Friday, September 5, 2014

शिक्षक दिवस पर एक भूतपूर्व शिक्षक की पुरानी कविता



पैर छूना 

गिरिराज किराड़ू

हर बात झूठ लग रही थी अपने रेगिस्तानी शहर से डेढ़ दो हजार किलोमीटर सूदूर दक्षिण में उसी शाम उसे देखने एक लड़का एक होटेल में आयेगा माँ-बाप ने तय किया है फोन पर बात भी करायी गयी  सब फर्जी मेरा दिमाग तो एक टूर इंचार्ज अध्यापक की तरह काम कर ही रहा था मेरी क्लास में छह महीने का बहीखाता भी हक में नहीं था उसके कि तभी अचानक एक उपन्यासकार जैसा जोखिम उठाते हुए कहा जाओ दो घंटे में लौट आना वर्ना अध्यापक ने फर्ज़ अदायगी की वह अपने कमरे में गयी थैंक्स बोलते हुए मैं उपन्यासकार से झगड़ता हुआ वहीं खडा रह गया दसेक मिनट में वह कमरे से निकली तैयार जींस छोटा-सा टॉप अभिसारिका मेरा नायिका भेद बोला बेहद अटपटेपन से उसे देख रहा था कि वह पास आयी और सीधे मेरे पैर छू लिये बिना किसी नाटक के फिर से थैंक्स और चली गयी

अपने को सबसे बेहतर समझने वाला उसका उद्दण्ड आत्मविश्वास छह महीने में कई बार टकरा चुका था मुझसे पैर छूना मास्टरस्ट्रोक नहीं था यह तब जितना साफ़ था मेरे लिये आज भी उतना ही साफ़ है समय से कुछ पहले ही लौट आयी मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया उसके अगले साल पाँच सितंबर को एक एसएमएस आया आपके फैसले हमेशा याद रहेंगे मुझे

दूसरी बार और भी अजब हुआ दूर की एक हमउम्र रिश्तेदार सिर्फ़ दूसरी बार मिल रहा था जाते जाते पैर छू लिये कुछ बहुत बड़ा फैसला लेना है मन पक्का कर लिया है आपका आशीर्वाद चाहिये उसके चार दिन बाद उसने भाग कर अपने चचेरे भाई से शादी कर ली

आज तक समझ नहीं पाया दोनों बार ऐसा क्यूं हुआ क्यूं इन दो लड़कियों ने छुए मेरे पैर क्यूं पूरे नहीं हो सकते थे उनके काम मेरे आशीर्वाद के बिना इसका कहीं इस बात से तो कुछ लेनादेना नहीं कि बहुत कायदे से न सही पर दोनों को पता था कुछ राइटर वगैरह हूँ मैं


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(15 मार्च 1975 को बीकानेर में जन्मे गिरिराज किराडू की कवितायें,आलोचना,अनुवाद और कुछ कहानियां बहुवचन,पूर्वग्रह,तद्भव,सहित,वाक्,वागर्थ,इंडिया टुडे वार्षिकी,इंडियन लिटरेचर,अकार,कथाक्रम,जनसत्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. उन्हें कविता के लिये भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार " (2000) प्राप्त हो चुका है और वे एक द्विभाषी पत्रिका ‘प्रतिलिपि’ का संपादन करते हैं.)

Saturday, August 30, 2014

प्रोफ़ेसर बिपन चन्द्रा नहीं रहे


जानेमाने इतिहासकार प्रोफ़ेसर बिपन चन्द्रा का छियासी वर्ष की आयु में देहांत हो गया. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी अध्येताओं में गिने जाने वाले प्रोफ़ेसर बिपन चन्द्रा का जन्म १९२८ में हिमांचल की कांगड़ा घाटी में हुआ था. उन्होंने लाहौर और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय अमेरिका में अपनी पढ़ाई पूरी की थी.

कबाड़खाना उनकी मृत्यु पर शोकाकुल है और उन्हें श्रद्धांजलि देता है.


कि भाषा कोरे वादों से वायदों से भ्रष्ट हो चुकी है सबकी



फिल्म के बाद चीख़

- रघुवीर सहाय


इस ख़ुशबू के साथ जुड़ी हुई
है एक घटिया फ़िल्म की दास्ताँ
रंगीन फ़िल्म की
ऊबे अँधेरे में
खड़े हुए बाहर निकलने से पहले बंद होते हुए
कमरे में
एक बार
भीड़ में
जान-बूझ
कर चीख़
ना होगा
जिंदा रहने के लिए
भौंचक बैठी हुई रह जाएँ
पीली कन्याएँ
सीली चाचियों के पास
टिकी रहे क्षण-भर को पेट पर
यौवन के एक महान क्षण की मरोड़
फ़िर साँस छोड़ कर चले
जनता
सुथन्ना सम्हालती
सारी जाति एक झूठ को पीकर
एक हो गयी फ़िल्म के बाद
एक शर्म को पीकर युद्ध के बाद
सारी जाति एक
इस हाथ को देखो
जिसमे हथियार नहीं
और अपनी घुटन को समझो, मत
घुटन को समझो अपनी
कि भाषा कोरे वादों से
वायदों से भ्रष्ट हो चुकी है सबकी
न सही यह कविता
यह मेरे हाथ की छटपटाहट सही
यह कि मैं घोर उजाले में खोजता हूँ
आग
जब कि हर अभिव्यक्ति
व्यक्ति नहीं
अभिव्यक्ति
जली हुई लकड़ी है न कोयला न राख
क्रोध, नक्कू क्रोध, कातर क्रोध
तुमने किस औरत पर उतारा क्रोध
वह जो दिखलाती है पैर पीठ और फ़िर
भी किसी वस्तु का विज्ञापन नहीं है
मूर्ख, धर्मयुग में अस्तुरा बेचती है वह
कुछ नहीं देती है बिस्तर में बीस बरस के मेरे
अपमान का जवाब
हर साल एक और नौजवान घूँसा
दिखाता है मेज़ पर पटकता है
बूढों की बोली में खोखले इरादे दोहराता है
हाँ हमसे हुई जो ग़लती सो हुई
कहकर एक बूढा उठ
एक सपाट एक विराट एक खुर्राट समुदाय को
सिर नवाता है

हर पांच साल बाद निर्वाचन
जड़ से बदल देता है साहित्य अकादमी
औरत वही रहती है वही जाति
या तो अश्लील पर हंसती है या तो सिद्धान्त पर
सेना का नाम सुन देशप्रेम के मारे
मेजें बजाते हैं
सभासद भद भद कोई नहीं हो सकती
राष्ट्र की
संसद एक मंदिर है जहाँ किसी को द्रोही कहा नहीं
जा सकता
दूधपिये मुँहपोंछे आ बैठे जीवनदानी गोंद-
दानी सदस्य तोंद सम्मुख धर
बोले कविता में देशप्रेम लाना हरियाली प्रेम लाना
आइसक्रीम लाना है
भोला चेहरा बोला
आत्मा नें नकली जबड़ेवाला मुँह खोला
दस मंत्री बेईमान और कोई अपराध सिद्ध नहीं
काल रोग का फल है अकाल अनावृष्टि का
यह भारत एक महागद्दा है प्रेम का
ओढने-बिछाने को, धारण कर
धोती महीन सदानंद पसरा हुआ
दौड़े जाते हैं डरे लदेफंदे भारतीय
रेलगाड़ी की तरफ़
थकी हुई औरत के बड़े दाँत
बाहर गिराते हैं उसकी बची-खुची शक्ति
उसकी बच्ची अभी तीस साल तक
अधेड़ होने के तीसरे दर्जे में
मातृभूमि के सम्मान का सामान ढ़ोती हुई
जगह ढूँढती रहे
चश्मा लगाए हुए एक सिलाई-मशीन
कंधे उठाये हुए

वे भागे जाते हैं जैसे बमबारी के
बाद भागे जाते हों नगर-निगम की
सड़ांध लिये-दिये दूसरे शहर को
अलग-अलग वंश के वीर्य के सूखे
अंडकोष बाँध .
भोंपू ने कहा
पांच बजकर ग्यारह मिनट सत्रह डाउन नौ
नंबर लेटफारम
सिर उठा देखा विज्ञापन में फ़िल्म के लड़की
मोटाती हुई चढ़ी प्राणनाथ के सिर उसे
कहीं नहीं जाना है.
पाँच दल आपस में समझौता किये हुए
बड़े-बड़े लटके हुए स्तन हिलाते हुए
जाँघ ठोंक एक बहुत दूर देश की विदेश नीति पर
हौंकते डौंकते मुँह नोच लेते हैं
अपने मतदाता का

एक बार जान-बूझकर चीख़ना होगा
ज़िंदा रहने के लिये
दर्शकदीर्घा में से
रंगीन फ़िल्म की घटिया कहानी की
सस्ती शायरी के शेर
संसद-सदस्यों से सुन
चुकने के बाद.

Friday, August 29, 2014

मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन पर रीपोस्ट



आज ध्यान चन्द का जन्मदिन है.

सिर्फ़ एक वीडियो देखिये आज : Tribute to Indian Hockey

सवा दो मिनट का वीडियो है. देख लेंगे तो बहुत सारी यादें आएंगी. हिटलर, बर्लिन ओलिम्पिक, ग्रेट ब्रिटेन के झन्डे का अनुसरण करता ग़ुलाम भारत का दल और दद्दा ध्यानचन्द का अतुलनीय कौशल:

यह जो स्त्री आप देखते हैं सो मेरी स्त्री है


मेरी स्त्री

- रघुवीर सहाय


प्यारे दर्शको, यह जो स्त्री आप देखते हैं सो मेरी स्त्री है
इसकी मुझसे प्रीति है. पर यह भी मेरे लिए एक विडम्बना है
क्योंकि मुझे इसकी प्रीति इतनी प्यारी नहीं
जितनी यह मानती है कि है. यह सुंदर है मनोहारी नहीं,
मधुर है, पर मतवाली नहीं, फुर्तीली है, पर चपला नहीं
और बुद्धिमती है पर चंचला नहीं. देखो यही मेरी स्त्री है
और इसी के संग मेरा इतना जीवन बीता है. और
इसी के कारण अभी तक मैं सुखी था.
सच पूछिए तो कोई बहुत सुखी नहीं था. पर दुखिया
राजा ने देखा कि मैं सुखी हूँ सो उसने मन में ठानी
कि मेरे सुख का कारण न रहे तो मैं सुखी न रहूँ.
उसका आदेश है कि मैं इसकी हत्या कर इसको मिटा
डालूँ. यह निर्दोष है अनजान भी. यह
नहीं जानती कि इसका जीवन अब और अधिक
नहीं. देखो, कितने उत्साह से यह मेरी ओर आती है.

(चित्र: बिल गूफी की पेंटिंग “वूमन इन अ फील्ड इन फ्रांस’)

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