Friday, July 25, 2014

अमीरख़ानी गायकी की बौछारों से भीगा तराना


उस्त्ताद अमीर ख़ाँ साहब को लेकर हम इन्दौर वाले कुछ ज़्यादा ही भावुक होते हैं.हों भी क्यों नहीं ? उस्तादजी की वजह से ही पूरे देश में इन्दौर को क्लासिकल मौसीक़ी परिदृश्य पर एक ख़ास पहचान हासिल है. जब आप उनका गाया प्ले करें तो बस सुनो और सुनते जाओ.गरज़ ये कि आपके मन-मानस में अभी तक का सारा सफ़ा कर देगा और ख़ाँ साहब का अभी अभी गाया हुआ तारी हो जाएगा. मेघ के तराने को भी जिस तसल्ली और रूहानियत से ख़ाँ साहब ने बरता है वह बस महसूस करने की चीज़ है.न कोई गिमिक्स हैं और न ही द्रुत की ऐसी हरक़ते जो सुनने वाले को खरज से भरी गायकी से महरूम करे.
एक दरवेश की भाँति सुरों की इबादत करता ये अनूठा गायक हम सबको ऐसे लोक में ले जाता है जहाँ तानॊं की मुसलसल बौछारें हैं... आपके बस में है ही क्या सिवा इसके कि आप उनकी मेरूखण्ड गायकी के शैदाई हो जाएँ.इस बार मालवा का सावन देरी से भीगा है लेकिन मेघ में भीगा ये तराना आपको तरबतर कर देगा.सुनिये....अति विलम्बित गायकी का ये शहंशाह किराना घराना,उस्ताद रजब अली ख़ाँ और उस्ताद अब्दुल वहीद ख़ाँ ( बेहरे) के आस्तानों पर सलाम करता हुआ हमें किस क़दर मालामाल कर रहा है. 

Tuesday, July 15, 2014

हमारे समय का एक बेहद ज़रूरी उपन्यास


हमारे समय का एक बेहद ज़रूरी उपन्यास

-प्रणय कृष्ण

अस्थिर, अनिश्चित, आशंकाग्रस्त और संक्रमणशील समयों में उपन्यास विधा अपनी लचीली, परिधिहीन काया से ऐसी विक्षोभकारी कृतियाँ फेंकने में सर्वाधिक समर्थ होती है जो अपनी अनेकस्वरता में ऐसे समयों की जटिलता को खोल कर रख देने में सक्षम होती हैं. भारत के भूमंडलीकरण के समय को उसकी तमाम जटिलताओं में समग्रतः उपस्थित करता रणेंद्र का 'गायब होता देश' शीर्षक उपन्यास लिखा तो काफी पहले से जा रहा होगा, लेकिन उसके प्रकाशित होने का समय इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता था. अभी अभी तो भारत के आम चुनाव गुज़रे हैं जिसमें पूंजी के जादूगरों ने 'विकास' की ऐसी रेशमी चादर तानी जिसने मतदाताओं की नज़रें बाँध लीं. देखते-देखते 'विकास' की यह जादुई चादर एक लबादे में बदल गई जिसे सिर्फ एक आदमी ने पहन लिया. पूंजी के सभी जादूगर एक ही काया में समा गए. इस 'विकास' के तिलिस्म को तोड़ता, कारपोरेट जादूगरी को औपन्यासिक जादू से काटता यह उपन्यास हमारे समय की ज़रुरत है. पूंजी-प्रतिष्ठान ने देश, समय और समाज का जैसा आख्यान रचा है, 'गायब होता देश' उपन्यास उसका प्रति-आख्यान है, मूल्य, विचार, ज्ञानशास्त्र, अनुभव व भाव संपदा, संस्कृति और राजनीति, हर स्तर पर. उपन्यास के पूर्वकथन में ही इस प्रति-आख्यान की झलक दे दी गई है, " उसने बंदरगाह बनाने , रेल की पटरियां बिछाने , फर्नीचर बनाने , मकान बनाने के लिए अंधाधुंध कटाई शुरू की. मरांग-बुरु-बोंगा की छाती की हर अमूल्य निधि, धातु-अयस्क उसे आज ही, अभी ही चाहिए था.....वे दौड़ में अपनी परछाइयों से प्रतिद्वंद्विता कर रहे थे.... इन्हीं ज़रुरत से ज़्यादा समझदार इंसानों की अंधाधुंध उड़ान के उठे गुबार-बवंडर में सोना लेकन दिसुम गायब होता जा रहा था. सरना-वनस्पति जगत गायब हुआ, मरांग-बुरु-बोंगा, पहाड़ देवता गायब हुए, गीत गानेवाली, धीमे बहनेवाली, सोने की चमक बिखेरने वाली, हीरों से भरी सारी नदियाँ जिनमें इकिर बोंगा-जल देवता का वास था, गायब हो गयीं. मुंडाओं के बेटे -बेटियाँ भी गायब होने शुरू हो गए. सोना लेकन दिसुम गायब होनेवाले देश में तब्दील हो गया."

हमारी समझ से उपन्यास से अधिक उपयुक्त कोई अन्य विधा भी नहीं है जो इस मायावी समय को भेद कर सच तक पाठकों को पहुंचा सके. लेकिन ध्यान से पढ़ें, तो इस उपन्यास के कूल-कगार कविताओं और लोकगीतों से बने हैं. ५१ प्रकरणों में से अनेक न केवल कविता-पंक्तियों से शुरू होते हैं, बल्कि बीच- बीच में दुःख, प्रेम और प्रकृति के सघन काव्यात्मक वर्णन व विवरण उपन्यास के 'देश-राग' को गद्य-पद्यमय बनाते हैं. उपन्यास की संवेदना भूमि बहुत आदिम और भविष्य की सुदूर झिलमिलाहट के छोरों को, स्मृति और स्वप्न को कठिन-कठोर वर्त्तमान के रक्तरंजित यथार्थ से मिलाने में गद्य-पद्यमय हुई जाती है. जिस विकल्प या प्रति-संसार को रचना उपन्यास का संवेदनात्मक उद्देश्य है, उसे पूर्णतः यथार्थ बनने और मूर्त होने में क्रम में स्मृति और स्वप्न से भी सामग्री संजोते चले जाना है. उपन्यास का बहुत सा घटना-प्रवाह जिस लोकजीवन (मुंडारी और मैथिल) से गुज़रता है, उसकी फितरत है कड़े से कड़े दर्द को भी, प्रतिहिंसा तक को गीत में ढाल देना.

उपन्यास के शीर्षक और उसके आखिरी घटना-सत्य में एक ज़बरदस्त द्वंद्व है. शीर्षक में जो 'गायब होता देश' है, उपन्यास का अंत होते-होते, वही अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए लड़ता हुआ, बल्कि छोटी- छोटी ही सही, जीत हासिल करता हुआ देश है. संभव है कि आज उसका 'गायब होते जाना' प्रबलतर सच्चाई हो, लेकिन उसका लड़ते हुए आगे बढ़ना भी एक सच है जिसे संगठित होता जाना है. वैसे इस शीर्षक की एक ऐतिहासिक-मिथकीय संगति भी है- 'लेमुरिया' द्वीप से 'कोकराह' तक. 

सत्ता की वैचारिक मशीनरी सच्चाई को इस कदर खण्डित और विकृत कर, मुनाफे की अकूत कमीनी कामना को ढँकने वाले चमकदार संयोजनों में प्रबल वेग से प्रतिक्षण हमारी चेतना पर फेंकती रहती है कि इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में आम इंसान का हार जाना ही स्वाभाविक लगता है. जिस तरह भूमंडलीकृत भारत में मुनाफे की ताकतें खेत, खदान, जंगल, ज़मीन, जलस्रोत, खनिज और उन पर निर्भर आबादी का प्रतिक्षण आखेट कर रही हैं, ठीक उसी तरह सच का आखेट भी एक राष्ट्रव्यापी उद्योग है. सूचना और संचार क्रांति के रथ पर सवार मीडिया को गहराई से देखें तो समझना मुश्किल नहीं है कि सत्य का मुख स्वर्ण से क्यों ढँका हुआ है. एक उपन्यासकार के रूप में रणेंद्र दोहरी चुनौती स्वीकार करते हैं- एक तो 'मनुष्य' की जगह 'मुनाफे' को केंद्र करके भीषण वेग से चल रहे भविष्यहीन, रोज़गारविहीन, खोखले, परजीवी और निर्दयी विकास की आंधी में 'गायब होते देश' के तड़पते हुए सच को प्रत्यक्ष करना , तो दूसरी ओर इस सच को छिपाने में लगे, उस के इर्द-गिर्द सम्मोहन का जाल रचनेवाले बौद्धिक-वैदुषिक और सर्वाधिक सक्रिय मीडिया-तंत्र की कार्य-प्रणाली को प्रत्यक्ष करना. अन्य सांस्कृतिक- वैचारिक उद्देश्यों के अलावा इस दोहरी चुनौती ने ही उपन्यास की बनावट और बुनावट को आकार दिया है. अकारण नहीं है कि उपन्यास के घटनाक्रम के अनेक नरेटरों द्वारा भिन्न-भिन्न शैलियों में सुनाए गए - समय में आगे-पीछे आते जाते घटनाक्रम को जोड़नेवाला चीफ ( या आख़िरी!) - नरेटर एक पत्रकार ही है. किशन विद्रोही सहित उपन्यास के कई अहम किरदार इस मीडिया जगत से ताल्लुक रखते हैं. हर नरेटर साथ ही साथ उपन्यास का किरदार भी है. इसलिए कोई भी एक नैरेटर अपने ही दृष्टि-पथ में आने वाले यथार्थ और अनुभव को जानता और बताता है. उपन्यास का पूरा आख्यान इन तमाम आख्यानों और स्वरों की विविधता और पूरकता में ही साकार होता है. उपन्यास अपने संवेदानात्मक उद्देश्य ही नहीं, बल्कि अपनी संरचना में भी लोकतांत्रिक है. उसके नायक अनेक हैं जो जन -संघर्षों से नायकत्व हासिल करते हैं. उपन्यास के अंतिम कवर पर प्रसन्न कुमार चौधरी का वाक्य है (कि उपन्यास में), '...लगभग कोई पात्र एकायामी नहीं है , सभी पात्रों के अपने-अपने ग्रे-शेड्स हैं. " यह तथ्य खुद इंसानों की आतंरिक बहुस्वरीयता और गतिमान यथार्थ के संघात से उनमें आते बदलाव पर उपन्यासकार की माहिर पकड़ की तस्दीक करता है.  उपन्यास अपनी यात्रा में लोकगीतों से लेकर फैज़, नागार्जुन, रेणु, भवानी प्रसाद मिश्र, मजाज़, रामदयाल मुंडा, दिनेश शुक्ल, विनोद कुमार शुक्ल तक विरासत में पाई और हमअसरों में गूंजती लोकतांत्रिक अर्थ-ध्वनियों का गुंफन करता चलता है. इस तरह 'प्रतिरोध' की विरासत की समृद्धि और निरंतरता को जताता है, जाने हुए को फिर से पहचनवाता है.   

'गायब होता देश' हालांकि उपन्यास के प्रत्यक्ष घटनाक्रम की दृष्टि से मुंडाओं का 'कोकराह' क्षेत्र है जहां वे ईसा के सैकड़ों वर्ष पहले आकर बसे, लेकिन जिस कारपोरेट लूट के चलते यह 'सोना लेकन दिसुम' गायब होता जा रहा है, वह शेष भारत और औपनिवेशिक तथा नव-औपनिवेशिक शोषण का शिकार रहे और अभी भी हो रहे देशों का सार्वभौम यथार्थ है, जिसके चलते उपन्यास एक रूपक-कथा बन जाता है - पूंजी के युग की निर्दयी लूट और झूठ तथा उसके प्रतिकार की रूपक-कथा. लेखक इस रूपकात्मकता के प्रति सचेत भी है. वह अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, भारत आदि में औपनिवेशिक लूट और उसके प्रतिरोध, भारत के ख़ास सन्दर्भ में आदिवासी विद्रोहों की लम्बी परम्परा, १८५७ के संग्राम से लेकर मध्य बिहार के क्रांतिकारी किसान आन्दोलन, बोधगया के महंत द्वारा हड़पी जमीन को वापस पाने के संघर्ष तक की तमाम घटनाओं की स्मृति-लताओं को वर्त्तमान के मुख्य-घटनाक्रम में बारीकी से इस तरह पिरोता चलता है कि वे उपन्यास के मूल अर्थ का अंग बन कर उसे व्यापकता और गहराई प्रदान करती हैं. इस उपन्यास में भाषा के अनेक स्तर हैं. मुंडारी, मैथिल, भोजपुरी के वाक्य-विन्यास, कथन भंगिमा, लोकोक्ति, मुहावरे, गीत देश-काल-पात्र-स्थिति के अनुसार खडी बोली में घुसकर उसमें लोच पैदा करते हैं और स्थान-विशेष में घट रहे जीवन-संघर्ष को बगैर सामान्यीकरण किए सार्वभौमता प्रदान करते हैं. खालिस हिन्दुस्तानी (उर्दू) का प्रयोग भी सार्वभौम अनुभव और सम्प्रेषण के इसी उद्देश्य को पूरा करता है.

'गायब होता देश' के रचनाकार रणेंद्र की उपन्यास-यात्रा का समय वही है जिसे सामान्य रूप से भारत के भूमंडलीकरण का समय कहा जाता है. यह उनके उपन्यासों के रचे जाने का भी समय है और उनके उपन्यासों के भीतर बहता समय भी. उनका पहला उपन्यास 'ग्लोबल गाँव के देवता' इसी समय की दास्तान है जिसके केंद्र में 'असुर' जाति है, जैसे कि इस उपन्यास के केंद्र में 'मुंडा' जाति. इन आदिवासी जातियों के जीवन-संघर्ष और जीवन-दर्शन को केंद्र में रखते हुए भी यह उपन्यास बहुत जतन से हमारे युग की भूमंडलीय लूट के केन्द्रीय अंतर्विरोध और संघर्ष के खंडित समाजशास्त्रीय, मानवशास्त्रीय (ऐन्थ्रोपोलोजिकल), प्रशासनिक या निपट वैचारिक भाष्य का अतिक्रमण करके ही उपन्यास बनता है. अकारण नहीं कि सोमेश्वर मुंडा, नीरज पाहन, अनुजा पाहन, सोनामनी दी आदि के दर्द और लड़ाई के साथ अलग-अलग स्तर और सीमा तक साझीदार बने किशन विद्रोही, सुबोध दा, राजेश, कमला, रमा, संजय जायसवाल, अमरेन्द्र, बिट्टू जैसे लोग खुद आदिवासी नहीं हैं, लेकिन विचारधारा, नैतिक द्वंद्व, सामाजिक जिम्मेदारी अथवा स्मृति या आत्मसंघर्ष के अनेक रास्तों से गुज़रकर वे अपना पक्ष ग्रहण करते हैं. दूसरी ओर, उन्हीं आदिवासियों में जन्में साहब-सूबा- डी. डी. सी., ए. डी. एम., ट्रांसपोर्ट, एक्साइज और सप्लाई के अफसर, इंजीनियर, डाक्टर, इन्स्पेक्टर आदि कारपोरेट-जनप्रतिनिधि-माफिया-अफसर-सुरक्षा-तंत्र के लुटेरे गठजोड़ का अंग बन कर जीवन गुज़ार रहे हैं. यह उपन्यास बाहरी तत्वों द्वारा आदिवासी इलाके की भू-संपदा की लूट को उसके संरक्षण के लिए बने कानूनों में बड़े-बड़े छिद्रों का लाभ उठाकर, थाना कचहरी को मिलाकर सवर्ण-सामंती धाक के जोर पर लूट और पूंजी के आदिम संचय की प्रक्रिया से आरम्भ होता है. दूसरी ओर, बड़े बाँध और एनर्जी प्रोजेक्ट के कारण विस्थापित हो रहे लोगों के संघर्ष के दृश्य हैं. 'कोकराह' के इलाके के जल, जंगल, जमीन, खनिज और पर्यावरण की लूट से संपन्न तत्व रियल एस्टेट, माइनिंग, मैनूफैक्चरिंग से लेकर मीडिया तक कारपोरेट जाल बिछाए गोवा, दिल्ली, नार्थ ईस्ट, सिंगापुर,लाइबेरिया,दुबई, फुकेट तक अपने सरमाए का विस्तार करते हैं. यह पूरी प्रक्रिया आपराधिक और सनसनीखेज़ है. उपन्यास पढ़ते हुए कभी मर्डर मिस्ट्री, कभी खोजी पत्रकारिता, कभी क्राइम फिक्शन, कभी लव-स्टोरी और यहाँ तक कि साइंस फिक्शन सा आभास होता है, लेकिन ऐतिहासिक और मिथकीय अनुभूतियाँ, मानवीय संवेदनाओं की गहराइयां, लोकजीवन की साझेदारी की गहन स्मृतियाँ और चाहतें सारी सनसनी को अतिक्रमित करते हुए पाठक को एक गहरे और व्यापक जीवन-विवेक तक उठा ले जाती हैं. अहसास होता है कि हमारे भूमंडलीकृत समय का यथार्थ पाठक के सीमित अनुभव-जगत और कल्पना से कहीं ज़्यादा हैरतअंगेज़ ज़रूर है, लेकिन मानव-जीवन ने अपनी लम्बी विकासयात्रा में जिन सुन्दरतम मूल्यों और सपनों को अर्जित किया है, संजोया है, वे बहुत जिद्दी हैं, सनसनी और हैरत से विमूढ़ या पराभूत होना अंततः उनकी फितरत नहीं है.

यह उपन्यास समय और देश-देशांतर के अनेक संस्तरों में विचरण करता है, ठिठकता और ठहरता है, लेकिन इसीलिए कि अपने समय की आनुवांशिकी की समझ तक पहुँच सके. समय और देश को अनुभव करने और अपनी चेतना में उन्हें प्रत्यक्ष करने का ढंग भी दिकुओं और आदिवासियों का एक जैसा नहीं है. दरोगा वीरेन्द्र प्रताप सिंह, सविता पोद्दार, अशोक पोद्दार, जेम्स मिल, राणा, नरेश शर्मा, नवल पांडे, कोकिला बैनर्जी, कैथरीन,जेम्स मिल आदि लुटेरों की टोली का देश और काल का तसव्वुर वही नहीं है जो सोमेश्वर मुंडा, नीरज पाहन, अनुजा पाहन, सोनामनी दी का है.

२१वी सदी के हिन्दी उपन्यासों में संजीव का 'रह गयीं दिशाएं इसी पार' के बाद 'गायब होता देश' ही उत्तर-पूंजी के इस युग में कार्पोरेट मुनाफे के तंत्र द्वारा विज्ञान के सर्वातिशायी अपराधीकरण की परिघटना को सामने लाता है. सोमेश्वर मुंडा अपने पुरखों के इतिहास और ज्ञान-विज्ञान की लुप्त विरासत के पुनराविष्कार के क्रम में जो वैज्ञानिक अध्ययन करते हैं, उन्हें चुराकर रोजालिन मिल और उससे हथियाकर जेम्स मिल उन्हें आदिवासियों के संहार की कीमत पर अमीरों के अमरत्व की तकनीक में बदलने की कोशिश करता है, वह इस 'नालेज सोसायटी' में ज्ञान की अमानुषिक लूट और विज्ञान के अपराधीकरण का अद्भुत किस्सा है. इस युग में सफल और बलशाली लुटेरों की शाश्वत अपराजेयता और अमरत्व के साधन के रूप में विज्ञान की नयी दिशा का उदघाटन उपरोक्त दोनों उपन्यासों को बाकी सबसे एकदम ही विशिष्ट बनाता है.

इस उपन्यास में व्यक्त 'सभ्यता-समीक्षा' पर निश्चय ही कहीं अधिक विस्तार के साथ चर्चा की ज़रुरत है, यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि नागरी अक्षर चीन्हने और उनमें बने शब्द और वाक्य समझनेवाले सभी लोगों को इस उपन्यास को ज़रूर ही पढ़ना चाहिए.          

ट्रिक ये है कि आपने सब कुछ जानना चाहिए - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 10


(पिछली क़िस्त के आगे)

कॉनी हाम – दर्शकों को बांधे रखने की ट्रिक क्या है.

कादर ख़ान – ट्रिक ये है कि आपने सबको जानना चाहिए. आपने सब कुछ जानना चाहिए. आपको हरफनमौला होना होता है. अगर आप एक बढ़ई हैं तो आपको सबसे अच्छी लकड़ी छांटना आना चाहिए, उसे सलीके से काटना आना चाहिए, उसने सारी उपलब्ध स्पेस को घेरना चाहिए, और डिजाइन भी उम्दा होना होगा. डिजाइनिंग और एकोमोडेशन – ये हैं स्क्रिप्ट लेखन के उपकरण. कभी कभी आप सब कुछ अकोमोडेट करना चाहते हैं और वह किसी बक्से जैसा दिखने लगता है. चीज़ का अच्छा दिखना भी ज़रूरी है.

कॉनी हाम – आपको कैसे पता लगता है कि आपने सही लाइन लिखी है?

कादर ख़ान – प्रतिक्रिया के बाद. कभी कभी ऑडीटोरियम में आपको ऐसी लाइनों पर प्रतिक्रियाएं सुनने को मिल जाती हैं कि उनके बारे में आपने कभी सोचा तक नहीं होता. और कई बार जब आपको लगता है कि ये लाइन दर्शकों में धमाल मचा देगी तो कुछ होता ही नहीं. तीन तरह की प्रतिक्रियाएं होती हैं.  पहली आपकी प्रतिक्रिया, दूसरी डायरेक्टर की और तीसरी ऑडीएन्स की. तीन प्रतिक्रियाओं के अपने अपने इलाके होते हैं, तीन मुख्तलिफ ज़खीरे होते हैं. आपने तीनों ज़खीरों की सैर करना होती है. यह एक काल्पनिक संसार होता है.

मानवीय वाणी


मैंने थियेटर से क्या सीखा? – एक अभिनेता के लिए, जब वह स्टेज पर आता है. यही बात सबसे ज़रूरी होनी चाहिए. उसकी एंट्री असाधरण होनी चाहिए. और कुछ आवाजें होनी चाहिए ताकि ऑडीएन्स का दिमाग कहीं और भी लगा रहे. आखिर एक इंसान इंसान ही हो सकता है. तो ऑडीएन्स का ध्यान भटकाया जाना चाहिए. तब जब वह बोलता है, उसका हर शब्द आख़िरी आदमी तक पहुंचना चाहिए. और अभिनेता एक गायक भी होता है. एक गायक अपने गानों के बोल गाता है. अभिनेता अपने डायलॉग्स की पंक्तियों को गाता है. उसको डायलॉग्स की शक्ल में गीत को गाना होता है. उसकी आवाज़ कानों को मीठी लगनी चाहिए. मैंने ये एनालिसिस किया है कि मर्द की आवाज़ में थोड़ी सी गूँज और गरज होनी चाहिए, थोड़ा सा बेस होना चाहिए, थोड़ी सी नेज़ल होनी चाहिए. ये कॉम्बिनेशन जो है , ये साउंड को ऐसा बना देती है जैसे कि किसी गुम्बद के अन्दर कोई घुँघरू गिरा हो. एक गुम्बद की तरह! आप एक घुँघरू गिराते हैं. जो साउंड पैदा होती है और उसकी गूँज, ... वैसी आवाज़ होनी चाहिए जो अभिनेता के मुंह से बाहर निकले.तो जब आप  उस टोन में बोलेंगे तो सुनने वाले मन्त्र मुग्ध हो जाएंगे. तब वे आपकी परफॉरमेंस के बारे में भूल जाएंगे क्योंकि शब्द बड़ी ताकतवर चीज़ है. और अगर एक्टर के बोलने में डायलाग डिलीवरी में ताकत है तो वह दर्शकों को अपनी आवाज़ से बाँध सकता है. और अगर उसके पास अच्छी भाव भंगिमाएं हैं, चेहरे का अच्छा एक्सप्रेशन है और स्टाइल भी है, तो वह तमाम ऑडीएन्स को अपने घर ले के जा सकता है.     

Monday, July 14, 2014

इसे जानकर किसी भी नागरिक का सर शर्म से झुक जाएगा

अग्रज कवि और शानदार कवि-अध्येता जनाब असद ज़ैदी ने मेरी फेसबुक वॉल पर यह जानकारी निम्नलिखित टिप्पणी के साथ शेयर की है. बात शर्म की है और आप कम से कम अपने अपने स्तर परअपना विरोध तो दर्ज करवा ही सकते हैं.

महरुद्दीन ख़ाँ मेरे पुराने दोस्त हैं. वह मशहूर लेखक हैं और काफ़ी समय तक (राजेन्द्र माथुर काल से) नवभारत टाइम्स में ग्रामीण मामलों के सम्पादक भी रह चुके हैं. उनके साथ जो बीत रही है उसे जानकर किसी भी नागरिक का सर शर्म से झुक जाएगा. कृपया इसे पढ़ें और जो कुछ कर सकते हैं करें.” – असद ज़ैदी

महरुद्दीन ख़ाँ 
काफी सोच विचार के बाद तय किया कि जो हमारे परिवार के साथ हो रहा है सब लिख ही दिया जाए. अब लग यही रहा है की गांव छोड़ना ही पड़ेगा क्योंकि गांव के कुछ साम्प्रदायिक और अपराधी तत्वों ने घोषणा कर दी है कि उन्हें इस गांव में मुसमान का रहना पसंद नहीं. पहले ये लोग छेड़ छाड़ करते रहते थे तो गांव के लोग इन्हें डांट देते थे. दो साल पहले इनके लीडर संजय ने छोटे भाई पर गोली चला दी. गांव के लोगों ने ये मामला भी फैसला कर दिया और गारंटी ली कि भविष्य में कुछ नहीं होगा. सब ठीक चल रहा था कि पहली जुलाई को संजय और उसके साथी ने मेरे बड़े भाई के लड़के को दो गोलियां मार दीं जो ग़ाज़ियाबाद के यशोदा अस्पताल में ज़िंदगी के लिए संघर्ष कर रहा है . हम तीन भाइयों का परिवार भयभीत हो गया पुलिस से सुरक्षा मांगी आश्वाशन तो मिला मगर सुरक्षा नहीं मिली. 

सात जुलाई को दादरी थाने जाकर सुरक्षा की गुहार लगाई मगर पुलिस ने कुछ नहीं किया तो बदमाशों के हौसले इतने बुलंद हुए कि इसी दिन तीन बजे बड़े भाई की गोली मार कर हत्या कर दी. मैंने कुछ मित्रों को बताया तो वे भी सक्रिय हुए. श्री शम्भू नाथ शुक्ल ने सक्रियता दिखाई और लखनऊ सम्पर्क किया तो पुलिस ने हमारी सुरक्षा का प्रबंध किया. इसके लिए मै शुक्ल जी का आभारी हूँ. 

इन दोनों घटनाओं की नामजद रपट दर्ज है मगर पुलिस छः नामजद में से किसी को नहीं पकड़ पाई है जिससे परिवार परेशान है. उधर बदमाश धमकी दे रहे हैं की या तो ये लोग गांव छोड़ दें वरना सब को निपटा दिया जायेगा. 

गांव में किसी से हमारी कोई रंजिश कभी नहीं रही.एक पुलिस अधिकारी का कहना है की नौकरी के 15 सालों में ये पहली घटना है कि बिना किसी रंजिश के बदमाश चुप चाप आते हैं और बिना कुछ कहे गोली मार कर चले जाते हैं. 


छह सात बदमाशों के इस गिरोह से अब गॉव वाले भी डरने लगे हैं. अपना दुःख दोस्तों में बाँटने के लिए ये सब लिख दिया वरना तो किसी काम में मन नहीं लगता. जिस गांव के लिए बहुत कुछ किया, जिस गांव के मोह में पड़कर शहर नही गया ,जिस गांव की खातिर कई संकट झेले और जिस गांव का खमीर यहीं खाक करना था अब पता नहीं कब ये गांव छोड़ना पड़ जाए वैसे दो भतीजे गांव से पलायन कर गए हैं. बदमाशों ने अब मेरा और मेरे बेटों का नंबर लगा दिया बताया है. 

अंत में आप सभी से अनुरोध है कि इस मामले में जो भी मदद आप कर सकें अवश्य करें. आभारी हूँगा.

ग़ालिब ने मुझे स्क्रीनप्लेज की सूरत में आइडियाज़ दिए - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 9



लेखन की बाबत

कॉनी हाम – फिल्मों के अपने लेखन के बारे में मुझे कुछ बताइये.

कादर ख़ान – कहानी में उतार चढ़ाव – मनमोहन देसाई उस पर यकीन करते थे. वे मुझे आउटलाइन  दे दिया करते थे जिनके बीच मैंने अपनी पंक्तियाँ फिट करनी होती थीं. और मुझे उनकी इस कमजोरी का पता चल गया था. वे चाहते थे कि डायलॉग्स पर तालियाँ बजें. “तलवार का वार जिसे मार न सके, वो अमर है. आग को जलाकर जो ख़ाक कर डाले वो अकबर है.” तब वे कहते थे “अपुन नईं पब्लिक बोलता है, अनहोनी को जो होनी बना डाल दे, वो एन्थनी है.” इसी तरह के ज़बान पर चढ़ जाने वाले डायलॉग्स. इसी से उन्होंने ‘जॉन, जॉनी जनार्दन’ गाना बनाया था.

तो मुझे मनमोहन देसाई की कमजोरी का पता चल गया था. मैं मनमोहन देसाई को फ्रेम में रखा करता था. उनके घर जाने से पहले ही मुझे उनकी प्रतिक्रिया का पता चल जाता था कि वे मेरी लाइनों पर तालियाँ बजाएंगे या नहीं. वे मेरी ऑडीएन्स थे. और वे ऑडीएन्स की नब्ज़ पकड़ना जानते थे.       

कॉनी हाम मैं आपसे पूछने ही वाली थी कि ऑडीएन्स के बारे में आपकी क्या इमेज थी. सो आपके दिमाग में मनमोहन देसाई रहते थे.

कादर ख़ान – जैसे, मैं नाटक लिखा करता था. मैंने इंटर-कॉलेज ड्रामाटिक प्रतियोगिताएं से शुरू किया था. चौपाटी में भारतीय विद्या भवन के नाम से एक बहुत घटिया नाटक प्रतियोगिता हुआ करती थी. या खुदा, क्या ऑडीएन्स आती थी वहाँ – बेहद खतरनाक. जब भी एक्टर स्टेज पर आता वे कहते थे “आओ.” एक्टर डरने ही वाला होता था जब वे कहते “बैठो” वह बैठ जाया करता. वह फोन का रिसीवर उठता. ऑडीएन्स कहती “हैलो” और यह एक्टर बिना नंबर डायल किये बातें करना शुरू के देता. और तब उसे जुतिया के बाहर कर दिया जाता. तो ऑडीएन्स से मैंने बहुत सारे पाठ सीखे. वह 400 की क्षमता वाला हॉल था. जब मेरा नाटक होता तो 1700 से 1800 लोग आ जाया करते. और मैं उन्हें हर दफ़ा तालियाँ बजाने पर मजबूर कर देता था. मैं उन्हें गैलरी में बैठा देखने की कल्पना किया करता. दस तारीफों के बाद आप ऑडीएन्स को समझ जाते हो. और तब आप उन्हें अपने विचार बताया करते हैं. ऐसा ही लगातार करते जाना होता था. ऑडीएन्स हिल जाया करती थी. उस अनुभव ने मुझे बहुत सिखाया. सो भारतीय विद्या भवन से मैंने अपना फ़ोकस मनमोहन देसाई पर केन्द्रित कर लिया था.     


लेखन और अभिनय के बारे में:

लेखकों ने हमेशा स्केचेज़ बनाने चाहिए. लेखकों ने हमेशा अभिनय करना चाहिए. अधिकतर लेखक रंगमंच से आते हैं. वक्तृता भी अभिनय ही है. जब आप बोलते हैं, आप ऑडीएन्स को जकड़ना शुरू करते हैं. शब्द का चयन, आपकी आवाज़ की लरज़, भावमुद्रा का चयन. यह सब मिलकर अभिनेता को बनाते हैं ... जब हम असल जीवन में झूठ बोल रहे होते हैं हम सब अभिनय करते हैं. उस वक्त हमारे एक्सप्रेशन मेक-अप का काम करते हैं. वह आपके चेहरे को ढांप लेता है.

मंटो के लेखन ने मुझे बहुत प्रेरित किया. मंटो से मैंने यह पाया कि अच्छे ख़याल लाने के लिए आपके पास अच्छे लफ्ज़ होने चाहिए. किसी बड़े आइडिया को नैरेट करने के लिए लोग बड़ी बड़ी शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, जबकि मंटो का मानना था कि आपके आइडिया बड़े होने चाहिए और वाक्य साधारण. और मैंने इसी बात का अनुसरण किया. यही मेरी सफलता का कारण बना. ग़ालिब ने मुझे स्क्रीनप्लेज की सूरत में आइडियाज़ दिए. किसी सीन को लेकर आपके पास कुछ न कुछ कल्पना होनी चाहिए. और वह सब आपको कम शब्दों में बयान कर सकना आना चाहिए. और ये सारे शब्द आपस में जुड़े होने चाहिए ताकि ऑडीएन्स भी उनसे जुड़ी रह सके. अगर आप ऑडीएन्स को अपनी स्क्रिप्ट से बाँध सकते हैं तो आप सफल हैं. यह बांधना ही सबसे मुश्किल होता है.


(जारी)

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