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Thursday, January 15, 2015

हँह, इसमें नया का है, सब्ब बेद में बा


(यह महत्वपूर्ण लेख भाई धीरेश सैनी के ब्लॉग 'एक ज़िद्दी धुन' से साभार लिया जा रहा है. बांग्ला अखबार 'एई समय' में प्रकाशित आशीष लाहिड़ी के लेख का वरिष्ठ कवि व वैज्ञानिक लाल्टू का किया अनुवाद. आशीष लाहिड़ी नैशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्युज़ियम में विज्ञान के इतिहास के अध्यापक हैं)

वैज्ञानिक मेघनाद साहा कम उम्र में ही ताप-आधारित आयनीकरण की खोज कर दुनिया भर में प्रख्यात हो चुके थे. उनका मन हुआ कि बचपन के गाँव जाकर आम लोगों से बातचीत कर आएँ. एक बूढ़े वकील ने उनसे पूछा, “बेटा,  का खोजा है तुमने कि एतना नाम हो गया.” मेघनाद ने समझाने की कोशिश की कि सूरज के प्रकाश में रंगों का विश्लेषण कर वहाँ मौजूद या जो मौजूद नहीं हैं, उन तत्वों को जानने का तरीका निकाला है. सुनकर उम्रदराज वकील साहब बोले, “हँह, इसमें नया का है, सब्ब बेद में बा.”

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद यह 'सब्ब बेद में बा' बात काफी फैल चुकी है. ताप-आधारित आयनीकरण की जगह पाईथागोरस के प्रमेय या अंग-ट्रांस्प्लांटेशन (गणेश इसके प्रमाण हैं) ने ले ली है. एन आर आई की ताकत के बल पर पहलवान बने बजरंगबली की पूँछ में तीन 'मशालें' धू-धू जल रही हैं - मनी, मैनेजमेंट, मीडिया. हाल में इस मशाल की लपटें विज्ञान महासभा तक धधक उठीं.

भले लोग आतंकित हैं. पर अगर ऐसा नहीं होता तो क्या हिसाब ठीक रहता? पढ़े लिखे लोगों ने बीजेपी से इससे अलग और क्या अपेक्षा रखी थी? पिछली बार बीजेपी के सत्ता में आने पर विश्वविद्यालयों में ज्योतिष (हस्तरेखा)-'विज्ञान' को अलग विषय मानकर पढ़ाना लगभग चालू ही हो गया था. नार्लिकर समेत दीगर वैज्ञानिकों ने विरोध जताया था. यह सब जानकर ही तो पढ़े लिखे लोगों ने बीजेपी को सत्ता दी है. तो फिर बंधु अब क्यों चीखो मम्मी, मम्मी...!

सवाल प्रधानमंत्री या बीजेपी के आचरण का नहीं है. सवाल यह है कि लोग आज क्यों चौंक रहे हैं? इसमें बड़ी बेईमानी है. अगर बीजेपी सत्ता में नहीं भी होती, तो क्या देश के लोगों के बड़े हिस्से की, वैज्ञानिकों की भी, आस्था क्या ऐसी ही नहीं है? सब्ब बेद में होने की परंपरा तो आधुनिक हिंदू-चेतना में अमिट, अमर है. विद्यासागर ने 1853 में कहा था, 'भारत के पंडितों' के लिए वैज्ञानिक सच गौण हैं, गैरज़रूरी हैं, वे यह देखते हैं कि इस सच के साथ हिंदुओं के शास्त्रों के किसी विचार का सही या कल्पित मेल कितना है. अक्षय दत्त ने आजीवन ऐसे खयालों का विरोध करते हुए खुद को समाज से बहिष्कृत तक करवा लिया, पर क्या इससे किसी का विचार बदला? जी नहीं, अगर बदला होता तो विवेकानंद क्यों कहते कि न्यूटन के जन्म के एक हजार साल पहले ही हिंदुओं ने गुरुत्वाकर्षण की खोज कर ली थी. विवेकानंद के हमउम्र प्रकांड विद्वान योगेशचंद्र राय विद्यानिधि ने इसका विरोध करते हुए कहा था, 'कम जानकारी रखने वाले कुछ लोग भास्कराचार्य के कथन पेश कर न्यूटन के महत्व को कम करना चाहते हैं. उन्हें यह जानना चाहिए कि दोनों में ज़मीं आस्मान का फर्क है. मेघनाद साहा स्वभाव से तीखा लिखते थे, 'इस देश में कई लोग सोचते हैं कि ग्यारहवीं सदी में भास्कराचार्य गुरुत्वाकर्षण पर धुँधला सा कुछ कह गए तो वे न्यूटन के बराबर हो गए. और न्यूटन ने नया क्या किया है? पर ये 'नीम हकीम खतरे जान' वाले श्रेणी के लोग भूल जाते हैं कि भास्कराचार्य ने कहीं यह नहीं कहा कि धरती और दीगर ग्रह सूरज के चारों ओर अंडाकार परिधि में घूम रहे हैं. उन्होंने कहीं यह सिद्ध नहीं किया कि गुरुत्वाकर्षण और गति के नियमों को जोड़कर धरती और दीगर ग्रहों के गति-कक्ष पता लगाए जा सकते हैं. इसलिए भास्कराचार्य या कोई हिंदू, ग्रीक या अरब केप्लर-गैलीलिओ या न्यूटन के बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोज चुके हैं, ऐसा कहना पागल का प्रलाप ही होगा. बदकिस्मती से इस मुल्क में ऐसे अंधविश्वास फैलाने वाले लोगों की कमी नहीं है, ये लोग सच के नाम पर महज खाँटी झूठ फैला रहे हैं.'

इससे हमारी निष्क्रिय चेतना पर कोई खरोंच पड़ी क्या? नहीं, अगर पड़ती तो हिग्स बोज़ोन की खोज के बाद देश के उच्च-शिक्षित लोग क्यों कह रहे थे कि अब भारत ने जो वेदांतिक सच खोजा था, वह सिद्ध हुआ.

1961 में रवींद्रनाथ की विज्ञान-चेतना की चर्चा करते हुए परिमल गोस्वामी ने लिखा था, 'प्राचीन भारत में सब कुछ ग्रामीण मान्यताओं पर आधारित था, इस देश में विज्ञान के आने के बाद कई पढ़े-लिखे लोगों में इसका असर दिखने लगा था.... बिना प्रमाण और तर्क के कई बार ऐसा कहा गया है कि आधुनिक यूरोपी विज्ञान असल में प्राचीन भारतीय विज्ञान के एक छोटे से हिस्से की खोज मात्र है. मेरे विचार में बंगाल में आधुनिक विज्ञान को पूरी आस्था के साथ स्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति अक्षयकुमार दत्त थे. पर अकेले उनके प्रचार की औकात ही क्या कि वह नए उभरते घमंड के बनिस्बत तर्कशीलता की प्रतिष्ठा करे. 


रवींद्रनाथ के वक्त झूठे घमंड में बढ़ोतरी होती चली थी.' और इसके विरोध में रवींद्रनाथ ने व्यंग्य के औजार की मदद ली थी. हेमंतबाला को लिखे अमर ख़तों में रवींद्रनाथ ने इस मूढ़ता की जम कर खिंचाई की थी. क्या उस तिरस्कार कोई असर हम पर पड़ा था? नहीं. किसी भी बात से हम पर कोई असर नहीं पड़ने वाला.

1891 में ज्योतिराव फुले ने लिखा था, 'कुछ साल पहले मराठी में लिखी एक पुस्तक में मैंने ब्राह्मणों के संस्कारों के असली रुप की पोल खोली थी.' उसी महाराष्ट्र में गणेश आगरकर ने लिखा था, 'इंसान के चमड़े के रंग से उसकी काबिलियत कैसे पहचानी जा सकती है? इस चतुर्वर्ण प्रथा को किसने शुरू किया? किस ने यह अतिवादी कथा चलाई कि ब्राह्मणों का जन्म 'समाजपुरुष'  नामक किसी पुराणकल्पित आदमी के मुँह से और अछूतों का उसके पैर से जन्म हुआ? ऐसे अन्यायी शास्त्रों का विनाश हो.' विनाश हुआ क्या? नहीं. 

इसीलिए फुले-आगरकर की चेतावनी के सौ सालों से भी ज्यादा समय के बाद उसी महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी ताकतों के हाथों तर्कशील जनसेवक चिकित्सक नरेंद्र दाभोलकर की मौत हुई. सनातन धर्म संस्था के सिद्धांतों के नेता डा.  जयंत अठवले ने अपनी निजी मानविकता का ब्रांड दिखलाते हुए सार्वजनिक रूप से कहा, हत्यारे के हाथों मारा जाना दाभोलकर का कर्मफल है; अच्छा ही हुआ, डॉक्टर की छुरी सहकर, ऑपरेशन टेबल पर मरने से तो यह तो बेहतर है! उस प्रांत के कुछ वैज्ञानिकों के अलावा हममें से और किसी के सीने में कहीं कोई आग धधकी? नहीं धधकी. रोशनी नहीं चमकी.

हाँ, यह मानना पड़ेगा कि अंधविश्वास और अंधविश्वास मौसेरे भाई हैं. हिंदुत्ववादी सब्ब वेद में है कहकर जो हुंकार देते हैं, उसकी बिल्कुल एक जैसी प्रतिध्वनि पश्चिमी सीमा के पार सुनाई पड़ती है. बस 'बेद' की जगह वे 'कुरान'  कहते हैं. पाकिस्तान के प्रसिद्ध नाभिकीय भौतिकी के माहिर परवेज हूदभाई ने इसके कुछ नमूने पेश किए हैं. जैसे 'इस्लामाबाद में विज्ञान सम्मेलन में एक जर्मन प्रतिनिधि ने कहा कि उन्होंने गणितीय टोपोलोजी का इस्तेमाल कर सिद्ध कर दिया है कि वे 'अल्लाह का कोण' माप सकते हैं. यह है पाई बटा n, जहाँ पाई का मान 3.1415927. और n का मान अनिश्चित है. पाठक इस बात को मानने से इन्कार कर सकते हैं. सही है, ऐसा अजीब हिसाब किसी के दिमाग में कैसे आ सकता है? पर पाकिस्तान के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के इस्लामी विज्ञान सम्मेलन के संक्षिप्त विवरण-ग्रंथ (1983) के पृ. 82 को देखिए. अगर देखें तो अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं कर पाएँगे. पाठक यह भी जान लेंगे कि इस पागल को पाकिस्तान सरकार ने निमंत्रण कर उसकी आवभगत का खर्च तक उठाया था. सवाल उठ सकता है कि इस आदमी को ईश निंदा के ज़ुर्म में क्यों नहीं पकड़ा गया? इसकी दो वजहें हैं. एक तो इस आदमी की ऊल-जलूल बातें (जो छपी हैं) ऐसी निरर्थक हैं, कि वह किसी के समझ नहीं आ सकतीं. दूसरी बात यह कि उस सभा में वे अकेले ऐसे पागल नहीं थे.' क्या मुंबई विज्ञान कॉंग्रेस की सभा में मौजूद विद्वान जन हूदभाई की इस पुरानी टिप्पणी से वक्त रहते कोई सीख ले पाए?

इसलिए, बीजेपी का काम बीजेपी कर रही है, इससे दुखी होने का नाटक करने से पहले, हे साधुजन, अपनी नज़र साफ करो.


Monday, March 24, 2014

आपका हीरो कौन है - भगत सिंह या नरेंद्र मोदी?

भाई धीरेश सैनी की फेसबुक वॉल से यह ज़रूरी पोस्ट लगा रहा हूँ-


आपका हीरो कौन है - भगत सिंह या नरेंद्र मोदी?

(यह पोस्ट उन आम नवयुवकों के लिए है जो अज्ञानतावश भगत सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों की तस्वीरें चिपकाए हुए हैं. भगत सिंह का रास्ता मोदी के रास्ते से संघर्ष का रास्ता है, शायद यह पढ़कर उन्हें मोटे तौर पर कुछ बातें समझ में आएं. बाकी जो धूर्ततावश और जानबूझकर ऐसा करते हैं, वे इसे पढ़कर समय न गँवाएं.)

नरेंद्र मोदी भगवान हैं. उन्होंने कलजुग में खाकी निक्कर पहनकर अवतार लिया है. सामूहिक नरसंहार और बड़ा जनसमर्थन जुटा लेने के कारनामे तो अक्सर होते रहे हैं लेकिन बचपन में एक मंदिर पर झंडा फहराने के लिए खाकी निक्कर पहनकर मगरमच्छों से भरी झील को पार कर जाना सामान्य बच्चे के बूते से बाहर की बात है. उनके ऐसे चमत्कारी कारनामों पर आ रही चित्रकथा के प्रकाशक का दावा है कि बाल मोदी के ये कारनामे सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और इस बारे में आठ महीने की रिसर्च भी की गई है.

लेकिन, अगर आप भगत सिंह के भी प्रशंसक हैं तो आपको निराशा होगी. भगत सिंह एक सामान्य हाड़-मांस के बने मनुष्य थे और मगरमच्छ से भरी झील में पांव रखने की मूर्खता वे नहीं कर सकते थे. मंदिर पर झंडा फहराने का काम उन्होंने बीच में कोई ऐसी बाधा न होते हुए भी कभी नहीं किया. आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा ले रहे एक ऐसे सिख किसान (बड़े किसान) परिवार जिस पर आर्यसमाज का गहरा असर था, में जन्मे भगत सिंह पर भी शुरुआती दौर में आर्यसमाज का असर था और बाद में वे तार्किकता के आधार पर नास्तिक हुए और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हुए. अपने मशहूर लेख `मैं नास्तिक क्यों हूं` में भगत सिंह लिखते हैं-
“मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी. मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं.” इसी लेख में वे कहते हैं, “अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था. यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था. ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो. अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो. मैंने पढ़ना शुरू कर दिया. इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए. रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली. न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास. यथार्थवाद हमारा आधार बना. मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला. मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता मार्क्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे. ये सभी नास्तिक थे. बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली. इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी. 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है. मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया. मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की. मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था.” आप इस लेख को थोड़ी सी भी गंभीरता के साथ पढ़ेंगे तो भगत सिंह, ईश्वर और धर्मों और धर्मों के पीछे के कुतर्कों व पाखंड़ों को आसानी से समझा सकोगे.

तो मोदी की तरह भगत सिंह की राजनीति हिंदू या किसी भी धर्म की रक्षा या किसी दूसरे धर्म से नफ़रत और इस आधार पर हिंसा की कभी नहीं रही. बल्कि मोदी और उनकी ब्रिगेड और उनके आक़ा संघ के लोग जा कर रहे हैं, उससे भगत सिंह की सीधी लड़ाई थी. 1928 में भगत सिंह ने एक लेख लिखा था साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज. इस लेख में भगत सिंह लिखते हैं-
“ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है. इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है. और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे. इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है. और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं. कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं. बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं. इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है.

यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है. इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली. वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं. सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं. और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.

दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं. पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था. आज बहुत ही गन्दा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो.
”


इसी लेख में भगत सिंह कहते हैं-
“यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है. धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें.” लेकिन मोदी और उनकी विचारधारा धर्म के नाम पर खूनी सियासत करके ही फलती-फूलती है.

मोदी 54-56 जाने कितने इंच के चौड़े सीने का दंभ भरते हैं. भगत सिंह विचारों की, साम्प्रदायिक एकता की, सामाजिक और आर्थिक बराबरी वाले समाज की, प्रगतिशील विचारों की बात करते हैं. उन्हें लगातार एक पिस्तौलधारी बांके युवक की छवि में सीमित करने की कोशिश की जाती रही पर वे ऐसी दंभी वीरता के बजाय `इंकलाब की तलवार को विचारों की सान पर तेज` करने की बात करते हैं. आरएसएस वर्ण व्यवस्था की हिमायत करता है और मंडल आंदोलन को बेअसर करने के लिए मंदिर आंदोलन खड़ा कर देता है. मोदी तो मैला उठाने के काम को आध्यात्मिकता और कर्तव्यपारायणता करार देते हैं. लेकिन भगत सिंह अपने लेख `अछूत समस्या` में लिखते हैं-
“सब इन्सान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से. अर्थात् क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं. इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे. साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है. अब क्या हो सकता है?चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए. लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया. मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया. आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया. बहुत दमन और अन्याय किया गया.”

भगत सिंह से सच्चा लगाव रखने वाला कोई भी शख्स अडानी-अंबानी और दूसरे देसी-विदेशी पूंजीपतियों को सार्वजनिक संसाधनों की लूट की छूट देने की नीति पर चल रहे नरेंद्र मोदी का सिपाही नहीं हो सकता. भगत सिंह तो साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष करते रहे. जिस आज़ादी के लिए वे लड़ रहे थे, वह आज़ादी कैसी होगी, इस बारे में उन्होंने और उनके साथियों ने साफ तौर पर अपना रुख सामने रखा था. अपने संIठन के नाम में इसीलिए उन्होंने सोशलिस्ट शब्द जोड़ा था- हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी. और उन्होंने कहा भी था कि गोरे अंग्रेजों के बजाय काले अंग्रेजों के हाथ में शासन आना आज़ादी नहीं होगी. लेनिन को पढ़ते हुए फांसी के फंदे की ओर चले भगत सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों की तस्वीरें एक साथ लगाना या तो अज्ञानता के चलते किया जाता है या बेशर्मी और धूर्तता के चलते. साथियो, आपको तय करना चाहिए कि आप सच में किसके साथ हैं मोदी के या भगत सिंह के.

(जिन उद्धरणों का यहां जिक्र किया है, उनसे संबंधित पूरे लेख भी आसानी से नेट पर तलाशकर पढ़े जा सकते हैं.)

Wednesday, November 6, 2013

मेरी ज़्यादातर प्रेरणाएँ और मशग़ले साहित्यिक जीवन से बाहर के हैं

कुछ दिनों पहले ‘प्रभात खबर’ अख़बार में छपा वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी का यह साक्षात्कार पढ़कर कलकत्ता में रहने वाले मेरे फिल्मकार दोस्त राजीव का फ़ोन आया था. वह इस साक्षात्कार से खासा प्रभावित था और असद जी को व्यक्तिगत रूप से बधाई देना चाहता था. जीवन के तमाम मसलों पर ख़ासा आलस्य बरतने के कोई एक हज़ार विश्व कीर्तिमान बना चुके राजीव की असद ज़ैदी का नम्बर प्राप्त करने की यह बेचैनी बता रही थी कि इंटरव्यू बढ़िया होगा. अपने परिचितों में अगर मुझे कुछ गिनती के लोगों के पढ़े से रश्क होता है तो राजीव उनमें काफ़ी आगे नज़र आता है. इस इंटरव्यू को पढने की सबसे बड़ी वजह तो मुझे सब से पहले यही लगी.   

भाई धीरेश सैनी ने इसे अपने ब्लॉग एक ज़िद्दी धुन पर पहले ही लगा रखा है. फ़ॉर द रेकॉर्ड इसे यहाँ लगाने में मुझे अच्छा लग रहा है. धन्यवाद धीरेश!


‘कविता’ आपके लिए क्या है?

कविता समाज में एक आदमी के बात करने का तरीक़ा है. पहले अपने आप से, फिर दोस्तों से, तब उनसे जिनके चेहरे आप नहीं जानते, जो अब या कुछ बरस बाद हो सकता है आपकी रचना पढ़ते हों. कविता समाज को मुख़ातिब करती बाहरी आवाज़ नहीं, समाज ही में पैदा होने वाली एक आवाज़ है. चाहे वह अंतरंग बातचीत हो, उत्सव का शोर हो या प्रतिरोध की चीख़. यह एक गंभीर नागरिक कर्म भी है. एक बात यह भी है कि कविता आदमी पर अपनी छाप छोड़ती है - जैसी कोई कविता लिखता है वैसा ही कवि वह बनता जाता है और किसी हद तक वैसा ही इन्सान.


लेखन की शुरुआत स्वत: स्फूर्त थी या कोई प्रेरणा थी?

खुद अपने जीवन को उलट पुलटकर देखते, और जो पढ़ने, सुनने और देखने को मिला है उसे संभालने से ही मैं लिखने की तरफ़ माइल हुआ. घर में तालीम की क़द्र तो थी पर नाविल पढ़ने, सिनेमा देखने, बीड़ी सिगरेट पीने, शेरो-शाइरी करने, गाना गाने या सुनने को बुरा समझा जाता था. यह लड़के के बिगड़ने या बुरी संगत में पड़ने की अलामतें थीं. लिहाज़ा अपना लिखा अपने तक ही रहने देता था. पर मिज़ाज में बग़ावत है, यह सब पर ज़ाहिर था.


आपने शुरुआत कहानी से की थी फिर कविता की ओर आये. कविता विधा ही क्यों?

शायद सुस्ती और कम लागत की वजह से. मुझे लगता रहता था असल लिखना तो कविता लिखना ही है. यह इस मानी में कि कविता लिखना भाषा सीखना है. कविता भाषा की क्षमता से रू-ब-रू कराती है, और उसे किफ़ायत से बरतना भी सिखाती है. कविता एक तरह का ज्ञान देती है, जो कथा-साहित्य या ललित गद्य से बाहर की चीज़ है. वह सहज ही दूसरी कलाओं को समझना और उनसे मिलना सिखा देती है. हर कवि के अंदर कई तरह के लोग - संगीतकार, गणितज्ञ, चित्रकार, फ़िल्मकार, कथाकार, मिनिएचरिस्ट, अभिलेखक, दार्शनिक, नुक्ताचीन श्रोता और एक ख़ामोश आदमी - हरदम मौजूद होते हैं.


अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएं.

मैं अक्सर एक मामूली से सवाल का जवाब देना चाहता हूँ. जैसे : कहो क्या हाल है? या, देखते हो? या, उधर की क्या ख़बर है? या, तुमने सुना वो क्या कहते हैं? या, तुम्हें फ़लाँ बात याद है? या, यह कैसा शोर है? जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, मेरे प्रस्थान बिंदु ऐसे ही होते हैं. कई दफ़े अवचेतन में बनती कोई तस्वीर या दृश्यावली अचानक दिखने लगती है जैसे कोई फ़िल्म निगेटिव अचानक धुलकर छापे जाना माँगता हो. मिर्ज़ा ने बड़ी अच्छी बात कही है - 'हैं ख़्वाब में हनोज़ जो जागे हैं ख़्वाब में.'

दरअसल रचना प्रक्रिया पर ज़्यादा ध्यान देने से वह रचना प्रक्रिया नहीं रह जाती, कोई और चीज़ हो जाती है. यह तो बाद में जानने या फ़िक्र में लाने की चीज़ है. यह काम भी रचनाकार नहीं, कोई दूसरा आदमी करता है - चाहे वह उसी के भीतर ही बैठा हो - जो रचना में कोई मदद नहीं करता.

मुक्तिबोध से बेहतर चिंतन इस मामले में किसी ने नहीं किया, वह इन मामलात की गहराई में गए थे. 'कला का तीसरा क्षण' निबंध और 'बाह्य के आभ्यंत्रीकरण' और 'अभ्यन्तर के बाह्यकरण' का चक्रीय सिद्धान्त जानने और समझने की चीज़ें हैं. लेकिन मुझे यक़ीन है कवि के रूप में मुक्तिबोध 'तीसरे क्षण' के इन्तिज़ार में नहीं बैठे रहते थे.


अपनी रचनाशीलता का अपने परिवेश, समाज और परिवार से किस तरह का संबंध पाते हैं?

संबंध इस तरह का है कि 'दस्ते तहे संग आमदः पैमाने वफ़ा है' (ग़ालिब). मैं इन्ही चीज़ों के नीचे दबा हुआ हूँ, इनसे स्वतंत्र नहीं हूँ. लेकिन मेरे लेखन से ये स्वतंत्र हैं, यह बड़ी राहत की बात है.


क्या साहित्य लेखन के लिए किसी विचारधारा का होना जरूरी है?

पानी में गीलापन होना उचित माना जाए या नहीं, वह उसमें होता है. समाज-रचना में कला वैचारिक उपकरण ही है - आदिम गुफाचित्रों के समय से ही. विचारधारा ही ज़बान और बयान को तय करती है, चाहे आप इसको लेकर जागरूक हों या नहीं. बाज़ार से लाकर रचना पर कोई चीज़ थोपना तो ठीक नहीं है, पर नैसर्गिक या रचनात्मक आत्मसंघर्ष से अर्जित वैचारिक मूल्यों को छिपाना या तथाकथित कलावादियों की तरह उलीचकर या बीनकर निकालना बुरी बात है. यह उसकी मनुष्यता का हरण है. और एक झूटी गवाही देने की तरह है.


आप अपनी कविताओं में बहुत सहजता से देश और दुनिया की राजनीतिक विसंगतियों को आम आदमी की जिंदगी से जोड़ कर एक संवाद पेश करते हैं. क्या आपको लगता है कि मौजूदा समय-समाज में कवि की आवाज सुनी जा रही है?

मौजूदा वक़्त ख़राब है, और शायद इससे भी ख़राब वक़्त आने वाला है. यह कविता के लिए अच्छी बात है. कविकर्म की चुनौती और ज़िम्मेदारी, और कविता का अंतःकरण इसी से बनता है. अच्छे वक़्तों में अच्छी कविता शायद ही लिखी गई हो. जो लिखी भी गई है वह बुरे वक़्त की स्मृति या आशंका से कभी दूर न रही. जहाँ तक कवि की आवाज़ के सुने जाने या प्रभावी होने की बात है, मुझे पहली चिन्ता यह लगी रहती है कि दुनिया के हंगामे और कारोबार के बीच क्या हमारा कवि ख़ुद अपनी आवाज़ सुन पा रहा है? या उसी में एबज़ॉर्ब हो गया है, सोख लिया गया है? अगर वह अपने स्वर, अपनी सच्ची अस्मिता, अपनी नागरिक जागरूकता को बचाए रख सके तो बाक़ी लोगों के लिए भी प्रासंगिक होगा.


आपके एक समकालीन कवि ने लिखा है (अपनी उनकी बात: उदय प्रकाश) आपके साथ ‘हिंदी की आलोचना ने न्याय नहीं किया.’ क्या आपको भी ऐसा लगता है? इसके पीछे क्या वजहें हो सकती हैं?

मैं अपना ही आकलन कैसे करूँ! या क्या कहूँ? ऐसी कोई ख़ास उपेक्षा भी मुझे महसूस नहीं हुई. मेरी पिछली किताब मेरे ख़याल में ग़ौर से पढ़ी गई और चर्चा में भी रही. कुछ इधर का लेखन भी. इस बहाने कुछ अपना और कुछ जगत का हाल भी पता चला.


लेखन से जुड़े पुरस्कारों को कितना अहम मानते हैं एक लेखक के लिए?

मुझे अपने मित्र पंकज चतुर्वेदी की कविता 'कृतज्ञ और नतमस्तक' की याद आ रही है. यह कालजयी रचना बहुत थोड़े शब्दों में वह सब कह देती है जो इस मसले पर कहा जा सकता है.


कृतज्ञ और नतमस्तक

-      पंकज चतुर्वेदी

सत्ता का यह स्वभाव नहीं है
कि वह योग्यता को ही
पुरस्कृत करे
बल्कि यह है
कि जिन्हें वह पुरस्कृत करती है
उन्हें योग्य कहती है

अब जो पुरस्कृत होना चाहें
वे चाहे ख़ुद को
और पूर्व पुरस्कृतों को
उसके योग्य न मानें
मगर यह मानें
कि योग्यता का निश्चय
सत्ता ही कर सकती है

अंत में योग्य
सिर्फ सत्ता रह जाती है
और जो उससे पुरस्कृत हैं
वे अपनी-अपनी योग्यता पर
संदेह करते हुए
सत्ता के प्रति
कृतज्ञ और नतमस्तक होते हैं
कि उसने उन्हें योग्य माना


आप अपनी सबसे प्रिय रचना के तौर पर किसका जिक्र करना चाहेंगे?

इस बारे में राय बदलता रहता हूँ, किसी समय कोई कविता ठीक लगती है किसी और समय दूसरी. मेरे दोस्तों से पूछिए तो कहेंगे मेरी ज़्यादातर रचनाएँ अप्रिय रचनाएँ हैं. यह भी ठीक बात है. उन लोगों को जो पसन्द हैं - या सख़्त नापसंद हैं - वे कविताएँ हैं : बहनें, संस्कार, आयशा के लिए कुछ कविताएँ, पुश्तैनी तोप, दिल्ली दर्शन, कविता का जीवन, अप्रकाशित कविता, सामान की तलाश, आदि.


इन दिनों क्या नया लिख रहे हैं? और लेखन से इतर क्या, क्या करना पसंद है?

कुछ ख़ास नहीं. वही जो हमेशा से करता रहा हूँ. मेरी ज़्यादातर प्रेरणाएँ और मशग़ले साहित्यिक जीवन से बाहर के हैं, लेकिन मेरा दिल साहित्य में भी लगा रहता है. समाजविज्ञानों से सम्बद्ध विषयों पर "थ्री एसेज़" प्रकाशनगृह से किताबें छापने का काम करता हूँ. और अपना लिखना पढ़ना भी करता ही रहता हूँ. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, ख़ासकर ख़याल गायकी, सुनते हुए और विश्व सिनेमा देखते हुए एक उम्र गुज़ार दी है.


ऐसी साहित्यिक कृतियां जो पढ़ने के बाद ज़ेहन में दर्ज हो गयी हों? क्या खास था उनमें?

चलते चलते ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते. मैं पुराना पाठक हूँ. जवाब देने बैठूँ तो बक़ौल शाइर - 'वो बदख़ू और मेरी दास्ताने-इश्क़ तूलानी / इबारत मुख़्तसर, क़ासिद भी घबरा जाए है मुझसे.' कुछ आयतें जो बचपन में रटी थीं और अन्तोन चेख़व की कहानी 'वान्का' जो मैंने किशोर उम्र में ही पढ़ ली थीं ज़ेहन में नक़्श हो गईं हैं. इसके बाद की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.


Tuesday, December 11, 2012

भर्तृहरि की कवितायेँ – १०



वैराग्यशतक का यह पद सं. १०६ धीरेश सैनी की फेसबुक दीवार पर जनाब-ऐ-अव्वल असद जैदी के हवाले से पोस्ट किया गया था. पोस्ट पर आई एक टिप्पणी में कैफ़ी आजमी साहब की “वक्त ने किया क्या हसीं सितम ...” को उद्धृत किया गया. असद जी ने भर्तृहरि और कैफ़ी साहब के दरम्यान किसी हॉटलाइन के मौजूद होने का ज़िक्र किया और हिन्दी तर्जुमा भी उपलब्ध कराया - 

यूयं वयं वयं यूयमित्यासीन्मतिरावयोः ।
किं जात मधुना मित्र येन यूयं यूयं वयं वयम् ।।


तुम हम थे और हम तुम थे – 
यह हमारी और तुम्हारी बुद्धि थी। 
आज क्या हो गया कि हे मित्र! 
तुम तुम हो और हम हम हैं।

Thursday, April 12, 2012

हिन्दी कविता का जेस्चर और मेटाफर युग

धीरेश सैनी के ब्लॉग एक जिद्दी धुन की ताज़ातरीन पोस्ट में नरेंद्र जैन की कवितायेँ और उन पर जनाब असद ज़ैदी की टिप्पणी प्रकाशित हुई है. उसी से एक बेहद ज़रूरी अंश लगा रहा हूँ -


आज कविता एक भयावह सरलीकरण के दौर से गुज़र रही है और यह सरलीकरण मोटी समझ या ठसपन वाला सरलीकरण नहीं, एक नैतिक और राजनीतिक सरलीकरण है. चूंकि घुटन, पीड़ा, दुःख और क्रोध से, अन्याय और विषमता के प्रतिकार से, अंतर्विरोध की मार से बचकर कविता नहीं लिखी जा सकती, और लिखी जाए तो समकालीन कविता नहीं हो सकती, इसलिए यथास्थितिवादी रचनाकारों ने वास्तविक चुनौतियों और अंतर्विरोधों की जगह काल्पनिक चुनौतियों और अंतर्विरोधों की भूलभुलैयाँ रचनी शुरू की है. बिना विद्रोह किए, बिना उस विद्रोह की क़ीमत चुकाने को तैयार हुए ये लोग विद्रोह और प्रतिरोध का एक रुग्ण रोमांटिक औरउत्तर-आधुनिकतावादी संसार कलाओं में रच रहे हैं. अब मुठभेड़ और प्रतिरोध की जगह 'जेस्चर'और 'मेटाफर' ने ले ली है. देखते देखते आज ऐसे कवि काफ़ी तादाद में इकट्ठे हो गए हैं जो इस तरीक़े को ही असल 'तरीक़ा' और सच्चा 'सिलसिला' मानते हैं.