Wednesday, March 25, 2015

एक क़स्बे की कथाएँ - 3

फेसबुक पर दो दिन पहले मैंने अपने शहर हल्द्वानी के कुछ किस्से लगाना शुरू किया है. अभी इनका क्या बनेगा, ऐसी कोई ठोस सूरत इस विचार ने नहीं ली है. फिलहाल उन्हें यहाँ भी शेयर कर रहा हूँ –



त्रिपाठीजी मेरे पड़ोसी हुआ करते थे कोई दो साल पहले तक. भारत सरकार के अधिकारी. सामान्य सरकारी अधिकारी की तरह उनकी कोई विशेष पहचान न थी. विशेष पहचान बनाने के लिए सरकारी अधिकारी को या तो परम भ्रष्ट होना होता है या मूर्ख समझे जाने की हद तक ईमानदार.

खैर.

दस साल के उनके छोटे बेटे गौतम उर्फ़ पिंटू से मेरा गहरा याराना था - बावजूद इस तथ्य के कि हमारी उम्रों में कोई पैंतीस साल का फर्क था. पिंटू का एक बड़ा भाई भी था अनिमेष.

अनिमेष का घर का कोई नाम नहीं था. नवीं का छात्र था और एक दफा मोटरसाइकिल की जिद पूरी न होने पर तीन दिन तक घर में बिना खाए-पिए विरोध प्रदर्शन कर चुका था. इस विरोध प्रदर्शन का अंत उसके पापा द्वारा ज़मीन पर अपनी नाक रगड़ कर मोटरसाइकिल दिलाये जाने पर तब हुआ था जब लखनऊ से आई उनकी मौसियों ने उसे सोता देख अधमरा समझ लिया और बदहवास चीखना शुरू कर दिया था. 

मिसेज़ त्रिपाठी उस वक़्त कबाड़ी से रद्दी के भाव को लेकर आधे घंटे से झिकझिक में संलिप्त थीं. जीवन के मूलभूत अधिकारों जैसे रोटी के स्थान पर केवल पिज़्ज़ा और सब्जी के स्थान पर केवल गुलाटी या शमा के यहाँ का मुर्गा, मोबाइल फोन के केवल सबसे महंगे मॉडल की उपलब्धता, जब तक चाहें टीवी पर एकाधिकार, केवल प्यूमा की चप्पल, केवल नेस्ले का दही, केवल लीवाइस की जीन्स, केवल एप्पल के कम्प्यूटर और अन्य सभी केवलों के प्रति उसके घनघोर आग्रह और कबहूँ न छाड़ें खेत जैसी कर्मठता ने अनिमेष को मोहल्ले भर में पर्याप्त ख्याति दिला रखी थी. अनिमेष में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी, बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि इसकी उलट बात सच थी यानी मैं उसके किसी काम का न था.

त्रिपाठीजी बिचारे टाइप के भले आदमी थे, इसलिए उन्होंने समाज में अपना नाम बचाये रखने की नीयत से एकाध एडल्ट किस्म की शिकायतों के बाद घर पर इंटरनेट का कनेक्शन कटा दिया था और बड़े बेटे के तीन ट्यूशन दो कोचिंग लगा दिए. आलम यह था कि अनिमेष सुबह चार बजे पहली कोचिंग के बाद एक या दो ट्यूशन पढ़ कर स्कूल जाता फिर लौटकर आता तो घर पर दो ट्यूटर एक-एक कर आते. वह फिर कोचिंग जाता. दस बजे रात डिनर करता था अनिमेष. यदि उसे भूख लगी होती, तो.

यानी वह आधुनिक समाज का टीनेजर महामानव था कि इतना सारा कोचिंग-स्कूल-ट्यूशन करने के बावजूद उसके पास टीवी, फोन, पिज़्ज़ा, चिकन, प्यूमा, एप्पल और केवल अफवाहों में विद्यमान एक गर्लफ्रेंड वगैरह सबके लिए समय की इफरात रहती. मुझे लगता है उसका दिन अडतालीस या सौ घंटे का रहा होता होगा. मिसेज़ त्रिपाठी पड़ोस में कहीं कहती पाई जातीं - “अनिमेष ना अपने पापा के लिए एक नया रेजर मंगाने को कहा रहा था कम्प्यूटर से. कितना तो टाइम लगाते हैं ये अपनी दाढ़ी सैट करने में. अनिमेष कह रहा था इस नए रेजर से टाइम बिलकुल नहीं लगता. मैंने इनका एटीम छुपा के दे दिया है उसको. आजकल बच्चे हमसे बहुत आगे का सोचने वाले हुए. अनिमेष कह रहा था ...”

अनिमेष एक काम और करता था. उसे बात-बेबात पिंटू गुरु को धुनने का शौक था. पिंटू के सुतने की आवाजें अक्सर मोहल्लावासियों के कानों में पड़ा करतीं. यही मेरे और पिंटू के पास आने की वजह बना. उसका पिटते हुए क्रंदन करना मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. त्रिपाठीजी से मैंने एक दफा कहा कि पिंटू को मेरे पास भेज दिया करें. कुछ ग्रामर वगैरह पढ़ा दिया करूंगा. तो पिंटू एक दफा आया तो बस आता ही गया. शुरू में मुझे लगा पिंटू मेरे अनलिमिटेड इंटरनेट प्लान के लालच में मुझसे दोस्ती बढ़ा रहा था. ग्रामर वैसे भी बहाना भर थी. मुझे कोई ऐतराज़ भी न था. उसे स्कूल के प्रोजेक्ट्स बनाने होते थे, घर के इंटरनेटरहित कम्प्यूटर पर अग्रज का एकछत्र रहता था और मेरे कमरे की चीज़ें उसे लुभाती भी थीं.

पिंटू का दिमाग दुनिया भर की चीज़ों में मुब्तिला रहता और वह किसी भी तरह के सवाल पूछने से गुरेज़ न करता. ऐसे बच्चे मुझे अच्छे लगते हैं और उनसे मेरी खूब पट जाती है. एक दिन उसने मुझे बताया कि अनिमेष भैया सुबह कोचिंग जाते समय मम्मी से पचास रूपये मांग के ले जाता है हर रोज़. मोमो खाने के लिए.

सुबह चार बजे कोचिंग में जाने वाला बच्चा पचास रुपये के मोमो खा जाता है, यह मेरे लिए उतनी हैरानी की बात नहीं थी जितनी यह कि इतनी जल्दी मोमो मिलते कहाँ हैं. थोड़ी बहुत रिसर्च से पता चल गया कि हल्द्वानी में सुबह साढ़े तीन बजे से नालियों के ऊपर लगनेवाले कुछ अड्डों में ताज़े मोमो मिलने शुरू होते हैं जिनके ठेले सुबह छः सात बजे तक पहली पारी निबटा देते हैं. विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि तकरीबन कच्चे मैदे और सड़ी-गली सब्जियों और सस्ते मांस के कीमे से बनने वाले इस तिब्बती व्यंजन के हल्द्वानी-संस्करण को लेकर हल्द्वानी के टीनएजर-समुदाय में पोर्नोग्राफी और थिनर-चरस वगैरह से भी ज़्यादा क्रेज़ है.

खैर. इस नयी व्यवस्था में पिंटू पिटाई से बच जाता था और मेरा मन बहलाव हो जाता था. हमने शामों को अपने बरामदे में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया. एकाध बच्चे और आ जाया करते. ज़्यादा गर्मी पड़ने लगती तो हम स्क्रैबल खेलते. कैरम और शतरंज भी. पिंटू ने धीरे-धीरे मेरे घर से किताबे ले जाना शुरू कर दिया. उसने मेरा एस्टरिक्स और टिनटिन का पूरा संग्रह चाट डाला. बचपन से संजो कर रखी अमर चित्र कथाएँ भी. एन फ्रैंक की डायरी और लिटल प्रिंस तक उसे भाने लगी थी.

एक दिन उसके मुझे फुसफुसाते हुए बताया कि अनिमेष भैया की एक गर्लफ्रेंड है जिसे उन्होंने अपना मोबाइल फोन गिफ्ट कर दिया है. पापा के पूछने पर उसने खो गया है कह कर झूठ बोल दिया था.
एक दिन उसने यह भी बताया कि भैया की साइंस की किताब के बीच में पांच-पांच सौ के कुछ नोट छिपाकर रखे रहते हैं जिन्हें वह पापा के पर्स से निकाल लेता है जो अक्सर भरा हुआ होता है. शाम को पापा भैया से ही ड्रिंक्स बनवाते हैं और जब वे खूब हंसने लगते हैं तो अनिमेष उनके बाथरूम में टंगी उनकी पेंट की जेब से एक-दो या तीन नोट पार कर लाता है.

ये सब हमारे सीक्रेट्स थे जिन्हें किसी और को न बताना हमारी दोस्ती की पहली शर्त थी.

मई का महीना था जब वे एक शाम को मेरे पास बेहद चिंताग्रस्त चेहरा लिए आया. मेरे पूछने से पहले ही बोल पड़ा - “पेपर में आया है परसों को दुनिया ख़त्म हो जाएगी.”

“मतलब?”

उसने बहुत संजीदा होकर बताया कि स्कूल और घर में भी इसी बारे में दिन भर बातें होती रही थीं. मेरा मन ठिठोली करने का हुआ.

“अच्छा तो है न यार. सब ख़त्म हो जाएगा तो तुम्हें स्कूल नहीं जाना पड़ेगा. होमवर्क भी नहीं मिलेगा. पापा-मम्मी नाराज़ नहीं होंगे. भैया भी पीट नहीं सकेगा.”

जितना संभव था मैं इस फिजूल की बात से उसका ध्यान हटाकर शतरंज खेलना चाहता था लेकिन उसे पक्का यकीन था कि दुनिया परसों को उजड़ जाने वाली है क्योंकि अखबार में आया है.

“तो मैं भी मर जाऊंगा.”

“हां”

“और आप भी”

“हां”

वह चुप हो गया तो मैंने फिर से उसे स्कूल, होमवर्क, पिटाई वगैरह से मुक्त हो जाने की संभावना से ललचाने की कोशिश की. लेकिन उसका मूड बिगड़ा हुआ था.

हम बरामदे में खड़े बातें कर रहे थे और सामने सड़क पर मोटरसाइकिल घर्राता हुआ रेबैन लगाए अनिमेष निकला, अपने पीछे महंगे डियोडरेंट का भभका छोड़ता हुआ. पिंटू उसे देर तक जाता हुआ देखता रहा. उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि अपने बड़े भाई को लेकर उसके मन में बेतरह गुस्सा और खीझ भरी हुई है.

दुनिया ख़त्म होते को थी और मैं उतना गंभीर नहीं हो रहा था जितनी उसे आशा थी. मैं ताड़ गया वह इसी वजह से उखडा हुआ था.

अब हमने डीटेल में दुनिया के विनाश की बातें करना शुरू कर दिया. जब जब अनिमेष और पड़ोस में रहनेवाले एक क्रूर गेंदप्रेमी बुढ्ढे और उसके सतत भौंकायमान कटखने कुत्ते की बात होती उसके मुंह पर कमीनी संतोषपूर्ण मुस्कराहट आ जाती. उसे अफ़सोस इतना ही हो रहा था कि वह स्पाइडरमैन की अगली पिक्चर नहीं देख पाएगा. मैंने पिछले हफ्ते उसके लिए स्पाइडरमैन का पोस्टर फ्लिपकार्ट से मंगवाकर गिफ्ट किया था. उसे तकलीफ हो रही थी कि वह ढंग से उस पोस्टर को देख भी नहीं सका है क्योंकि भैया उसे कमरे की दीवार पर लगाने की इजाज़त नहीं दे रहे.

दुनिया के साथ मम्मी-पापा के भी न रहने की बात उसे नहीं भाई लेकिन प्रलय तो प्रलय होता है. हमने कुछेक फिल्मों की बातें करनी शुरू कर दीं.

आधा घंटा बीतते न बीतते पिंटू सामान्य होकर किसी उस्ताद की तरह कैरम की गोटियाँ पिल कर रहा था और मुझे दो गेम हरा चुका था.

“एक बात बता यार पिंटू, परसों को हम सब यहाँ नहीं होंगे. मर गए होंगे. मरने से पहले तेरी कोई आख़िरी इच्छा है क्या?”

वह कैरम छोड़कर फिर तल्लीन होकर सोचने लगा.

दो मिनट सोचकर कुछ झेंपता हुआ बोला “आप पूरी कर पाओगे?”

“देख लेंगे यार! देख लेंगे. पहले बता तो क्या है तेरी आख़िरी इच्छा.”

“मुझे मोमो खाने हैं."

कच्चे कीचड़ से बना कोई व्यंजन किसी के जीवन की अंतिम इच्छा हो सकता है, मेरी समझ से परे था. मैं हैरत से पिंटू को ताक रहा था.

"... खूब सारे मोमो!” ध्यान से क्वीन कवर करने के बाद उसने बहुत गंभीर मुद्रा बनाकर अपनी अंतिम इच्छा पर मोहर लगाई.


(कथाकाल: मई २०१२)

हाशिमपुरा में हुआ क्या था - इन्डियन एक्सप्रेस का फ़ोटो निबंध

फ़ोटो और टैक्स्ट इन्डियन एक्सप्रेस से साभार. लिंक मुहैय्या कराने के लिए अरुंधती घोष का धन्यवाद. सभी फ़ोटो प्रवीण जैन के खींचे हुए हैं - 

On the night of May 22, 1987, about 45 Muslim men from Hashimpura, 
a settlement in Meerut, were rounded up and packed into 
the rear of a truck of the Provincial Armed Constabulary (PAC). 
(Source: Praveen Jain) 

Forty-two of those on board the truck that May night in 1987 
were killed in two massacres in neighbouring 
Ghaziabad district. 

One along the Upper Ganga canal near Muradnagar, 
a The other along the Hindon canal in Makanpur, 
on the border with Delhi — in 
what have since come to be known as the Hashimpura killings

Indian Express photographer Praveen Jain, who was 
with The Sunday Mail then, was in Hashimpura that May. 

The Army rounding up men in Hashimpura: 
Those were tense days, especially in Meerut. T
he Rajiv Gandhi government had ordered the locks on the 
Babri Masjid to be opened and riots and killings were 
reported from several parts of the district. 

After a month of rioting, parts of the city smouldered 
with fires and fear. Hundreds of homes, factories, 
shops and vehicles were gutted. 

In Meerut, the Army and paramilitary had been called in. 
A company of the 41st battalion of the PAC, 
which has its battalion headquarters in 
Ghaziabad, had also been sent to Meerut. 

The Army had forced all the residents of Hashimpura 
out of their homes onto the road, and searched their homes. 

It was the month of Ramzan and many spent 
their time outside their homes, cowering in fear. 
Over 500 men were arrested and taken 
away in police trucks. 

That night, the PAC truck with the Hashimpura 
residents had first stopped along the Upper Ganga canal 
near Muradnagar and allegedly killed 
some of the villagers. 
They stopped only when a milk van drove that way. 

Then, the jawans turned the truck towards Makanpur, 
along the Hindon canal, and went on 
another killing spree. Though the exact count of the dead
 was never established (because some of the bodies 
were flung into the canal and were never recovered) 
at least 42 are presumed to have been killed. 

महान कलाकारों की पहली पेंटिंग्स - 2


यह पिकासो का बनाया पहला सम्पूर्ण चित्र माना जाता है. इसमें वे एक बुलफाइटर बना रहे थे. उस वक़्त उनकी उम्र थी कुल नौ साल. इस पेंटिंग को ‘ले पिकादोर’ के नाम से जाना जाता है.

पाब्लो पिकासो (1881-1973)


इसी तरह अपना प्रतिशोध लेते हैं पेड़ हर रात - अरुंधती घोष की कविता - 5

पिकासो की कृति 'गर्ल बिफ़ोर अ मिरर'

प्रतिशोध

एक दिन, रात की गहराई में वे घरों से बुलाएंगे हमें 
गर्द और धुएं में, उस राजमार्ग पर, ट्रकों की उस कतार की बगल में, खड़ी हो जाऊंगी जाकर.
आसमान की तरफ पसार दूंगी बाँहें
खोदूंगी कोलतार में एक गड्ढा, पिंडलियों तलक धंसा लूंगी अपने पैर 
सिर से कमर तक उगेंगी छायाएं
धीरे-धीरे खुलते जाएंगे वस्त्र
चमड़ी का रंग होता जाएगा भूरा, हरा, काला
आसमान को देखूंगी आँखें उठाकर
नन्हे कीड़े मकोड़ों से भर जाएगी समूची छाती
एक भी सितारा नहीं होगा आसमान में उस रात
योनि से बूँद-बूँद टपक गिरना शुरू करेगा एक उर्वर रस
टांगों पर रेंगता चढ़ता जाएगा एक सांप और शरण लेगा नाभि में
जब तक वह नीचे उतरेगा, कुछ चिड़ियाँ आ कर कन्धों पर बैठ गयी होंगी
लेकर आएंगी वे भूसा और नन्हे तिनके
सूरज चढ़ेगा, नगर के लोग शुरू करेंगे अपना दिन
किसी का ध्यान नहीं जाएगा सड़क किनारे उग आया है एक और पेड़

एक दिन भोर से समय, मैं भी बन जाऊंगी एक पेड़
इसी तरह अपना प्रतिशोध लेते हैं पेड़ हर रात

वे ज़रूर बुलाएंगे घर से मुझे एक दिन

Tuesday, March 24, 2015

एक प्रतीक के रूप में बिरयानी

यह पोस्ट श्री प्रियदर्शन की फेसबुक वॉल से ली गयी है. उनका आभार.'

(बिरयानी के बहाने राष्ट्रवाद की समझ को लेकर ऑनिंद्यो चक्रवर्ती की यह प्रखर टिप्पणी ndtv.in पर आई है. अंग्रेजी के मूल लेख का पहले मैंने हिंदी में अऩुवाद किया और फिर ऑनिंद्यो चक्रवर्ती ने उसमें हिंदी पाठकों के हिसाब से कुछ फेरबदल किए. – प्रियदर्शन)


एक प्रतीक के रूप में बिरयानी

जब मेरी बेटी करीब दो साल की थी, वह उस इलाके को कुछ-कुछ पहचानने लगी, जहां हम रहते थे. वह इसका नाम बता सकती थी और शहर के दूसरे हिस्सों से अलग इसे पहचान सकती थी. लेकिन तब तक, उसे यह समझाना लगभग नामुमकिन था कि ऐसी सारी बस्तियां दिल्ली नाम के शहर का हिस्सा हैं, या दिल्ली और कलकत्ता दोनों भारत नाम के एक देश के हिस्से हैं.

मेरी बेटी को, पहली बार, भारत क्या है, यह तब समझ में आया, जब उसने स्कूल जाकर नक्शा देखना सीखा. वर्ल्ड मैप पर भारत का आकार देखकर वह अपने देश को पहचान लेती थी. हम सबने शायद इसी तरह भारत को पहचानना सीखा था - एनसीईआरटी की किताबों में छपे नक्शों से. धीरे-धीरे हमने राष्ट्र के दूसरे प्रतीकों को भी पहचानना सीखा - झंडा, सिक्के, और दूसरी चीज़ें, जो हमें स्कूल में पढ़ाई जाती थीं.

...और उसके बाद हमने सीखा किताबी, आधिकारिक इतिहास. अकबर अच्छा था, औरंगजेब बुरा. पृथ्वीराज चौहान और शिवाजी महान थे. गांधीजी ने अहिंसा से आज़ादी दिलाई. भूगोल में हमने सीखी अनेकता में एकता, भारत के विभिन्न राज्यों की अलग-अलग भाषाएं, संस्कृति और पोशाकें.

मुझे याद है, बचपन का होमवर्क, जिसमें मोहल्ले की स्टेशनरी शॉप से खरीदे हुए चार्ट काटकर नोटबुक में चिपकाना पड़ता था. चार्ट में छपी होती थीं भारत के प्रसिद्ध स्मारकों, स्वतंत्रता सेनानियों, धर्मों और राज्यों की 'टिपिकल' तस्वीरें. आज भी मैं अपनी आँख बंद करके याद करूं तो उस 'टिपिकल' बंगाली और तमिल आदमी के, गोखले और तिलक के, अकबर और शिवाजी के, जंतर-मंतर और सांची के स्तूप के हाथ से बनाए चित्रों के प्रिंट्स को देख सकता हूं.

इन्ही तस्वीरों और चिह्नों से बनी थी मेरी राष्ट्रवाद की समझ. तीस साल बाद मेरी बेटी के दिमाग में राष्ट्रवाद का आइडिया ऐसी ही 'टिपिकल' तस्वीरों और चिह्नों से ठोस आकार ले रहा है. हम सब के राष्ट्रवाद ऐसे ही चिह्नों, तस्वीरों, नक्शों, नामों से बनते हैं. साथ-साथ राष्ट्रवाद की समझ उन चीज़ों से भी होती है, जो हमसे अलग हैं, जैसे दूसरे देशों की भाषाओं के नाम, उनका खान-पान, उनकी पोशाक, उनके सिक्के. ये सब अलग-अलग तरह के प्रतीक और चिह्न हैं, जो हमारे लिए अपने और पराये की व्याख्या करते हैं.

जब उज्ज्वल निकम ने कसाब के संदर्भ में बिरयानी के प्रतीक का इस्तेमाल किया, तो वह - जाने या अनजाने - ठीक यही काम कर रहे थे. वह एक पाकिस्तानी शख्स के लिए एक प्रतीक या चिह्न तैयार कर रहे थे, जो अपना 'राष्ट्रीय' व्यंजन मांग रहा था. बिरयानी का यही प्रतीक था, जिसे फिर पाकिस्तान को चिह्नित करने के लिए तब इस्तेमाल किया गया, जब कोस्ट गार्ड के एक डीआइजी बीके लोशाली ने कहा कि वह चाहते थे कि पाकिस्तानी बोट उड़ा दी जाए, क्योंकि 'हम उन्हें बिरयानी परोसना नहीं चाहते थे...' और यही वजह है कि हाफ़िज़ सईद से वेद प्रताप वैदिक की मुलाकात पर वीएचपी ने कहा कि 'सईद के साथ बिरयानी खाना' देशभक्ति नहीं है.

ऐसी बातें बिरयानी शब्द को एक चिह्न में बदल देती हैं, जिसमें एक खाने की चीज़ को पाकिस्तान और आतंकवाद का प्रतीक बना दिया जाता है, लेकिन निशाने पर न पाकिस्तान है, न आतंकवाद. असली निशाना घर में है - तथाकथित बिरयानी खाने वाले - भारतीय मुसलमान. बार-बार बिरयानी और आतंकवाद को साथ जो़ड़कर बोलते हुए बिरयानी को एक भयावह शब्द में बदल दिया जा रहा है, और शब्द के उच्चारण से एक छवि सामने आ रही है, एक कट्टर आदमी, जो धर्म के लिए देश के साथ गद्दारी कर सकता है.


वे सब लोग, जो यह दलील दे रहे हैं कि बिरयानी की कहानी गढ़कर निकम ने सही किया, चाहे-अनचाहे, यही छवि बना रहे हैं. हमें इन छवियों से सावधान रहने की ज़रूरत है, क्योंकि अगर हमने उन्हें अपने रोज़मर्रा की भाषा के अर्थों को बदलने दिया, तो एक दिन वह हमारे राष्ट्रवाद की समझ को भी बदल सकती है.

एक क़स्बे की कथाएँ - 2

फेसबुक पर दो दिन पहले मैंने अपने शहर हल्द्वानी के कुछ किस्से लगाना शुरू किया है. अभी इनका क्या बनेगा, ऐसी कोई ठोस सूरत इस विचार ने नहीं ली है. फिलहाल उन्हें यहाँ भी शेयर कर रहा हूँ –


(एक क़स्बे की कथाएँ - 1)

हल्द्वानी के किस्से - 2

नैनीतालनिवासी मेरा एक मित्र अमरीका में नौकरी करता है. साल में एक दफ़ा अपने माता-पिता से मिलने यहां आता है. पिता सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, फ़िलहाल रिटायर हो चुके हैं.

दोस्त के आने की ख़बर सुनकर जाहिर है उस से मिलने उसके घर जाना होता था. अक्सर वह बिजली विभाग के किसी दफ़्तर गया पाया जाता था. और मुझे उसके लौटने तक उस के पिता से सौ बार सुना जा चुका 'रागदरबारी' के लंगड़-प्रकरण सरीखी उनकी एक संघर्षगाथा को पुनः सुनना पड़ता था.

रिटायरमेन्ट के समय मिली पीएफ़ की रकम से साहब ने हल्द्वानी में एक प्लॉट खरीदा ताकि बुढ़ापे के जाड़ों की धूप सेकने को अपना खुद का एक ठीहा बनाया जा सके. प्लॉट एक परिचित के माध्यम से खरीदा गया. परिचित के किसी चचेरे भाई के किसी दोस्त के किसी प्रॉपर्टी डीलर से सम्बन्ध थे. तो बिना देखे, हर किसी की भलमनसाहत पर भरोसा रखते हुए जो प्लॉट इन्हें मिला उसके बीचोबीच बिजली का ट्रान्सफ़ॉर्मर था.

रजिस्ट्री हो चुकी थी, पैसे का धुंआं निकल चुका था. तो पिछले तीन सालों से एक पखवाड़े के लिए घर आए मेरे दोस्त का ज़्यादातर समय बिजली विभाग के बाबुओं से अपने पिता द्वारा उक्त ट्रान्सफ़ॉर्मर को हटाए जाने सम्बन्धी आवेदन का स्टैटस मालूम करने में बीता करता था. कभी बड़ा साहब दौरे पर गया होता, कभी कोई अनापत्ति प्रमाणपत्र कम पड़ जाता.

"दिस कन्ट्री वुड नेवर इम्प्रूव! हू वान्ट्स टु कम टू दिस गटर! आई रादर टेक माई पेरेन्ट्स अलॉन्ग नैक्स्ट टाइम!" अमरीका से ही लाई सिन्गल माल्ट व्हिस्की के घूंट लगाता भारत महान को इसी तरह की लानतें-मलामतें भेजता मित्र किसी शुभ दिन अमरीका चला जाता और पिताजी का प्लॉट बमय ट्रान्सफ़ॉर्मर बना रहता.

यह बेहद इत्तफ़ाकन हुआ कि मेरा एक स्कूली सहपाठी एक पार्टी में टकरा गया जो बिजली महकमे में एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर बन कर पिछले ही हफ़्ते मेरे शहर पोस्टेड हो कर आया था. अमरीकावासी दोस्त के पिताजी को इस बात की भनक लगने में करीब दसेक दिन लगे और वे बड़ी आशा के साथ अपने शाश्वत बनते जा रहे विद्युतविभागीय दुख की फ़ाइलों का पुलिन्दा यह कह कर मेरे घर छोड़ गए कि बस मेरे दोस्त के एक दस्तख़त से उनका काम बन जाएगा.

अगले ही दिन करीब दस फ़ाइलों का वह पुलिन्दा ले कर मैं अभियन्तामित्र के दफ़्तर गया. उसने फ़ाइलें अपने मातहत किसी कर्मचारी को थमाते हुए कहा कि कामधाम तो होता रहेगा थोड़ा गपशप की जाए.
शाम को उसका फ़ोन आया कि उसने अपने असिस्टेन्ट इंजीनियर को साइट पर भेज कर रपट तैयार करवा ली है और इस काम में प्रार्थी को एक लाख उन्नीस हज़ार रुपये खर्च करने पड़ेंगे क्योंकि ट्रान्सफ़ॉर्मर हटवाने का काम बहुत पेचीदा होता है.

अमरीकावासी मित्र के पिता को बताया तो वे बोले यह रकम तो प्लॉट की कीमत से भी ज़्यादा है. अभियन्तामित्र से मैंने कुछ रियायत करने को कहा तो उसने खुद मौका मुआयना करने का आश्वासन दिया और हफ़्ते भर बाद उक्त रकम को तेईस हज़ार बनाने का चमत्कार कर दिखाया. यह समझौता किये जाने लायक रकम थी.

अगली सुबह जब अमरीकावासी मित्र के पिता रकम लेकर बिजली दफ़्तर पहुंचे तो दोस्त ने उनसे कहा कि अभी पैसा जमा करवाने की आवश्यकता नहीं. उसने यह सलाह भी दी कि फ़िलहाल वे पैसा मेरे पास छोड़ जाएं क्योंकि पता नहीं खम्भों का इन्तज़ाम कब हो जाए. तो साहब यह रकम भी मेरे पास छोड़ दी गई.

उसी शाम अभियन्तामित्र ने अपने घर खाने पर बुलाया. एकाध घन्टे की गपशप के बाद उसे अचानक कुछ याद आया. वह फुसफुसाते हुए बोला: "देखो ये तेरे बुढ़ऊ बहुत शरीफ़ आदमी हैं इसी लिए इनका काम नहीं बनता. अगर मैं इनके पैसे जमा करा लेता तो ऑफ़ीशियली भी इस काम में कम से कम एक साल लगना था. एक तो इनकी एप्लीकेशन अस्सीवें नम्बर पर होती फिर कब कहां से तार आते, कहां से खम्भे और लेबर कब फ़्री होती ... तो ... " उसने आंख मारते हुए कहा: "तेरे परिचित मेरे भी तो कुछ हुए न यार ... ऐसा है तू उनके दस हज़ार रुपए लौटा देना ... कल तक खेत से ट्रान्सफ़ॉर्मर हटा मिलेगा."

मैंने असमंजस और अविश्वास में उसे देखना शुरू किया ही था कि वह बोला: "देख भाई, चाहो तो काम अब भी वैसे ही करवा लो. मगर उसमें कागज़-पत्तर कम पड़े तो फिर अड़ंगा लग सकता है. और क्या पता चुनाव के बाद कहीं मेरा ट्रान्सफ़र हो गया तो! अब काम को ऐसे कराने में क्या हर्ज़ है ... देख, मैं अपना हिस्सा छोड़ रहा हूं ... पर दूसरे इंजीनियर हैं, लाइनमैन हैं, उन्होंने भी तो बच्चे पालने हैं न! और कागज़-पत्तर पर कुछ लिखत-पढ़त कराने की ज़िद न करें, बोल देना बुढ़ऊ को! फ़िज़ूल काम में अड़ंगा लगेगा."

अगली शाम तक वाकई काम हो चुका था. प्लॉट का ट्रान्सफ़ार्मर हट चुका था, सभी सम्बन्धित 'महोदय' और 'प्रार्थी' पार्टियां सन्तुष्ट थीं. तीन साल तक लंगड़ बनते बनते अमरीकावासी मित्र के पिता की गरदन और पीठ इस लायक नहीं बचे थे कि उन्हें दोबारा सीधा किया जा सके. खैर, जब मैंने उनसे फ़ाइलें वापस ले जाने के बाबत पूछा तो उन्होंने हिकारत से आसमान को देखते हुए कहा: "अरे बेटा खड्डे में डाल सालियों को."

अभियन्तामित्र ने इन फ़ाइलों को लेकर जो शब्द इस्तेमाल किए उन्हें यहां लिखा नहीं जा सकता. 

एक क़स्बे की कथाएँ - 1

फेसबुक पर दो दिन पहले मैंने अपने शहर हल्द्वानी के कुछ किस्से लगाना शुरू किया है. अभी इनका क्या बनेगा, ऐसी कोई ठोस सूरत इस विचार ने नहीं ली है. फिलहाल उन्हें यहाँ भी शेयर कर रहा हूँ –


हल्द्वानी के किस्से - 1

माँ ने आकर कहा "ज़रा देख तो, कोई आया है."

दरवाज़े पर थोड़ा सा परेशान लगता पैसठ-सत्तर साल का एक टिपिकल रिटायर्ड मध्यवर्गीय दिख रहा आदमी. कुछ कहने-पूछने से पहले ही बोला "ये डी पैंतीस नहीं मिल रहा." "ये डी पैंतीस ही है." मैंने कहा.

वह थोड़ा और परेशान हो गया. थोड़ा पूछताछ के बाद मालूम चला कि उसकी बेटी हमारे मोहल्ले के डी/35 में रहती है जहां आज उसके बच्चे का मुंडन संस्कार है. अब डी/35 मेरे घर का नंबर है. अच्छा खासा पसर जाने के बावजूद हमारे मोहल्ले में आज भी पड़ोसियों को हरेक छोटे-बड़े आयोजन में न्यौते जाने का रिवाज़ बना हुआ है. मैंने माँ से पूछा कि आज कहीं ऐसा कोई कार्यक्रम तो नहीं. उसे जानकारी नहीं थी.
मैंने भरसक सहानुभूति जताई कि हो सकता है उसकी बेटी ई/35 में रहती हो. उसे वहां जाने का रास्ता भी बता दिया.

दसेक मिनट बाद पाया कि वह फिर घर के बाहर की सड़क पर ही परेशान टहल रहा था. चेहरा बताता था वह अच्छा परेशान हो चुका. मुझे दया आ गयी.

बरामदे पर उसके लिए कुर्सी लगाई. साप्ताहिक कॉलम लिखने का जो काम मैं इमरजेंसी की हालत में कर रहा था, उसे किनारे रखा और बूढ़े की तकलीफ का समाधान खोजने की जुगत में लग गया.

दामाद एक आधुनिक बैंक में है. स्मार्टफोन पर उस बैंक हल्द्वानी का नम्बर खोजा. लैंडलाइन था. उठा नहीं. एकाध बैकर दोस्तों से पूछा फोन पर. कुछ नहीं.

इधर बूढ़ा उस रिक्शेवाले को कई बार गालियाँ दे चुका था जिसने उसे नहर के पास छोड़ने के बजाय क्रियाशाला के आगे छोड़ दिया था, वरना अपनी बेटी के घर तो वह कितनी बार जा चुका है वगैरह .
"आपके पास कोई फोन नंबर है?" - मैंने यह सवाल पहले पूछ लेना चाहिए था. उसे अपना नंबर याद था लेकिन फोन वह घर पर भूल आया था. शुक्र है नंबर याद था. घंटी मारी तो तीसरी कॉल पर उसकी बीवी ने उठाया. मैंने ज़रूरी सूचनाएं देकर बुढ़िया से कहा कि मेरे नंबर पर फोन करे. बीवी की आवाज़ ने उसे तात्कालिक राहत दिला दी थी. बूढ़े की बात भी कराई.

इधर माँ ने उसके लिए पहले पानी और फिर सेव-अंगूर पेश कर दिए. अंगूर टूंगता बूढ़ा अब आत्मकथात्मक मोड में आ गया था. बैंक में नौकरी करता था. २००४ में रिटायर हुआ. हल्द्वानी में मकान बना लिया है. कोई दोस्त नहीं है. टीवी कोई कितना देखे. सुबह-शाम वॉक करता है. एक बेटा अफ्रीका में कहीं है. बड़ी फैक्ट्री का मालिक है. छोटा इंजीनियर है गुडगाँव में. वहीं उसने दूसरा फ़्लैट खरीद लिया है, पहला फ़्लैट नोएडा में था ही. दामाद-बेटी-कुलीन ब्राह्मण-रिश्तेदार-भांग-घंटा-प्लाट वगैरह.

बीसेक मिनट बीत गए थे. बूढ़े की आत्मकथा समाप्त हो चुकी थी. बुढ़िया का फोन अब तक नहीं आया.
इधर माँ उसके लिए कॉफ़ी बना लाई.

फिर बुढ़िया को फोन लगाया. शायद ऐसा पहली बार हुआ था सो बुढ़िया के पास परिस्थिति से निबटने को कोई तात्कालिक स्ट्रेटेजी नहीं थी. मैंने उसकी बेटी का नंबर माँगा. यह भी मैंने बीस मिनट पहले कर लेना था.

बेटी ने दूसरी बार में फोन उठाया.

"येस" - फोन उठा. बेटी शायद हल्द्वानी के किसी पब्लिक स्कूल की मास्टरनी थी.

उसे बताया कि उसके पिताजी पौन घंटे से यहाँ भटक रहे हैं और यह भी कि मैं डी/35 से बोल रहा हूँ. वह भी डी/35 से बोल रही है - ऐसा उसने कहा.

वह हमारे अगले मोहल्ले से थी. यानी बूढ़ा गलत मोहल्ले में पहुँच गया था.

बेटी ने कहा वह किसी को स्कूटी से भेज रही है, मेरे मन में अब भी बूढ़े के लिए सहानुभूति बची हुई थी. सोच रहा था पिताजी ऐसे कहीं भटके होते तो!

पन्द्रह मिनट और बीत गए. बूढ़े ने अपनी जीवनगाथा रिपीट कर के सुनाई - इस बार दामाद-बेटी-कुलीन ब्राह्मण-रिश्तेदार-भांग-घंटा-प्लाट वगैरह पर ज़्यादा जोर था. इस रिपीट नेरेशन ने पहली बार मेरे भीतर उसके लिए नापसंदगी जैसी कोई चीज़ पैदा की. अब अपनी कल्पना में मैं उसे नौकरी के दौरान बैंक में आये गरीबों पर झींकता, चिल्लाता देख सकता था.

स्कूटी आ गयी. कलावा बांधे, तिलक लगाए बीसेक साल का गुटकाखोर एक मुटल्ला लौंडा था. लौंडे ने बूढ़े को देखा. बूढ़े ने लौंडे को. मैंने दोनों को देखा. बिजली की फुर्ती से बूढ़े ने उठकर गेट खोला. स्कूटी में बैठने से पहले बूढ़े लोगों को जितनी मशक्कत करनी पड़ती है उतनी करने में दो-तीन मिनट लगे. मैं गेट के बाहर सड़क पर खड़ा था.

यह विदा करने का समय था. आज के दिन के अच्छे काम के उपसंहार का समय.

लौंडे ने किक मारी, स्कूटी फुर्र. बूढ़े ने एक अक्षर बोलना तो दूर एक सेकेण्ड को भी पलट कर नहीं देखा. और दरअसल स्कूटी को देखने के बाद से उसके लिए मैं मर गया था. लौंडे से किसी तरह की थैंक्यू वगैरह की उम्मीद मुझे नहीं थी.

गेट बंद करता मैं कुर्सी, कप, प्लेट, संतरे के छिलके वगैरह देख रहा हूँ.

फिर एक बार गेट खोलता हूँ, सड़क पर निगाह मारता हूँ. स्कूटी पर एक तरफ को तनिक लटक सी गयी बूढ़े की पिछवाड़ी मोड़ पर ओझल होने को है.

गले में थूक भर गया है. मन माँ की गाली देने का कर रहा है.

(घटनाकाल: मार्च २०१५)