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Tuesday, November 14, 2017

इण्डिया में डर का कारोबार कितने हज़ार करोड़ का?

पावेल हुलका की कृति 'आल्टश्टाट'

इण्डिया में डर का कारोबार कितने हज़ार करोड़ का?

- गीता यादव और दिलीप मंडल
(बीबीसी हिंदी से साभार)

देश के महानगर के स्कूलों में एक चलन शुरू हुआ है. बिल्कुल नया नहीं है. देर-सबेर यह लहर राज्यों की राजधानियों और बाक़ी शहरों और कस्बों तक भी पहुंचेगी.

इन स्कूलों में क्लासरूम में सीसीटीवी कैमरे लग गए हैं. ये कैमरे स्कूल में सेंट्रल सर्वर्स से जुड़े हैं और यहां की लाइव फ़ीड माता-पिता के मोबाइल फ़ोन पर जा रही है.

माता-पिता न सिर्फ़ बच्चों को लगातार देख सकते हैं, बल्कि वे उनकी बातचीत भी सुन सकते हैं. ये सीसीटीवी कैमरे स्कूल के चप्पे-चप्पे पर लगे हैं.

स्कूल बसों में सीसीटीवी कैमरे लग चुके हैं और बसों में सिक्युरिटी गार्ड तैनात हो गए हैं. आख़िरी बच्चा उतारने तक कोई न कोई टीचर भी बसों में रहने लगी हैं.

वे दिन गए जब माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजकर निश्चिंत हो जाते थे. अब उन्हें किसी पर भरोसा नहीं है. पता नहीं शैतान किस शक्ल में सामने आ जाए.

वह कोई भी तो हो सकता है. टीचर, ड्राइवर, कंडक्टर, सीनियर छात्र, माली, कैंटीन वाला, सिक्युरिटी गार्ड, प्रिंसिपल.
गुड़गांव या गुरुग्राम के एक पब्लिक स्कूल में मासूम प्रद्युम्न ठाकुर की निर्मम हत्या के बाद यह चलन और तेज होगा. माता-पिताओं का शक और गहरा होगा.

भारत में व्यक्तिगत सुरक्षा का परिदृश्य देखते ही देखते पूरी तरह बदल गया है. वे दिन गए जब जंगल और पहाड़ों से डकैत आते थे और लूटकर चले जाते थे.

अब अपराधी घोड़े पर चढ़कर नहीं आते. वे अक्सर हमारे बीच होते हैं और कई बार तो अपने ही लोग या रिश्तेदार होते हैं.
लोगों को अब भय अपने आसपास नजर आने लगा है. वे लगभग हर किसी से डरे हुए हैं. वे घर में डरे हुए हैं कि नौकर अपने बूढ़े माता-पिता को लूटकर न चला जाए.

वे फेरी वाले से डरे हुए हैं. स्कूल में उन्हें डर है कि कोई सीनियर या स्कूल का स्टाफ़ या टीचर उनके बच्चे के साथ कुछ कर न दे.

ड्राइवर उन्हें ख़तरनाक लगता है. मोहल्ले का माली उन्हें संभावित हत्यारा लग सकता है. पेंटर, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, लिफ्टमैन, यहां तक कि प्राइवेट सिक्युरिटी गार्ड, सभी संभावित अपराधी हैं, जिनसे लोग डरते हैं.

यहां तक कि वे परिवार के सदस्यों से डरे हुए हैं कि उनमें से कोई उनकी बच्ची का बलात्कार न कर दे. ये रिश्तेदार कोई भी हो सकता है. मामा, मौसा, भाई, पिता. कोई भी.

यह हर किसी से बचकर रहने का समय है.

फ़िल्मों को अगर समाज का आईना मानें तो पाएंगे कि सुरक्षा परिदृश्य में आया यह बदलाव वहां भी दिख रहा है.

डकैतों पर बनी आखिरी फ़िल्म को आए अरसा बीत चुका है. चाइनागेट शायद वह आखिरी हिट फ़िल्म थी, जिसमें विलेन शहर के बाहर बियावान में रहता है.

अब अपराधी समाज के अंदर हैं. परिवार के अंदर हैं. अपने अपार्टमेंट में रहता है. पड़ोसी है.

हो सकता है कि वह हर दिन आपको देखकर गुड मॉर्निंग भी बोलता हो और स्माइल भी करता हो. वह पढ़ा लिखा और प्रोफेशनल हो सकता है.

दरअसल वह कोई भी हो सकता है.

इस आसपास के भय ने सुरक्षा के मायने भी बदल दिए हैं. अब जोर इस बात पर नहीं है कि शहर या कस्बे या गांव को सुरक्षित बनाया जाए.

अब सुरक्षा की दीवार घर के पास और घर के अंदर आ गई है.

महानगरों में हर पॉश कॉलोनी की कांटेदार तार से बाड़बंदी हो चुकी है और गेट पर गार्ड तैनात हो चुके हैं. वे हर आने जाने वाली गाड़ी और आदमी का लेखाजोखा रखते हैं.

अपार्टमेंट गेट से आने वाले हर आदमी की सूचना संबंधित फ्लैट को दी जाती है और अनुमति मिलने पर ही गार्ड किसी को अपार्टमेंट में घुसने दे रहा है.

कोठियों और फ्लैट के गेट पर सिक्युरिटी सिस्टम लग गए हैं और बाहर वाले का चेहरा देखकर और उसकी बात सुनकर ही किसी को अंदर आने दिया जा रहा है.

हर संभावित जगह पर सीसीटीवी की निगरानी होती है और रिकॉर्डिंग रखी जा रही है. कई जगहों पर बायोमैट्रिक एक्सेस यानी अंगूठे या आंख की पुतली की पहचान करके अंदर आने की इजाजत दी जा रही है.

ज़ाहिर है कि ये सारा बंदोबस्त किसी गब्बर सिंह या सुल्ताना डाकू या जगीरा डकैत को रोकने के लिए नहीं है. ये सारा इंतजाम उन लोगों से सुरक्षित होने के लिए है, जो हमारे बीच के लोग हैं, हमारे काम के लोग हैं और अपने लोग हैं.

भारत में सुरक्षा का निजी कारोबार पर 2014 में कराए गए गैंट थॉमसन-फ़िक्की रिपोर्ट के मुताबिक यह बिज़नेस 40,000 करोड़ रुपये का था. सालाना बढ़ोतरी की रफ़्तार के हिसाब से इस समय यह बिज़नेस 50,000 करोड़ को पार कर चुका है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस बिज़नेस के बढ़ने की मौजूदा दर कायम रही तो 2020 तक सिक्युरिटी का कारोबार 80,000 करोड़ रुपये का हो जाएगा और इसमें 50 से 70 लाख लोगों को सीधे रोजगार मिलेगा. इसे देश में रोजगार देने वाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र बताया गया है.

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में भारत में सुरक्षा उपकरणों का कारोबार 8,000 करोड़ रुपये का था, जिसके 2020 तक बढ़कर 18,000 करोड़ रुपये सालाना हो जाने की उम्मीद है.

यह बिज़नेस हर चार साल में दोगुना हो जाता है. इसे देश के सबसे तेज़ बढ़ते कारोबारों में से एक माना गया है. खासकर बायोमैट्रिक सिक्युरिटी इक्विपमेंट का बाज़ार सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है.

सवाल उठता है कि भारत के लोग इतना डर क्यों रहे हैं और किनसे डर रहे हैं? क्या उन्हें पुलिस और सुरक्षा की उन व्यवस्थाओं पर भरोसा नहीं है, जिसे राज्य यानी सरकार उपलब्ध करा रही है?

ज़ाहिर है कि लोगों का इस मायने में सरकार पर भरोसा नहीं है. दरअसल उन्होंने मान लिया है कि सुरक्षा की कुछ ज़रूरतें ऐसी हैं, जिसके लिए सरकार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता.

अपार्टमेंट की गेट पर सोसाइटी का अपना गार्ड तैनात करना या अपनी कोठी के बाहर अपना गार्ड खड़ा करना इसी सोच के तहत है. इसके अलावा शायद यह भी माना जा रहा है कि पुलिस बेशक अपराध अनुसंधान करेगी, लेकिन अपराध होने से रोकने का दायित्व सिर्फ़ पुलिस पर नहीं छोड़ा जा सकता है.

अपराध की प्रकृति में आया बदलाव इसकी सबसे बड़ी वजह है. मिसाल के तौर पर महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले यौन अपराधों को देखें, तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि लगभग सभी मामलों में अपराधी या तो रिश्तेदार होगा या कोई जान-पहचान वाला.

नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो ने 2015 तक के अपराध के आंकड़े संकलित कर लिए हैं.

2015 के आंकडों के मुताबिक बलात्कार के 95% मामलों में अपराधी परिचित होता है. 27% यानी हर चौथा बलात्कारी पड़ोसी होता है. 22% बलात्कार शादी का वादा करके किए जाते हैं. हर दसवां बलात्कारी कोई रिश्तेदार होता है.

2% बलात्कार लिव इन पार्टनर या पूर्व पति करते हैं. लगभग 2% बलात्कार साथी कर्मचारी करते हैं. बाकी 30% से ज़्यादा बलात्कार भी कोई परिचित ही करता है. ज़ाहिर है कि बलात्कार जैसे अपराधों से बचने के लिए आपको अपने आसपास के लोगों से सावधान रहने की ज़रूरत ज़्यादा है.

वक्त बदलने के साथ कुछ और चीज़ें बदली हैं, जिसकी वजह से अपराध की मुख्य साइट यानी लोकेशन घर और ऑफ़िस बन गए हैं.

एटीएम, डेबिट और क्रेडिट कार्ड की वजह से लोग कैश लेकर कम चलते हैं. ज़ाहिर है कि अपराध करने वालों के लिए किसी को लूट लेना अब उतना फ़ायदेमंद नहीं होता होगा. इसके अलावा इमिटेशन जूलरी ने भी लूट और स्नैचिंग को कम लाभप्रद बना दिया है.

सार्वजनिक स्थानों पर लाइटिंग की पहले से बेहतर व्यवस्था और ट्रैवल के साधनों के अपेक्षाकृत सुरक्षित होने की वजह से भी अपराध के पैटर्न बदले हैं.

एक और चीज़ जो बदली है, वह है कि इलीट लोगों की जीवन पद्धति के बारे में वंचित लोगों को अब पहले से ज्यादा जानकारी है. ख़ासकर टीवी सीरियल और सोशल मीडिया की वजह से इलीट लोगों के कई राज, अब सार्वजनिक हैं. उनकी ठाठ, जो अब तक आम लोगों की नजरों से ओझल थी, वह खुल चुकी है.

यह बात समाज में बड़े पैमाने पर असंतोष पैदा कर रही है. इलीट लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा अब यहां से आ रहा है. इससे बचने के लिए वे अपनी अलग सुरक्षित दुनिया सजा रहे हैं, जिसे प्रोफेसर रणधीर सिंह 'ससेशन ऑफ़ द सक्सेसफुल' यानी 'कामयाब लोगों का अलगाववाद' कहते हैं.

भारत में चूंकि क्रांति की कोई परंपरा नहीं है, इसलिए मुमकिन है कि इस तरह उपजा असंतोष अपराध की शक्ल में बाहर आ रहा है.

इनसे बचना जरूरी है. भारत में निजी सुरक्षा के फलते-फूलते बाज़ार के पीछे एक वजह यह भी है.


(दिलीप मंडल समाजशास्त्र के शोधार्थी हैं और श्रेष्ठ कबाड़ी जमात से पुराने मेंबर हैं. गीता यादव भारतीय सूचना सेवा की अधिकारी हैं.  )

Tuesday, January 6, 2015

कैसी-कैसी क्रिकेट कमेंट्री - 1

रेवरेंड फ़्रैंक हे गिलिंगहैम
आज भाई संजय पटेल ने फेसबुक पर क्रिकेट कमेंट्री के कुछ उस्तादों को याद किया और कमेंट्री के गिरते स्तर पर भी एक मौजूं कमेन्ट किया. मुझे लगा क्यों न इस विषय पर कबाड़खाने में बाकायदा एक सीरीज चलाई जाए.

बीबीसी को इस क्षेत्र में पायनियर का दर्ज़ा इस लिहाज़ से हासिल है कि 14 मई 1927 को चर्च में भाषण दे रहे एक पादरी महोदय से रेडियो पर लाइव क्रिकेट कमेंट्री करने का निवेदन किया गया.

इंग्लैण्ड के लेटन में मेहमान न्यूजीलैंड और मेज़बान एसेक्स काउंटी के बीच मैच चल रहा था. जॉनी डगलस एसेक्स की कप्तानी कर रहे थे. पहले दिन मेजबानों ने जैक ओ’कोनर की धीमी स्पिन की मदद से मेहमानों को २८९ पर ऑल आउट किया और स्टम्प्स तक दो विकेटों के नुकसान पर ५९ रन बना लिए थे. इस दिन का आकर्षण था एक पूर्व काउंटी क्रिकेटर फ़्रैंक गिलिंगहैम का माइक पर बोलना – वे पैविलियन की बालकनी में सचिव के दफ्तर के पास बैठे भीड़ की आवाज़ भी रेकॉर्ड कर रहे थे. बीबीसी पर यह पहली क्रिकेट कमेंट्री थी. चार किस्तों में गिलिंगहैम कोई आधा घंटा माइक्रोफोन पर कमेंट्री करने में सफल रहे.  

एसेक्स के इस पूर्व बल्लेबाज़ को इस काम के लिए इस लिए नहीं चुना गया कि वे ठीकठाक क्रिकेटर रहे थे. वे एक पादरी भी थे और उनके भाषण सुनने को जनता भीड़ की सूरत में उमड़ा करती थी. विज़डन के मुताबिक़: “वे डिनर के बाद होने वाली पार्टियों में एक लोकप्रिय वक्ता थे जिनका सेन्स ऑफ़ ह्यूमर शानदार था; और किस्सों की वे खान थे सो अलग. भावहीन चेहरा लेकर वे ऐसी बातपोशी किया करते कि सुननेवाले लोटपोट हो जाया करते.”     

जब लाइव कमेंट्री की योजना से सम्बंधित सूचना पहली बार रेडियो पर प्रसारित हुई तो उसका बहुत ज़्यादा स्वागत नहीं हुआ. यह अलग बात है कि “टेस्ट मैच स्पेशल” बहुत जल्दी इंग्लैण्ड में एक क्रेज़ बन जाने वाला था.

१ अप्रैल को ‘गार्डियन’ ने सूचना दी कि बीबीसी ने क्रिकेट को रेडियो स्पोर्ट्स की सूची में रखने का निर्णय लिया है. इस रपट में बीबीसी की हंसी उड़ाई गयी थी और ‘डेली हैरल्ड’ ने यहाँ तक कहा कि जल्द ही बीबीसी शतरंज और बिलियर्ड्स की कमेंट्री करना शुरू न कर दे.

२५ अप्रैल को खुलासा किया गया कि रेवरेंड फ़्रैंक गिलिंगहैम लेटन से पहली लाइव क्रिकेट कमेंट्री करेंगे. सबसे पहले यह दोपहर २:१० बजे से २:२० बजे तक और उसके बाद हर घंटे के अंतराल पर पांच मिनट को होनी तय की गयी जिसके समापन के तौर पर ६:४५ पर दिन के खेल का संक्षिप्त ब्यौरा पेश किया जाने वाला था. इस के बीच श्रोताओं के मनोरंजन के लिए लंदन रेडियो डांस बैंड अपनी प्रस्तुतियां देने वाला था.

‘डेली टेलीग्राफ’ ने इस सीमित समय की कमेंट्री को जायज़ ठहराते हुए दलील दी कि यह सोच पाना भी मुश्किल है कि श्रोताओं के लिए इससे अधिक समय तक क्रिकेट जैसे बोझिल खेल को दिलचस्प कैसे बनाया जा सकता है. कुछ दिनों बाद ‘गार्डियन’ में रपट छपी कि जब भी खेल दिलचस्प हो रहा होगा, बैंड की प्रस्तुति को विराम देकर लाइव कमेंट्री प्रसारित किये जाने की बात चल रही है. ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक भी थी. उन दिनों रेडियो को प्रेस अपने सबसे बड़े शत्रु के रूप में देखती थी और लम्बे समय तक अखबारों ने रेडियो प्रोग्रामों का शेड्यूल छापने से गुरेज़ ही किया.

लाइव कमेंट्री को लेकर बीबीसी में भी कोई ख़ास उत्साह नहीं था. उनके अपने प्रकाशन ‘रेडियो टाइम्स’ में इस बात को स्वीकार किया गया कि यह नया प्रयोग एक एडवेंचर है क्योंकि उसे पता है कि क्रिकेट दुनिया के सबसे धीमे खेलों में एक होने के कारण श्रोताओं को लम्बे साय तक बांधे रख सकने के लिहाज़ से कतई अनुपयुक्त है. “उन्हें मेडेन ओवरों के वर्णन सुनने पड़ेंगे या उस वक्त इंतज़ार करना होगा जब बल्लेबाज़ पैविलियन से अपनी टोपी मंगा रहा होगा.

यह अलग बात है कि ऑस्ट्रेलिया में रेडियो पर क्रिकेट मैचों के बारे में कार्यक्रम खासे लोकप्रिय हो रहे थे जिनमें क्लेम हिल जैसे पूर्व दिग्गज क्रिकेटर मैच के संक्षिप्त वर्णन पेश किया करते थे. १९२४-२५ के सिडनी टेस्ट के दौरान भी ऐसा किया जा चुका था.

उसके अलावा बीबीसी के स्वप्नदृष्टा प्रोड्यूसर लांस सीवकिंग उन्हीं दिनों अमेरिका में प्रसारित होना शुरू हुई लाइव बेसबॉल कमेंट्री से खासे मुतास्सिर थे. इस लिहाज़ से बेसबॉल ने क्रिकेट को उन्नीस साबित कर दिया था जब ५ अगस्त १९२१ को पिट्सबर्ग पाइरेट्स और फिलाडेल्फिया फिलीज़ के बीच हुए मैच का लाइव ब्रॉडकास्ट हुआ था.

सो बीबीसी ने अपना एडवेंचर किया. इस बात की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि पादरी गिलिंगहैम ने अपनी वक्तृता का कैसा इस्तेमाल किया होगा क्योंकि उसके दस्तावेज़ अब नष्ट हो चुके हैं. अखबारों की रपटें अलबत्ता बहुत उत्साह बढाने वाली नहीं थीं. ‘द वेस्टर्न डेली प्रेस’ ने इसे “भीषण उबाऊ” करार दिया अलबत्ता ‘द एडिनबर्ग ईंविंग’ के मुताबिक़ यह प्रयोग आंशिक रूप से सफल रहा था.

बीबीसी के लिए इतना प्रोत्साहन पर्याप्त था और जल्द ही काउंटी मैच, ईटन-हैरो के मैच और जेंटलमैन एनकाउंटर्स को लॉर्ड्स और ओवल से ब्रॉडकास्ट किया जाने लगा और क्रिकेटप्रेमियों के बीच पेल्हाम वार्नर एक जानी पहचानी आवाज़ बनने लगे थे. स्थानीय स्टेशनों ने भी ऐसा करना शुरू किया – बेलफ़ास्ट और कार्डिफ के स्टेशन इसमें पायनियर रहे. हालांकि अखबार क्रिकेट कमेंट्री पर हमला बोलते रहे पर श्रोताओं के बीच वह लोकप्रिय होने लगी थी.

१९३० में डॉन ब्रैडमैन की पहली एशेज़ सीरीज का लाइव ब्रॉडकास्ट हुआ और ऑस्ट्रेलिया में मैच की कवरेज के लिए तार-सेवा का इस्तेमाल किया गया.

अफ़सोस की बात यह रही कि रेवरेंड गिलिंगहैम को कमेंट्री बॉक्स से सदा के लिए हटा दिया गया. द ओवल में एक मैच में बरसात से पड़े व्यवधान के दौरान उन्हें मैदान में लगे हुए विज्ञापन बोर्ड्स को पढ़कर सुनाने का उबाऊ काम करते पाया गया. इसकी सजा उन्हें तत्कालीन बीबीसी प्रमुख लार्ड राईट के गुस्से के रूप में झेलनी पडी जो रेडियो को किसी भी तरह की व्यावसायिकता से दूर रखना चाहते थे.

तसल्ली की बात यह रही कि इस “हिमाकत” की सजा उन्हें राजशाही ने नहीं दी. १९३९ में रेवरेंड गिलिंगहैम को चैप्लेन टू द किंग नियुक्त किया गया.
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फ़्रैंक गिलिंगहैम का क्रिकेट करियर:

(जारी)

Tuesday, December 9, 2014

इतने तो कमाऊ देश वेटर को टिप में ही दे देते हैं


भारत-पाक में मामला रक़म का है?

- वुसतुल्लाह ख़ान, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
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अब तो मुझे तरस आने लगा है उन बेचारों पर जो चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के संबंध भले जैसे भी हों, वो उनके जीवन में ही सुधर जाएँ.

पर जब मैं पूछता हूँ कि मियाँ जी आप इतने उतावले क्यों हो रहे हो? अभी तो सिर्फ 67 बरस ही बीते हैं आपसी तनाव को, ऐसी भी क्या जल्दी. तो ये मित्र मुझे यूँ घूरते हैं जैसे मैं भी पागल हूँ.
देखो भाई, बात है सीधी-सीधी, न तो आपसे पूछ के ये संबंध ख़राब हुए, न आपके कहने से ठीक होंगे.

भले हर चौदह और पंद्रह अगस्त को वाघा-अटारी पर सौ छोड़ एक लाख दीये जला लें, भले हज़ार दफा तस्बीह घुमा लें कि हवन करा लें, भले ट्रैक टू डिप्लोमेसी का चक्कर चला लें कि सीमा पार से सेमिनारों और कॉन्फ्रेंसों के बहाने बुलाए जाने वाले मेहमानों के कल्ले से कल्ला मिलाकर चुम्मा फोटो खिंचवाएं, रत्ती बराबर फर्क नहीं पड़ने का.

कौन करता है घाटे का सौदा?

ऐ भोली फाख्ताओं, दुनिया का कौन सा ऐसा देश है जो जानबूझकर घाटे का सौदा करता है. तो ये क्यों न मान लिया जाए कि अभी जैसे-कैसे भी संबंध हैं, वो दोनों देशों के हित में हैं. और ये तभी सामान्य होंगे जब दोनों देशों को लगेगा कि अब फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान हो रहा है.

देखिए, बुरे संबंध अच्छे होने के तीन ही कारण होते हैं. या तो आप एक-दूसरे के बिना मरे जा रहे हों. मगर इश्क मानव करते हैं, देश तो बस एक-दूसरे से फ्लर्ट ही करते हैं.

या फिर एक दूसरे को इतना मारकूट लें कि थक के चूर हो जाएं और फिर अहसास हो कि लड़ाई अच्छी चीज़ नहीं, इंसान के बच्चे बनकर रहने में ही फ़ायदा है.

मगर अभी तक न तो भारत सही से पाकिस्तान को कूटपीट सका और न ही पाकिस्तान की एक के बाद दूसरे बदले की भावना ठंडी हुई है.

जब आर्थिक फ़ायदा हो

या फिर तीसरा कारण ये है कि आज की दुनिया में एक देश दूसरे देश के लिए आर्थिक स्तर पर फ़ायदेमंद हो तभी आपस में मुट्ठीचापी शुरू होती है. इसका ज़िंदा उदाहरण भारत-चीन संबंध है.
जब एक दिन दोनों ने समझ लिया कि कोई किसी को नहीं पछाड़ सकता तो मुफ़्त में एक दूसरे की मंडी गोरों के हाथों क्यों गंवाएं?

दोनों ने किसी बिचौलिए के बग़ैर एक दूसरे से दिल ही दिल में समझौता कर लिया.

कहाँ 2002 में दोनों देशों ने एक दूसरे को पाँच खरब डॉलर का माल बेचा, कहाँ आज बात 70खरब डॉलर तक पहुँच गई.

टिप बराबर रक़म

चीन इस वक़्त भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जबकि सीमा पर कौन सा इलाक़ा किसका, वो झगड़ा अपनी जगह ज्यों का त्यों.

पाकिस्तान और भारत को एक दूसरे से आर्थिक लाभ पहुँचने का अभी तक ऐसा कोई लालच नहीं जिसके होते दोनों कहें कि भाड़ में जाएं ऐतिहासिक झगड़े पहले मिलकर नोट कमा लें, झगड़े भी निपटते रहेंगे.

इस वक़्त दोनों देश लगभग ढाई अरब डॉलर का आपसी व्यापार करते हैं. अब इतनी सी रक़म कमाने के लिए आपसी संबंध क्या अच्छे करने, इतने तो कमाऊ देश वेटर को टिप में ही दे देते हैं.




(http://www.bbc.co.uk/ से साभार)