Friday, April 12, 2013

उत्तर पूर्व की कविताएं - ८


मुझे चाहिए
     - ममांग दाई
(उत्तर पूर्व की कविताओं के क्रम में आज प्रस्तुत है अंग्रेजी में लिखने वाली अरुणाचली कवि ममांग दाई की एक और कविता। अनुवाद सिद्धेश्वर सिंह का है)

मेरे प्रियतम
मुझे चाहिए
प्रात:काल का महावर
मुझे चाहिए
ढलती दोपहर की स्वर्णिम सिकड़ी
मुझे चाहिए
चन्द्रमा की पायल
ताकि मैं नृत्य कर सकूँ
पुन: तुम्हारे संग।

मुझसे साझा करो
अपने हृदयंगम रहस्य
अपनी साँसें दो मुझे
फिर से।
कथायें सुनाओ मुझे मानवीय भूलों की
और बतलाओ
कि क्यों परिवर्तित नहीं होता है प्रतिबिंब।

Thursday, April 11, 2013

उत्तर पूर्व की कविताएं - ७


जन्म स्थान
         - ममांग दाई

(ममांग दाई न केवल पूर्वोत्तर  बल्कि समकालीन भारतीय  अंग्रेजी लेखन की  एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर है। वह पत्रकारिता ,आकाशवाणी और दूरदर्शन ईटानगर से जुड़ी रही हैं । उन्होंने कुछ समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी भी की , बाद में छोड़ दी । अब स्वतंत्र लेखन । उन्हें `अरूणाचल प्रदेश : द हिडेन लैण्ड´ पुस्तक पर पहला `वेरियर एलविन अवार्ड ` मिल चुका है साहित्य सेवा के लिए  वे  पद्मश्री सम्मान से नवाजी गई हैं।  प्रस्तुत हैं  ममांग दाई की एक कविता जो उनके के संग्रह `रिवर पोएम्स´ से साभार ली गई हैं।कविता का अनुवाद सिद्धेश्वर सिंह का है. )

हम बारिश के बच्चे हैं
बादल - स्त्री की संतान
पाषाणों के सहोदर
पले है बाँस और गुल्म के पालने में
अपनी लंबी बखरियों में
हम शयन करते हैं
जब आती है सुबह तो पातें है स्वयं को तरोताजा।

हमारी उपत्यका में
कोई नहीं अजनबी - अनचीन्हा
तत्क्षण प्रकट हो जाता है परिचय
हम बढ़ते जाते है वंश दर वंश।
बहुत साधारण है हमारा प्रारब्ध।
किसी हरे अँखुए की तरह
अपनी दिशा में तल्लीन
हम अग्रसर होते हैं अपने पथ पर
जैसे चलते हैं सूर्य और चंद्र।

जल की पहली बूँद ने
जन्म दिया मनुष्य को
और रक्तिम आच्छद से हरित तने तक
विस्तारित करता रहा समीरण।

हम अवतरित हुए हैं
एकान्त और चमत्कार से।

Tuesday, April 9, 2013

उत्तर पूर्व की कविताएं - ५



बिक्री के लिए

-पाल लिंगदोह

(खासी कवि पाल लिंगदोह का जन्म १९७२ में शिलोंग में हुआ था. उनका एक द्विभाषिक काव्य-संग्रह प्रकाशित है. वे का खुन हाइनीत्रिप नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट के संस्थापक अध्यक्ष रहे. यह पार्टी खासी स्टूडेंट्स यूनियन के समर्थन से बनी. अनुवाद गोपाल प्रधान का है.)

बिकाऊ है
यह गीली, रमणीय भूमि अपनी समस्त लाभकारी योग्यता के साथ
हमारे बेशकीमत खनिज औषधीय वृक्ष दुर्लभ ऑर्किड
वृक्ष भूमि और जल
सब कुछ और बहुत भी कुछ.
बिकाऊ हैं
इस धरती की ही तरह सुन्दर, वर्णीय युवतियां
मैदानी लोगों को वर बनाना शोभता है हमें
वैसे तो समुन्दर पार के पुरुष भी अपनाने में हर्ज नहीं
बस थोड़ी योग्यता हो
(विवाहित, विधर्मी या विजातीय सब स्वीकार हैं)
तोंद जिन्हें हो
या हाल फिलहाल निकलने की सम्भावना हो
वे ही आवेदन करें.
बिकाऊ हैं
कंकड़ी जैसे आदिम जनजातीय मूल
इन्हीं से प्रगति का रथ आगे बढ़ता है
हम तो हम से दूर हुए जाते हैं
हम ही हम से लगातार लज्जित हैं.
बिकाऊ हैं
अभिमान, मूल्य और काम करने की आदत
लज्जा बोध और अंतरात्मा
संपर्क सूत्र चाहिए?
ज़रूरत नहीं
हमारे दलाल सर्वत्र विराजमान हैं
सड़क पर आप संपर्क कर लें उनसे खुले खजाने. 

Monday, April 8, 2013

उत्तर पूर्व की कविताएं - ४




मूर्तिकार
- अनुपमा बसुमतारी

(असमिया कवयित्री अनुपमा बसुमतारी का जन्म १९६० में ग्वालपाड़ा जिले के दारांगमिरि में हुआ था. उनके तीन काव्यसंग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. वे एल.आई.सी. गौहाटी में कार्यरत हैं. उन्हें भारतीय भाषा परिषद का ‘ईशान सम्मान’ प्राप्त है. कविता का अनुवाद गोपाल प्रधान का है.)

मैंने पत्थर का परिधान पहना था
गहने भी पत्थर के
पत्थर के इन होंठों से
बोलना तो संभव ही नहीं था.
वह आया मुझे देखा
पत्थर के टुकड़े जैसे अंगों में झाँका
फिर आहिस्ता से छुए उसने
मेरे स्तन, होंठ और आंसू.
मेरे पथरीले बदन से बाहर खींचकर
उसने पत्थर के एक और टुकड़े में
उकेर दिया.
पता नहीं उसके हाथों की
जादुई छुअन थी
या दो दिलों की चाह
कि एक दिन मेरा
पत्थर दिल धडकने लगा
मेरे हाथ बाहर निकले
और उसे आगोश में ले लिया.
फिर मैं
भरपूर औरत बन गयी.

Sunday, April 7, 2013

उत्तर पूर्व की कविताएँ – ३



फफूँद

-किनफम सिंग नोंकिनरिह

(खासी कवि किनफम सिंग नोंकिनरिह का जन्म १९६४ में सोहरा में हुआ था. उनके दो काव्य संग्रह अंग्रेज़ी में और तीन खासी में छप चुके हैं. फिलहाल वे नेहू, शिलांग में प्रकाशन विभाग में कार्यरत हैं)

घर के भीतर जहां रहता हूँ
बहुत ठंड और अँधेरा है.
इतनी ठंड कि कभी पता भी नहीं चलता
दिन कितना गरम है,
इतना अँधेरा कि कभी पता नहीं चलता  
बाहर कितना बजा.
खिड़की के बाहर आडू के रंग बदले
फिर उन्होंने चूनर ओढ़ी
सर्दियों के अंतिम संतरे भी
धूप में पक चले.
पर बाहर की दुनिया पर मेरा वश ही क्या!
मन तो सूरज की धूप देखने के लिए
सुरंग से रेंग कर बाहर निकला
पर फिसल कर फिर नीचे आया
बाहर पत्थर पड़ने का डर जो था.
इसी वजह से फफूँद की मानिंद
ठन्डे और अँधेरे घर में पड़ा रहा
जो भी कुछ मैं करता हूँ
फफूँद ही दिखाई देता है.