Saturday, December 3, 2016

ज़ुल्फ़ बिखरा के निकले वो घर से


बेकल उत्साही को श्रद्धांजलि. उनकी इसी ग़ज़ल से पहले पहल उनसे तार्रुफ़ हुआ था. आवाज़ अहमद हुसैन-मुहम्मद हुसैन की - 


Tuesday, November 22, 2016

उमेश पंत के यात्रा वृतांत 'इनरलाइन पास' से एक अंश



... कुटी गाँव के परिसर से बाहर निकलकर एक बार फिर मुड़कर उस गाँव को देखा. कल किसी ग्रामीण ने ही बताया था कि गाँव में कई घर दो सौ साल पुराने भी हैं. उनमें से एक घर की दीवार सीमेन्ट या मिट्टी की जगह दाल से बने लेप से चिनी गई थी. घर के दरवाज़ों और खिड़कियों पर जो नक्काशी थी वो भी देखने लायक थी. गाँव के ऊपर जो पहाड़ थे उन्हें गाँव वालों ने यरपा गल और नंगपा गल नाम दिया था. यरपा और नंगपा गाँव के ही दो राठों के नाम हैं. और गल का मतलब है ग्लेशियर. छाता ओढ़े हुए बुग्याल पर पहुंचकर एक बार फिर मुड़कर उस गाँव को देखा. मेरी राय अभी भी नहीं बदली थी. इससे खूबसूरत गाँव मैने इससे पहले कभी नहीं देखा था. खैर बुग्याल पार करने के ठीक बाद एक तीखा ढ़लान था जो एक पहाड़ी नदी पर बने पुल की तरफ ले जाता है. जैसे-जैसे हम पुल की तरफ बढ़ रहे थे वैसे-वैसे इस नदी की आवाज़ तेज़ और तेज़ होती जा रही थी. पिछले चौबीस घंटे से  लगातार हुई बारिश की वजह से नदी में पानी इतना बढ़ गया था कि वो पुल को छूने को बेकरार था.

पुल पर पहुंचने के बाद जैसे ही सामने खड़े पहाड़ को देखा तो पहली बार एक सिहरन सी शरीर में दौड़ी. सामने जो पहाड़ था उस पर पत्थर रिसते हुए दिखाई दे रहे थे. वो पहाड़ दरअसल एक कीचढ़ के टीले में तब्दील हो गया सा लग रहा था. और इसी पहाड़ के किनारे उस संकरे रास्ते पर अभी हमें कई किलोमीटर चलना था. सफर के खुशनुमा होने के जो भी खयाल अब तक दिमाग में थे वो इस एक नज़ारे को देखने के बाद छूमंतर हो चुके थे. और पहली बार लगने लगा था कि ये सफर अब आगे इतना आसान नहीं रहने वाला.

जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे हमारे बगल में खड़ा वो पहाड़ और खतरनाक दिखने लगा था.

उमेश सावधानी से चलना. एक एक कदम संभाल के रखना

रोहित ने ये कहा तो मेरा डर कुछ और बढ़ गया. हालाकि मैने ये डर ज़ाहिर नहीं होने दिया. रास्ते पर बीच-बीच में कुछ देर पहले गिरे छोटे बड़े पत्थर बिखरे हुए थे. और कई जगह मिट्टी के छोटे-छोटे टीले भी ऊपर से खिसकर आये थे. पर रास्ता बंद नहीं था. हमें निसंदेह संभलकर चलना था क्योंकि एक ओर कीचड़ में बदल चुके पहाड़ थे तो दूसरी तरफ पूरे उफान में बहती कुटी नदी. अगर आप फिसले तो सीधे नदी के हवाले. बिना कोई गलती किये आगे बढ़ना था. क्योंकि इस वीरान में दरकते पहाड़ों के बीच दूर-दूर तक कोई तीसरा हमारी मदद करने के लिये नहीं था.

उमेश पन्त 
मैं कुछ तेजी से आगे बढ़ रहा था. मेरे भीतर के डर ने मेरी रफ्तार को सामान्य से कुछ ज्यादा तेज़ कर दिया था. इस बीच आस-पास से आई खबरें अब याद आ रही थी. हमारे यहां रहते-रहते फिसलने या पत्थर गिरने से अब तक चार मौतें हो चुकी थी. दो नेपाली मजदूर जो यारसा गुम्बा (एक पहाड़ी बूटी जो सेक्स पावर बढ़ाने के काम आती है और बहुत महंगी बिकती है)लेने गए थे ग्लेशियर में फिसलने से मरे थेएक डॉक्टर पहाड़ से पत्थर गिरने से जान गंवा चुका था. एक कैलास मानसरोवर यात्री ऑक्सीजन की कमी से दम घुटने की वजह से अपनी जान गंवा चुकी थी. खैर इन खबरों ने हमारा हौसला कम नहीं किया था. यहां इन पहाड़ों में हौसला ही हमारा सबसे बड़ा हथियार था. हम प्रकृति से जितना भी जूझ सकते हैं उसमें हौसला सबसे बड़ी भूमिका निभाता है.

मैं ये सब सोच ही रहा था कि पीछे से आता हुआ रोहित एकदम चीखा

उमेश रुक जाओ.

मैं पीछे देखता उससे पहले ही उसने चीखते हुए कहा 

ऊपर  देख के चलो.

मैने अपनी बांयी तरफ उस रिसते पहाड़ को देखा. मिट्टी के छोटे-छोटे ढ़ेले लुड़कते हुए नीचे आ रहे थे. मैं भागकर आगे जाने की सोच ही रहा था कि रोहित फिर चीखा पीछे भागो

मैं भागकर पीछे आया और पीछे आकर वापस मुड़ा तो देखा कि पहले कुछ छोटे-छोटे पत्थर और फिर कई बड़े पत्थर उस अनंत उंचे पहाड़ से तेज़ रफ्तार से लुड़कते हुए आये. कुछ सीधे नदी की तरफ चले गये और कुछ वहीं हमारे रास्ते पर टिक गये.

इनमें से कोई भी पत्थर अगर हमें लगता तो तय था कोई बड़ी अनहोनी हमारे साथ हो ही जाती. पर थोड़ी सी सावधानी ने प्रकृति के इस पहले हमले से हमें बचा लिया था.


क्योंकि बारिश रुक नहीं रही थी तो साफ था कि हालात आगे और खराब होंगे. कितने खराब इसकी हम कोई कल्पना नहीं कर सकते थे. प्रकृति जब विकरालता दिखाने पर आती है तो उसकी विकरालता का कोई भी आंकलन मानव कल्पना से बहुत परे की चीज़ होता है. पीछे जाना भी कोई समझदारी नहीं थी. इसलिये ये खयाल हम दोनों में से किसी के दिमाग में नहीं आया. आगे लगभग चार किलोमीटर का रास्ता खतरनाक था लेकिन वो पार कर लेने के बाद आगे का सफर उतना मुश्किल नहीं था. 

इन पहाड़ों में हुई दुर्घटनाओं से जुड़ी कई घटनाएं थी जो हमें डराने के लिये काफी थी. पर इस वक्त उन्हें याद करने से कुछ भी हासिल नहीं होना था. हमें एकदम संभलकर आगे बढ़ना था. रास्ते में कई जगह हमें मलवे के ऊपर से भी जाना था. पत्थरों को लांघते हुएकीचड़ में धंसते पैरों को संभालते हुए और इस पूरी प्रक्रिया में लगातार भीगते हुए हम आगे बढ़ रहे थे. और अगल बगल से भोजपत्र के जंगल इस वीरान में दो लोंगों को रास्तों से जूझते हुए आगे बढ़ते देख न जाने क्या सोच रहे थे. 

कमाल की बात थी कि ये इलाका इस वक्त जितना खतरनाक हो गया था उतना ही खूबसूरत भी लग रहा था. सफेद बादलों से घिरे हरे पहाड़ भी थे. उन पहाड़ों पर बर्फ की कई कतरनें भी थी. नीचे एक नदी थी जो लगातार बहती जाती थी. नदी की आवाज़ उसके भीतर टकराते पत्थरों (बोल्डर्स) की वजह से कई गुना बढ़ ज़रुर गई थी. पर वो शोर नहीं लग रही थी. उसके शोर में भी एक सुर था. अगर पहाड़ों के दरकने का खतरा नहीं होता तो बारिश में भीगती वादी में भीगता ये वक्त जि़न्दगी के सबसे खूबसूरत लमहों में शुमार होता. पर इस वक्त यहां जि़न्दगी बिखरी भी हुई थी और उसी पर लगातार खतरा भी बना हुआ था. 

(किताब के बारे में ज़्यादा जानकारी यहां -

Tuesday, November 15, 2016

राष्ट्र-जल में कागजी, छवि-यान बहता देखता हूँ

ज़िन्दगी
-केदारनाथ अग्रवाल

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को,
पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ!
सत्य के जारज सुतों को,
लंदनी गौरांग प्रभु की, 
लीक चलते देखता हूँ!
डालरी साम्राज्यवादी मौत-घर में,
आँख मूँदे डाँस करते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मैं अहिंसा के निहत्थे हाथियों को,
पीठ पर बम बोझ लादे देखता हूँ.
देव कुल के किन्नरों को,
मंत्रियों का साज साजे,
देश की जन-शक्तियों का,
खून पीते देखता हूँ,
क्रांति गाते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
राजनीतिक धर्मराजों को जुएँ में,
द्रोपदी को हारते मैं देखता हूँ!
ज्ञान के सब सूरजों को,
अर्थ के पैशाचिकों से,
रोशनी को माँगते मैं देखता हूँ!
योजनाओं के शिखंडी सूरमों को,
तेग अपनी तोड़ते मैं देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
खाद्य मंत्री को हमेशा शूल बोते देखता हूँ
भुखमरी को जन्म देते,
वन-महोत्सव को मनाते देखता हूँ!
लौह-नर के वृद्ध वपु से,
दण्ड के दानव निकलते देखता हूँ!
व्यक्ति की स्वाधीनता पर गाज गिरते देखता हूँ!
देश के अभिमन्युयों को कैद होते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मुक्त लहरों की प्रगति पर,
जन-सुरक्षा के बहाने,
रोक लगाते देखता हूँ!
चीन की दीवार उठते देखता हूँ!
क्राँतिकारी लेखनी को,
जेल जाते देखता हूँ!
लपलपाती आग के भी,
ओंठ सिलते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
राष्ट्र-जल में कागजीछवि-यान बहता देखता हूँ,
तीर पर मल्लाह बैठे और हँसते देखता हूँ!
योजनाओं के फरिश्तों को गगन से भूमि आते,
और गोबर चोंथ पर सानंद बैठे,
मौन-मन बंशी बजातेगीत गाते,
मृग मरीची कामिनी से प्यार करते देखता हूँ!
शून्य शब्दों के हवाई फैर करते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
बूचड़ों के न्याय-घर में,
लोकशाही के करोड़ों राम-सीता,
मूक पशुओं की तरह बलिदान होते देखता हूँ!
वीर तेलंगानवों पर मृत्यु के चाबुक चटकते देखता हूँ!
क्रांति की कल्लोलिनी पर घात होते देखता हूँ!
वीर माता के हृदय के शक्ति-पय को
शून्य में रोते विलपते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
नामधारी त्यागियों को,
मैं धुएँ के वस्त्र पहने,
मृत्यु का घंटा बजाते देखता हूँ!
स्वर्ण मुद्रा की चढ़ौती भेंट लेते,
राजगुरुओं कोमुनाफाखोर को आशीष देते,
सौ तरह के कमकरों को दुष्ट कह कर,
शाप देते प्राण लेते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
कौंसिलों में कठपुतलियों को भटकते,
राजनीतिक चाल चलते,
रेत के कानून के रस्से बनाते देखता हूँ!
वायुयानों की उड़ानों की तरह तकरीर करते,
झूठ का लम्बा बड़ा इतिहास गढ़ते,
गोखुरों से सिंधु भरते,
देश-द्रोही रावणों को राम भजते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
नाश के वैतालिकों को
संविधानी शासनालय को सभा में
दंड की डौड़ी बजाते देखता हूँ!
कंस की प्रतिमूर्तियों को,
मुन्ड मालाएँ बनाते देखता हूँ!
काल भैरव के सहोदर भाइयों को,
रक्त की धारा बहाते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
व्यास मुनि को धूप में रिक्शा चलाते,
भीमअर्जुन को गधे का बोझ ढोते देखता हूँ!
सत्य के हरिचंद को अन्याय-घर में,
झूठ की देते गवाही देखता हूँ!
द्रोपदी को और शैव्या कोशची को,
रूप की दूकान खोले,
लाज को दो-दो टके में बेचते मैं देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मैं बहुत उत्तप्त होकर
भीम के बल और अर्जुन की प्रतिज्ञा से ललक कर,
क्रांतिकारी शक्ति का तूफान बन कर,
शूरवीरों की शहादत का हथौड़ा हाथ लेकर,
श्रृंखलाएँ तोड़ता हूँ
जिन्दगी को मुक्त करता हूँ नरक से!! 

(कविता संग्रह, "कहें केदार खरी खरी" से)

Monday, November 14, 2016

लेनर्ड कोहेन - एक ज़ेन संन्यासी का भारत से नाता

जहाँगीर आर्ट गैलरी में लेनर्ड कोहेन

[रत्नेश माथुर 2003 तक बंबई में एक बैंकर थे. उन्होंने उसके बाद यूरोप में एक भारतीय आउटसोर्सिंग कंपनी खोली और 2010 तक उसमें काम किया. पिछले पांच सालों से वे उत्तर प्रदेश में कुछ सामाजिक विकास के प्रोजेक्ट्स चला रहे हैं. उनका यह आलेख मेरी पुरानी मित्र सोनाली हार्डीकर की मार्फ़त मुझ तक पहुंचा है. अनुवाद जल्दी उपलब्ध करवाता हूँ -]

Bird on a Wire: How Bombay helped Leonard Cohen find his voice again

In 1998, I read a newspaper report that Leonard Cohen was in Bombay. I was a big fan of his music and poetry and tracked him down to a small hotel in Kemp’s Corner. I asked if he could autograph the CDs and books I intended to leave at the reception. But Cohen came out and invited me to stay for a chat. It turned out to be a five-hour discussion – the start of a friendship for the next 18 years. We exchanged our last emails just five weeks ago, on his 82nd birthday.

Every day in that autumn of 1998, Cohen was reciting the verses of the 13th-century Marathi bhakti poet Sant Dnyaneshwar. He was in the city to attend the satsangs of Advaita guru Ramesh Balsekar at Warden Road. He wasn’t just reciting the verses by rote: he knew the English meanings of the words. He was pondering the concepts of sagun (the worship of God with form) and nirgun (the worship of God without form) and why both were essentially the same.

When he arrived in India in 1998, Leonard Cohen was already a Zen monk. He had spent five years in deep meditation and silence with Zen guru Roshi in Mount Baldy, near Los Angeles. It had been a decade since he had recorded new music or performed. The guru of 1960s folk and poetry had entirely stepped out of public life. Instead, his life-long quest for knowledge and inner peace had completely consumed his time and attention. He was led to Bombay by his curiosity to meet Balsekar, the author of a book titled Consciousness Speaks he read in his monastery.

Cohen spent much of 1999 and 2000 in Bombay, and then made brief visits until 2003. It was always for one purpose – to attend Balsekar’s daily morning satsangs and spend time with the teacher. Many of these conversations during the satsang have been preserved in audio and video recordings by Balsekar’s devotees. Between the Buddhist teachings of Roshi and the Vedanta teachings of Balsekar, Cohen finally found the inner peace that he had been seeking all his adult life. Sylvie Simmons’s excellent biography, I’m Your Man explains this very well. He got back to writing poetry and sketching in his art book.

Some Sunday mornings, Cohen took us along to Balsekar’s satsangs. These were Vedanta question-and-answer style discussions at which Balsekar’s philosophy appeared to have answers to every big question in life. The teacher’s clarity of thought and his delivery in English had attracted many Western seekers. During most sessions, Cohen sat quiet but attentive. As the friendship between Cohen and Balsekar developed, they would spend time alone in the evenings too, away from the satsang devotees.

A typical day in Cohen’s Bombay life involved walking from his hotel room at Kemp’s Corner to Balsekar’s apartment 1.5 kilometres away. On his way back, he would stop for chai at a roadside stall and then drop in for a swim at the exclusive Breach Candy club. The rest of the day was spent in his room, reading, in meditation, sketching and writing. He accessed his email on his laptop and communicated with his daughter, Lorca, his son, Adam and his manager in Los Angeles, Kelly.
Indian philosophy was not new to Leonard when he first visited India in 1998. His understanding of both Buddhist and Vedanta thought gave him great insights into the everyday life of India. He was in his mid-sixties and not keen on travel but he was keen to know the average Mumbaikar. The chaiwallah, the hotel cleaning staff and the taxi drivers were the Indians who interested him the most. He politely refused invitations from the elite of Mumbai, who he would sometimes run into at the club or the satsang.

रत्नेश माथुर के साथ
On one rare Sunday though, we did manage to take Leonard Cohen out to see some sights in the Kala Ghoda area in South Bombay. We took in an exhibition at Jehangir Art Gallery and a show of cartoons by World Word II Bombay refugee-artist Rudolf von Leyden at the Max Mueller Bhavan next door. Then we peeped in on the restoration work underway at the Army and Navy Building opposite. We’d already had several discussions on Judaism, so it was interesting to accompany Cohen to the synagogue in the area for a discussion with the rabbi. Over lunch, Cohen joked that we should find him a good Indian Yehudi wife for him to settle down with in Bombay.
But a dark cloud was looming. During the years that he was spending time in Bombay, Cohen’s manager in Los Angeles had been siphoning money out of his bank accounts. By the time Cohen discovered this, he was broke, and going to court didn’t help. This is when he went back to the studio to record new music and undertake new world tours. When he performed spectacular shows between 2008 and 2014, Cohen’s spiritual strength was evident every time he stepped on stage.

My wife and I had relocated from Bombay to Europe in 2003 and kept touch with Cohen over email. On his Europe tour of 2009, we had tickets for his show in Prague and we pinged him to ask if he wanted to meet. I received a polite refusal immediately. On performance days, Cohen and his team were very focused and wanted no distractions. But he didn’t forget about this. Onstage, he said namaste to his friends who come from far – from India. That was the last time we saw him.

Leonard Cohen was the perfect gentleman, a healer, a man with a keen desire to bring unity and peace. He even created a symbol for this – the Unified Heart – which he would often email in his replies to friends. Leonard Cohen was much more than the poetry and music he is known for. To those of us who had the good fortune to know him, he was the very definition of saint he had once articulated in his daring 1960s novel Beautiful Lovers:


“What is a saint ? A saint is someone who has achieved a remote human possibility. It is impossible to say what that possibility is. I think it has something to do with the energy of love. Contact with this energy results in the exercise of a kind of balance in the chaos of existence…He rides the drifts like an escaped ski. His course is the caress of the hill. His track is a drawing of the snow in a moment of its particular arrangement with wind and rock…His house is dangerous and finite, but he is at home in the world. He can love the shape of human beings, the fine and twisted shapes of the heart. It is good to have among us such men, such balancing monsters of love."     

Friday, November 11, 2016

अपने कर्म एवं विचारों से वह पूरी तरह बौद्धिक श्रमिक थे

बीते माह की दस तारीख को पिथौरागढ़ में रहने वाले अद्वितीय मनीषी और कर्मठ विद्वान डॉ. राम सिंह नहीं रहे. इस महाप्रतिभा को याद कर रहे हैं कबाड़ी आशुतोष उपाध्याय -


डॉ. राम सिंह से मेरा परिचय उनके बड़े बेटे भरत (स्व. भारत बंधु) के मार्फ़त हुआ था. हाईस्कूल के आगे की पढ़ाई के लिए मैं 1978 में पिथौरागढ़ पहुंचा था और हमारा परिवार उनके करीब ही रहने लगा. यह संयोग ही था कि एक जैसी रुचियों के कारण हम दोनों के पिताओं की भी अच्छी छनने लगी. हमारे घर के बगल से गुजरने वाली सड़क पर कॉलेज से आते-जाते डॉ. राम सिंह लगभग रोज दिखाई पड़ते थे. वह अकसर खादी का कुर्ता और सफ़ेद धोती पहनते थे. होठों को ढके रहने वाली अधपकी मूंछें उनके चेहरे को और भी ज्यादा गंभीर बना देती थीं. जब उन्हें मैंने पहली बार देखा तो वे मुझे मुंशी प्रेमचंद जैसे लगे थे. वे हमारी किशोरावस्था के दिन थे, जब बेटे अपने पिताओं से थोड़ा दूरी बनाकर चलना पसंद करते हैं. तब मुझे कहाँ पता था कि इस गंभीर मुखमुद्रा के पीछे एक कोमल हृदय नटखट बच्चा भी रहता है.

उन दिनों डॉ. राम सिंह स्थानीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे. मेरी बड़ी दीदी उनकी विद्यार्थी थीं और उनके बारे में बताया करती थीं. उनकी कर्मठता के क़िस्से मशहूर थे. आस-पास के लोग कहते थे कि डॉ. राम सिंह ने अपना दो-मंजिला घर खुद अपने हाथों से बनाया है. पता नहीं इस क़िस्से में कितनी सच्चाई थी, मगर जब भी वह घर पर होते तो कठोर श्रम करते हुए उन्हें देखा जा सकता था. शहर में उनका लोहे का एक कारखाना था, जहां अलमारियां, बक्से, गेट, ग्रिल वगैरह बनते थे. कॉलेज के बाद वह सीधे अपने कारखाने पहुंचते और वहां का कामकाज देखते थे.

तब मैं विज्ञान का सामान्य विद्यार्थी था. साहित्य व इतिहास की ओर झुकाव पैदा होना अभी बाकी था. इसलिए डॉ. राम सिंह के व्यक्तित्व के अकादमिक व बौद्धिक आयामों तक दृष्टि नहीं पहुंचती थी. अलबत्ता हम बच्चों के बीच इस बात की चर्चा ज़रूर होती थी कि वह नास्तिक हैं और ईश्वर को नहीं मानते हैं. प्रगतिशील आन्दोलनों से अछूते दूर-दराज इलाके में रहने वाले हमारी उम्र के बच्चों के लिए तब नास्तिकता के मायने और महत्त्व को समझ पाना आसान न था. हमारे लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी कि ईश्वर की सत्ता को कोई भला कैसे नकार सकता है!

यह बात बहुत देर से समझ में आई कि डॉ. राम सिंह की नास्तिकता प्रायोजित या चालू फैशन के हिसाब से दिखावे के लिए नहीं थी. मैंने उन्हें किसी की आस्था का मज़ाक उड़ाते हुए कभी नहीं देखा और न ही वह अपनी मान्यताओं का प्रचार करते थे. यह उनका निजी मामला था और वह इसे बड़ी सहजता से जीते व इसकी क़ीमत भी चुकाते थे. उनके बड़े बेटे और होनहार छोटी बेटी की सड़क दुर्घटनाओं में हुई असामयिक मृत्यु के बाद कुछ लोगों ने दबी जुबान में उनकी अनास्था को इसकी वजह बताया. कुछ लोगों ने इसे ईष्ट देवताओं की नाराजगी का परिणाम भी घोषित कर किया. एक पिता के लिए इससे कठिन समय और क्या हो सकता है! लेकिन वह अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता से कभी नहीं डिगे.

*****

डॉ. राम सिंह से मेरा व्यक्तिगत संसर्ग 1992 में उनके बड़े पुत्र भरत के देहांत के बाद शुरू हुआ. इस दौर में मुझे इतिहास सम्बन्धी उनके काम को समझने और उस पर चर्चा करने का भी मौका मिला. यद्यपि वह हिंदी के प्राध्यापक थे लेकिन इतिहास और पुरातत्व में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. पुरातात्विक साक्ष्यों को सहेजने के कौशल में भी वह प्रवीण थे. कुमाऊं की पुरातात्विक धरोहरों के कई दुर्लभ प्रमाण मूल अथवा प्रतिकृति के रूप में उनके निजी संग्रह में मौजूद थे. बड़े जतन से उन्होंने न जाने कितने ताम्रपत्रों और शिलालेखों की नक़लें तैयार कीं और उनका अनुवाद किया. यह संग्रह उनके उम्र भर के परिश्रम का परिणाम था. शिलालेखों और ताम्रपत्रों की नक़लें दिखाते वक्त वह यह बताना नहीं भूलते थे कि कैसे उन्हें तैयार किया जाता है.

स्थानीय इतिहास के साक्ष्यों के विश्लेषण की जैसी समझ डॉ. राम सिंह को थी, वैसी उनके समकालीन अन्य स्थानीय इतिहासकारों में कम ही दिखाई देती है. तथ्यों और मिथकों की उलझी हुई ऊन में से इतिहास के तर्कसम्मत रेशों को खींच निकालने का गज़ब का हुनर उनमें था. राग-भागों, पारंपरिक आख्यानों, वीर गाथाओं व जागरों के घने मिथकीय कुहासे के बीच वह वास्तविक इतिहास की धुंधली पगडंडियों को खोज निकालते थे. 'पहाड़' प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनकी चर्चित पुस्तक- 'राग-भाग काली कुमाऊँ'- में प्राचीन बाणासुर के किले के बारे में उनका यह विश्लेषण गौरतलब है:

"... 'कोट का पय्या' के आधार की प्राकृतिक संरचना ही ऐसी है कि उसे दुर्ग के रूप में विकसित करने का विचार इस उपत्यका में पहले-पहल बसने वाले महत्वाकांक्षी लोगों के मन में यहां प्रविष्ट होने के साथ ही आ गया होगा. इस प्रकार यह उतना ही प्राचीन हो सकता है, जितना इस उपत्यका की उपजाऊ द्रोणी में बसने वालों की बस्तियां. फलतः इनके साथ स्थानीय राग-भाग, पौराणिक कल्पनाओं और इतिहास का अद्भुत सम्मिश्रण हो गया है. कुछ पुरातन को गौरवान्वित करने की इच्छा से प्रेरित पढ़े-लिखे लोग इसे बाणासुर का किला कहने लगे हैं. प्रत्येक स्थान को किसी न किसी पुराण कथा से जोड़कर स्थानीय मूल स्वरूप व इतिहास को मिटा देने की प्रवृत्ति ने इसको बाणासुर का किला घोषित कर दिया है....."

'राग-भाग काली कुमाऊँ' उनकी वर्षों की मेहनत का परिणाम थी. काली कुमाऊँ (वर्तमान जिला चम्पावत) के गांव-गांव पैदल घूमकर वह वहां के बुजुर्गों से उनकी 'राग-भाग' पूछते और मौखिक परंपरा में मौज़ूद सदियों पुराने क़िस्सों को डायरी में नोट करते रहते थे. यह काम उन्होंने 1966 में शुरू किया था, जिसे आखिरकार सदी के अंत में जाकर पुस्तक का आकार दिया. इस काम के साथ-साथ वह लगातार ऐतिहासिक व पुरातात्विक दस्तावेजों को भी इकठ्ठा करते रहे. देखा जाय तो फोकलोर से जन इतिहास बीनने वाले डॉ. राम सिंह अपनी तरह के अनोखे सबाल्टर्न इतिहासकार थे.

ऐसा वह इसलिए कर पाए क्योंकि एक इतिहासकार से संस्कृति के प्रति जिस किस्म की अकादमिक तटस्थता की अपेक्षा की जाती है, वह उनमें कूट-कूट कर भरी थी. आचरण में खांटी पहाड़ी शख्सियत होने के बावजूद डॉ. राम सिंह संकीर्ण क्षेत्रीयतावाद से सर्वथा अछूते रहे. पहाड़ की संस्कृति, लोक और परम्पराओं के क्षरण का अनवरत रोना रोने वाले भावुक बुद्धिजीवियों की उत्तराखंड में कमी नहीं है. लेकिन इन बातों को लेकर डॉ. राम सिंह जैसी समझ कम ही लोगों में होगी. सांस्कृतिक बदलावों पर मैंने कभी भी उन्हें छाती पीटते नहीं देखा. वह मानते थे कि भौतिक जीवन में होने वाले बदलावों के बरक्स संस्कृति स्वाभाविक रूप से बदल जाती है. पिछले दो-तीन दशकों के दौरान हुए वैश्विक बदलावों ने हमारे दूर-दराज के गांवों को भी अपने आगोश में लिया है. हमारी आजीविका और रहन-सहन के तौर-तरीके बदल गए हैं. टेक्नोलॉजी ग्रामीण जीवन के अब तक अछूते हिस्सों तक पहुँच गयी है. ऐसे में भाषा-बोली और परम्पराओं का बदलना लाजमी है. डॉ. राम सिंह इतिहासकार के रूप में इन बातों को गहराई से समझते थे.

*****

छात्र जीवन में हम उनके बाहरी व्यक्तित्व को देखकर थोड़ा सहम जाते थे. धोती-कुर्ते में सजी लम्बी छरहरी शालीन काया और होंठों को ढकती हुई गहरी मूंछें. लेकिन तब हमें पता नहीं था कि इस गंभीर आवरण के पीछे एक बेहद मज़ाकपसंद किस्सागो छुपा बैठा है. उनकी स्पष्टवादिता और बातें करने का ठेठ सोर्याली अंदाज़ गज़ब का था. पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी वह यदाकदा लिखते थे. लेकिन ये लेख डॉ. राम सिंह के बजाय 'राम जनम परजा' के नाम से छपते थे. एक दिन मैंने उनसे इस तरह छद्म नाम से लिखने की वजह पूछी. उनके आमोदपूर्ण जवाब ने स्थानीय इतिहास को देखने की मेरी दृष्टि ही बदल डाली. वह कहते थे- राम उनका नाम है और यहां के अन्य पढ़े-लिखे लोगों की तरह वह राजवंशी नहीं है बल्कि जन्म-जन्मातरों से 'प्रजा' हैं. यानी उनके पिता और तमाम पूर्वज भी प्रजाजन ही थे. इसलिए वह राम जनम परजा के नाम से लिखते हैं.

उत्तराखंड के अधिकतर भद्रजन उनका मूल स्थान/पुरुष के बारे में पूछे जाने पर बड़े गर्व से बताते हैं कि उनका सम्बन्ध फलां राजा या राज पुरोहित के खानदान से है. मसलन पंडितजी कहेंगे कि वे फलां राजपुरोहितों के वंशज हैं और उनके पुरखे मुग़लों की प्रताड़ना से बचने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल या राजस्थान से यहां आकर बसे थे. इसी तरह ठाकुर साहबान भी महाराणा प्रताप या किसी और राजपुरुष से अपना सम्बन्ध जोड़ने में देर नहीं लगाते. पहाड़ से पलायन कर गए श्रेष्ठियों का मन तो ऐसी बातों में और भी रमता है. ऊंची शिक्षा और अच्छी पोजीशन वाले उत्तराखंडी इन बातों पर खूब तवज्जो देते हैं. घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध, यानी बाहर से आने वाला श्रेष्ठ ही होता है, यह धारणा हमें अग्रेजों से मिली. इस तर्क के सहारे वे अपनी जातिगत श्रेष्ठता और शासन का औचित्य सिद्ध करते थे. 

औपनिवेशिक शासन-प्रशासन का हिस्सा बनने वाले पहली पीढ़ी के स्थानीय समुदायों को भी यह तर्क खूब जंचा. उन्होंने खुद को आप्रवासी (और इसलिए श्रेष्ठ) और अपने कमजोर व गरीब सहोदरों को कमतर श्रेणी का स्थानीय बताना शुरू किया. धीरे-धीरे इस धारणा को इतिहास बताकर पेश किया जाने लगा. कालांतर में स्वघोषित इतिहासकारों ने योजनाबद्ध ढंग से इस धारणा को आगे बढ़ाया और अब यह इतनी रूढ़ हो चली है कि आम पर्वतवासी इसे अपनी ऐतिहासिक विरासत मानते हैं.

डॉ. राम सिंह प्रभुत्वशाली जातियों के 'बाहरी' होने की अवधारणा को पूरी तरह अतार्कित और अविश्वसनीय मानते थे. उनके मुताबिक़ ऐसा कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य (प्राचीन शिलालेख, दानपात्र, ताम्रपत्र, बही आदि) उपलब्ध नहीं है जो अतीत के किसी ख़ास कालखंड में बाहरी समुदायों (पड़ोसी नेपाल को छोड़कर) के यहां आ बसने की पुष्टि करता हो. उनका कहना था, अगर ऐसा होता तो खुद को बाहरी बताने वाली कथित ऊंची जातियों के लोग कमतर समझे जाने वाले स्थानीय खस समुदायों के रीति-रिवाजों, पूजा पद्धतियों और भाषा बोली को कतई नहीं अपनाते. यदि वे शासक थे तो उनके सामने पिछड़ी स्थानीय संस्कृति को अपनाने की कोई मजबूरी भी नहीं थी. वे अपनी कथित श्रेष्ठ संस्कृति को बचाए रख सकते थे. आखिर क्यों उन्होंने उन जातियों की भाषा-बोली को अपनाया और उनके अवैदिक देवी-देवताओं और भूत-प्रेतों को अपना आराध्य मानना शुरू किया, जिन्हें वे आज भी हीन मानते हैं? मुग़ल प्रताड़ना (ख़ास तौर पर औरंगजेब कालीन जबरिया धर्मांतरण) से पहाड़ों पर आकर बसने की बात तो और भी हास्यास्पद है. ऐसा होता तो वास्तव में ज्यादा प्रताड़ना झेलने वाले राजधानी दिल्ली के नज़दीकी इलाकों- जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड, रामपुर, मुरादाबाद आदि से आकर लोग यहां बसते! लेकिन कोई भी इन इलाकों को अपने पूर्वजों की मातृभूमि नहीं बताता है बल्कि गैर-मुग़ल शासित दूर-दराज राज्यों का मूलवासी होने का दावा किया जाता है.

उत्तराखण्ड का अतीत हमेशा से पिछड़ा नहीं रहा. खास तौर पर कत्यूरी काल स्थापत्य और अन्य विधाओं में अपेक्षाकृत उन्नत प्रतीत होता है. लगभग इसी दौर तक हिमालयवासी धातुशोधन सीख चुके थे. प्रख्यात पुरातत्वविद प्रो. डी.पी. अग्रवाल के अनुसार इस काल में गंगा-यमुना के मैदानी राज्यों को लोहा और तांबा हिमालयी इलाकों से ही भेजा जाता था. पहाड़ के लोग दूसरी शताब्दी से जलशक्ति का यांत्रिक इस्तेमाल करने लगे थे. आज घराट (पनचक्की) हमें तकनीकी दृष्टि से जरूर मामूली लग सकता है, लेकिन दूसरी शताब्दी के हिसाब से इसे एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि कहा जाएगा. कत्यूरी काल के मंदिर स्थापत्य के लिहाज से परवर्ती चंदकाल से कहीं ज्यादा उन्नत हैं. यह दौर शानदार काष्ठकला का भी रहा है. यदि कथित सभी श्रेष्ठ जातियां चन्द सदियों पहले बाहर से आकर बसीं तो ज्ञान-विज्ञान की इस समृद्ध विरासत के असली वारिस कौन हैं?

डॉ. राम सिंह यह भी मानते थे कि उत्तराखंड में ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था ने अपेक्षाकृत बाद में पैठ बनाई. वह इसे शंकराचार्य के आगमन से जोड़ते थे. उनकी दलील थी कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं पर जमी वर्ण व्यवस्था की धूल को अगर झाड़-पोंछ दिया जाय तो भाईचारे पर आधारित पुरातन आदिवासी संस्कृति को बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता है. अगर ऐसा न होता तो दलितों को देवताओं के आवाहन की जिम्मेदारी कैसे मिलती? जागर गायक के रूप में वास्तव में वे आज भी पुजारी की भूमिका ही तो निभाते हैं. सनातन ब्राह्मण संस्कृति में क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है?

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डॉ. राम सिंह ने इतिहास के नाम पर फैलाई जाने वाली वैमनस्यपूर्ण भ्रांतियों के निवारण का भी प्रयास किया. कुमाऊं में मनाये जाने वाले 'खतडुआ' त्योहार के बारे में व्यापक रूप से प्रचलित है कि यह गढ़वाल के राजा पर कुमाऊं के राजा की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. डॉ. राम सिंह कहते थे कि पहले तो गढ़वाल की राज वंशावली में खतड़ सिंह नाम का कोई राजा नहीं हुआ. दूसरे, गढ़वाल के राजवंश के साथ कुमाऊं के राजवंश के सम्बन्ध पूरी तरह शत्रुवत कभी नहीं थे बल्कि उतार-चढ़ाव भरे थे. कभी दोस्ती तो कभी प्यार और कभी रिश्तेदारी भी. लगभग ऐसे ही सम्बन्ध कुमाऊं और डोटी (पश्चिमी नेपाल) के बीच भी थे. गौरतलब है कि खतडुआ कुमाऊं में ही नहीं पश्चिमी नेपाल में भी मनाया जाता है, जिनका गढ़वाल के राजा की हार-जीत से कोई नाता नहीं. डॉ. राम सिंह के मुताबिक़ खतडुआ शुद्ध खेतिहर त्योहार है, जिसके साथ औपनिवेशिक काल में किसी कथित इतिहासकार ने हार-जीत की यह कथा जोड़ दी.

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डॉ. राम सिंह का जन्म माता श्रीमती पार्वती देवी और पिता श्री मोहन सिंह के घर पिथौरागढ़ के निकट कफलानी (गैना) गांव में 17 जुलाई 1937 को हुआ था. उनकी स्कूली शिक्षा पिथौरागढ़ के विद्यालयों में पूरी हुई. आगे की पढ़ाई के लिए वह लखनऊ विश्वविद्यालय चले आये. हिंदी में एम.ए. करने के बाद उन्होंने पीएच.डी. में प्रवेश लिया. उनका शोध प्रबंध कुमाऊं की कृषि एवं ग्रामोद्योग शब्दावली के भाषाशास्त्रीय अध्ययन पर केन्द्रित था. शिया डिग्री कॉलेज लखनऊ से एक शिक्षक के रूप में उन्होंने अपना पेशेवर जीवन शुरू किया. बाद में विभिन्न राजकीय विद्यालयों में प्रवक्ता, रीडर व विभागाध्यक्ष रहने के बाद वह 1997 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए. उत्तराखंड के मशहूर खोजी पं. नैनसिंह की यात्राओं पर डॉ. राम सिंह ने "पं. नैन सिंह का यात्रा साहित्य" नामक पुस्तक लिखी. अनेक ऐतिहासिक व पुरातात्विक अध्ययनों के अलावा उन्होंने जागरों का संग्रह 'भारत गाथा' भी तैयार किया, जो अब तक अप्रकाशित है.

अपने अंतिम वर्षों में अल्जाइमर्स की बीमारी के कारण डॉ. राम सिंह की याददाश्त कमजोर हो गयी थी. जीवन पर्यंत वह बड़े जतन से उत्तराखंड के ऐतिहासिक साक्ष्यों का संग्रह व संरक्षण करते रहे. पिछले दो-तीन दशकों में उत्तराखंड विकास की जिस राह पर आगे बढ़ा है, उसमें इन साक्ष्यों के बड़े स्तर पर मटियामेट होने का सिलसिला शुरू हुआ. इस लिहाज से डॉ. राम सिंह का काम बड़े महत्त्व का है. उन्होंने न सिर्फ ऐतिहासिक साक्ष्यों को संजोया बल्कि एक इतिहास दृष्टि भी हमें दी. वे एक कर्मयोगी की तरह चुपचाप अपना काम करते रहे मगर अपने काम का ढोल नहीं पीटा. अपने कर्म एवं विचारों से वह पूरी तरह बौद्धिक श्रमिक थे. वह सचमुच प्रजाजन थे और सत्ता संरचनाओं से हमेशा दूरी बनाकर रखते थे. उनकी बौद्धिकता भी इसीलिए सहज, श्रमसाध्य और आतंकविहीन थी. एक समाज के बतौर अपने कर्मवीरों को याद रखने व उन्हें यथोचित सम्मान देने के मामले में हमारा रिकॉर्ड ख़ास अच्छा नहीं है. डॉ. डी.डी. पन्त जैसे वैज्ञानिक और शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' जैसे लोक कवि इस उपेक्षा के ज्वलंत उदाहरण हैं. डॉ. राम सिंह भी इस दुर्लभ मणि शृंखला की एक और कड़ी हैं.


डॉ. राम सिंह शारीरिक श्रम को सर्वोपरि मानने वाले जाति-भेदविहीन और समतावादी राज्य के हिमायती थे. वह कहते थे कि अतीत में इन्हीं मूल्यों के आधार पर हिमालय के कठिन भूगोल में हमारे पुरखों का बसना संभव हो पाया था. आज जब हम इन मूल्यों को नज़रअंदाज़ करने का खामियाजा भुगत रहे हैं, डॉ. राम सिंह और उनका इतिहास बोध अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करते नज़र आते हैं.