Sunday, May 24, 2015

वेलेरी हादीदा के शिल्प

समकालीन फ्रेंच पेंटर और वास्तुशिल्पी वेलेरी हादीदा अधिकतर कांसे और मिट्टी के माध्यमों पर काम करती हैं. आज उनकी कुछ अनूठी वास्तुशिल्पीय कृतियाँ देखिये जिन्हें ‘लिटल वूमेन’ सीरीज का नाम दिया गया गई. आलोचक इस सीरीज के बारे में कहते हैं: “यह एक काव्यात्मक भिड़ंत है जो हमें स्त्रियों द्वारा पार किये गए उन तमाम रास्तों की बाबत बताती है जो उन्होंने युवावस्था से प्रौढ़ होने तक पार किये होते हैं और उन तमाम संवेदनाओं और मूड्स की बाबत भी जो स्त्रियों की इन पीढ़ियों के जीवन का संबल हैं.” 


EMSAT में प्रशिक्षित वेलेरी ने १९९१ के पॉल रिकार्ड फाउंडेशन पुरूस्कार से सम्मानित मारील पोल्स्का के स्टूडियो में छः साल काम किया. १९९० से उनका काम तमाम गैलरीज़ में प्रदर्शित होता रहा है. 

































वेलेरी हादीदा 

मर भी जाओ तुम ऐसे-वैसे अगर हक़ होगा मेरा तुम पर

शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएं आप कबाड़खाने पर पढ़ते रहे हैं. आज उनकी एक और उम्दा साझा कर रहा हूँ. यह कविता शेफाली की अन्य कविताओं के साथ 'जलसा' के अगले अंक में प्रकाश्य है. फिलहाल इस वजह से इसे कबाड़खाना एक्सक्लूसिव कहा जा सकता है-

ऑस्ट्रियाई चित्रकार इगोन शीले की पेंटिंग 'प्रोसेशन' (१९११)

मुसलमान रहो 

-शेफाली फ्रॉस्ट

'मान लो कि ख़ैरख़्वाह हूँ मैं,
इश्क़ करती हूँ उस क़ौम से 
जो तुम्हारी है, 
जो तुम हो... '

'मेरी है, मैं हूँ?'

'हाँ, बात करो न उनकी प्लीज़,
वो पुरखे तुम्हारे ईरान से, तुर्रान से,
गोरे, चमकीले, ब्राह्मण तुम्हारी जात के,
सुना है उनकी बीवियों ने
पर्दा नहीं किया कभी … है ना?'

'बुर्क़ा पहनती हैं।'  

'कौन?'

'अम्मी मेरी।'  

'रियली! बट हाऊ कैन यू अलाऊ दैट?'

'अलाऊ मतलब? उनकी मर्ज़ी।' 

'पर तुम तो वैसे नहीं?'

'कैसे?'

'अरे हैं न वो काले काले, 
काजल लगे, लोबान वाले,
मांगते हैं मज़ारों का चंदा,
हरी चादर में गाड़ी रोक,
अकेली पड़ जाऊं उनके हाथ कभी,
तौबा ! सोचो क्या हशर होगा मेरा!'

'क्यों, छू लेंगे तुम्हे?'

'उफ़! नॉटी!
उनकी सुनाओ ना मुझे, 
कार्ल मार्क्स की हंसिया पकड़े,  
फैज़ लपेटे कान में,
नाप दें रोज़े साल्हो साल,  
दाब दें ताज़िए बा-एहतराम, लेकिन, 
पड़ोसियों को ख़लल न पड़े, 
लड़कियाँ न्यूयॉर्क रहे, बीवियां कुर्रान पढ़ें  
शराब से तौबा नहीं, पर... '

'अरे! वो नहीं हूँ मैं, मेरी जान!
अलिफ़ बे का तालिब,
मीर, मोमिन और ग़ालिब,
सड़क से गुज़रूँ तो  
चप्पल की चाप में उर्दू बसे, 
भीड़ में चलाता हूँ मारुती  
हॉर्न बजा बजा कर, एक्सैक्टली वैसे
जैसे तुम्हारे बाप, 
गालियां देता हूँ पैदलों को बाकी,
कुछ हिन्दुआनी, कुछ मुसलमानी,
मेरा हुजूम मुझे वैसे ही निगलता है
जैसा तुम्हारा तुम्हे, 
वो अमरीकी आसमान जब औंधा गिरा ज़मीन पर 
उतना ही बेखबर रहा मैं जितना की तुम,
नामा देखा, ट्रैफिक का अफ़सोस किया,
सब्ज़ियों के दाम कर्फ्यू में कितने बढ़ेंगे  
तिजारत की …'

'दैट इस ऑपर्चुनिज़्म!   
यह आइडेंटिटी दोगे हमारे बच्चों को तुम?' 

'आइडेंटिटी? 
अमरीकियों की नौकरी बजाता हूँ,
साइबर पार्क में नौ से पांच,
वीकेंड पर शराब पीता हूँ, जर्मन,
जो न हिन्दू है, न मुसलमान, 
जुम्मा कब आया याद नहीं,
ईद उतनी ही इर्रेल्वेन्ट है जितनी दीवाली, 
पर दोनों पर दिए जलाता हूँ,
हाँ, जब हिन्दुओं के गढ़ में मकान ढूंढने जाता हूँ,
सोचता हूँ, ले चलूँ तुम्हे भी साथ,
बिंदी लगाए, छै गज की साड़ी लिपटाये!
देर रात, बैरियर किनारे
मांगता है लाइसेंस, पान चबाता ठुल्ला, 
डर यह नहीं कि, 
गाड़ दिया जाऊं, कि जला दिया जाऊं, 
बस इसलिए कि गुआंटानमो में न मार दिया जाऊं, 
कर देता हूँ तुम्हे आगे, बड़ा शर्मसार, 
सोचा है नाम दूंगा बच्चों को अपने  
पीटर, टोनी, और निर्वाण,
अगली पुश्त के लाइसेंस तो न कहलायें मुसलमान!'

'अरे, अरे! ना कहीं, 
यह कैसा कुफ्र है तुम्हारा मेरे ख़िलाफ़!
तुम मुसलमान न होगे,
मैं ख़ुद को क्या कहूँगी? 
नारे लगाऊंगी, गाने गाऊंगी, 
जेल के गेट पर धरना लगाऊंगी, 
शान से कहूंगी,
हैं तो वही, पर वैसे नहीं!
इन्हे मैं प्यार करती हूँ...

मर भी जाओ तुम ऐसे-वैसे, इधर-उधर,
हक़ होगा मेरा तुम पर, मय्यत पर करूंगी सोज़ख़्वानी,
मेरे महबूब, तुम्हे मेरी मुहब्बत की क़सम,
डोंट थिंक इलेक्ट्रिक क्रेमटोरियम में होने दूँगी क्विक एंड ईज़ी!
मुंह घुमा दूँगी तुम्हारा, जिस तरफ कहेंगे क़ाबा, 
पूरे साढ़े छै फुट नीचे करवाऊँगी दफ़न,  
रो रो कर कहूँगी सबसे 
जब ज़िंदा थे तब सबसे डरे, 
पर प्यार देखो मेरा, 

मुसलमान थे, मुसलमान ही मरे!'

Saturday, May 23, 2015

मारिया रीता पेरेस की कला

मारिया रीता पेरेस फिगरेटिव शैली में वास्तुशिल्प बनाती हैं. पुर्तगाल की रहनेवाली इस कलाकार ने १९९५ में सेरामिक्स आर्ट में डिप्लोमा हासिल किया है और वे कागज़ की लुगदी और सेरामिक्स की मदद से बेहतरीन कलाकृतियों का निर्माण करती हैं. देखिये उनकी कुछ ट्रेडमार्क कृतियाँ-
















मारिया रीता पेरेस

Thursday, April 30, 2015

अमां डॉ. साब ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिये लंबी नहीं - सुनील शाह की याद

बरेली में रहने वाले डॉ. एहतेशाम हुदा मेरे मित्र हैं. अभी बीती २८ अप्रैल की सुबह दिवंगत हुए परमसखा सुनील शाह के लिए उन्होंने यह लिखकर भेजा है. जस का तस शेयर कर रहा हूँ.


तुम बहुत याद आओगे गुरु

अबे क्या चूतियापा लगा रखा है, बड़ी झन्नाटेदार ख़बर है यार, आदमी है या पजामा, लो कल्लो बात, जितना कमाओ उतना उड़ा दो, अंग्रेजी हमारी तुम से अच्छी है बेटे, तुम निखट कद्दू हो, हीरो तो हम ही हैं गुरु, मियां तुम से नाए होगा, अमा नया क्या है, अमा घोर गरम है ये बिरयानी तो, अमा एक बार चल लो विदेश यात्रा पर हमारे साथ ज़िन्दगी झंड से प्रचंड हो जायेगी, अबे ये इटली के जूते हैं तुम्हारे अब्बा ने भी नहीं देखे होंगे. वैसे तो देखे हम ने भी नहीं थे जुगाड़ से झपट लिये, मियाँ स्कार्पियो के चक्कर में मत पढ़ो कोई सुर्रा गाड़ी लो, अमां अकेले अकेले उड़ा रहे हो मट्टन हम कद्दू छान रहे हैं ...

ऐसे ही पता नहीं कितने हज़ारो देसी मुहावरो से तुम्हारी बात की शुरुआत होती थी. और अंत में कहते थे कुछ नया हो तो बताना तुरंत भेजना.

तुम्ही कहते थे अमां डॉ. साब ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिये लंबी नहीं.

तुम्हारा हर एक जुमला कानो में गूँज रहा है ...और तुम चुपके से कान में आकर कह रहे हो अमां छोड़ो भी चूतियापा मत करो, एक आंसू भी मत गिराना वरना समझूँगा अपनी यारी में कसर रह गई. अच्छा चलो ज़रा मोटर साइकिल निकालो तो ... कैंट घूम कर आते हैं, वहीं वाकिंग स्ट्रीट पर बैठ कर मेरी मौत का शोक मनाना बेटे ... तुम तो कहते थे भैया तुम निपट लोगे किसी दिन तो कद्दू कोई फर्क नहीं पड़ेगा अपने ऊपर ...अब सन्नाटे में क्यों हो मेरी जान ... अबे हमारा नाम सुनील शाह है मर कर भी ज़िंदा रहेंगे ... और हाँ भैयू के मट्टन चाप का ध्यान रखना बस कोई और वसीयत नहीं है, बढ़ा गोश खोर है यार अपना ये लौंडा भैयू. और हाँ सुनो जब भी नए जूते या गाड़ी लो तो एक बार दिल से याद करना आ जाऊंगा बताने. यार डाक्टर इतना मातम नहीं करते भाई ... तुम तो खूब लकड़ी करते थे मेरे आज क्यों क्या हो गया ...

अमा आज तो लगता है हम जीत गए बकैती में तुम से ... अबे तुमने एक गाड़ी के चक्कर में पूरी-पूरी रात नेट पर काली करायी है हमारी. गुरु इसी का नाम दुनिया है हम जैसे ज़्यादा दिन तक यहाँ अच्छे नहीं लगते वरना खुदा को कौन याद करेगा.

ओके सुनील भैया ... जो कहा उसका ख्याल रखूँगा आते रहना ख्यालों-ख़्वाबों में और चूतियापा बघारते रहना. खुदा को यही मंज़ूर था तो ये ही सही. फिर कद्दू काटा तुमने डॉ ...

अबे ये कहो जब तक रहे ज़िन्दादिली से रहे और लोगो के दिलो पर राज किया तुम्हारे सुनील भैया ने ...

चलो अब निकलो यहाँ से काटो जब याद करोगे आ जाऊंगा बस अब खुश. कित्ते चेप हो यार मरने के बाद तो पीछा छोड़ दो कम से कम ...

चलो चलो चलो ... कट लो.


ओके भाई खुदा हाफ़िज़ ... हमेशा-हमेशा के लिये.

Tuesday, April 14, 2015

इस नगरी के दस दरवाजे जोगी फेरी नित देता है


कुमार गन्धर्व जी के स्वर में गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछिन्दरनाथ) का एक भजन -



शून्य गढ़ शहर शहर घर बस्ती कौन सूता कौन जागे है
लाल हमरे हम लालान के तन सोता ब्रह्म जागे है

जल बिच कमल कमल बिच कलिया भँवर बास न लेता है
इस नगरी के दस दरवाजे जोगी फेरी नित देता है

तन की कुण्डी मन का सोटा ज्ञानकी रगड लगाता है
पांच पचीस बसे घट भीतर उनकू घोट पिलाता है


अगन कुण्ड से तपसी तापे तपसी तपसा करता है
पाँचों चेला फिरे अकेला अलख अलख कर जपता है

एक अप्सरा सामें उभी जी, दूजी सूरमा हो सारे है
तीसरी रम्भा सेज बिछावे परण्या नहीं कुँवारी है

परण्या पहिले पुत्तुर जाया मात पिता मन भाया है
शरण मच्छिन्दर गोरख बोले एक अखण्डी ध्याया है