Sunday, July 23, 2017

दास्तान-ए-अकबर अली उर्फ़ क़िस्सा अक्कू मियाँ


दास्तान-ए-अकबर अली उर्फ़ क़िस्सा अक्कू मियाँ

-शम्भू राणा

एक हुआ करते थे अकबर अली. इन हजरत के बारे में अब ये तो नहीं कह सकते कि ये अल्मोड़ा शहर की एक विभूति थे, शान थे कोई ऊंची हस्ती थे. लेकिन कुछ तो थे. एक चरित्र तो थे ही कि जिनका जिक्र आज भी प्रसंगवश गाहे-ब-गाहे लोगों की जबान पर आ ही जाता है. अकबर अली अभी दो-चार बरस पहले तक बाहयात थे. ज्यादा वक्त नहीं बीता उन्हें गुजरे. कचहरी बाजार में पाए जाते थे और अकबर अली नहीं बल्कि अक्कू या अक्कू मियां के नाम से जाने जाते थे. उलझे बाल, खिचड़ी दाढ़ी, भेंगी आंखें, दुबली पतली काया और उस पर लटके हुए काम चलाऊ कपड़े. न रहने की कोई जगह, न कोई स्थाई रोजगार, बीवी न बच्चा, अकेली जान, दिमाग में लेकिन खुराफातें बेशुमार. 

अकबर अली के कई रूप थे. मूल रूप से शायद वह मोची थे. सामने वाले के जरूरत के हिसाब से रूप धरने की अद्भुत क्षमता उनमें थी. तांत्रिक, नजूमी, वैद्य, गवाह, जमानती कुछ भी. बताने वाले बताते हैं कि एक बार उन्हें दशहरे के जुलूस में पंडित बनकर आरती की थाली लेकर चलते हुए भी देखा गया. पंडितजी की थाली में पैसे चढ़ाती और आशीर्वाद लेती महिलाओं को अक्कू मियां के ही मोहल्ले-बिरादरी के लड़के मियां को चिढ़ाने की गरज से सावधान कर रहे थे- चाची, त मुसई छ मुसई, अकबर अली ने उन लड़को को एक आंख से घूरकर कहा- चुब्बे हां, बता रिया हूँ भांची मत मार .... 

मोची के रूप में अकबर अली के कई किस्से मशहूर हैं. एक बार किसी आर्मी अफसर का जूता मरम्मत के लिए अक्कू मियां के पास आया. वे कई दिन तक सिपाहियों को आज-कल कहकर टालते रहे. आखिर कब तक ? एक दिन दो-तीन जवान वसूली वाले मूड में सामने आ खड़े हो गए कि साहब का जूता दो. उस दिन जवान टाले न टले. अकबर अली ने कहा- अच्छा रुको, लाता हूं. घर में रखा है हिफाजत से. और वो सामने की गली में समा गए. वहीं किसी खंडहर में उन दिनों रह रहे थे. बड़ी देर हो गई अकबर अली लौटकर नहीं आए. जवान पूछते हुए गली में घुसे. और जरा देर बाद भागते हुए वापस आ गए. चेहरे बदहवास. उन्होंने बताया कि शू मेकर पत्थरों में दबकर मर गया है. और तेज कदमों से कैंट की ओर चले गए. अकबर अली जैसे जीव इतनी आसानी से कहां मरते हैं. अकबर अली ने अपने कपड़ों में यहां-वहां लाल पेंट पोता, कुछ जमीन में गिराया और एक बड़ी-सी पटाल छाती में रखकर बेसुध लेट गए. जैसे कि वे चाह रहे थे जवानों ने सोचा पुराने मकान की ढीली पटाल अचानक गिर जाने से मोची मर गया. पुलिस, गवाही, पेशी, पूछ-ताछ, छत्तीस झंझट, आर्मी की नौकरी. भाड़ में गया जूता, भागो. ब्रिगेडियर साहब का जूता दरअसल अकबर अली बहुत पहले किसी को बेच चुके थे, ऐसे में मरने के अलावा चारा ही क्या बचता है ?
 
तब तनख्वाह आज जितनी ऊंची नहीं हुआ करती थीं. ज्यादातर परिवारों में एक ही आदमी कमाने वाला हुआ करता था. महिलाओं में नौकरी का चलन कम था. कपड़ों में पैबन्द होना और एक ही जूते को सालों साल सी-सी कर पहनना आम बात थी. आम आदमी रूपये-पैसो की तंगी की वजह से सस्ते के जुगाड़ में रहता था. ऐसे में मोचियों द्वारा बनाए गए सस्ते जूते खरीदकर लोग काम चला लिया करते थे. एक दिन अकबर अली से एक सज्जन सेकिन्ड हैंड जूता करीदने गए. जूता हर हिसाब से ठीक ही लग रहा था. दाम के हिसाब से एकाध साल भी चल गया तो पैसे वसूल. घर पहुंचे तो पता चला कि अक्कू ने मियां की जूती मियां के सर दे मारी थी. वह जूता उनके छोटे भाई का था जो कई दिनों से सिलाई के लिए अक्कू के पास पड़ा था.
 
कचहरी की सीढ़ियों के पास ही एक कोने में अकबर अली जूता मरम्मत का सामान लिए बैठा करते थे. वहीं बैठे-बैठे लोगों की जरूरतों का सुराग लगता था. फिर उसी के हिसाब से समाधान सोचा जाता और रूप धरा जाता. अब रोज तो ब्रिगेडियर का जूता मरम्मत को आता नहीं, न ही आप रोज मर सकते हैं. तो लाजमी है कि यहां-वहां भी हाथ आजमाया जाय. एक बार की बात है, कचहरी के किन्हीं साहब का जूता अकबर अली के पास सिलाई-पॉलिश के लिए आया. हस्बे आदत कुछ दिनों तक टालमटोल चलती रही. आखिर एक दिन साहब ने अर्दली भेजकर अकबर अली को दफ्तर में तलब कर ही लिया. जिसके पास अर्दली हो, वह कोई बड़ा ही हाकिम रहा होगा, उस पर मामला पड़ोस का. जाना ही पड़ा. अकबर अली ज्यों ही साहब के सामने गए साहब ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि जाओ-जाओ, चलो ठीक है, कोई बात नहीं. अर्दली हैरान! अब यह राज तो बाद में खुला कि साहब अकबर अली के पैरों में अपना जूता देखते ही पहचान गए थे.
 
एक दफे अकबर अली झूठी गवाही या ऐसी ही किसी वजह से जेल चले गए. कई दिन गुजर गए. फिर मोहल्ले वालों ने सोचा चलो यार काफी हो गया. अकेला गरीब आदमी भला कौन इसकी जमानत करवाएगा. कुछ किया जाए. ईद या बकरीद भी नजदीक ही थी. पड़ोस में कचहरी होने की वजह से वकील, सरकारी वकील और पेशकार साहेबान से रोज की दुआ-सलाम. कुछ लोगों ने जाकर बात की, जुगाड़ लगाया और अकबर अली बाहर आ गए. मोहल्ले में पहुंचकर आपने फरमाया कि आजकल लोगों को किसी का आराम से खाना-पीना देखा नहीं जाता. वहां आराम से रै रिया था, खा-पी रिया था, हरामियों ने बाहर निकलवा दिया. 

अकबर अली का गुस्सा एकदम वाजिब था, सौ फीसदी जायज था. वे जेल में अक्कू बाबा के नाम से मशहूर हो चुके थे. उन्होंने जेल में रहते हुए जेलर को ताबीज पहना दिया था और कुछ सुविधाएं अपने लिए जुटा ली थीं. कई कैदी उनके मुरीद हो चुके थे. बाबाजी ने अपनी ज्योतिष विधा और टोने-टोटकों से कइयों की जमानत करवा दी थी. जो कैदी बाहर जाता वह अपना खाने-पीने का सामान और जो थोड़ा रूपया-पैसा होता बाबाजी को अर्पित कर जाता, चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेता था. सब बढ़िया चल रहा था कि तभी एक दिन बाबाजी की खुद की जमानत हो गई. जेल दरगाह होते-होते रह गई. 

एक बार मोहल्ले वालों ने देखा कि अकबर अली फौंजी जिप्सी में शान से बैठे चले आ रहे हैं. बांह खिड़की में टिकी है और सर बाहर निकला है ताकि सब ठीक से देख लें कि हां, अकबर अली ही हैं. और लोगों में धाक जमे, रूतबा बढ़े. इस बार उन्होंने किसी आर्मी अफसर को न जाने क्या पट्टी पढ़ा दी कि उसने उन्हें अपने क्वार्टर बुलवा लिया. गए तो अक्कू मियां चलकर, लौटे मगर हरी जिप्सी में. 

अकबर अली ने एक बार मेरी नजरों के सामने मेरे बाप को ही ठग लिया. मेरे पिता न जाने उन्हें कहां टकरा गए कि एक सुबह अक्कू मियां घर आ पहुंचे. वे अपने साथ मिट्टी के सात दिए लेकर आए थे. उन्होंने पिता को सामने बिठाकर उनके गले में अपने गले से निकालकर माला डाल दी. एक परात में थोड़ा आटा, खाने का तेल, रूई और गीली धूप की मांग की. उन्होंने सात लोइयां बनाकर उन पर आटा गूंथना शुरू किया. फिर सात लोइयां बनाकर उन पर दिए जला दिए. साथ में जल तू जलाल तू, आई बला को टाल तू चलता रहा. फिर दिए एक ओर रख दिए और लोइयों को आपस में मिलाकर गूंथा जाने लगा. मैं यह सब तमाशा देख रहा था और मन ही मन कुढ़ रहा था.

लेकिन कुछ भी कर या कह नहीं सकता था क्योंकि मुझ पर पहले ही कई इल्जाम थे. महत्वपूर्ण काम बिगाड़ने का एक और आरोप अपने सर मैं नहीं ले सकता था. आटा गूंथते अकबर अली अचानक मेरी ओर मुखातिब हुए- यार थोड़ा-थोड़ा चाय बना, ठंड काफी है. ज्यों ही मैं चाय का पानी चढ़ाने को पलटा कि अकबर अली को कहते सुना- देखा, ये देखो, किसी ने कर-करा कर तुम्हारे पुश्तैनी घर में ये गाढ़ रख्खा है. उन्होंने आटे में से हड्डी का टुकड़ा और बाल बरामद कर लिए थे. अकबर अली बाल-हड्डी में से आटा छुड़ा रहे थे. 

अकबर अली की ठगी का एक दायरा था. मतलब कि कभी किसी का कोई गंभीर नुकसान नहीं किया. बस, बीस-पचास या हद से हद सौ-दो सौ. हर आदमी कुछ न कुछ करता ही है. उन्होंने यही रास्ता पकड़ लिया. जीने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है. सच कहूं तो उन्हें ठग कहने को भी जी नहीं चाहता. आए दिन हजारों करोड़ों के घपलों की खबरों के सामने अकबर अली के कारनामें किसी बच्चे की-सी नादानी लगते हैं. 

अकबर अली को याद करते हुए एक बात मुझे अनायास ही महसूस हुई कि तब हमारी कूवते-बरदाश्त आज के मुकाबले शायद ज्यादा थी. क्योंकि जहां तक मैं जानता हूं अकबर अली अपनी हरकतों के लिए कभी पिटे नहीं. आज आदमी जरा सी बात पर पुलिस बुला लेता है या खुद ही जज बनकर सामने वाले के मुंह पर लात-घूंसे से फैसला लिख देता है. तब आदमी थोड़ा बहुत बक-झक करके आगे बढ़ जाता था. मसलन दर्जी कभी समय पर कपड़ा सीकर नहीं देता था. लेकिन दर्जी बदला नहीं जाता था. आज अमूमन ऐसा नहीं होता. 


यहां पर अकबर अली के चंद ही किस्से जुट पाए. उनके किस्से सैकड़ों की तादात में होंगे. उन्हें अगर इकट्ठा किया जाए तो ‘दास्ताने-अकबर अली’ नाम की मोटी-सी किताब बन सकती है. कोई सुनाने वाला मिला तो अक्कू मियां की कुछ दास्तानें फिर कभी. 

Saturday, July 22, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - बीस


(पिछली क़िस्त से आगे)

गिरधारी को उसके घर छोड़कर परमौत अपने घर लौटा तो उसने खुद को अजीब सी कैफियत में गिरफ्तार पाया. दिन भर भावनात्मक रूप से निचुड़ जाने के बाद भी उसे थकान नहीं लगी थी. वह छत पर चला  गया. गर्मी अब भी अच्छी खासी थी और कई दिनों के बाद शराब और इतनी सारी शराब पी चुकने के बाद उसके भीतर सांय-सांय करते विचार किसी उबाल की तरह घुमड़ रहे थे. इन विचारों में उसकी पिरिया थी और उसके सुख-दुःख में हमेशा साथ रहा करने वाले दोस्त. उसे डायरी में लिखे वायदों की निस्सारता का अहसास हुआ. उसकी समझ में आ रहा था कि ज़िन्दगी के स्याह-सफ़ेद को इस तरह डायरी में चार वाक्य लिख कर अलग-अलग खांचों में फिट नहीं किया जा सकता.

क्या नब्बू डीयर जैसे दोस्त सिर्फ इस लिए उसके जीवन में थे कि उसकी सुविधा के हिसाब से कभी सह-मद्यप, कभी मसखरे, कभी सलाहकार और कभी कुछ भी नहीं की भूमिकाएं निभाते रहें? क्या पिछले तीन-चार महीनों में चाहे जिस कारण से हुआ हो, उसका निपट स्वार्थी बन जाना उसका अब तक के जीवन का सबसे बड़ा पाप नहीं था? क्या वह किसी के गले से लिपटकर गिरधारी की तरह निष्पाप रोना रो सकता था? क्या उसने गिरधारी और गोदाम के बाकी दोस्तों के साथ दगा नहीं किया था? क्या उनके दुःख को साझा करना उसका नैतिक कर्तव्य नहीं था जिसे गिरधारी लम्बू जैसा परम स्वार्थी प्रतीत होने वाला इंसान ‘धरम’ का नाम दे रहा था? क्या परिवार के जमे-जमाए बिजनेस को बढ़ाते चले जाना और अंततः किसी लाला की तरह मुटाकर टें बोल जाने की तरफ बढ़ते जाना में वह अपने जीवन का कोई अर्थ खोज सकता था?

गहरी सांस लेकर असहाय परमौत ने आंखें उठाकर आसमान की ओर देखा. टेलीफोन एक्सचेंज के ऊपर लगे टावर के ठीक ऊपर हल्का पीला पड़ा हुआ बेडौल चाँद था और उसके मरियल आभामंडल की परिधि के समाप्त होने के बाद छिटपुट तारे देखे जा सकते थे. चाँद-तारों को देख कर उसके मन में गोदाम के कोने में बैठे ‘चाँद सी मैबूबा’ वाले गीत पर प्रवचन देते नब्बू डीयर की इमेज तैर आई. ज़ाहिर है इस इमेज के बाद की अगली इमेज पिरिया की होनी थी. पिरिया का ख़याल आते ही से उस रूमाल की याद आई जिसे वह तकिये के नीचे छुपा आया था. वह दबे से क़दमों ज़ीने की सीढियां उतर कर अपने कमरे में पहुंचा. रुमाल वहीं था. उसे हल्की थकान महसूस हुई और वह जूता पहने-पहने बिस्तर पर लेट गया. छत पर निगाह अटकाए उसने रुमाल को फिर से सूंघा. शाम से अब तक काफी समय बीत गया था और उसमें सिर्फ पसीने की गंध बची रह गयी थी. शराब और अहसासों का मिला-जुला नशा अब पकने लग गया था और परमौत के आत्म-मंथन का दायरा बढ़ रहा था. उसने रुमाल को अच्छे से तहा कर नीचे रखा और एक तरफ को करवट ली. 

क्या पिरिया से सिर्फ ख़याली मोहब्बत की जा सकती थी जबकि वह चौबीसों घंटे शहर के गली-कूचों और उसके अंतर्मन में इस कदर ठोस तरीके से उपस्थित थी. उसके "ल्लै ... अब आपको मेरा नाम बी पता नईं  हुआ” का वह क्या अर्थ निकाले? क्या पिरिया को इस बात का थोड़ा भी अहसास होगा कि वह उसके साथ कैसे-कैसे सपने देखा करता है? लेकिन क्या पिरिया से मोहब्बत करने के मामले में भी उसने वैसी ही अवसरवादिता नहीं दिखाई थी? क्या वह दोस्ती की ही तरह मोहब्बत को भी अपनी सुविधा के हिसाब से नहीं कर रहा था? क्या उसकी अपनी मोहब्बत नब्बू डीयर की उस एकतरफ़ा मोहब्बत जैसी गलीज और काइयां नहीं थी जिसका वह और गोदाम के अन्य दोस्त इस कदर मज़ाक बनाया करते थे? क्या उसने गिरधारी द्वारा पिरिया की फोटो जुगाड़ लाने के प्रस्ताव को बिसराकर अपने सखा का अपमान नहीं किया था?

पिरिया की फोटो का ख़याल आते ही परमौत का मन अपने आप को लात मारने का हुआ. फोटो होती तो वह अपनी उस से इन सब बातों को कह सकता था ...

किसी बेफिक्र बच्चे की तरह गहरी नींद सोये परमौत को सुबह उठने में देर हुई. जैसे-तैसे दस बजे तक केमू स्टेशन पहुंचकर उसने गिरधारी को प्रतीक्षारत पाया. साढ़े दस पर बागेश्वर की आख़िरी बस थी. उन्होंने फिलहाल अल्मोड़े तक का टिकट लिया.

रास्ते भर कभी फ़िज़ूल की बातों पर हंसी-ठठ्ठा करते, कभी ऊंघते-सोते, भवाली-रातीघाट-खैरना-गरमपानी-लोधिया जैसी बेमतलब नज़र आने वाली लेकिन महान जगहों से गुजरने के बाद तीन बजे के आसपास दोनों अल्मोड़ा स्टेशन पर थे. अल्मोड़ा में बस के आधा घंटा के हॉल्ट के दौरान आगे का कार्यक्रम तय किया जाना था. यह अलग बात थी कि गिरधारी इसके पहले कभी अल्मोड़ा नहीं आया था लेकिन उसका मन था कि उसी रात बागेश्वर पहुँच जाया जाय जबकि परमौत एक रात अल्मोड़े में बिताना चाहता था. पहली नज़र में गिरधारी को अल्मोड़ा बेतरह भाया. नीचे उतरते ही वहां के पुरातन बस अड्डे के गिर्द पसरे आलस, भीड़, बास और गन्दगी के शाश्वत अल्मोड़िया परिवेश का हिस्सा बनाते ही गिरधारी का मन बदल गया. सदियों पहले बनाई गयी सीढ़ियों पर सदियों ही से बगैर नहाए बैठे दो दढ़ियल पागल नागरों की आवाजाही का मुआयना कर रहे थे, मिठाई और रेडीमेड कपड़ों की दुकानों पर पहाड़ के गाँवों से आए हुए असंख्य हकबकाए कुनबे जुटे हुए थे, पेशाबघर की बदबू सड़क पार कर उन तक पहुँच रही थी, गायों और कुत्तों के नियत कोने थे, ट्रैफिक का संचालन करने की नीयत से तैनात किया गया बेचारा लग रहा सिपाही किसी दुकान से माँगी गयी कुर्सी पर बैठा बाकायदा ऊंघ रहा था. सामने से बन्दरटोपी पहने बंगाली पर्यटकों का एक टोला आता दिखाई दिया तो गिरधारी बोला - "बुआ कां रैने वाली हुई तुमारी परमौद्दा ...?"

परमौत ने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया और उसे अपने पीछे आने का इशारा किया. परमौत स्टेशन के नज़दीक अवस्थित एक होटल में घुसा ने पर ही मौजूद एक ठीकठाक दिख रहे होटल में कमरा ले लिया.

“बुढ़िया के यहाँ खाली चिक-चिक होने वाली हुई यार गिरधर. अकेली हुई बिचारी. क्या बनाएगी क्या खिलाएगी? बस ज़रा सा मिल कर आ जाएंगे फिर दिखाते हैं तुमको अल्मोड़े के वो क्या कैने वाले हुए जलुवे ...” परमौत ने गिरधारी लम्बू की पीठ पर हल्की सी धौल जमाते हुए कहा. 

कमरे ने अपने अपने झोले डालकर दोनों अल्मोड़े के धारानौला मोहल्ले में रहनेवाली परमौत की बुआ के घर की तरफ चले कि शाम होने के पहले जल्दी-जल्दी इस औपचारिकता को भी निबटा लिया जाय. होटल से बाहर निकल कर उन्होंने सड़क पर सरसरी निगाह डाली. स्कूल-कॉलेज से लौट रही सैकड़ों सुन्दर-हंसोड़-शर्मीली लड़कियों के खी-खी करते झुण्ड के झुण्ड अलग अलग दिशाओं को गतिमान थे जिनकी वजह से ट्रैफिक की सघनता और सौन्दर्यबोध में कई गुना वृद्धि हो गयी लगती थी. चमत्कृत कर देने वाले इस दृश्य को गिरधारी मुंह खोले देख रहा था. उसने इतने नज़दीक से एक साथ इतनी सारी सुन्दर लड़कियां कभी नहीं देखी थीं – हल्द्वानी के डिग्री कॉलेज में भी नहीं. गिरधारी की लार टपकता देख परमौत हौले से मुस्कराया और उसने उसकी कमर में उंगली चुभो कर आँख मारी.

इस दृश्य का बहुत लम्बे समय तक अवलोकन करने के बाद वे लोहे के शेर तक पहुंचने वाली सीढ़ियां चढ़ने लगे. सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने वालों का अजस्र तांता लगा हुआ था.

“अबे सालो ... भौंरा कि पतंगा ...” उनके पीछे कोई जोर से चीखा. परमौत और गिरधारी ने इसे सुन कर भी अनसुना करते हुए चढ़ना जारी रखा. लेकिन जब “अबे परमौती वस्ताज जरा रुको तो हो ...” का स्वर कानों में पड़ा तो दोनों ठिठककर  पलटे. उनके पीछे भागता-हांफता परमौत का चाचा अर्थात हरुवा भंचक आ रहा था.

हरुवा को देखकर दोनों प्रफुल्लित हुए. वहीं सीढ़ियों पर उनका संक्षिप्त गला-मिलन समारोह हुआ जिसके तुरंत बाद हल्द्वानी से आए दोनों मित्रों को ज्ञान हुआ कि हरुवा भंचक हल्की टुन्नावस्था में है. “और गिरधर लाल, हाउ आर यू कहा ... तुमारी सकल देख के लग रहा एभरीथिंग फाइन ही हो रही होगी यार. अल्मोड़े आये हो और साला हरीस चन्न को हवा नहीं लगने दी साली ... गलत बात ठैरी यार भतीजे, कत्तई गलत ...” उत्साह के अतिरेक में आ गया हरुवा दोनों से एक साथ बात कर रहा था.

जब तक परमौत या गिरधारी लम्बू हरुवा की किसी बात पर कोई प्रतिक्रिया देते, सामने से आ रहे एक बाबा टाइप के आदमी से हरुवा की हाय-हैलो होने लगी और उसने उनसे “तुम चलते रहो आगे को ... लोहे के सेर पर रुके रैना हाँ परमौती बाबू ...” कहकर बाबा के कान में कुछ कहा जिसे सुनकर पहले बाबा और फिर स्वयं हरुवा जोर के ठहाकों में फूट पड़े. हरुवा भंचक और बाबा की मंत्रणा दो-चार मिनट चली जिसकी समाप्ति तक हरुवा के ऐसे आकस्मिक तरीके से टकरा जाने से अचकचाए दोनों मित्र लोहे के शेर तक पहुँच गए थे.

लोहे का यह दयनीय दिखने वाला शेर एक अनूठी कलाकृति है जिसे नगर के मुख्य बाज़ार के तकरीबन केंद्र में ऐसी जगह स्थापित किया गया है जहां इसे स्पॉट तक करने में नए आदमी को अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ सकती है. कई बार तो इसकी ठीक बगल में या इस से सटकर खड़े लोगों को भी यह पूछते हुए पाया गया जाता है कि दाज्यू लोहे का शेर कहाँ होगा. परमौत ने इस शेर को बचपन से देखा हुआ था और वह उसके आगे खड़ा हो गया. गिरधारी आगे जाने को था जब परमौत ने उसकी बांह थामकर रोका. परमौत ने उस पर सवालिया निगाह डाली तो परमौत ने लोहे के शेर की तरफ इशारा कर दिया. गिरधारी लम्बू ने लोहे के शेर को देखा तो अनायास बोल पड़ा – “भंचक लग गयी बिचारे सेर को यार परमौद्दा. कैसा बिरालू के जैसा म्यां-म्यां करने को हो रहा.” परमौत हंस पड़ा. अब वे बाजार की तरफ मुंह कर खड़े हुए. 

संकरे चौक बाज़ार की भयानक चहलपहल और उसमें मौजूद सुन्दर स्त्रियों की बहुलता देख कर गिरधारी लम्बू फिर से बौरा गया और उसने परमौत की तरफ चोर निगाह डाली. परमौत सामने ज़मीन पर फड़ लगाकर बैठी एक बुजुर्ग तिब्बती महिला के सामने लगी जम्बू-हींग-गंदरायणी जैसे एक्ज़ोटिक मसालों की ढेरियों पर ध्यान लगाए था. इस से गिरधारी को अपना महिला दर्शन कार्यक्रम जारी रखने को पर्याप्त प्रोत्साहन मिला और उसने समय का भरपूर लाभ उठाना शुरू कर दिया.

दो-तीन मिनट में हो-हो करता हरुवा भंचक पहुँच गया और उसने एक-एक कर दोनों से दूसरी बार गले मिलकर अपना पिछ्ला डायलाग रिपीट करते हुए उनके चुपचाप अल्मोड़ा आने पर थोड़ी सी नकली नाराजगी ज़ाहिर की. परमौत और गिरधारी से बगैर उनके भविष्य के कार्यक्रम की बाबत कोई सवाल किये उसने अपनी तरफ से प्रस्ताव रखा – “ऐसा करते हैं भतीजे पहले तुम को मिला के लाते हैं भगौती दी से. मैं तो हर दूसरे दिन जाने वाला हुआ वहां. तो पैले तुमारी बुबू के यहाँ जाते हैं फिर उसके बाद जो है हम करने वाले हुए फश्क्लाश पाल्टी.”

“तुम क्या ले जाओगे हम तो पैले ही वहीं जा रहे चचा ... तुम तो ये बताओ कि अल्मोड़े में तुम क्या कर रहे हो और ये साली दिनदहाड़े घुटकी कहाँ से लगा आए कि मार बम्पुलिस जैसे भभका मार रहे हो पैनचो ...”

दिनदहाड़े किये गए मद्यकर्म की भतीजे से ऐसी तारीफ़ सुनकर मुदित हरुवा के होंठ आधे गालों तक पसर गए और उसने किसी गुप्त सूचना का खुलासा जैसा करते हुए फुसफुस स्वर में कहा – “ठेला डाल रखा है यार एक अल्मोड़ा-रानीखेत रूट पर. आजकल खूब रहीस लोग मकान-हकान लगा रहे हैं दिल्ली-फिल्ली से आके उधर मजखाली-द्वारसों साइड. वहीं ईंट-पत्थर का ढुलान चल्ला इन दिनों. अरे ... अभी मुझको मिला नहीं था वो सीढ़ी पर ... क्या नाम कहते हैं उसका ... वो महेसिया ... अरे वोई दाढ़ी वाला वो जिससे बात कर रहा हुआ मैं अब्बी ... उसके सांथ पाल्टनरी कर रखी है ... थोड़ा पौपल्टी वगैरा का काम भी सुरु है ... अरे ऑफिश बना रखा है नैन्ताड़ीदीवाल में यार भतीजे ...”

चार महीने पहले कंगालावस्था में हल्द्वानी पहुंचे हरुवा के अल्मोड़ा में ट्रांसपोर्टर-कम-प्रॉपर्टी डीलर बन चुकने की कहानी गिरधारी को विश्वसनीय लगी लेकिन दो और दो चार मिलाकर परमौत समझ गया कि बचपन से ऊंची छोड़ने की आदत से मजबूर हरुवा झूठ बोल रहा था. कभी संकरी और कभी और भी अधिक संकरी हो जा रही अल्मोड़े की ऐतिहासिक बाज़ार से रास्ते में बुआ के लिए फल-मिठाई वगैरह खरीदे गए. फिर दो तरफ पत्थर की दीवारों से घिरी डेढ़-दो फुट चौड़ी बदबूदार गली से होते हुए उन्होंने धारानौला का रुख किया. सीढ़ियां उतरते हुए अचानक गिरधारी का पैर ताज़े गोबर पर पड़ा और वह गिरते-गिरते परमौत पर लधर जैसा गया. परमौत के हाथ से केलों की थैली नीचे गिर गयी. गोबर ही में गिरी थैली को लात से साइड करते हुए परमौत ने नारा जैसा लगाया – “जय हो भंचक देवता की!” और ठठ्ठा मार कर हंसा.

भगौती बुआ का घर अपने आप में एक वास्तुशिल्पीय अजूबा था जिसका प्रवेश दोमंजिले में अवस्थित छत पर बनी एक झिरीनुमा खोह में था. इस खोह से होकर पाताल को जैसा जाने वाला एक सीढ़ीदार, संकरा और अँधेरा गलियारा था. इस गलियारे में एकाधिक बार भबरी जाने की परमौत की बचपन की ठोस यादें थीं. परमौत के पीछे हरुवा था और हरुवा के पीछे अपने जूतों को लगातार ज़मीन पर घिसता आ रहा गिरधारी लम्बू.

घुप्प अँधेरे में खड़े रहकर पांच मिनट तक लगातार बुआ के दरवाज़े पर खटखटाने के बाद “को मर रौ न्हल ...  को मर रौ न्हल” का जाप करता गालियों से सुसज्जित स्त्री-स्वर सुनाई दिया तो हरुवा हल्की आवाज़ में बोला – “बुढ़िया मल्लब आने को बाद में कहेगी मरने को पहले ...”

अंदर से कुंडी खोलने की खटखट हुई. दरवाज़ा खुला और बुआ ने लाईट जलाकर जैसे ही “कौन है” कहा लाईट चली गयी – “आ जा हरीसौ ... तेरे आत्ते ही जाने वाली हुई ये आगहालण लाईट हम्मेसा ... ज़रा रुक तो लम्फू लाती हूँ बज्यौण ...”

(जारी)


Thursday, July 20, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - उन्नीस



उसी आवेशित क्षण में जैसे परमौत की अगल-बगल का सारा संसार पुनः जागृत हो गया. सड़क पर उन लोगों की आवाजाही फिर से शुरू हो गयी जो कुछ देर पहले मर गए थे. चेतना के वापस आते ही परमौत को लगने लगा जैसे समूचे हल्द्वानी शहर ने उसे पिरिया को अपने साथ मोपेड पर बिठाकर ले जाते देख लिया था और सड़क पर आने-जाने वाला हर आदमी उसको घूर रहा था. इस से पैदा होने वाली झेंप और सद्यःप्राप्त उपलब्धि से मिली नासमझ खुशी के मिलेजुले भावनात्मक विलयन ने उसे बजाय बनवारी के पास जाकर अपना स्कूटर लाने के मोपेड को घर की दिशा में मोड़ देने पर विवश कर दिया. उसे एकांत की घनघोर आवश्यकता महसूस हो रही थी.

असमय घर आया देख भाभी ने एकाध गैरज़रूरी सवाल पूछे और फिर अपने कामों में में व्यस्त हो गईं. चाय के लिए पूछे जाने पर उसने मना कर दिया. बच्चे पड़ोस में ट्यूशन पढ़ने गए थे. परमौत बिस्तर पर लेट गया और दरवाज़े पर एक चोर निगाह डालने के उपरान्त उसने जेब में रखा पिरिया का रूमाल बाहर निकाल लिया. सफ़ेद सूती कपड़े के रूमाल में चारों तरफ गुलाबी धागे से पीको की गयी थी और एक कोने में एक कली दो पत्तियाँ टाइप थोड़ी सी कढ़ाई. रूमाल को बिस्तर पर पूरा फैलाने के बाद उसने उसके आकार को अपनी हथेली से भी नापा. उसे गौर से देखकर उसके मन में पहली बात यह आई कि वह उसके अनुमान से बहुत ही छोटा था - इम्तहान के वक्त गुप्त जेबों में छिपा कर ले जाई जाने वाली नक़ल की पुर्जियों जितना. एकाध फिल्मों में तरह हीरो द्वारा हीरोइन के रूमाल को पा लिए जाने को जिस महामानवीय उपलब्धि के रूप में ग्लोरीफ़ाई किया गया था, परमौत अपने भीतर वैसी ही किसी असाधारण भावना का अनुभव करना चाहता था लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. उसने रूमाल को दूसरी बार सूंघना शुरू किया. पिरिया की लगाई परफ्यूम की महक में, जिससे उसका हाल ही में अन्तरंग परिचय हुआ था, पसीने की मरती हुई सी गंध भी मिली हुई थी और परमौत ने नोटिस किया कि पिछले कुछ ही मिनटों में पसीने की महक ने परफ्यूम पर हावी होना शुरू कर दिया था.

अचानक उसे अपने ऊपर तरस आने लगा. उसका व्यापारी मन रूमाल के गैरज़रूरी विवरणों को दर्ज करता जा रहा था जबकि उसे इस समय खुशी के मारे फट पड़ना चाहिए था. इतने लम्बे समय से वह जिस घटना को अपनी कल्पनाओं में हज़ार बार जी चुका था, वह अभी-अभी घटी थी. उसने अपने आप को डपटा और पिछले तीस-पैंतीस मिनटों के संयोगों को दुबारा से तरतीबवार जीने में सन्नद्ध हो गया. उसने अपने आप को स्कूटर पर सवार, गुनगुनाते हुए भीमताल से काठगोदाम पहुँचता हुआ देखा, फिर वह बनवारी के ठीहे पर लस्सी पी रहा था, फिर तिकोनिया, फिर पाकड़ का पेड़ जिसकी छाँह में पिरिया खड़ी थी ... इसके बाद के विवरण एक दूसरे में गुज्जीमुज्जी हो जा रहे थे और बार-बार कोशिश करने के बाद भी वह तय नहीं कर पा रहा था कि पिरिया ने उसका नाम मोची की दुकान पर लिया था या मोपेड रुकने के बाद. फिर उसे मोची की सूरत याद आई और अखबार में रखा हुआ पिरिया का सुन्दर पाँव और पाँव का खड़िया जैसा तलुवा और उस तलुवे पर नन्हीं सी लाल फुंसी. उसके दिमाग पर एक साथ इतनी सारी छवियों ने धावा बोला कि उसे लगा जैसे पिरिया उसकी बगल में आ कर लेट गयी है. उसकी आंखें मुंदी हुई थीं और उसने पिरिया के रूमाल को अपनी हथेली में भींचा हुआ था जब भाभी की आवाज़ ने उसकी तन्द्रा तोड़ी - "अरे प्रमोद वो तुम्हारे दोस्त बिष्टजी आये हैं. क्या कहूं उनसे? तीन चक्कर लगा गए हैं सुबे से बिचारे ..."

पिरिया के ख़्वाबों में खोये परमौत को उस वक्त किसी का आना बहुत अच्छा तो नहीं लगा लेकिन उसके तीन बार आ चुकने की बात ने उसे उठने पर विवश किया. उसे लगा था शायद रुद्दरपुर वाला उसका एक बड़ा कस्टमर आया होगा लेकिन एक बार पुनः ये बिष्ट जी गिरधारी लम्बू निकले. परमौत को देखते ही उसकी आँखों में आंसू आने को हो गए और वह इतना ही बोल सका - "क्या यार परमौद्दा ..."

परमौत को गिरधारी का आना बहुत अच्छा लगा और वह उसे पहली दफ़ा अपने कमरे में लेकर गया. उसने चादर को ठीक करने का बहाना बनाते हुए बिस्तर पर पड़ी रूमाल को जल्दी-जल्दी तकिये के नीचे स्थापित कर दिया. कमरे में घुसते ही उसे जैसे ही एकांत मिला, गिरधारी परमौत के गले से लग गया और बाकायदा सुबकने लगा.

"क्या हुआ गिरधरौ? अरे हो क्या गया जो ऐसे डाड़ हाल रा तू यार ... "

थोड़ा संयत होकर गिरधारी कुर्सी पर बैठा और शिकायती लहजे में बोला - "क्या नईं हुआ ये कौ यार परमौद्दा. आज साला तीन चार महीने हो गए तुमारी कोई खोज-खबर ही नहीं है ... तुम नोट कमाने में ऐसे लगे कि अपने भाई को भूल गए यार ... हद्द हो गयी ... मल्लब तुम बताओ कि तुमको जो क्या हुआ होगा कि तुमने गोदाम का राउंड काटना बी बंद कर दिया हो परमौद्दा ..."

परमौत के पास इन सारे सवालों के उत्तर थे भी और नहीं भी थे. उसने थोड़ा असहज महसूस किया और बात टालने की नीयत से पूछा - "चाय लगाते हो जरा-जरा गुरु?"

"चाय-हाय छोड़ परमौद्दा. ये बता कि कल को बागेस्वर चलते हो या नईं? वो नबुवा साला मरने-मरने को हो रा बल वहां ..."

"हैं ...? नब्बू उस्ताद वहां क्या कर रहे होंगे बागेश्वर में ... मल्लब ..."

"तुम गोदाम आते-जाते रहते तो तुमको पता चलता ना कि साला कौन क्या कर रा होगा ... चलो तो जरा बाहर को चलते हैं ... बड़ा गरम लग रा साला ..."

परमौत के घर से बनवारी की दुकान तक पहुँचने के अंतराल में मोपेड पर पीछे बैठे गिरधारी ने परमौत को बताया कि किस तरह उस नाटकीय घटनाक्रम के चलते नब्बू डीयर को अपनी माँ के साथ बागेश्वर जाना पड़ गया और किस तरह बिना उसे बताये मैं भी बंबई चला गया और किस तरह हमारी जन्नत को एक वीराने में तब्दील होने में ज़रा भी वक्त नहीं लगा. परमौत द्वारा गोदाम और गोदाम-मंडल से अकारण बेरुख हो को जाने भी गिरधारी लम्बू ने लाड़ और अपनेपन के साथ ने एकाधिक बार गरियाया. तात्कालिक संकट यह था कि पहाड़ से आये किसी आदमी के माध्यम से गिरधारी को पता लगा था कि नब्बू डीयर की तबीयत बहुत ज़्यादा खराब थी और यह भी कि ढंग का इलाज न मिला तो उसका हैप्पी बड्डे होने तक का भी चांस था. गोदाम तो तबाह हो ही चुका था.

बनवारी के ठीहे तक पहुँचने तक परमौत पशेमानी और अफ़सोस का जीता-जागता पुतला बन चुका था. उसी मनःस्थिति में उसने गिरधारी को लस्सी और सिगरेट पिलवाये, अपना स्कूटर वापस लिया, उसमें फिट किये गए बक्सों को उतारा और गिरधारी से मुखातिब होकर कहा - "अब कितना चूसेगा साली ठुड्डी को यार गिरधर ... चल जल्दी बैठ तो ..." गिरधारी को पीछे बिठाकर परमौत काठगोदाम और उससे आगे रानीबाग-भुजियाघाट तक का चक्कर काट आने की मंशा से उस दिशा में निकल पड़ा. स्कूटर को रेस देते समय उसे अचानक भान हुआ कि वह पिरिया के बजाय नब्बू डीयर के बारे में सोचता हुआ कातर हो रहा था. अपने सबसे नज़दीकी दोस्तों की ऐसी अनदेखी कर चुकने की अपनी कमीनगी पर अब उसे शर्म आने लगी थी. उसके अपने स्वार्थ के चक्कर इतनी मेहनत से बनाई गयी शरणस्थली बर्बाद हो गयी थी.

परमौत ने काठगोदाम के ठेके पर स्कूटर रोका और गिरधारी को पैसे देकर अद्धा लाने को कहा. काठगोदाम के रेलवे स्टेशन से रात कि निकलने वाली इकलौती ट्रेन के जाने में अभी समय था और प्लेटफॉर्म दस-बारह मनुष्य और इतने ही लेंडी कुत्ते फ़िज़ूल कामों में लगे हुए थे. अंग्रेजों के ज़माने में बनाए गए इस स्टेशन की आरामदेह बेंचें इस हिसाब से बनाई गयी लगती थीं कि बीस मिनट में अद्धा खेंचने की नीयत रखने वाले महात्माओं को इस सत्कर्म को बेरोकटोक अंजाम देने में ज़्यादा परेशानी न हो. पानी के लिए एकाधिक नल थे, सामने देखने के लिए एक लैंडस्केप था जिसमें पहले पटरियां थीं, उनके आगे झोपड़पट्टी, उसके आगे मकानात और उनके भी आगे वाली  गौला नदी से सटी पहाड़ियाँ जो फिलहाल गर्मी के कारण धूसर नज़र आ रही थीं और परमौत के मन के असमंजस और ग्लानि को प्रतिविम्बित कर रही थीं. जलते हुए तरल-गरल की थोड़ी सी मात्रा दोनों सखाओं के पेटों में पहुँची और दोनों की आँखों में बरसों बाद मिले किसी दुर्लभ आनंद की सी तरावट और संतुष्टि आ गयी.

"अब बता गिरधर बेटे तू बागेश्वर-हागेश्वर क्या कै रा था उस टैम? ... ये अपने नबदा को जो क्या हुआ होगा साला ये दो-तीन महीने में ही मरने को तैयार हो गया बल ..."

"अरे ऐसे ही हुआ यार परमौद्दा ... खाल्ली हुआ सब साला ... कोई पैंसा-डबल-टका जो क्या ठैरा उसकी फैमली में किसी के पास. मामा हुए उसके वो गोदाम वाले आर्मी रिटायर ... उन्हीं के दिए से काम चलने वाला हुआ उसका और उसकी ईजा का ... बाबू बिचारे के गाँव रहने वाले हुए बागेस्वर ... बिचारों को वहीं बाई पड़ गयी हुई उस दिन ... नहीं बता रहा था मैं तुमको जब वो पंडत आया रहा उसके अगले दिन गोदाम को ... दायाँ सरीर पूरी तरे से घुस गया बल उनका ... लाचार ठैरे ... डबल-हबल सब निल हुआ. नबदा बिचारा वहां किसी ठेकेदार के साथ काम रहा था बल ... खाना-हाना खाया नहीं होगा .... टीबी-टाबी जैसा क्याप्प कुछ हो गया है बल बिचारे को ... मरता है साला भलै अब ..."

परमौत ने अपने जीवन में इस तरह की किसी स्थिति का सामना नहीं किया था जहां पैसे की इतनी तंगी से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता पड़ा हो. उसे अपनी पतलून की जेब में धरी नोट की गड्डी का ख़याल आया फिर यह भी कि ऐसे पैसे के होने का क्या फ़ायदा था जब आपका सबसे पक्का दोस्त बागेश्वर जैसी नामुराद जगह पर टीबी से मर रहा हो. परमौत ग्लानि के दलदल में थोड़ा और धंस गया.

वह तनिक असहाय स्वर में बोला - "अब क्या करेंगे यार गिरधर गुरु ... क्या होता है अब ...?"

"... करना वही ठैरा परमौद्दा जो धरम कैने वाला हुआ ... मल्लब मैं तो कल सुबे जा रहा बागेश्वर नब्बू डीयर को हल्द्वानी लाने को ... देखी जाएगी साली ... चार-छै सौ रुपे बचा रखे थे मैंने इमर्जेंटी के लिए ..."

"... मल्लब ... अकेले .... "

"मेरे पास कौन से साले ड्राईबर-फ्राईबर घर में लगे ठैरे परमौती वस्ताज ... अकेले ही जाना हुआ ... और क्या फिर ... तुम चलते हो तो ऐसा कहो ..."

प्रोजेक्ट-बागेश्वर में शामिल होने के लिए गिरधारी लम्बू ने परमौत को दूसरी बार प्रस्ताव दिया. परमौत को पहली बार अहसास हुआ कि उसे अपने आप को बचाए रख सकने के लिए गिरधारी लम्बू के साथ जाना ही होगा.

काठगोदाम रेलवे स्टेशन वाले अद्धे के उपरान्त एक और वैसी ही शीशी लेकर उन्होंने सीधे गोदाम जाने का फैसला किया. चाभी गिरधारी के पास धरी रहती थी. शटर खोलकर गोदाम में घुसे तो बंद कमरे की भीषण गर्मी और बदबू के असहनीय भभके ने उनका स्वागत किया. स्थिति सामान्य होने पर उन्होंने देखा कि मेरे और नब्बू द्वारा खले गए चैंटू के अंतिम खेल के प्रमाणस्वरूप माचिस की डिब्बी गिलास के भीतर घुसी हुई थी और खेल की मेज़ पर जमी हुई धूल के बीच स्कोरबोर्ड लिखनेवाली कॉपी खुली रखी हुई थी. खुली हुई यह कॉपी का स्कोर बता रहा था कि खेल के पूरा होने से पहले ही खिलाड़ी किसी कारणवश उसे बीच में छोड़कर चले गए थे. गिरधारी लम्बू और परमौत इस स्थिति में नहीं थे कि उस शाम की घटनाओं की ठीकठीक कल्पना कर पाते जब नब्बू डीयर और मैं देर तक परमौत का इंतज़ार करते रहे थे. परमौत ने बेहद अपनेपन के साथ कॉपी का मुआयना किया और अपनी निगाहें गोदाम के चप्पे-चप्पे पर डालना शुरू किया - बगैर ढक्कन वाला टू-इन-वन, पव्वे-अद्धों की सूरत में कबाड़ी को बेचे जाने की राह देख रहा शराब का बेशुमार बारदाना, टीन के बेमतलब पत्तरों का चट्टा, दो दर्जन से अधिक जगहों पर सिगरेट से दगा हुआ एक अदद गद्दा, दस-बारह कैसेट, तीस-चालीस किताबें-पत्रिकाएँ, पुराने अखबार, एक छड़ी, दीवार पर समांथा फॉक्स का धूसरित हो चूका आदमकद पोस्टर और सिगरेट की ठुड्डियों से भरी पीतल की पुरानी एशट्रे. कोने पर दीवार में बनाए गए सरिया निकले, सीमेंट के एक छोटे से बेडौल स्लैब के ऊपर पता नहीं कब से नब्बू डीयर का फूटा हुआ माउथ ऑर्गन रखा हुआ था जिसे बजाना हम में से किसी को नहीं आ सका. नब्बू डीयर ने शुरू शुरू में यह बण्डल फेंकी थी कि उसकी प्रेमिका ने वह माउथऑर्गन उसके किसी बर्थडे में उपहार में दिया था. बाद में अपनी पोल खुल जाने के पहले ही उन्होंने स्वीकारोक्ति की थी कि दरअसल वह यंत्र पीलीभीत में रहनेवाले उनके एक जन्मजात चोट्टे मौसेरे भाई का था जिससे उन्हें बचपन से ही दुश्मनी थी और इसी वजह से वह उसे कभी वहां से चुरा लाया था.

परमौत ने माउथऑर्गन उठा किया और उसे अपनी पतलून पर पोंछकर उसमें फूंक मारी. अजीबोगरीब किस्म की च्वां-प्वां की सी ध्वनि निकली जिसने गोदाम के शटर के बाहर बैठे कुत्ते को हकबका सा दिया और उसने भौंकना शुरू कर दिया.

परमौत नोस्टाल्जिया के गटर में घुस गया. उसने अद्धा मुंह में लगाकर एक लंबा घूँट लिया और गिरधारी से मुखातिब हुआ - "और ये हमारे साले पंडत को बंबई किसने भेजा दिया होगा यार? यहीं रैता ... टूसन-फूसन पढ़ाता, ईजा-बाबू के साथ रैता ... वो अच्छा हुआ या साला बंबई जैसी हौकलेट जगे पे अपनी ऐसी-तैसी करा रा वो अच्छा हुआ  ... हैं?"

"तुझे कैसे पता परमौद्दा कि पंडत की वहां ऐसी-तैसी हो रही होगी ..."

"गिरधारी गुरु, एक बात समझ लो बाबू, बंबई में कोई साला खुस नहीं रैता सिवाय टाटा-बिल्डा के ... और क्या कैते हैं वो राजेस खन्ना-देबानन के अलावे ... बाकी सब सालों का क्या हुआ? ... भागते रहो चूतियों की तरह ... लटके रहो साले बस-ट्रेन के उप्पर ... मैंने देख रखा हुआ साला बंबई-हम्बई पैले ... बाबू ले के गए थे एक बार ददा और मुझको ..."

"तो तू कह रहा हुआ परमौद्दा कि पंडत को भी बंबई में वैसी ही टीबी-टाबी हो सकने वाली हुई ... ये अजीबी टाइप फुकसटपंथी है साली - मल्लब हल्द्वानी छोड़ के जहाँ जाए वहां बीमार पड़ जाने वाला हुआ आदमी बल ... ल्लै! ..."

गिरधारी और परमौत उस रात एक बजे तक प्रेमालाप करते रहे जिसके समापन पर यह तय हुआ कि वे दोनों अगली सुबह नौ-दस बजे बागेश्वर का रुख करेंगे. हुआ तो एक रात अल्मोड़े में परमौत की बुआ के घर बिताई जाएगी और उसके अगले दिन बागेश्वर जाकर नब्बू डीयर को हल्द्वानी लाने का जुगाड़ बनाया जाएगा.

"हाँ लौट के पंडत के घर जा के उसका नम्बर-हम्बर पता लगाते हैं परमौद्दा. बड़े गुलसन नंदा बन्ने गए हैं साले ..."


(जारी)  

Wednesday, July 19, 2017

फ्रीदा काहलो की डायरी का एक पन्ना


आधुनिक कला संसार में एक कल्ट की हैसियत रखने वाली मैक्सिकी चित्रकार फ्रीदा काहलो के बारे में आप काफ़ी जानते होंगे. उनके बारे में कबाड़खाने में कई पोस्ट्स लिखी जा चुकी हैं. इन पोस्ट्स पर जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - कबाड़खाने में फ्रीदा काहलो.

फिलहाल फ्रीदा की मशहूर डायरी का एक पन्ना देखिये. यह पोस्ट मेरी फेसबुक मित्र और शानदार पेन्टर शबनम गिल के लिए ख़ास तौर पर - 


पन्ने पर लिखी इबारत का अनुवाद:

मैं अनंतता के बिंदु तक
छीली गयी पेंसिलों को आजमाऊंगी
जो हमेशा आगे देखती है:

हराअच्छी गर्म रोशनी

लाल-बैंगनीअज़टेक. पुरातन त्लापाली* (TLAPALI)   
कंटीली नाशपाती का रक्त, सबसे
चमकीला और सबसे पुराना 
  
[भूरा —] मस्से का रंग, धरती में बदलती
पत्तियों का रंग

[पीला —] पागलपन बीमारी भय
सूरज और ख़ुशी का एक हिस्सा

[नीला —] बिजली और पवित्रता प्रेम

[काला —] काला कुछ भी नहीं होता – सच में कुछ नहीं

[जैतूनी —] पत्तियाँ, उदासी, विज्ञान, समूचा
जर्मनी यही रंग है

[पीला —] और ज़्यादा पागलपन और रहस्य
सारे प्रेत इसी
रंग के वस्त्र
या कम से कम इसी
रंग के अंतर्वस्त्र पहना करते हैं

[गाढ़ा नीला —] खराब विज्ञापनों
और अच्छे बिजनेस का रंग

[नीला —] दूरी, कोमलता.
क्या यह नीला रक्त

हो सकता है?

[त्लापाली* = पेंटिंग और ड्राइंग में इस्तेमाल होने वाले 'रंग' के लिए अज़टेक शब्द]  

Tuesday, July 18, 2017

पलकों की है कलम बनायी, काजल बहकर बना सियाही


ख़तो-किताबत
-शंभू राणा

            क़ासिद के आते-आते ख़त एक और लिख रखूं,
            मैं   जानता   हूँ, जो   वो   लिखेंगे   जवाब   में

ख़तो-किताबत के प्रति ऐसी बेताबी अब देखने में नहीं आती. ज्यादा वक्त नहीं गुज़रा जब ख़तो-किताबत आम थी. पत्र भेजे जाते थे, उनके जवाब आते थे. कुछों के जवाब फौरन आते थे तो कुछ आलसी किस्म के लोग थोड़ी देर से जवाब भेजते थे. अब ख़तो-किताबत गये जमाने की चीज होकर रह गयी है. भूले से किसी को पत्र लिख भी दो तो जवाब आता नहीं. आज किसी को चिट्ठी लिखना अंधेरे में लड़की को आँख मारने जैसा है.

पहले डाकिए को देख कर दिल धड़कता था, एक उत्सुकता सी पैदा होती थी कि शायद मेरे लिए कुछ लाया हो. किसी दोस्त, रिश्तेदार या प्रियजन का पत्र, खुशखबरी भरा कोई पैग़ाम. पोस्टमैन आकर्षित करता था, जीवन का एक हिस्सा था, उसका इन्तजार रहता था. बहुत दिनों तक जब आपके नाम कोई चिठ्ठी न आए तो डाकिए को रोककर पूछा जाता था - 'क्यूँ जी क्या बात, आजकल खाली हाथ आते हो?' या पोस्टमैन खुद ही आपकी खैरियत पूछ लेता - 'क्या बात है, साहब कई दिनों से आपकी कोई डाक-वाक नहीं आई!' यह रिश्ता अब जाता रहा. मोहल्लों के कुत्तों ने अब पोस्टमैन पर भौंकना शुरू कर दिया है, क्योंकि डाक कम होती है इसलिये उस रास्ते कम ही गुजरना होता है. अब डाकिया महकते हुए आत्मीयता भरे पत्र नहीं, टेलीफोन के बिल, बीमे की किस्त जमा करने की याद दिलाने वाले कागज और नौकरी के इन्टरव्यू का बुलावा लेकर आता है. (हर इन्टरव्यू बेसूद). एक और चीज कभी-कभार वह घरों में डाल जाता है - सरकारी नौकरी के लिए उम्र के हिसाब से अनफिट होने की पूर्व संध्या पर भेजी गई आखिरी अर्जी जब किन्हीं कारणों लौट आती है.

एक फिल्मी गीतकार कहता है - 'पहले जब तू खत लिखता था कागज में चेहरा दिखता था.' सचमुच कागज में लिखने वाले की सूरत नजर आती थी. कागज पर हाथ से लिखे अक्षरों में जो एक शब्दातीत आत्मीयता हुआ करती थी वह ई-मेल, मोबाइल के जरिये भेजे जाने वाले संदेशों में हो ही नहीं सकती. बड़े नाज़-नखरों के साथ राख छानकर चिमनी साफ कर पीतल के लैम्प जलाने और लापरवाही से बिजली का बटन दबा देने में बड़ा फर्क है.

बन्द कमरे में जो उसने मेरे खत जलाये होंगे, एक-एक हर्फ़ ज़बीं पर उभर आया होगा. शायर ने जिस दर्द को बयाँ किया है वह दर्द ई-मेल या एसएमएस को डिलीट करते हुए हो ही नहीं सकता. किसी बेहद आत्मीय के पत्रों को मजबूरीवश जलाने पर ही इसे महसूस किया जा सकता है.

पत्रों की दुनियाँ अजब थी और बेहद हसीन थी. गाँव-देहात में परदेश गये बेटे या पति का पत्र लेकर जब डाकिया आँगन में आता तो एक छोटा-मोटा उत्सव का सा माहौल उत्पन्न हो जाता. साक्षरता की दर कम थी. ऐसे में अमूमन डाक बाबू को ही पत्र पढ़कर सुनाना पड़ता था. पत्र पाने वाले परिवार के सदस्यों और पास-पड़ोस के दूसरे सदस्यों के चेहरे ख़त सुनते हुए रंग बदलते थे. चेहरे पर एक भाव आता तो दूसरा जाता. बेटे का ख़त माँ को ही सम्बोधित होता था. पत्नी को चाह कर भी ख़त नहीं लिखा जा सकता था, क्योंकि यह निर्लज्जता थी, कलयुग के आगमन की निशानी थी, और भी काफी कुछ था. बूढ़ी माँ को यह छूट और सुविधा थी कि वह पत्र सुनते हुए किसी बात पर खुल कर हँस पड़े या बेटे को याद कर सबके सामने आँसू बहा ले. पर जवान बहू के लिये यह मुमकिन नहीं था. वह सिर्फ नाक सिनक कर रह जाती. खत में उसके लिये भी संदेश होता मगर दूध में घुले बतासे की तरह छिपा हुआ और इशारों में. उसे मुस्कराने और रोने के लिये इन्तजार करना होता जब सब सो जायें और उसे भी दो घड़ी कमर सीधा करने की फुर्सत मिलती, बल्कि चुरानी पड़ती - पलकों की है कलम बनायी, काजल बहकर बना सियाही ...

आम आदमी के पत्रों में एक खास बात हुआ करती थी - पत्र भले ही कालकोठरी से लिख रहा हो-अपने सारे रंजो-गम छिपाकर सिर्फ सकारात्मक और हौसला बढ़ाने वाली बातों का ही जिक्र करना. मैं यहाँ पर राजी-खुशी हूँ और आप लोगों को सकुशल चाहता हूँ. यह वाक्य एक आम आदमी की अदम्य जिजीविषा और अपराजेय आत्मविश्वास का प्रमाण है, हर हाल में जी लेने और अनंत काल तक परिस्थितियों का मुकाबला कर सकने का भी. दूसरों के दुःख-दर्द और सुख की हर हाल में चिंता करने की हमारी परम्परा जिसे खलील जिब्रान ने 'दूसरे के प्याले से लो मत, हमेशा दूसरे का प्याला भरो' कहा है - का भी इसमें असर है कहीं. संघर्ष आम आदमी के लिये कभी भी तमगे की तरह सीने पर लटकाने की चीज नहीं रहा. उसके लिये यह स्वाभाविक है, जीवन का हिस्सा है- साँस लेने की तरह. इस नजरिये से अगर देखें तो यह जो आम आदमी है वह उन तथाकथित शहीदों से हजार दर्जा ऊँचा है जो अपने संघर्षों को भुना खाते हैं. एक जरा सी खरोंच की एवज में न जाने क्या क्या सुविधायें और ताम्र-पत्र लिये ऐंठते फिरते हैं. चैराहों पर अपनी मूर्ति की स्थापना और जन्मदिन पर राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा की प्यास भी सीने में कहीं दबी रहती होगी जरूर. संघर्षही उनका कैरियर बन जाता है. इस देश का आम आदमी अपनी पैदाइश से मौत तक रोज न जाने कैसे-कैसे संघर्ष करते हुए जीता है, उसके लिये यह नित्य कर्मों की तरह है. उसके लिये संघर्ष विधायकी का टिकट हासिल करने, नौकरी-पेंशन पाने या सार्वजनिक सभाओं में शॉल ओढ़ने के लिये किया गया शातिराना कर्म नहीं, जिससे व्यक्ति विशेष का भला तो होता है मगर किसी पवित्र उद्देश्य/विचार और वास्तविक संघर्ष की गरिमा जरूर कम होती है. विषय परिवर्तन हो गया शायद.

पहाड़ की मनीऑर्डर आधारित अर्थ व्यवस्था में डाक विभाग और डाकिए की अहम भूमिका थी. परदेश में छोटी-मोटी नौकरी करते तमाम जिल्लतें झेलते हुए, खुद खा न खाकर घर को पैसा भेजा जाता. लगभग हर परिवार ऐसे ही मनीऑर्डर की राह तका करता था बल्कि आज भी देखा करता है. उजली कालीन के नीचे कूड़ा उतना ही है. कुछ अर्थों में परिस्थितियाँ और भी खराब हुई हैं. बाजारवाद ने फिजूल के कुछ खर्चे बेशक बढ़ाए हैं मगर आमदनी के जरिये घट ही रहे हैं. विज्ञापनों का मायाजाल एक किस्म का एपिटाइज़र है जो आम आदमी के हाजमे और उपलब्ध खुराक का स्टॉक देखे बिना धकापेल पिलाया जा रहा है. पीने वाला दिनों-दिन बौराता जा रहा है. मनीऑर्डर लेकर आने वाला डाकिया ज्यादा सगा और आत्मीय लगता है. दूर ग्रामीण इलाके में मनीऑर्डर का आना तपती दुपहरी में ठंडी बयार चलने का सा अहसास दे जाता है. ऐसे में डाकिये को बख्शीश देने का भी रिवाज है.

उम्र के एक खास दौर में किताबों में दबाकर खुतूत का लेन-देन हुआ करता था. कंकरी में लिपटे खत इस छत से उस छत में उछाले जाते (यह उस जमाने का फैक्स था). ऐसे कुछ पत्रों के जवाब आते, ज्यादातर के नहीं. उर्दू शायरी ऐसी ख़तो-किताबत के जिक्र से भरी पड़ी है - 'पुर्जे उड़ा के खत के ये इक पुर्जा लिख दिया, लो अपने इक खत के ये सौ ख़त जवाब में.' डग्गामारी टैक्सी वाले आज करते हैं मगर इश्क में यह समस्या पुरानी है, ख़तो-किताबत के जरिये खूब हुई है. नतीजतन कोई भुक्तभोगी शायर नवोदित आशिकों को हिदायत दे गया है कि रकीबों को कासिद बनाते नहीं हैं. पोस्टमैनों के किस्से कई बार पढ़ने-सुनने में आते हैं कि पत्र पहुँचाने की सरकारी और पत्र पढ़ कर सुनाने की मानवीय ड्यूटी करते-करते माशूका पोस्टमैन के पाले में शिफ्ट कर गयी. असल आशिक जब लौटा तो लड़की उसे डाक बाबू की वर्दी धोती-सुखाती मिली. ख़तो-किताबत के बिला जाने से यह लुत्फ और ख़तरा भी जाता रहा.

ख़तो-किताबत को लेकर कई हल्के-फुल्के किस्से भी मशहूर हैं. ऐसा ही एक पुराना किस्सा है. बात तब की है जब पढ़े-लिखे कम होते थे, खासकर गाँवों में तो बिरले ही पाए जाते थे. ऐसे ही एक पढ़े-लिखे शख्स से किसी ने चिट्ठी लिख देने की इल्तजा की तो उसने यह कह कर इंकार कर दिया कि आजकल मेरे पाँव में दर्द है, बाद में आना. पाँव दर्द और चिट्ठी लिखने के बीच क्या संबंध हो सकता है, समझ में नहीं आया. पूछने पर उस अंग्रेजों के जमाने के पढ़े-लिखे आदमी ने खुलासा किया कि भय्या, तू जिस गाँव में चिट्ठी भिजवा रहा है वहाँ उसे पढ़ेगा कौन ? हमेशा की तरह मुझी को जाना पड़ेगा और मेरे पाँव में इन दिनों चोट है, मैं चल-फिर नहीं पा रहा. कुछ दिन ठहर जा, चिट्ठी भी लिख दूँगा और जाकर पढ़ भी आऊँगा.

एक और लतीफा है कि शहर से छुट्टियों में गाँव जा रहे आदमी के हाथों किसी ने एक पोटली भेजी अपने घर के लिये. पोटली में पत्र भी निकला. पोटलीवाहक दुर्घटनावश पढ़ना लिखना जानता था. घर वालों ने पत्र उसी से पढ़वाया. पत्र कुछ यूँ था- नरैणदा के हाथ कुछ सामान भिजवा रहा हूँ. एक सेर मिश्री-कुल पचपन  कुंजे, दो सेर आलू, तीस बड़े और पाँच दाने छोटे, एक सेर प्याज नौ दाने - सब बड़े. चाय की छटंगी देख लेना ठीक से. एक सेर शिकार - दस बिना हड्डी और पाँच छोटी हड्डी वाली बोटियाँ, सब पन्द्रह बोटियाँ. आजकल जमाना खराब है, भरोसा अपने सगे बाप का भी नहीं. और क्या लिखूँ, यहाँ हर तरह से कुशल है, बांकी नरैणदा बता ही देगा. और हाँ नरैणदा की नजर हमारे लाल वाले बकरे पर है. पैसा नकद गिने तो ठीक वर्ना किसी बहाने टरका देना. शिकार खूब पका कर एक कटोरा नरैणदा की इजा को देना मत भूलना.

कोना फटा कार्ड किसी के परलोक गमन की खबर लेकर आता था और अर्जेंट लिखे बिना ही अर्जेंट माना जाता था. किसी के गंभीर बीमार होने या दूसरे किसी किस्म के आपातकाल में पत्र के आखिर में यूँ लिखा जाता - चिठ्ठी को तार समझो और फौरन अगली गाड़ी से रवाना हो जाओ. समझने वाला उसे तार ही समझता और मालिक से लड़-झगड़ कर हाँफता हुआ चला आता. सचमुच का तार अगर मिले (गाँवों में तार का मतलब ही मरना होता था) तो मतलब कि चिता ठंडी पड़ चुकी है. तार पाने वाला उल्टी बनियान धारण किये और सर घुटा कर घर पहुंचाता था. गाँव-देहात में यह एक गंभीर गाली मानी जाती थी कि तेरे घर तार आ जाये. इससे झगड़े की गंभीरता का पता चलता था (अब पता नहीं क्या हाल है!) कोई साहब बता रहे थे कि पुराने वक्तों में एक बार गाँव वालों ने डाकिए को इसलिये खदेड़ दिया कि वह किसी के लिये तार लेकर आया था. गाँव वाले नाराज हो गये कि तेरी यह मजाल कि हमारे गाँव में तार लेकर आये. अपशगुनी कहीं का.

इसमें कोई दो राय नहीं कि संचार क्रांति (बावजूद इसके की यह क्रान्ति अब भी न तो सस्ती है न सर्वसुलभ) से सुविधा तो हुई है. जो संदेश पहले दिनों-हफ्तों में पहुँचता था वह आज मिनटों में ज्यों का त्यों पहुंचता है. नचिकेता अगर कहो तो नचिकेता ही सुनता है सुनने वाला, नीच कुतिया नहीं. जैसा कि पहले कई बार तकनीकी गड़बड़ी के चलते हो जाया करता था. गणेश जी एक ही समय में कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर पापी-धर्मात्मा के हाथों दूध पीते हैं.

बेशक हम पीछे नहीं आ सकते, न बीच रास्ते में अड़ सकते हैं. हमें हर विषय में, हर हाल में आगे ही जाना होगा. मगर आदमी का दिमाग ब्लैक बोर्ड भी तो नहीं कि डस्टर फेरा और सब साफ. मरे हुए का श्राद्ध हमारी परम्परा है और कोई सक्की बुड्ढा चाहे तो जीते जी अपना अग्रिम श्राद्ध भी करवा सकता है. पत्र लेखन की विधा लगभग अपनी अंतिम सांसें गिन रही है. तेजी से बिला रही इस विधा को याद करना एक तरह से उसका अग्रिम श्राद्ध ही है.

            मत फाड़ इनको कि जब अपनों से दिल घबराएगा
            हौसला  देंगी   तुझे   ये   चिठ्ठियाँ,   रहने  भी    दे.