Monday, December 29, 2014

भारत के चित्रकार - चिन्मय पांडा

४ नवम्बर १९८९ को जन्मे चिन्मय पांडा ने कला की विधिवत शिक्षा नहीं ली है. २०११ में उन्होंने भुवनेश्वर से बी टेक की डिग्री हासिल की.









प्रेम के बीच कुछ होता है हमेशा


मध्यान्तर

-अजंता देव

सफ़ेद होते बालों पर हाथ फिराते
अभी नहीं बाद में
जगर-मगर दुकानों के सामने से
निकल गए सीधे
जैसे यहीं से शुरू होता है हिमालय
इसी जगह से शुरू होनी है तपस्या

मैं पीछे आ रही थी दान की बछिया
जिसके दांत नहीं गिने गए पंद्रह बरस पहले

पंद्रह बरस पहले की यह कहानी
पंद्रह बरस पहले बड़ी सुहानी थी
लगा नहीं कंधे के झोले से 
इतनी नफ़रत निकलेगी
इतनी खीज निकलेगी 
इतनी बीमारी इतना क्रोध निकलेगा पन्द्रह बरस बाद

लेकिन निकले
हमारी सदिच्छाओं के बावजूद
उसकी घृणा मेरे कटुवचन निकले
उसके कुछ साल बेरोजगारी
मेरे कुछ संघर्ष में
उसके कुछ झूठ छिपाने में
मेरे झूठ झेलने में निकले

दरअस्ल माफ़ करें
बात कुछ गड़बड़-सी है
यही कि
प्रेम के बीच कुछ होता है हमेशा
पुराने ज़माने में बेदर्द ज़माना था
अब जो है उसे पकड़ना मुश्किल है
लेकिन कुछ है ज़रूर
जो पंद्रह बरस में 
ख़त्म कर देता है 
खून की लाली
मज़ाक में गाली
ख़त्म कर देता है ख़ुश होने का माद्दा
एक अच्छी-ख़ासी लम्बी कहानी 
ख़त्म कर देता है पंद्रह बरस में

कसी हुई पटकथा की तरह
यह खलनायक अभी भी पहचाना नहीं गया है
शायद कहानी के अंत में
वह मेरे क़दमों में होगा
दया की भीख मांगता
फिलहाल बालों पर हाथ फिराते
नायक के दृश्य पर ही होगा
मध्यान्तर

Sunday, December 28, 2014

नाइजीरिया के कलाकार – 2 – चिडी ओकोये









भारत के चित्रकार - एम. वी. रेंजू के वाटरकलर्स - 3













भारत के चित्रकार - एम. वी. रेंजू के वाटरकलर्स - 2













भारत के चित्रकार - एम. वी. रेंजू डिजिटल प्रिंट - 1








जैसे कोढ़!

रोनाल्ड स्लैबर्स का बनाया व्हाइट हाउस का कार्टून 

व्हाइट हाउस

-अजंता देव

दूर से
चमकता है सफ़ेद घर
जैसे पृथ्वी की त्वचा पर

कोढ़!

Saturday, December 27, 2014

वे वरिष्ठ हैं जैसे मुर्गी अंडे से

पीटर ब्रूगेल की कृति ‘द पिलर बाईटर’

वरिष्ठ

-अजंता देव

वे वरिष्ठ हैं
जैसे मुर्गी अंडे से
पानी मछली से और
बन्दर मनुष्य से

उनके हाथों में है वरिष्ठता सूची
जिसमें दर्ज हैं तारीख़ें
और कुछ ब्यौरे
जैसे अपरान्ह पूर्वान्ह आदि

उन्होंने हर काम मुझसे पहले किया है
मैंने बहुत बाद में दिखाया है घटियापन
बाद में की हैं मूर्खताएं
बहुत बाद में बोला है झूठ
हथियार डाले हैं बहुत बाद में मैंने

वे पृथ्वी पर आये हैं मुझसे पहले
और जाएंगे भी शायद
जब झर जाते हैं पुराने पत्ते
तब कहीं निकलती हैं कोंपलें
जो और सुन्दर बनाती हैं दृश्य

अगले बसंत का.