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Friday, February 19, 2016

फस्किया़धार का ढिणमिणाण रहस्य काण्ड उर्फ़ क्याप की भूमिका

पेश है मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास 'क्याप' का शुरुआती अंश. मेरी पसंदीदा गद्य शैली -


अफ़सोस कि यह कहानी पहले लिखी जा चुकी है. यह अफ़सोस उस सैद्धान्तिक स्तर पर ज़ाहिर किया गया न समझा जाय कि हर कहानी ही एक तरह से पहले लिखी जा चुकी होती है क्योंकि कहानी में जो तीन तत्व होते हैं-घटनाएँ, पात्रों के चरित्र एवं उनकी भूमिकाएँ और देशकाल-उनमें से पहले दो के अन्तर्गत कुछ मौलिक कर दिखाने की सम्भावना शायद गुणाढ्य के बृहत्कथा लिख डालने के साथ ही चुक गयी थी. और देश-काल का भी ऐसा है कि लेखक की कल्पना उसकी तमाम सीमाओं को लाँघने में सक्षम है.

 प्रस्तुत कथा के एक पात्र वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मेधातिथि जोशी के पिता और हमारे गाँव के विद्वान केदारदत्तज्यू अक्सर कहा करते थे-‘बताओ तो तुम्हारी मॉर्डन साइंस में ऐसा क्या है जो महाभारत युग में हमारे यहाँ नहीं था ?’ मेरा मॉर्डन साइंटिफ़िक माइण्ड भले ही यह मानने को तैयार न हुआ हो कि महाभारत युग में तो हम सब कुछ जानते थे पर बाद में भूल गये, लेकिन महर्षि व्यास की देशकालजित कल्पना की दाद देने को अवश्य मजबूर हुआ था. ख़ैर ! तो मैं कह रहा था कि मेरा अफ़सोस उस सौद्धांतिक स्तर पर नहीं, सर्वथा स्थूल पर है. यह कहानी सचमुच लिखी जा चुकी है. छह माह पूर्व यह हमारे मीडिया की सुर्ख़ियों में छाई रही और अब कूर्मांचली ने, जो एक ज़माने में मेरा शिष्य रह चुका है, ‘हंस’ के ताजा अंक में उसे रचनात्मक साहित्य का अंग बनाते हुए छपवा डाला है.

समाचारों का वाचन या श्रवण किये बग़ैर अपने को प्रातः कालीन निवृत्ति में असमर्थ पाने वाले समस्त महानुभाव समझ ही गये होंगे कि मेरा इशारा तथाकथित ‘रहस्यमय ढिणमिणाण भैरव काण्ड’ की स्टोरी की ओर है. अगर आप उन चन्द लोगों में से हैं, जिन्होंने मास-मीडिया की ओर से सिद्धान्ततः मुँह मोड़ लिया है. या अगर आप उन अनेक लोगों में से हैं, जिनके लिए मास-मीडिया की परोसी हुई हर महत्त्वपूर्ण ‘स्टोरी’ इस अर्थ में बेवफ़ा साबित होती है कि दिमाग़ से सफ़ा हो जाती है, तो शायद आपके हित में इस काण्ड का तथाकथित रहस्य संक्षेप में दोहरा देना अनुचित न होगा. 

ज़िले बना कर बोट जीतने की राजनीति के अन्तर्गत बनाये गये नये मध्य हिमालयवर्ती ज़िले वाल्मीकि नगर में, जो कभी कस्तूरीकोट कहलाता था और अगर राजनेताओं ने चाहा तो आगे चलकर उत्तरा कहलाने लगेगा, फस्कियाधार नामक चोटी के रास्ते में स्थित ढिणमिणाण यानी लुढ़कते भैरव के मन्दिर के पास एक-दूसरे की जान के प्यासे पुलिस डी.आई.जी. के मेधातिथि जोशी और माफ़िया सरगना हरध्यानु बाटलागी की लाशे पड़ी मिलीं. दोनों के ही सीने में उल्टियों के अवशेष थे. पहला रहस्य यह कि वे दोनों वहाँ क्या कर रहे थे ?

यह सही है कि मन्दिर से कुछ ही ऊपर उन दोनों का पुश्तैनी गाँव फस्कियाधार है लेकिन यह घटना 1999 के नवम्बर में घटी और इस इलाक़े के ज़्यादातर भेड़-बकरीपालक अक्टूबर में ही नीचे वादियों की ओर निकल जाते हैं. दूसरा रहस्य यह है कि वे मरे कैसे ? जब उनकी लाशें काफ़ी बिगड़ी हालत में ज़िला मुख्यालय के सरकारी अस्पताल में पहुँचीं, वहाँ का नौसिखिया डॉक्टर चीर-फाड़ के बावजूद ऐसा कुछ भी पता नहीं कर सका जिससे अस्वाभाविक मृत्यु के संकेत मिलते हों. उल्टियों के अवशेष और आँतों में पड़े भोजन के विश्लेषण से भी किसी विष की उपस्थिति के संकेत नहीं मिले. कोई शराब को ही विष कहता हो तो अलग बात है.

और सबसे बड़ा रहस्य यह कि ये दो जानी दुश्मन, जो एक अरसे से एक-दूसरे को मारने की कोशिश में लगे हुए थे, इकट्ठा कैसे मर गये ? अगर सिर्फ़ पुलिसिये की लाश मिली होती तो समझ लिया जाता कि माफ़िया सरगना की करतूत है. अगर सिर्फ़ सरगना की लाश मिलती तो कहा जाता कि पुलिसिये की करतूत है. वे दोनों निर्मम हत्यारे थे इसलिए यह भी कल्पनातीत है कि उनमें से एक ने पहले दूसरे की हत्या की और फिर पश्चाताप में आत्महत्या कर डाली. या यह कि दोनों ने ही सैकड़ों बेकसूरों की जानें अपने आपसी झगड़े में ले डालने के पाप का प्रायश्चित करने के लिए आत्महत्या कर ली.

या यह कि दोनों ही एक-दूसरे को मारने की तैयारी करके गये और उन्होंने एक-दूसरे की शराब में ज़हर मिला दिया यानी एक-दूसरे को मारने की कोशिश में दोनों ही मारे गये ! और अगर यह दोहरी हत्या का मामला था तो मारने वाला वह तीसरा था कौन ? और उसने चोर और सिपाही दोनों को ही क्यों मारा और कैसे मारा ? और सवा लाख टके का एक सवाल किया अगर उन्हें किसी ने नहीं मारा तो वे दोनों कुदरती तौर पर एक साथ और एक जगह कैसे मर गये ? यह सही है कि तथाकथित रचियता परमपिता परमेश्वर की कलम से निकलीं कहानियाँ अक्सर संयोग-प्रधान होती हैं तथापि इतने ज्यादा संयोग से तो वह घटिया लेखक भी परहेज करता ही होगा.

इसी के चलते मास-मीडिया में ‘रहस्यमय तीसरे’ की चर्चा होती रही जिसने किसी रहस्यमय विधि से यह दोहरा हत्याकाण्ड किया. दो एक समझदार और वैज्ञानिक दृष्टिवाले लोग कहते रहे कि कुछ ऐसे भी विष होते हैं. जिनके प्रभाव से हुई मृत्यु स्वाभाविक लगती है और जिनकी उपस्थिति का पता लगाना बहुत कठिन होता है, इसलिए रहस्यमय विधि या विधाता की बातें न की जायें लेकिन मीडिया, में कहीं घुमा-फिराकर और कहीं साफ़-साफ़ यह कहा गया कि वह ‘रहस्यमय तीसरा’ स्वयं विधाता था. 

‘परवरदिगार के आलम में तमाम ऐसी चीज़ें है, जो इन्सान की समझ से परे हैं’-नुमा ये बातें जब तक ‘मासेज़’ को सैक्स-सनसनी-रहस्य रोमांस का नशेड़ी बनाने वाला पूँजीवादी मास-मीडिया परोस रहा था तब तक मैं चुप रहा लेकिन अब अपने को ‘मासवादी’ नहीं, मार्क्सवादी’ कहने वाला कूर्मांचली अपनी उत्तरआधुनिकता के अन्तर्गत वही राग अलाप रहा है, तब मुझे भी कुछ कहने को बाध्य होना पड़ रहा है. ख़ासकर इसलिए कि कूर्मांचली की यह कहानी उन दोनों मृतकों का ही नहीं, मुझ जीवित का भी अपमान करती है. सो ऐसे कि यह कहानी उसने एक तरह से मुझसे सुनी हुई बातों के आधार पर लिखी है. 

कोई दो-ढाई महीने पहले वह मेरे प्रिय पेय ‘घोड़ी’ यानी सस्ती फ़ौजी रम की बोतल को लेकर मेरी सेवा में हाज़िर हुआ था और यद्यपि मैं सिद्धान्ततः उन लोगों की सोहबत नहीं करना चाहता जो आधुनिक से उत्तरआधुनिक हो गये हैं, तथापि मैंने उसे इस एहसान को याद करते हुए पास बैठा लिया कि मुझे पागलख़ाने से मुक्ति दिलाने के अभियान में वही सबसे आगे रहा था. अपने हर पैग पर मुझे दो पिलाते हुए कूर्मांचली ने ढिणमिणाण भैरवकाण्ड और उससे जुड़े हुए दोनों पात्रों के बारे में मुझसे बातचीत की. कुछ इस अन्दाज़ से मानो उसने बातचीत का यह विषय महज़ वक्त काटने के इरादे से चुना हो और सो भी इसलिए कि यह घटना मेरे पुश्तैनी गाँव के पास घटी थी और उससे जुड़े हुए दोनों पात्र मेरी ही शागिर्दी में जीवन में आगे बढ़े थे. उसने साफ़-साफ़ यह नहीं कहा कि इस काण्ड पर मैं कहानी लिखना चाहता हूँ, कृपया लिखवा दीजिए. कहता तो मैं लिखवा देता. इस ख़तरे को मोल लेते हुए लिखा देता कि वह मुझे सचमुच पागल समझ बैठेगा.

मैं ठोस यथार्थवादी हूँ लिहाज़ा हर क़िस्म के रहस्यवाद से मुझे सख़्त कोफ़्त होती रही है. इसलिए मेरी लिखवाई हुई कहानी में कोई ‘रहस्यमय तीसरा’ न होता. ‘जादुई यथार्थवाद’ की पैरवी करने वाले कूर्मांचली को मैं याद दिला देता कि यथार्थ घिनौना है, इसीलिए तो कभी मेरी तरह उसने भी यथार्थ को जादुई बनाने के लिए क्रान्ति कराने की क़सम खायी थी.

शीर्षक से लेकर अन्तिम वाक्य तक कूर्मांचली की इस कहानी की हर बात मेरा क्रोध उत्तरोत्तर बढ़ाती रही. तबीअत हुई कि एक और ‘रहस्यमय काण्ड’ कर डालूँ जिसके बादे दो लाशें मिलें-एक उसकी, एक मेरी. कहानी के शीर्षक को ही लें-‘मौत की जुगलबन्दी’. इससे दो बातें प्रमाणित होती हैं-पहली यह कि भले ही कूर्मांचली हिन्दी का लब्धप्रतिष्ठ लेखक हो उसे हिन्दी नहीं आती, इसीलिए ‘घातक जुगलबन्दी’ को ‘मौत की जुगलबन्दी’ बना डाला है उसने. दूसरी यह कि अपनी कॉन्वेंटिया बिरादरी के अन्य लेखकों की तरह वह भी लिखता भले ही हिन्दी में हो, पर सोचता अंग्रेज़ी  में है. निश्चय ही उसके मन में कहानी के लिए शीर्षक उभरा होगा-‘अ डैलली डुएट’. अगर कविमना कूर्मांचली को वह अंग्रेज़ी शीर्षक लुभा रहा था तो मुझसे सलाह करता, मैं उसी टक्कर का यह हिन्दी शीर्षक सुझा देता-‘सम पर यम’.

अगर कहानी के शीर्षक से मुझे खीज हुई तो उसकी शैली से मैं तिलमिला उठा. अरे आप मुझे दारू पिलाकर जो कुछ सुन ले गये हैं उसे सीधे-सीधे ढंग से और साफ़-साफ़ शब्दों में लिखिए न. मगर नहीं. कूर्मांचली तो उत्तराधुनिक है ! तो उसके यहाँ होता क्या है कि कथा के दो मुख्य पात्र वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मेधातिथि जोशी और क्षेत्रीय वन, खनन तखा भू माफ़िया के सरगना हरध्यानु बाटलागी ढिणमिणाण भैरव मंदिर के प्रांगण में आमने-सामने चुपचाप बैठे दारू की घूँट भरते रहते हैं और मन ही मन एक-दूसरे से बातें करते रहते हैं. 

रोब में आइए कि यहाँ सारा संवाद आन्तरिक एकालाप के माध्यम से कराया गया है. रोब में आइए कि किस कुशलता से इन आन्तरिक एकालापों को परस्पर गूँथ कर संगीत में होने वाली जुगलबन्दी का आभास दिया गया है-एकालापों की अवधि कभी बहुत छोटी, कभी बहुत बड़ी, और कभी बीच-की-सी करते रहकर. रोब में आइए कि इसमें इस जुगलबन्दी के चलते दोनों मुख्य पात्रों की दोस्ती-दुश्मनी की कहानी उनके अपने-अपने नज़रिये से पेश कर दी गयी है. सिनेमाई भाषा में यह कि उन दोनों के सत्यों को ‘परस्पर इन्टरकट’ कर दिया गया है कि साहब सच सच से टकरा रहा है और सच यह है कि टक्कर में सच कहीं नज़र नहीं आ रहा है ! जबकि सच यह है कि लेखक ख़ुद सच का सामना करने से कतरा रहा है और पाठक को भी कायरता की यह सुविधाजनक राह अपनाने के लिए उकसा रहा है. 

लुत्फ़ की बात यह है कि कूर्मांचली कहीं भी यह बताने की कोशिश नहीं करता कि उसके कथापात्र दारू की घूँट भरते-भरते मर कैसे गये ? अपने-अपने एकालाप में एक-दूसरे की मृत्यु अपने-अपने कारणों से चाहते हैं और कूर्मांचली ऐसा जताता है मानो उनके ऐसा चाहने-भर से दोहरी मौत की यह घटना घटी.

उत्तरआधुनिक कूर्मांचली यह कहते हुए तो नहीं शरमाता कि सच राम जाने क्या था लेकिन यह कहने में वह संकोच कर जाता है कि यह घटना राम जी की रहस्यमय लीला का ही एक नमूना थी, बावजूद इसके कि वह इधर राम का नाम जपने वाली पार्टी का भी कृपांकाक्षी बन चला है. अभी पिछले ही महीने उसने राम का नाम जपने वाले एक मन्त्री की पत्नी के काव्य-संग्रह का प्रधानमन्त्री द्वारा विमोचन किये जाने के समारोह की अध्यक्षता की थी. बहरहाल इस दोहरी मौत का कोई युक्तियुक्त कारण न बताकर वह अपने पाठक को यही मानने के लिए मजबूर करता है कि इन दो गुनाहगारों को परमपिता परमेश्वर ही आकर मौत के घाट उतार गये. 

कूर्मांचली की कहानी की अन्तिम पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-‘दारू ख़त्म हो चुकी थी. उनकी अपनी-अपनी कहानियाँ भी विलीन हो चुकी थीं उस अथाह और स्याह सागर में, जिसमें पहुँचकर हर किसी की कथा समाप्त हो जाती है और जिज्ञासु की जिज्ञासा ज्यों-की-त्यों बनी रहती है. अपराधी जीवन की उपल्बधियाँ और निशानी के रूप में केवल उनके वमन के अवशेष ही रह गये थे जिनमें उनका अपराधबोध ढूँढे नहीं मिल सका.’ इस तरह के शब्दजाल पर ख़ुद ही निहाल होते लेखकों को मैं लानत भेजता हूँ. क्या कूर्मांचली को इतना भी नहीं पता है कि जब तक दुनिया में हम इन्सान मौजूद हैं, अच्छी या बुरी कैसी भी लीला के लिए किसी काल्पनिक भगवान को ज़िम्मेदार ठहराना सरासर बैईमानी है ? मैं ‘हंस’ के प्रगतिशील समपादक पर भी हैरान हूँ. जिस दौर में साहित्यिक मोर्चा मेरे हाथ में था, कोई प्रगतिशील साहित्यकार इस तरह की कहानी न लिख सकता था, न छाप सकता था.

कूर्मांचली की लिखी कथा भ्रामक है और उसमें सुधार अपेक्षित है. वैसे सुधार किसमें अपेक्षित नहीं है आज ? हमारे उपवन में यहाँ से वहाँ तक भूल के ही फूल खिले हैं. अफ़सोस कि भले ही एक ज़माने में मैंने कूर्मांचली-जैसे अनेक लेखकों का मार्गदर्शन किया था, मैं स्वयं लेखक नहीं हूँ. मैं तो बस इस काण्ड की भौगोलिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करके कूर्मांचली के लिए भूल-सुधार का मार्ग प्रशस्त कर सकता हूँ और करूँगा भी, क्योंकि वह मेरी नैतिक ज़िम्मेदारी हो जाती है. बात भूगोल से शुरू करूँगा. हमारे प्रान्त की उत्तरी सीमा से थोड़ा इधर को एक अत्यन्त दुर्गम क्षेत्र स्थित है, जो कभी रियासत कस्तूरीकोट के नाम से जाना जाता था और आज ज़िला वाल्मीकि नगर के नाम से पुकारा जाता है. कस्तूरीकोट इसलिए पुकारा जाता था कि यहाँ कभी कस्तूरी मृगों की भरमार थी. वाल्मीकि नगर इसलिए कहलाता है कि यहाँ ऐसे लोगों की भी भरमार है जिन्हें बाहर से आये विजेताओं ने डूम यानी अछूत माना. उनसे थोड़े बेहतर दर्जे के लोगों को उन्होंने खसिया का दर्ज़ा दिया.

डूम, जिनकी संख्या बहुत ज़्यादा थी, भोजन-पानी तो दूर सवर्ण की छाया भी नहीं छू सकते थे. अगर किसी काम से डूम को बुलाया जाता था तो घर के बाहर जिस भी जगह वह बैठता था उस जगह को सोने का स्पर्श पाये पानी से धोना और फिर गोबर से लीपना ज़रूरी होता था. फिर उस जगह पर और घर वालों पर गोमूत्र छिड़कना आवश्यक समझा जाता था. अगर कोई कमज़ोर नजर वाला सवर्ण दूर से आते डूम को अपना कोई बिरादर समझ कर नमस्कार कर देता था तो यह डूम के लिए भयंकर अपशकुन वाली बात मानी जाती थी और भयभीत डूम फ़ौरन अपने फटेहाल कपड़ों का एक हिस्सा फाड़कर आग में जला कर श्राप-मुक्ति पाता था. खसिया, जो कभी इस इलाक़ें के स्वामी रहे होंगे, सवर्णों का पानी छू सकते थे, खाना नहीं. खसियाओं के लिए हम डूम अछूत थे. जहाँ तक बाहर से आये विजेताओं का सवाल है, उनके लिए यहाँ के ब्राह्मण भी एक तरह से अछूत ही हैं और वे उनसे सम्बन्ध नहीं करते.

 सच तो यह है कि वे हमें अन्य इलाकों में प्रचलित संज्ञाओं-बामण, खसिया और डूम-से सम्बोधित न करके हामण, हसिया और डूम-हूम कहना पसन्द करते. 
सच तो यह है कि वे हमें अन्य इलाकों में प्रचलित संज्ञाओं-बामण, खसिया और डूम-से सम्बोधित न करके हामण, हसिया और हूम कहना पसन्द करते थे. इसका औचित्त यह था कि उनकी बोली में ‘बामण-वामण’ या डूम-वूम’ न कहकर ‘बामण-हामण’ और डूम-हूम’ कहने का रिवाज था. विचित्र किन्तु सत्य कि विजेताओं के दिये हुए इस हिकारत-भरे ‘हकार’ से मुक्ति पाने के लिए हम लोगों को बाक़ायदा राजदरबार में गुहार लगानी पड़ी थी. तब जाकर हम बामण, खसिया और डूम समझे जा सके सरकारी तौर पर. व्यवहार में बाहर वाले हमें हामण, हसिया और हूम ही पुकारते रहे.

तो कस्तूरीकोट का नाम वाल्मीकि नगर कर देने का औचित्य यह है कि यह अनुसूचितों का इलाक़ा है. किसी ज़िले को नगर कहने का क्या औचित्य है, यह बताने में असमर्थ हूँ, कभी रियासत की राजधानी और अब नये ज़िले के मुख्यालय कस्तूरीकोट के, जिसे अब वाल्मीकि नगर पुकारा जाता है, एक उजड़े उद्यान में लगी महर्षि वाल्मीकि की मूर्ति से आप आकर कभी इस रहस्य का उद्धाटन करवा लें. चेतावनी देना आवश्यक समझता हूँ कि कस्तूरीकोट दुर्गम था और वाल्मीकि नगर भी दुर्गम है. चीनी आक्रमण के बाद इस इलाक़े में कुछ मोटर-मार्ग बना ज़रूर दिये गये हैं मगर वे कुल मिलाकर मुसाफ़िरों से ज़्यादा ठेकेदारों पर मेहरबान हैं. चट्टानें खिसकाने से टूटती ही रहती हैं सदा. स्थानिक कन्याओं की परम्परागत पोशाक झगुली के, जिसे आप देहाती नाइटी कह सकते हैं, तंग फेरों-जैसे लपेटे खाती यह सड़क भयानक खड्डु का दर्शन कराती इतनी तेज़ी से चढ़ती है मानो आपको स्वर्ग पहुँचाने की जल्दी में हो.

इस दुर्गम ज़िले का दुर्गमतम क्षेत्र है फस्किया़धार, जहाँ यह काण्ड हुआ. इस काण्ड को ढिणमिणाण रहस्य काण्ड पुकारने वाले मीडिया को पता ही नहीं है कि ढिणमिणाण भैरव मेरे जन्म स्थान फस्कियाधार की देवी का द्वारपाल है. दोनों मृत व्यक्ति फस्कियाधार ही के थे. यह मान सकना मुश्किल है कि वह तथाकथित रहस्यमय तीसरा भी कहीं और का रहा हो. जिन्हें उस तीसरे को भगवान मानने की ही ज़िद हो वे भी इस इलाके को देखने के बाद यही कहेंगे कि लुढ़कते भैरव के मन्दिर में चोर और सिपाही दोनों को मारने वाला या तो भैरव ही रहा होगा यह फिर उसकी मालकिन देवी रही होगी या फिर दोनों ने मिलकर यह दोहरा हत्याकाण्ड किया होगा. 

फस्कियाधार तो इतना दुर्गम है और नवम्बर में वहाँ इतनी ठण्ठ पड़ती है कि कोई बाहर का भगवान भी वहाँ नहीं आना चाहता. ज़िला मुख्यालय से फस्कियाधार की ओर एक और भी ज़्यादा ख़तरनाक मोटर मार्ग ह्यपानी-यानी बर्फीले घाट तक ज़रुर बना दिया गया है लेकिन इस मोटर मार्ग से आते हुए आप डर के मारे पसीना-पसीना हो जायेंगे और अगर उसके बाद ह्यूपानी घाट के पानी से अपने अंग भी पोंछेंगे तो मारे ठण्ड के वहीं परचेत पड़ जायेंगे यानी बेहोश हो जायेंगे.
होने को ह्यूपानी घाट से फस्कियाधार की लगभग 11 हज़ार की ऊँची चोटी के नाक के नीचे बहती ढुंग्याली गाड़ तक भी जंगलात वालों ने एक कामचलाऊ मार्ग बना दिया है लेकिन उनमें कोई सवारी गाड़ी नहीं चलती. और अगर चलती भी होती तो मैं आपको यही सलाह देता कि उसमें चढ़ने की बजाय आप आत्महत्या का कोई बेहतर तरीक़ा खोज लीजिए.

मारे डर के मरना भी क्या मरना ! ढुंग्याली गाड़ से फस्कियाधार तक एक तीख़ी चढ़ाई और इस चढ़ाई के लगभग बीचों-बीच स्थित है ढिणमिणाण भैरव का छोटा-सा मन्दिर, जिसके चारों ओर थके यात्रियों के विश्राम करने के लिए काफ़ी जगह समतल बना दी गयी है. फस्कियाधार और उसके आस-पास का इलाक़ा पथरीला और बर्फ़ीला है. यहाँ की छोटी-सी वेगवती नदी ढुंग्याली गाड़ में पानी से ज़्यादा बड़े-बड़े पत्थर हैं, इसीलिए उसे ढुंग्याली गाड़ यानी पथरीली नदी कहा गया है. नवम्बर ख़त्म होते-होते यह सारा इलाक़ा बर्फ़ से ढक जाता है और यहाँ के पानी के तमाम स्रोत भी जम जाते हैं.

चोटी के ऊपर पत्थरों से बना हुआ एक मन्दिर है, जिसमें, ज़मीन से बाहर की ओर थोड़ी-सी उभरी एक चट्टान ही देवी के रूप में प्रतिष्ठित है. इस छोटे-से मन्दिर के पास ही एक बड़ा-सा गाँव है. गाँव के लोगों को मुख्य पेशा भेड़-बकरी पालना और ऊन कातना है. इलाक़ा खेती के योग्य नहीं है लेकिन गर्मियों में बर्फ़ पिघल जाने के बाद यहाँ मवेशियों के लिए अच्छी घास उग आती है. जाड़ा शुरू होते ही घास और आजीविका की तलाश में यहाँ के लोग  निचले इलाकों की ओर निकल जाते हैं. ढुंग्याली गाड़ की तरफ़ पड़ने वाला पर्वत का हिस्सा निचले इलाक़ों की ओर निकल जाते हैं. ढुंग्याली गाड़ की तरफ पड़ने वाला पर्वत का हिस्सा लगभग वृक्षहीन है. उसमें झाड़ियाँ और जड़ी-बूटियाँ ही उगती हैं. लेकिन अगर दूसरी तरफ़ हिमबंग्गा उर्फ़ हिमगंगा नदी की ओर उतरने लगें काफ़ी हरियाली नज़र आती है. सामने वादी में देवदार के पुराने पेड़ों के ठूँठ और नये पेड़ों का एक पूरा वन नज़र आता है.

आमतौर से सारे कस्तूरीकोट के और ख़ासतौर से फस्कियाधार के लोग अपने सौन्दर्य के लिए विख्यात हैं-ख़ासकर स्त्रियाँ. उनमें भी ख़ासकर बाटलगी यानी राहलगी कहलाने वाली जाति की स्त्रियाँ. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, इस जाति के लोग राह से ही लगे रहते थे और यहाँ-वहाँ घूम-घाम कर लोगों का अपने नाच-गाने से और अपने क़िस्से-कहानियों से मनोरंजन किया करते थे. देवी के मन्दिर में मेले-ठेले पर उन्हें ही श्रद्धालुओं का मनोरंजन करने का काम मिलता था और शादी-ब्याह में उन्हें बारात के आगे-आगे चलाया जाता था. वे और तमाम मामलों में अछूत समझे जाते थे, लेकिन मन और तन का रंजन करने के मामले में नहीं. संकेत दे चुका हूँ कि 14 वीं शताब्दी में बाहर से आये विजेताओं का दावा है कि इस क्षेत्र के सभी लोग अछूत हैं. उनका अहंकार से भरा निर्मम दावा है कि हमारे आने से पहले यहाँ एक ही जाति थी, जिसे किसी बदतर शब्द के अभाव में भड़ुवा-पतुरिया जाति कहा जा सकता था. यहाँ के कुछ लोग अपने को सवर्ण मान सके हैं तो इसीलिए कि हमारे बुजुर्गों में से कुछ ने भयंकर वितृष्णा पर उत्कट कामेच्छा से विजय पाते हुए उनकी आद्या जननी से सम्भोग कर लिया था.

भयंकर वितृष्णा का सन्दर्भ यह है कि यहाँ की अन्यतम रूप से कामोत्तेजक स्त्रियों के आकर्षणरूपी चन्द्र पर अनेकानेक कलंक उनकी ग़रीबी लगाये रहती है. जैसे एक कलंक उनके फटे हुए चीकट वस्त्रों का, जिन्हें एक-एक बार पहन लेने के बाद वे तभी उतार पाती हैं जब कहीं से नये वस्त्र का जुगाड़ हो या पुराना वस्त्र उन्हें ढक सकने में सर्वथा असमर्थ हो चला हो. जल के अभाव और शीत के प्रभाव में स्नान से अनजान रह गयी उनकी देह पर पड़ी मैल की मोटी-मोटी रेखाएँ और उनकी शरीर से उठती दुर्गन्ध भी उनकी कामोत्तेजक रूपराशि पर दूसरे कलंक के समान हैं. कहना न होगा कि स्थानिक सवर्णों को इस तरह की बातों पर घोर आपत्ति होती आयी है. जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं यह मानने को तैयार हूँ कि बाहर वालों के अपवित्र चरण पड़ने से पहले इस इलाक़े में एक ही जाति थी, जिसे किसी बेहतर शब्द के अभाव में निर्धन-नादान पुकारा जा सकता था. बहरहाल मेरे अछूत बुजुर्ग भी बाहर वालों के इस दावे को निरी फसक यानी गप्प ठहराते थे कि हमारे सवर्ण भी अछूत है. लुत्फ़ यह है कि बाहर वाले हमें फस्किया यानी गप्पी मानते आये, इसीलिए उन्होंने हमारे क्षेत्र का नाम फस्कियाधार रखा.

मेरे बुजुर्ग बताते थे कि उन्होंने अपने बुज़ुर्गों से सुना था कि इस जगह का नाम पहले कुछ और था-शायद जीबीजौल. जीबीजौल का कुछ अच्छा-सा मतलब था-शायद जाँबाज़ों का जमघट. यह ‘शायद’ वाली स्थिति इसलिए कि सदियों से चला आ रहा बाहरी विजेताओं का वर्चस्व मेरे बुज़ुर्गों के बुज़ुर्गों के मस्तिष्क तक से अपने इतिहास और भाषा की स्मृतियाँ मिटा चुका था. वे विजेताओं की मानसिक औलादें तो निश्चय ही बन चुके थे. देख रहा हूँ कि भूगोल सुनाते-सुनाते मैं इतिहास में फिसल आया हूँ. 

जिन महानुभावों के धैर्य को किसी ताज़ातरीन रहस्यमय काण्ड से जुड़े हुए भूगोल पर प्रकाश डाला जाना स्वीकार्य हो भी गया हो वे भी शायद उससे जुड़े पिछले इतिहास, का ज़िक्र किये जाने पर आपत्ति कर उठें. उनसे मेरा नम्र निवेदन है कि हर कहानी के पीछे कई-कई और कहानियाँ रहती हैं और उनका सन्दर्भ सामने न होने पर पाठक के लिए हर कहानी एक पहले बनायी जा सकती है. इसी के चलते कूर्मांचली जैसे लेखक अपना जादुई यथार्थवाद बड़े मजे से चला ले जाते हैं. यथार्थ में विस्मयकारी के अर्थ में जादुई-वादुई कुछ होता है तो यही कि वह आगे-पीछे की तमाम अन्य कहानियों से जुड़ा हुआ होता है और उन सबकी एक साथ जानकारी किसी को भी नहीं हो पाती.

Monday, February 15, 2016

मिस्टर योस्सी की पश्चिमी जर्मनी यात्रा – 4


(पिछली क़िस्त से आगे)

फ्रांकफुर्त्त से हाइडलबर्ग की रेलयात्रा एक घण्टे की है. फ्रांकफुर्त्त जर्मन वाणिज्य-व्यवसाय का विराट केन्द्र है उधर हाइडलबर्ग शान्त एकान्त मध्ययुगीन विद्यापीठ और यह वापसी कुल साठ मिनट में होती है लेकिन इतने क्रमशः कि पता नहीं चलता कब हो गई. जर्मनी के अन्य भागों में भी रेलयात्रा करते हुए मुझे यह प्रतीति हुई कि शहर-गाँव-कस्बा खेत कारखाना जंगल सब यहाँ एक दूसरे से सटा हुआ है और इनमें कोई इतना भारी भेद नहीं है कि सहसा आपको बोध हो. भारत में केरल में यात्रा करते हुए आपको कुछ-कुछ ऐसी ही अनुभूति होती है. केरल की तरह पश्चिम जर्मनी भी घना बसा हुआ है. (कुल आबादी 6 करोड़ 13 लाख घनत्व 247 प्रति वर्ग किलोमीटर) और पश्चिम जर्मनी के निवासी भी मुख्यतः मध्यमवर्गीय हैं. इतनी आबादी के बावजूद वहाँ की आधी से ज्यादा जमीन कृषि में लगी हुई है (जबकि आबादी का कुल 6 प्रतिशत कृषि-वन जीवी है और सो भी सरकारी प्रोत्साहन से) और बीस प्रतिशत जमीन आज भी जंगलों से ढकी है. जिस जर्मन के भी मकान के आसपास थोड़ी जमीन होती है वह उसमें बागवानी जरूर करता है और हर जर्मन गृहिणी अपने घर की खिडकियों-झरोखों पर छोटे बड़े गमलों से अलग बगीचा बनाती है.

 महानगरों के फ्लैटों तक में भीतर दस-बारह गमले होना आम-सी बात है. कोई आश्चर्य नहीं जो इतनी हरियाली में औद्योगिक केन्द्र भी औद्योगिक न लगते हों. प्रदूषण के प्रति जर्मनी के लोग बहुत चिन्तित और सजग हैं. उन्हें दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हर चीज नए सिरे से बनाने का अवसर मिला है इसलिए वे अपने कल-कारखानों को ऐसा रूप दे सके हैं कि उनसे गन्दगी न फैले और वे सैरे में बहुत खूबसूरती से खप जाएँ. फ्रांकफुर्त्त हाइडलबर्ग रेलमार्ग के इर्द-गिर्द ट्रैक्टर और ट्रकबनाने वाला विख्यात मानहाइम उद्योग-केन्द्र है लेकिन उसके पास से गुजरते हुए यह अनुभूति ही नहीं होती कि धुएँ और लोहे-लक्कड़ की सनीचरी दुनिया से होकर निकल रहे हैं.

हाइडलबर्ग बाहनहोफ (स्टेशन) में ही अच्छा-खासा बाजार है. एरिका यहाँ की किताबों की दुकान में डोरिस लेसिंग का उपन्यास ‘समर बिफोर डार्क’ ढूँढ़ने लगीं जिसका मैंने उनसे जिक्र किया था और जिसे लेसिंग की प्रशंसिका होने के नाते वह तुरन्त खरीदना-पढ़ना चाहती थीं. उपन्यास उन्हें मिला नहीं. वह गुलदस्ता अलबत्ता मेरे लिए खरीद लाईं. मैंने उनसे कहा कि मैं आपके लिए कोई उपहार नहीं लाया हूँ क्योंकि मुझे बताया गया था कि जर्मन लोग उपहार देने लेने में विश्वास नहीं करते. वह बोलीं, ‘‘यह उपहार मैं आपको उस संस्था की ओर से दे रही हूँ, जिसने मुझे आपकी मेजबानी के लिए नियुक्त किया है, इसलिए जवाबी उपहार की कोई जरूरत नहीं है. लेकिन जर्मनों के बारे में आपको और क्या-क्या बताया गया है यह मैं जरूर जानना चाहूँगी.’’

जवाब में मैंने एरिका को ब्रीफकेस में से वही पुस्तिका निकालकर दी. पलट-पढ़कर वह बहुत हँसीं. फिर बोलीं, ‘‘किसी भी देश के लोग स्वयं अपने को कितना कम जानते हैं. कोई भी व्यक्ति अपने को कितना कम जानता है ! दूसरों को बताना होता है और दूसरे बताते हैं तो लगता है अरे हाँ ऐसा तो है लेकिन फिर भी मन हठ करता है कि ठीक ऐसा नहीं है, गलत समझे हैं वे.’’

स्टेशन से होटल जाते हुए नेकार नदी के दोनों ओर वनाच्छादित पहाड़ियों पर बसे हुए हाइडलबर्ग कस्बे का नजारा किया. जाड़ों की शुरुआत का जंगल-ललछौहें-सुनहरे पत्ते, कुछ टँगे हुए, कुछ गिरे हुए. पतली-सी नदी पुराना सा पुल. मध्ययुगीन इमारतें. घुमावदार सड़कें. पत्थरों से पटे प्रांगण वाले बाजार. एक भव्य दुर्ग-प्रासाद. सब कुछ बहुत साफ-सुथरा धुला-खिला (सफाई के खब्त में जर्मन लोग सड़कें बाकायदा धोने वाले स्वीडनवासियों के भाईबन्द हैं).

‘‘कैसा लग रहा है हाइडलबर्ग ?’’ एरिका ने जिज्ञासा की.

‘‘बहुत सुन्दर है.’’ मैंने कहा, ‘‘पढ़ा-लिखा होता तो यहीं विश्वविद्यालय में नौकरी ढूँढ़ लेता.’’
‘‘सुन्दरता देखने के लिए वसन्त में आए होते.’’

‘‘पतझड़ का भी तो अपना एक सौन्दर्य है.’’

‘‘हाँ !’’ एरिका मुस्कराईं, ‘‘और आप अधेड़ों को तो वह नजर आना ही चाहिए.’’

घुमावदार सड़क से ऊपर चढ़ते हुए हम एक मध्ययुगीन हवेली में पहुँचे यहाँ कभी छात्रावास और विद्यालय थे. जिन्होंने इसे होटल का रूप दिया है उनकी कोशिश यही रही है कि अब भी यह अगले जमाने का विद्यालय ही नजर आए. वही बेंचें, कुर्सियाँ, डेस्क. वही जगह-जगह सजावटी आखरों में लिखे आप्त वचन. छोटा सा होटल. सराय वाली आत्मीयता.

यूरोप में सर्वत्र ऐसे परम्परा परोसने वाले छोटे होटल हैं जिनमें परम्परा के नाम पर सैलानी से लगभग उतना ही पैसा ले लिया जाता है जितना तीन-तारा पाँच-तारा होटलों में. एरिका का प्रस्ताव था कि आप आराम कर लें और दो बजे मुझे लाबी में मिलें. मेरा आग्रह था कि जब यहाँ कुल दो दिन रहना है और इसी बीच फ्रांकफुर्त्त भी घूमना है तब आराम करने की कोई जरूरत नहीं. आध घण्टे बाद चलते हैं.

‘मगर मुझे जरूरत है !’’ एरिका बोलीं, ‘‘मैं सवेरे चार बजे उठी थी कि पति के लिए खाना बनाकर रख दूँ. अपने गाँव से हाइडलबर्ग पहुँचूँ कार से और फिर ट्रेन पकड़कर फ्रांकफुर्त्त पहुँचूँ. चलिए-आपकी बात पर इस जरूरत को अनदेखा भी कर दूँ, लेकिन आध घण्टे में मैं नहाकर तैयार नहीं हो सकती. अगर मर्द को तैयार होने में आध घण्टा लगता है तो सामाजिक गणित के अनुसार एक औरत को कितना लगेगा ? घण्टा ?’’


नहा-धोकर तैयार हुआ और कपड़े पहनने से पहले थोड़ी देर आराम करने के इरादे से बिछौने पर लेट गया. कमरे की दीवार पर टँगे कजरारे मूँछों वाले किन्हीं महानुभाव का फोटो देखते-देखते मुझे झपकी आई फिर नींद तभी टूटी जबफोन की घण्टी बजी. मालूम हुआ कि एरिका आधे घण्टे से लाबी में मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं.

एरिका ने मुझे कुछ इस नजर से देखा मानो कहना चाह रही हों कि आप लोग भी बस हद ही करते हैं. घूमने के लिए वह बेहद सजी-सँवरी थी. सम्पन्न देशों की स्त्री साज-सज्जा और पहनावे पर कितना समय साधन खर्च करने को बाध्य हैं. 

सवाल यह था कि मिस्टर योस्सी (जोशी का यह जर्मन उच्चारण मुझे तब तक मान्य हो चुका था) कहाँ का भोजन पसन्द करते हैं ? एरिका के (और पुस्तिका के भी !) अनुसार जर्मन लोगों को जर्मन भोजन विशेष प्रिय नहीं है और जर्मन नगरों में दुनिया के सभी प्रमुख देशों का भोजन परोसने वाले रेस्तरां मिल जाते हैं-भारतीय भोजन भी कई जगह उपलब्ध है. इतालवी फ्रांसीसी, चीनी और मेक्सिकोई भोजन जर्मनों को विशेष प्रिय है. एरिका को मिस्टर योस्सी का यह जवाब कतई पसन्द नहीं आया कि भोजन के मामले में मेरी कोई पसन्द नापसन्द नहीं है, जैसा आप चाहें. एरिका ने जानना चाहा कि पुरबिया लोग इतने अज्ञेय क्यों बनना चाहते हैं ? एरिका के अनुसार भारतीय तो फिर भी गनीमत है कि कभी हाँ-ना ऐसा कह देते हैं, चीनी-जापनी तो बस लगातार मुस्कराकर और सिर हिलाकर काम चलाते हैं !

Sunday, February 14, 2016

मिस्टर योस्सी की पश्चिमी जर्मनी यात्रा – 3


(पिछली क़िस्त से आगे)

रात में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप पार करके दिल्ली से आया विमान बदली और फुहार वाली जाड़े की एक सुबह फ्रांकफुर्त्त हवाई अड्डे पर उतर रहा है. विराट हवाई अड्डा जहाँ रोजाना छह सौ फ्लाइट आती-जाती हैं. जिसे और बढ़ाने की योजनाएँ हैं. योजनाएँ, जिनके विरोध में जर्मन युवक प्रदर्शन कर रहे हैं. 

पतली लम्बी एक अधेड़ प्लेटिनम ब्लाण्ड (सफेद से सुनहरे से बालों वाली स्त्री) श्रीमती एरिका न्यूबर्ट मुझे लिवाने आई हैं. वह विवाहित हैं कि नहीं यह पूछना पड़ा है क्योंकि जर्मनी में किशोरावस्था पार की हुई किसी भी औरत को कुमारी कहने का रिवाज नहीं है. विवाहित-अविवाहित वे सब ‘फ्राउ’ होती हैं, फ्राउलीन नहीं. और इधर नारी-मुक्ति आन्दोलन के प्रभाव में वहाँ भी औरतों ने नाम के आगे केवल एम.एस. लगाना शुरू कर दिया है-उच्चारण म्यूज. एरिका हवाई अड्डे के विस्तार का विरोध करने वाले ‘इन नाशुक्रों’ से बहुत खफा हैं.

उनका कहना है कि इन्हें समाजवाद के नाम पर बैठे-बिठाए रोटी तोड़ने को मिल गई है. इन्होंने जाना नहीं है कि दुःख किसे कहते हैं, यन्त्रणा कैसी होती है. बस गाँजे का दम लगाया, एक झण्डा उठाया और प्रगति का विरोध करने निकल पड़े. मुझे इनसे नफरत है मिस्टर योस्सी. क्षमा करेंगे मैं बहक गई. और आपकी यात्रा कैसी रही ?

फ्रांकफुर्त्त से रेलगाड़ी में हाइडलबर्ग जाते हुए एरिका से बातें हुईं. युद्ध से पहले या युद्ध के दौरान जन्मे हर जर्मन की कहानी की बुनियाद में पीड़ा होती है. एरिका के पिता एरिका की आँखों के सामने बमबारी में मारे गए. एरिका की माँ ने अपनी बच्ची की खातिर दुबारा विवाह नहीं किया और फिर युवती एरिका ने काफी अर्से तक अपनी बीमार माँ की खातिर अपना विवाह टाले रखा. विलम्ब से उसने विवाह किया एक ऐसे समझदार और सुयोग्य व्यक्ति से जो उसकी माँ की देखभाल करने के लिए तैयार था, किन्तु माँ उनके साथ नहीं आई. एरिका को कोई बच्चा नहीं हुआ. उसके पति रासायनिक इंजीनियर हैं और वह स्वयं अब विशुद्ध गृहिणी है क्योंकि ‘शादी करने मगर गृहिणी न बनने का कोई मतलब नहीं होता मिस्टर योस्सी.’ एरिका अपना फालतू समय क्रिश्चेन डेमोक्रेट दल का काम करने, साहित्य पढ़ने (नहीं लिखा कभी नहीं, मुझे अपनी प्रतिभा के बारे में कोई मुगालता नहीं मिस्टर योस्सी) और विभिन्न संस्थाओं के लिए दुभाषिए, अनुवादक और होस्टेस का काम करने में लगाती हैं. कोई बच्चा गोद क्यों नहीं ले लिया ? ‘गोद ही लेना हो, मातृत्व का इतना ही शौक हो तो एक क्यों मिस्टर योस्सी ? कम से कम आधा दर्जन. अभी इतना पैसा नहीं कि आधा दर्जन बच्चे पाल सकूँ. होगा तो जरूर गोद लूँगी.’

एरिका ने साहित्य का विस्तृत अध्ययन किया है. और उसकी विचाराधारा ऐसी है जिसे ‘अनुदार’ अथवा ‘दक्षिणपन्थी’ कहा जाता है. इससे कुछ अचरज होता है क्योंकि दक्षिणपन्थी व्यक्ति आमतौर से पोंगे और अनपढ़-से होते आए हैं. आधुनिकता और उदारता हमारे लिए पर्यायवाची रहे हैं. किन्तु इधर पश्चिमी देशों में ऐसी भी बिरादरी पनपी है जो आधुनिक होते हुए भी अनुदार है, बुद्धिजीवी होते हुए भी दक्षिणीपन्थी है. एरिका इसी ‘नव-अनुदारवादी’ बिरादरी की सदस्या निकलीं. इस बिरादरी को जैसे समाजवाद के अन्तर्गत निठल्ले लोगों की सहायता करना और फिर उनका प्रगति-विरोध सहना बुरा लगता है, वैसे ही मानवीयता के अन्तर्गत तीसरी दुनिया के काहिल लोगों की मदद करना और फिर उनकी पश्चिम-विरोधी बातें सुनना.

जाहिर है कि एरिका से बहुत बहस होनी थी और हुई. ‘तीसरी दुनिया’ बनाम ‘सम्पन्न पश्चिम’ इस बहस का जर्मनी और यूरोप के दो अन्य देशों की यात्रा में मुझे कई बार सामना करना पड़ा. मेरी यह धारणा बनी कि तेल की कीमतें बढ़ाए जाने के बाद पश्चिमी देशों को जिस आर्थिक संकट’ का सामना करना पड़ा है उसमें तीसरी दुनिया के प्रति उनकी सहानुभूति बहुत कम हो गई है. बहस में हम तमाम तर्क तीसरी दुनिया की ओर से दे सकते हैं-आप हमें लूट कर ही सम्पन्न बने हैं, आप हमारी मदद करते हैं तो मानवीयता के नाते नहीं, शुद्ध व्यावसायिक कारणों से अपना तैयार माल खपाने के लिए, हमारा कच्चा माल लेने के लिए, आपने अपने उद्यमों के लिए हमारा श्रम, हमारी प्रतिभा हमारे प्राकृतिक साधन लिए हैं. लेकिन सारी बहस के बाद यह अकाट्य तथ्य रह जाता है कि सहायता लेने हम ही पहुँचे हैं. 


(जारी)

Saturday, February 13, 2016

मिस्टर योस्सी की पश्चिमी जर्मनी यात्रा – 2


(पिछली क़िस्त से आगे)

किसी भी देश के मन और मानस का परिचय देने के लिए जब भी कोई पुस्तक लिखी जाती है, देशवासियों को वह विचित्र अथवा पूर्वाग्रहग्रस्त मालूम होती है. लिखने वाला उस देश के अजनबीपन को रेखांकित करता है, खांटी और परम्परागत को उभारता है. उधर औसत नागरिक यह मानता है कि बाबा आदम के जमाने की इन बातों को हम भुला चुके हैं. 

फिर भी किसी भी देश की यह औसत परम्परागत सच्चाई किसी हद तक वहाँ के हर नागरिक पर लागू होती है. जर्मनी की यात्रा में मुझे बार-बार यह अनुभव हुआ कि ‘दीज स्ट्रेंज जर्मन वेज’ नामक यह पुस्तिका जर्मनों और उनके देश को समझने के लिए बहुत उपयोगी है.

आज जब एक खास तरह की पाँच सितारा उपभोगवादी संस्कृति सारे विश्व में फैल चुकी है, जबकि अंग्रेजी अपने अमेरिकी मुहावरे में विश्व-भाषा बन चुकी है, किसी देश की परम्परागत संस्कृति की बात करना निरर्थक मालूम हो सकता है. जर्मनी के, जो केवल 1871 से लेकर 1945 तक ही एक-राष्ट्र-एक-देश रहा है, जर्मनपन की बात करना तो और भी असंगत प्रतीत होता है. फिर जब हम यह देखते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी का बँटवारा होने पर कुल मिलाकर एक करोड़ सत्तर लाख लोग पूर्व जर्मनी से पश्चिम जर्मनी आ गए, युद्ध के दौरान और युद्धोत्तर आर्थिक चमत्कार के दौरान करोडों और लोग अपना प्रदेश, अपना जिला छोड़कर अन्यत्र बस गए, तब जर्मनी के विभिन्न अंचलों की अपनी अलग संस्कृति की चर्चा करना तो परम मूर्खता ही मानी जा सकती है. विचित्र किन्तु सत्य कि जर्मनी के जर्मनपन की, उसके विभिन्न अंचलों की आंचलिकता की चर्चा करने वाली पुस्तिका में दी गई जानकारी सही है.

उदाहरण के लिए इसमें लिखा है कि जर्मनी में मर्द, औरत की बायीं ओर रहते हुए चलता है. इसलिए कि किसी को अपनी दायीं तरफ रखना, सम्मान देने का ढंग है, इसलिए कि दिल बायीं तरफ होता है और इसलिए भी कि किसी जमाने में मर्द तलवार लेकर चलते थे और तलवारें उनकी बायीं ओर लटकती रहती थीं. यद्यपि पुस्तिका में कहा गया है कि यह परम्परागत रिवाज है और नए जमाने के लोग इसे नहीं मानते तथापि मैंने अनुभव किया कि नए जमाने के लोग भी अधेड़ होते ही परम्पराप्रिय होने लगते हैं. पुस्तिका के अनुसार ही जर्मन रिवाज के मुताबिक सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, किसी भी जगह भीतर जाते हुए मर्द को आगे रहना चाहिए क्योंकि पहले जवांमर्द जाकर देख ले कि स्थिति ठीक-ठाक है तब ही अबला जा सकती है. यह नियम ‘पहले आप’ मार्का विश्व-व्यापी शिष्टाचार के प्रतिकूल है. इसीलिए दो एक बार मैं इसे भूल गया मेरी मेजबान ने इस ओर ध्यान दिलाना जरूरी समझा.

हमारे यहाँ भी लोग-बाग बूढ़े होकर ‘धार्मिक’ होते देखे जाते हैं लेकिन अधेड़ होते ही, पैसा-टका बनते ही ‘सांस्कृतिक’, ‘आंचलिक’ वगैरह-वगैरह हो जाने का जैसा आग्रह जर्मनी में है वैसा शायद दुनिया में कहीं और नहीं. जर्मन आज अपने जर्मनपन की बात नहीं करना चाहता. इस जर्मनपन के चलते वह दो दो विश्वयुद्धों में पिट चुका है. वह इस जर्मनपन के राजनीतिक सैनिक आयाम को भुला ही देना चाहता है. बच रहती है संस्कृति. इसमें भी वह आंचलिकता का आग्रह करता है ताकि कहीं फिर हिटलरी मनःस्थिति की लपेट में न आ जाए. इस सबका एक चमत्कारी परिणाम हुआ है. आधुनिक जर्मन के साहित्य, सिनेमा मंच और रेडियो दूरदर्शन में बोलियों का महत्त्व सहसा बढ़ गया है. हर क्षेत्र में आंचलिक स्थापत्य, तीज-त्योहार रस्मोरिवाज की जबरदस्त वापसी हुई है. आंचलिक स्थापत्य का तो पश्चिम जर्मनी में कुछ ऐसा बोलबाला है कि केवल मकान देखकर आप बता सकते हैं कि आप किस अंचल के हैं. गाँवों-कस्बों के पुराने मकान तो थे ही ऐसे, अब नए मकान भी उन्हीं नमूनों के बनाए जा रहे हैं और सर्वत्र नई पीढ़ी गगनचुम्बी रिहाइशी मकानों का, फ्लैट की जिन्दगी का विरोध कर रही है.

संक्षेप में यह कि पुस्तिका सही है. अगर आप किसी जर्मन स्त्री का हाथ चूमना चाहें तो ध्यान रखें कि यह अनुष्ठान केवल तब किया जाता है जब सिर पर छत हो. (खुले में नहीं) और आपके ओंठों के तथा सुन्दरी की उल्टी हथेली के बीच कागज की मोटाई भर जगह छूटी रहे ऐसा शास्त्रोक्त विधान है. और हाँ यह सूचना दिए जाने पर कोई ठहाके बुलन्द करता है, फब्तियाँ कसता है तो वह बवेरिया का होता है जिस अंचल के लोगों में से जिन्दादिली उसी तरह उठती रहती है जिस तरह उनकी विश्वविख्यात बीयर से झाग. 

Friday, February 12, 2016

मिस्टर योस्सी की पश्चिमी जर्मनी यात्रा – 1


मेरे प्रिय लेखकों में से एक मनोहर श्याम जोशी के पश्चिम जर्मनी संस्मरणों के कुछ टुकड़े पेश हैं -

जब मैं पश्चिमी जर्मनी की यात्रा के लिए जाने लगा, तब नई दिल्ली में एफ.आर.जी. के दूतावास ने मुझे एक पतली-सी पुस्तिका दी-‘ये विचित्र जर्मन रीति-रिवाज’.  जर्मनी में नियुक्त अमेरिकियों की सुविधा के लिए लिखी गई यह पुस्तक कार्टूनों के सहारे जर्मन तौर तरीकों के बारे में निहायत ही रोचक ढंग से जरूरी जानकारी देती है. इसे पढ़ने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि जर्मन लोग बहुत गम्भीर, औपचारिकता-विश्वासी और थोड़े रूखे होते हैं. 

इसी पुस्तिका को उलटते-पलटते मैं लुफ्टहांजा के उस विमान में सो गया जो पेइचिंग से दिल्ली के रास्ते फ्रांकफुर्त्त जाता है. पौ फटने से बहुत पहले जबर्दस्त ठहाके सुनकर नींद खुल गई. देखा गैली में जर्मनी इंजीनियरों का वह दल जर्मन विमान-सुन्दरियों के साथ कहवे और कहकहे का सुख लूट रहा है जो चीन में एक प्रसिद्ध जर्मन फर्म की ओर से कारखाना लगाकर स्वदेश लौट रहा था.

मैं भी चाय का तलबगार होकर गैली में पहुँचा. चाय की घूँट लेकर मैंने उस दल के सबसे हँसोड़ सदस्य से, जो एक विमान-सुन्दरी विशेष से कौतुक प्रीतिनिवेदन में बहुत उत्साह से व्यस्त था, कहा, ‘‘गुस्ताखी माफ, मगर आप जर्मन मर्द की सरकारी छवि बिगाड़ने में कोई कसर उठा नहीं रख रहे हैं.’’

वह बोला, ‘‘जर्मन मर्द की कोई सरकारी छवि भी है क्या ?’’

मैंने उसे वह पुस्तिका दिखा दी.

हँसोड़ इंजीनियर पुस्तिका पढ़ता जाए और मुझे निशाना बनाता हुआ कोई टिप्पणी करे. उदाहरण के लिए पुस्तिका में एक जगह लिखा है कि जर्मनी में हाथ चूमने का रिवाज है और हाथ चूमने के परम्परागत ढंग में कोई चूक नहीं की जानी चाहिए. परम्परागत ढंग में ओंठ हाथ पर छुलाए नहीं जाते हैं, ओंठ और हाथ के बी बारीक-सा फासला छोड़ना होता है. इसे पढ़कर वह हँसोड़ बोला, ‘‘यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूचना है मिस्टर योस्सी. इसे हृदयंगम करें आप. जब आप अस्सी वर्ष की स्त्रियों से शुरू होंगे तब यह सूचना काम आएगी और मिस्टर योस्सी, आप इतने शरीफ आदमी मालूम होते हैं कि अट्ठारह वर्ष वालियों से तो क्या ही शुरू होंगे. और हाँ, मिस्टर योस्सी, इस पुस्तिका में लिखा है कि आपके ओंठों और स्त्री की हथेली के बीच कागज जितनी मोटाई का फासला रहे. आप टायलेट पेपर का एक रोल साथ रखा करें मिस्टर योस्सी, सूक्ष्म, नाप-जोख अन्दाजे से करना निरापद नहीं.’’

ठहाके का भागीदार बनने के बाद मैंने इसी पुस्तिका से प्राप्त सूचना के आधार पर फतवा दिया, ‘‘आप लोग बवेरिया के हैं, जर्मनी के नहीं.’’ 

इस बार ठहाका नहीं लगा. केवल मुस्कराहटें खिलीं. सब तो नहीं, अधिकतर बवेरिया के ही थे और वह हँसोड़ तो बवेरिया के भी हृदय-देश का. बवेरिया, जर्मनी का आल्प (हिमपर्वत) क्षेत्र है और इसके निवासी ज्यादा बोलने वाले, ज्यादा रंगीले, ज्यादा नाटकीय माने जाते हैं.


(जारी)

Saturday, January 12, 2008

मनोहर श्याम जोशी की एक कविता और 'क्याप' का मूली फसक

(पोस्ट: सिद्धेश्वर सिंह)

मनोहर श्याम जोशी ने हिन्दी कथा साहित्य को न केवल 'कुरू-कुरू स्वाहा', 'कसप', 'हरिया हरक्यूलीज की हैरानी', 'टटा प्रोफेसर', 'क्याप' जैसे अद्भुत उपन्यास दिये हैं बल्कि हिन्दी पत्रकारिता को नई दिशा देने के साथ ही हिन्दुस्तानी टेलीविजन और सिनेमा की दुनिया को बनाने और बदलने का रास्ता भी दिखाया है। उनके समूचे लेखन को एक शब्द में समेटने की पाठकीय जुर्रत करूं तो मैं उसे एक असमाप्त 'फसक' (गप्प) कहना चाहूंगा. उनकी गप्प का एक दुर्लभ रूप उस समय देख्नने को मिला था जब म.गा.अं.हि.विश्वविद्यालय, वर्धा के 'हिन्दी कथा साहित्य और उपन्यास' वाले वर्कशाप (नैनीताल,११ जून से १ जुलाई २००२ ) में वे मेरे अध्यापक बने थे और खुद को 'वीर बालक' तथा हम प्रतिभागियों को 'दंड पेले हुए हिन्दी के मास्टर' कह-कह कर दो दिनों तक 'उत्तर आधुनिकता और हिन्दी उपन्यास' जैसे विषय को अपने अंदाज में पढाते रहे. इन दो दिनों में उन्होंने भारतीय मनीषा में उपन्यास की पड़ताल, उपन्यास और भारतीयता की अवधारणा, परम्परा और आधुनिकता का द्वन्द्व, आस्था और तर्क जैसे मुद्दों पर बोलते हुए इस पर जोर दिया था कि 'उत्तर आधुनिक कथा साहित्य का लक्ष्य किस्सागोई की वापसी है'.

जोशी जी ने शुरूआती दौर में (अपने अधिकांश समकालीनों की तरह) कवितायें भी लिखी थीं। आज अपने प्रिय साहित्यकार की 'आजकल' मासिक पत्रिका के जून १९५४ अंक में प्रकाशित एक कविता 'उद्जन -बम के युग में 'और 'क्याप' उपन्यास का एक चर्चित प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूं।

उद्जन -बम के युग में

इस तोतापंखी कमरे में नीलम-मोती बिखराते हम,
मोरपंख हिलाते हम और श्वेत शंख बजाते हम,
चांद डाल में,
चांद ताल में,
चांद-चांद में मुस्काते हम.
कभी,बहुत पहले कभी,
शायद यही छटा एक कविता बन सकती थी.

इसका वर्णन कर,
इसके कानों में रुपहले रूपकों के झूमर डालकर,
इसकी आंखॉं में अलंकार का काजर डालकर,
चिपकाकर मद्रासी बिंदिया इसके उन्नत भाल पर,
और आंखॉं ही आंखों में पूछे कुछ प्रश्नों के मूक उत्तर
इसकी फैली गदोलियों में थैली-झोलियों में भर-भर कर,
मैं कभी,
बहुत पहले कभी,शायद कवि बन सकता था.
मेरी काव्यकृति की प्रेरणा तू
शायद कविप्रिया बन सकती थी.
पर अब नहीं,नहीं अब नहीं,
क्योंकि धक धक धक दिल के टेलिप्रिंटर पर अक्षर कर
छप-छप जाती है यह फ्लैश खबर-

कि सवधान
लो! अब विराट घृणा के कुंचित ललाट का धीरज छूटता है!
लो! अब उद्जन के परम कण का सूर्य-सा शक्ति-स्रोत फूटता है!
हो सावधान!
ओ आधे-भगवानः इंसान!
अब दूर कहीं बहुत-बहुत दूर
शुरू होती है वह अनंत विध्वंस-प्रक्रिया-लड़ी
जिसमें न रह पाएगी यह अर्ध-चेतना की मीनार खड़ी,
जिसमें हो जायेंगे ये सब के सब कांच के सपने चकनाचूर!

खबरदार
आ रहा ज्वार!
ये आधे-आधे वादे सब बह जायेंगे!
ये पुंसत्वहीन इरादे सब धरे रह जायेंगे!


***

'क्याप' का मूली फसक

बाहर वालों को हमारी उस किस्म की गप्पें भी पसंद आयीं,जिनमें हम ऐसा जताते थे मानों गिनिस बुक आफ रिकार्ड में जा सकने योग्य सभी अद्भुत घटनायें और चीजें हमारे इलाके में होती हों । फर्ज़ कीजिये किसी ने जौनपुर की मूली का जिक्र किया कि वह बहुत ही बड़ी और भारी होती है. इस पर हमारी तरफ वाला बड़े विनम्र स्वर में कहता- 'महाराज, मैंने आपकी वो जौनपुर वाली मूली तो देखी नहीं ठहरी. अपने नाना जी के बाड़े में जो मूली होने वाली हुई उसके बारे में जरूर जानता हूं. एक दिन क्या हुआ मामी ने कहा-जा रे बाड़े में से एक मूली उखाड़ ला. साग के लिये और कुछ तो है नहीं आज . -अरे मामी - मैंने कहा- एक मूली का क्या होने वाला हुआ इतने बड़े परिवार में! मामी ने कहा- 'तू पहले जा के देख तो सही ! वहां जाकर देखा महाराज तो बाप रे बाप ! एक-एक हाथ तो जमीन के ऊपर निकली ठहरी मूलियां ! जमीन के भीतर का किसे पता ! और मोटाई पूछते हो तो मैनें अंगवाल डाली तो हाथ छोटे पड़ गए कहा .हिलाता हूं तो हिली ही नहीं. कुदाल से खोदना शुरू किया तो मेरी कबर-जसी बन गई, लेकिन मूली फिर भी नहीं निकली. तो मैंने अंगवाल डाल कर खूब जोर से हिलाया. थोड़ी हिलती-सी देखी तो पीछे को झुक कर जोर लगाकर खींचा. मूली तो निकल गई महाराज, लेकिन मैं उसके अंगवाल डाले-डाले ही ढिणमिणाते-ढिणमिणाते सीधा तल्ला गांव जा पहुंचा. अब मेरे को कितनी चोट लगी क्या बताऊं, लेकिन महाराज ,उस मूली को कुछ नहीं हुआ. फिर तल्ला गांव वालों ने मेरी दवा-पानी की और कुल्हाड़ी से मूली के चार टुकड़े किए एक-एक टुकड़े को दो-दो आदमी उठाकर ऊपर ले गये मल्ला गांव.

(मनोहर श्याम जोशी जी पर यह पोस्ट कबाड़ी सिद्धेश्वर ने तैयार की है। बदक़िस्मती से उन के नगर खटीमा में इन्टरनेट पिछले कुछ समय से परेशान कर रहा है। आशा करें कि उन का नेट ठीक काम करना शुरू कर देगा। ताकि हिन्दी साहित्य का वह अमूल्य कूड़ा जो उन के यहां धूल फ़ांक रहा है, जल्द ही कबाड़खाने में नज़र आए। )

Saturday, October 13, 2007

मनोहर श्याम जोशी जी को सादर याद करते हुए ‘कसप’ से मेरा एक प्रिय अंश

(अथ डी डी उवाच )...

यह शहर मुझे तभी स्वीकार करेगा जब मैं सरकारी नौकरी पर लगूं, तरक्की पाता रहूं और अवकाश प्राप्त करके यहाँ अपने पुश्तैनी घर में लौट आऊँ और शाम को अन्य वृद्धों के साथ गाड़ी-सड़क पर टहलते हुए, छड़ी से क़मर को सहारा दिए हुए बताऊँ कि नॉक्स सैप की नोटिंग की क्या स्पेशेलिटी ठहरी और फाइनेंशियल रूल्स हैन्डबुक में अमुक चीज के बारे में क्या लिखा ठहरा।

मुझे नहीं चाहिए यह नगर। ऐसा कह रहा है नायक।

मैं लानत भेजता हूँ नगर पर, ऐसा कहते हुए नायक उस दयनीय होटल एंड रेस्टोरेंट के बाहर पहुंच गया है, जिसमें जनवासा है, लेकिन वह भीतर नहीं जा रहा है।

उसे यहीं शहर पर टहलते हुए थोक के हिसाब से लानत भेजने का काम जारीः रखना है इस नगर पर जो सुबह की पहली रोशनी में आकार ले रहा है उसकी आंखों में, उसकी स्मृति में।

मैं लानत भेजता हूँ इस नगर पर। इसके प्रत्येक वयोवृद्ध नागर, एक-एक जर्जर घर पर मैं लानत भेजता हूँ। ढहती मुन्डेरों, ढुलकती खेत-सीढियों पर, धुंधुवाए दुन्दारों, नक्काशीदार नीचे-नीचे द्वारों पर, मैं लानत भेजता हूँ। अंगूर की बेल पर¸ दाड़िम के बोठ पर¸ घर में उगे शाक पात पर¸ सोनजई के झाड़ पर¸ मैं लानत भेजता हूं। आंगन पटआंगन पर¸ उक्खल मसूल जांतर पर¸ स्लेट की छत पर¸ छत पर रखे बड़े चकमक पत्थर पर¸ नागफनी पर¸ कद्दुओं और खुबानियों पर¸ सूखती बड़ियों और मटमैली धोतियों पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

सिन्दूर पिटार पर¸ तार तार तिब्बती गलीचे पर¸ खस्ताहाल हिरण खाल पर¸ दादी की पचलड़ मोहनमाल पर¸ दादा के चांदी के चमची पंचपात्र पर¸ बच्चों के पहने धागुल सुतुल पर¸ कुल देवता पर¸ कुल पर¸ मैं लानत भेजता हूं। कीलक पर¸ कवच पर¸ रूद्री खंडग पर¸ स्रुवा आज्या इदं न मम पर¸ मैं लानत भेजता हूं। रामरक्षा अमरकोष पर¸ चक्रवर्ती के गणित¸ नेस्फील्ड के ग्रामर पर¸ लघु सिद्धान्त कौमुदी¸ रेनबो रीडर पर¸ मोनियर विलियम्स के कोश¸ एटकिंसन के गजेटियर पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

चन्दन चन्धारे पर¸ पंचांग और पट्टों पर¸ ऐंपणों ज्यूंतियों पर¸ हरियाले के डिकारों पर¸ भेंटणे की छापर पर¸ बेसुरे सकुन आखर पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

चैंस फाणा चुलकाणी पर¸ बांठ ठट्वाणी पर¸ रस भात पपटौल पर¸ चिलड़ा और जौल पर¸ मैं लानत भेजता हूं। जम्बू के छौंक पर¸ भांगे की भुनैन पर¸ कड़वे तेल की झलैन पर¸ खट्टे चूक नींबू पर¸ डकार की झुलसैंण पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

जागर पर¸ कौतिक पर¸ कथा¸ हुड़ुक बोल पर¸ हो हो होलक हुल्यारों पर¸ उमि मसलती हथेलियों पर¸ छिलूक की दीवाली पर¸ बरस दिन के घर पर¸ तिथि त्यौहार पर¸ बारसी जनमबार पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

पल्लू में बंधे सिक्कों पर¸ पुड़िया में रखे बताशों पर¸ पेंच पर ली चीजों पर¸ साहजी के यहां के हिसाब पर¸ मैं लानत भेजता हूं। ‘श्री राम स्मरण’ से शुरू हुए हर पेस्टकार्ड पर¸ देस से आए हर मनीओरडर पर¸ यहां के वैसे ही हाल पर¸ तहां की कुशल भेजना पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

अतीत के क्षय पर¸ भविष्य के भय पर¸ सीखचों के पीछे से चीखते उन्माद पर¸ खांसी के साथ होते रक्तपात पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

आप लक्ष्य कर रहे होंगे कि चिन्ताप्रद रूप से काव्यात्मक हुआ जा रहा है हमारा क्रान्तिकारी नायक।
अगर आप इससे पूछें इस समय कि भाई इसका समाधान क्या है? वह निस्संकोच उत्तर देगा¸ सारे पहाड़ियों को पंजाबी बना दो। मानो पंजाब में मध्यवग होता ही न हो¸ मानो अम्बरसर की गलियां किसी मौलिक अर्थ में अल्मोड़ा के मोहल्लों से भिन्न हों। किन्तु मैं इसे टोकूंगा नहीं। अपने वर्तमान पर लानत भेजने का युवाओं का वैसा ही अधिकार है जैसा मेरे जैसे वृद्धों को अतीत की स्मृति में भावुक हो जाने का।

थक कर होटल में घुसने से पूर्व अब नायक सिटोली के जंगल को और उस के पार नन्दादेवी और त्रिशूल की सुदूर चोटियों के देखते हुए लानत का खाता पूरा करता है।

मैं लानत भेजता हूं स्वर्गोपम गोद और नारकीय बचपन पर¸ वादियों में गूंजते संगीत पर¸ मैं लानत भेजता हूं रमकण चहा के चमकण गिलास पर¸ अत्तर सुरा तीन पत्ती फल्लास पर¸ छप्पर फटने के सपनों पर¸ अपने पर¸ अपनों पर¸ मैं लानत भेजता हूं।

सारी रात जागने के बाद¸ लानत लदवाई में इतना श्रम करने के पश्चात नायक अधिकारपूर्वक मांग करता है कि अब उसे कुछ देर शान्ति से सोने दिया जाए। अस्तु¸ सम्प्रति उससे यह न पूछना ही उचित होगा कि जिन नगरवासियों को लानत भेजी गई है¸ उन में बेबी नाम्नी कन्या सम्मिलित मानी जाय कि नहीं ?