Friday, February 5, 2016

मजाज़ और मजाज़ - 2



इसरारुल हक़ ‘मजाज़’ उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के रुदौली क़स्बे में 1909 में जन्मे थे. उनके वंश का ताल्लुक अजमेर के ख्वाज़ा मुहीउद्दीन चिश्ती के गुरू ख्वाज़ा उस्मान हारूनी तक पहुँचता है. मजाज़ के पिता चौधरी सिराजुलहक़ लखनऊ के रजिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट में मुलाजिम थे. अपने पिता के पास रहते हुए मजाज़ ने लखनऊ से मैट्रिक पास किया. उसके बाद आगरे से एफ़.ए. और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से बी.ए. किया.

दिल्ली में जब रेडियो डिपार्टमेंट खुला तो मजाज़ 1935 में अलीगढ़ से दिल्ली चले आये. वहां उन्होंने करीब दो साल तक रेडियो के उर्दू पत्र ‘आवाज़’ का संपादन किया, लेकिन डिपार्टमेंट के तत्कालीन सर्वेसर्वा बुख़ारी भाइयों की दूषित मनोवृत्ति और तानाशाही स्वभाव के कारण मजाज़ वहां ज्यादा टिक न सके. रेडियो से मुलाज़मत छूटने पर मजाज़ को मानसिक क्लेश पहुंचा जिसका आभास इस नज़्म से हो जाता है -

रुख़सत ऐ दिल्ली, तिरी महफ़िल से अब जाता हूँ मैं
नौहागर जाता हूँ मैं, नालः-ब-लब जाता हूँ मैं

याद आयेंगे मुझे तेरे ज़मीन-ओ-आसमां
रह चुके हैं मेरी जौलांगाह तेरे बोस्तां

क्या कहूं किस शौक़ से आया था तेरी बज़्म में
छोड़कर ख़ुल्द-ए-अलीगढ़ की हज़ारों महफ़िलें

कितने रंगीं अहदो-पैमां तोड़कर आया था मैं
दिल नवाज़ाने-चमन को छोड़कर आया था मैं ...

रेडियो से सम्बन्ध टूट जाने के बाद मजाज़ लखनऊ चले गए. वहां उनके पिता पेंशन पाने के बाद से स्थाई रूप से बस गए थे. सो ये भी लखनऊ में रहते हुए साहित्यिक गतिविधियों में दिलचस्पी लेने लगे, साथ ही एम.ए. करने के लिए कॉलेज भी जाने लगे लेकिन अपने मौजी स्वभाव के कारण एम.ए. कर न सके. 1939 में उन्होंने अपने साहित्यिक मित्र अली सरदार ज़ाफ़री के सहयोग से ‘नया अदब’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया.

1941 में मजाज़ का मस्तिष्क विकृत हो गया. स्वस्थ होने पर दिल्ली की हार्डिंग लाइब्रेरी में मुलाजिम हो गए पर 1944 में ये नौकरी भी छूट गयी. मुशायरों में हाथोहाथ लिया जाने वाला और घरों में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला मजाज़ चिंताओं और दरिद्रता का जीवन बिताते हुए लखनऊ के बलराम हस्पताल में  केवल 46 की आयु में 5 दिसंबर 1955 की रात को 10 बजकर 22 मिनट पर अल्लाह को प्यारा हो गया.

मजाज़ के अन्यतम मित्र हयातुल्लाह अंसारी उनकी इस दर्दनाक मौत के बारे में यूं लिखते हैं -

“मजाज़ शाम तक अच्छे थे और अपनी बाग़-ओ-बहार तबीयत को मुताबिक अपने दोस्तों से पुरलुत्फ़ गुफ़्तगू में रात गए तक मसरूफ़ देखे गए. तकरीबन 12 बजे रात को वे अपने चंद हम-मशरब साथियों के साथ लाल बाग के एक देसी शराबघर ले जाए गए, जहाँ से उनके साथी तीन बजे रात को अपने-अपने घर चले गए और मजाज़ की पूरी रात वहीं गुज़री. रात-भर आँगन में पड़े रहने की वजह से सुबह वे मफ़लूज मिले. दुकान के मालिक ने एक करीबी डाक्टर को बुलाकर दिखाया, जिसने डबल निमोनिया तजवीज किया और वह खुद दोपहर के करीब मजाज़ को बलरामपुर हस्पताल पहुंचा गया.

"वहां भी डाक्टरों ने डबल निमोनिया तजवीज करते हुए पेनिसिलिन के इंजेक्शन देने शुरू कर दिए. शाम के करीब हस्पताल के इंचार्ज ने तशखीस किया कि जिस्म के दाहिने हिस्से में फालिज का असर हो गया है और दिमाग की रगें फट गई हैं. अभी तक मजाज़ के घरवालों को कोई इत्तिला नहीं थी इसलिए कि मजाज़ तीन दिन से घर नहीं गए थे और घरवालों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. हस्पताल में किसी जानने वाले ने मजाज़ को देखकर उसके घरवालों को इत्तिला पहुंचाई. मजाज़ के वालदैन ने हस्पताल आकर मरनेवाले की हालत उस वक़्त देखी जब कि डाक्टरों ने मायूसी का इज़हार कर दिया था और आक्सीजन के जरिये सांस की आमद-ओ-शुद को क़ायम रखने की कोशिश की जा रही थी.

"दूसरों को सुरूर और इंबसात से मालामाल करनेवाला मजाज़ रुखसत हो गया और इस तरह रुखसत हो गया कि बेकसी आंसू बहा रही है. न उसका सिन मरने का था और न अभी ऐसी तंदुरुस्ती थी कि वह इतनी जल्दी दगा दे जाती. मगर भला हो ज़ालिम दोस्तों और शराब का कि उसने बहार-ए-अदब के एक गोशे को वीरान कर दिया.

"मजाज़ का मर जाना एक बेहद दर्दनाक सानिहा है. लेकिन जिस तरह वह मरा है वह तो एक अजीमुश्शान ट्रेजडी है. उसमें सिर्फ शराब का ही दखल नहीं है बल्कि ऐसे ज़ालिम दोस्तों का भी दखल हा जो उसकी बज्लहसंजी और शाइरी की वजह से उसे पिलाते थे. वो जानते थे कि यह पीना उसके लिए ज़हरे-क़ातिल है लेकिन फिर भी पिलाते थे. अपने मज़े और अपनी संगत के लिए पिलाते थे.


(जारी)  

जब ज़िंदा थे तब सबसे डरे, मुसलमान थे, मुसलमान ही मरे!

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 4
फ़ोटो thewire.com से साभार
मान लो 

'मान लो कि ख़ैरख़्वाह हूँ मैं,
इश्क़ करती हूँ उस क़ौम से 
जो तुम्हारी है
जो तुम हो... '

'मेरी है, मैं हूँ?'

'हाँ, बात करो न उनकी प्लीज़,
वो पुरखे तुम्हारे ईरान से, तूरान से,
गोरे, चमकीले, ब्राह्मण तुम्हारी जात के,
सुना है उनकी बीवियों ने
पर्दा नहीं किया कभीहै ना?'

'बुर्क़ा पहनती हैं।'  

'कौन?'

'अम्मी मेरी।'  

'रियली! बट हाऊ कैन यू अलाऊ दैट?'

'अलाऊ मतलब? उनकी मर्ज़ी।

'पर तुम तो वैसे नहीं?'

'कैसे?'

'अरे हैं न वो काले काले
काजल लगे, लोबान वाले,
मांगते हैं मज़ारों का चंदा,
हरी चादर में गाड़ी रोक,
अकेली पड़ जाऊं उनके हाथ कभी,
तौबा ! सोचो क्या हशर होगा मेरा!'

'क्यों, छू लेंगे तुम्हे?'

'उफ़! शैतान!
उनकी सुनाओ ना मुझे
कार्ल मार्क्स की हंसिया पकड़े,  
फैज़ लपेटे कान में,
नाप दें रोज़े सालहा साल,  
दाब दें ताज़िए बा-एहतराम, लेकिन
पड़ोसियों को ख़लल न पड़े
लड़कियाँ न्यूयॉर्क रहे, बीवियां कुरआन पढ़ें  
शराब से तौबा नहीं, पर... '

'अरे! वो नहीं हूँ मैं, मेरी जान!
अलिफ़ बे का तालिब,
मीर, मोमिन और ग़ालिब,
सड़क से गुज़रूँ तो  
चप्पल की चाप में उर्दू बसे
भीड़ में चलाता हूँ मारुती  
हॉर्न बजा बजा कर, एक्सैक्टली वैसे
जैसे तुम्हारे बाप
गालियां देता हूँ पैदलों को बाकी,
कुछ हिन्दुआनी, कुछ मुसलमानी,
मेरा हुजूम मुझे वैसे ही निगलता है
जैसा तुम्हारा तुम्हे
वो अमरीकी आसमान जब औंधा गिरा ज़मीन पर 
उतना ही बेखबर रहा मैं जितना की तुम,
नामा देखा, ट्रैफिक का अफ़सोस किया,
सब्ज़ियों के दाम कर्फ्यू में कितने बढ़ेंगे  
तिजारत की …'

'दैट इस ऑपर्चुनिज़्म!   
यह आइडेंटिटी दोगे हमारे बच्चों को तुम?' 

'आइडेंटिटी
अमरीकियों की नौकरी बजाता हूँ,
साइबर पार्क में नौ से पांच,
वीकेंड पर शराब पीता हूँ, जर्मन,
जो न हिन्दू है, न मुसलमान
जुम्मा कब आया याद नहीं,
ईद उतनी ही इर्रेल्वेन्ट है जितनी दीवाली
पर दोनों पर दिए जलाता हूँ,
हाँ, जब हिन्दुओं के गढ़ में मकान ढूंढने जाता हूँ,
सोचता हूँ, ले चलूँ तुम्हे भी साथ,
बिंदी लगाए, छै गज़ की साड़ी लिपटाये!
देर रात, बैरियर किनारे
मांगता है लाइसेंस, पान चबाता ठुल्ला
डर यह नहीं कि
गाड़ दिया जाऊं, कि जला दिया जाऊं
बस इसलिए कि गुआंटानमो में न मार दिया जाऊं
कर देता हूँ तुम्हे आगे, बड़ा शर्मसार
सोचा है नाम दूंगा बच्चों को अपने  
पीटर, टोनी, और निर्वाण,
अगली पुश्त के लाइसेंस तो न कहलायें मुसलमान!'

'अरे, अरे! ना कहीं
यह कैसा कुफ्र है तुम्हारा मेरे ख़िलाफ़!
तुम मुसलमान न होगे,
मैं ख़ुद को क्या कहूँगी
नारे लगाऊंगी, गाने गाऊंगी
जेल के गेट पर धरना करवाऊंगी
शान से कहूंगी,
हैं तो वही, पर वैसे नहीं!
इन्हे मैं प्यार करती हूँ...

मर भी जाओ तुम ऐसे-वैसे, इधर-उधर,
हक़ होगा मेरा तुम पर, मय्यत पर करूंगी सोज़ख़्वानी,
मेरे महबूब, तुम्हे मेरी मुहब्बत की क़सम,
डोंट थिंक इलेक्ट्रिक क्रेमटोरियम में होने दूँगी क्विक एंड ईज़ी!
मुंह घुमा दूँगी तुम्हारा, जिस तरफ कहेंगे क़ाबा
पूरे साढ़े छै फुट नीचे करवाऊँगी दफ़न,  
रो रो कर कहूँगी सबसे 
जब ज़िंदा थे तब सबसे डरे
पर प्यार देखो मेरा

मुसलमान थे, मुसलमान ही मरे!'

सोनी वर्ल्ड फ़ोटोग्राफ़ी अवार्ड्स 2015 की शॉर्टलिस्ट - 2












ओ डार्लिंग, डार्लिंग, स्टैण्ड बाय मी


ट्रेसी चैपमैन का एक और गाना




When the night has come
And the land is dark
And the moon is the only light we'll see
No I won't be afraid, no I won't be afraid
Just as long as you stand, stand by me

And darling, darling, stand by me
Oh stand by me
Oh Stand
Stand by me

If the sky we look upon
Should tumble and fall
Oh and the mountains should crumble to the sea
I won't cry, I won't cry, no I won't shed a tear
Just as long as you stand, stand by me

Oh darling, darling, stand by me
Oh stand by me
Oh stand
Stand by me

Whenever you're in trouble you just stand by me
Oh stand by me
Oh stand
Stand by me
Stand by me

Oh darling darling stand by me
Oh stand by me
Oh stand
Stand by me
Stand by me
Stand by me

Stand by me

सोनी वर्ल्ड फ़ोटोग्राफ़ी अवार्ड्स 2015 की शॉर्टलिस्ट - 1