Wednesday, September 2, 2015

अनुपयोगी लोगों के वर्ग के पैदा हो जाने की संभावना - युवाल नोह हरारी


युवाल नोह हरारी का एक संक्षिप्त इंटरव्यू

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ब्रूनो जिउसानी: युवाल आपकी नई किताब आई है. सेपियंस के बाद यह आपकी दूसरी किताब है. फिलहाल यह हिब्रू में है और अभी तक इसका अनुवाद ... 
युवाल नोह हरारी: मैं इसके अनुवाद पर काम कर रहा हूं.
बीजी:    इस किताब में, अगर मैंने ठीक-ठीक समझा है, आप कहते हैं कि इस वक्त जो हैरतंगेज खोजें हो रही हैं उनसे न सिर्फ हमारी ज़िन्दगी बेहतर होगी बल्कि ये, आपके मुताबिक, "नए वर्गों और वर्ग संघर्षों को भी जन्म देंगी." क्या आप इस पर थोड़ा और प्रकाश डालेंगे.
युवाल:   ज़रूर. औद्योगिक क्रांति में हमने शहरी सर्वहारा के रूप में नए वर्ग को जन्मते हुए देखा था. पिछले 200 वर्षों का राजनीतिक और सामाजिक इतिहास इस वर्ग की समस्याओं और सम्भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. आज हम अनुपयोगी हो चुके लोगों के एक और बड़े वर्ग को जन्म लेते हुए देख रहे हैं. जैसे-जैसे कंप्यूटर अधिकांश क्षेत्रों में बेहतर से बेहतर होते जाएंगे, एक दूरगामी संभावना बनती है कि ज्यादातर कामों में कंप्यूटर हमें पीछे छोड़ दें और मनुष्यों को अनावश्यक बना दें. तब 21वीं सदी का सबसे बड़ा राजनीतिक और आर्थिक सवाल होगा, "इंसानों की क्या सचमुच ज़रूरत है?" या कम से कम, "क्या हमें इतने ज्यादा इंसानों की ज़रूरत है?"
बीजी:    क्या इस किताब में आपने कोई हल सुझाया है?
युवाल:   फिलहाल सबसे अच्छा अंदाजा हम यही लगा सकते हैं कि अनुपयोगी हो चुके इंसानों की इस विशाल आबादी को दवाओं और कंप्यूटर गेम्स की मदद से खुश रखा जाय. लेकिन भविष्य की यह तस्वीर बहुत अच्छी नहीं जान पड़ती.
बीजी:    तो कुल मिलाकर इस किताब में और अभी आप बहुत ज्यादा आर्थिक असमानता के प्रमाणों के बारे में बताना चाहते हैं, जैसा कि इस प्रक्रिया की शुरुआत में था?
युवाल:   मैं फिर दोहराना चाहूंगा कि इसे भविष्यवाणी न समझा जाय. हमारे सामने कई सारी संभावनाएं मौजूद हैं. एक संभावना एक बहुत बड़े अनुपयोगी लोगों के वर्ग के पैदा हो जाने की है. दूसरी संभावना है कि मनुष्य जाति दो अलग-अलग जैविक उपजातियों में बंट जाय- पैसे वाले खुद को आभासी देवताओं में अपग्रेड कर लें और गरीब लोग अनुपयोगी हो चुके मनुष्यों के स्तर पर आ जाएं.
[अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय]

Tuesday, September 1, 2015

क्यों करते हैं इंसान धरती पर राज

[प्रो. युवाल नोह हरारी यरुशलम विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाते हैं. उनके लिए इतिहास संस्कृति के जन्म के साथ शुरू नहीं होता बल्कि वह उसे बहुत-बहुत पीछे ब्रहमांड के उद्भव तक ले जाते हैं. इतिहास को जैविक उद्विकास के नज़रिए (ईवोल्युशनरी पर्सपेक्टिव) से देखने का उनका तरीका उन्हें ख़ास बनाता है. पढ़िए TED TALKS में दिया उनका हालिया भाषण. - आशुतोष उपाध्याय]


प्रोफ़ेसर युवाल नोह हरारी

क्यों करते हैं इंसान धरती पर राज
युवाल नोह हरारी

पचहत्तर साल पहले हमारे पुरखे मामूली जानवर थे. प्रागैतिहासिक इंसानों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात हम यही जानते हैं कि वे ज़रा भी महत्वपूर्ण नहीं थे. धरती में उनकी हैसियत एक जैली फिश या जुगनू या कठफोड़वे से ज्यादा नहीं थी.  इसके विपरीत, आज हम इस ग्रह पर राज करते हैं. और सवाल उठता है: वहां से यहां तक हम कैसे पहुंच गए? हमने खुद को अफ्रीका के एक कोने में अपनी ही दुनिया में खोए रहने वाले मामूली वानर से पृथ्वी के शासक में कैसे बदल डाला?
अमूमन हम अपने और अन्य सभी जानवरों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर अंतर खोजते रहते हैं. हम यह विश्वास करना चाहते हैं- मैं यह विश्वास करना चाहता हूं- कि मुझ में कुछ तो ख़ास है, मेरे शरीर में, मेरे दिमाग़ में, जो मुझे एक कुत्ते या एक सूअर या एक चिम्पैंजी से श्रेष्ठ बनाता है.
लेकिन सच यही है कि मैं शर्मिंदगी की हद तक एक चिम्पैंजी जैसा ही हूँ. अगर आप मुझे और एक चिम्पैंजी को साथ-साथ किसी निर्जन द्वीप पर छोड़ दें, और पूछें कि खुद को जिन्दा रखने के संघर्ष में कौन बेहतर साबित होगा. तो इस सवाल पर मैं खुद अपने बजाय चिम्पैंजी पर दांव लगाना चाहूंगा. ऐसा कतई नहीं कि व्यक्तिगत रूप से मुझमें कोई गड़बड़ी है. मेरा अंदाज़ा है कि आप में से किसी को भी अगर चिम्पैंजी के साथ उस द्वीप में छोड़ दिया जाय, चिम्पैंजी हर हाल में आप पर भारी पड़ेगा.
मनुष्य और अन्य सभी जानवरों के बीच वास्तविक अंतर व्यक्तिगत स्तर पर नहीं होता; दरअसल यह अंतर सामूहिक स्तर पर होता है. इंसान पृथ्वी पर इसलिए राज कर पाते हैं, क्योंकि वे अकेले ऐसे जानवर हैं जो बड़े लचीलेपन से और बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार कर पाने में सक्षम हैं.
हां, कुछ और जीव भी हैं- जैसे सामाजिक कीट, मधुमक्खियां, चींटियां- ये भी बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार करते  हैं, लेकिन उनके सहयोग में लचीलापन नहीं होता. वे अत्यंत अनम्य तरीके से सहयोग करते  हैं. मधुमक्खियों के छत्तों का कामकाम सिर्फ एक ही तरीके से चलता है. और अगर कहीं कोई नई संभावना या कोई नया खतरा पैदा हो जाय तो मधुमक्खियां अपनी सामाजिक व्यवस्था को रातों-रात नहीं बदल सकतीं. उदाहरण के लिए, वे अपनी रानी को फांसी के तख्ते पर टांगकर मधुमक्खियों का गणतंत्र या फिर कामगार मधुमक्खियों का साम्यवादी अधिनायकत्व स्थापित नहीं कर सकतीं.
अन्य जानवर, जैसे सामाजिक स्तनधारी- भेड़िए, हाथी, डोल्फिन और चिम्पैंजी- कहीं ज्यादा लचीलेपन के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करते हैं. लेकिन वे ऐसा बहुत छोटी संख्या में कर पाते हैं. क्योंकि चिम्पैंजियों के बीच यह सहयोग एक दूसरे के बारे में बेहद करीबी जानकारी के आधार पर होता है. मैं एक चिम्पैंजी हूं और आप एक चिम्पैंजी हैं और मैं आपके साथ सहयोग करना चाहता हूं. इसके लिए मुझे आपको व्यक्तिगत तौर पर जानना होगा. आप किस किस्म के चिम्पैंजी हैं? क्या आप एक नेक चिम्पैंजी हैं? क्या आप एक दुष्ट चिम्पैंजी हैं. क्या आप पर भरोसा किया जा सकता है? अगर मैं आपको नहीं पहचानता तो मैं कैसे आपके साथ सहयोग कर सकता हूं?
अकेला जीव, जिसे इन दोनों खूबियों- बहुत बड़ी संख्या में और भरपूर लचीलेपन के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करने में महारत हासिल है, वह हम मनुष्य ही हैं- होमो सेपियंस. एक बनाम एक या यहां तक कि 10 बनाम 10 के लिहाज से, चिम्पैंजी हम पर भारी पड़ेंगे. लेकिन अगर आप 1000 इंसानों को 1000 चिम्पैंजियों के सामने खड़ा कर देंगे, तो इंसान आसानी से बाज़ी मार ले जाएंगे. वजह बेहद मामूली कि हजार चिम्पैंजी सहयोगपूर्ण ढंग से कतई नहीं रह सकते. और अगर आप एक लाख चिम्पैंजियों को ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट या वेम्बली स्टेडियम या तिएनमान चौक या वेटिकन में धकेल देंगे तो वहां पूरी तरह अफरा-तफरी मच जाएगी. जरा कल्पना कीजिए- एक लाख चिम्पैंजियों से भरे वेम्बली स्टेडियम की! पागलपन की हद.
इसके विपरीत, इंसान सामान्यतया हजारों-लाखों की तादाद में इकठ्ठा होते हैं और आम तौर पर जरा भी अफरा-तफरी नहीं होती. बल्कि दिखाई देता है सहयोग का अत्यंत परिष्कृत और प्रभावशाली नेटवर्क. समूचे इतिहास में दर्ज़ महान इंसानी उपलब्धियां- चाहे वह पिरामिडों का निर्माण हो या फिर चांद का सफ़र- किसी की व्यक्तिगत क्षमताओं का नतीजा नहीं बल्कि बड़ी संख्या में भरपूर लचीलेपन के साथ मिलजुलकर काम करने की हमारी क्षमता का परिणाम है.
अब इस भाषण को ही लीजिए, जो इस वक्त मैं आपके- लगभग 300 या 400 श्रोताओं- के सामने दे रहा हूं. आपमें से अधिकतर को मैं बिलकुल नहीं जानता. इसी प्रकार, मैं आज के इस आयोजन की योजना बनाने वाले और उसे अंजाम देने वाले सभी लोगों को नहीं जानता. मैं उस विमान के पायलट और उसके क्रू मेम्बर्स को नहीं जानता जो कल मुझे यहां लन्दन लेकर आया. मैं उन लोगों को नहीं जानता जिन्होंने मेरी बातों को रिकॉर्ड करने वाले इस माइक्रोफोन और इन कैमरों को खोजा और बनाया. मैं उन लोगों को नहीं जानता, जिनकी किताबों और लेखों को मैंने इस भाषण की तैयारी के लिए पढ़ा. और निश्चय ही मैं उन तमाम लोगों को भी नहीं जानता जो ब्यूनस आयर्स या नई दिल्ली में कहीं बैठे इंटरनेट पर मेरे इस भाषण को देख रहे हैं. बावजूद इसके कि हम एक-दूसरे को नहीं जानते, हम विचारों के वैश्विक आदान-प्रदान के लिए एक साथ काम कर सकते हैं .
यह एक ऐसी चीज़ है जो चिम्पैंजी नहीं कर सकते. बेशक वे आपस में संवाद कर सकते हैं, लेकिन आप ऐसे चिम्पैंजी को नहीं ढूंढ सकते जो कहीं दूर किसी और चिम्पैंजी झुण्ड को, केलों या हाथियों या उनकी दिलचस्पी के किसी अन्य विषय पर भाषण देने के लिए यात्रा कर रहा हो.
हां, सहयोग बेशक हमेशा किसी अच्छी बात के लिए ही होता हो, ऐसा नहीं है. समूचे इतिहास में इंसानों ने जितने भी वीभत्स कृत्य किए हैं- और आज भी हम कई अत्यंत वीभत्स कृत्य कर रहे हैं- ये सभी काम बड़ी संख्या में किए जाने वाले सहयोगपूर्ण व्यवहार का परिणाम हैं. जेल सहयोग से पैदा होने वाली व्यवस्था है; जनसंहार केंद्र सहयोग आधारित व्यवस्था है; यातना शिविर सहयोग आधारित व्यवस्था है. चिम्पैंजियों के पास जनसंहार केंद्र और जेल और यातनाशिविर नहीं होते.
अब मान लीजिए मैं आपको यह समझाने में सफल हो जाता हूं कि हम धरती पर इसलिए शासन कर पाते हैं क्योंकि हममें लचीलेपन सहित बड़ी संख्या में सहयोग करने की क्षमता है. एक जिज्ञासु श्रोता के मन में इस दावे से तुरंत यह सवाल पैदा हो सकता है: ऐसा हम ठीक-ठीक कैसे कर पाते हैं? तमाम जानवरों से अलग वह कौन सी बात है जो एकमात्र हमें इस तरह सहयोग कर पाने लायक बनाती है?
इसका जवाब है हमारी कल्पनाशक्ति. हम असंख्य अजनबियों के साथ लचीलेपन सहित इसलिए सहयोग कर पाते हैं, क्योंकि इस ग्रह के सभी जीवों में अकेले हम कपोल कल्पनाएं करने व कहानियां गढ़ने और उन पर विश्वास करने में सक्षम हैं. जब तक लोग इन कहानियों में विश्वास करते रहेंगे, वे इसके नियमों, उसूलों और मूल्यों का पालन करेंगे.
बाकी सभी जीव अपने संवाद तंत्र का इस्तेमाल यथार्थ को प्रकट करने भर के लिए करते हैं. एक चिम्पैंजी कह सकता है, "देखो! वहां शेर बैठा है, चलो भाग चलें!" या, "देखो! वो वहां केले का पेड़ है! चलो चलकर केले खाएं!" इसके विपरीत, मनुष्य अपनी भाषा का इस्तेमाल यथार्थ का वर्णन करने मात्र के लिए नहीं करता, बल्कि नए यथार्थ, काल्पनिक यथार्थ गढ़ने के लिए भी करता है. एक मनुष्य कह सकता है, "देखो, वहां ऊपर आसमान में भगवान बैठे हैं! और अगर तुम मेरे कहे अनुसार आचरण नहीं करोगे तो तुम्हारी मृत्यु के बाद वह तुम्हें दंड देंगे. तुम्हें नर्क में भेज देंगे." अगर आप सब मेरी गढ़ी हुई इस कहानी पर विश्वास करेंगे तो आप उसमें सुझाए गए तौर-तरीकों, नियमों व मूल्यों का अनुसरण करने लगेंगे और उसकी मान्यताओं के आधार पर सहयोग करने लगेंगे. यह एक ऐसी चीज़ है जो सिर्फ इंसान ही कर सकते हैं.
आप किसी चिम्पैंजी को यह कहकर नहीं पटा सकते कि "अगर तुम यह केला मुझे दे दोगे तो मरने के बाद तुम्हें चिम्पैंजियों का स्वर्ग नसीब होगा..." "... और अपने अच्छे कर्मों के लिए तुम्हें वहां केले के ढेर के ढेर मिलेंगे."  कोई चिम्पैंजी इस तरह की कहानी में कभी भी विश्वास नहीं करेगा. सिर्फ इंसान ऐसी कहानियों में विश्वास करते हैं. और इसी वजह से हम इस दुनिया में राज कर पाते हैं, जबकि चिम्पैंजी चिड़ियाघरों और प्रयोगशालाओं में कैद रहते हैं. अब आपको यह मानने में कोई दिक्कत नहीं होगी कि धर्म के दायरे में समान किस्से पर विश्वास करने की वजह से मनुष्य परस्पर सहयोग करते हैं.
लाखों लोग एक गिरजाघर या मस्जिद के निर्माण के लिए एकजुट होते हैं. जिहाद या क्रूसेड के नाम पर युद्ध में उतर जाते हैं. क्योंकि वे सब ईश्वर, स्वर्ग और नर्क के बारे में एक जैसी कहानियों में यकीन करते हैं. लकिन मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि यह प्रक्रिया सिर्फ धर्म के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर संपन्न होने वाले मानव सहयोग के अन्य सभी कार्यक्षेत्रों पर भी लागू होती है.
उदाहरण के लिए न्यायिक क्षेत्र को ही लीजिए. आज दुनिया की अधिकतर न्याय-व्यवस्थाएं मानवाधिकारों के ऊपर आस्था पर टिकी हैं. लेकिन ये मानवाधिकार आखिर हैं क्या? मानवाधिकार, ईश्वर या स्वर्ग की तरह हमारी खुद की गढ़ी हुई एक कहानी भर है. ये वस्तुगत यथार्थ नहीं हैं. ये होमो सेपिएंस सम्बंधी ठोस जैविक प्रभाव नहीं हैं.
एक आदमी के शरीर को काट कर खोलिए, अन्दर झांकिए. वहां आपको दिल, गुर्दे, तंत्रिकाएं, हार्मोन और डीएनए आदि मिलेंगे लेकिन कोई अधिकार कहीं नहीं मिलेगा. एकमात्र जगह जहां ये अधिकार पाए जाते हैं वह है हमारी गढ़ी हुई कहानियां, जिन्हें हमने पिछली कुछ सदियों में खूब फैलाया है. ये निहायत सकारात्मक और बहुत अच्छी कहानियां हो सकती हैं, मगर फिर भी ये हमारी गढ़ी हुई निरी कपोल-कल्पनाएं ही हैं.
यही बात राजनीतिक क्षेत्र पर भी लागू होती है. आधुनिक राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं राज्य और राष्ट्र. लेकिन ये राज्य और राष्ट्र हैं क्या? ये वस्तुगत यथार्थ नहीं हैं. एक पहाड़ वस्तुगत यथार्थ है. आप इसे देख सकते हैं, छू सकते हैं और यहां तक कि इसकी गंध महसूस कर सकते हैं. लेकिन एक राष्ट्र या राज्य, जैसे- इजराइल या ईरान या फ़्रांस या जर्मनी- महज एक किस्सा है, जिसे हमने गढ़ा और जिसके साथ बेइंतहा चिपक गए.
यही बात आर्थिक क्षेत्र पर भी लागू होती है. वैश्विक अर्थ व्यवस्था में आज सबसे महत्वपूर्ण कर्ता हैं कम्पनियां और कॉर्पोरेशन. आप में से कई इनके लिए काम भी करते होंगे- जैसे गूगल या टोयोटा या मैकडोनाल्ड. ये चीज़ें दरअसल हैं क्या? ये वकीलों की गढ़ी हुई कहानियां हैं. ये उन शक्तिशाली जादूगरों की खोजी और संजोई हुई कहानियां हैं, जिन्हें हम कानूनविद कहते हैं. और ये कॉर्पोरेशन दिन-रात क्या करते रहते हैं? आम तौर पर वे पैसा बनाने की जुगत में लगे रहते हैं. मगर, यह पैसा क्या होता है? फिर से, पैसा भी कोई वस्तुगत यथार्थ नहीं है. इसकी कोई वस्तुगत कीमत नहीं है. आप इसे खा नहीं सकते, पी नहीं सकते और न ही पहन सकते हैं. लेकिन फिर ये महान किस्सागो आते हैं- बड़े बैंकर, वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री- ये सब हमें बेहद भरोसे-लायक कहानी सुनाते हैं: "देखिये, आप कागज़ के इस हरे टुकड़े को देख रहे हैं? यह असल में 10 केलों के बराबर है." और अगर मैं इस बात में विश्वास करता हूं, आप इसमें विश्वास करते हैं, और हर कोई इसमें विश्वास करता है, तो यह सचमुच काम करने लगती है. मैं कागज के इस बेमोल टुकड़े को लेकर बाज़ार जा सकता हूं और इसे किसी नितांत अनजान व्यक्ति, जिससे मैं अबतक कभी मिला नहीं, को देकर बदले में खाए जाने वाले असली केले ले सकता हूं. यह बात सचमुच आश्चर्यजनक है. आप ऐसा चिम्पैंजी के साथ नहीं कर सकते. लेनदेन बेशक चिंपैंजियों में भी होता है: "हां, तुम मुझे एक नारियल दो, मैं तुम्हें एक केला दूंगा." यह काम करता है. लेकिन तुम मुझे कागज़ का एक बेकार सा टुकड़ा दो और उम्मीद करने लगो कि मैं तुम्हें एक केला दे दूं? बिलकुल नहीं! तुम क्या सोचते हो मैं कोई इंसान हूं? पैसा असल में मनुष्यों द्वारा खोजी और सुनाई गयी अब तक की सबसे सफल कहानी है. क्योंकि यही वह कहानी है जिस पर हर कोई विश्वास करता है.
हर कोई ईश्वर पर विश्वास नहीं करता. न ही हर आदमी मानवाधिकारों पर विश्वास करता है. राष्ट्रवाद पर भी हर किसी को यकीन नहीं. लेकिन नोटों की शक्ल में पैसे पर हर कोई यकीन करता है. ओसामा बिन लादेन को ही लीजिए. उसे अमेरिकी राजनीति, वहां के मजहब और संस्कृति से नफरत थी. लेकिन उसे अमेरिकी डॉलर से कोई दिक्कत नहीं थी. असल में वह उन्हें काफी चाहता था.
अंत में: हम मनुष्य धरती पर इसलिए राज कर पाते हैं क्योंकि हम दोहरी वास्तविकता में जीते हैं. शेष सभी जीव वस्तुगत यथार्थ में जीते हैं. उनके यथार्थ में वस्तुगत चीज़ें शामिल हैं, जैसे- नदी, पेड़, शेर और हाथी. हम इंसान भी वस्तुगत यथार्थ में जीते हैं. हमारी दुनिया में भी नदियां हैं, पेड़ हैं और शेर-हाथी वगैरह हैं. लेकिन सदियों से हमने अपने वस्तुगत यथार्थ के ऊपर मनोगत यथार्थ की एक और परत चढ़ा दी है. यह यथार्थ कल्पना से उपजी चीज़ों से बना है, जैसे- राष्ट्र, ईश्वर, पैसा और जैसे कॉर्पोरेशन. और हैरानी की बात यह है कि जैसे-जैसे इतिहास आगे बढ़ा, मनोगत यथार्थ और मज़बूत होता चला गया. आज दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियों में यही काल्पनिक वस्तुएं हमारे सामने हैं. आज नदी, पेड़, शेर और हाथी जैसे वस्तुगत यथार्थ का अस्तित्व भी अमेरिका, गूगल, विश्व बैंक जैसी उन काल्पनिक शक्तियों के निर्णयों और इच्छाओं पर निर्भर है, जिनका अस्तित्व सिर्फ हमारे मनोगत संसार में है. धन्यवाद. 

[अनुवाद एवं प्रस्तुति: आशुतोष उपाध्याय]


Wednesday, August 26, 2015

एक क़स्बे की कथाएँ - 4


हल्द्वानी के किस्से - 4

जल के असंख्य नाम होते हैं. मेरे एक परम सखा के भी ऐसे ही असंख्य नाम हैं. कोई तीसेक साल पहले एक दफा होली के मौसम में उन्होंने बाबा तम्बाकू के टीन के डिब्बे में छेद कर और उस छेद में से घासलेट में भीगी सुतली को गुजारकर पागल कुत्ते की आवाज़ निकालने वाली मशीन का आविष्कार किया था. इस मशीन की मदद से वे अपने घर के बाहर से गुजरने वाले हर आदमी, विशेषतः बूढ़ों के प्रति अपने सीजनल अनुराग का प्रदर्शन किया करते. अपनी पीठ पीछे अचानक आ धमके पागल कुत्ते की आवाज़ सुनकर बूढ़े धरती से कोई डेढ़ फुट हवा में उछल जाते थे. भाग्यवान बूढ़े धरती माता की शरण में पहुँच जाया करते और जो कम भाग्यवान होते उन्हें केवल अपने चेहरे पर आ गए खौफ़-ए-अज़ल भर से काम चलाना पड़ता था. इसमें मेरे मित्र का और मित्र के अनुसार बूढ़ों का खूब मनोरंजन होता था. उनका विचार था कि हमारे जीवन में और ख़ासतौर पर रिटायर्ड लोगों के जीवन में स्वस्थ मनोरंजन की बहुत कमी है. यही उनका स्थाई दर्द था और कुत्ता मशीन बनाने की प्रेरणा. इस महामना कर्म के एवज़ में उन्हें आसपास के मोहल्ले तक में सुतली नंगा और उनके शिष्यटोले में सुतली उस्ताद के नामों से संबोधित किये जाने का एज़ाज़ हासिल हो गया.

जब हमारे मोहल्ले में पान-बीड़ी की पहली दुकान खुली तो उसका उद्घाटन मेरे इन्हीं मित्र के हाथों हुआ. हाईस्कूल के इम्तहान में चौथी दफ़ा असफलता मिलने के बाद मेरे एक और सखा नब्बू डीयर, जिनकी जीवनगाथा मैं फिर कभी लिखूंगा, ने लगातार फेलियर कहे जाने के सुख का मोह त्यागकर इस दुकान को खोला था. दुकान सरकारी नर्सरी में आई आम की पेटियों से निकली फंटियों और सरकारी नर्सरी के ही साइनबोर्डों इत्यादि पदार्थों से बनाया गया इस कार्य में लगने वाली मेहनत के लिए नर्सरी के चौकीदार को भागीदार बनाने का काम सुतली उस्ताद ने ही किया था क्योंकि चौकीदार की निगाह में सुतली ही मोहल्ले का इकलौता शिक्षित और सभ्य इंसान था जो बिना फीस लिए उसके इकलौते बच्चे को पढ़ाया करता था. यह अलग बात है कि उसका बच्चा सातवीं में दो साल से फेल हो रहा था. उद्घाटन कार्यक्रम सुतली उस्ताद से ही कराये जाने की शर्त पर ही चौकीदार ने दुकान-निर्माण में योगदान दिया था.

तो बिना छत कीनब्बू डीयर की दुकान के उदघाटन की रस्म के तौर पर जब सुतली ने फ़ोकट कैपिस्टन का पहला सुट्टा खींचा, उनके नाम के आगे सुट्टन की उपाधि लग ही जानी थी. अगले सात माह तक नब्बू डीयर सुतली को फिरी-फ़ोकट कराता रहा. शनैः शनैः सुतली ने स्वाध्याय से चरस पीने में पीएचडी हासिल कर ली और इस शोध में नब्बू डीयर को अपना रिसर्च असिस्टेंट बनाया. सुतली चरस के सेवन से पहले घर पर खाना भकोस कर आता था जबकि नब्बू डीयर के घर हर बखत फाके चला करते. अंततः जीवन से विरक्त होकर दुकान को एक रात आग के हवाले कर नब्बू डीयर संन्यासी बन गया अर्थात घर से भाग गया. कोई कहता वह गोपेश्वर चला गया है कोई कहता उसने मुरादाबाद में एक्सपोर्ट का काम शुरू कर दिया है. नब्बू की अम्मा अलबत्ता कुछ नहीं कहती थी, पुत्र के नाम का ज़िक्र चलते ही अपनी आँखों के कोरों पर अपनी मैली धोती चिपका लेती. नब्बू-पलायन प्रकरण के बाद चरस ठूंसने की समर ट्रेनिंग कर रहे नए छोकरों की निगाह में सुतली ईश्वर हुआ चाहते थे. नब्बू की जली हुई दुकान के खंडहरों पर बड़े बड़े पत्थरों की सुरक्षित आड़ में उन्होंने एक मंदिर का निर्माण किया जिसे सुट्टन चरस के आस्ताने के नाम से ख्याति मिली.

इस तरह अच्छे भले जमुनादत्त पुत्र गंगादत्त को पहले सुतली नंगा फिर सुतली उस्ताद और फिर सुट्टन चरस के नाम दे दिए गए. हमारे देश का इतिहास गवाह है महापुरुषों की सर्जना ऐसे ही होती रही है.

पढ़ाई और कामधाम के चक्कर में मेरा हल्द्वानी से सामान बंध तो गया लेकिन मन यहीं रमा रहा. चिठ्ठी-फोन इत्यादि से मालूम पड़ता था सुतली ने पहले चरस और उसके बाद लकड़ी की तस्करी में हाथ डाला. इस दूसरे काम ने उसे क्रमशः सुतली लठ्ठ, सुतली फर्री, सुतली जड़िया, सुतली धरमकाँटा, सुतली लेलेण्ड और सुतली जंगलात जैसे नामों से विभूषित किया. हल्द्वानी में निर्माण कार्य की धूम मचना शुरू हुई तो पूर्ववर्ती धंधों में अटैच्ड रिस्क से निजात पाने की नीयत से उसने रेता बजरी की खदानों में हाथ आज़माया. यहाँ अकूत धन था और सुतली के पास उसे कमाने की कूव्वत. एक बड़ा सा प्लाट खरीदकर सुतली गौला नदी के उस पार जा बसा और दुनिया उसे सुतली गारा कहने लगी. सुतली गारा से वापस श्री जमनादत्त पुत्र स्व. श्री गंगादत्त बनने में सुतली ने सबसे मुफीद हिन्दुस्तानी दांव खेला. ज़मीन का धंधा और जनसेवा. यह दांव भी सदा की तरह निशाने पर लगा और नियतिचक्र ने सुतली को पहले अमीर आदमी फिर ग्राम प्रधान और बाद में ब्लॉक सदस्य बनवा दिया. सुतली नाम से उसे लोग अब सामने से नहीं बुलाते थे. उसमें सुतली के क्रोधित हो जाने का भय था और सुतली अब वह पुराना आविष्कारक भर नहीं रहा था जो घासलेट में सुतली डुबोकर तम्बाकू के खाली डिब्बे से पागल कुत्ते की आवाज़ निकालता था. सुतली को नागरों और ज़माने ने हल्द्वानी के सबसे संपन्न और आदरणीय लोगों में प्रतिष्ठित कर दिया था.

मेरा सुतली से सीधा संपर्क लम्बे समय तक कटा रहा था और हमारे बीच जैसा कि मुहावरे में कहा जाता है पुल के नीचे से भतेरा पानी बह चुका था. तो कहने का मतलब यह है कि जब मैंने हल्द्वानी लौटने का फैसला किया तो इससे यह साबित नहीं होता था कि सुतली इतने सालों से मेरी बाट जोह रहा था. वह मेरी स्मृति के उन गुप्त तहखानों में जा बसा था जहां खुद मैं भी बहुत मेहनत कर के ही पहुँच सकता था. इसके अलावा यह भी बात थी कि वह मेरी किसी भी तात्कालिक आवश्यकता का हिस्सा भी नहीं था. हमारे रास्ते अलग हो चुके थे.

कोई दो साल पहले घर पर घंटी बजी तो सुतली को आया देख मुझे हैरानी और खुशी दोनों का मिलाजुला अनुभव हुआ. मैं उसे तकरीबन पच्चीस सालों बाद सशरीर देख रहा था. हाल ही में स्थानीय अखबार में उसकी एकाधिक बार फ़ोटो मुझे दिखी थी लेकिन वह इतना बदल गया होगा मुझे उम्मीद न थी. उसने उम्दा काट के कपड़े पहने हुए थे, तनिक मुटा गया था और पहली निगाह में सम्मानीय समझे जाने लायक लग रहा था. हम गले मिले उसने माँ की खबर पूछी, तीन साल पहले गुज़र गए पिताजी की फ़ोटो को स्पर्श कर प्रणाम किया. हमने बहुत देर तक अपने मोहल्ले के नब्बूडीयर युग को याद किया और भरसक नोस्टाल्जिक होते रहे. हमने दिन का खाना भी साथ खाया. वह लौटने के मूड में नहीं लगता था. धीरे धीरे मेरे बिस्तर पर लुढ़क गया और बाकायदा दो घंटे सोता रहा.

शाम हो गयी थी. वह उठकर दो कप चाय सूत चुका था और अब बोतल खोलने का प्लान बना रहा था. मुझे लगा उसके बच्चे बाहर गए होंगे और उसने समय काटने की नीयत से मेरे घर का रुख किया होगा. वरना उसका मुझसे क्या काम. मैं अनमना सा उसके साथ बाहर जाने को तैयार होने लगा तो वह अभी आया पंडितकहकर बाहर चला गया.

यार आज बच्चों ने ये दिला दिया हैकहते हुए उसने अचानक कमरे में एंट्री ली और अपने साथ गाड़ी से निकाल कर लाये झोले के भीतर से चमचमाता लैपटॉप निकालते हुए कहा. मुझे गश आते-आते बचा.

कैसा है?” उसके चेहरे पर किसी महंगी चीज़ पर पैसे खर्च कर देने का कोई भी भाव नहीं था.

अच्छा बुरा तो छोड़ सुतली लेकिन ये बता यार तू इसका करेगा क्या. वो भी इस उमर में.

अरे यार पंडित, पढ़ाई के लिए बेटा दिल्ली भेज रखा है पिछले महीने से. वाइफ भी उसी के पास है. फोन करता हूँ तो बेटा कहता है पापा फेसबुक किया करो फेसबुक किया करो. वाइफ कहती है मैं कर लेती हूँ तो तुमसे कैसे नहीं होता फेसबुक. अब हमने बखत में कोई पढ़ाई कर रखी होती तो करते ना साले फेसबुक ... बाबू ने शादी भी साली एम ए पास से करा दी हुई यार पंडित. क्या लाटापंथी है साली ...

चेहरे पर गोपनीयता का भाव लाते हुए वह फुसफुसाया मुझे कम्प्यूटर सिखा दे यार पंडित. मना मती करियो भाई.

यह मेरे लिए बहुत ज़्यादा बड़ी डोज़ हो गयी थी सो रात की हत्या करने के लिए पूरी बोतल निबटाने से बेहतर कोई रास्ता था भी नहीं.

अगले दिन से मैं सुतली के इस नवीनतम साइबरावातार के चक्करों में लिपझ गया. पहले तो उसे ढंग से माउस पकड़वाना सिखाने में दिन भर की ऐसी-तैसी हुई फिर वह सीधे पोर्नोग्राफी डाउनलोड करने के तरीके सीखने पर आ गया. मेरे झिड़कने पर उसने पोर्नोग्राफी का आइडिया पोस्टपोन कर दिया और ताश के पत्तों वाले खेल में दूसरे ही दिन महारत हासिल कर ली. वह सुबह दस बजे मेरे दरवाज़े पर होता और गलत नहीं कहूँगा उसकी यह कर्मठताभरी जिद मुझे अच्छी लगने लगी थी. मैंने अपने भीतर के अध्यापक को झकझोर कर जगाया और जी जान से सुतली को बिल गेट्स बनाने में जुट गया. दिन भर तल्लीन होकर कम्प्यूटर पर हाथ साफ़ करने में सन्नद्ध सुतली को देखते मुझे लगने लगा था जैसे इतने सालों में उसके बारे में सुनी गयी सारी बातों में कोई सच्चाई नहीं थी. उसके फोन भी बहुत कम आते थे. जो आते भी थे उन्हें वह घर के बाहर जाकर अटैंड करता था और वापस आकर पहले से अधिक उत्साह से इस नवीं ज्ञान की बारीकियां समझने की कोशिश करता.

चौथे दिन जब वह ठीकठाक ऑपरेट करने लगा तो मैंने उसे फेसबुक दिखा कर उसका अकाउंट बनवा दिया.

पांचवे दिन मुझे बाहर जाना था. सुतली चौबीस घंटों में एक्सपर्ट फेसबुकिया बन चुका था और उसके फ्रेंड्स में उसके बीवी बच्चों के अलावा मेरी भी एंट्री हो चुकी थी. वह तीसेक लोगों की लिस्ट में शुमार था.

मेरे लौटने में कोई तीन सप्ताह लगे. दो एक बार सुतली का फोन आया. लेकिन औपचारिकता वाला ही. मैं पूछता फेसबुक कैसा चल रहा है सुतली गुरु?” तो वह मुदित होकर कहता चीज तो अच्छी बनाई यार अमरीकावालों ने. कल बेटे ने वाइफ के साथ पिक्चर देखी तो उसकी फ़ोटो देखने को मिल गयी. सही चीज़ है पंडित यार.

एक दिन उसने अपनी सेल्फी अपलोड की. दो घंटे बाद दूसरी. अगले दिन पूरा अल्बम था दो साल पुरानी गोवा यात्रा का. प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ उसकी एक फ़ोटो पर पैंतालीस लाइक्स आये. एमएपास बीवी की स्कर्ट वाली फ़ोटो लगाई तो उस पर दो सौ से ऊपर. फ़ोटो उसने हटा दिया. फ्रेंड लिस्ट में उसे जाननेवाले अब पांच सौ हुआ चाहते थे.

फिर मैं लौट आया. सुतली अगले छः माह तक नज़र नहीं आया. अखबारों में उसकी नियमित फ़ोटो लगती. एक दफा उसने नगरपालिका लाइब्रेरी की बदहाली को लेकर इंटरव्यू दिया था तो एक दफा उसे पुलिस ने शांतिभंग की आशंका में हिरासत में ले लिया था.

फेसबुक पर उसकी अपडेट्स बेहद बेसिक और भोली होती थीं. उनकी संख्या अलबत्ता अब कम होती जा रही थी.

यार पंडित फेसबुक पे लोगों को टैग कैसे करते हैं?” छः महीने के अंतराल पर उसका फोन आधी रात के बाद आया. वह बेतरह हंस रहा था और पार्श्व की गूंजें बता रही थीं कि वह अपनी मंडली के साथ पार्टी कर रहा है.

एक माह बाद मैंने अखबार में उसकी फ़ोटो देखी. जेल में था सुतली. एसडीम को धमकाने के आरोप में.

फिर सुतली बाहर था. सुतली पर मुकदमा चल रहा था. सुतली का बेटा नशेड़ी हो गया था पूना में उसका इलाज चल रहा था. सुतली ने हमारे मोहल्ले में स्कूल की बिल्डिंग खरीद ली थी और वह उसे बैंकेट हॉल में बदलने ला रहा था.

सुतली एक दिन मिल ही गया. एक शादी थी. वह अपने असल चरित्र में था. काला चश्मा, कमर में पिस्तौल वाली चमड़े की पेटी, ००७ नंबर की लम्बी गाड़ी और चमचों की बरात.

अरे पंडित गुरु, क्या हाल!उसने उत्साहपूर्वक मुझे गले लगाया.

बस ठीक है यार सुतली. तू बता कैसा चल रहा है तेरा फेसबुक.

अरे छोड़ यार, तू बता माँ कैसी हैं आजकल? मैं जल्दी आ रहा हूँ रस-भात खाने. उनके हाथ का स्वाद उस दिन से भूला कौन साला है यार पंडित.

हमें तू-तड़ाक करता देख उसके चमचों के चेहरों पर मेरे लिए थोड़ी सी एक्स्टेम्पोर इज्ज़त भभक आई.

उसकी गाड़ी के भीतर हम अपना दूसरा पैग खींच रहे थे जब वह अचानक बोला साली फेसबुक ने जीना हराम कर दिया यार. आधी आधी रात पैन्चो फोन में टुणुन्ग टुणुन्ग. सुबह हगने जाओ तो साली फोन में टुणुन्ग टुणुन्ग. इसका फ़ोटो देखो उसकी फ़ोटो देखो. बीजेपी वाले की लाइक करो तो साले कांग्रेसी नाराज़. कांग्रेसी की लाइक करो बीजेपी वालों की पिछाड़ी में चरस. बेटे ने अलग अपनी साली फ़ोटो लगा लगा के दिक कर रखा था. साले हाथ भर के हुए नहीं गर्लफ्रेंड के साथ बीयर सूत रहे हैं बाप के पैसों से. हमें गधा समझा है साला. फेसबुक पे सब दिख जाता है. बड़ी दिक्कत है यार पंडित. चल खींच ना! एक और ठोकते हैं.

माह भर बाद उसका फिर से फोन आया पंडित यार फेसबुक बंद कैसे करते हैं.

अबे हुआ क्या सुतली बाबू?”

कुछ नहीं यार. बड़ी कुत्ती चीज़ है साली. इतना टाइम बर्बाद होता है दिनमान भर. पिछली दीवाली के टाइम पे दारू पी के साला वो वाइफ के फादर को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी एक दिन. उसका अकाउंट भी वाइफ ने ही बनाया था. वाइफ भी वहीं थी उन दिनों देहरादून. बुड्ढा निकला रंगीला सायर. रोज़ सुबह से आधी रात तक हर दस मिन्ट में पैन्चो एक सायरी. लाइक करो तो आफ़त. न करो तो आफ़त. वाइफ अलग नाराज़. आपने पापा की सायरी लाइक नहीं की. अबे खच्चर हैं साले यार हम कोई. फोन में साली हर बखत टुणुन्ग टुणुन्ग. आज बुड्ढे ने परिवार की फ़ोटो लगाई हैं. मेरी भी है एक. जेल से बाहर निकलते हमारे जामाता ये लिख के टैग किया है साले ने.

इस वाकये को साल बीतने आया. कहाँ हो सुतली उस्ताद? 

Monday, August 3, 2015

ऐ री धन-धन भाग मोरे - पंडित वेंकटेश कुमार

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पंडित वेंकटेश कुमार का नाम उतना “विख्यात” नहीं है लेकिन आपको उनके बारे में जानना ही चाहिए. उनके गायन के बारे में इन्डियन एक्सप्रेस ने कुछ समय पहले एक लेख छापा था जिसका अनुवाद यहाँ आपके लिए पेश किया जा रहा है-


कुछ बरस पहले कलकत्ता में एक संगीत सभा में, जहाँ पंडित वेंकटेश कुमार का नाम किसी ने भी नहीं सुन रखा था, यह संकोची गायक बमुश्किल श्रोताओं की तरफ निगाह डाल रहा था और उस राग को अनाउंस करने में भी उसे संकोच हो रहा था जिसे वह गाने वाला था. दो-एक मिनट के भीतर ही उसने राग पूरिया के अपने गांधार और निषाद से श्रोतामंडली को बाँध लिया. विलम्बित का आधा होते होते करीब 2000 के आसपास मौजूद श्रोता जानते थे कि वे एक दुर्लभ कलाकार से रू- ब-रू थे. स्पष्टतः पंडित वेंकटेश कुमार एक ऐसे संगीतकार थे जिन्हें उन्होंने सुन चुका होना था, लेकिन सुना नहीं था. हॉल में श्रोताओं के बीच बांटे गए संगीतकारों का जीवनपरिचय देने वाले ब्रोशर्स को उलटने की परिचित कागज़ी आवाज़ आने लगी थी.

उसमें श्रोताओं को एक पैराग्राफ़ का नोट हासिल हुआ. हासिल किये गए इनामात और विदेशी दौरों की सूची गायब थी जो इस बात का सबूत थी कि कलाकार अभी विख्यात नहीं है. इकलौता परिचित शब्द था – धारवाड़ – उत्तरी कर्नाटक का वह इलाका जहां पंडित जी का घर है. धारवाड़ ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को गायन की अनेक हस्तियाँ दी हैं जिनमें पंडित भीमसेन जोशी भी सम्मिलित हैं.  

जैसे-जैसे गायन बढ़ता गया, उनकी गायकी में से भीमसेन जोशी की स्मृतियों ने उभरना शुरू किया – ख़ास तौर पर वह पौरुष से भरा खारापन और पुकार की स्पष्टता – और संगीत संध्या के समाप्त होते न होते कलकत्ता वाले कला को लेकर अपनी अति-संवेदनशीलता के चलते तकरीबन पगला चुके थे. इस कलाकार को पहली बार सुनने वाले हर किसी के मन में यही संशय चल रहा था – पचास पार का एक आदमी है जो उतना ही अच्छा गा रहा है जितना स्थापित उस्ताद गाया करते हैं लेकिन उसे कोई जानता तक नहीं. उसकी चर्चा तब क्यों नहीं हुई जब वह उभर रहा था?

कुमारजी हमेशा धारवाड़ में ही रहे हैं. उनका जन्म लक्ष्मीपुरा में हुआ और 12 की आयु में उन्होंने मिथकीय ख्याति रखनेवाले संत और बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न हिन्दुस्तानी संगीतकार पुत्तुराजा गवई द्वारा संचालित वीरेश्वर पुन्याश्रम में दाखिला लिया. कुमारजी ने अपने मामा की राय पर यहाँ दाखिला लिया था. मामाजी स्वयं कन्नड़ थियेटर आर्टिस्ट थे. कुमार जी के पिता एक लोकगायक थे और अपने बेटे के लिए हिन्दुस्तानी वोकल की औपचारिक तालीम का ख़र्च उठा सकने की स्थिति में नहीं थे. आश्रम में जाकर यह तालीम संभव हुई जहां उन्होंने गवई महाराज से 11 साल तक सीखा. अंततः उन्होंने अध्यापन शुरू कर दिया जो वे आज तक कर रहे है – धारवाड़ के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक में.

(अरुणाभ देब की लिखी और 18 अगस्त 2012 को इन्डियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट पर आधारित)

प्रस्तुत है पंडित वेंकटेश कुमार का गाया राग दुर्गा. अलौकिक प्रस्तुति है यह. इस लिंक तक पहुंचाने के लिए अन्यतम मित्र आशुतोष उपाध्याय का शुक्रिया -

उन इलाकों की हिफाज़त में ख़र्च हुए हम - "ठुल्ले" की कविता

फ़ोटो http://news.xinhuanet.com/ से साभार

वे साधारण सिपाही जो कानून और व्यवस्था में काम आए

-संजय चतुर्वेदी

शायद कुछ सपनों के लिए
शायद कुछ मूल्यों के लिए
कुछकुछ देश
कुछकुछ संसार
लेकिन ज़्यादातर अपने अभागे परिवारों के भरणपोषण के लिए
हमने दूर-दराज़ रात-बिरात
बिना किसी व्यक्तिगत प्रयोजन के
अनजानी जगहों पर अपनी जानें लगाई
जानें गंवाई

हम कानून और व्यवस्था की रक्षा में काम आए
लेकिन हमारे बलिदान को आंकना
और उस बलिदान के सारे पहलुओं को समझना
एक आस्थाहीन और अराजक कर देने वाला अनुभव रहेगा

जो अपने कारनामों के दम पर
इस मुल्क की सड़कों पर चलने का हक़ भी खो चुके थे
हमें उनकी सुरक्षा में अपनी तमाम नींदें
और तमाम ज़िन्दगी ख़राब करनी पड़ी
उन्माद और साम्प्रदायिकता का ज़हर और कहर
सबसे पहले और सबसे लम्बे समय तक हम पर गिरा
हम उन इलाकों की हिफाज़त में ख़र्च हुए
जहां हमारे बच्चों का भविष्य चुराकर
काला धन इकठ्ठा करने वालों के बदआमोज़ लड़के-लड़कियां
शिकार करें और हनीमून मनाएं
या उन विवादास्पद संस्थाओं की सुरक्षा में
जहां अन्तर्राष्ट्रीय सरमाए के कलादलाल
हमारी कीमत पर अपनी कमाऊ क्रांतियां सिद्ध करें

हमें बंधक बनाया गया
या शायद हम जब तक जिये बंधक बनकर ही जिये
लेकिन हमारे सगे-संबंधी इतने साधन सम्पन्न नहीं थे
कि राजधानी में दबाव डाल सकते
और उन्होंने हमारे बदले किसी को रिहा कर देने के लिए
छातियां नहीं पीटीं
हम यातना सहते हुए ही मरे
लेकिन हमारे बीवी-बच्चे जो आज भी बदहाल हैं
हवाई जहाज़ पर उड़ने वाले नहीं थे
इसलिए न उन्हें पचास हज़ार डालर मिले
न फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन के मौसेरे पुरस्कार

और यह हम तमाम गीतों और प्रार्थनाओं के बीच कह रहे हैं
कि हमारे अपने अफसरों नें
जिन्हें ख़ुद एक सिपाही होना था
हमें अपने घर झाड़ुओं की तरह इस्तेमाल किया
और यह भी हम तमाम गीतों और प्रार्थनाओं के बीच कह रहे हैं
कि कोई उल्लू का पट्ठा इतना अच्छा होगा
जो अपनी आंखों
और अपने दिमाग़ के सारे सितारों के साथ हमें बताए
कि अपने बीवी-बच्चों के साथ
जिस तरह की ज़िन्दगी जिए हम
वह क्या किसी देशी-विदेशी महापरिषद में
कभी कोई महत्वपूर्ण एजेंडा रही

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नोट: जनसत्ता में वर्ष 2000 में छपी संजय जी की इस कविता को पढ़ते हुए देश के एक नव-महामना की ज़बान की एक यह बानगी भी देखी ही जानी चाहिए -