Saturday, March 25, 2017

प्रेम के विषय पर यूपी के दो दोस्तों की चिठ्ठियाँ

डिजिटल डॉन राहुल पाण्डेय का बेबाक धारदार लेखन मुझे बहुत प्रभावित करता रहा है.  उतर प्रदेश के हालिया घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में लिखी गयी ये दो चिठ्ठियाँ इसके पहले नवभारत टाइम्स में उनके नियमित कॉलम में छप चुकी हैं. राहुल के लेखन में तमाम तरीकों से उम्मीद देने और बढ़ाने वाला गज़ब का ट्रेडमार्क ह्यूमर होता है. 
पढ़िए मिरगेंदर और तारकेंदर के मध्य हुआ यह संक्षिप्त पत्राचार. राहुल अभी इस पत्राचार के अनेक आयामों पर काम कर रहे हैं. 
प्रमुख रूप से चिंता का वि‍षय निश्‍चित रूप से गधा चिंतन ही है
-राहुल पाण्डेय 

प्रिय मिरगेंदर,
तुमने अपनी चिट्ठी में मुझसे जो सवाल पूछा, यकीन मानो उस सवाल ने क्‍या दिन और क्‍या रात, मुझे बेचैन करके रख दि‍या है. मेरे भाई, मेरे सखा, मुझे पता है कि इन दिनों तुम उत्‍तर प्रदेश में हो और उत्‍तर प्रदेश समूचा तुममें समा चुका है. अन्‍यथा मेरे बाल सखा, तुम मुझसे ऐसा प्रश्‍न न पूछते कि कि‍ससे प्रेम करें. अरे जिन दिनों मैं बाग में बांस की लग्‍गी लि‍ए घूमता रहता था, उन दिनों तुम सकीना, सीमा, नीतू और न जाने किस-किस के साथ प्रेम की पींगे लेते रहते थे. मुझे यकीन है कि आज भी कहीं से कोई उनके कान में मिरगेंदर फुसफुसा दे तो उनकी आह ही निकलेगी. खैर तुम्‍हारा सवाल हमको बहुत बेचैन किए हुए है और मुझे यह भी यकीन है कि मेरे पास इसका कोई न कोई ऐसा उत्‍तर जरूर होगा जो तुम्‍हारे प्रदेश की सामाजिकता को सूट कर सके. बस तुम किसी तरह से अपने हृदय को संभाले रहो मित्र, उसे असामाजिक न होने देना. तुम्‍हारे हृदय के कितने भी उत्‍तर में वह प्रदेश बस गया हो, बाकी की दि‍शाएं प्रेम की हि‍लोरों के लि‍ए तुम खाली रखोगे, यह भी मुझे यकीन है.
मुझे सकीना की कमी खासी खलती है, खासकर ऐसे वक्‍तों में जब मेरे सामने दो सवाल हों और उनमें से कि‍सी एक का जवाब पहले देना हो तो वो दन्‍न से एक उंगली पकड़ लेती थी. मौली को उंगली दि‍खाता तो वह तो पूरा हाथ ही पकड़ लेती तो उसका ऐसे समय में कोई काम नहीं. नाम तो हम बस इसलि‍ए लि‍ए कि कैसे तो हम और तुम कंप्‍यूटर क्‍लास में उसके आगे पीछे घूमते रहते थे. हमारी तरह तुम्‍हारी भी आह छूटेगी, तभी तो हमको चैन मि‍लेगा. अब हमारे सामने दो सवाल हैं. पहला ये कि ये बताएं कि कि‍ससे प्रेम न करो या पहले ये बताएं कि किससे और किस-किस से प्रेम करो. है ना एकदम भीष्‍म समस्‍या. तुम जिस तरह से उत्‍तर प्रदेश से घि‍र चुके हो, धर्मोचित और संभवत: मित्रोचित भी यही होगा कि पहले यह बताया जाए कि तुम किस-किस से प्रेम न करो. और प्‍लीज, अभी अपने महाभारत का ज्ञान न उड़ेलना, पूरी जिंदगी पड़ी है महाभारत के लि‍ए. पहले प्रेम की समस्‍या पर वि‍चार होना चाहि‍ए.
तो मित्र, अपने हृदय पर उत्‍तर प्रदेश से भी भारी वस्‍तु रखकर सुनो. अब तक तुम जिस-जिस से प्रेम करते आए हो, अब तुम उससे प्रेम नहीं कर सकते. तेरह तक तो मित्र मैं ही तुम्‍हारा गवाह रहा हूं, लेकिन जो हाल इस वक्‍त तुम्‍हारे प्रदेश का है, मैं किसी भी तरह की गवाही से साफ मुकर जाउंगा. मैं न किसी नीतू, सकीना, सीमा और मौली को जानता हूं और न ही निधि, पूजा, प्रेरणा, प्रियंका, श्‍वेता, आस्‍था, शांति, समीक्षा या अंजू को जानता हूं. ये भी मुझे नहीं जानतीं, इसका भी मुझे यकीन है. तो मित्रवर, अब जब किसी भी स्‍त्री को देखना तो ऐसे देखना कि कुछ भी नहीं देखा. पुरुष को तो देखना भी नहीं, नहीं तो पूरा का पूरा प्रदेश तुम्‍हारे हृदय में जो हाहाकार करेगा, तुम कहीं के भी रह जाओगे, मुझे पूरा यकीन भरा संदेह है.
अब मेरे बाल सखा, अपने प्रश्‍न का उत्‍तर सुनो. दुनि‍या में कितना कुछ तो है प्रेम करने के लि‍ए. गाय से प्रेम करो. बकरी से भी प्रेम करो. नहीं, बकरी से प्रेम न करो मित्र. आजकल बकरी दूसरे धर्म में शिफ्ट हो गई है. गाय से भी करना तो सफेद गाय से करना, काली गाय से नहीं. काली गाय दूसरे धर्म की है. कुत्‍ते से प्रेम करो. तरह तरह के मोती इधर से उधर चंचल होकर चपल कुलांछे भरते रहते हैं, क्‍या तुम्‍हें उनसे तनिक भी प्रेम नहीं होता. भूल गए कैसे हम लोग बचपन में कनछेदू की कुतिया के तीन पिल्‍ले चुराकर लाए थे. भले बाद में अम्‍मा लात मारकर नि‍काल दी हों, क्‍या हमें उनसे प्रेम नहीं था. बंदरों से प्रेम करो. हमने बंदरों पर बहुत अत्‍याचार कर लि‍या. जहां उन्‍हें देखते हैं, उठाकर पत्‍थर या डंडा या जो भी हाथ में आए, उनपर फेंकते हैं. जरा भी नहीं सोचते कि वह अब उत्‍तर प्रदेश के राष्‍ट्रीय प्रतीक हैं.
राह चलते गाय-भैंस, कुत्‍ता-बिल्‍ली, बंदर-बंदरि‍या, जो कोई भी दि‍खे, सबको प्रेम से सहलाते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहो. इसकी परवाह बिलकुल न करो कि कौन तुम्‍हें सींग मार रहा है, कौन पंजा और कौन दांत गड़ा रहा है. आखि‍रकार पहले के भी प्रेम में तुमने कम मुसीबतें नहीं झेली थीं. भूल गए कैसे नुपूर के घर की छत कूदने के चक्‍कर में हम दोनों के टखने टूटे थे. टूट फूट उस प्रेम में भी थी, इस प्रेम में भी है मित्र, इसलिए बिलकुल भी हताश होने की आवश्‍यकता नहीं है. और क्‍या तुम्‍हारी प्रेमिकाओं ने तुम्‍हें कभी दांत नहीं काटा. बंदर भी तो सिर्फ दांत ही काटते हैं, कभी कभार थप्‍पड़ भी मार देते हैं तो थप्‍पड़ तो प्रेम की पहली सीढ़ी ही है मित्र. मैंने तुमने मिलकर कितने तो थप्‍पड़ खाए हैं. बंदर के थप्‍पड़ को जैसी सामाजिक स्‍वीकृति मिलती है, क्‍या किसी प्रेमिका के थप्‍पड़ को मि‍ल सकती है.
मि‍रगेंदर, मेरे दोस्‍त, मेरे भाई, इसलि‍ए बि‍लकुल भी निराश न हो. देखो, मैं भी बि‍लकुल भी नि‍राश नहीं हूं और कल ही अपनी कामवाली से दो बिल्‍ली के बच्‍चे लाने को कहा है. मैंने अपनी लाइफ में अजस्‍ट करना सीख लि‍या है और आशा करता हूं कि मेरी लाइफ से लाइन लेते हुए तुम भी अडजस्‍ट करना सीख लोगे. नहीं सीखोगे तो उत्‍तर प्रदेश में सिखा दि‍ए जाओगे, इसका भी मुझे पूरा यकीन है. बाकी प्रत्यक्षा के बारे में जब दिल्‍ली आओगे, तब बात की जाएगी, तब तक चुप रहना भी सीखना होगा दोस्‍त.
तुम्‍हारे बचपन का वेरी अनरि‍लायबल दोस्त
तारकेंदर

प्रिय तारकेंदर,
तुम्‍हारे नाम के आगे जो मैंने प्रिय लगाया है, प्‍लीज इसे अन्‍यथा न लेना और न ही किसी से कहना कि तुम मेरे प्रिय हो. तुम्‍हें तो पता ही होगा कि इन दिनों मेरे प्रदेश में प्रिय, प्रेम, प्रेमी, प्रेमिकादि पर कितनी सख्‍ती चल रही है. ऐसे में किसी पुरुष को प्रिय कहना खतरे से खाली नहीं है, लेकिन पत्राचार की रवायतों से मजबूर होकर मुझे ऐसा कहना पड़ रहा है, इसलिए प्‍लीज, न तो तुम इसे अन्‍यथा लेना और न ही किसी और को लेने देना. लेना-देना एक तरफ मित्र, तुमने अपने पत्र में गाय-बकरी, कुत्‍ता-बिल्‍ली, बंदर-बंदरिया से प्रेम करने की जो सलाह दी, वह तुम्‍हारे जैसा अनरि‍लायबल दोस्‍त ही दे सकता है. अगर वाकई तुम मेरे रिलायबल दोस्‍त होते तो मित्र, तुम मुझे गधे से प्रेम करने की सलाह जरूर देते. इस वक्‍त हमारे प्रदेश में वही इकलौता जानवर है, जो निर्विवाद है.
यह बात तो मित्र हम बचपन से ही सुनते आए हैं कि स्‍त्रियों को प्रेम गधों से ही होता है. वैसे सुनने से कहीं ज्‍यादा तो कहते आए हैं. अभी उस दिन ही जब श्‍वेता गली के संजू के साथ अकब-बजाजा में हंस-हंस ठिठोली करके सैलाराम के सड़े हुए गोलगप्‍पे खा रही थी तो वह कौन था जो बोला था स्‍त्रियों को गधे ही भाते हैं? तुम ही तो थे! जब मैसी साहब की लड़की रीटा उस दो कौड़ी के यूपी बोर्ड वाले राहुल के साथ मटकती हुई गुदड़ी बाजार से चौक जा रही थी तो कौन बोला था कि देखो-देखो, गधा जा रहा है? तुम ही तो थे! और तो और, सकीना की शादी तक में गधा आया-गधा आयाकी जो हुलकारें लगीं, वो किसने लगाई थीं मित्र? तुम ही तो थे! इतना सब याद रखने के बावजूद तुम गधे को क्‍यों भूल गए मित्र? क्‍या सिर्फ इसलिए कि इस बार जो गधा आया है, वह सीधे गुजरात से आया है?
गुजरात हो या गोरखपुर, गधे-गधे में क्‍या भिन्‍नता? लेकिन मूल प्रश्‍न यह नहीं है. मूल समस्‍या भी यह नहीं है. मूल समस्‍या यह है मित्र कि स्‍त्रियां तो गधों से प्रेम कर लेती हैं, हम पुरुष गधों से कैसे प्रेम करें? और फिर ऐसे में क्‍या सेम सेक्‍स का सवाल नहीं उठेगा? मैंने इस सवाल पर गहन वि‍चार कि‍या मित्र. इतना कि जल में तनिक तरल मिलाकर गुप्‍तारघाट किनारे रात भर बैठकर सोचता रहा. वो तो सुबह जि‍यावन निषाद आकर बोले कि झाड़ा पानी करना हो तो घाट के बारे में मन में एक भी गलत विचार न लाना. हमको पता है कि तुम और तारकेंदर कितने बड़े पापी हो. कैसे-कैसे तो लोग हैं मित्र तारकेंदर. एक तरफ हम रात भर तरल में जल मि‍ला भरी बोतल को सीने से सटाकर उदर में उतारकर गंभीर विचार मंथन करते रहे तो एक तरफ जियावन को झाड़ा-पानी की पड़ी है. आने दो इस बार वाला सभासदी का चुनाव. कम से कम सात सौ वोट न कटवाए तो हमारा नाम मिरगेंदर से बदलकर चुगेंदर कर देना. सरयू मैया हमारी गवाह हैं.
तुमने अपने पत्र में बंदर के थप्‍पड़ की सामाजिक स्‍वीकृति की बड़ी ही अर्थपूर्ण विवेचना की थी. तुमसे अच्‍छी विवेचना कोई और कर भी नहीं सकता. मुझे अभी तक वह दिन याद है जब तुम अपने घर के टूटी छत वाले टॉइलट में दिव्‍य निपटान में व्‍यस्‍त थे और कैसे वानर सेना ने तुम पर आक्रमण कर तुम्‍हें थप्‍पड़ों और दंतक्षत का परम प्रसाद दिया था? उसके बाद कैसे उस निधि ने आर्यकन्‍या के पीछे ब्रह्म बाबा की थान पर तुम्‍हें थप्‍पड़ पर थप्‍पड़ लगाए थे? तुम कहते रहे कि बंदर बहुत काटे हैं, पेट में सुई बहुत दर्द कर रही है, फि‍र भी उसके थप्‍पड़ एकदम उसकी साइकिल के पैडल की तरह एक बार जारी हुए तो सीधे सत्‍तर की स्‍पीड में. बावजूद इसके तुमने उससे प्रेम करना नहीं छोड़ा था. जब तक उसकी डोली आर्यकन्‍या वाली गली से नहीं उठ गई, जाने कौन सा विश्‍वास तुम्‍हें उसके थप्‍पड़ छाप प्रेम से चिपकाए हुए था, आज तक मुझे समझ नहीं आया? क्‍या बचपन का एक थप्‍पड़ बीकॉम तक किसी को इस तरह से चिपकाकर रख सकता है?
खैर यह सब तो मजाक की बात हुई मित्र और मुझे पता है कि निधि के लि‍ए तुम्‍हारे मन में सम्‍मान का कौन सा स्‍थान है. तुम्‍हारे मन में मौजूद सम्‍मान को लेकर मुझे कभी कोई कन्‍फ्यूजन नहीं हुई मित्र और न ही तुम्‍हारे प्रेम की पवित्रता को लेकर. तुम तो मेरी गवाही देने से साफ मुकर गए, लेकिन मैं कभी भी और कहीं भी तुम्‍हारे मन में मौजूद प्रेम की गवाही देने के लिए गीता को उठाने को तैयार हूं. वैसे बता दूं कि तिवारी एजेंसी नियावां वाले पंडित जी की लड़की गीता की पिछले साल ही शादी हो चुकी है. हम जाना तो नहीं चाहते थे, ऊपर छत वाले कमरे में पेट के बल लेटकर बेगम फैजाबादी का गाना इतना ना जिंदगी में किसी की खलल पड़ेपूरे शोक से सुन रहे थे, लेकिन मम्‍मीजी जबरदस्‍ती इक्‍कीस रुपये का लिफाफा जेब में ठूंसते हुए बोलीं कि नन्‍हीं के जन्‍मदिन पे पूरे ग्‍यारह रुपये नकद दी थीं. हम कोई उनसे कम थोड़ी ना हैं! लिखा जरूर देना कि इक्‍कीस दिए हैं और खाना पूरा खा के आना, अंत में आइसक्रीम जरूर खाना! कोई पूछे उनसे कि दोस्‍त, इस दिल का दर्द इक्‍कीस रुपया देके और आइसक्रीम खाके कहां दूर होता है. अभी और सुनो, जाते-जाते ऑर्डर दीं कि ये जरूर पता लगा के आना कि गीता का लहंगा कितने का था?
गीता चिंतन बहुत हुआ मित्र, उस चिंतन से लेशमात्र भी लाभ नहीं. अब उत्‍तर प्रदेश में जो भी चिंतन प्रमुख रूप से चिंता का वि‍षय है, वह निश्‍चित रूप से गधा चिंतन ही है. गुजरात हो या गोरखपुर, गोरखनाथ हो या सोमनाथ या फिर तुंगनाथ ही क्‍यों न हो, उसके चिंतन से जीवन की यह नैया उस किनारे नहीं लगने वाली मित्र, जिस किनारे लगने से पहले क्‍या-क्‍या करें के बारे में महाराज भृतहरि बता गए थे. हम सब एक हद तक प्रेमी जीव हैं. इस धरा पर हमने प्रेम करने का ही अवतार लिया है. अब यह भूलोकवासि‍यों पर निर्भर है कि वह हमें किस-किस से प्रेम करने देते हैं. अगर वह स्‍त्री से प्रेम नहीं करने देंगे तो हम गधों से प्रेम कर लेंगे मित्र क्‍योंकि बार-बार बेहूदे बदलाव करना भूलोकवासियों की आदत है, हम प्रेमियों की नहीं. लोग बदल जाते हैं, स्‍थान बदल जाते हैं, काल बदल जाते हैं, सवाल बदल जाते हैं मित्र, किंतु यह प्रेम ही है जो नहीं बदलता. जानता हूं मेरे पत्र का तुम्‍हारे पास कोई जवाब नहीं होगा, इसलिए मैं किसी जवाब के इंतजार में नहीं बैठा हूं. दरअसल थोड़ी देर में बंबे धोबी अपने गधों को मेरी गली से लेकर जाने वाला है, मैं बस अपनी टूटी दीवार पर बैठा उन्‍हीं गधों का इंतजार कर रहा हूं. गधों से प्रेम करने के बारे में सोच रहा हूं!
तुम्‍हारा दूर जाता मित्र
मिरगेंदर


Tuesday, March 21, 2017

इसे बनाते मुसलमान हैं और स्वर फूंकते हैं हिन्दू

यह आलेख और फोटो निबंध हमारे स्टार फोटूकार कबाड़ी रोहित उमराव ने बहुत मशक्कत से तैयार किया है. इस से पहले रोहित ने इस ब्लॉग पर आपको मांझे और सिवइयों के निर्माण पर अद्भुत फ़ोटो-कथाओं से रू-ब-रू कराया है. ऐसी शानदार पोस्ट्स से ही कबाड़खाना वह है जो इतने सालों में बन सका है. थैंक्यू रोहित.

पीलीभीत की बांसुरी
- रोहित उमराव 

बांस की बनी बांसुरी और उसकी मधुर-सुरीली तान आखिर  किसे नहीं रिझाती? बांसुरी भारत वर्ष का ऐतिहासिक वाद्य यंत्र है. महाभारत काल में श्रीकृष्ण-बांसुरी-गोपिका और गायों की लीलाओं से विश्व परिचित है. उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में कारीगरों की कई पीढियां बांसुरी बनाने के काम को बखूबी आगे बढ़ा रही हैं. वह इसे अपनी पुश्तैनी विरासत मानती हैं. ज्यादातर मुश्लिम परिवार के लोग इसे बनाते हैं. लेकिन यदि कहा जाय कि "इसे बनाते मुसलमान हैं और स्वर फूंकते हिन्दू है" तो यह एकदम सही होगा.  पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, राजेंद्र प्रसन्ना जैसे ख्यातिप्राप्त बांसुरी वादकों की पसंद बनी पीलीभीत की बांसुरी देश-दुनियां में अपना नाम रोशन कर रही है.

पीलीभीत जिले में बांसुरी बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता आया है. आज से 10 साल पहले यहाँ करीबन 500 से ज्यादा परिवार बांसुरी बनाते और उसकी आय से ही बसर करते थे. पर अब हालात बदल गए हैं. इनकी संख्या घटकर 100 के करीब ही रह गई है और आने वाले दिनों में कम ही होती जा रही है. हाथ के हुनर का उचित मूल्य न मिल पाने के चलते इस काम से उनका पारिवारिक गुजर-बसर नहीं हो पा रहा है. जीविका और रोजी-रोटी पर संकट के बदल गहराते जा रह है. इस अँधेरे से उबरने के लिए वे दूसरे रोजगार ढूंढ रहे हैं. जिसमे चार पैसे की बचत भी हो सके.

हुनरमंद कारीगर खुर्शीद, अज़ीम, इसरार और गुड्डू का कहना है कि आसाम से आने वाले बांस के यातायात की समस्या है. पहले ये बांस आसाम से ट्रेन द्वारा बड़े लठ्ठे के रूप में आता था. ट्रेने बंद हो गईं उनका बांस अब ट्रक में छोटे टिकड़ों के रूप में बोरों में भरकर आने लगा. कई जगह बदला जाता है. लाने-ले जाने में बहुत सारा बांस टूट जाता है. सरकार इस हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्री की ओर ध्यान दे. राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में इन कारीगरों के काम को प्रदर्शित करने को निःशुल्क बढ़ावा मिले. राहत फण्ड यदि की समस्या हल हो. तब तो फिर से कारीगरों को आशा की किरण नजर आने लगे. और वे जी लगाकर इसी पारंपरिक काम को आगे बढ़ाये.

पेश है पीलीभीत में बनायीं जाने वाली बांसुरियों की एक बानगी. देखते हैं -       

आसाम से आये बांस की गोलाई, मोटाई,
लंबाई और सिधाई को परखता कारीगर

बांसुरी बनाने के चार सोपान सामने हैं. पहले कारीगर साधारण बांस को तराश
कर मुहाने को गोलाई देता है.
फिर उसकी जीभ तराशता है. फिर उसमें अरहर की लकड़ी को तराशकर ढाठ बनाता है.
फिर ढाठ को तराशकर जीभ से मिला देता है

बांसुरी के बांस की पेंसिल से सिधाई परखकर, फर्मा के सहारे
सुरों के छेदों के अनुपात पर निशान लगा लिए जाते हैं.
और फिर आग में तपती सुर्ख सलाखों से उसमे छेद किये जाते हैं

साधारण बांस में हांथों के हुनर से
अग्नि की तापिश के बाद स्वरों का गुंजन स्वतः उत्पन्न हो जाता है

परिवार के सभी सदस्य महिलाएं और पुरुष
मिलकर बांसुरियों की पैकिंग करते हैं और यहीं से फिर उन्हें बाजार भेज दिया जाता है

Thursday, March 16, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - पंद्रह

(पिछली क़िस्त से आगे)



परमौत की प्रेम कथा - भाग पंद्रह

परमौत ने फ़ोटो वाला लिफाफा वापस गिरधारी को थमाया और जल्दी-जल्दी गुसलखाने में चला गया. दस मिनट में वह बाहर सड़क पर था जहाँ पूरा गोदाम-मंडल उसकी प्रतीक्षा में आतुर था. इस दरम्यान उसकी समझ में यह बात नहीं आई थी कि गिरधारी पिरिया की फोटू कैसे ले आया होगा. अभी तो उसने गिरधारी को बताना था कि पिरिया असल में है कौन. लेकिन उसका चोर मन कहता था कि जिस तरह का संयोग पिछली रात घटा था उसके परिप्रेक्ष्य में गिरधारी का यह जादुई कारनामा कर सकना भी संभव था. इसके अलावा पिछली रात पिरिया और लम्बू अमिताब  के एक ही घर में घुसने के उसने तमाम अर्थ लगाए लेकिन किसी भी ठोस नतीजे पर नहीं पाहुंच सका था. वह पिरिया का घर हो सकता था. वह लम्बू अमिताब का घर भी हो सकता था. वह लम्बू अमिताब के किसी परिचित या रिश्तेदार का घर भी हो सकता था जिसने हो सकता है उन्हें भागने में मदद की हो. वह पिरिया के भी किसी ऐसे ही परिचित या रिश्तेदार का घर भी हो सकता था. जो भी हो पिरिया को हफ्ते भर के लम्बे अंतराल के बाद देखना उसके लिए बेहद खुशी देने वाला रहा था और पिरिया के कम से कम एक स्थाई अथवा अस्थाई अड्डे तक पहुँच सकना भी.

हम तीनों ने जैसे तैसे कहीं से पचास पचास रूपये इकठ्ठा करके जिन की एक बोतल और कुछ चबेना खरीद रखा था और हम परमौत को लेकर सीधे गोदाम जाकर गिरधारी द्वारा अब तक न बताए गए सीक्रेट की पाल्टी करने की नीयत रखते थे.

परमौत के बाहर निकलते ही हमने उसे आँख मारी जिसे अनदेखा करते हुए उसने हमसे तेज़-तेज़ उसके मोहल्ले की सरहद से बाहर निकल चलने का इशारा किया.

दस मिनट के भीतर हम गोदाम के भीतर थे - मोहब्बत, मनहूसियत और मैकशी से सराबोर जिसकी हर शै हमारा इंतज़ार कर रही लग रही थी.

बोतल खुलने से पहले ही नब्बू डीयर बोला - "अबे गिरधारी गुरु आज सुबे-सुबे किच्चक्कर में पाल्टी हो रई साली ... जीनातामान का ब्या तो ना हो रा भलै ..."

"अबे नब्बू वस्ताज, सबर करो जरा सबर. बड़ी वाली पाल्टी का काम हुआ ठैरा आज परमौद्दा का. बड़ी मेनत करी है साली सुबे से इसके लिए" - परमौत से चिपक कर बैठते हुए गिरधारी ने बोलना जारी रखा - "ले यार परमौद्दा ... देख ले भाभी की फोटुक. क्या याद करेगा किस साले गिरधारी ने वादा निभाया अपना और वो भी पैन्चो बखत से पहले ..." परमौत के हाथ में उसने फोटो वाला लिफ़ाफ़ा पुनः थमाया. परमौत ने खोल कर देखने की जगह उसे अपनी कमीज़ की जेब के हवाले किया और बोतल का ढक्कन खोलने लगा.

"मुझको तो पैले ही पता हुआ परमौद्दा कि भाबी कौन हुई. वो तो तेरा लिहाज़ कर रहा हुआ मैं इत्ते दिन से. नहीं तो कब के बता दिया होता इन सब सालों को. नहीं तो अपने नबदा कितने हरामी हुए, सब जानने ही वाले हुए. इनको बताता तो साले ये भी लग जाते वहां अपना मूँ उठाके ..."

"अबे ससुर पैले फोटुक तो दिखाओ साले ... और तुम लम्बुआ गुरु अपनी मत कहना भौत. बता रहा हूँ."

गिलास ढाले जा चुके थे और हम सब की उत्सुकता परमौत की कमीज़ की जेब पर केन्द्रित हो गयी थी जिसके भीतर से उस जादुई लिफाफे को निकालने की उसकी कत्तई नीयत नहीं लग रही थी.

"तू तो सैणियों की चार सरमा रहा हुआ यार परमौद्दा ..." कहते हुए गिरधारी ने लिफाफा परमौत की जेब से बाहर निकल लिया. परमौत ने जरा भी विरोध नहीं किया. 

लिफाफा खोल कर उसमें से दो एक जैसे पासपोर्ट साइज़ फोटो निकले जिनमें से एक मैंने हथिया लिया दूसरा नब्बू डीयर ने.

"सई है लौंडिया वैसे तो मल्लब ... भौत सई है बस फोटूगीराफ़र ने जरा फोटुक सई एंगिल से नहीं खींच रखी. इस चक्कर में जरा ढैणी लग रई गिरुवा की भाबी ..." काइयां नब्बू डीयर अपने पहले कमेन्ट जारी करने लगा था.

मैंने भी एक झलक में ताड़ लिया कि फोटो में सचमुच तनिक ढैणी दिख रही लड़की किसी भी कोण से पिक्चर की हीरोइन तो नहीं दिख रही थी अलबत्ता उसके चेहरे पर एक मूर्ख किस्म की निश्छलता थी जिस पर परमौत जैसे बौड़म के दिल के आ जाने को मैंने कोई अचरज करने वाली चीज़ नहीं जाना.

पिरिया की आँखों के बारे में नब्बू डीयर की राय सुनकर एक पल को परमौत को गुस्सा आ गया - "ढैणी होगी तेरी भाबी नबुआ. तुम क्या जानो सालो खबसूरती! तुम तो बस दारू पियो और मुकिया के गाने सुन के बस ओईजा-ओबाज्यू करते रैना बेटा जिन्दगी भर ... जरा ये देख ... ये पिरिया तुझको ढैणी लग रही है ... हैं? ..." - परमौत ने मेरे हाथ से फोटो छेना और उसे देखते ही जैसे उसके होश गायब हो गए.

करीब दस सेकेण्ड बाद वह गिरधारी पर फटा - "साले गिरधारी ... बहुत स्मार्ट बन रहे हो साले ... जब मैंने कहा था कि पहले मैं लड़की दिखाऊंगा तो सबर नहीं होता था तुझसे ... अबे ये फोटो जो है ..."

"देख यार परमौद्दा नाराज मत हो यार ... मैंने एक बार देखा ठैरा ना तुम्को भाबी के साथ उस दिन जब तुम उसके संग समोसे खा रहे हुए वो क्या नाम कहते हैं घनुवा सौंठ के खोमचे पे ... तो मैं जानने वाला हुआ भाबी को ... तू समझ क्या रहा है यार परमौद्दा ... और साले चापरासी को पचास रुपे दे के कॉलेज के दफ्तर से चाऊ कर के लाया हूँ बिचारी भाबी की फोटुक और तू ऐसे मुझी पे फ़ैल रहा हुआ यार ..."

"भांग की फुन्तुरी है भाभी, कद्दू का टुक्का है माचो ... जड़ है किल्मौड़े की ... अबे ये वो ससी है सालो जो मेरे पीछे पड़ी हुई है इत्ते दिन से बता नहीं रहा था मैं जिसके चक्कर में कप्यूटर जाना बंद कर रखा है मैंने. और ये साले बड़े वो बन रये गिरधारी क्या नाम कहते हैं गोपीचन्दर जासूस - अबे घनश्याम हलवाई की दूकान पे समोसे खाने से कोई भाबी बनने वाली होती तो ये अपने नब्बू डीयर जो हैं ना, पांच तो इनकी शादी हो गयी होतीं ... हटा साले को ..."  - कहते हुए गुस्से में उसने अपना गिलास सामने की दीवार पर पटक दिया. 

परमौत को इतना आक्रामक हमने कभी नहीं देखा था. हम चारों में वही सबसे अधिक शालीन और ठहरा हुआ था लेकिन मेरा मानना था कि मोहब्बत के चक्कर में इंसान का ऐसा हाल हो ही जाना था. गिरधारी लम्बू ने ग़लती की थी पर अपने दोस्त की सहायता करने के लिए उसने जितना रिस्क लेकर कॉलेज के एडमीशन फॉर्म में से ससी का फोटो निकाल दिखाया था उसकी कुछ तो तारीफ़ बनती थी. तारीफ नब्बू डीयर की ओर से आई -

"देख यार परमौती ... एक तो गिलास ऐसे फोड़ते नहीं हैं और दूसरे ये कि जो भी कहो ढैणी होने के बाद भी साली माल तो लग रही है लौंडिया. और तुमको तो थैंक्यू कैना ही पड़ेगा गिरधारी लला जो साले रेगिस्तान में पानी का सोता जैसा फोड़ने को एक फोटुक तो ले के आये ... जरा अपने खुट दिखाओ तो उनको छू के आशिरबाद ले लेते हैं कि कभी हमारे लिए भी ऐसे ही फोटुक ले के आओगे कभी ..."

खासा रुआंसा हो चुका गिरधारी एक कोने में सुबकने को तैयार बैठा था. नब्बू डीयर का मज़ाक उसे ज़रा भी पसंद नहीं आया और वह बिफर कर परमौत से मुखातिब होकर बोला - "साला ऐसे सबके सामने कोई समोसे खाता है यार परमौद्दा ... अबे हल्द्वानी है यार हल्द्वानी. कोई साला बॉम्बे लंदन समझ रखा है ... अबे यहाँ लौंडिया का सपना भी देखो तो लोग कैने लगते हैं साले चक्कर चल रहा है तुम्हारा. बहन के साथ भी रिक्से में जाओ तो साले ऐसे घूर-घूर के देखने लगते हैं हरामी ... और तू जो है परमौद्दा साले समोसा खा रहा हुआ चटनी लगा-लगा के सबके सामने और वो भी घनुवा हलवाई के यहाँ ... अब मैं उसको तेरा चक्कर ना समझता तो तेरी दिद्दी समझता क्या ... उलटे इतने दिन से जो मार यहाँ-वहाँ चक्कर लगा के वो तेरी ससी-फसी के खानदान का पूरा हिसाब-किताब इकठ्ठा कर रखा है, उसको तू एक झटके में भांग की फुन्तुरी बता रहा हुआ पैन्चो ... क्या यार ..."

गिरधारी की आँखों से बाकायदा आंसू बहने चालू हो गए. इससे परमौत हकबका गया. दरअसल हम सब गिरधारी के रोने से हकबका गए थे. परमौत ने उठ कर गिरधारी को कन्धों से थामा और उठाकर गले से लगा लिया. ऐसा करने से गिरधारी का रोना और तेज़ हो गया जिसे चुप कराने के लिए नब्बू डीयर ने पिछले कई सालों का हिसाब चुकाते हुए "गिरधारी चोप्प भैं ..." का उद्घोष किया. गिरधारी चुप हो गया. मैं और नब्बू डीयर गिलास के चूरे उठाने लगे.

"फिर अब ..." मैंने झुके-झुके ही सवालिया निगाह राम-लक्ष्मण बने परमौत और गिरधारी पर डाली.

"अब क्या ... अब घंटा! ... तुम्हारी भाबी जो है वो भाग गयी है उस हरामी लम्बू के साथ और कल ही वो लोग दिल्ली से शादी कर के लौटे हैं .... मैंने अपनी आँखों से देखा है कल रात ..."

"लेकिन कल रात दो बजे तक तो तू मेरे साथ था यार परमौद्दा ... "

माहौल वापस नियंत्रण में आ रहा था और परमौत ने रोडवेज़ से लेकर रामपुर रोड की गली तक के अपने सफ़र की तफ़सीलात बयान कीं.

हमारे पास परमौत के लिए घनघोर सहानुभूति थी लेकिन हम कर कुछ नहीं सकते थे.

"मल्लब भाबी ने घर से भाग के सच्ची-मुच्ची की सादी कर ली और लौट भी आई?" - नब्बू डीयर के स्वर में अविश्वास और अचरज के मिले-जुले भाव थे.

"हाँ यार ... उस से तो ये फोटो वाली मोटी सही हुई ना ... अरे कम से कम भागी तो नहीं ... उलटे हमारे परमौती के साथ समोसे भी खाए और मोब्बत करने वाली चिठ्ठी भी उसको दी ... लेकिन नब्बू वस्ताज ये होने वाली ठैरी आशिकी ... मल्लब मोब्बत ... वो साली सायरी नहीं है एक पिक्चर में कि आग कि नदी होने वाली हुई और उसी में डूब के हिल्ले से लगने का काम होने वाला हुआ. परमौत गुरु को तो वो चइये जो साली किसी और के पास हुई और जिसको परमौत गुरु अच्छे लगने वाले हुए उसको समोसे के अलावा घुत्ती भी नहीं मिलने वाली हुई ... मैं मुकेश के किसी नैराश्यपूर्ण गाने को उद्धृत करते हुए अपनी बात समाप्त करना चाहता था लेकिन उस समय कुछ भी याद नहीं आया. मेरी दुविधा को शायद नब्बू डीयर ने ताड़ लिया और अपनी नक्कू अचारी आवाज़ में उसने गुनगुनाना शुरू किया -  बहारों ने मेरा चमनि लूटिकर खिज़ा को ये इल्जामि क्यों दे दिया ..."

तीस-चालीस सेकेण्ड को गोदाम की कराहती आत्मा को नब्बू डीयर ने मुकेश के अनिष्टकारी गीत की मार्फ़त आवाज़ अता फ़रमाई जिसके बाद परमौत को हाथ जोड़कर उससे गाना बंद कर देने का संकेत किया.

गिरधारी अब नार्मल होता दिख रहा था और सबके लिए गिलास भर रहा था.

"मैंने सोचा कि यार परमौद्दा खुस होगा कि मैंने भाबी के घर खानदान के बारे में सब पता लगा लिया हुआ कि एक तो वो अपने माँ-बौज्यू की इकलौती औलाद हुई और उसके बौज्यू करने वाले हुए पीडबुलडी में घूसखोरी की नौकरी. सुभाषनगर में दोमंजिला घर हुआ और घर में रैनेवाले हुए तीन जने और चार कुकूर-बिरालू. हाईस्कूल में उसके आये रहे तित्तालीस परसेंट और इंटर में आई रही सोसोलौजी में सप्लीमेंटरी. बीए किया ठैरा लौंडिया ने होमसाइंस में सेकिण्ड डिभीजन और अब एमे कर रही इंग्लिस में. और ... लेकिन इस सब को बताने का अब क्या फायदा हुआ भलै ... वो तो कोई और ही निकल गयी पैन्चो ..." - सब कुछ बता चुकने के बाद गिरधारी अब दयायाचना की निगाह से परमौत को देख रहा था.

परमौत और नब्बू डीयर ने इस वार्तालाप के अलग-अलग मानी निकाले - परमौत गिरधारी के भीतर छिपे शोधार्थी से बहुत इम्प्रेस हुआ और सोचने लगा कि जब गिरधारी हफ्ते-दस दिन में ससी के बारे में इतनी बहुमूल्य जानकारी जुटा सकता है तो फोटो का जुगाड़ करने के अलावा वह पिरिया के बारे में भी ऐसा ही कर सकता है. नब्बू डीयर को ससी में भरपूर संभावना नज़र आई. उसकी काल्पनिक प्रेमिका का अब तक कोई पता-पानी नहीं था जबकि यहाँ प्रेम करने को आतुर एक माल टाइप की तनिक ढैणी लड़की बमय फोटू और बायोडाटा के मौजूद थी. नब्बू को बचपन से ही किसी ऐसे ही घराने की तलाश थी जिसमें एक घूसखोर बाप हो और इकलौती लड़की भी. ऐसे खानदान का घरजमाई बन पाना उसके संजीदा सपनों में शुमार था. ससी के फोटू को अपनी आँखों के पास ले जाकर और उसे काफी देर तक ध्यान से देखने के बाद उसने गिरधारी से पूछा - "मल्लब एक महीने में कितना कमा लेता होगा ये क्या नाम कहते हैं ये ससी-हसी का बाप ..."

इस बार गिरधारी ने भ अक्षर से शुरू होने वाली दो गंभीर गालियाँ देकर नब्बू डीयर को कोसना चालू किया तो परमौत बोला - "सॉरी यार गिरधारी वस्ताद ... ग़लती मेरी है साली ... मैंने तुम सब को पैले ही दिखा देना था पिरिया को. पैले बता दिया होता तो ना वो उस लम्बू के साथ भाग कर दिल्ली जाती ना इतना फजीता होता ... माफ़ कर दे यार ..."

गिरधारी परमौत के गले से लिपट गया और तनिक भर्राए स्वर में बोला - "कल को दिखा देना मुजको कि भाबी कौन सी वाली है. बस. आगे का काम तेरा ये चेला कर देने वाला हुआ परमौद्दा ..."     

(जारी)

हल्द्वानी के किस्से - 5 - चौदह



परमौत की प्रेम कथा - भाग चौदह

गिरधारी को सुबह तीन बजे गुडनाईट कहने के बाद परमौत ने घर जाने के बजाय दुबारा से रोडवेज़ का रुख किया. चौबीसों घंटे आबाद रहने वाला हल्द्वानी का एक वही ठीहा था जहाँ उस समय जीवन के लक्षण देखे जा सकते थे. दोस्त के वायदे ने परमौत के वीरान पड़ते जा रहे मोहब्बत के आशियाने में नई पुताई कर दी थी और वह उस पल का पूरा लुत्फ़ लेने के उद्देश्य से जितनी देर हो सके जीवन के और नज़दीक जाना जाना चाहता था. 

रोडवेज़ का उत्सवपूर्ण माहौल उसकी आशा के अनुरूप हैरान कर देने वाली चहल-पहल से भरपूर था. कोई दर्ज़न भर दुकानों पर बिकने के वास्ते नेपाल के रास्ते लाये गए बड़े बड़े चाइनीज़ टेपरिकार्डर-टूइनवन-कैसेट्स और ऐसे ही इलैक्ट्रोनिक सामान सजे हुए थे और उनका प्रचार करने के वास्ते हर दुकान से ऊंची आवाज़ में पहाड़ी गाने बज रहे थे और संगीत की मारकाट मची हुई थी जिसका पूरा साथ देने के उद्देश्य से अगणित ठेलों-खोमचों पर फल, सब्जी, पान-सिगरेट, चाय, बन-आमलेट, पकौड़ी, समोसा, चाट, टिक्की वगैरह का महाव्यापार चल रहा था. 

पहाड़ से दिल्ली और दिल्ली से पहाड़ आने-जाने वाली दर्ज़नों नाइट बसों की आवाजाही के कारण उनके बड़े-बड़े टायरों ने कीचड़ और मुसमुसी मिट्टी से अटी सड़क और उसके गड्ढों पर एक से बढ़कर एक त्रिआयामी आकृतियाँ सर्जित कर दी थीं. अनेकानेक ढब-आकृति और मुखों वाले और अनेक मुद्राओं में चलते-बैठते-ऊंघते-खरीदारी करते-चाय सुड़कते-बोलते-टोहते-चीखते-सोते पैसेंजरगण इस समूचे माहौल को सम्पूर्णता प्रदान कर रहे थे. परमौत को अपना कलेजा अब भी मुंह में आया जैसा महसूस हो रहा था और उसका मुंह कसैला हो रहा था जिसे दूसरा स्वाद देने की नीयत से उसने पहले एक चाय समझी और फिर एक-के-बाद-एक दो सिगरेट. वह सिगरेट के पैसे चुका रहा था जब उसकी निगाह सामने पोस्टऑफिस की बिल्डिंग के पसमंजर में खड़े एक पुरातन नीम के पेड़ के पीछे छिपने जा रहे चन्द्रमा पर पड़ी.

इस दृश्य का दिखना था और पास की एक दुकान से 'चाँद सी मैबूबा' बजना शुरू हो गया. इस संयोग के कारण परमौत के चेहरे पर एक विडम्बनापूरित मुस्कान आयी और उसने इस मेले सरीखे माहौल में अपनी बगल में पिरिया की उपस्थिति होने की कल्पना करना शुरू कर दिया. वे दोनों ऐसे ही कभी-कभार रात के तीन बजे रोडवेज़ पर चाय और बन-मक्खन खाने आ जाया करेंगे जैसे एक ठेले पर एक फ़ौजी लग रहा आदमी और उसकी नवेली बीवी लग रही औरत खा रहे थे. गाने में प्रेमिका से कहा जा रहा था कि उसकी सूरत भोली भाली है और उसके नैना सीधे सादे हैं. गायक यह भी बता रहा था कि उसके ख़यालों में प्रेमिका का ठीक ऐसा ही रूप था. परमौत चंद्रमा को देखता था, गाना सुनता था और पिरिया की सूरत को याद करने की कोशिश करता था और हैरत करता जाता था कि मुकेश ने बिना देखे हू-ब-हू उसकी पिरिया का ऐसा सटीक वर्णन कैसे जो कर दिया होगा.

वह मटर गली वाले शॉर्टकट से रामलीला ग्राउंड होता हुआ अपने घर की राह लगने के बारे में सोच रहा था कि रास्ते को बाधित करती दिल्ली से आई एक और बस अचानक रुकी. 

परमौत जेब में हाथ डाले इस दृश्य को भी आलस भरी दार्शनिकता के साथ देखना शुरू कर ही रहा था कि अचानक उसने बस से पिरिया को उतरता देखा. पिरिया का चेहरा थकान और नींद से म्लान हो रहा था और सीढ़ियों से उतारते हुए उसने अपने शॉल को कन्धों के गिर्द लपेटते हुए एक जम्हाई ली. एक सेकेण्ड से कम समय में हुए इस दृश्य परिवर्तन ने परमौत को अचानक विस्मय अनजान भय से भर दिया और वह एक खोखे की आड़ में हो गया. आड़ में आते ही उसका आत्मसंतुलन वापस लौटा और उसके अवचेतन ने दीदार के इन दुर्लभ लम्हों को डीटेल में कैप्चर करना शुरू कर दिया. पिरिया ने फीरोज़ी रंग का वही सलवार सूट पहना हुआ था जो परमौत की निगाहों में उस पर सबसे ज्यादा फबता था. बस में बैठे रहे से उसका शॉल गुज्जीमुज्जी हो चुका था. नींद की तात्कालिक ज़रुरत उसकी बड़ी-बड़ी और फिलहाल उदास दिख रही आँखों में साफ़ पढ़ी जा सकती थी. फिल्मों में देखी गयी किसी भी हीरोइन से अधिक सुन्दर दिख रही उसकी पिरिया बस की सीढ़ियाँ उतर रही थी. बस के बाहर रिक्शेवालों का झुण्ड टूट चुका था जिनके कारण आख़िरी सीढ़ी से उतर पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था. तनिक झल्लाई सी पिरिया ने एक क्षण के एक लाखवें हिस्से के लिए अपनी निगाहें आसमान के उसी हिस्से की तरफ कीं जहाँ  पोस्टऑफिस की बिल्डिंग पीछे नीम के पेड़ पर चन्द्रमा छिप रहा था. उसी एक लाखवें हिस्से में उसके चेहरे पर आ गयी खीझ के बावजूद मुस्कराहट की एक सूदूरतम झलक आई जिसे परमौत ने अपनी आत्मा के कैमरे से कैद कर लिया. 

परमौत को अहसास भी नहीं हुआ कि वह मुस्करा रहा था और आड़ से बाहर आ गया था. पिरिया उतर चुकी थी और रिक्शेवालों और यात्रियों के हुजूम में अचानक अदृश्य हो गयी थी. परमौत उसकी टोह लेने की कोशिश कर रहा था कि अचानक उसकी निगाह लम्बू अमिताब पर पड़ी. लम्बू के बाल बिखरे हुए थे और वह रामलीला के किसी राक्षस जैसा दिख रहा था. उसके कंधे पर दो बैग लटके हुए थे और वह रिक्शेवालों के खदेड़ता हुआ सा अपने लिए बाहर निकलने का रास्ता बना रहा था.

अमिताब को देखते ही परमौत स्वप्नलोक से बाहर निकला और सतर्क होकर एफ़बीआई का एजेंट बन गया. पूरे होशोहवास में आकर अब वह फिर से खोखे की आड़ में हुआ और उसने अपनी निगाहें लम्बू पर लगा दीं. अचानक पिरिया नज़र आई. उसने रिक्शा कर लिया था और वह निढाल होकर उस पर बैठी हुई पलट कर लम्बू के आने का इंतज़ार कर रही थी. परमौत को अपना गला सूखता सा महसूस हुआ. लम्बू रिक्शे के करियर पर बैग लाद रहा था. लम्बू पिरिया की बगल में बैठ गया था. लम्बू हैडल थाम कर खड़े रिक्शेवाले से जोर-जोर से कुछ कह रहा था. रिक्शेवाला भी कुछ कह रहा था. फिर दोनों कुछ नहीं कह रहे थे. फिर रिक्शेवाला गद्दी पर बैठ रहा था. परमौत की चाँद सी मैबूबा और अमिताब राक्षस को लेकर रिक्शा रेलवे बाज़ार की दिशा में बढ़ चला. परमौत के पैर जैसे काठ के हो गए थे. उसका दिमाग कुंद हो रहा था. उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. सारा घटनाक्रम भयंकर तेज़ी से हुआ था. वास्तविकता धीरे-धीरे उसकी समझ में आना शुरू हुई. कमीना लम्बू उसकी माशूका के साथ दिल्ली से आ रहा था और सुबह के तीन बजे उसे रिक्शे में बिठाकर कहीं ले जा रहा था. हो सकता है दोनों ने भागकर शादी कर ली हो. हो यह भी सकता है वे बस में अचानक ऐसे ही संयोगवश मिल गए हों. इस दूसरी सम्भावना ने परमौत को थोड़ा सा दिलासा दिया लेकिन तथ्य यह था कि वे दोनों एक ही रिक्शे में बैठकर जा रहे थे.

परमौत ने अपनी बगल में खड़े एक खाली रिक्शा पर बैठते हुए कहा - "रेलवे बजार की तरफ चल. दस रुपे दूंगा और गाड़ी तेत्तेज चलइयो." परमौत ने हाथ में दस का नोट निकालकर रिक्शेवाले को दिखाया. केमू अड्डे से दाईं तरफ मुड़ते ही करीब पचासेक मीटर दूर पिरिया और लम्बू का रिक्शा दिखाई दे गया. मोड़ पर परमौत का रिक्शा तेज़ी से कटा और पलटता-पलटता बचा

"हौली कर बे जरा" - परमौत ने रिक्शे वाले को झिड़का.

"ठीक है बाबू जी" रिक्शेवाले ने क्षमायाचना के लहजे में कहा.

भोर के झोंके परमौत के चेहरे पर पड़ रहे थे और उनकी ताजगी ने उसे आगामी रूपरेखा बनाने में सहायता की.

"वो वाले रिक्शे के पीछे लगाए रखियो गाड़ी ... और सुन ... " गला खंखारते हुए परमौत ने रिक्शेवाले को हिदायत दी - "इत्ती दूरी बनाए रखियो कि वो हमको ना देख पावें." रिक्शेवालों से बात करते समय वह शाहजहाँपुर-बरेली का लहज़ा अपना लेता था क्योंकि एक तो उसे ऐसा करना अच्छा लगता था दूसरे हल्द्वानी के ज़्यादातर रिक्शेवाले इन्हीं दो शहरों से आते थे.

इस दूसरी हिदायत के बाद रिक्शेवाले ने पैडल ऐसे मारने शुरू किये जैसे वह किसी गुप्त मिशन पर निकले जेम्स बांड का सहायक हो.

"जी बाबूजी ..." कहकर रिक्शेवाले ने सीटी बजाते हुए उस पर 'कभी आर कभी पार' बजाना शुरू कर दिया. परमौत की निगाहें पिरिया के रिक्शे पर लगी हुई थीं. उनके बीच अब करीब बीस मीटर का सुविधाजनक फासला था.

"बस ऐसेई रखियो ... और ये सीटी बजाना बंद कर ... पूजापाठ के टैम पर सीटी बजागा तो ज़िन्दगी भर रिक्शा खेंचता रै जागा भैए ..."

पिरिया का रिक्शा बाज़ार से होता हुआ में चौराहे से रामपुर रोड की तरफ मुड़ा थोड़ा आगे जाने के बाद एक गली में प्रविष्ट हो गया. परमौत ने रिक्शेवाले को रोका, पैसे दिए और उतर गया.

"भीतर ठीक से जइयो बाबूजी ... पूजापाठ का टैम हैगा ... " तेज़ी से वापस लौट रहे रिक्शेवाले ने काइयां हंसी हँसते हुए परमौत को ताना मारा और लक्ष्मी वाले मोड़ पर मुड़ता हुआ ओझल हो गया.

परमौत तय नहीं कर पा रहा था कि गली के भीतर जाए या नहीं. कहीं पिरिया ने उसे देख लिया तो. "देख लिया तो देख लिया साला" - उसके अन्दर से आवाज़ आई और वह अन्दर चला गया. वह दबे पाँव अंधेरी गली में घुसा तो उसने पाया आठवें-दसवें मकान के बाहर रिक्शा खड़ा था. वह एक मकान के बाहर खड़ा किये गए चाट के ठेले की ओट में हो गया. पिरिया और लम्बू कुछ बातें कर रहे थे और पिरिया अपने बटुए से पैसे निकालकर रिक्शेवाले को दे रही थी. मकान के भीतर लाईट जल चुकी थी और खड़खड़ करता लोहे का शटर खोला जा रहा था. शटर खोला गया. पिरिया और अमिताब मय बैगों के भीतर घुसे. कोई हंगामा नहीं हुआ. कुछ भी ऐसा अप्रत्याशित नहीं हुआ जो चीज़ों की असामान्य स्थिति की तरफ इशारा करता.

परमौत पशोपेश में था कि पिरिया का रिक्शेवाला उसकी बगल में आकर ठिठका और उसे गौर से देखकर इत्मीनान जैसा करने की कोशिश करने लगा कि वह कोई चोर तो नहीं.

"रोडवेज चल्लिया?" परमौत ने अचानक पूछ कर रिक्शेवाले को हकबका दिया.

मुख्य चौराहे पर पहुंचकर परमौत ने रिक्शेवाले को बजाय रोडवेज जाने के अपने घर की तरफ मुड़ने को कहा. उसके भीतर अमिताब लम्बू और पिरिया को लेकर भयानक उथलपुथल चल रही थी और वह अचानक बहुत ज्यादा थक गया. उसे नींद आ रही थी. पिछले दरवाज़े से बिना आवाज़ किये वह अपने कमरे में घुसा और किसी कटे पेड़ जैसा बिस्तर पर गिरा और दोपहर तक सोता रहा.

दो बजे भाभी ने दरवाज़ा खटखटाकर उसे जगाया और बताया कि कोई बिष्ट नाम का आदमी उससे मिलने आया है. आँखें मलते हुए परमौत को पिछली रात का समूचा घटनाक्रम याद आने लगा और वह झटके में उठ कर बीच के बरामदे की तरफ चल दिया जहाँ कोई उसका इंतज़ार कर रहा था. बिष्ट गिरधारी लम्बू निकला जो उसे देखते ही मुदित होकर पहले तो उसके गले से लगा लेकिन उसके मुंह से आ रही शराब की बचीखुची बास के कारण तुरंत अलग हो गया.

"परमौद्दा ... काम हो गया यार ददा! ..." गिरधारी ने चोरों की तरह इधर उधर देखते हुए फुसफुसाकर कहा.   

"कौन सा काम यार गिरधारी बाबू?"

"अरे भूल गया परमौद्दा! फोटुक नईं चइये थी तुज्को! ..." उसने फिर से चारों तरफ निगाह डाली और परमौत के कान में कहा - "भाबी की फोटुक कै रा हूँ यार. ले आया साले को बड़ी मुश्किल से यार ..."

"हैं ..." परमौत की आँखें अचम्भे में खुली रह गईं जब गिरधारी लम्बू ने उसके हाथ में बाकायदा एक छोटा सा लिफाफा थमाया.

"एडमीसन फॉरम में दो लगी थीं. भाबी की दोनों फोटुक उचेड़ लाया यार परमौद्दा ... अब तैयार होकर जल्दी बाहर चल तो ... तुज्को कुछ बताना है ..."     


(जारी)

Wednesday, March 15, 2017

हिज़ नेम इज़ एन्थनी गोंसाल्वेस

7 अगस्त 2014 को यह पोस्ट इरफ़ान ने अपने ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई पर लगाई थी. आज एक चैनल पर 'अमर अकबर एन्थनी' का वह गाना चल रहा था जिसने मुझे इस पोस्ट की याद दिलाई. इरफ़ान से पूछे बिना इसे यहाँ जस का तस लगाए दे रहा हूँ ताकि आप भी खुद से कम से एक बार तो अवश्य पूछें कि आखिर कौन था ये शख्स जिसका नाम एन्थनी गोंसाल्वेस था.

एन्थनी गोंसाल्वेस पर उपलब्ध कुछ लेख-साक्षात्कार वगैरह पढ़ रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ जल्द ही उन पर एक पोस्ट लिख सकूंगा.

युवा एन्थनी गोंसाल्वेस (1927-18 जनवरी 2012)

मत हंसो... कि तुम्हारी हंसी से कोई हारता है

- सैयद मोहम्मद इरफ़ान

प्यारे लाल शर्मा (लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल) भले ही यह कहें कि उन्होंने अपने गुरु एंथनी गोंसाल्वेस के प्रति कृतज्ञता स्वरूप एक सस्ते से गाने में अपने गुरू का नाम डलवाया लेकिन बात कुछ जंचती नहीं है.

दिल पर हाथ रखकर कहिये कि तुलसीदास के शिष्य ने ऐसी कोई श्रंद्धांजलि उन्हें दी होती तो क्या आपको मंज़ूर होता? रवींद्रनाथ टैगोर को 'माय नेम इस रवींद्रनाथ टैगोर' कहकर एक बड़े से दुर्गापूजा पंडाल से बाहर आता देखना कैसा लगता? अज्ञेय के लिये ये बात शायद माक़ूल होती लेकिन तब वात्स्यायन की चटपटी पहचान में भी वह खटकती.

जो लोग भी अमर अकबर एंथनी की कहानी और उसमें आए इस गाने से परिचित हैं जिसमें एंथनी गोंसाल्वेस का नाम लिया गया, क्या वो कह सकते हैं कि उन्हें इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के 37 साल बाद भी एक स्वप्नदर्शी कम्पोज़र-अरेंजर एंथनी गोंसाल्वेस के बारे वैसा कुछ मालूम हो सका जिसके वो हक़दार हैं?

वैसे तो एंथनी गोंसाल्वेस के शिष्य आर डी बर्मन भी थे लेकिन प्यारेलाल जैसा ओछा फ़ैसला उन्होंने नहीं लिया. पिछ्ले 9 वर्षों में मैं अपने मन को आश्वस्त नहीं कर सका हूं कि माय नेम इज़ एंथनी गोंसाल्वेज़ ... गाने ने मशहूर गोवानी म्यूज़ीशियन, विलक्षण अरेंजर एंथनी गोंसाल्वेस को इस पॉपुलर प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिये संगीत प्रेमियों से परिचित कराया.

इसके उलट मेरा मानना है कि इस गाने को सुनते हुए ख़ुद एंथनी गोंसाल्वेस उस फ़िल्म म्यूज़िक की तरफ़ पीठ ही फेरते गये (इस गाने को उन्होंने 35 साल तक झेला होगा) जिससे उन्होंने अपना न सिर्फ़ करियर शुरू किया था बल्कि जिस अद्भुत संगीत संसार में उन्होंने मुंबई में भारतीय और पश्चिमी संगीत के अंतर्घुलन की भव्य प्रस्तुतियां कर दिखाई थीं.

मैं यह भी मानता हूं कि बजाय कोई जिज्ञासा जगाने के, यह गीत एक 'वास्तविक' आदमी को 'फ़िक्शनल' ही सिद्ध करता गया. कोई अगर एंथनी गोंसाल्वेस के ब्रेनचाइल्ड सिम्फ़नी ऑर्केस्ट्रा ऑफ़ इंडिया के उन ब्रोशर्स को देखे जिनमें उन्होंने क़रीब डेढ सौ भारतीय और विदेशी वाद्यों के साथ अपनी प्रस्तुतियां की थीं तो दांतों तले उंगलियां दबाएगा.


यहां एक और बात मेरे ज़ेहन में आती है, जितना मैं अमिताभ बच्चन को जानता हूं, कि अगर उन्हें यह मालूम होता कि जिस आदमी को उस गीत का खिलंदड़ हिस्सा बनाया जा रहा है, वो कितने सम्मान का हक़दार है, तो शायद वो प्यारेलाल की इस सायास और आनंद बख़्शी की इस लापरवाह स्कीम का हिस्सा न बनते.


तो सवाल ये है कि 2 साल पहले तक जीवित रहे इस भारतीय नागरिक और संगीत के चितेरे के साथ हम सब ने मिलकर यह मज़ाक़ क्यों किया?