Saturday, December 12, 2015

ग़ालिब पर एक कहन ये भी

'द डेड मैन वॉक्स' में डेंजर मैन की भूमिका में ज़िया मोहिउद्दीन 
चचा ग़ालिब के बारे में न जाने कितने लोग कितना-कितना लिख और कह चुके हैं. लेकिन ज़िया मोहिउद्दीन साहब की निगाह ख़ासी अलहदा है और उनके अंदाज़-ए-बयाँ के तो क्या कहने.

सुनिए और आनन्द लीजिये. उम्दा पेशकश -  
(डाउनलोड लिंक: http://www.4shared.com/mp3/4O6MXUutce/Ghalib_aur_Mein_-_Zia_Mohyeddi.html) 

Friday, December 11, 2015

गली मीर क़ासिम जान से एक रपट - चाहे है फिर किसी को लबे बाम पर हवस

मिर्ज़ा ग़ालिब की पुण्यतिथि के अवसर पर लिखा गया जनाब आर. वी. स्मिथ का यह पीस 2013 की मार्च में 'द हिन्दू' में शाया हुआ था. 'डेल्ही: अननोन टेल्स ऑफ़ अ सिटी' के लेखक स्मिथ साहब पर एक लंबा लेख जल्द कबाड़खाने में देखिये.
गली क़ासिम जान. फ़ोटो - अभिषेक सिसोदिया
15 फ़रवरी को बसंत पंचमी के दिन पड़ी मिर्ज़ा ग़ालिब की पुण्यतिथि के दिन वैसा उत्साह नहीं दिखा जैसा उनकी जन्मतिथि (27 दिसंबर) को दिखा था.  सुबह जब गली मीर क़ासिम जान पहुंचा तो उनकी हवेली, जिसे अब एक स्मारक में तब्दील कर दिया गया है, के आसपास कुछ ख़ास नज़र नहीं आया. बाहर उनके पोते के साथ अपने बच्चे को मदरसे ले जाने के लिए रिक्शे का इंतज़ार करता एक बूढ़ा खड़ा था. जब मैंने ग़ालिब के बारे में पूछा तो उसने अपनी भवें बुनते हुए कहा - “आप ऐसे शख्स के बारे में बात कर रहे हैं जिसने अपनी समूची ज़िन्दगी में एक भी अच्छी मिसाल पेश नहीं की. उसने अपने दिन रूमानियत से भरी खिलंदड़ी में बिताए जबकि रातें मुशायरों में या शराब पीते हुए और नाचवालियों की सोहबत में. ऐसे मुसलमान को याद रखने की ज़्यादा ज़रुरत नहीं. हालांकि वह एक मस्जिद की बगल में रहता था, वहां वह भूले से ही जाया करता था.” अपना ज्ञान प्रदर्शित करने की नीयत से उन्होंने एक शेर गढ़ते हुए कहा – “मस्ज़िद के ज़ेर से एक घर बना लिया है/ एक बन्दा-ए-कमीना हमसे ख़ुदा है.” अगर एक आदमी अपने आपको ख़ुदा का ऐसा कमीना पड़ोसी समझता था जो दुनिया उसकी बाबत और कुछ कैसे सोच सकती है? मेरी बात सुन लीजिये,  उसके सारे बच्चे पैदा होते ही इस लिए मर गए क्योंकि ख़ुदाई उसके तौर-तरीकों से ख़फ़ा थी.”
हो सकता है बूढ़े मियाँ सनक गए हों पर लालकुआं के एक दुकानदार के ख़याल इससे अधिक बेहतर न थे. “शरीफ़ज़ादे नहीं थे वो वरना इस इलाक़े की हर मस्जिद में उनके नाम की गूँज होती.” नाहरी की एक दुकान पर नाश्ते का इंतज़ार करते एक और बुज़ुर्ग (संभवतः उनकी बहू का मिजाज़ बिगड़ा रहा होगा) ने ग़ालिब का नाम लेते ही ज़मीन पर जोर से अपनी लाठी पटकते हुए अपनी नाक पर लगे चश्मे को गुस्से में ऊपर किया. उनका ख़याल था कि आज की अंग्रेज़ी पढ़ी लिखी सोसाइटी ने उसे कुछ ज़्यादा ही चढ़ा दिया है जबकि दिल्ली ने कहीं बेहतर शायर और रोलमॉडल्स पैदा किये हैं.
बल्लीमारां और आसपास के इलाक़े के लोगों में इस तरह की भावनाएं पाई जाती हैं – जो ज़्यादातर दुकानदार, ठेली लगाने वाले, कारीगर या पेंशनयाफ्ता पुरुष हैं – जिनका समय दिन में पांच दफ़ा नमाज़ अदा करने में बीतता है. बीच-बीच में वे उन दिनों को गिना करते हैं जब उन्हें रमजान के रोज़े रखने होते हैं, ईद-उल-फ़ित्र मनानी होती है और जिसके बाद ईद-उल-ज़ुहा और उससे जुड़े हज का काउंटडाउन शुरू होता है. फिर मुहर्रम के दस दिन जब ताजिये उनके दिमागों पर छाये रहते हैं. प्रार्थना, भोजन और धार्मिक मुबाहसों में उनके दिन कटते हैं चूंकि उन्हें जीवन को “कॉफ़ी की चम्मचों” में नहीं बल्कि धार्मिक चीज़ों  “में गिनने” का काम करना होता है. सो क्या आप उन पर इलज़ाम लगा सकते है कि उनके पास ग़ालिब को लेकर कोई बहुत अच्छे खयालात नहीं हैं, जिन्होंने खुद को 1857 के ग़दर के वक़्त एक अँगरेज़ अफसर के पूछे जाने पर आधा मुसलमान बताया था? “मुसलमान हो” गोर साहिब ने पूछा था. “आधा” ग़ालिब ने जवाब दिया. जब इस बात को समझाए जाने को कहा गया तो शायर बोला “शराब पीता हूँ सूअर नहीं खाता.” अपने असामान्य लम्बे कानों के ऊपर एक शंक्वाकार टोपी लगाए और घिसा हुआ मध्यकालीन चोगा धारे हल्की रंगत वाले, दुबले, दढ़ियल औसत कद के उस हाजिरजवाब आदमी के उत्तर  को सुनकर गोरा अफसर ठठाकर हंसा. उसने ग़ालिब को इस अंदाज़ में चले जाने दिया जैसे कुदरत के उन खब्तियों में से एक को अपने रास्ते से साफ हो जाने दे' रहा हो, जो “मस्जिद में बर्बाद हुए समय की भरपाई के लिए शराबखाने में प्रायश्चित” करने पर यकीन करते हैं.
चित्र द हिन्दू से साभार

जो भी हो, आज भी आप अपनी हवेली से जामा मस्जिद तक टहलने जा रहे ग़ालिब के क़दमों का पीछा कर सकते हैं – हवेली आज़म खान और मंदिर की बगल से जिसके बाद हिन्दू बाहुल्य वाला मोहल्ला शुरू होता है, जहाँ छोले-भटूरे की दुकानों के बीच शादी के कार्ड छापने वालों की दुकानें हैं; स्कूल से घर लौट रहे अध-भुखाने लड़के-लड़कियों की भीड़ ने एक कचौड़ीवाले के ठेले को घेर रखा है जिसका धंधा बढ़िया चल रहा है. स्वीकार करना पड़ेगा कि यहाँ की कचौड़ियाँ चावड़ी बाज़ार में बिकनेवालियों से भी बेहतर हैं.
गुज़िश्ता सालों में इस गली से गुज़रते हुए ग़ालिब अपना रस्ता बनाते मसीता की दुकान पर जाया करते थे, जहाँ ओल्ड टॉम व्हिस्की के तीन पैग पीने से पहले या बाद में वे कबाब खाते. उसके बाद उस सांवली नाचनेवालीके कोठे पर जाया करते जिसने बुढापे में उनका दिल चुरा लिया था. वहां आराम करते हुए कभी-कभार ग़ालिब एकाध भिखारियों को अपनी रचनाएं गाते और भीख मांगते सुना करते. इससे उन्हें इल्हाम होता कि उन्होंने अपनी माशूका की निगाह में थोड़ी ज्यादा इज्ज़त कमा ली होगी. लेकिन कोठे जाने का काम हर रोज़ नहीं होता था. उनकी खस्ताहाली के चलते दिक्कतें भी थीं, जिनकी वजह से एक दफ़ा उन्हें बादशाह के रिश्तेदार मिर्ज़ा इलाही बख्श के महल में पनाह मांगने पर मजबूर होना पड़ा था क्योंकि उनके अपने मकान की छत भारी बारिश में गिर गयी थी. फिर इसके अलावा लालकिले में मुशायरों में जाना होता था (मिर्ज़ा फ़तेहउल्ला बेग के मास्टरपीस दिल्ली की आख़िरी शमा से पहले). विख्यात फ्रेंच विद्वान् और भाषाविद गार्सिन दे टैसी ने 19वीं सदी के उर्दू साहित्य की स्थिति पर अपने सालाना भाषणों में उन सभी को दर्ज किया है. औपचारिक मुशायरों के अलावा मटिया महल में हवेली सद्र में तरही मुशायरे भी हुआ करते थे. कुछ समय पहले तक पत्थर का वह उठा हुआ चबूतरा देखा जा सकता था जिस पर शमा धरी जाती थी ताकि शायर और उसे सुनने आये लोगों के चेहरे रोशन हो सकें.
गली क़ासिम जान में वापस. मेरी मुलाक़ात नज़दीकी राबिया गर्ल्स स्कूल से वापस लौट रही एक लम्बी, गोरी और बेहद खूबसूरत एक लड़की से होती है. वह शर्मीली थी लेकिन जब मैंने उससे ग़ालिब के बारे पूछा तो उसके विचार बाकी बाशिंदों से बेहतर थे. “बहुत लाजवाब थे ग़ालिब मियाँ. उनके शेर तो सुब्हान अल्लाह थे. जी चाहता है बस सुनते जाएं.”
यह टिप्पणी बताती है कि युवा लोग ग़ालिब की बुराई करने की कोई मंशा नहीं रखते. हो सकता है उनमें से कुछ ने उस शाम हवेली में एक शमा रोशन की हो. लेकिन उस दिन को मनाने के लिए बाकायदा कोई आयोजन जैसा नहीं था जब असदुल्लाह बेग खान ग़ालिब उर्फ़ मिर्ज़ा नौशा 143 साल पहले जन्नत के मैदानों में अपने साथियों से जा मिले थे. अलबत्ता यह बात भुत कम लोग जानते हैं कि एक दफ़ा अपने दोस्त हरगोबिन्द तफ्ता को लिखे एक ख़त में उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की थी कि उन्हें दिल्ली-आगरा मार्ग पर लाल घोड़े की मूर्ति के नज़दीक दफ़नाया जाए जिसकी बगल में पीर साहब की कब्र थी और जिसे वे हमेशा अपने सलाम भेजा करते थे. अगर वह ख्वाहिश पूरी हो गयी होती तो ग़ालिब के चाहनेवाले उनकी जन्म और मृत्यु की तारीखों को उन्हें गली क़ासिम जान के अलावा ताज के शहर में भी अपनी अकीदत पेश कर रहे होते, जहाँ वे पैदा हुए थे.

लेखक श्री आर. वी. स्मिथ

सचमुच स्वर्ग से बनकर आई थी उनकी जोड़ी

बिल ब्राइसन की किताब ‘द लाइफ़ एंड टाइम्स ऑफ़ द थंडरबोल्ट किड’ का एक अंश. अपने माता-पिता को इस तरह शायद ही किसी ने याद किया हो जैसे वे करते हैं.


माँ के काम करने के तरीके में इकलौती खराब बात यह थी घर को चलाने और खासतौर पर डिनर (जो कभी भी उनका मज़बूत पहलू नहीं रहा) के मामले में वे अपने ऊपर ज़्यादा दबाव नहीं लेती थीं. माँ को अक्सर देर हो जाया करती थी और बारगेनिंग करते वक़्त वे सब कुछ भूल जाती थीं. हमने जल्दी ही हर शाम छः बजने में दस मिनट होते ही उनकी बगल में खड़ा रहना सीख लिया क्योंकि ठीक इस वक़्त वे अचानक पीछे वाले दरवाज़े से भीतर जातीं और अवन में कुछ झोंक देतीं और हर शाम अपना स्वागत कर रहे घर के हज़ारों बाकी कामों को निबटाने के उद्देश्य से घर के किसी कोने में अदृश्य हो जातीं. इस चक्कर में वे तकरीबन हमेशा डिनर के बारे में भूल जाया करती थीं. और हमेशा थोड़ी देर हो चुकी होती थी. नियमतः हम जान जाते थे कि खाने का समय हो चुका क्योंकि अवन में विस्फोटित हो रहे आलुओं की आवाजें आना शुरू हो चुकी होती थीं.

अपने घर में हम उस हिस्से को रसोई नहीं कहते थे. उसे बर्न्स यूनिट कहा जाता था.   

"ये थोड़ा जल गया है,” कहती हुई, हर रोज़ खाने के वक़्त माफ़ी जैसी मांगती हुई माँ मीट का एक टुकड़ा प्रस्तुत करती जो किसी चीज़ जैसा दिखाई देता था – शायद किसी अतिप्रिय पालतू जानवर जैसा – जिसे किसी घर में लगी त्रासद आग से निकाला गया हो. “लेकिन मेरे ख़याल से मैंने अधिकतर जला हुआ हिस्सा खुरच दिया था,” वह आगे जोड़ा करती, इस बात को नज़रअंदाज़ करती हुई कि उस खुरचे हुए का हरेक हिस्सा कभी मांस हुआ करता था.

खुशी की बात यह थी कि यह सारा पिताजी के लिए काफ़ी सुविधापूर्ण था. उनकी जीभ केवल दो स्वादों पर रेस्पॉण्ड करती थी – जला हुआ खाना और आइसक्रीम – सो उन्हें हरेक चीज़ अच्छी लगती थी बशर्ते वह पर्याप्त गहरी रंगत वाली हो और आश्चर्यजनक रूप से स्वादिष्ट न हो. उनकी जोड़ी सचमुच स्वर्ग से बनकर आई थी क्योंकि खाने को इस तरह शायद ही किसी ने जलाया हो जैसे माँ जलाती थी और उस खाने को वैसे कभी किसी ने नहीं खाया होगा जैसे मेरे पिताजी ने.

अत मधुर बन बंसरी बाज री

www.thehindu.com से साभार

पंडित वेंकटेश कुमार की राग धानी में गाई एक और मधुर बंदिश –

पंडित वेंकटेश कुमार का गाया राग शुद्ध कल्याण

फ़ोटो http://maradhimanni.blogspot.in से साभार

पंडित वेंकटेशकुमार का गाया राग दुर्गा आप पहले सुन चुके हैं. आज के हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायकों में अपनी अलग पहचान बना चुके पंडितजी धारवाड़ की संगीत परंपरा के सच्चे ध्वजवाहक हैं. पंडित पंचाक्षरी गवई और पंडित पुत्तराजा गवई की ग्वालियर-किराना गायकी को उन्होंने अपने समर्पण से जीवित रखा है.

सुनिए उनका गाया राग शुद्ध कल्याण. तबले पर उनकी सांगत कर रहे हैं रघुराम नाकोड.



यह भी सुनें: ऐ री धन-धन भाग मोरे - पंडित वेंकटेश कुमार

Thursday, December 10, 2015

वो जो था बन्दर का बच्चा बन्दर नहीं था, आदमी था

फ़ोटो https://donaldwhy.wordpress.com से साभार 

वो तो देवयानी का ही मर्तबा था
-रमाशंकर यादव विद्रोही

वो तो देवयानी का ही मर्तबा था
कि सह लिया साँच की आँच 
वरना बहुत लम्बी नाक थी ययाति की 
तो नाक में नासूर है 
और नाक की फ़ुफ़कार है 
और नाक विद्रोही की भी शमशीर है, तलवार है 
और जज्बात कुछ ऐसा कि बस सातों समंदर पार है 
और ये सर नहीं गुम्बद है 
कोई पीसा की मीनार है 
और ये गिरा तो आदमियत का अक़ीदा गिर पड़ेगा 
और ये गिरा तो बलन्दियों का पेंदा गिर पड़ेगा 
और ये गिरा तो मुहब्बत का घरौंदा गिर पड़ेगा 
और इश्क़ का और हुस्न का 
दोनों का
दीदा गिर पड़ेगा
इस लिए रहता हूँ जिन्दा 
वरना कब का मर चुका हूँ 
मैं सिर्फ काशी में ही नहीं रूमान में भी जी चुका हूँ 
और हर जगह 
ऐसी ही जिल्लत  
और हर जगह ऐसी जहालत 
और हर जगह पर है पुलिस 
और हर जगह पर है अदालत 
और हर जगह पर हैं पुरोहित 
और हर जगह नरमेध है 
और हर जगह कमजोर मारा जा रहा है, खेद है
तो सूलियां ही हर जगह पर हैं निजामों की निशान
और हर जगह पर फांसियां लटकाये जाते हैं गुलाम 
हर जगह पर औरतों को मारा-पीटा जा रहा है 
खोदा-गाड़ा जा रहा है 
जिन्दा जलाया जा रहा है 
और हर जगह पर फूल हैं 
और हर जगह आंसू बिछे हैं 
और ये कलम है 
सरहदों के पार भी नगमे लिखे हैं  
तो आप को बतलाऊं मैं इतिहास की शुरुआत को 
और किस लिए बारात दरवाजे पे आई रात को 
और ले गई दुल्हन उठाकर 
और मंडप को गिराकर
और एक दुल्हन के लिए आये कई दूल्हे मिलाकर 
और जंग कुछ ऐसा मचाया 
कि तंग दुनिया हो गयी 
और मरने वाले की चिता पर 
जिन्दा औरत सो गयी 
और तब बजे घड़ियाल 
पंडित शंख घंटे घनघनाये
और फौजों ने भोपू बजाये 
और पुलिस ने तुरही बजाये 
और मंत्रोच्चारण ये हुआ कि मंगलम औरत सती हो 
और जीते जी जलती रहे जिस भी औरत के पति हो
और तब भरे बाजार 
और बाजार में सामान आये  
और बाद में सामान की गिनती में खुद इंसान आये  
तो बगदाद और बदख्शां में खुल्ला बिकते थे गुलाम 
सीरिया और काहिरा में पट्टा होते थे गुलाम 
और बेतलहम येरूसलम में रेहन होते थे गुलाम 
और रोम में और काकुआ में गिरवी होते थे गुलाम 
और मंचूरिया शंघाई में नीलाम होते थे गुलाम 
और मगध कोशल काशी में बेनामी होते थे गुलाम 
और सारी दुनिया में किराये पे उठते थे गुलाम 
पर वाह रे मेरा जमाना
और वाह रे भगवा हुकूमत 
कि सरे बाजार में खैरात बँटते हैं गुलाम
तो लोग कहते हैं कि लोगों पहले तो ऐसा न था 
पर मैं तो कहता हूँ कि लोगों कब कहाँ कैसा न था 
तो दुनिया के बाजार में सबसे पहले क्या बिका था 
तो सबसे पहले दोस्तों वो 
वो बन्दर का बच्चा बिका था 
बन्दर का बच्चा बिका था 
और बाद में तो डार्विन ने सिद्ध बिल्कुल कर दिया 
कि वो जो था बन्दर का बच्चा बन्दर नहीं था 
आदमी था.

मगर आदमी का फरज ये नहीं है

फ़ोटो https://islampeace1.wordpress.com से साभार 

हकीकत कोई नंगई तो नहीं है
-रमाशंकर यादव विद्रोही

हकीकत कोई नंगई तो नहीं है
हकीकत किसी की फजीहत नहीं है 
हकीकत वही है जो खुद रास आये
हकीकत किसी की नसीहत नहीं है
और हकीकत की वारिस है खुद ही हकीकत
हकीकत किसी की वसीयत नहीं है 
और हकीकत वही है जो मैं कह रहा हूँ 
और जो मैं कह रहा हूँ 
यहीं कह रहा हूँ
कि अभी दाब दूँ तो जमीं चीख देगी
और अभी तान दूँ तो गगन फाट जाये 
मगर आदमी का फरज ये नहीं है
फरज है 
कि छप्पर गिरे तो उठाये  
इसी के लिए
हाँ इसी के लिए तो
अमीना का छप्पर 
और हामिद की खपरैल 
और सालिक की शादी 
कि मालिक की तेरही
कि बैजू की बीबी
कि सरजू की रखैल 
सभी के लिए
हाँ सभी के लिए 
तो सभी के लिए 
इक वतन चाहिए ही  
ये कमबख्त हैं 
इसमें अब शक कहाँ है 
मगर अब मर गए 
तो कफ़न चाहिए ही
और आज से 
इक कफ़न ही है झंडा मेरा 
मैं हरिश्चंद्र के बाप का बाप हूँ 
मैं वही बीज हूँ, जो, जमा आदि में  
मैं वही फल हूँ, फलता है, जो अंत में 

Wednesday, December 9, 2015

अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा


नई खेती
- रमाशंकर यादव विद्रोही

मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता

मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा.

मुझे बचाओ! मैं तुम्हारा कवि हूं.

कल आठ दिसंबर 2015 को रमाशंकर यादव विद्रोही ने अपनी अंतिम सांस ली. नकली कविता के आज के दौर में दुर्लभ असल कविता लिखने वाले इस कवि को उसकी बेलाग, निर्भीक और मज़बूत आवाज़ के लिए लगातार याद किया जाएगा. कबाड़खाने की श्रद्धांजलि. 

दिवंगत कवि को याद करते हुए उनकी कविता 'मोहनजोदड़ो' का एक अंश. 

...

ये लाश जली नहीं है, जलाई गयी है,
ये हड्डियां बिखरी नहीं हैं, बिखेरी गयी हैं,
ये आग लगी नहीं है, लगाई गयी है,  
ये लड़ाई छिड़ी नहीं है, छेड़ी गई है,
लेकिन कविता भी लिखी नहीं है, लिखाई गई है,
और जब कविता लिखी जाती है,
तो आग भड़क जाती है.

मैं कहता हूं तुम मुझे इस आग से बचाओ मेरे लोगो!
तुम मेरे पूरब के लोगों, मुझे इस आग से बचाओ!
जिनके सुंदर खेतों को तलवार की नोकों से जोता गया,
जिनकी फसलों को रथों के चक्कों तले रौंदा गया.
तुम पश्चिम के लोगों, मुझे इस आग से बचाओ!
जिनकी स्त्रियों को बाजारों में बेचा गया,
जिनके बच्चों को चिमनियों में झोंका गया.
तुम उत्तर के लोगों, मुझे इस आग को बचाओ!
जिनके पुरखों की पीठ पर पहाड़ लाद कर तोड़ा गया
तुम सुदूर दक्षिण के लोगों मुझे इस आग से बचओ
जिनकी बस्तियों को दावाग्नि में झोंका गया,
जिनकी नावों को अतल जलराशियों में डुबोया गया.
तुम वे सारे लोग मिलकर मुझे बचाओ-
जिसके खून के गारे से
पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं,
क्योंकि मुझको बचाना उस औरत को बचाना है,
जिसकी लाश मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी पर
पड़ी है.

मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है,
जिनकी हड्डियां तालाब में बिखरी पड़ी है.
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है,
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है,
तुम मुझे बचाओ!
मैं तुम्हारा कवि हूं.