टता है.  एक नई काव्य भाषा का निर्माण कर पाने का उनका संघर्ष और आर्थिक-राजनैतिक वास्तविकताओं को बदलने की उनकी आकांक्षा अक्सर एक नई पोयटिक्स में तब्दील हो जाती है – एक पोयटिक्स जो अल-ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) से ढंके अल-बातिन (गुप्त) को उद्घाटित कर सकने वाली मानवीय रचनात्मकता को रेखांकित करती है. उनकी कुछ शुरुआती कविताओं की सुबोधगम्यता, सौष्ठव और लयात्मक संरचना उनकी कुछ बाद की कविताओं की जटिलता और लयात्मकता की अनुपस्थिति के बरअक्स बिलकुल अलहदा हैं. अदूनिस विडंबनाओं और पराकाष्ठाओं के कवि हैं, जो अपनी हर नई रचना में अपने आप से आगे बढ़ जाते हैं. हालिया समय में उन्होंने ‘कविता’ के स्थान पर ‘लेखन’ की वकालत की है, जिसका आशय यह हुआ कि कविता ने अपनी फॉर्म के पारंपरिक ढाँचे से ऊपर उठ कर एक सम्पूर्ण कविता बनने का प्रयास करना चाहिए जिसके भीतर स्तरों, भाषाओं, आकारों और लयात्मक संरचनाओं की बहुलता समाहित हो. महान अरबी साहित्यिक-सांस्कृतिक आलोचक एडवर्ड सईद ने उन्हें “आज का सबसे जोखिम उठाने और उकसा देने वाला अरबी कवि” बताया है. अदूनिस के संग्रह “दिन और रात के सफ़े” के अनुवादक सैमुएल हाज़ो ने कहा है “अदूनिस के पहले एक अरबी कविता थी और अदूनिस के बाद एक अरबी कविता है.”  शैली के लिहाज़ से प्रयोगधर्मी और स्वर के लिहाज़ से किसी पैगम्बर सरीखी, अदूनिस की कविता में आधुनिकतावाद के नए औपचारिक उपकरणों और शास्त्रीय अरब कविता की रहस्यवादी इमेजरी का मेल पाया जाता है. उन्होंने निर्वासन की वेदना, अरब संसार की आध्यात्मिक हताशा और पागलपन और ऐंद्रिकता के नशीले अनुभवों को जगाया है. लेकिन उनके कार्य की सबसे बड़ी खूबी वह रचनात्मक विध्वंस है जो उस हर पंक्ति में जलता हुआ नज़र आता है जिसे वे लिखते हैं.  –

“हम मारे जाएंगे अगर नहीं रचेंगे देवताओं को
हम मारे जाएंगे अगर हम उनकी हत्या नहीं करेंगे.”      

आग का दरख़्त

नदी की बगल में
पत्तियों के आंसू बहाता एक दरख़्त रो रहा है.
आंसू-दर-आंसू सैलाब
उमड़ रहा है किनारे पर.
वह आग की अपनी भविष्यवाणी
पढ़कर सुनाता है नदी को.
मैं वह आख़िरी पत्ता हूँ
जिस पर किसी की निगाह
नहीं पड़ती.
मारे जा चुके
मेरे जन
जिस तरह मरती है आग –
बिना कोई निशान छोड़े.



क़ैदी

कोंपलों और घास में गिरफ़्तार
मैं अपने दिमाग में निर्माण करता हूँ एक द्वीप का
एक तट पर बुनता हूँ शाखाओं को.
घुल जाते हैं बंदरगाह. काली रेखाएं
उधेड़ती हैं ख़ुद को. मैं गुज़रता हूँ
रोशनी की बाधाओं और झरनों के बीच से
जिन्होंने मेरे सपने को बनाया था.
मुझे महसूस होता है हरेक तितली का
क़ैद किया गया आश्चर्य
जो डगमगाती है
अपने मरते पंखों की फड़फड़ाहट में.



भूख

भूखे ने एक जंगल रोपा
जहां रोते हुए लोग पेड़ बने
और शाखाएँ ... प्रसव पीड़ा झेल रही
स्त्रियों के वास्ते एक देश.
अजन्मे बच्चों की फसल उगी
इस ब्रह्माण्ड के खेत में
कोंपलों की तरह.
राख में तब्दील हो गया जंगल
उनकी चीखों से जो
मानो विनाश की मीनारों से आईं
जिनमें थे नन्हे भूखे स्वर

आरोप लगाते, आरोप लगाते, आरोप लगाते.

Sunday, December 15, 2013

काँधे पर धरता हूँ आने वाले कल का सूरज


सीरियाई कवि अदूनिस की रचनाओं से कबाड़खाने के पाठक अपरिचित नहीं हैं. उनके संग्रह ‘दिन और रात के सफ़े’ की महत्वपूर्ण भूमिका और इसी संग्रह की कुछ शुरुआती कविताएँ पेश करता हूँ. मूल अरबी से ये अनुवाद सैमुअल हाज़ो ने किये थे.

१.

मैं ऐसी भाषा में लिखता हूँ जो मुझे निर्वासित कर देती है. एक अरब कवि का अपनी भाषा के साथ रिश्ता उस माँ जैसा होता है जो अपनी देह के भीतर की पहली हरकत के साथ ही अपने पुत्र को त्याग देती है. अगर हम बाइबिल में बताई गयी हैगर और इश्माइल की कहानी को, जिसे कुरान में भी दोहराया गया है, स्वीकार कर लें तो हम पायेंगे कि अरब कवि के लिए मातृत्व, पितृत्व और ख़ुद भाषा भी निर्वासन में जन्म लेते हैं. अपनी ही मातृभूमि में निर्वासन, जैसा यह कथा बताती है. उसके लिए कहा जा सकता है – आरम्भ में निर्वासन था न कि शब्द. अपने रोज़मर्रा जीवन के नर्क के विरुद्ध संघर्ष में अरब कवि की इकलौती शरणस्थली निर्वासन का नर्क होती है.

२.

मैंने अभी अभी जो कहा है, वह हमें मिथक और भाषा की जड़ों तक वापस ले जाता है. इन जड़ों के आधार पर इस्लाम ने एक नई शुरुआत पेश की. उसने भाषा को उसके सांसारिक निर्वासन से हटा कर इलहाम के मुल्क की तरफ़ मोड़ दिया – स्वर्ग की तरफ़. भाषा की मार्फ़त इलहाम अध्यात्मिक को प्रकट करता है जबकि कार्य दैहिक को व्यवस्थित करता है. यह व्यवस्था आदमी को नए ख़लीफ़ा यानी पैगम्बर के उत्तराधिकारी के रूप में सौंपी गयी है. इलहाम को उसी समय स्थापित किया गया जब आदमी ने उसे जीवन में उतारना स्वीकार किया था. तब जा कर वह एक नियम और एक व्यवस्था बना.

लेकिन तब भी हरेक व्यवस्था में एक दूसरे तरह का निर्वासन मौजूद रहता है क्योंकि हर व्यवस्था ख़ुद ही एक सीमा और पहले से तयशुदा रास्ता होती है. हरेक व्यवस्था मनुष्य को उसके अस्तित्व से जबरन अलग करती है और उसे उसकी शक्ल-सूरत के आधार पर पहचानती है.

इस तरह अरब जीवन अपनी शुरुआत से ही भाषा और धार्मिक व्यवस्था से निर्वासन रहा है. बीते हुए समय और वर्तमान में अरब कवि ने निर्वासन के कई और रूपों को जाना है – सेंसरशिप, सरकारी प्रतिबन्ध, देशनिकाला, कारावास और हत्या.

‘दूसरा’ इस परिदृश्य में ‘मैं’ की मुक्ति दिखाई देता है. ‘दूसरा’ न तो भूतकाल है न ही भविष्य, न ही वह ऐसा आईना है जो ‘मैं’ को उसके बचपन तक वापस लौटा ले जा सके. अलबत्ता वह कवि को अज्ञात की तरफ, जहां हर चीज़ अजनबी होती है, गतिमान बनाता है.

३.

इस ज़ाविये से, कविता निश्चित ही “खोया हुआ स्वर्ग” नहीं होती न ही वह कोई “स्वर्णकाल” है. इसके उलट वह एक ऐसा सवाल है जो एक दूसरे सवाल से रू-ब-रू कराती है. एक प्रश्न की तरह पहचाना गया “दूसरा” एक बिंदु पर “मैं” के साथ मिलता है जो दरअसल जवाब के निर्वासन में रह रहा होता है. इसीलिये “दूसरा” जवाब का एक संघटक हिस्सा होता है – ज्ञान और इलहाम का तत्व. यह ऐसा ही है जैसे कि “मैं” के भीतर के सवाल की उत्तेजना “दूसरा” होती है.

अरब कविता के रचनात्मक अनुभव में “दूसरा” हमेशा मौजूद रहा है. क्योंकि जिस भाषा का इस्तेमाल अरब कवि करता है उसके भीतर नई और पुरानी कई भाषाएँ होती हैं. कविता में कहा जाए तो अरबी एकवचन के आकार में बहुवचन है.

लेकिन चाहे अभ्यास में हो चाहे ऊपर बताई गयी व्यवस्था से अपने संपर्क में, अरबी भाषा के पास हमें बताने को और कुछ बचा नहीं है. कहा जाए तो वह खामोशी की ज़बान बन गयी है, बल्कि वह कोशिश करती है कि अभिव्यक्ति को खामोशी में तब्दील कर दे. उसका कार्यक्षेत्र निश्शब्दता में है न कि बोली-भाषा में. "दूसरे” ने, यहाँ अभिप्राय पश्चिमी छवि से है, अरब कवि के साथ अपने सम्बन्ध को एक ख़ामी या एक ज़ंजीर में बदल दिया है, कम से कम व्यवस्था के सम्बन्ध में ऐसा कहा जा सकता है.वह अपनी सीमाओं में अपनी स्वतंत्रता से संतुष्ट रह सकता है. शायद वह अरब इतिहास में कुछ न देख पा रहा हो, लेकिन सवाल का जवाब उसे पहले से पता है क्योंकि अपनी कल्पना, ज़रुरत और स्वार्थ के हिसाब से सवाल का आविष्कार भी उसी ने किया था.

इस बात से हम समझा सकते हैं कि क्यों एक अरब कवि दोहरी अनुपस्थिति का मूर्त रूप होता है – एक अपने आप से और दूसरी “दूसरे” से अनुपस्थिति. वह इन दो निर्वासनों में दरम्यान रहता है : आंतरिक और बाहरी. सार्त्र के शब्दों की व्याख्या करें तो कह सकते हैं, वह दो नर्कों के बीच कहीं रहता है – “मैं” और “दूसरा”.

“मैं” मैं नहीं होता, न ही “दूसरा”.

अनुपथिति और निर्वासन ही इकलौती उपस्थिति का निर्माण करते हैं.  

४.

कवि होने का अर्थ हुआ कि मैं पहले ही लिख चुका हूँ लेकिन यह कि दरअसल मैंने कुछ लिखा ही नहीं. कविता बगैर शुरुआत और अंत का एक कार्य है. वह एक आरम्भ का वायदा है, एक सतत आरंभ.

होने का अर्थ हुआ कुछ मायने रखना. मायने केवल शब्दों के माध्यम से पकड़ में आते हैं. मैं बोलता हूँ – इसीलिये मैं हूँ. इस तरह और इसके बाद ही मेरे होने का कोई अर्थ बनता है. इस दूरी और उम्मीद के माध्यम से ही अरब कवि बोलने का प्रयास करता है यानी लिखना और शुरू करना.

लेकिन जिन दो निर्वासनों का मैंने ज़िक्र किया है, क्या उनके दरम्यान किसी तरह का आरम्भ वाक़ई संभव है?

और, हर चीज़ से पहले, क्या होता है ऐसा आरम्भ?

मैं यह सवाल पूछ रहा हूँ ताकि मैं घुमा फिराकर इसका यह कहकर जवाब दे सकूं कि अरबी भाषा शुरुआत से ही एक ऐसे आरम्भ को स्थापित करने का सतत प्रयास थी और है जिसे स्थापित किया ही नहीं जा सकता क्योंकि उसकी स्थापना असंभव लगती है.

और चूंकि अपनी परिभाषा के हिसाब से कविता उपस्थिति के पक्ष में रहती है, इसलिए अरब कवि एक संभव बुनियाद के भ्रम  के भीतर न तो जीवित रह सकता है न ही लिख सकता है. इस तरह एक अरब कवि अपने जीवन और अपनी भाषा में स्वतंत्रता और लोकतंत्र को भ्रम की तरह बताता है.

मैं ‘भ्रम’ कह रहा हूँ क्योंकि स्वयं जीवन स्वतंत्रता और लोकतंत्र से पहले आता है. मैं जीवन की बाबत कैसे लिख सकता हूँ जब मुझे मैं होने से ही रोका जाता है, जब मैं जी ही नहीं रहा, न अपने भीतर न अपने लिए, जब मैं “दूसरे” के लिए भी नहीं जी रहा?

अपने पश्चिमी काउंटरपार्ट के बरखिलाफ़ अरब कवि की स्वतंत्रता के साथ जुड़ी समस्या न तो अपने व्यक्तित्व का भान होने में है न ही लोकतंत्र और मानवाधिकारों की आंशिक या सम्पूर्ण अनुपस्थिति में. दरअसल यह समस्या जहां है वह बहुत गहरी, सुदूर और जटिल है क्योंकि एक विडम्बना के तौर पर वह खासी साधारण है. यह समस्या आदिम और मूलभूत चीज़ों में निहित है. वह मनुष्य के शुरुआती निर्वासन में, संघटक तत्वों और उनसे निर्मित वस्तु में और आदेशों और प्रतिबंधों के “नहीं” में निवास करती है. यह “नहीं” न केवल संस्कृतियों की रचना करता है, मनुष्य और स्वयं जीवन भी इसी से निर्मित होते हैं.

५.

संस्थागत बना दी गयी भाषा “मैं” और “दूसरे” के ऊपर बाढ़ की तरह बहती है और स्वाधीनता और लोकतंत्र की बुनियादों को झकझोर कर रख देती है. मृत्यु और कत्ले-आम की इस भाषा में “मैं” और “दूसरा” अपनी मृत्यु खोजा करते हैं.

मृत्यु सिर्फ़ मृत्यु को देखती है. पहले से ही मरा हुआ “मैं” “दूसरे” को स्वीकार नहीं कर सकता – वह उसे अपनी ही छवि में देखता है जो कि मृत्यु की छवि है. फ़िलहाल हमारी कविता इसी तरह की मृत्यु के भीतर घूमती नज़र आती है.

अदूनिस
पेरिस, ९ मार्च १९९२


रास्ता

मैंने चाहा
बर्फ़
और आग के जीवन को साझा करना.
लेकिन न बर्फ़ ने
न आग ने
मुझे भीतर आने दिया.
सो
मैं शांत बना रहा
फूलों की तरह प्रतीक्षारत
पत्थरों की तरह ठहरा हुआ.
प्रेम में
अपने आप को खोया मैंने.
मैं टूट कर दूर गया
और देखा किया
जब तक कि डोलने नहीं लगा किसी लहर जैसा
सपने में देखे गए जीवन
और बदलते हुए सपने के दरम्यान
जिसे मैंने जिया.
  
दिन

थक चुकी मेरी आँखें, थक चुकी दिनों से,
दिनों के बावजूद थक चुकीं.
तो भी मुझे छेदते जाना होगा
दिनों को दीवार दर दीवार
ताकि एक और दिन पा सकूं.
क्या है अभी? क्या बचा हुआ है एक और दिन?

यायावर

एक यायावर, मैं धूल से
एक प्रार्थना बनाता हूँ.
निर्वासित,
मैं अपनी आत्मा को गाता हूँ  
जब तक कि दुनिया जलने न लगे
मेरे गान से
किसी चमत्कार की मानिंद.
इस तरह हूँ मैं
उगा हुआ.
इस तरह होती है मेरी मुक्ति.
  
सिसीफ़स का निशान

बाक़ियों को जानता हूँ मैं. उनके
ख़िलाफ़ उछलता हूँ मैं
पश्चाताप की इस चट्टान को
इसके पहले कि
सामना करूं आने वाले समय का.
निरपराध वर्ष घुमते हैं
किसी गर्भ में जीवन की तरह.
मुझे पश्चिम में नज़र आती है
हरी सरहदों की रोशनी जहां
मुझे कभी नहीं मिलेगा मेरा
दूसरा निज. मैं दूर जाता हूँ लोगों से,
काँधे पर धरता हूँ आने वाले कल का सूरज
उठाये लिए जाता हूँ उसे आगे स्वर्ग की तरफ.

(यूनानी मिथकों में सिसीफ़स एफ़ेरिया का राजा था जिसे उसके छल-कपट की आदत के कारण एक विशालकाय चट्टान को एक पहाड़ी की चोटी तक लुढ़काते ले जाने की सज़ा मिली थी. चोटी पर पहुँचते ही पत्थर वापस नीचे आ जाता था सो उसे लगातार ऐसा करते जाना होता था.)

हाथों की नींद

आज प्रस्तुत करता हूँ अपनी हथेलियाँ
मृतक भूमियों और गूंगी
सड़कों को इसके पहले कि मृत्यु
सिल दे मेरी पलकों को, सी दे मुझे
सारी धरती की त्वचा में
और सो जाए मेरे हाथों में हमेशा के लिए.


भूमिगत

नगरों की उपस्थिति
हमारी आँखों की भंवों
के बीच से गुज़री.
अपने चेहरों के पीछे नकाबों से
हम चीखे खो गयों की तरह,
“हर नगर की कब्रगाह के तहखानों में
हम रहते हैं घोंघों की तरह
अस्वीकार के उनके
कवचों के भीतर,
आओ!
हमें खोजो!  
नगरो!”

Friday, December 6, 2013

मैंने श्वेत प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष किया. मैं अश्वेत प्रभुत्व के खिलाफ भी संघर्ष करूंगा


अनवरत संघर्ष के मंडेला

-शिवप्रसाद जोशी

नेल्सन मंडेला ऐसे समय में इस दुनिया में नहीं रहे जब फिर अंधेरा घिर आया है, कई क़ब्ज़े किए जा चुके हैं, युद्ध की नई छायाएं मंडरा रही हैं, नफ़रत, हिंसा और जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक और नस्लभेद के रूप नए होकर आ गए हैं. मंडेला ने जिस लड़ाई के लिए अपना जीवन खपा दिया वो अब भी जारी है और हम नहीं जानते कि कितने मंडेला चाहिए होंगे इस दुनिया को अन्याय से मुक्त कराने के लिए. जो अब गोरे और काले का ही नहीं, अलग अलग रूपों और अलग अलग व्याख्याओं और अलग अलग जातीय राजनैतिक सांस्कृतिक उत्पीड़नों और समीकरणों में फिर से भीषण और हिंसक कूदफांद मचा रहा है मानो कई सिर वाला दैत्य.

लेकिन हम ये नहीं मानते हैं जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने शोक संदेश में कहा है कि "अब वे हमारे नहीं रहे. अब वे इतिहास के हो गए." न जाने ओबामा का ऐसा कहने का क्या तात्पर्य रहा हो, लेकिन हम नहीं मानते कि वे हमारे नहीं रहे और वे इतिहास के हो गए. रहेंगे तो वे हमारे ही, जाएं वो कहीं भी. हम उन्हें इतिहास के हवाले से याद नही करते रहेंगे, आने वाली पीढ़ियां उन्हें अपने संघर्षों और यातनाओं और मुसीबतों और जीतों में याद करती रहेगी. वे इन लड़ाइयों में पैबस्त रहेंगे. यही मंडेला होने का अर्थ है.

वरना तो नस्लभेद से मुक्त एक देश ने उन्हें एक महाविराट छवि में बदल दिया था. एक चलतेफरते संग्रहालय, जब तक चल सके, और एक स्थिर संग्रहालय जब बिस्तर के हो गए. दक्षिण अफ्रीका ने मंडेला के संघर्ष से मिली नेमतों को एक सरकारी खजाने की तरह चलाया और लुटाया. कोई नहीं जानता कि मंडेला की मुक्ति की कामना को एक कारखाना बना देने के उपक्रम को देखदेखकर उनपर क्या गुजरती होगी. आज हैरानी की बात नहीं है कि मंडेला को घोटघोट कर श्रद्धांजलि देने वालो में वे ताकतें और वे लोग भी पीछे नहीं हैं जिन्होंने इस दुनिया को बदरंग और अस्थिर और अशांत और खूंखार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

मंडेला का अखिल वैश्विक गुनगान करने वालों में सत्ताओं के वे सूरमा भी हैं जिनके रहते बढ़ते फैलते मंडेला जेल में रहे. जेल से बाहर आए तो उनके महत्त्वपूर्ण साल छीन लिए गए थे. उन्हें कुछ पहले से तै चीज़ों पर हस्ताक्षर करने थे और देश को उस एजेंडे पर आगे चलाना था जो 90 के दशक का विकासशील देशों में मुक्त बाजार और भूमंडलीकरण का एजेंडा था. एक ओर मंडेला जेल से मुक्त हुए और दूसरी ओर दुनिया के विकासशील मुल्कों में मुक्त बाजार हुआ.

जेल की सलाखों के अंधेरों और कष्टों के बीच मंडेला ने एक नए दक्षिण अफ्रीका और एक नए न्यायसंगत समाज का सपना देखा था. उस सपने के साथ वो बाहर आए. शांतिपूर्ण सत्ता हस्तातंरण के भागीदार बने, देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने, एक विशाल पार्टी के नेता, पीढियों से दबे कुचले और शोषित समाज की आत्मा की आवाज़, उसके महानायक. मंडेला ने देश को कठिन बेड़ियों से छुटकारा दिला दिया लेकिन शायद उन्हें भी अंदाज़ा न रहा होगा कि कुछ नई बेड़ियां देश की विराटता के पिछवाड़े तैयार की जा रही हैं. एक नया भूमंडल उनके सामने आने ही वाला है. बुजुर्ग और बीमार मंडेला ने पूरी दुनिया के साथ उस महागेट में प्रवेश किया. फिर नहीं दिखे. पिछले सालों में जो ख़बरें आई थीं उनके मुताबिक मंडेला की अंतिम यात्रा के टेलीकास्ट राइट्स उनके पोते ने बेच दिए थे. मंडेला उस समय गंभीर रूप से बीमार और बिस्तर पर थे. बाद में पारिवारिक विवाद के बीच उनके पोते को खंडन करना पड़ा कि ऐसा कुछ नहीं किया गया है. एक विवाद मंडेला के परिवार में उन्हें दफ़नाने की जगह को लेकर भी छिड़ा है. परिवार से बाहर कॉरपोरेट मीडिया में भी मंडेला के अंतिम संस्कार की कवरेज को लेकर विवाद रहे हैं और दक्षिण अफ्रीका की अश्वेत जनता अपने प्रिय नायक को लेकर चल रहे इस विवाद को लेकर आक्रोशित रही है.


"मैंने श्वेत प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष किया. मैं अश्वेत प्रभुत्व के खिलाफ भी संघर्ष करूंगा. मैंने एक लोकतांत्रिक समाज का सपना देखा है, जहां हर कोई बराबरी से रह सके." मंडेला ने अपने जेल दिनों में अदालत के सामने यही कहा था. भारत की तरह दक्षिण अफ्रीका भी विकास और प्रभुत्व की नई छलांगों की ओर अग्रसर है. मार्टिन लूथर हों या मंडेला या मोहनदास- वे पहले मौन फिर मृत्यु की ओर धकेले जाते हैं. भूमंडलीकृत विश्व अपार श्रद्धांजलियां देते हुए उन्हें स्मारकीय महत्त्व की वस्तु में बदल देता है. लेकिन जो नहीं दिखता, न सत्ता को न बाजार को, वो मूल्य है जो मंडेला जैसों के जीवन से दुनिया की आम जनता तक आया है और चुपचाप आने वाली पीढ़ियों में जाता है. ये संघर्ष का मूल्य है. मंडेला इसी मूल्य के संवाहक थे और रहेंगे. 

कॉफी-हाउस: उदय प्रकाश की कहानी 'नेलकटर' (स्वर यूनुस ख़ान)

कॉफी-हाउस: उदय प्रकाश की कहानी 'नेलकटर' (स्वर यूनुस ख़ान)यूनुस भाई हमने कहानी को डाउनलोड करके उसका ऑडियो कई मित्रों को whatsapp किया। हर जगह से जादू बाबा के लिए जवाब यही था "so sweet" ! हम तो डायबिटिक ठहरे-हमारी तो शकर बढ़ गई।

Tuesday, December 3, 2013

किसी को दिक्कत नहीं इस खेल से


मार्च १०, १९५० को जन्मीं बल्गारियाई मूल की फेदिया फ़िल्कोवा ने सोफिया विश्वविद्यालय से ज़र्मन दर्शन में ग्रेजुएट की डिग्री हासिल की. कई कविता संग्रह उनके प्रकाशित हैं और उन्होंने बीस से अधिक जर्मन ग्रंथों का अनुवाद किया है. उन्हें १९९१ में बल्गारिया का सर्वोच्च अनुवाद पुरूस्कार प्राप्त हुआ जबकि १९९५ में उन्हें ऑस्ट्रियाई स्टेट अवार्ड फ़ॉर आर्ट ट्रांसलेशन से नवाज़ा गया.

उनके ये अनुवाद लोकमत समाचार की वार्षिकी ‘दीप भव’ के लिए किये गए थे. वहीं से साभार -

मित्रता

मृत्यु भी मान जाती है कभी-कभी
ख़ासतौर पर अगस्त में जब
रातें अब भी छोटी
और अँधेरे के पास इतना सारा निबटाने को ...

तब ज़ाफ़रान के फूल तक चमकते हैं पतझड़ में.

एक पंख के तले

अपनी मर्ज़ी से खेलती हैं आवाज़ें
शब्द हैं उड़ान भरते परिन्दे,
पहुंचते हुए दूसरे परिंदों तक
जैसे पहुंचते हैं दूसरे परिन्दे उन तक.
किसी को दिक्कत नहीं इस खेल से.


मुस्कराती है ख़ामोशी.

Monday, December 2, 2013

तहलके के बाद

तेजपाल के ‘तहलके’ के बाद

-शालिनी जोशी

“ ‘मेरे हत्यारों की कहानी’ एक ऐसा उपन्यास है जिसमें 21वीं सदी के भारत की सच्चाइयों की एक गहन और मर्मभेदी पड़ताल है जो भारतीय समाज में भाषा,वर्ग और संपत्ति के विभाजन को बेनकाब करता है और सत्ता और ताकत के गलियारों की क्रूर सच्चाइयों और अंधेरे को उजागर करता है.” तहलका के संपादक तरुण तेजपाल के लिखे उपन्यास का इंटरनेट पर कुछ इन्हीं शब्दों में परिचय उपलब्ध है. इसी उपन्यास का एक किरदार कहता भी है कि,“सत्ता ही इस दुनिया का इंजन है और इस इंजन का ईंधन हैं सेक्स और पैसा”. इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज तरुण तेजपाल अपने ही लिखे उपन्यास का एक किरदार प्रतीत हो रहे हैं और उन पर लगे यौन दुराचार के आरोप ने उनके मीडिया साम्राज्य को बेनकाब कर दिया है ठीक उसी तरह से जैसे उनके उपन्यास के बारे में दावा किया जाता है.
   
खबरों और खुलासों से भारतीय राजनीति और समाज में तहलका मचाने वाले तरुण तेजपाल पर जब यौन उत्पीड़न के आरोप लगे तो जेहन में पहला सवाल यही उठा कि क्या ये भी...ऐसा नहीं होना चाहिये. लेकिन ऐसा हो चुका था. खुद तरूण ‘भूल’ स्वीकार करते हुए अपने पाप के प्रायश्चित की घोषणा कर चुके थे. फिर क्या था मामला यौन उत्पीड़न का न रहकर मीडिया हंट और आरोप-प्रत्यारोप के बीच पूरी तरह से सियासी और सनसनीखेज बना दिया गया. पल भर में तेजपाल उच्च मूल्यों और मानदंडों की मचान से नीचे गिर गये और बरसों की बनाई और कमाई हुई अपनी छवि से हाथ धो बैठे और तहलका की प्रतिष्ठा ढह गई.

तरुण तेजपाल ने जो किया उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए वो कम है. तेजपाल की छवि एक सम्मानित और लोकप्रिय पत्रकार-संपादक की रही है. न सिर्फ मीडिया की बिरादरी में बल्कि आम पाठकों के बीच भी उनका सिक्का रहा है. कहा जा सकता है कि अगर ये घटना सामने नहीं आई होती तो उन्हें समकालीन पत्रकारिता के इतिहास में एक संस्था की तरह याद किया जाता. लेकिन आज तेजपाल खुद कठघरे में हैं उसी कठघरे में जिसमें वो हमेशा दूसरों को खड़े करते आए थे. हालांकि इस मामले की जांच और फैसला आना अभी बाकी है लेकिन पब्लिक स्फेयर में उनके खिलाफ फैसला सुना दिया गया है. वो सबसे कुख्यात दुराचारी घोषित किये जा चुके हैं और उनकी कथित चरित्रहीनता और भ्रष्टाचार के नित नये किस्से सामने आ रहे हैं. लेकिन क्या ये मामला सिर्फ एक यौन दुराचारी और पीड़िता के बीच का है. नहीं, इसके कुछ और निहितार्थ भी हैं जिनपर चर्चा जरूरी है.

सबसे पहले इस घटना ने पत्रकारीय नैतिकता पर छाए संकट को और गहरा कर दिया है. जहां मुख्यधारा की पत्रकारिता पर बेलगाम व्यावसायिकता हावी है और जान हथेली पर रखकर की जानेवाली जनपक्षीय, खोजी,सरोकारपरक पत्रकारिता इतिहास बनती जा रही है वहां तरुण तेजपाल के इस कृत्य से वैकल्पिक और खोजी पत्रकारिता को गहरा झटका लगा है. कल तक तेजपाल इन मूल्यों के प्रतिनिधि माने जाते थे. आखिर उन्होंने राजनीति-समाज और खेल के कई धुरंधरों का पर्दाफाश किया था.

इस घटना से ही ये सवाल भी उठता है कि क्या स्त्री आजादी और कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की बड़ी-बड़ी घोषणाओं और दावों के बावजूद कार्यस्थलों में महिलाएं सुरक्षित हैं. ध्यान रहे कि इसी बीच तीन और ऐसे मामले आए हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. गोवा में हुए सरकारी फिल्म समारोह में एक अधिकारी के यौन उत्पीड़न का शिकार हुई जेएनयू की छात्रा ने अपनी शिकायत दर्ज कराई.कानून की एक इंटर्न ने न्यायाधीश पर यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया और इसी तरह से उत्तराखंड में भी अपर गृहसचिव के खिलाफ एक युवती ने नौकरी का झांसा देकर यौन उत्पीड़न करने का मामला दर्ज कराया. ये वो मामले हैं जहां पीड़िताओं ने जीवन, परिवार और कैरियर को दांव पर लगाकर मामला सार्वजनिक करने का जोखिम उठाया लेकिन उनका क्या जहां यौन उत्पीड़न से जुड़े शर्म और अपमान, कैरियर की चिंता और जलालत के डर से महिलाएं मुंह ही नहीं खोल पातीं. जरा सोचिये कि यदि इस महिला पत्रकार ने आगे बढ़कर साहस नहीं दिखाया होता तो क्या तेजपाल का उसी अदम्य और निर्भीक अंदाज में थिंक फेस्ट और लिट फेस्ट में वाहवाही लूटना जारी नहीं रहता.

कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न पूरी दुनिया में एक गंभीर सामाजिक समस्या है लेकिन दुर्भाग्य ये है कि व्यवहार में इसे अभी तक समस्या और अपराध के तौर पर स्वीकार ही नहीं किया गया है. अगर ऐसा नहीं था तो खुद तहलका में विशाखा निर्देशों के तहत समिति क्यों नहीं बनाई जाती. ऐसा इसलिये है कि यौन छेड़छाड़ एक सहज पुरूष व्यवहार माना जाता है और इस माहौल में अपने सम्मान और शील की रक्षा करना खुद महिलाओं की ही जिम्मेदारी है. नौकरीपेशा महिलाएं भी सामान्यत: अश्लील बातों और अश्लील प्रस्तावों या अश्लील हावभाव को नजरअंदाज करने में ही अपनी भलाई समझती हैं. अगर कुछ सर्वेक्षणों पर नजर डालें तो 2011 में मानविकी और समाज विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय जनरल में छपे एक लेख के मुताबिक जापान में किये गये एक सैंपल सर्वे में 40 प्रतिशत महिलाओं ने ये माना कि उन्हें कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और 40 महिलाओं ने इस वजह से नौकरी भी छोड़ दी. इसी तरह से इंग्लैंड में 92 प्रतिशत महिलाओं ने ये कहा कि कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न एक गंभीर समस्या है और 12 प्रतिशत महिलाओं ने ये स्वीकार किया कि वो कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न का शिकार हुई हैं. अमरीका में एक रिपोर्ट के अनुसार 52 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि अपने कैरियर में किसी न किसी अवसर पर उन्हें यौन प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है.ये अकारण नहीं है कि हर क्षेत्र में उच्च और निर्णायक पदों से महिलाएं लगभग गायब हैं.  
  
दोबारा से तेजपाल मामले पर लौटें तो यहां एक सवाल ये भी है कि क्या हर यौन उत्पीड़क के खिलाफ इतनी ही सख्ती और मुस्तैदी दिखाई जाएगी जितनी तेजपाल मामले में हुई. इसमें शक है क्योंकि तेजपाल के ही समांतर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एके गांगुली का भी मामला चल रहा है जिनके खिलाफ इंटर्न ने यौन दुराचार का मामला दर्ज कराया है. गांगुली ने आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. फिल्म महोत्सव में जेएनयू की छात्रा के साथ हुए यौन दुर्व्यवहार का मामला भी रफा-दफा कर दिया गया. इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता कि एक ही तरह के अपराध के लिये अलग-अलग मानदंड नहीं अपनाए जा जाएंगे.

सब पर सवाल उठाने वाले मीडिया के लिये निस्संदेह ये आत्मनिरीक्षण की घड़ी है.एक बड़ा सवाल जो इस मामले से टीआरपी बढ़ाने की कोशिश में दब गया है या दबा दिया गया है वो ये है कि आखिर पीड़ित महिला पत्रकार को जो काम सौंपा गया था उसका पत्रकारिता से दूर-दूर तक क्या नाता था. उसे रिपोर्टिंग करने और खबरें लिखने के लिये नौकरी पर रखा गया था न कि किसी सेलेब्रिटी की मेहमाननवाजी करने और उसे कंपनी देने के लिये. शायद इस मसले पर चर्चा इसलिये भी नहीं हो रही है क्योंकि हर बड़े कॉरपोरेट मीडिया घराने का ये सालाना शगल बन चुका है चाहे उसे कॉनक्लेव का नाम दिया जाए या फेस्ट का लीडरशिप डिबेट का. पत्रकारीय सरोकार के नाम पर किये जाने वाले इन पांचसितारा आयोजनों में विचार-विमर्श के इतर सत्ता, पैसे और सेक्स का कैसा प्रदर्शन और इस्तेमाल होता है- ये इन आयोजनों में जानेवाले और भागीदारी करनेवाले बखूबी जानते हैं और ये किसी से छिपा भी नहीं है. विडंबना यही है कि यहां एक बार फिर तेजपाल की किताब का वो अंश याद आता है कि सत्ता का इंजन धन और सेक्स के ईंधन से चलता है.

ये अलग बात है कि सबसे सवाल पूछने वाले मीडिया की असलियत को बयान करने के लिये तहलका एक बहाना हो गया वरना तहलका अकेला नहीं है. मीडिया उद्योग से जुड़ा कोई भी अनुभवी आदमी इस बात को स्वीकार करने से पीछे नहीं हट सकता कि जो तरुण तेजपाल ने किया वो अगर आम नहीं तो मीडिया में नई बात भी नहीं है. लेकिन अगर तहलका में विशाखा दिशा निर्देशों के तहत आंतरिक समिति नहीं बनाई गई थी तो अधिकांश अन्य मीडिया संस्थानों में भी इसका संज्ञान नहीं लिया गया था. वरिष्ठ पत्रकार राहुल सिंह ने भी इसका खुलासा किया जब इस घटना के बाद चर्चा में बुलाए जाने पर उन्होंने एक टेलीविजन चैनल के संपादक से पूछा कि क्या उनके यहां ऐसे मामलों से निबटने के लिये कोई समिति है तो जवाब न में मिला. ये स्थिति तब है जब मीडिया एक ऐसा क्षेत्र है जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व बड़ी तेजी से बढ़ रहा है. क्या उम्मीद की जाए कि मीडिया संस्थान अब भी इसका संज्ञान लेते हुए विशाखा गाइडलाइन के तहत अपने यहां आंतरिक समिति बनाने के लिये विवश होंगे.

इस मामले में जिस तरह तेजपाल ने अपने वकीलों की सलाह पर बाद में बयान दिये कि उनके खिलाफ साजिश की गई है (जो कि आरोपी की तरफ से पीड़ित पर लगाया जाने वाला सबसे आसान आरोप होता है) वो महिलाओं और महिला संगठनो के लिये आशंका की घंटी भी है. उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि दहेज कानून की तरह ही कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न रोकने के लिये बना ये कानून भी कहीं ब्लैकमेलिंग का जरिया न बन जाए. स्त्री की सुरक्षा के लिये बनाया गया ये कानून कहीं कार्यस्थलों में स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने की बजाय उसकी स्वतंत्रता के लिये खतरा न बन जाए जिसकी ओर कुछ संगठन लगातार इशारे कर रहे हैं कि अब महिला स्टाफ को रखने में लोग हिचकेंगे. अगर ऐसा होता है तो कार्यस्थल बदला लेने के अखाड़े बन जाएंगे.

इतना तो तय है कि हमारा जो भी तंत्र है औऱ उसके जो भी पुर्जे हैं वो अब भी पुरुषवादी मानसिकता से ही संचालित हैं और उनका वर्ग चरित्र भी है जो महिलाओं के साथ सहयोग और भागीदारी का पाठ नहीं समझना चाहते हैं और जिनका नजरिया अभी भी हुकूमती ही है और जिनके लिये मर्यादा लांघना एक भूल भर है.