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Sunday, November 3, 2013

केवल धरती, सूर्य, और मैं ...


आज इतवार है

-नाज़िम हिकमत

आज इतवार.
आज वे मुझे पहली दफ़ा धूप में ले कर आये.
और मैं बस खड़ा रहा वहां, जीवन में पहली बार इस बात पर भौंचक्का
कि कितनी दूर है आसमान,
कितना नीला
और कितना विस्तृत.
तब मैं इज्ज़त देता हुआ बैठा ज़मीन पर.
पीठ लगाई दीवार पर.
एक क्षण के लिए फंस जाने को कोई फंदा नहीं,
न संघर्ष, न स्वतंत्रता, न बीवी.
केवल धरती, सूर्य, और मैं ...
ख़ुश हूँ मैं.


(जेल में लिखी एक कविता)

Friday, November 1, 2013

पड़ोसियो, मैं तुम सब के लिए दीर्घायु की कामना करता हूँ

अलैक्ज़ेन्द्रिया में रहने वाली जर्मन मूल की मेरी मित्र ईफ़ा फ़ॉन नील ने मुझे एक सुदूर मिश्री क़स्बे सलाह-अल-दीन में अपने भ्रमण की कुछ तस्वीरें भेजीं. उनमें से एक तस्वीर देखकर मुझे बेसाख्ता नाज़िम हिकमत की कविता ‘मेरा जनाज़ा’ की याद हो आई. पेश है उस कविता का कबाड़शिरोमणि वीरेन डंगवाल द्वारा किया गया अनुवाद .ईफ़ा फ़ॉन नील का आभार –


मेरा जनाज़ा

-नाज़िम हिकमत

(अनुवाद – वीरेन डंगवाल)

मेरा जनाज़ा क्या हमारे आँगन से उठेगा?
तीसरी मंजिल से कैसे उतारोगे मुझे?
ताबूत अंटेगा नहीं लिफ्ट में
और सीढियां निहायत संकरी हैं.

शायद अहाते में घुटनों भर धूप होगी और कबूतर
शायद बर्फ़ बच्चों के कलरव से भरी हुई,
शायद बारिश अपने भीगे तारकोल के साथ.
और कूड़ेदान डटे ही होंगे आँगन में हमेशा की तरह.

अगर, जैसा कि यहाँ का दस्तूर है,मुझे रखा गया ट्रक में खुले चेहरे
हो सकता है कोई कबूतर बीट कर दे मेरे माथे पर: यह शुभ संकेत है.
बैंड हो या न हो, बच्चे तो आयेंगे मेरे क़रीब
उनमें उत्सुकता होती है मृतकों के बारे में.

हमारी रसोई की खिड़की मुझे जाता हुआ देखेगी.
हमारी बालकनी मुझे विदा देगी तार पर सूखे कपड़ों से.
इस अहाते में मैं उस से ज़्यादा ख़ुश था जितना तुम कभी समझ पाओगे.
पड़ोसियो, मैं तुम सब के लिए दीर्घायु की कामना करता हूँ.


(अप्रैल १९६३, मॉस्को) 


Monday, July 8, 2013

उस साल कपास की मानिंद सफ़ेद थी डबलरोटी - नाज़िम हिकमत


जब से क़ैद किया गया है मुझे

-नाज़िम हिकमत

जब से क़ैद किया गया है मुझे
दस फेरे लगा चुकी धरती सूरज के गिर्द
और अगर आप धरती से पूछेंगे तो वो कहेगी:
“वक़्त के इतने ज़रा से टुकड़े का
क्या ज़िक्र.”
और अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूँगा:
“दस साल मेरी ज़िन्दगी के.”
जिस साल मैं क़ैदख़ाने में आया था
मेरे पास एक पेन्सिल थी.
वह घिस गयी हफ़्ते भर में.
और अगर आप पेन्सिल से पूछेंगे तो वो कहेगी:
“एक पूरी ज़िन्दगी.”
और मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा:
“फ़क़त एक हफ़्ता बस.”
जब से क़ैदख़ाने में हूँ मैं
हत्या के लिए क़ैद किया गया उस्मान
सात-सालों की सज़ा बिताकर जा चुका था.
बाहर कुछ समय आवारागर्दी की उसने
और स्मगलिंग के अपराध में फिर क़ैद हुआ.
उसने छः महीने की सज़ा काटी और फिर छूट गया,
और कल एक चिठ्ठी आई है जो कहती है कि उसकी शादी हो चुकी
और वसंत में आनेवाला है एक शिशु.
जो बच्चे उस साल बाहर आए थे अपनी माँओं के गर्भ से
जिस साल आया था मैं क़ैदख़ाने में
अब दस साल के हो चुके होंगे,
और उस साल की लम्बी पतली डगमगाती टांगों वाली वे बछेड़ियाँ
काफ़ी पहले बदल चुकी होंगी चौड़े पुठ्ठों वाली दब्बू घोड़ियों में.
मगर जैतून के अंकुवे अब भी अंकुवे हैं
और बच्चे हैं अब भी.
नए चौक खुल गए हैं मेरे सुदूर शहर में
क़ैदख़ाने में मेरे आने के बाद से.
और एक ऐसी गली के एक ऐसे घर में  
रह रहा है मेरा परिवार
जिसे मैंने देखा तक नहीं.
उस साल कपास की मानिंद सफ़ेद थी डबलरोटी
जब क़ैदख़ाने में आया था मैं.
बाद में उस पर राशन लगा दिया गया,
और यहाँ भीतर
हम मारपीट किया करते हैं आपस में
मुठ्ठी की नाप के डबलरोटी की एक काली पपड़ी के लिए.
अब उसे दोबारा राशन से मुक्त कर दिया गया है
लेकिन वह भूरी और बेस्वाद है.
जिस साल क़ैदख़ाने में आया था मैं
शुरू ही हुआ था दूसरा विश्वयुद्ध  
दाखाऊ के शिविरों में तब तक नहीं दहके थे तंदूर
एटम बम नहीं गिराया गया था हिरोशिमा पर
गला काट डाले गए किसी बच्चे के रक्त की तरह बहता रहा समय.
बाद में आधिकारिक तौर पर बंद कर कर दिया गया वह अध्याय.
फ़िलहाल अमरीकी डॉलर तीसरे युद्ध की बात करने लगा है.
लेकिन इस सारे के बावजूद, जब से क़ैदख़ाने में आया हूँ मैं
दिन हो गए हैं ज़्यादा उजले,
और अँधेरे की सरहद से, वे उठ चुके हैं आधे,
फुटपाथों पर ख़ुद को उठाते हुए.
दस फेरे लगा चुकी धरती सूरज के गिर्द
जब से क़ैद किया गया है मुझे
और मैं उसी जज्बे से दोहराता हूँ अपने शब्द,
“वे उतने हैं तादाद में
जितनी चींटियाँ होती हैं मिट्टी में,
और समुद्र में मछलियाँ
आकाश में चिडियां जितनी होती हैं.
वे हैं डरे हुए, बहादुर,
अनभिज्ञ और बच्चे,
वे हैं जो नष्ट होते हैं और रचते हैं,
जिनके कारनामे है गीतों के भीतर.”
और इसके अलावा कुछ नहीं होता
बाक़ी सारा
क़ैद में कटे मेरे दस बरस मिसाल के तौर पर ...