Saturday, July 12, 2014

आपको यह गुमान कब से हुआ कि मैं एक बड़ा लेखक और आदमी हूँ - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 7

(पिछली क़िस्त से जारी)


लेकिन उस ज़माने में एक विभाजन रेखा थी. फिल्मों में दो बड़े आदमी थे: मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा. मैं प्रकाश मेहरा का साथ भी काम कर रहा था. मैंने उनके लिए ‘खून  पसीना’, ‘लावारिस’, और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ लिखीं. वह एक दूसरा ही राकेट था. अब ये दोनों लोगों में से क्या महानी है, जो उसकी फिल्म में काम  करेगा, इधर नहीं कर सकता, जो उधर करता है, इधर नहीं कर सकता. लेकिन वे मुझे आदेश नहीं दे सकते थे. “तुम यहाँ काम नहीं कर कर सकते,” अमिताभ बच्चन ने कहा “मेरे साथ आओ, जहाँ मैं काम करूंगा वहाँ तुम भी करोगे.” मनमोहन देसाई ने ‘रोटी’ बनाई. तब वे बोले “अब मैं प्रोड्यूसर बनना चाहता हूँ.” तब उन्होंने ‘अमर अकबर एन्थनी’ बनाई. उसके बाद ‘नसीब’ और ‘कुली’. प्रकाश मेहरा के यहाँ स्ट्रेट नरेशन्स होते थे जो डायलाग और परफोर्मेंस पर निर्भर करते थे. प्रकाश मेहरा साब एक अच्छे गीतकार भी थे.

दक्षिण की ओर

एक दिन मैं आर. के. स्टूडियो में शूट कर रहा था, जितेन्द्र मेरे पास आये और बोले “माफ़ करना लेकिन एक प्रोड्यूसर आपसे दो साल से मिलना चाह रहा है, लेकिन उसके पास आपसे मिलने की हिम्मत नहीं है.”

तब वह प्रोड्यूसर आया. मैंने पूछा “आपको यह गुमान कब से हुआ कि मैं एक बड़ा लेखक और आदमी हूँ? मैं एक साधारण इंसान हूँ.”

“नहीं सर, दरअसल मेरा भाई आपसे बात करना चाहता है.” सो मैंने उसके भाई हनुमंत राव से बात की जो पद्मालय का प्रोड्यूसर होने के साथ ही एक बड़े दिल वाला अच्छा आदमी निकला. उसने कहा “मैं कन्नड़ से हिन्दी में एक रीमेक बनाने की सोच रहा हूँ.” उसने मुझे स्क्रिप्ट थमाई.

“मैंने सुना है” मैं बोला “दक्षिण भारत में आप जब रीमेक बनाते हैं तो आप कदम दर कदम शब्द दर शब्द ओरिजिनल की कॉपी करते हैं. मैं वैसा नहीं कर सकता. मुझे इसे दुबारा लिखना होगा.”

“आपको जैसा करना हो कीजिये” उसने जवाब दिया.

मैंने वैसा ही किया और पूरी स्क्रिप्ट को रेकॉर्ड किया. जितेन्द्र वहाँ काम करते थे. हेमा मालिनी वहाँ काम करती थीं. और वह फिल्म थी ‘मेरी आवाज़ सुनो’. उस फिल्म के साथ मैंने दक्षिण भारत में प्रवेश किया. सेंसर बोर्ड सर फिल्म को कुछ दिक्कतें पेश आईं पर फिल्म पास हो गयी. जब कोई फिल्म बैन की जाती है उसे अच्छी पब्लिसिटी मिलती है. फिल्म सुपरहिट गयी. मुझे बेस्ट राइटर का इनाम मिला. इस तरह साउथ में मेरी एंट्री हुई.

तनाव: किरची किरची आईना

अब मैं तीन हिस्सों में बंट गया था – मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और दक्षिण भारत. दक्षिण में लोग समय के बड़े पाबन्द होते हैं. वे आपको पूरा पैसा देते हैं. सो मैं वहाँ काम कर रहा था. मैं यहाँ भी काम कर रहा था. यही मेरा जीवन था. लेकिन घर पर हमेशा एक तनाव रहता था, “तुम हमें ज़रा भी समय नहीं दे रहे.” मैं झोपड़पट्टी से आया था. मैंने अपनी बीवी और बच्चों को फ्लैट्स और बंगले और सब कुछ दिया था. लेकिन इन सब पर सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि मैं उन्हें समय नहीं दे पा रहा था. सो दो के बदले अब तीन तीन विभाजन रेखाएं थीं. मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा के बीच एक रेखा थी; मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और दक्षिण के बीच एक दूसरी रेखा थी जबकि मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और दक्षिण और घर के बीच एक तीसरी. और उस रेखा का अस्तित्व अब भी है. मैं टुकड़ों में बंट गया था. और अगर रोटी का एक टुकड़ा हिस्सों में बंट जाए तो उसे दुबारा जोड़कर एक नहीं बनाया जा सकता. ठीक जिस तरह एक आईना किर्चियों में टूट जाता है, मैं भी बिखर गया था. हालांकि इसका कोई अफ़सोस नहीं है. मैं जो भी हूँ, वो हूँ. मुझे पता है मैं अब भी मेहनत कर रहा हूँ. मेरे अपने लोग इस बात को अभी नहीं पहचानते पर एक दिन उन्हें मेरी याद आएगी. मेरे पिताजी बताया करते थे घर की खुशी, उसकी मोहब्बत और अपनेपन के बारे में ... कुछ बातें मेरे दादाजी की बाबत. उन्हें अपने परिवार से अलग होना पड़ा था. वही चीज़ें मेरे दादाजी के साथ घटीं वही पिताजी के साथ. परिवार का सम्बन्ध क्या होता है? परिवार के लिए वह एक गोंद का काम करता है. अगर वो चीज़ें नहीं हैं तो सब कुछ बिखर जाएगा.   


(जारी)

Friday, July 11, 2014

ज़ोहरा सहगल के लिए एक रीपोस्ट

कल ज़ोहरा सहगल नहीं रहीं. उन्हें श्रद्धांजलि प्रस्तुत करता हुआ मैं इस पुरानी पोस्ट को इस उम्मीद में लगा रहा हूँ कि दीपा इस किताब से कुछ और प्रेरक अंश यहाँ शीघ्र पोस्ट करेंगी.


ज़ोहरा सहगल को कौन नहीं जानता. अठानवे साल की आयु में २०१० में उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘क्लोज़ अप’ प्रकाशित की. हिन्दी के पाठकों के लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि इस पुस्तक का अनुवाद हमारी कबाड़न दीपा पाठक के किया है और ‘क़रीब से’ शीर्षक अनुवाद के रूप में इसे राजकमल प्रकाशन द्वारा छाप भी दिया गया है.

इस किताब के चंद शुरुआती हिस्से दीपा की मेहरबानी से यहाँ पेश किये जा रहे हैं.


ज़ोहरा सहगल-उर्फ मुमताज़ के खानदान का लेखाजोखा
नवाब नजीब-उद-दौला (1708-1770) के खानदानी

नजीबाबाद के आखिरी हुक्मरान नवाब जलालुद्दीन खान 1857 की बग़ावत के दौरान अंग्रेज़ों की गोली से मारे गए  थे. उनकी विधवा बेगम, दो जवान बेटे और दो कमउम्र बेटियां बैलगाड़ी में छुप कर मुरादाबाद पहुंचे, जहां बेगम के भाई फौज में कमांडर थे.

बाद में बड़ा बेटा अज़िमुद्दीन खान रामपुर के जवान नवाब के रीजेंट के साथ-साथ वहां की फौज के जनरल बन गए. कई सालों बाद उनकी पोती असकरी बेगम की शादी रामपुर नवाब के वारिस राज़ा अली खान से हुई और उन्हें राफत ज़ामानी बेगम की पदवी दी गई.

छोटा बेटा, साहेबज़ादा हमिद्दुज़ार खान को देश की कई रियासतों का रीजेंट बनाया गया. उनकी छोटी बहन जाफरी बेगम की शादी रामपुर के एक इज़्जतदार और अमीर आदमी अताउल्लाह खान से हुई. उनके सबसे छोटे बेटे मुमताज़ुल्लाह खान ने अपनी रिश्ते की बहन साहेबज़ादा हमिद्दुज़फर खान की बेटी नातिका बेगम से शादी की. उनके सात बच्चे हुए जिनमें से ज़ोहरा सहगल तीसरे नंबर की संतान थीं.

जलालुद्दीन खान की सबसे बड़ी बेटी ज़ुबैदा बेगम (?) की शादी लोहारू के नवाब से हुई, जिनकी बहुत सारी बेटियां पैदा हुई, जिनकी बाद में अलग-अलग नवाबों से शादियां हुईं जैसे मालेर कोटला, पटौदी और फखरुद्दीन अली अहमद का रंगून खानदान.
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1919 -1929
बचपन और लाहौर

जीवनः खुद के साथ अंतहीन बातचीत; होश के आलम में चुप और पागलपन में सुनाई देने वाली

कोई अपने बारे में किताब क्यों लिखता है? सबसे बड़ी वजह तो यह कि इंसान मरने के बाद जीवन से अपनी पकड़ छूटने की कल्पना से डरता है . ऐसे में आत्मकथा उसे मरने के बाद भी अपने होने के भ्रम को बनाए रखने का जरिया लगता है. मुझे लगता है कि यह एक तरह की आत्ममुग्धता है, भला किसे परवाह है तुम्हारी भावनाओं की, तुम्हारे संघर्ष की, तुम्हारे सुख या दुख की? हां, शायद तुम्हारे बच्चों के लिए उनकी कुछ अहमियत हो. हालांकि वो भी दिल से तुम्हें प्यार करने और तुम्हारी देखभाल करने के बावजूद कभी-कभी ऐसा अहसास दिलाते हैं जैसे तुम उनकी जिंदगी से जुड़ा एक फालतू हिस्सा हो और तुम्हारे हटने से उन्हें राहत मिलेगी...पता नहीं पर मुझे ऐसा लगता है!

मेरे लिए इस किताब को लिखने की खास वजह एक ऐसा काम हाथ में लेना था जिसमें मैं खुद को डुबा सकूं, साथ ही मैं अपनी जिंदगी जो कुछ हुआ उन सब बातों को पूरी तरह से भूल जाने से पहले ही लिख डालना चाहती थी. इसमें से बहुत सारी बातें बहुत पुरानी हैं, ऐसा लगता है वो सब किसी और जन्म में घटा था, इसके बावजूद कुछ यादें इतनी जीवंत हैं जैसे लगता है कल ही की बात हो.


मैं 27 अप्रैल, 1912 में संयुक्त भारतीय प्रांत, जो अब उत्तर प्रदेश कहलाता है, में सहारनपुर में पैदा हुई. मेरे पिता एक पठान सरदार, मौलवी गुलाम जिलानी खान साहेब के वंशज थे. मौलवी साहेब  की नस्लीय जड़ें अफगानिस्तान के अब्दुल राशिद नाम के एक यहूदी से जुड़ी थीं, जिन्होंने 631 ईसवीं सन् में मुस्लिम धर्म अपना लिया. 1760 में गुलाम जिलानी, जो एक विद्वान और प्रसिद्ध योद्धा थे, दिल्ली में अहमद शाह के दरबार में आए जहां उन्हें बहुत सम्मान दिया गया. बाद में वे अन्य रोहिला सेनापतियों के साथ सेना में शामिल हुए. उन्हें नवाब फैजुल्लाह खान की सेना की कमान सौंप दी गई. नवाब साहब के साथ वे कोसी नदी के किनारे बसे 'रामपुरा' नाम के एक गांव में पहुंचे. इस तरह से रामपुर शहर और राज्य के रूप में विकसित हुआ. गुलाम जिलानी और बाकी ग्यारह रिसालदारों को यहां जमीन आवंटित की गई. मेरी मां के दादा जी नवाब जलालुद्दीन खान थे, जो नवाब ज़ेब्ते खान के पोते थे. नवाब ज़ेब्ते खान नजीबाबाद के संस्थापक और नवाब नजीबुद्दौला के बेटे और उत्तराधिकारी थे. मुझे अचरज होता है यह सोच कर कि हमारे पूर्वजों के जीवन का हम पर कितना प्रभाव पड़ता है, कभी सोचती हूं कि मेरे पूर्वज के व्यक्तित्व में जुड़े विद्वता और साहसिक  गुणों का का मेरे जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है.

मेरे पिता ने युवावस्था में ही रामपुर छोड़ दिया. मेरी पैदाइश के दौरान वह ब्रिटिश प्रोविंसियल सर्विस में कनिष्ठ अधिकारी थे. (एक बहुत हास्यास्पद सी बात यह थी कि बाद के वर्षों में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें नौकरी में अच्छे प्रदर्शन के लिए खान साहेब का दर्ज़ा दिया, जबकि नवाबी खानदान से जुड़े होने के चलते यह तमगा तो जन्म के साथ ही उनके नाम से जुड़ा था.)

मैं अपने परिवार में तीसरे नंबर की संतान थी, अब क्योंकि भारतीय किसी भी और देश के मुकाबले सबसे ज्यादा रंगभेदी होते हैं,  मैं घरवालों की काफी चहेती थी सिर्फ इस वजह से कि मेरा रंग मेरे बड़े भाई और बहन के मुकाबले थोड़ा गोरा था. हालांकि मुझे लगता है कि मुझसे छोटे दो भाई-बहन के आने के साथ ही मेरी कद्र कम हो गई क्योंकि दोनों का रंग एंग्लो-इंडियन की तरह गोरा था. मेरी छोटी बहन की तो बचपन में घुंघराली सुनहरी लटें भी थी, जैसे अक्सर पठानों में होती हैं.

मेरी सबसे पुरानी याद अपने ऊपर छाए नीले आसमान की है, हांफने की आवाज के साथ-साथ बहुत धीमी गति के साथ आसमान के इस टुकड़े का फ्रेम बदलता जा रहा था. साथ में थी पसीने की गंध और मेरी पीठ किसी कठोर सतह पर टिकी थी. मैंने अपने पिता से जब यह बात की तो उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि शायद यह 1914  में नैनीताल जाते समय की बात होगी, जब मुझे एक कुली कंधे पर बंधी बेंत की टोकरी में ले गया. उन दिनों बसें नहीं चला करती थी. आपको पहले तांगे या घोड़ा गाड़ी पर चढ़ाई करनी पड़ती थी, यात्रा का अंतिम हिस्सा घोड़े की पीठ पर करना होता था. बच्चे बेंत की टोकरियों पर बैठा कर ले जाए जाते थे.


(जारी)

इस उल्लू के पठ्ठे को सब्जेक्ट समझ में आया है और ये उल्लू का पठ्ठा लिख के भी लाया है - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 6

(जारी)

कॉनी हाम – तो वह कौन सा लम्हा था जब आप अध्यापन और लेखन अभिनय से अचानक सिनेमा में पहुंच गए?

कादर ख़ान – फिल्म इंडस्ट्री के लोग नियमित रूप से थियेटर देखने आया करते थे. तो उन्होंने मेरा नाम सुना. उन्होंने मुझे थियेटर के स्टेज पर देखा. उन्होंने मेरी एक्टिंग देखी, मेरा लेखन देखा और मेरा निर्देशन भी. उन्होंने कहना शुरू किया “यह बेवकूफ फिल्म इंडस्ट्री में क्यों नहीं आ रहा? इसमें प्रतिभा है. इसे फिल्म इंडस्ट्री में होना ही चाहिए.” जब मुझे ‘लोकल ट्रेन’ के लिए एक अवार्ड मिला तो अगले दिन एक निर्माता, कुछ निर्देशक और लेखक मेरे पास आकर बोले “आप फ़िल्में ज्वाइन क्यों नहीं करते?” मेरे लिए यह एक लतीफे जैसा था. “आप ने एक लेखक होना चाहिए, आपने एक अभिनेता होना चाहिए. आप कुछ भी कर सकते हैं क्योंकि आपको सब कुछ आता है.” मैंने फिल्मों में जाने के बारे में कभी नहीं सोचा था क्योंकि उन दिनों फिल्मों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था. एक निर्माता रमेश बहल ने कहा कि वो एक फिल्म बनाने जा रहे हैं ‘जवानी दीवानी’ (१९७२).

“मैं चाहता हूँ आप इसके डायलॉग्स लिखें.”

मैंने जवाब दिया “मुझे नहीं आता डायलॉग लिखना.”

उन्होंने कहा “आप जो कुछ अपने नाटकों के लिए लिखते हैं, उसी को फिल्मों में डायलॉग्स कहा जाता है.”
सो मैं वहाँ गया और उन्होंने मुझे एक मौका दिया. उन्होंने कहा कि वे अगले हफ्ते से शूटिंग शुरू करना चाहते हैं. मेरे पास रहने की जगह नहीं थी. सो मैं क्रॉस मैदान चला गया जहां लोग फुटबॉल खेलते हैं. मैं एक कोने में बैठा रहा और फुटबॉल मुझे लगती रही. चार घंटे में मैंने स्क्रिप्ट लिख ली.

कॉनी हाम: उर्दू में?

कादर ख़ान: उर्दू में. मैं गया वापस. तो मुझे देखकर वे बौरा से गए. “ये उल्लू के पठ्ठे को वो सीन समझ में नहीं आया.”  

मैं उनके होंठ पढ़ सकता था. वे मेरे बारे में बुरी बातें कह रहे थे. और मैं बोला “इस उल्लू के पठ्ठे को सब्जेक्ट समझ में आया है, ये उल्लू का पठ्ठा लिख के लाया है.”

“क्या! इतनी जल्दी! आज ही!”

“मेरी लाइफ ऐसी ही है. जो डिसाइड करता हूँ, उसी दिन कर देता हूँ. आज ही फैसला हो जाए. अगर आपने मुझे लेना है तो ठीक वरना मुझे जाने दीजिये क्योंकि मेरे स्टूडेंट्स मेरा इंतज़ार कर रहे हैं.”

तब मैंने अपना सब्जेक्ट उन्हें पढ़कर सुनाया और सीन भी. वे उछल पड़े. बोले “फिर से!” मैंने तीन या चार बार सुनाया. उन्होंने उसे रेकॉर्ड किया. और तीन दिन के अन्दर शूटिंग शुरू हो गयी. इस तरह मेरी स्क्रिप्ट ने फिल्म की सूरत ली. शेड्यूल के हिसाब से फिल्म दस दिन में शुरू होनी थी पर स्क्रिप्ट फाइनल होने के कारण वह तीन दिन में शुरू हो गयी. शूटिंग के इन दिनों में मुझे अतिरिक्त पब्लिसिटी मिली. इंडस्ट्री में अफवाह गर्म थी कि एक नया राइटर आया है जो बहुत आमफहम ज़बान लिखता है. और जिस तरह से वह सीन को नरेट करता है, अभिनेता के लिए परफॉर्म करना मुश्किल पड़ता है. पहली फिल्म के लिए मुझे 1500 रूपये मिले, जो उस ज़माने के हिसाब से बड़ी रकम थी क्योंकि मैंने उसके पहले पांच सौ का नोट भी नहीं देखा था. सात हफ्ते के बाद मैं अपनी संस्था में वापस जाने को तैयार था जब किसी ने आकर मुझसे कहा “मैं एक प्रोड्यूसर हूँ और एक फिल्म बनाने के बारे में सोच रहा हूँ. मेरी फिल्म का नाम है ‘खेल खेल में’. ये रहा स्क्रीनप्ले और मैं चाहता हूँ आप इसके डायलॉग्स लिखें.” उसने मुझे एक खासा मोटा लिफाफा थमाया. उसमें दस हज़ार से ज़्यादा रुपये थे. मैंने स्क्रिप्ट पूरी की. तब मुझे एक ऑफर और मिला.
      
मनमोहन देसाई का खेतवाड़ी वाला घर: कादर खान की पाठशाला

चार या छः महीने बाद मुझे मनमोहन देसाई ने बुलवाया. वे ‘रोटी’ फिल्म बना रहे थे. वे उर्दू लेखकों से बुरी तरह चट चुके थे. उन्होंने कहा “मुझे इस ज़बान से नफरत है. ये राइटर तमाम मुहावरे, लोकोक्तियों और उपमाओं का इस्तेमाल करना जानते हैं बस. मुझे अपनी रोज़मर्रा की ज़बान चाहिए. कोई लिख नहीं सकता.”

तो प्रोड्यूसर ने कहा “कादर खान को ट्राई क्यों नहीं करते?”

“एक और मुसलमान. मैं ऊब चुका हूँ उनसे. और तुम एक और नया लेकर आ रहे हो.” वे मुझसे मिले और बोले “देखो मियाँ, मैं बहुत स्ट्रेट बोलता हूँ. तुम्हारी स्टोरी पसंद आयेगी तुम्हारा डायलाग अच्छा लगेगा तो ठीक है वरना धक्के मार कर बाहर निकाल दूंगा.” पिछले छः या आठ महीनों में किसी ने मुझसे ऐसे बात की थी. “अगर अच्छा लगा तो मैं तेरे को लेके गणपति की तरह नाचूँगा.”

उन्होंने मुझे पूरा क्लाइमैक्स नरेट किया. वे खेतवाड़ी में रहते थे. वह मेरी पाठशाला था. दो या तीन दिन बाद मैं वहाँ गया तो वे गली के छोकरों के साथ क्रिकेट खेल रहे थे. उन्होंने मुझे देखा और बोले “क्या है?”

“सब्जेक्ट और सीन सुनाने आया हूँ.”  

“सुनाने मतलब? लिख के लाया?” उन्होंने क्रिकेट खेलना छोड़ा और मुझसे बोले “चल झटपट.”

वे मुझे अन्दर ले गए. पहली बार. इतना बड़ा इंसान. पहले यूं होता था कि सारा क्रू और डायरेक्टर वगैरह से मेरी अच्छी ट्यूनिंग रहती थी. किसी बड़े प्रोड्यूसर के सामने सीन सुनाने का यह मेरा पहला मौका था. जो भी हो, मेरे भीतर के अभिनेता ने मेरी बहुत मदद की. सो इसी वजह से अभिनेता, लेखक और अध्यापक इन तीनों के बीच हमेशा ट्यूनिंग बनी रहती थी. अभिनेता ने मेरी बहुत मदद की. तब राइटर ने अभिनेता की मदद करना शुरू किया. मैंने सीन सुनाया तो वे उछल पड़े. “दुबारा! फिर से सुनाओ!” उन्होंने चिल्लाना शुरू किया “जीवन!” जीवन उनकी पत्नी का नाम था. “इधर आ!”

“कायको बुलाया है?” उन्होंने पूछा.

“सुनो ये क्या लिख के लाया है.”

मैंने फिर दोहराया. उन्होंने रोना शुरू कर दिया. “ये आदमी ऐसे सीन के लिए छः महीने से मर रहा है. तुमने उस से कहीं ज़्यादा कर दिखाया है.

वे बोले “फिर से!” मैंने पूरा एपीसोड करीब दस बार सुनाया. मुझे पता नहीं थे कि उन्होंने टेप पर सब कुछ रेकॉर्ड कर लिया था. फिर वे अन्दर के कमरे में गए. वे एक छोटा पैनासोनिक टीवी लेकर आये. बोले “ये मेरी ओर से तोहफा है.” फिर उन्होंने मुझे सोने का एक कड़ा और पच्चीस हज़ार रुपये दिए. “मेरी तरफ से एक यादगार.” इतने बड़े आदमी थे वो. अगर उन्हें कोई अच्छा लगता था तो उसे दिल से प्यार करते थे. वे कंजूस आदमी नहीं थे. बड़े दिलेर इंसान थे. उन्होंने तमाम लेखकों और निर्देशकों को फोन लगाया और बोले “अब तुम सब चेत जाओ. एक आदमी आ गया है जो तुम्हारी इंडस्ट्री पर राज करने जा रहा है.” वे थोडा सनकी भी थे. उन्होंने लेखकों से कहा “अपनी कलमें फेंक दो. तुम्हें लिखना नहीं आता.” मुझसे बोले “लिखने के लिए तुम्हें कितना मिलता है?”

मैंने कहा “पच्चीस हज़ार.”


वे बोले “अब तुम्हारा रेट एक लाख होगा.” इस तरह मैं एक लाख पाने वाला लेखक बना. मुझे जैसे पहली मंजिल से सौवीं मंजिल पर पहुंचा दिया गया. सौवें माले से मैंने उड़ान भरी. वहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था. मेरे बगैर वे कोई फिल्म बना ही नहीं पाते थे. मुझे स्क्रीनप्ले पर बहसों, कहानी और गीतों तक हर चीज़ में वे अपने साथ बिठाते थे.

(जारी)

Thursday, May 8, 2014

मूलतः मेरे पिता ने मुझे एक शिक्षक बनाया था - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 5


अध्यापन से सिनेमा और वापस

कॉनी हाम – और आपका सिनेमा का काम?

कादर ख़ान – मैंने कोई अट्ठाईस सालों तक फिल्मों के लिए लिखा. फिर मैं उकता गया. मूलतः मेरे पिता ने मुझे एक शिक्षक बनाया था. मुझे पढ़ाने में ही सबसे ज़्यादा आनन्द आता था. मैं ग्लैमर के संसार में गया. मैंने अच्छा नाम और पैसा बनाया. लेकिन मेरे दिल को आराम न था. मुझे महसूस होता था कि मेरे छात्र कहीं मेरा इंतज़ार कर रहे हैं. और इसी लिए जब एक दिन मैंने पाया कि नई पीढ़ी बॉलीवुड में आकर कब्जा कर रही है - मतलब नए नए लड़के, और वो लड़के जो मेरे निर्देशक के असिस्टेंट के नीचे काम किया करते थे, वो भी थर्ड या फोर्थ या फिफ्थ असिस्टेंट. वे हीरो बन रहे थे, डायरेक्टर बन रहे थे. तो एक तरह का जेनेरेशन गैप आ रहा था. विचारों और भावनाओं में एक गैप आ रहा था. मैंने एकाध के साथ काम किया पर उसे चालू नहीं रख पाया. सो धीरे धीरे मैंने काम करना कम कर दिया. इस तरह मैं फिल्म इंडस्ट्री से बाहर आया. मेरे समय के ७० से ८०% निर्देशक और एक्टर अब जा चुके हैं. और उनसे बात करना दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा है. उनके थॉट्स वो सारे इम्पोर्टेड हैं. मैं इस ज़मीन का आदमी हूँ. मैं कमाठीपुरा का रहनेवाला हूँ. जब तक मुझे वो माहौल, वो कमाठीपुरा का माहौल नहीं मिलता, न अमिन एक्टिंग कर सकता हूँ न लिखना. और ये नई जेनेरेशन – इसे कम्प्यूटर साइंस और बिजनेस मैनेजमेंट के बारे में सब पता है. हमारे समय में ये विषय होते ही नहीं थे. मैनेजमेंट बहुत दुरुस्त है. तकनीक बहुत आगे की है. लेकिन साहित्य को उन्होंने खो दिया है. अब कोई लेखक हैं ही नहीं. वो लोग लिखते ही नहीं. क्योंकि लिखने से पहले आपको ज़िन्दगी के कई उबलते हुए सबक सीखने पड़ते हैं, उनसे गुजरना होता है.

कॉनी हाम – तो आप सोचते हैं कि नई पीढ़ी ने उतना सब सहा ही नहीं कि वे अच्छा लिख सकें?

कादर ख़ान – देखिये, यातना की सघनता – वे लोग यातना को कुछ और नाम से पुकारते हैं. अगर एक लड़के को एक लडकी से मोहब्बत हो जाती है और वह घंटों तक उसका इंतज़ार कर रहा है, उसे वो लोग यातना मतलब सफ़रिंग कहते हैं. नहीं साहब, वह सफ़रिंग नहीं है. वह कुछ और होती है. और वह ऐसी चीज़ होती है जो आपके अचेतन में चली जानी चाहिए, उसे वहीं लिखा जाना चाहिए, वहीं रेकॉर्ड किया जाना चाहिए. जीवन के किसी भी समय आप अपने को रोने के मूड में पा सकते हैं. आप क्यों चाहते हैं रोना? क्योंकि सारी बुरी चीज़ें भाप में बदल जाती हैं और आप उन्हें भूल जाते हैं, लेकिन वहाँ अचेतन में एक कैमरा होता है जो सब कुछ दर्ज करता चलता है. और एक दिन एक प्रोजेक्शन रूम भी होता है, और कैमरा प्रोजेक्टर बन जाता है और उस एपीसोड को प्रोजेक्ट करने लगता है जिसे आँखों ने देखा होता है. और वह कोई नाटकीय या संवेदनशील दृश्य होता है जो आपको रुला देता है. तो असल में यह यूं घटता है. इस तरह एक इंसान बस एक इंसान नहीं होता, वह कई हिस्सों में बंटा होता है. और शरीर का सबसे अहम् डिपार्टमेंट होता है अचेतन यानी सबकॉन्शस. हम उसे दिल या दिमाग कहते हैं पर वह सबकॉन्शस की परम शक्ति होती है असल में,

(जारी)

हम भीग रहे थे और हमारे बीच की हवा गर्म थी


हम बारिश में भीग कर आए.


- फ़रीद ख़ाँ

छाता लेकर निकलना तो इक बहाना था,
असल में हमको इस बारिश में भीगना था.

हम लम्बे मार्ग पर चल रहे थे,
ताकि देर तक भीग सकें साथ साथ....
और ऐसा ही इक मार्ग चुना,
जिस पर और किसी के आने जाने की संभावना क्षीण हो.

लम्बी दूरी के बाद हमें दिखा
एक पेड़ के नीचे,
एक चूल्हा और एक केतली लिए, एक चाय वाला.
एक गर्म चाय हमने पी. 
हम भीग रहे थे और हमारे बीच की हवा गर्म थी.  
हमारे अन्दर भाप उठ रही थी.

हमने पहली बार एक दूसरे को इतना एकाग्र हो,
इस क़दर साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ देखा था बिल्कुल भीतर.    

उस क्षण आँखों के सिवा और कुछ नहीं रहा शेष इस सृष्टि में.

बाक़ी सब कुछ घुल रहा था पानी में.   

Wednesday, May 7, 2014

अल्लाह से मिलने वाली मोहब्बत सबसे टॉप लेवल की मोहब्बत है - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 4

(पिछली क़िस्त से आगे)


बुरा वक़्त

कादर ख़ान – मैं करीब २४ का था. तब मैं अपनी माँ से मिलने दोपहरों को जाया करता था. वे मुझसे वापस आ जाने को कहती थीं. मैं मना कर दिया. मैं तुम्हारे प्यार के लिए आता हूँ. मेरे भीतर एक आत्मसम्मान है जो मुझे यहाँ आने से रोकता है. मैंने उस से कहा कि मैं वहाँ इस लिए नहीं आना चाहता कि मैं नहीं चाहता वो आदमी मुझे बेइज़्ज़त करे. जब वह मुझे बेइज़्ज़त करता है तो मुझे लगता है वह तुम्हें बेइज़्ज़त कर रहा है. कई सालों तक ऐसे ही रहा. फिर मेरी शादी का दिन आया. यह आदमी काम भी किया करता था और एक बेहतरीन बढ़ई था. अगर वह चाहता होता तो बहुत पैसा बना सकता था. लेकिन उसकी संगत खराब थी. उसके दोस्त उसे शराबखानों में ले जाते थे. वह दारू पीता था. शराब पीता था, आता था, हंगामा करता था, माँ को मारता था, सब गालियाँ देता था. और जब मैं छोटा था वह मुझसे कहता था “जा अपने बाप से पैसे मांग के ला.” तो कभी कभी मैं अपने पिताजी के पास जा कर खड़ा हो जाया करता.

“क्या है?”

“दो रुपये चाहिए.”

“मैं कहाँ से लाऊँ? मैं मुश्किल से छः रुपये कमाता हूँ.”

खैर. वे मुझे दो रूपये दे देते. उन पैसों से में थोडा आटा, दल, घी या तेल ले जाया करता. तब जाकर माँ डाल रोटी बनाती और हम खाना खाते.  हफ्ते में दो दिन में तीन दिन में एक बार भूखा रहना पड़ता था, फाका करते थे न – ये ज़िन्दगी में सब कुछ देख लिया है!  इन सारी चीज़ों में मुझे विद्रोही बना दिया. और मैंने कहीं से साहित्य वगैरह पढ़े बिना लिखना शुरू कर दिया.


और मुझे एक अच्छे अध्यापक के तौर पर ईनाम दिया गया क्योंकि मैं जो कुछ करता उसे प्यार से करता था. मुझे माँ बाप के अलावा किसी का प्यार नहीं मिला. तो प्यार का वो इलाका ख़ाली था. मैं ऐसे स्कूल कॉलेज में पढ़ा जहां लडकियाँ नहीं होती थीं. सो किसी तरह का कोई अनुराग नहीं, कोई मोहब्बत नहीं. हर किसी को माँ-बाप का प्यार चाहिए होता है. सच बात है. लेकिन उसके भीतर भी एक कोई शैतान होता है. आपको अल्लाह से भी मोहब्बत  मिलती है. वह सबसे टॉप लेवल की मोहब्बत है. लेकिन इंसान टॉप लेवल नहीं होता. वह पहाड़ की चोटी पर नहीं घाटी में रहता है. सो एक इंसान को प्यार चाहिए होता है. लेकिन प्यार होता कहीं नहीं, सो उस सारे प्यार को मैंने विद्रोह की तरफ मोड़ दिया. मैं लिखा करता था. मैं तीखी पंक्तियाँ लिखा करता था. तीखे नाटक.

(जारी)

गंगा में अर्घ्य देते हाथों के बीच से दिखता लाल सा सूरज


छठ की याद में

-फ़रीद ख़ाँ

पटना की स्मृति के साथ मेरे मन में अंकित है,
गंगा में अर्घ्य देते हाथों के बीच से दिखता लाल सा सूरज.

पूरे शहर की सफ़ाई हुई होगी.
उस्मान ने रंगा होगा त्रिपोलिया का मेहराब.
बने होंगे पथरी घाट के तोरण द्वार.   

परसों सबने खाए होंगे गन्ने के रस से बनी खीर,
और गुलाबी गगरा निंबू.   
व्रती ने लिया होगा हाथ में पान और कसैली.

अम्मी बता रही थीं,
चाची से अब सहा नहीं जाता उपवास,
इसलिए मंजु दीदी ने उठाया है उनका व्रत.
धान की फ़सल अच्छी आई है इस बार. 
रुख़सार की शादी भी अब हो जायेगी.
उसकी अम्मी ने भी अपना एक सूप दिया था मंजु दीदी को.
सबकी कामनाएँ पूरी होंगी.
  
पानी पटा होगा सड़कों पर शाम के अर्घ्य के पहले.
धूल चुपचाप कोना थाम कर बैठ गई होगी.
व्रती जब साष्टांग करते हुए बढ़ते हैं घाट पर,
तो वहाँ धूल कण नहीं होना चाहिए, न ही आना चाहिए मन में कोई पाप.
वरना बहुत पाप चढ़ता है.

इस समय बढ़ने लगती है ठंड पटना में.  

मुझे याद है एक व्रती.
सुबह अर्घ्य देकर वह निकला पानी से,
अपने में पूरा जल जीवन समेटे
और चेहरे पर सूर्य का तेज लिये.
गंगा से निकला वह
दीये की लौ की तरह सीधा और संयत.

सुबह के अर्घ्य में ज़्यादा मज़ा आता था,
क्यों कि ठेकुआ खाने को तब ही मिलता था.

पूरा शहर अब थक कर सो रहा होगा,
एक महान कार्य के बोध के साथ.

Tuesday, May 6, 2014

फिर इन सब में लगा पलीता


पढ़िए गीता

-रघुवीर सहाय


पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घर-बार बसाइए

होंय कँटीली
आँखें गीली
लकड़ी सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए

मैं दुआ करता हूँ काश हर बेटे को ऐसी माँ मिले - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 3

(पिछली क़िस्त से आगे)


कॉनी हाम – पढ़ाई के लिए ऐसी इच्छा उनके भीतर कहाँ से आई?

कादर ख़ान – मुझे नहीं मालूम. मेरे लिए वो एक फ़रिश्ता थीं. मैं दुआ करता हूँ काश हर बेटे को ऐसी माँ मिले. उसने मुझे ज़िन्दगी में सब कुछ दिया. मेरे कहने का मतलब दुनियावी चीज़ों से नहीं है, यानी मैं जो कुछ भी हूँ, जो कुछ भी बन सका हूँ, वह मेरी माँ और मेरे पिता के कारण संभव हुआ. मेरे वालिद बहुत कमज़ोर आदमी थे. बेहद ग़रीब. वे बहुत पढ़े-लिखे थे. उन्हें दस तरह की फ़ारसी और आठ तरह की अरबी का ज्ञान था.

कॉनी हाम – उन्होंने यह सब कहाँ सीखा?

कादर ख़ान – काबुल में. उन्होंने वहाँ कोई स्कूल ज्वाइन किया था. उनकी हस्तलिपि शानदार थी. लेकिन पढ़े-लिखे लोग पैसे नहीं कमा पाते. जब वे बम्बई आये तो एक मस्जिद में मौलवी बन गए. वहाँ वो दूसरों को अरबी सिखाया करते थे – अरबी व्याकरण, फ़ारसी, उर्दू. लिकं उन्हें बदले में कुछ नहीं मिलता था – बस चार या पांच या छः रूपये एक महीने के.

मेरे सौतेले पिता

गरीबी की वजह से मेरे माँ-बाप का साथ चल नहीं सका. मेरे वालिद घर की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते थे. घर में हमेशा एक तनाव बना रहता था. तो वो दोनों अलग हो गए. मैं कोई चार साल का था जब मेरे माँ-बाप का तलाक हुआ. तब मेरे नाना मेरे मामा के साथ आये और उन्होंने कहा “एक जवान औरत ऐसी गंदी जगह में बिना पति के नहीं रह सकती. तुम्हे शादी करनी होगी.” और उन्होंने मेरी माँ की फिर से शादी करा दी. सो आठ साल की आयु से मैंने जीवन को एक माँ और दो पिताओं के साथ गुज़ारना शुरू किया – एक मेरे असली पिता एक सौतेले. मेरे माता-पिता अलग हो चुके थे पर दोनों के मन में एक दूसरे के लिए सहानुभूति थी. हर कोई जानता था कि उनका अलगाव गरीबी के कारण हुआ है. माहौल ने उन्हें अलग होने पर विवश किया था. वर्ना उनके अलग हो जाने का कोई करण न था. मेरे मन में अपनी माँ के लिए बेतरह मोहब्बत थी पर अपने सौतेले पिता के लिए उतनी ही बेपनाह नफ़रत. वह किसी ड्रामा या स्क्रीनप्ले के सौतेले बाप जैसे थे – कठोर दिल वाले. एक दफ़ा मेरा नाटक ‘लोकल ट्रेन’ राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में पहुंचा. हमने बेस्ट प्ले, बेस्ट राइटर और बेस्ट एक्टर के अवार्ड्स जीते. मैं इनिनामों को माँ को दिखाने की नीयत से घर लाया. मेरे सौतेले पिता उस दिन मुझसे बात करने के मूड में नहीं थे. उन्होंने ट्राफी को देखना था और वे आगबबूला होकर मुझे पीटने लगे – उन्होंने पीट पीट कर मुझे नीला बना दिया और लतियाते हुए घर से बाहर निकाल दिया. मैं अपने संस्थान गया और प्रिंसिपल के दरवाज़े पर बैठकर उनसे बातचीत की. वे बोले, “अगर तू चाहो तो स्टाफ क्वार्टर्स में रह सकते हो..” उन्होंने मुझे बांस की बनी एक खटिया, बिस्तर, कम्बल और तकिया दिया. “मैं यही तुम्हारी मदद कर सकता हूँ” वे बोले. मैंने वहाँ रहना शुरू कर दिया.

कॉनी हाम – तब आप कितने साल के थे?