Wednesday, December 13, 2017

मुँह भर पुकारे नहीं सुनेगी तू


रेल की पटरी
- इब्बार रब्बी

रेल की पटरी हो सुनसान
चांद आज नहीं निकले
कुत्ते भूँकते हों दूर
भगवान ग्लास फ़ैक्टरी का भोंपू
बोलने में देर हो
दूर-दूर तक कुछ नहीं
सिर्फ़ अंधेरा
ऐसे में वह
बस्ती से दूर आए
सूनी पटरी पर बैठे
फिर खड़ा हो और
मुँह भर पुकारे
नहीं सुनेगी तू


[1967]

Tuesday, December 12, 2017

धरती की गोद में बहुत पुरानी कब्र की तरह

उस औरत की गोद में
- इब्बार रब्बी

उस औरत की गोद में बच्चा
मैं बच्चे को देख रहा हूँ
और औरत को

मैं मैं नहीं रहा
गोद में हो गया
फूल की तरह भारहीन
गीत की तरह कोमल
उस औरत की गोद में


लाख-लाख औरतों की गोद में
धरती की गोद में
पुरानी, बहुत पुरानी कब्र की तरह


[1979]

Monday, December 11, 2017

ताकि वह रात में आए और चूमकर चला जाए


बिजली का खम्भा
- इब्बार रब्बी

वह चलता गया
और अंधेरा पाकर
चूम लिया बिजली का खम्भा
काले लोहे का ठंडापन

क्यों चूमा उसने
बिजली के अंधे कंधाबरदार को
ढोएगा जो
उलझे तारों की
सती
निगेटिव-पाजेटिव धाराएँ

इस सवाल का जवाब
दर्शनशास्त्रियों,
बुद्धिजीवियों
या केन्द्रीय मंत्रिमंडल के
किसी भी मंत्री
के पास नहीं है

32 खंभे हैं सड़क पर
इसे ही पसंद किया उसने
और्रों के पास नहीं फ़ालतू वक़्त
रोशन हैं सब
इसने तुड़वाया बल्ब
बच्चों की गुलेल से
ताकि वह रात में आए
और चूमकर चला जाए

इसके बस का नहीं चलना
उसके बस का नहीं रुकना


[1967]

Sunday, December 10, 2017

फूलों की पाँत में गा रहा हूँ


अंकुर
- इब्बार रब्बी

1.
अंकुर जब सिर उठाता है
ज़मीन की छत फोड़ गिराता है
वह जब अंधेरे में अंगड़ाता है
मिट्टी का कलेजा फट जाता है
हरी छतरियों की तन जाती है कतार
छापामारों के दस्ते सज जाते हैं
पाँत के पाँत
नई हो या पुरानी
वह हर ज़मीन काटता है
हरा सिर हिलाता है
नन्हा धड़ तानता है
अंकुर आशा का रंग जमाता है


2.
क्या से क्या हो रहा हूँ
छाल तड़क रही है
किल्ले फूट रहे हैं
बच्चों की हँसी में
मुस्करा रहा हूँ
फूलों की पाँत में

गा रहा हूँ

Saturday, December 9, 2017

सुबह से कम कुछ भी नहीं


सुबह दे दो
- इब्बार रब्बी

मुझे मेरी सुबह दे दो
सुबह से कम कुछ भी नहीं
सूरज से अलग कुछ भी नहीं
लाल गर्म सूरज
जोंक और मकोड़ों को जलाता हुआ
सुबह से कम कुछ भी नहीं


[1978]

Friday, December 8, 2017

बीज की तरह सुगबुगाना चाहता हूँ


बीज
- इब्बार रब्बी

मैं आदिम अंधेरे में
बीज की तरह
सुगबुगाना चाहता हूँ
आकाश और पृथ्वी से बाहर
माँ के गर्भ में
एक बूंद की तरह
आँख मलना चाहता हूँ
मैं एक महान नींद से
भयंकर आनन्द और
विस्मय में जगना चाहता हूँ


[1976]

Thursday, December 7, 2017

कैरम बोर्ड


कैरम बोर्ड
- इब्बार रब्बी

काली और सफ़ेद गोट
हमेशा लड़ती नहीं रहेंगी
अलग-अलग नहीं रहेंगी
’क्वीन’ का साम्राज्य डूबेगा
चार पाकेटॊं के समुद्र में
लाशें नहीं उतराएंगी
काली और सफ़ेद


[1976]

Wednesday, December 6, 2017

कोई है जो दराज़ को मैदान बना दे


दराज़
- इब्बार रब्बी

बीच की दराज में बन्द हूं
ऊपर होता हूं तो
पैर टूटता है
नीचे सरकता हूं
सिर फूटता है

मैं कहां जाऊं !
क्या करूं !
कैसे रहूं इस अन्धेरे में !
कब तक काग़ज़ों से पिचका हुआ !

दराज़ की हत्थी टूटी हुई है
कोई है
जो खींचकर निकाले
बेहत्थी दराज़ को
मैदान बना दे
मुझे हवा की दुनिया में
गुब्बारे-सा उड़ा दे


[1978]

Tuesday, December 5, 2017

उसकी आत्मा से तृप्ति का केंचुल उतर गया है


भूखा आदमी
इब्बार रब्बी

भूखे आदमी को लगता है कि जैसे
वह नंगा हो गया है,
कुछ पेट उसे नोच रहे हैं

उसकी आत्मा से तृप्ति का केंचुल
उतर गया है
वह अपने में सिकुड़ रहा है,
कि उसकी भूख और अधिक और अधिक
नंगी न हो जाए

वह भूख से बाहर नहीं निकलता
अपना कुछ भी
भूख में डूब जाने के लिए
इधर-उधर कातरता से कतराता है
भूखा आदमी सितम्बर की धूप में
यहां आता है, वहां जाता है
वह लपटों की सीढ़ियां चढ़ता है
उतरता है

उसे लगता है कि वह भूलभुलैया में भटक रहा ऐ
जो पिघले लोहे से भरी है
उसे लगता है कि समुद्र सूख रहे हैं
उसकी खाल और स्वभाव तड़क रहा है


[1976]