Saturday, October 25, 2014

ज़ोया फ़्रोलोआ के चित्र

१९५३ में यूक्रेन के खारोव में जन्मीं ज़ोया फ़्रोलोआ ने १९७६ में खारोव स्टेट एकेडमी ऑफ़ आर्ट एंड डिजाइन से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी. वे फिलहाल न्यूयॉर्क में रहती हैं.

















मैं ने बेवफ़ाई की है तुम से ठीक उसी तरह जैसे करते हैं प्रेमी एक दूसरे के साथ - नीलाभ की प्रेम कविताओं की सीरीज -२



(जारी)

अन्तरा
( एम. के लिए )

-नीलाभ

६.

मैंने तुम्हें प्यार किया जैसे किसी को किसी ने पहले कभी
प्यार नहीं किया, मैं ने तुम्हें प्यार किया जैसे कोई किसी को
प्यार कर सकता है, लेकिन मैं तुम से कभी
यह स्वीकार नहीं करूंगा, क़रा कूज़, मैं ने तुम्हें ऐसे प्यार किया है
जैसे तुम इस दुनिया में क़दम रखने वाली
पहली औरत हो,
मैं ने तुम्हें गढ़ा मौत से अपना प्रतिशोध लेने के लिए,
तुम सदानीरा हो मेरी, मेरे अन्तस्तल में
सृष्टि के आरम्भ से बहती हुई,
सहती हुई मेरी सारी उछृंखलताएं,
मिटाती हुईं मेरे तमाम गुनाहों को,
सहज सौंपतीं मुझे अपना विश्वास औत अपनी व्यथाएं,

७.

मैं ने बेवफ़ाई की है तुम से ठीक उसी तरह जैसे करते हैं
प्रेमी एक दूसरे के साथ,
तुम्हारा आहत चेहरा कचोटता है मुझे नींद के निरापद लोक में,
आत्म-ग्लानि के आत्म-हन्ता शोक में,
क्योंकि पराजय तो है ही, मनु, एक-दूसरे को नष्ट करना....
मैं किसी अशुभ अमंगल धूमकेतु की तरह उदित हुआ था
तुम्हारे नभ में, जलता और जलाता, अपनी अग्नियों में डूबता-उतराता,
भरता आशंकाएं और भय प्रियजनों के मन में,
जाने किस परिक्रमा-पथ पर बढ़ा जाता अपनी बेलगाम
गति में, छोड़्ता हुआ अपने पीछे
चिनगारियां और ज्वालाएं....

८.

मैं ने सोचा था मैं चला जाऊंगा किसी दूसरे देश को,
जहां होंगे दूसरे क्षितिज, दूसरी सीमाएं, दूसरे लोग,
मैं ने सोचा था मैं चला जाऊंगा
दूसरी सुबहों, शामों, वनस्पतियों, नदियों और कबीलों के बीच,
मैंने सोचा था मैं चला जाऊंगा सप्तर्षियों के आगे,
मृगशिरा के पार, ऐल्फ़ा सेन्टौरी और विशाखा के परे,
किसी दूसरी मन्दाकिनी के छोर पर,
किसी दूसरी नीहारिका में आकार ले रहे किसी दूसरे सौर मण्डल में
रचूंगा नयी सृष्टि,
नयी वनस्पतियां, प्रजातियां, पर्वत, नदियां, मैंने सोचा था
रच दूंगा नये दिन-रात, नयी ऋतुएं, नयी दिशाएं, पवन, नये सागर
और नये पाप, अभिशाप, नये शमन और नयी क्षमाएं
और मैंने सोचा था अन्तरिक्ष के उस छोर पर
अपनी रची हुई सृष्टि के बीच मैं
अपनी अभिशप्त घुमक्कड़ी से अवकाश ले कर
प्रतीक्षा करूंगा तुम्हारी, अन्तहीन कल्पान्तरों तक....

९.

अपने संसार से कलह, मनु , मेरा शौक़ नहीं मजबूरी थी,
मेरी वहशत और मेरे इश्क़ के बीच,
मेरे फ़र्ज़ और मेरी चाहत के बीच
नक्षत्रों जितनी दूरी थी; मैं घिरा हुआ था
श्रम के सफ़ेद्पोश तस्करों से, ताक़त के बेरहम मस्ख़रों से,
मैंने रचा था यह संसार
अपनी अनुकृति में, तुम चाहो तो इसे प्रतिसंसार कह लो,
एक दर्पण बनाया था मैं ने, जो दिखाये मुझे मेरी छवियां
हू-ब-हू जैसी वे नज़र आती हैं दूसरों को,
कलंकों और कालिमा के साथ,
नश्वर था यह संसार उतना ही जितना नश्वर था मैं
बार-बार सहता काल के प्रहार मेरा रचा संसार
सहता रहा मैं भी बार-बार प्रहार समय के,
मरता हुआ करोड़ों-अरबों मौतें
हर पत्ती जो पीली हो कर गिरी,
हर शरीर जो झुर्रियों से लद कर धराशायी हुआ
हर प्राण जो विलीन हुआ वायु में
मेरा ही प्रतिरूप था
लेता हुआ करोड़ों-अरबों बार करोड़ों-अरबों रूपों में जन्म....

१०.

कठिन थी यह डगर जिस पर वर्षों पहले मैंने
शुरू किया था सफ़र साधारण को असाधारण में
बदल देने का संकल्प ले कर
सोचा था मैंने जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे
छंटती चली जायेगी
राह पर तारिका धूलि की तरह बिख्ररी हुई धुन्ध,
सूर्य की किरणों पर तैरते धूल के कणों की तरह
हलके हो जायेंगे शब्द,
जब हम कहेंगे प्रेम, असंख्य दरवाज़े खुल जायेंगे
मैं खोलूंगा किवाड़ और उषा दाख़िल होगी सुनहरे पैरों पर

तुम्हारी तरह....

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद


अभी अभी मेल पर हमारे पुरातन कबाड़ी आशुतोष उपाध्याय ने एक शानदार पीस भेजा है. बावजूद इस बात के कि अभी अभी बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब का इंटरव्यू पोस्ट किया है, मैं इसे यहाँ तुरंत जगह देने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा –

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद

स्वामी विवेकानंद     :  मैं समय नहीं निकाल पाता. जीवन आप-धापी से भर गया है.

रामकृष्ण परमहंस   :  गतिविधियां तुम्हें घेरे रखती हैं. लेकिन उत्पादकता आजाद करती है.

स्वामी विवेकानंद     :  आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया है?    
      
रामकृष्ण परमहंस   :  जीवन का विश्लेषण करना बंद कर दो. यह इसे जटिल बना देता है. जीवन को सिर्फ जिओ.

स्वामी विवेकानंद     :  फिर हम हमेशा दुखी क्यों रहते हैं?    
    
रामकृष्ण परमहंस   :  परेशान होना तुम्हारी आदत बन गयी है. इसी वजह से तुम खुश नहीं रह पाते.

स्वामी विवेकानंद     :  अच्छे लोग हमेशा दुःख क्यों पाते हैं?

रामकृष्ण परमहंस   :  हीरा रगड़े जाने पर ही चमकता है. सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता है. अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं. इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता है, बेकार नहीं होता.

स्वामी विवेकानंद     :  आपका मतलब है कि ऐसा अनुभव उपयोगी होता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हां. हर लिहाज से अनुभव एक कठोर शिक्षक की तरह है. पहले वह परीक्षा लेता है और फिर सीख देता है.

स्वामी विवेकानंद     :  समस्याओं से घिरे रहने के कारण, हम जान ही नहीं पाते कि किधर जा रहे हैं...

रामकृष्ण परमहंस   :  अगर तुम अपने बाहर झांकोगे तो जान नहीं पाओगे कि कहां जा रहे हो. अपने भीतर झांको. आखें दृष्टि देती हैं. हृदय राह दिखाता है.

स्वामी विवेकानंद     :  क्या असफलता सही राह पर चलने से ज्यादा कष्टकारी है?

रामकृष्ण परमहंस   :  सफलता वह पैमाना है जो दूसरे लोग तय करते हैं. संतुष्टि का पैमाना तुम खुद तय करते हो.

स्वामी विवेकानंद     :  कठिन समय में कोई अपना उत्साह कैसे बनाए रख सकता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हमेशा इस बात पर ध्यान दो कि तुम अब तक कितना चल पाए, बजाय इसके कि अभी और कितना चलना बाकी है. जो कुछ पाया है, हमेशा उसे गिनो; जो हासिल न हो सका उसे नहीं.

स्वामी विवेकानंद     :  लोगों की कौन सी बात आपको हैरान करती है?

रामकृष्ण परमहंस   :  जब भी वे कष्ट में होते हैं तो पूछते हैं, "मैं ही क्यों?" जब वे खुशियों में डूबे रहते हैं तो कभी नहीं सोचते, "मैं ही क्यों?"

स्वामी विवेकानंद     :  मैं अपने जीवन से सर्वोत्तम कैसे हासिल कर सकता हूँ?

रामकृष्ण परमहंस   :  बिना किसी अफ़सोस के अपने अतीत का सामना करो. पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने वर्तमान को संभालो. निडर होकर अपने भविष्य की तैयारी करो.

स्वामी विवेकानंद     :  एक आखिरी सवाल. कभी-कभी मुझे  लगता है कि मेरी प्रार्थनाएं बेकार जा रही हैं.

रामकृष्ण परमहंस   :  कोई भी प्रार्थना बेकार नहीं जाती. अपनी आस्था बनाए रखो और डर को परे रखो. जीवन एक रहस्य है जिसे तुम्हें खोजना है. यह कोई समस्या नहीं जिसे तुम्हें सुलझाना है. मेरा विश्वास करो- अगर तुम यह जान जाओ कि जीना कैसे है तो जीवन सचमुच बेहद आश्चर्यजनक है.
(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)


बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब का साक्षात्कार - उम्दा कबाड़


उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब का एक दुर्लभ साक्षात्कार-

मैं एक गौरैया हूँ भूसे की बनी सपना देखती हुई मछली का - माज़ेन मारूफ़ की कवितायें – ९


एक कुलीन माफ़िया

- माज़ेन मारूफ़

मैं भटकता हूँ
जीवन के नाले में
किसी पुराने तिरपाल के थैले की तरह लिए अपनी स्मृति,
टपकते हुए फ़रिश्ते
जिन्हें मैंने जमा किया बीते समय में.
छोड़ आता हुआ अपने होंठ धातु के एक प्याले में
एक बूढ़े के लिए
किसी मरे हुए लकड़ी के कुंदे की तरह
और मैं एक गौरैया हूँ भूसे की बनी
सपना देखती हुई मछली का,
लेकिन वह भारी ठेलागाड़ी
जो लादे लाती है आंसू  
किसी और दफ़ा मेरे गालों पर से
दौड़ती हुई
बिना ब्रेक के.
वह कॉकरोच जिसे मैंने दो दिन दिए थे
मरने के लिए
वह घंटों पहले पड़ा रहा अपनी पीठ पर
थोड़ा सा उठाता हुआ अपना सिर
आसमान की तरफ़,
शायद वह फुसफुसाना चाहता था कोई बात फरिश्तों से
मैं उसे लेकर जाऊँगा खुले में
उसके सामने अपने विशाल आकार से
मंत्रमुग्ध
उसके बाद
मैं उसे टांग दूंगा ठेलागाड़ी के पीछे
उसके प्रेमी को
देकर एक चुम्बन
और फिर मैं लौट आऊँगा
एक कुलीन माफिया की तरह
जिसने अभी अभी ख़त्म किया है अपने दुश्मनों को
और जो सपना देख रहा है
मछली का.

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