Sunday, December 30, 2012

मिलो दोस्त, जल्दी मिलो


देहरादून के अपने प्रिय स्वर्गीय मित्र अवधेश कुमार की एक कविता साझा करने का दिल हुआ –


मिलो दोस्त, जल्दी मिलो

सुबह--एक हल्की-सी चीख़ की तरह
बहुत पीली और उदास धरती की करवट में
पूरब की तरफ़ एक जमुहाई की तरह
मनहूस दिन की शुरुआत में खिल पड़ी.

मैं ग़रीब, मेरी जेब ग़रीब पर इरादे ग़रम
लू के थपेड़ों से झुलसती हुई आँखों में
दावानल की तरह सुलगती उम्मीद.

गुमशुदा होकर इस शहर की भीड़ को
ठेंगा दिखाते हुए न जाने कितने नौजवान
कब कहाँ चढ़े बसों में ओर कहाँ उतरे
जाकर : यह कोई नहीं जानता.

कल मेरे पास कुछ पैसे होंगे
बसों में भीड़ कम होगी
संसद की छुट्टी रहेगी
सप्ताह-भर के हादसों का निपटारा
हो चुकेगा सुबह-सुबह
अख़बारों की भगोड़ी पीठ पर लिखा हुआ.

सड़कें ख़ाली होने की हद तक बहुत कम
भरी होंगी : पूरी तरह भरी होगी दोपहर
जलाती हुई इस शहर का कलेजा.

और किस-किस का कलेजा नहीं जलाती हुई.
यह दोपहर आदमी को नाकामयाब करने की
हद तक डराती हुई उसके शरीर के चारों तरफ़.

मिलो दोस्त, जल्दी मिलो
मैं ग़रीब, तुम ग़रीब
पर हमारे इरादे ग़रम.

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