Saturday, November 1, 2014

जो सरदार की प्रतिमा की ऊंचाई नाप रहे हैं


पंकज श्रीवास्तव का यह पुराना लेख आईबीएन ब्लॉग से साभार लिया जा रहा है -

29 अक्टूबर (२०१३) को अहमदाबाद में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश का इतिहास कुछ और होता. उसी मंच पर मौजूद मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फौरन याद दिला दिया कि पटेल एक प्रतिबद्ध कांग्रेसी थे. सेक्युलर नेता थे. ये उस राजनीतिक युद्ध की बानगी है जो पटेल के नाम पर छिड़ा है. मोदी, दरअसल, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के उसी प्रचार को आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें बार-बार कहा जाता है कि सरदार पटेल, नेहरू से बेहतर नेता थे. यही नहीं पटेल को हिंदुत्व के दर्शन के करीब बताने की कोशिश भी होती है. आम चुनाव 2014 की आहट बढ़ने के साथ ये कोशिश तेज होती जा रही है.

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में पटेल की ऐसी प्रतिमा स्थापित करने का एलान किया है जो दुनिया में सबसे ऊंची होगी. अमेरिका की स्टैच्यू आफ लिबर्टी से भी ऊंची ये 182 मीटर की प्रतिमा गुजरात के नर्मदा जिले के सरदार सरोवर बांध के करीब स्थापित की जाएगी. 31 अक्टूबर को पटेल जयंती पर परियोजना का शिलान्यास हो भी चुका है. बीजेपी की ओर से इसका धुआंधार प्रचार जारी है. ऐसे मे ये जनना दिलचस्प है कि पटेल का बीजेपी की मूल प्रेरणा आरएसएस के प्रति क्या नजरिया था.

30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिरला हाउस में शाम की प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे महात्मा गांधी की छाती पर तीन गोलियां उतारी गईं. दुनिया भौंचक्की रह गई. खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले गांधी पर गोली किसी और ने नहीं, हिंदुत्व का दर्शन देने वाले विनायक दामोदर सावरकर के शिष्य और महासभा के कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने चलाई थी. गोडसे कभी आरएसएस का सक्रिय सदस्य था. गांधी की हत्या एक ऐसे हिंदू की हत्या थी जिसने सत्य को ही ईश्वर माना. जिसका धर्म मनुष्य और मनुष्य में भेद नहीं करता था. वे ईश्वर के साथ अल्लाह का नाम भी लेते थे. दोनों को एक समझते थे. लेकिन हिंदू गांधी के हत्यारों का आदर्श हिंदुत्व था. जिसके हिसाब से भारत के प्रति उनकी निष्ठा ही सच्ची हो सकती है जिनकी पितृभूमि और पवित्र भूमि, दोनों भारत में हों. इस परिभाषा से अल्पसंख्यक कभी देशभक्त नहीं हो सकते.

गांधी की हत्या ने दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया था जिसकी जिम्मेदारी गृह मंत्री के नाते सरदार पटेल के पास थी. तमाम तथ्यों को देखते हुए उन्होंने माना कि गांधी की हत्या में आरएसएस का भी हाथ है. और 4 फरवरी 1948 को पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया.

आरएसएस ने बेगुनाह बताते हुए इस पर आपत्ति जताई तो 11 सितंबर 1948 को पटेल ने आरएसएस के सरसंघचालक एम.एस.गोलवलकर को पत्र लिखा. उन्होंने लिखा- हिंदुओं को संगठित करना और उनकी सहायता करना एक बात है, लेकिन अपनी तकलीफों के लिए बेसहारा और मासूम पुरुषों, औरतों और बच्चों से बदला लेना बिल्कुल दूसरी बात.... इनके सारे भाषण सांप्रदायिक विष से भरे थे, हिंदुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए आवश्यक न था कि जहर फैले. इस जहर का फल अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी. सरकार व जनता की रत्तीभर सहानुभूति आरएसएस के साथ न रही बल्कि उनके खिलाफ ही गई. गांधी जी की मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया और मिठाई बांटी, उससे यह विरोध और भी बढ़ गया. इन हालात में सरकार को आरएसएस के खिलाफ कदम उठाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था.

आरएसएस और बीजेपी के लोगों का दावा है कि पटेल ने प्रतिबंध नेहरू के दबाव में लगाया था. लेकिन पटेल ने इस पत्र में लिखा कि गांधी जी की हत्या के बाद संघ वालों ने मिठाई बांटी. प्रतिबंध के अलावा कोई चारा नहीं था. जाहिर है, सरदार पटेल नेहरू की जुबान नहीं बोल रहे थे, अपना मन खोल रहे थे. बतौर गृह मंत्री उन्हें देशभर से खुफिया जानकारियां मिलती थीं.

यही नहीं सरदार पटेल ने 18 जुलाई 1948 को हिंदू महासभा के प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी एक पत्र लिखकर बताया कि प्रतिबंध के बावजूद आरएसएस बाज नहीं आ रहा है. उन्होंने लिखा-हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड संभव हो सका. मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी भाग षड्यंत्र में शामिल था. आरएसएस की गतिविधियां, सरकार और राज्य-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए स्पष्ट खतरा थीं. हमें मिली रिपोर्टं बताती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद वे गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं. दरअसल, समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली अधिक उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है.

दरअसल, संघ परिवार की ओर से पेश की गई हिंदूराष्ट्र की अवधारणा सरदार पटेल को कभी रास नहीं आई. वे भारत को हिंदू पाकिस्तान बनाने के सख्त खिलाफ थे. उन्होंने साफ कहा था कि, “भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इस देश में मुसलमानों के भी उतने ही अधिकार हैं जितने की एक हिन्दू के हैं. हम अपनी सारी नीतियां और आचरण वैसा नहीं कर सकते जैसा पाकिस्तान कर रहा है. अगर हम मुसलमानों को यह यकीन नहीं दिला पाये की यह देश उनका भी है तो हमें इस देश की सांस्कृतिक विरासत और भारत पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं.”

1925 में गठित आरएसएस का गांधी की हत्या तक न कोई संविधान था और न सदस्यता रसीद. पटेल ने मजबूर किया कि वो संविधान बनाये और खुद को सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखे. 11 जुलाई 1949 प्रतिबंध हटाने का एलान करने वाली भारत सरकार की विज्ञप्ति में कहा गया है-आरएसएस के नेता ने आश्वासन दिया है कि आरएसएस के संविधान में, भारत के संविधान और राष्ट्रध्वज के प्रति निष्ठा को और सुस्पष्ट कर दिया जाएगा. यह भी स्पष्ट कर दिया जाएगा कि हिंसा करने या हिंसा में विश्वास करने वाला या गुप्त तरीकों से काम करनेवाले लोगों को संघ में नहीं रखा जाएगा. आरएसएस के नेता ने यह भी स्पष्ट किया है कि संविधान जनवादी तरीके से तैयार किया जाएगा. विशेष रूप से, सरसंघ चालक को व्यवहारत: चुना जाएगा. संघ का कोई सदस्य बिना प्रतिज्ञा तोड़े किसी भी समय संघ छोड़ सकेगा और नाबालिग अपने मां-बाप की आज्ञा से ही संघ में प्रवेश पा सकेंगे. अभिभावक अपने बच्चों को संघ-अधिकारियों के पास लिखित प्रार्थना करने पर संघ से हटा सकेंगे...इस स्पष्टीकरण को देखते हुए भारत सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि आरएसएस को मौका दिया जाना चाहिए.'

इस विज्ञप्ति से साफ है कि संघ पर किस तरह के आरोप थे और भारत सरकार को उसके बारे में कैसी-कैसी सूचनाएं थीं. लेकिन प्रतिबंध हटाना शायद लोकतंत्र का तकाजा था और इसके सबसे बड़े पैरोकार तो प्रधानमंत्री नेहरू ही थे. पटेल को नेहरू के बरक्स खड़ा करने की कोशिशों के बीच ये पड़ताल भी जरूरी है कि दोनों नेता एक दूसरे के प्रति क्या राय रखते थे. भारत की आजादी का दिन करीब आ रहा था. मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी. 1 अगस्त 1947 को नेहरू ने पटेल को लिखा-

“कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं. इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं.”

जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा - “आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद. एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता. आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी. आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है. हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है. आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं.”

पटेल की ये भावनाएं सिर्फ औपचारिकता नहीं थी. अपनी मृत्यु के करीब डेढ़ महीने पहले उन्होंने नेहरू को लेकर जो कहा वो किसी वसीयत की तरह है. 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा – “अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी. अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफादार सिपाही नहीं हूं.”

साफ है, पटेल को नेहरू की जगह पहला प्रधानमंत्री न बनने पर नरेंद्र मोदी जैसा अफसोस जता रहे हैं, वैसा अफसोस पटेल को नहीं था. वे आरएसएस नहीं, गांधी के सपनों का भारत बनाना चाहते थे. पटेल को लेकर नरेंद्र मोदी के अफसोस के पीछे एक ऐसी राजनीति है जिसे कम से कम पटेल का समर्थन नहीं था.

बहरहाल, पटेल की विरासत पर बीजेपी के दावे के साथ कुछ ऐसे सवाल भी खड़े हो जाते हैं जिसका जवाब संघ परिवार नहीं देना चाहता. संघ परिवार कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग लगातार करता है. लेकिन सरदार पटेल ने 15 अगस्त 1947 को ऐसे भारत के नक्शे को स्वीकार किया था जिसमें कश्मीर था ही नहीं. जब विवाद बढ़ा तो पटेल ने शुरुआत में 'कश्मीर के झंझट से दूर रहने की ही नसीहत दी थी.' यही नहीं, वे संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को दी गई विशेष रियायतों के न सिर्फ समर्थक थे, बल्कि शर्तें तय करने में उनकी अहम भूमिका थी.

तो फिर संघ के पटेल प्रेम की वजह क्या है. जानकार मानते हैं कि संघ खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताता है, लेकिन हकीकत ये है कि स्वतंत्रता संग्राम में उसने भाग नहीं लिया. ऐसे में उसके पास ऐसे नायक नहीं जो अंग्रेजी साम्राज्यवाद से टकारते हुए पूरे भारत में सम्मानित हुए हों. जिनके जरिये राष्ट्रीय भावना जगाई जा सके. अब इस कमी को पटेल के जरिये पूरा करने की कोशिश की जा रही है.

कांग्रेस कार्यसमिति ने जून 1934 में प्रस्ताव पारित किया था कि कांग्रेस सदस्य, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग और आरएसएस से कोई संबंध नहीं रखेंगे. पटेल ने ये शपथ जीवन भर निभाई. लेकिन उनकी मौत के 63 साल बाद अगर आरएसएस ही उनसे संबंध जोड़ने मे जुटा है तो पटेल इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं. वैसे भी, किसी महापुरुष को उसके विचारों से दूर करके सिर्फ मूर्ति में तब्दील करना, हिंदुस्तान की पुरानी रवायत है. यही वजह है कि सबसे ज्यादा मूर्तियां गौतम बुद्ध की मिलती हैं जो मूर्तिपूजा के सख्त खिलाफ थे. कुछ ऐसा ही हाल गांधी का भी हुआ है. चौराहे-चौराहे गांधी जी की प्रतिमाएं हैं, लेकिन उनकी राह चलने वाले ढूंढे नहीं मिलते. और अब यही सलूक सरदार पटेल के साथ हो रहा है. जो सरदार की प्रतिमा की ऊंचाई नाप रहे हैं, वे उनके विचारों की गहराई में भी उतरेंगे, ऐसी कोई उम्मीद नहीं है.


सब से बड़ी बाधा तो आप हैं वित्तमंत्री जी! - राम जेठमलानी की चिठ्ठी



वित्तमंत्री के नाम वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी की यह चिठ्ठी ‘आउटलुक’ में छपी है. अभी इसे जस का तस अंग्रेज़ी में लगा रहा हूँ. समय पाते ही हिन्दी तर्जुमा करता हूँ-

An Open Letter To The Hon’ble Minister of Finance

Dear Minister,

I am not using your name because I am concerned only with your acts and omissions as Finance Minister in the Modi government and earlier as Leader of Opposition. The contents of this letter are meant primarily for the Chairman and the Vice-Chairman of the SIT and only secondarily for the education and enlightenment of your Ministry and the people of India in general.

India being a democracy, transparency of governmental operations is a fundamental obligation. Secrecy, and what you call confidentiality, have become very attractive to your ministry and they need to be put in proper prospective. Usually the two are associated with criminal activity, though I am conscious of some exceptional situations in which there may be a moral and legal compulsion.

I must confess that I have carefully watched your conduct as Leader of Opposition in the Rajya Sabha. Never once did you raise the issue of black money stashed abroad by persons who are no better than dacoits, and the enormous mindboggling volume of the loot. If I am wrong in this view of mine, kindly do enlighten the nation as to what you have done after you became the Leader of Opposition in the upper house in the matter of recovery of black money.

Now I want you to answer the following questions as honestly as you can.

(1) Are you aware that the German government in February 2008 made a public statement in newspapers circulating throughout the world that it will provide tax authorities in other countries, details of relevant clients from the DVD obtained by them from an ex employee of the bank on payment of roughly 475 million US dollars. The DVD contained names of 1400 clients of the Liechtenstein Bank. The German finance ministry spokesman Thorsten Albig said they will willingly share this information at no cost and condition to any requesting country. How did you react to this offer? Did you raise this issue in Parliament?

(2) Did you advise the BJP to do something about this grand offer which certainly made me excited and must have likewise brought some hope in the life of the forsaken and forlorn, who could well be the victims of the loot? Did you advise the party immediately to dispatch some emissary to Germany and secure this information?

(3) Did you come to know—if yes, when?—that the prestigious Swiss magazine called theSwiss Illustrierte had announced in 1991 the names, the photographs, the account numbers and the concealed loot in their accounts of 14 international crooks amongst whom the late, then recently killed, Prime Minister of India was one? Did you as an educated Indian citizen react to this news and if so, how?

(4) During the last election campaign for Parliament when our Prime Minister went around the country and spoke about repatriation of this black money, did you speak about it anywhere or write about it anywhere? Do tell me what and where?

(5) Do you know that in March, 2014 in the midst of the campaign I personally went to Germany and on my return recorded my discussions with the highest in the German ministry and the promise which I received from them about sharing this information with us. This letter was sent to your party leaders and I wanted some little help. Was that help of signing a letter of request to the Germans complied with? Did you do anything about it yourself? Have you done anything about it after you have become minister of finance?

(6) Is it correct that even before the election results were announced you had managed to secure an assurance from the party leaders that you would be made the minister of finance? Is it true that the party leaders carried out the pre-election promise by putting you in this ministry?

(7) When you were ultimately sworn in as India’s minister of finance, did you even once seek my cooperation and some education in techniques of recovery?

(8) Is it true that in the sitting of the Rajya Sabha of 8th July, 2014, you answered a question of a Member of Parliament relating to black money? Do you confirm the question asked and the reply that you gave which is reproduced here to refresh your memory.
“* 32. SHRI SHANTARAM NAIK:

Will the Minister of Finance be pleased to state:

(a) whether Government has made any request regarding black money held by Indian nationals in Swiss bank;

(b) when the request was sent and what was the information sought;

(c) whether it is a fact that parliament of Swiss Government has passed a law called, ‘The Swiss tax Administrative Assistance Act’;

(d) If so, when this Act was passed.

(e) whether the changes to be brought in under the law have to be approved through a referendum; and

(f) the details of response given by the Swiss Government in this regard, so far?”

Finance Ministry’s Answer to this question

“(a) Yes, Sir.

(b) and (f) : After the amendments to the Double Taxation Avoidance Convention (DTAC) with Switzerland came into force on 7th October, 2011, several requests seeking information in respect of Indian Nationals holding bank accounts in Swiss Banks in specific cases have been made. There has been a positive response to some requests, where information has been provided subject to the confidentiality clause in the said DTAC. In other cases, the Swiss Government has not been providing the information requested citing restrictions imposed by their domestic laws. Recently, reports appearing in the media on 22nd and 23rd June, 2014 indicated that during an ongoing exercise to identify the real beneficiaries or owners of funds held in various banks operating in Switzerland, the names of some Indian individuals and entities had been identified by the Swiss Government, who may have held untaxed money in Swiss banks through structures like trusts, domiciliary companies and other legal entities based out of countries other than India. A letter was accordingly written to Swiss Authorities on 23rd June, 2014 under the provisions of Article 26 of the DTAC between India and Switzerland, requesting them to provide the information in this regard that has been complied by Switzerland. The Swiss authorities in their reply dated 4th July, 2014 have stated that there is no list of Indian Tax residents holding assets in Swiss financial institutions in their own names or through structures.

(c), (d) and (e) : As per the information available on the website of the Federal authorities of the Swiss Federation (http://www.admin.ch), the Tax Administrative Assistance Act (TAAA) passed by the Swiss parliament came into force on 1st February, 2013. The Swiss Parliament approved the revision of the TAAA on 21st March, 2014. As per the information available on the said website, any proposed enactment, which includes changes in the existing law, may be subject to referendum in Switzerland. The referendum deadline will expire on 10th July, 2014 and if no referendum is called for by that date, the amended TAAA will come into force on 1st August, 2014.”
(9) Is it true that so far as your ministry is concerned you never invoked the provisions of the United Nations Convention Against Corruption (UNCAC) for securing this information from any country of the world. In no correspondence with any country have you invoked this document?

(10) Is this because your Ministry was not aware of this document as well as its ratification by Germany, Switzerland and India or knowing about this document you made no use of it? Have you or officers in the ministry read this document till today? Do tell the nation when you read it for the first time.

(11) Are you aware of the ‘Second report of the Task Force of the BJP on the steps to be taken by India’ in the matter of Indian Black Money Abroad in Secret Banks and Tax Havens running into 95 pages. I am sure this must have been read by you. Did you read “XIII. The Double Taxation Treaty with Switzerland” at page 26 of this document which described the Double Taxation treaty as an impotent instrument. Of course when this report was written in January 2011, the ratification of UNCAC by India had not taken place, though many other countries had ratified it long before. Did you read at the foot of page 23 -24 the warning of Admiral (retd.) R.H Tahiliani, the head of Transparency International India chapter?

(12) Do you know that before you took office, India did ratify this when the Manmohan Singh government was still in power. Yet you did not use it at all. You continued to use the DTAA because it was the favourite device of the previous government.

(13) Are you aware that Finance Minister Pranab Mukherjee, our President now had recommended the use of this useless document in his otherwise useless white paper on Black money. Ofcourse you would not know that his white paper was itself called a Black Paper.

For lack of space I am stopping this and it will be continued in the next issue of the Sunday Guardian. By now you must have discovered that I want to show to the nation that you are determined to see that Prime Minister Modi can never fulfil his pledge to the unfortunate people of India to get back the black money.

You, Mr Finance Minister, are the biggest obstacle.

उम्मीद पर तो हर पार्टी कायम है




एक भूतपूर्व मंत्री से मुलाकात

- शरद जोशी

मंत्री थे तब उनके दरवाज़े कार बँधी रहती थी. आजकल क्वार्टर में रहते हैं और दरवाज़े भैंस बँधी रहती है. मैं जब उनके यहाँ पहुँचा वे अपने लड़के को दूध दुहना सिखा रहे थे और अफ़सोस कर रहे थे कि कैसी नई पीढ़ी आ गई है जिसे भैंसें दुहना भी नहीं आता.

मुझे देखा तो बोले – 'जले पर नमक छिड़कने आए हो!'

'नमक इतना सस्ता नहीं है कि नष्ट किया जाए. कांग्रेस राज में नमक भी सस्ता नहीं रहा.'

'कांग्रेस को क्यों दोष देते हो! हमने तो नमकआंदोलन चलाया.' – फिर बड़बड़ाने लगे, 'जो आता है कांग्रेस को दोष देता है. आप भी क्या विरोधी दल के हैं?'

'आजकल तो कांग्रेस ही विरोधी दल है.'

वे चुप रहे. फिर बोले, 'कांग्रेस विरोधी दल हो ही नहीं सकती. वह तो राज करेगी. अंग्रेज़ हमें राज सौंप गए हैं. बीस साल से चला रहे हैं और सारे गुर जानते हैं. विरोधियों को क्या आता है, फ़ाइलें भी तो नहीं जमा सकते ठीक से. हम थे तो अफ़सरों को डाँट लगाते थे, जैसा चाहते थे करवा लेते थे. हिम्मत से काम लेते थे. रिश्तेदारों को नौकरियाँ दिलवाईं और अपनेवालों को ठेके दिलवाए. अफ़सरों की एक नहीं चलने दी. करके दिखाए विरोधी दल! एक ज़माना था अफ़सर खुद रिश्वत लेते थे और खा जाते थे. हमने सवाल खड़ा किया कि हमारा क्या होगा, पार्टी का क्या होगा?'

'हमने अफ़सरों को रिश्वत लेने से रोका और खुद ली. कांग्रेस को चंदा दिलवाया, हमारी बराबरी ये क्या करेंगे?'

'पर आपकी नीतियाँ ग़लत थीं और इसलिए जनता आपके ख़िलाफ़ हो गई!'

'कांग्रेस से यह शिकायत कर ही नहीं सकते आप. हमने जो भी नीतियाँ बनाईं उनके ख़िलाफ़ काम किया है. फिर किस बात की शिकायत? जो उस नीति को पसंद करते थे, वे हमारे समर्थक थे, और जो उस नीति के ख़िलाफ़ थे वे भी हमारे समर्थक थे, क्यों कि हम उस नीति पर चलते ही नहीं थे.'

मैं निरुत्तर हो गया.

'आपको उम्मीद है कि कांग्रेस फिर इस राज्य में विजयी होगी?'

'क्यों नहीं? उम्मीद पर तो हर पार्टी कायम है. जब विरोधी दल असफल होंगे और बेकार साबित होंगे, जब दो ग़लत और असफल दलों में से ही चुनाव करना होगा, तो कांग्रेस क्या बुरी? बस तब हम फिर 'पावर' में आ जाएँगे. ये विरोधी दल उसी रास्ते पर जा रहे हैं जिस पर हम चले थे और इनका निश्चित पतन होगा.'
'जैसे आपका हुआ.'

'बिल्कुल.'

'जब से मंत्री पद छोड़ा आपके क्या हाल हैं?'

'उसी तरह मस्त हैं, जैसे पहले थे. हम पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा. हमने पहले से ही सिलसिला जमा लिया था. मकान, ज़मीन, बंगला सब कर लिया. किराया आता है. लड़के को भैस दुहना आ जाए, तो डेरी खोलेंगे और दूध बेचेंगे, राजनीति में भी रहेंगे और बिज़नेस भी करेंगे. हम तो नेहरूगांधी के चेले हैं.'

'नेहरू जी की तरह ठाठ से भी रह सकते हैं और गांधी जी की तरह झोंपड़ी में भी रह सकते हैं. ख़ैर, झोंपड़ी का तो सवाल ही नहीं उठता. देश के भविष्य की सोचते थे, तो क्या अपने भविष्य की नहीं सोचते! छोटे भाई को ट्रक दिलवा दिया था. ट्रक का नाम रखा है देशसेवक. परिवहन की समस्या हल करेगा.'  
 
'कृषिमंत्री था, तब जो खुद का फ़ार्म बनाया था, अब अच्छी फसल देता है. जब तक मंत्री रहा, एक मिनट खाली नहीं बैठा, परिश्रम किया, इसी कारण आज सुखी और संतुष्ट हूँ. हम तो कर्म में विश्वास करते हैं. धंधा कभी नहीं छोड़ा, मंत्री थे तब भी किया.'

'आप अगला चुनाव लड़ेंगे?'

'क्यों नहीं लड़ेंगे. हमेशा लड़ते हैं, अब भी लड़ेंगे. कांग्रेस टिकट नहीं देगी तो स्वतंत्र लड़ेंगे.'

'पर यह तो कांग्रेस के ख़िलाफ़ होगा.'

'हम कांग्रेस के हैं और कांग्रेस हमारी है. कांग्रेस ने हमें मंत्री बनने को कहा तो बने. सेवा की है. हमें टिकट देना पड़ेगा. नहीं देंगे तो इसका मतलब है कांग्रेस हमें अपना नहीं मानती. न माने. पहले प्रेम, अहिंसा से काम लेंगे, नहीं चला तो असहयोग आंदोलन चलाएँगे. दूसरी पार्टी से खड़े हो जाएँगे.'

'जब आप मंत्री थे, जातिरिश्तेवालों को बड़ा फ़ायदा पहुँचाया आपने.'

'उसका भी भैया इतिहास है. जब हम कांग्रेस में आए और हमारे बारे में उड़ गई कि हम हरिजनों के साथ उठतेबैठते और थाली में खाना खाते हैं, जातिवालों ने हमें अलग कर दिया और हमसे संबंध नहीं रखे. हम भी जातिवाद के ख़िलाफ़ रहे और जब मंत्री बने, तो शुरूशुरू में हमने जातिवाद को कसकर गालियाँ दीं.'

'दरअसल हमने अपने पहलेवाले मंत्रिमंडल को जातिवाद के नाम से उखाड़ा था. सो शुरू में तो हम जातिवाद के ख़िलाफ़ रहे. पर बाद में जब जातिवालों को अपनी ग़लती पता लगी तो वे हमारे बंगले के चक्कर काटने लगे. जाति की सभा हुई और हमको मानपत्र दिया गया और हमको जाति कुलभूषण की उपाधि दी. हमने सोचा कि चलो सुबह का भूला शाम को घर आया. जब जाति के लोग हमसे प्रेम करते हैं, तो कुछ हमारा भी फर्ज़ हो जाता है. हम भी जाति के लड़कों को नौकरियाँ दिलवाने, तबादले रुकवाने, लोन दिलवाने में मदद करते और इस तरह जाति की उन्नति और विकास में योग देते. आज हमारी जाति के लोग बड़ेबड़े पदों पर बैठे हैं और हमारे आभारी हैं कि हमने उन्हें देश की सेवा का अवसर दिया. मैंने लड़कों से कह दिया कि एम.ए. करके आओ चाहे थर्ड डिवीजन में सही, सबको लैक्चरर बना दूँगा. अपनी जाति बुद्धिमान व्यक्तियों की जाति होनी चाहिए. और भैया अपने चुनावक्षेत्र में जाति के घर सबसे ज़्यादा हैं. सब सॉलिड वोट हैं. सो उसका ध्यान रखना पड़ता है. यों दुनिया जानती है, हम जातिवाद के ख़िलाफ़ हैं. जब तक हम रहे हमेशा मंत्रिमंडल में राजपूत और हरिजनों की संख्या नहीं बढ़ने दी. हम जातिवाद से संघर्ष करते रहे और इसी कारण अपनी जाति की हमेशा मेजॉरिटी रही.'

लड़का भैंस दुह चुका था और अंदर जा रहा था. भूतपूर्व मंत्री महोदय ने उसके हाथ से दूध की बाल्टी ले ली.

'अभी दो किलो दूध और होगा जनाब. पूरी दुही नहीं है तुमने. लाओ हम दुहें.' – फिर मेरी ओर देखकर बोले, एक तरफ़ तो देश के बच्चों को दूध नहीं मिल रहा, दूसरी ओर भैंसें पूरी दुही नहीं जा रहीं. और जब तक आप अपने स्रोतों का पूरी तरह दोहन नहीं करते, देश का विकास असंभव हैं.'

वे अपने स्रोत का दोहन करने लगे. लड़का अंदर जाकर रिकार्ड बजाने लगा और 'चा चा चा' का संगीत इस आदर्शवादी वातावरण में गूँजने लगा. मैंने नमस्कार किया और चला आया.


Friday, October 31, 2014

राजनीति जब भागती है तब उसके पैरों से छलछंद की घूल उठती है



मेरे स्कूल बिड़ला विद्यामंदिर, नैनीताल में मेरे सबसे प्रिय गुरुओं में एक श्री राजशेखर पन्त की फेसबुक वॉल से एक पोस्ट शेयर कर रहा हूँ.

अब तो हटना ही चाहिये खेलों की दुनिया से इन नेताओं को

राजशेखर पंत

जयशंकर प्रसादके प्रसिद्ध नाटक ध्रुवस्वामिनी की एक पंक्ति है – “राजनीति जब भागती है तब उसके पैरों से छलछंद की घूल उठती है”. संदर्भ भले ही बदल गये हों पर हकीकत आज भी सौ फीसदी यही है. खेल के मैदान और उस पर दौड़़ने वाले खिलाड़ी की बागडोर जब किसी नेता या राजनीति से जुड़े शख्स के हाथ में होती है तब विजय का उल्लास, उपलब्घि की संतुष्टि, पराजय से जन्मी कशमकश और आत्म-विश्लेशण या फिर खेल भावना और नेतृत्व की क्षमता के स्थान पर दिखायी देता है पद का दुरुपयोग, प्रतिभा की उपेक्षा, करदाता के पैसे से विदेशों में मौजमस्ती और शराब के नशे में गाड़ी चलाने या यौन उत्पीड़न जैसे आरोपों के चलते सारे देश को शर्मसार करने वाली धिनौनी और लिजलिजी हरकतें ... बात यहीं पर खत्म नहीं होती होती. खेल के मैदान पर तब नजर आते हैं वो चेहरे जिनके लिए सरकारी खर्चे पर दुनिया की सैर करना, सुविघाओं को भोगना ज्यादा अहम होता है. तब ओलंपिक या किसी अंर्तराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में जाने वाले खिलाडि़यों के दल से बड़ी हो जाती है उन आफीशियल्स की सेना जो इनके साथ जाती है, और लगे हाथों राजनीति के कुछ घुरंधर खिलाड़ी अपने बच्चों के स्कूल के प्रिसिंपिल्स को भी ग्लासगो की सैर करा लाते हैं. ग्रासरूट लेवल पर प्रतिभाओं की खोज और उन्हैं बढ़ावा देने जैसी बातें तब एक सजावटी सामान बन जाती हैं - 15 अगस्त या 26 जनवरी को झाड़पोंछ कर रखी गयी गांधी की मूर्ति की तरह. कोई चन्द्रप्रकाश मौर्य या एस. पी. पृथ्वी तब बार-बार उपेक्षा का शिकार हो कर आत्महत्या करते हैं और किसी अर्जुन एवार्डी की खस्ताहाली में रिक्शा चलाते हुए खींची गई तस्वीर किसी सांध्य दैनिक के आखिरी पन्ने पर छपी एक छोटी सी खबर भर बन जाती है. और यह सब होता है इसलिए क्योंकि इस देश में हिन्दुस्तान की हाकी टीम का कप्तान रहे किसी परगट सिंह की हाकी इंडिया का अघ्यक्ष बनने की दावेदारी को अक्सर किसी 85 वर्षीय विद्या स्टोक्स के बरक्स खारिज कर दिया जाता है.

इन विसंगतियों की फेहरिस्त निहायत ही लंबी है और शायद इससे भी लंबी है उन स्पोट्र्स फेउन्डेशन्स की सूची जिनमें से अघिकांश के अघ्यक्षपद पर राजनीति से जुड़ी शख्सियतों का कब्जा है. राजनीति से अप्रसांगिक हो चुके बहुत से पुराने सामानों को खेल की राजनीति आज भी प्रासंगिक बनाये हुए है. 

इन खेल संगठनों और उन राजनैतिक शख्सियतों का व्यक्तिगत रूप से उल्लेख करना, जो कि पिछले बीस-तीस सालों से इन्हैं अपनी मिल्कियत बनाये हुए हैं यहाँ जरूरी नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि खेल जो जमीन, घूल, मट्टी और पसीने से जुड़ा एक सरोकार है उससे अक्सर आसमान में उड़ने वाले राजनैतिज्ञ क्यों जुड़ना चाहते हैं? जब कि यह साफ है कि इन लोगों का खेलों से वैसा ही संबंघ है जैसा कि किसी महानगर की हाइराइज बिल्डिंग में रहने वाले शख्स का हिमालय की तलहटी पर स्थित किसी उजड़े हुए गाँव या खलिहान से होता है. वास्तव में खेल सामान्य जनों से, वोटर से जुड़ी एक फितरत है. जाति घर्म जैसे सरोकारों से उपर है ये. देश के युवा वर्ग में, जिसका प्रतिशत हमारे देश में काफी बड़ा है, यह सीघे जुड़ा है. इसके सहारे राष्ट्रवाद से ले कर क्षेत्रीय अस्मिता तक की भावनाओं को आसानी से भड़काया जा सकता है. एक खालिस शास्त्रीय किस्म का उदाहरण इसे और अघिक स्पष्ट कर देगा. याद कीजिये एक अज़ीम सियासी शख्सियत शरद पवार का राजनैतिक ग्राफ. महाराष्ट्र की क्षेत्रीय राजनीति से चल कर केन्द्र में कृषि मंत्री बनने तक के उनके सफर में कबड्डी और खो-खो जैसे ठेठ मराठी खेलों से ले कर बीसीसीआई से उनके जुड़ने तक की अन्र्तकथा समानांतर रूप से चलती है. बीसीसीआइ की अघ्यक्षता से पहले वह कबड्डी और खो-खो एसोसिएशन के भी प्रधान रहे थे. एक और वाकया है. हमारे तीन बाक्सर्स विजयेन्द्र सिंह, अखिलेश कुमार और जितेन्द्र कुमार जब अच्छे प्रर्दशन के बाद बिजिंग से लौटते हैं, तो हरियाणा की तत्कालीन हुड्डा सरकार का सारा अमला उन्हैं हुड्डा साहब की ब्रेकफास्ट टेबल तक ले जाने के लिए दिल्ली एअरपोर्ट पर होता है. पर इसी बीच बाक्सिंग फेडरेशन के अघ्यक्ष अभय चौटाला इन्हैं सीधे एयरपोर्ट से उठा कर उड़न छू हो जाते हैं, और फिर पांच दिनों तक उनके साथ समारोहों और अभिनन्दनों में व्यस्त हो जाते हैं. जाहिर है चैटाला इन दिनों मीडिया में छाये रहते हैं और काँग्रेस सरकार को इस उपलब्घि के बचे खुचे दोहन का मौका एक हफ्ते बाद मिलता है.

बात सिर्फ प्रचार या चर्चा में बने रहने भर की नहीं है. अकेले राष्ट्रीय खेल फेडरैशन लगभग 50 करोड़ का बजट खेलों के लिए मुकर्रर करता है. खेल से जुड़ा हर संगठन इस पैसे को लेता है. पर टैक्स पेयर की जेब से गये इस पैसे का हिसाब कोई नहीं देता. हास्यास्पद लगता है यह देखना कि मणिशंकर अय्यर जैसा सरकार में मंत्री रहा कोई व्यक्ति यदि इस मुद्दे को उठाता है तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. स्पोर्टस फेडरेशन को नैशनल स्टेडिया में आलीशान आफिस गैस्ट हाउस क्लब इत्यादि मामूली किराये पर मिलते हैं; बावजूद इसके इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन का बिजली का बैकलाग ही, स्पोर्टस अथारिटी आव़ इंडिया के अनुसार, करोड़ों में होता है. मुंबई में फाइल एक पी. आइ. एल. बताती है कि वेस्टर्न इंडियन फुटबाल एसोसिएशन द्वारा नियंत्रित कूपरेज ग्राउंड और मुंबई में ही स्थित महेन्द्रा स्टेडियम खेलों के लिए कम और हाइ प्रोफाइल शादियों के लिए अघिक जाने जाते हैं. विभिन्न स्टेडिआ का उपयोग पार्टियों द्वारा राजनैतिक जलसेां के लिये किया जाता है. स्वाभाविक है राजनैतिक हित जब इस कदर हावी होने लगते हैं तब खेल और खिलाडि़यों का पृष्ठभूमि में जाना तो तय होता ही है. 125 करोड़ की आबादी वाला यह देश एक दर्जन गोल्ड मैडल भी किसी ओलंपिक में नहीं जीत पाता. यहां प्रश्न प्रतिभा की कमी का नहीं उसे पहचानने, उसे संवारने, अवसर देने और उसके दोहन का है, गड़बड़ाती हुई प्राथमिकताओं का है. और जब राष्ट्रीय सन्दर्भों में प्राथमिकताऐं भटक जाती हैं तब खेलों को खोखला करने वाली राजनीति के इतिहास पुरुष रहे सुरेश कलमाडी या प्रहलाद सावंत जैसे लोग महज़ एक दुर्योग या दुर्घटना नहीं, एक आवश्यक बुराई बन जाते हैं. 

राजनेताओं को इन फेडरेशन्स से हटाना एक सामयिक ज़रूरत है और सिविल सोसायटी इस क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. पूर्व ओलंपियन्स द्वारा गठित क्लीन स्पोर्ट्स इंडिया की पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम कही जा सकती है. राजनैतिज्ञों के एकाघिकार को सीघे चुनौती देते हुए, इस संगठन से जुड़ी अश्विनी नाचप्पा कहती हैं कि इन्हैं खेल, खिलाडि़यों के आत्मसम्मान और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी सुविधाओं की न तो समझ होती है और न ही इसके महत्व का कोई आभास. सी. एस. आई. द्वारा लिखे गये एक पत्र का- जिसमें इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के खेल के प्रति दुर्भाग्यपूर्ण रवैये को आड़े हाथों लिया गया है- आई. ओ. सी. के प्रेसिडेंट द्वारा संज्ञान लिया जाना ही इस बात का प्रमाण है कि स्थितियां बहुत अच्छी नहीं हैं. राजनैतिज्ञों के खेल जगत में छाये वर्चस्व पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस टी. एस. ठाकुर और जस्टिस चलामेश्वर की बैंच इसे ए सैड कमेंन्ट्री आन स्पोर्टस इन इंडियाकहती है. सोसायटी फ़ॉर जस्टिस ने तो मुंबई हाइकोर्ट में फाइल अपनी पी. आइ. एल. में कुछ नामचीन सियासी हस्तियों को सीधे प्रतिवादी बना दावा किया है कि जो समय इन राजनैतिक हस्तियों को अपने मंत्रालय में बिताना चाहिये था वह पार्टी तथा व्यक्तिगत हितों को साघते हुए इन्होंने स्पोर्टस फेडरेशन में बरबाद किया है.

तो निश्चय ही एक अच्छी शुरुवात हो चुकी है, जो निरंतर बढ भी रही है. इसे यूं ही बढ़ते रहना चाहिये, क्यों कि ऐसा अगर नहीं हुआ तो सवा सौ करोड़ की आबादी वाला यह देश सैकड़ों कलमाडी, शरद पवार या राजीव शुक्ला भले ही पैदा कर ले पर एक ध्यानचंद, सचिन तेंदुलकर या मिल्खा सिंह का पैदा होना महज एक संयोग ही बना रहेगा. खेलों का स्तर तब यूं ही गिरता रहेगा और कभी कभार एक्का-दुक्का मैडल झटक लेने वाले खिलाडि़यों के फोटो हमेशा अपने होठों पर एक पेशेवर मुस्कान चिपकाये रहने वाले इन नेताओं के साथ अखबारों में छपती और न्यूज़ चैनलों पर दीखती रहेगी. ये बात दीग़र है कि तब ज़मींदोज़ हो जाने के इंतजार में क़फन ओढ़ कर बैठा हिन्दुस्तान के खेलों का भविष्य शायद यह कहने लायक भी नहीं रहेगा कि-

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक 
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है.

राजशेखर पंत

बद्री भवन
साकेत
भीमताल-263136
जि. नैनीताल
उत्तराखंड
मो. 9412100304


ज़ो चेर्नाकोवा के चित्र

मॉस्को के चित्रकार ज़ो चेर्नाकोवा के चित्र पेश हैं -










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