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Friday, June 14, 2013

मौसमों के छल्ले लिपटते हैं मेरी गिर्द धुएं की मानिंद



मेरी आंटियां

- आदम ज़गायेव्स्की 

अपनी कोहनियों तलक फर्नीचर, बिस्तरबन्दों,
आलमारियों और किचन गार्डनों में
मसरूफ रहने के बावजूद, वे जिसे वे कहा करती थीं
जीवन का व्यावहारिक पक्ष
(सैद्धांतिक पक्ष था प्लेटो के वास्ते),
वे कभी नहीं भूलीं लैवेंडर की पोटलियाँ धरना
जो चादरों की आलमारी को तब्दील कर दिया करती थीं बागीचे में.

चंद्रमा के अप्रकाशित हिस्से जैसे ,
जीवन के व्यावहारिक पक्ष में
रहस्यों की कभी कमी नहीं रही
जब क्रिसमस नज़दीक आता
जिंदगी बन जाती एक निखालिस दस्तूर
और अस्थाई रूप से निवास किया करती गलियारों में
और शरण ले लिया करती सूटकेसों और पोटलियों में.

और जब किसी की मृत्यु होती – उफ़, ऐसा
हमारे परिवार में भी होता था –
मेरी आंटियां व्यस्त रहतीं मृत्यु के व्यावहारिक पक्ष के साथ
आखिरकार वे भूल जाया करतीं लैवेंडर के बारे में
जिसकी पगलाई महक निस्वार्थ खिली रहती थी
चादरों की भारी बर्फ के नीचे.
कुछ भी मत करो, बस यहाँ बैठो.
सो मैं वैसा ही करता आया हूँ, वही करता आया हूँ,
मौसमों के छल्ले लिपटते हैं मेरी गिर्द धुएं की मानिंद
धरती के छोर तक जाकर वापस लौटते हुए बिना आवाज़ किये.

Thursday, June 13, 2013

एक जीव की बेचैनी से बना हुआ और अधिक संपन्न



दो सिरों वाला लड़का

-आदम ज़गायेव्स्की

अपने गाढ़े नीले विंडचीटर के नीचे
पन्द्रह साल का एक लड़का बिल्ली का बच्चा लिए जा रहा था.
उसका नन्हा सिर एक तरफ को घूमा हुआ
बड़ी बड़ी आँखें
हरेक चीज़ को से देखती हुईं
मानवीय आँखों से अधिक चौकन्नी.

गर्म ट्रेन के भीतर,
मैं तुलना करता हूँ
लड़के की आलसभरी निगाह की
बिल्ली के बच्चे की
चौकस और संकरी पलकों से.

मेरे सामने बैठा हुआ है दो सिरों वाला लड़का
एक जीव की बेचैनी से बना हुआ और अधिक संपन्न.

Wednesday, June 12, 2013

एक मोती मुझे देखता है



वर्मीयर की नन्ही लड़की

-आदम ज़गायेव्स्की 

अब विख्यात हो चुकी, वर्मीयर की नन्ही लड़की
मुझे देखती है. एक मोती मुझे देखता है.
वर्मीयर की नन्ही लड़की के होंठ
लाल, नाम और चमकदार हैं.

ओ वर्मीयर की नन्ही लड़की, ओ मोती,
नीला पगिया: तुम पूरी पूरी रोशनी हो
और मैं बना हूँ परछाईं का.
रोशनी उपेक्षा करती है परछाईं की
धैर्य के साथ, या शायद दया के साथ.   

[योहान वेर्मीयर, डच पेंटर (१६३२-१६७५) थे जिन्हें मध्यवर्गीय जीवन के भीतरी तत्वों को पकड़ने में महारत हासिल थी. सचेत पाठकों को याद होगा, कबाड़खाने पर कभी लगाई गयी शिम्बोर्स्का की एक कविता में वेर्मीयर का ज़िक्र हुआ है.] 

Tuesday, June 11, 2013

याद करता हूँ उस आग का धधकता आकर्षण



आग

-आदम ज़गायेव्स्की

मनुष्य के अधिकारों का समर्थक
शायद मैं एक साधारण मध्यवर्गीय हूँ, “स्वतंत्रता” शब्द  
मुझे बहुत आसान लगता है, इसका मतलब किसी
खास वर्ग से मुक्ति जैसा कुछ नहीं.
राजनैतिक रूप से भोलाभाला, औसत
शिक्षा प्राप्त (स्पष्ट दृष्टि के संक्षिप्त क्षण
इसका मुख्य पोषक तत्व होते हैं), मैं याद करता हूँ  
उस आग का धधकता आकर्षण जो
प्यासी भीड़ के कंठ सुखा देती है और किताबें
जला देती है और झुलसा कर रख देती है शहरों की त्वचाओं को. मैं गाया करता था
इन गीतों को और जानता हूँ दूसरों के साथ दौड़ लगाना  
कितना शानदार होता है; बाद मैं जब खुद मैंने,
राख का स्वाद अपने मुंह में लिए,
सुना असत्य की विडम्बना भरी आवाज़ और चिल्लाते भक्तिगीत गायकों को    
और जब मैंने छुआ अपना सिर, मैं महसूस कर सकता था
अपने देश की घुमावदार खोपड़ी को,
उसकी कड़ियल धारों को. 

Monday, June 10, 2013

वह विचार करता है उन योजनाओं की बाबत जिन्हें उसने अधूरा छोड़ दिया था



लेओनार्दो

-आदम ज़गायेव्स्की

अब फ्रांस में रहता है वह 
पहले से ज़्यादा शांत और कमजोर. 
सबसे शानदार है वह. बादशाह की 
दोस्ती नसीब है उसे. 
ल्वा नदी हौले-हौले लुढ़काती है अपने पानियों को. 
वह विचार करता है उन योजनाओं की बाबत 
जिन्हें उसने अधूरा छोड़ दिया था. 
अभी से उसे छोड़ चुका 
आधा लकवा पड़ा हुआ उसका दायाँ हाथ. 
बायाँ वाला भी हसरत रखता है निकल जाने की. 
और उसका दिल, और उसकी समूची देह. रोशनी के जज़ीरे अब भी मुस्तैद पहरेदारों की मानिन्द. 


Sunday, June 9, 2013

मैं युवा नहीं रहा अब, लेकिन कोई दूसरा हमेशा होता है मुझसे अधिक बूढ़ा

विख्यात पोलिश कवि आदम ज़गायेव्स्की (जन्म २१ जून १९४५) की एक कविता


सेल्फ़-पोर्ट्रेट

-आदम ज़गायेव्स्की

कम्प्यूटर, एक पेन्सिल और एक टाइपराइटर
के बीच गुज़र जाता है मेरा आधा दिन. एक दिन गुज़र चुकी होगी आधी सदी.
मैं रहता हूँ अजनबी शहरों में और कभी कभी
अबूझ अजनबी मसलों पर बातें करता हूँ अजनबियों के साथ.
ख़ूब संगीत सुनता हूँ – बाख़, मेह्लर, शोपाँ, शोस्ताकोविच.
मुझे तीन तत्व दीखते हैं संगीत में – अशक्तता, शक्ति और दर्द.
चौथे का कोई नाम नहीं होता.
मैं मृत और जीवित कवियों को पढ़ता हूँ, जो मुझे सिखलाते हैं
दृढ़ता, विश्वास और गौरव. मैं महान दार्शनिकों को
समझने का जतन करता हूँ – लेकिन उनके मूल्यवान विचारों
की छीलन भर ही पकड़ में आ पाती है. मुझे पेरिस की सड़कों पर टहलना
और ईर्ष्या, गुस्से और लालसा के वशीभूत
तेज़ तेज़ चल रहे अपने साथी मनुष्यों के देखना अच्छा लगता है;
और पसंद है एक से दूसरे हाथ जाते अपना आकार खोते जा रहे
चाँदी के सिक्के का सुराग लगाना (राजा की आकृति घिस चुकी उस में से).
मेरी बगल में कुछ भी अभिव्यक्त नहीं करते पेड़
सिवा एक बेपरवाह, हरी सम्पूर्णता के.
स्पानी विधवाओं की मानिंद इंतज़ार करतीं
काली चिड़ियाँ मंद क़दमों से नापती हैं खेतों को.
मैं युवा नहीं रहा अब, लेकिन कोई दूसरा हमेशा होता है
मुझसे अधिक बूढ़ा.
मुझे पसंद है गहरी नींद, जब नहीं रहता मेरा अस्तित्व,
और देहात की सड़कों पर तेज़-रफ्तार मोटरसाइकिल की सवारी करना जब
पोपलर के पेड़ और मकानात
धूपदार दिनों में आपस में घुलमिल जाते हैं बादलों के झुंडों जैसे.
कभी कभी संग्रहालयों में पेंटिंग्स मुझसे बातें करती हैं
और अचानक अदृश्य हो जाती है विडम्बना.
मुझे बहुत अच्छा लगता है अपनी पत्नी का चेहरा देखना.
हर इतवार को टेलीफोन करता हूँ अपने पिता को.
हर सप्ताह मिलता हूँ अपने दोस्तों से,
इस तौर साबित करता अपनी वफ़ादारी.
मेरे देश ने खुद को मुक्त किया था एक बुराई से. चाहता हूँ
अब हो एक और मुक्ति.
क्या मैं कुछ मदद कर सकता हूँ इस में? मुझे पता नहीं.
सच में मैं नहीं हूँ महासागर की संतान
जैसा कि आंतोनियो माचादो ने लिखा था अपने बारे में.
हूँ अलबत्ता हवा, पोदीने और वायोलिन की संतान
और स्वर्ग के तमाम रास्ते
नहीं गुजरा करते काटते हुए जीवन के रास्तों को – जो अब तक
सिर्फ मेरा है.