पं.भीमसेन जोशी जब गा रहे हो तान की लपट जैसे तूफ़ान बरपा देती है.
भीमसेन जी ने अपना स्वयं का स्वर-विन्यास गढ़ा है.पहाड़ी स्वर जब उनके
कंठ से फ़ूटता है तो आप सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ामोश होने के अलावा कुछ नहीं कर सकते. भीमसेन जी ने अपनी ज़िन्दगी में बहुत संघर्ष किया है . वह एक लम्बी कहानी है.हाँ एक बात यकायक याद आ गई.इन्दौर में पंडितजी का एक कंसर्ट था.
किसी ने एक रचना के बाद के विराम के दौरान चिल्ला कर फ़रमाइश की मिले सुर मेरा तुम्हारा गाइये...पंडितजी ने तुरंत जवाब दिया वह मैने भारत सरकार को बेच दिया ; उसकी फ़रमाइश यहाँ मत कीजिये.
अपने गुरू पंडित सवाई गंधर्व के लिये प्रतिवर्ष पुणे में विगत पचास वर्षों से अधिक समय से प्रतिष्ठित सवाई गंधर्व संगीत समारोह आयोजित करने वाले पं.भीमसेन जोशी भारतीय शास्त्रीय संगीत का ध्रुव तारा हैं.
आज यहाँ सुनते हैं पं.भीमसेन जोशी का गाया राग सूर मल्हार. विलम्बित और द्रुत दो रचनाओं में निबंध्द बंदिश को जब आप सुनेंगे तो महसूस करेंगे कि कहीं आसपास बिजलियाँ चमक उठीं हैं और बादलों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा है सारा आलम.