Tuesday, June 30, 2015

स्टिल अलाइव स्टिल एलिस


उसे वह नहीं बनना था जिससे लोगों को भय लगता है और जिसे मिलने से वे कतराने लगते हैं. उसे अपनी बेटी अन्ना के होने वाले बच्चे को गोद में लेकर नानी होने का अहसास करना था. वह चाहती थी उसकी छोटी बेटी लीडिया स्तरीय अभिनेत्री बने. वह चाहती थी पढ़ चुकने लायक न रह सकने से पहले अपनी पसंद की सारी किताबें पढ़ सके.
एलिस हॉलैंड ने अपने जीवन के निर्माण में बहुत श्रम किया है और वह उस पर गर्व करती है. हारवर्ड में पढ़ाने वाली एलिस का पति भी एक सफल व्यक्ति है और उसके बच्चे बड़े हो चुके हैं. जब वह शुरू शुरू में चीज़ों को भूलना शुरू करती है वह इस बात पर ध्यान नहीं देती लेकिन जब वह अपनी पड़ोस में ही खो जाती है, उसे अहसास होता है कि सब कुछ सही नहीं चल रहा. मेडिकल जांच से पता चलता है कि वह अल्ज़ाइमर्स की बीमारी से ग्रस्त है. कुल पचास साल की आयु में.
एक तरफ एक ख्यात शिक्षाविद और प्रोफ़ेसर के रूप में उसकी इमेज संकट में पड़ने लगती है, स्वयं अपने और अपने परिवार के साथ उसे अपने सम्बन्ध को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता पड़ती है.
अपने बीते हुए कल को खो चुकी एलिस की स्मृति एकाध झीने धागों से उसे अपनी ज़िन्दगी से बांधे रहती है. वर्तमान के पलों को भरसक जी लेने का प्रयास करती एलिस अब भी एलिस बनी रहती है.
'स्टिल एलिस' के एक दृश्य में जूलिएन मूर (बाएँ)  
लिसा जेनोआ की किताब ‘स्टिल एलिस’ पर बनी हालिया फिल्म आपको थर्रा कर रख देती है. इसे देखने के लिए खासी हिम्मत और धैर्य की ज़रूरत होगी. ‘अ ब्यूटीफुल माइंड’ और ‘आर्डिनरी पीपल’ जैसी किताबों/ फिल्मों से तुलना की जा सकती है ‘स्टिल एलिस’ की. किसी व्यक्ति की बीमारी को कितनी संवेदना के साथ ट्रीट किया जाना चाहिए, यह अहसास ‘स्टिल एलिस’ दिलाती है.

किताब पढ़ने का धैर्य आपमें न भी हो तो फिल्म तो देखी ही जानी चाहिए. उपन्यास 2007 में आया था जबकि फिल्म 2014 में बनी. वॉश वेस्टमोरलैंड द्वारा निर्देशित फिल्म में जूलिएन मूर में एलिस हॉलैंड की भूमिका निभाई है जबकि एलेक बाल्डविन उनके पति बने हैं. टोरंटो के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर हुआ. जूलिएन मूर को उनके अभिनय के लिए ढेरों इनामात हासिल हुए हैं जिनमें बेस्ट ऐक्ट्रेस का ऑस्कर शामिल है.

Monday, June 29, 2015

एक पेंटिंग एक सौ बारह मुहावरे


पीटर ब्रूगेल द एल्डर की पेंटिंग नीदरलैंडिश प्रोवर्ब्सखासी दिलचस्प है. 1559 में देवदार के पैनल पर ऑइल मीडियम में बनी यह पेंटिंग उस ज़माने के डच समाज में प्रचलित  मुहावरों और कहावतों को अभिव्यक्ति देने की सफल कोशिश है.

एक नितांत ग्रामीण दृश्य में आप तकरीबन एक सौ बारह मुहावरों को चिन्हित कर सकते हैं. इनमें से कुछ तो आज भी लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं जैसे "swimming against the tide," "the big fish eats the little fish," "banging one's head against a brick wall," और "armed to the teeth."  

बाकी की कहावतें मानवीय मूर्खताओं की तरफ़ इशारा करती हैं.कुछेक मानवाकृतियां एक से अधिक उपमाओं का प्रतिनिधित्व करती दीखती हैं. मिसाल के तौर पर पेंटिंग के सबसे निचले हिस्से के बाएँ हिस्से में भेड़ के बाल उतारता आदमी. वह सूअर के बाल उतार रहे एक आदमी की बगल में बैठा दिखाया गया है. मुहावरा है “one shears sheep and one shears pigs," यानी हर किसी को एक ही तरह का काम करने से बराबर फायदा हो, ज़रूरी नहीं. इसमें एक दूसरे मुहावरे की तरफ़ भी इशारा किया गया है - "shear them but don't skin them," यानी आपने अपने संसाधनों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करना चाहिए. बिल्ली के गले में घंटी बांधता हुआ दिखाया गया एक योद्धा किस मुहावरे की तरफ ध्यान खींच रहा है, बताने की ज़रुरत नहीं.








चित्र पर क्लिक कर के देखें, आनंद आएगा. 

देखिये इस पेंटिंग को समझाता हुआ एक छोटा सा वीडियो - 

Saturday, June 27, 2015

प्रफुल्ल बिदवई के न रहने का अर्थ


प्रफुल्ल बिदवई ज़िंदाबाद

- शिवप्रसाद जोशी

प्रफुल्ल बिदवई से छात्र राजनीति के दिनों में पहचान हुई थी! फ़्रंटलाइन में उनका कॉलम आता था. पर्यावरण, एटमी राजनीति और कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, पूंजीवादी वर्चस्व की होड़, विश्व तापमान, ग्लोबल वॉर्मिंग की पॉलिटिक्स, विश्व शक्तियों की ख़ुराफ़ातें आदि ऐसी कई बातें थी जो हमें प्रफुल्ल बिदवई के लेखों से पता चलती थी और एक विचार बनता जाता था.

आपको वैचारिक रूप से सजग और तैयार करने वाले ऐसे कितने लेखक हैं. भारतीय भाषाओं में? प्रफुल्ल अंग्रेज़ी में लिखते थे और दिल और दिमाग के इतने क़रीब थे. अरुंधति रॉय से पहले अंग्रेज़ी में हम उन्हें ही जानते आए थे. उनका लिखना कभी ग़लत ही नहीं होता था इतनी अकाट्य प्रामाणिक और नपीतुली राईटिंग थी उनकी. अपनी वाम वैचारिकी के साथ उनके पास एक सजग और नैतिक अंतदृष्टि भी थी जिसके भरोसे वो वाम दलों को उनकी सुस्ती, बौद्धिक तंगहाली, और दिल्ली केंद्रित नज़रिए के लिए फटकारते रह पाए थे. वे उन तमाम सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में एक थे जो पिछले साल हिंदूवादी रथ की दिल्ली आमद पर विचलित थे. सब लोग इससे ज़्यादा विचलित वाम दलों की निष्प्राणता से थे. वो कील इन वाम दुर्गपतियों को कब चुभेगी.

प्रफुल्ल बिदवई से नाता कभी नहीं टूटा. उनके लेखों का संग्रह करते आए. लेखन में उनसे टिप्स लिए, उनकी बातें कोट की. मेहनत और नज़रिया बनाना सीखा. कभी सीधा वास्ता नहीं हुआ लेकिन जर्मनी के बॉन शहर से 2007 के दिनों में फ़ोन पर बातें हुईं, गाहेबगाहे उनका इंटरव्यू करते थे, पर्यावरण, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय परमाणु कार्यक्रम पर. वो इतनी प्यारी भाषा बोलते थे. बोलने में भी एक शब्द अतिरिक्त नहीं. इतने अलर्ट. इतने समय के पाबंद. और आवाज़ में ऐसी गतिशीलता और तीव्रता और ज़ोर- जैसे कितनी छटपटाहट है इस आदमी में कि सब कुछ ठीक क्यों नहीं हो जाता. और इधर उनका ब्लॉग. कितना जीवंत और शोधपरक आलेखों से भरा हुआ. ये वैचारिक और ज़मीनी लड़ाइयों के लिए मानो तैयारी की एक पाठशाला सी है. आख़िरी पोस्ट एक मई 2015 की है. मई दिवस. लेखन के श्रमिक ही तो थे प्रफुल्ल.

प्रफुल्ल बिदवई के निधन से बहुत तक़लीफ़ होती है. बहुत निजी तक़लीफ़. वे हम सबको छात्र के रूप में स्कॉलर के रूप में लेखक के रूप में ऐक्टिविस्ट के रूप में लीडर और पॉलिटिक्ल बिरादरी के रूप में जगाते आ रहे थे. कहां जगे हम. अभी मौत हुई है तो हड़बड़ा कर उठे हैं. फिर सो जाएंगे.

Friday, June 26, 2015

लागी लगन - राग हंसध्वनि, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान



उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान से सुनिए राग हंसध्वनि में एक द्रुत कम्पोज़ीशन -

Thursday, June 25, 2015

मगर हीरो का बचना लाजिमी होता है

प्रमोद सिंह का गद्य पिछले बरस ‘अजाने मेलों में’ नामक किताब की सूरत में सामने आया था. हिन्दी ब्लॉग जगत में वे एक जाना माना नाम हैं. आज उन्हीं के ब्लॉग से एक उम्दा पोस्ट शेयर करने का मन है -  

फोटो www.youthkiawaaz.com से साभार

कुत्‍तों से भरी दुनिया में हीरो..

 -प्रमोद सिंह

एक हीरो के समर्थन व बचाव में ऐसे ज़ोर मारते निर्दोष प्रेम के खिलाफ़ आख़ि‍र कुछ धृष्‍ठ तत्‍व हैं इतनी छाती क्‍यों पीट रहे हैं? स्‍कूलों में जो भी पढ़ाया जाता हो, समाज में कदम रखते ही बच्‍चा दनाक् से अपना सबक सीख लेता है कि कैसा भी सामुदायिक जोड़ हो, उसमें एक, या कुछ हीरो होंगे और बाकी जो भी होंगे उन्‍हें उनका लिहाज करने के लिए भले जुनियर आर्टिस्‍ट्रस बोला जाता हो, होते वो कुत्‍ते ही हैं, तो इस सामुदायिक जोड़ का बच्‍चे के लिए कामकाजी तोड़ यही होता है कि वह हीरो का करीबी होने की कोशिश करे और कुत्‍तों से अपनी दूरी बनाकर चले. समाज में सहज साफल्‍य का सामयिक सर्वमान्‍य नियम है, परिवार से शुरु होकर जीवन व समाज के सभी क्षेत्रों में हम रोज़ न केवल उसका पालन होता देखते हैं, खुद लपक-लपककर उसका हिस्‍सा होते रहते हैं. नहीं होते तो समाज हंसते हुए दूर तक हमें कुत्‍ता पुकारता चलता है. 

परिवार का कोई ताक़तवर सदस्‍य हो, सबके उससे अच्‍छे संबंध होंगे. थोड़ा नीच व अपराधी प्रकृति का हुआ तोउसके चहेते होने में इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा. उसी परिवार में कोई दुखियारी विवाहित, प्रताड़ि‍त, रोज़ लात खाती एक गरीब बहन हो, आप थोड़ा याद करने की कोशिश कीजिये, कोई उस बहन की ख़बर नहीं रखता होगा. परिवार की यह बेसिक कहानी समाज के लगभग सभी क्षेत्रों की कहानी है, और बिना किसी अपवाद के आपको हर क्षेत्र में सघनभाव क्रियारत मिलेगा. आदर्शवादी जोड़-तोड़ में लगे किसी फ़ि‍ल्‍म प्रोड्यूसर के पास जाइये, उसे अपने गरीब एक्‍टरों की याद नहीं होगी, वह उसी बड़े सितारे के सपनों में तैरता मिलेगा जिसने कभी उसके लिए एक दिन शूटिंग का समय निकालकर उपकृत किया था. प्रोड्यूसर के फेसबुक वाले पेज़ पर सितारे की महानता की संस्‍तुति में आपको ढेरों स्‍मरणीय पंक्तियां मिलेंगी. यही कहानी थोड़े बदले शक्‍लों में किसी प्रकाशक की, कॉलेज अध्‍यापक की, मीडिया में सक्रिय किन्‍हीं और आदर्शवादी तोप के संबंधों के नेटवर्क में उसी सहजभाव से आपको घटित होता दिखेगी. उसमें ज़रा सा भी अतिरेक न होगा. सामाजिक परिवर्तन के लिए सबकुछ दावं पर लगाने का मूलमंत्र जपनेवाले समूहों के बीच भी. 

तब जब पूरे समाज का यही एक इकलौता मूल्‍य है तो बेचारे एक बड़े सितारे की जान को क्‍यूं आनापिये में एक ज़रा ग़लती हो गई, तो आप क्‍या करोगे, उसके लिए बेचारे नन्‍हीं सी जान को फांसी पर चढ़ाओगेउससे कुत्‍तों का जीवन किसी भी तरह संभल जायेगाकल को आप मुहब्‍बत भरे कुत्‍तों को अंकवार लेने लगोगेअब आप तुनककर न्‍याय-स्‍याय मत बोलने-बकने लगियेगा. लोकतंत्र हो या कोई तंत्र हो, न्‍याय ही नहीं, जीवन का सबकुछ वहां गैर-बराबरी पर चलता है. आप बहुत भोले होंगे तब भी इतना जानते होंगे. नहीं जान रहे हैं तो फालतू मेरा और अपना समय ज़ाया कर रहे हैं. सड़क पर सो रहा और समाज में बिना किसी हैसियत का बच्‍चा क्‍या खाकर कल को समाज में आपके बच्‍चे की बराबरी, या उससे मुकाबला करेगाकरने को खड़ा हुआ तो सबसे पहले आप ही कुत्‍ता-कुत्‍ता का रौर उठाना शुरु करेंगे.

सारी हिन्‍दी फिल्‍में मुंबई, पंजाब, दिल्‍ली और फिरंगी हवाइयों में ही घूमती फिरती है और हीरो हमेशा इन्‍हीं जगहों के होते हैं, और जाने कितने ज़माने से यही सब देख-देखकर आपकी आत्‍मा तृप्‍त होती रही है. इस दुनिया का नियम इसके सिर रखकर किसी फ़ि‍ल्‍म में हीरो का त्रिपुरा, मेघालय या झारखंडी किसी प्रदेश का बनाकर एक मर्तबा देखिये, या हिरोईन ही को, देखिये, कैसी वितृष्‍णा में आपका मुंह टेढ़ा होता है. उसके हिक़ारत में इस तरह तिरछा होने में कुछ भी अनोखा नहीं है. आप सिर्फ़ समाज में बड़े व्‍यापक और घर, तकिये और आपके चप्‍पल तक में घुसे वही इकहरे इकलौते अनूठे हीरोगिरी वाले वैल्‍यू को सब्‍सक्राइब कर रहे हैं- जिसमें बहुत थोड़े लोग ही हैं जो हीरो हैं, बाकी समाज का लातखाया, हाशिये पर छूटा, दुनिया से भुलाया तबका अपने घर में अपने को चाहे जो समझता हो, आपकी नज़रों में कुत्‍ता ही है. अपने जीवनरक्षा या अधिकार के लिए उसके ऐसे, या कैसे भी फुदकने का बहुत औचित्‍य नहीं है. फ़ि‍ल्‍म के आख़ि‍र में यूं भी कुत्‍तों की किसे याद रहती है, मगर हीरो का बचना, किसी भी सूरत में, लाजिमी होता है. हीरो बचेगा ही. समाज में जब तक ऐसे गहरे धंसे कुत्‍ता मूल्‍य हैं, हीरो का कौन बाल बांका करनेवाला हुआ. हीरो जिंदाबाद.