Monday, October 20, 2014

कैसे निकला ‘मतवाला’

मुंशी प्रेमचंद से सम्पादन में निकलनेवाले ‘हंस’ के आत्मकथा अंक का प्रकाशन आज से कोई अस्सी बरस पहले हुआ था. इस अंक से से एक शानदार आलेख जनाब राजकुमार केसवानी के ब्लॉग बाजे वाली गली से साभार लेकर यहाँ आपके लिए प्रस्तुत किया जा रहा है.

क्या ज़माना रहा होगा! कैसे कैसे लोग थे! ...

शिवपूजन सहाय अपनी पत्नी के साथ

मतवाला’ कैसे निकला

शिवपूजन सहाय

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हंसका यह आत्मकथांकहै. इसमे आत्मकथा ही लिखनी चाहिये. किंतु मेरी आत्मकथा. आरम्भ से आज तक, इतनी भयावनी है कि सचमुच यदि मैं ठीक-ठीक लिख दूं, तो बहुत से लोग विष खाकर सो रहें, या नहीं तो मेरे ऊपर इतने अधिक मान-हानि के दावे दायर हो जायें, कि मुझे देश छोड़कर भाग जाना पड़े. इसलिये मैं सब बातों को छिपाकर आत्मकथा नहीं लिखूंगा, और फिर मेरी आत्मकथा में कोई सीखने लायक सबक भी तो नहीं है. खैर, जाने दीजिये, ‘मतवालाकी जन्म कथा, संक्षेप में, सुन लीजिये ; क्योंकि विस्तार करने पर फिर वही बात होगी.

सन 1920-21 में महात्मा गांधी के अहिंसात्मक असहयोग की आंधी उठी. मैं जंगल के सूखे पत्ते की तरह उड़ चला. पहले आरानगर (बिहार) के टाउन स्कूल में हिन्दी शिक्षक था, अब वहीं के नये राष्ट्रीय विद्यालय में हिन्दी शिक्षक हुआ. कुछ महीनों तक छोटी-मोटी लीडरी ही रही. बाद में आरा के दो मारवाड़ी युवकों नवरंगलाल तुल्स्यान और हरद्वार प्रसाद जालान के उत्साह से मारवाड़ी सुधारनामक सचित्र मासिक-पत्र, मेरे ही सम्पादकत्व में निकला. उसको छपवाने के लिये मैं पहले पहल कलकत्ता गया. इसके बाद धनी मारवाड़ियों से सहायता लेने के लिये हाथरस, दिल्ली, इंदौर, जयपुर, बम्बई आदि अनेक बड़े नगरों में महीनों घूमता फिरा. किसी तरह दो साल मारवाड़ी सुधारनिकला. इसकी बड़ी लम्बी कहानी है.

मारवाड़ी सुधारका अंतिम अंक जब छप रहा था, तब मैं कलकत्ता में था. उस समय बालकृष्ण प्रेसशंकरघोष लेन के मकान नं. 23 में था. वहीं मैं रहता था. प्रेस के मालिक बाबू महादेव प्रसाद सेठ और मुंशी नवजादिकलालजी श्रीवास्तव प्रेस में ही रहते थे. ऊपर वाले खंड मॆं रामकृष्ण मिशन के सन्यासी लोग थे, जिनके साथ पण्डित सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाभी थे. निरालाजी रामकृष्ण कथामृत का अनुवाद और समन्वयका सम्पादन करते थे. समन्वयके संचालक स्वामी माधवानंद आचार्य द्विवेदीजी से मांगकर निरालाजी को वहां ले गये थे. और मुंशी नवजादिकलालजी श्रीवास्तव उस समय भूतनाथ तैलवाले प्रसिद्ध किशोरीलाल चौधरी की कोठी में मैनेजर थे. इसलिये अधिकतर चौधरीजी का ही काम प्रेस में होता था.

एक दिन मुन्शीजी बाज़ार से बंगला साप्ताहिक अवतारखरीद लाये. वह हास्य-रस का पत्र था. शायद एक ही पैसा दाम था और शायद पहला ही अंक भी था ; किंतु उसी पर छपा था

Guaranteed Circulation .0000000000001. मसाला भी मज़ेदार था. खूब पढ़ा गया. सोचावट होने लगी इसी ढंग का एक पत्र हिन्दी में निकाला जाय. रोज़ हर घड़ी चर्चा छिड़ी ही रहती थी. कितने ही हवाई किले बने और कितने ही उड़ गये. बहुत मंथन के बाद विचारों में स्तम्भन आया. उसी दम बात तय हो गई. बीजारोपण हो गया. ता. 20 अगस्त 1923 रविवार को सिर्फ बात पक्की हुई. ता. 21 को मुंशीजी ने ही पत्र का नामकरण किया – ‘मतवाला’. मुन्शीजी को दिन-रात इसी की धुन थी. नाम को सबने पसन्द किया. अब कमिटी बैठी. विचार होने लगा कौन क्या लिखेगा पत्र में क्या रहेगा, इत्यादि. निरालाजी ने कविता और समालोचना का भार लिया. मुंशीजी ने व्यंग-विनोद लिखना स्वीकार किया. मैं चुप था. मुझमें आत्मविश्वास नहीं था. बैठा-बैठा सब सुन रहा था. सेठजी भंग का गोला जमाये सटक गुड़गुड़ा रहे थे. मुझसे बार-बार पूछ गया. डरते-डरते मैने कहा मैं भी यथाशक्ति चेष्टा करूंगा. सेठजी ने कहा आप लीडर (अग्रलेख) लिखियेगा, प्रूफ देखियेगा, जो कुछ घटेगा सो भरियेगा.

मैं दहल गया. दिल धड़कता था. मेरी अल्पज्ञता थरथराती थी. ईश्वर का भरोसा भी डगमगा रहा था. हड़कम्प समा गया. अथाह मंझधार में पड़ गया.

मुंशीजी और सेठजी तैयारी में लग गये. स्तम्भों के शीर्षक चुने गये. डिज़ाईन, ब्लाक, कागज, धड़ाधड़ प्रेस में आने लगे. चारू बाबू चित्रकार ने मुखपृष्ठ के लिये नटराजका चित्र बनाया. देखकर सबकी तबीयत फड़क उठी. निरालाजी ने कविता तैयार कर ली, समालोचना भी लिख डाली. मुंशीजी भी रोज़ कुछ लिखते जाते थे. मैं हतबुद्धि-सा हो गया. कुछ सूझता ही न था. श्रावण की पूर्णिमा ता. 26 शनिवार को पड़ती थी. उस दिन मतवालाका निकलना सर्वथा निश्चित था. युवती दुलहिन के बालक पति की तरह मेरा कलेजा धुकधुका रहा था.

ता. 23 बुधवार की रात को मैं लिखने बैठा. कई बार कई तरह से लिखा और फाड़ डाला. बहुत रात बीत गई. नींद भी नहीं आती थी. दिमाग चक्कर काट रहा था. मन, जहाज़ का पक्षी हो रहा था. यकायक एक शैली सूझ पड़ी. लिखने लगा. भाव टपकने लगे. धारा चली. मन तृप्त हो गया. अग्रलेख पूरा करके सो रहा. सुबह उठते ही सेठजी ने मांगा. तब डरते-डरते ही दिया ; किंतु ईश्वर ने लाज रख ली. सब ने पसन्द किया. शीर्षक था – ‘आत्म-परिचय’.

कुल मैटर प्रेस में जा चुका हा. उसका प्रूफ भी मैं देख चुका था. अब उत्साह बड़ने पर मैने भी कुछ बहकऔर चलती चक्कीलिखी. श्रावणी संवत 1980 शनिवार (23 अगस्त 1923) को मतवालाका पहला अंक निकल गया. था तो साप्ताहिक, मगर मासिक पत्र की तरह शुद्ध और स्वच्छ निकला. बाज़ार में आते ही, पहले ही दिन, धूम मच गई.

वहां सब लोग यू.पी. के निवासी थे, केवल मैं ही बिहारी था. इसलिये मेरी भाषा का संशोधन निरालाजी कर दिया करते थे. मतवालामण्डल में वही भाषा के आचार्य थे; किंतु मुंशीजी अपनी लिखी किसी चीज़ में किसी को कलम लगाने नहीं देते थे. मुंशीजी पुराने अनुभवी थे, कई अखबारों में रह चुके थे, उर्दू-फारसी के अच्छे जानकार थे, हाथ मंजा हुआ था. सिर्फ मैं ही बुद्धू था. अनाड़ी था. नौ सिखुआ था. निरालाजी बड़े स्नेह के साथ मेरी लिखी चीज़ें देखते. संशोधन करते और परामर्श देते थे.उनसे मैने बहुत कुछ सीखा है. उनकी योग्यता का मैं कायल हूं. मुंशी जी का तो कहना ही क्या ! वह तो मतवालामण्डल के प्राण ही थे. उनकी बहक का मज़ा मैं प्रूफ में लेता था. उनकी मुहावरेदार चुलबुली भाषा ने मतवालाका रंग जमा दिया. निरालाजी की कविताओं और समालोचनाओं ने भी हिन्दी-संसार में हलचल मचा दी. वह भी एक युग था. यदि उस युग की कथा विस्तार से कहूं, तो बाढ़े कथा पार नहिं लहऊं’.

उम्मीद के पन्ने पर खुली हुई है कहानी और मैं हूँ वहां - माज़ेन मारूफ़ की कवितायें – ४


 शिकायत करना

- माज़ेन मारूफ़

हवा में उछलता हूँ अपना दिल
चित
या पट

मैं ख़ुद अनुमान लगाने की कोशिश करता हूँ;
एक छज्जे का कोना नहीं हो सकती मेरी पलक ...
और यह गौरैया उतरती हुई दरवाज़े के हत्थे पर
हत्था जो बना हुआ एक पुरानी पसली से
फ़कत एक घपला

उम्मीद के पन्ने पर खुली हुई है कहानी
और मैं हूँ वहां
चौड़ा पसारता अपने हाथों को
फैलाता अपनी दसों उँगलियों को ऑलपिनों की तरह
ताकि गड़ा लू ख़ुद को पन्ने पर
जो
जब भी मेरा अंगूठा
उसे पलटने को नज़दीक पहुँचता है
मैं देखता हूँ उसकी परछाई
मैंने सोचा था वह एक सेब है
जो गिर गया था ऊपर रहने वाले जिन्नों में से एक की आस्तीन से
और वह टकराएगा मेरे सिर से और खून से सन जाएगी कहानी.

Sunday, October 19, 2014

नज़ीर आप भी है जुआरिया दिवाली का - नज़ीर अकबराबादी की दीवाली – ३


हर एक मकां में जला फिर दीया दिवाली का
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिल में समां भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा खुश लगा दिवाली का
अजब बहार का दिन है बना दिवाली का

जहां में यारो अजब तरह का है यह त्यौहार
किसी ने नकद लिया उअर कोई करे है उधार
खिलौने-खीलों बताशों का गरम है बाज़ार
हर एक दुकां में चिराग़ों की हो रही है बहार
सभों को फ़िक्र है अब जा बजा दिवाली का

खिलौने मिट्टी के घर में कोई ले आता है
चिराग़दान कोई हंडिया मंगवाता है
सिवाई गूंजा व मटरी कोई पकाता है
दिवाली पूजे है हंस-हंस दिए जलाता है
हर एक घर में समां छा गया दिवाली का

जहां में वह जो कहते हैं सेठ साहूकार
दोशाला, शाल, ज़री, ताश, बादली की बहार
खिलौने खीलों बताशों के लग रहे अम्बार
चिराग़ जलते हैं घर हो रहा है सब गुलज़ार
खिला है सामने इक बाग़ सा दिवाली का

मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई
पुकारते हैं कि लाला दिवाली है आई
बताशे ले कोई, बर्फी किसी ने तुलवाई
खिलौनेवालों की उनसे ज़्यादा बन आई
          गोया उन्हीं के वां राज आ गया दिवाली का

कोई कहे है ‘इस हाथी का बोलो क्या लोगे’
‘यह दो जो घोड़े हैं इनका भी भला क्या लोगे’
कोई कहे है कि इस बैल का टका लोगे
वह कहता है कि ‘मियाँ जाओ बैठो क्या लोगे’
टके का ले लो कोई चौघड़ा दिवाली का

कोई खड़ा फ़क़त इक चौघड़ा चुकाने को
कोई जो गुज़री का पैसा लगा बताने को
वह कहता है कि मैं बेचूंगा पांच आने का
यह पैसा रक्खो तुम अपने अफ़ीम खाने का
कि जिसकी लहर में देखो मज़ा दिवाली का

हठा है मोर पे लड़का किसी का या चेला
कोई गिलहरी के नौ दाम दे है या धेला
वह धेला फेंक के इसका कुम्हार अलबेला
खिलौना छीन के कहता है ‘चल मुझे दे ला’
तू ही तो आया है गाहक बड़ा दिवाली का

कबूतरों का किसी ने लिया है बेल चुका
कोई छदाम को रखता है बहू बेल चुका
वह कहता है कि ‘मियाँ लो जी’ इसका मेल चुका
यह धुन है दिल में तो लड़का तुम्हारा खेल चुका
चबैना लड़के को दो तुम दिला दिवाली का

इधर यह धूम, उधर जोश पर जुएखाने
क़िमार, बाज़ लगे जा बजा से वां आने
अशर्फी कौड़ी व पैसे रुपे लगे आने
तमाम जुआरी हुए माल-ओ-जार के दीवाने
सभों के सर पे चढ़ा भूत सा दिवाली का

सिर्फ हराम की कौड़ी का जिन का है ब्यौपार
उन्होंने खाया है उस दिन के वास्ते ही उधार
कहे हैं हंस के क़र्ज़ख्वाह से हर इक इक बार
‘दिवाली आई है सब दे दिलाएंगे ऐ यार’
‘खुदा के फ़ज्ल से है आसरा दिवाली का

(इस नज्म का आगे का और आख़िरी हिस्सा कल पेश करता हूँ)

यह निशानी मिली भगतसिंह को भोजन कराने की

सरदार हरभंस सिंह

फ़िरोज़पुर शहर के देहाड़ियागाँव में रहनेवाले ९६ वर्षीय सरदार हरभंस सिंह छोटे से घर में भरे-पूरे परिवार के साथ गुज़र-बसर करते हैं. १९४७ से पहले हरभंस लाहौर से आठ मील दूर बांकड़ियागाँव में रहते थे. शहीद भगतसिंह का परिचय दो मील दूरी के काछा गाँव के भोला सिंह नम्बरदार ने इनके परिवार से कराया था. यह घटना १९२७ की है. तबसे भगतसिंह अक्सर इनके यहाँ आया करते थे और भोजन कराने का काम हरभंस किया करते थे. इनकी उम्र उस वक़्त तकरीबन तेरह-चौदह साल की होगी. यह सिलसिला १९२९ तक चला. “खबर थी कि ब्रितानी पुलिस गाँव पहुँच गयी. हमने भगतसिंह से भाग जाने को कहा. पुलिस के दबाव में आकर हमारे नौकर बशीर ने मेरा नाम बता दिया. बस पुलिस ने धर दबोचा और उलटा लेटा कर मारा. आज भी मेरे दाहिने हाथ की उंगलियाँ टेढ़ी हैं और किसी काम की नहीं. यह निशानी मिली भगतसिंह को भोजन कराने की.”

२२ मार्च १९३१ को लाहौर जेल में भगतसिंह की माँ-बहन और बड़े भाई के साथ हुई. “ये लोग मुझे अपने साथ लाहौर जेल मिलवाले ले गए थे. दोपहर के १२:३० बजे हम सभी लाहौर जेल की डायरी में दर्ज किये गए थे. भगतसिंह के चेहरे पर मुस्कान थी. उसी मुस्कान के साथ हम लौटे.”


“१९४७ की घटना ने हमें बांकड़ियागाँव छोड़ने पर विवश किया. स्वतंत्रता सेनानी के लिए अर्जी कभी नहीं दी.”

(मुम्बई से निकलने वाली पत्रिका 'चिंतन दिशा' के ताज़ा अंक में छपी गोपाल नायडू की यात्रा डायरी से साभार) 

हम कीड़ों से मदद मांगते हैं जिनकी हमने ज़रा भी भी परवाह नहीं की - माज़ेन मारूफ़ की कवितायें – ३


 मौत की बाबत

- माज़ेन मारूफ़

जब हम मरते हैं
अब तक न बोले गए हमारे शब्द 
बुलबुलों में बदल जाते हैं 
फुलाना शुरू करते हैं शरीर को वे
और तस्करी कर उसे बाहर निकाल लाते हैं कब्र से
जबकि सोया होता है कब्रगाह का चौकीदार
लेकिन
देहों पर धरी पत्थर की शिला
हमसे टकराती है
और हटने से इनकार कर देती है.
सो
हम कीड़ों से मदद मांगते हैं जिनकी हमने ज़रा भी भी परवाह नहीं की
एक कीड़ा यहाँ
एक वहाँ
हर कीड़ा कुतरता जाता है
उनमे से एक-एक शब्द को
कुछ भी नहीं छोड़ता
अपने पीछे सिवा
खुरचन के
जो इकठ्ठा होती हुई बगल में धीरे-धीरे
रचती हुई एक कंकाल
जो लौटता है स्कूल से
हर रोज़

एक टुकड़ा कम.  

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