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Monday, March 2, 2015

उर्फ़ पड़ोसी मुल्क

अजी सुनती हो !

-वुसतुल्लाह खान

 

पाकिस्तान 13 अगस्त 1947 तक अफ़ग़ानिस्तान, चीन या ईरान का हिस्सा नहीं बना था बल्कि हिंदुस्तान का हिस्सा था. सिवाय काबुल दरिया के पाकिस्तान में सब नदियां हिंदुस्तान से दाख़िल होती हैं.

पाकिस्तान की सबसे लंबी सीमा चीन, अफ़ग़ानिस्तान या ईरान के साथ नहीं बल्कि भारत से मिलती हैं.
पाकिस्तानी नागरिक ईरान, चीन और अफ़ग़ानिस्तान भी जाते हैं लेकिन सबसे ज़्यादा भारत जाते हैं. 

हांलाकि पाकिस्तान में फ़ारसी, पश्तो और चीनी बोली जाती है लेकिन सबसे ज़्यादा उर्दू बोली जाती है जो ईरान, अफ़ग़ानिस्तान या चीन में नहीं बल्कि हिंदुस्तान में पैदा हुई.

चीन, ईरान या अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान की कभी जंग नहीं हुई लेकिन भारत से चार बड़ी जंगें और सैकड़ों छोटी-मोटी झड़पें हो चुकीं हैं.

पाकिस्तान के सिनेमाओं में अफ़ग़ान, चीनी या ईरानी फ़िल्में नहीं दिखाई जातीं बल्कि भारतीय फ़िल्में दिखाई जाती हैं.

पाकिस्तान के टीवी दर्शक सबसे ज्यादा जो ग़ैर-मुल्की चैनल देखतें हैं उनमें हिंदुस्तानी चैनल सबसे आगे हैं.

पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियां चीन, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से आने-जाने वालों पर उतनी कड़ी नज़र नहीं रखतीं जितनी भारत आने-जाने वालों या भारत से आने-जाने वालों पर रखती हैं.

यही काम भारतीय एजेंसियां भी करती हैं.

पाकिस्तानी चीनी, अफ़ग़ानी और ईरानी खाना भी पसंद करते हैं लेकिन उनके किचन में रोज़ाना जो कुछ पकता है वो उत्तरी भारत के किसी भी घर के किचन मे पकता है.

पाकिस्तान में शायद ही कोई अफ़ग़ानी, चीनी या ईरानी शायर और अदीब इतना मशहूर हो जितने हिंदुस्तानी शायर या अदीब मशहूर हैं.

हर पाकिस्तानी बच्चा शाहरूख़ ख़ान, सलमान ख़ान, सचिन तेंदुल्कर और मनमोहन सिंह को जानता है.

लेकिन बहुत कम पाकिस्तानी बच्चे अफ़ग़ानिस्तान, चीन और ईरान के शीर्ष अदाकारों या खिलाड़ी या नेताओं के बारे में जानते हैं.

पाकिस्तानी एफ़एम चैनल पर बॉलीवुड संगीत चलता है. राहत फ़तह अली ख़ान और आतिफ़ असलम के बारे में ये बताना मुश्किल है कि वो भारत के ज़्यादा हैं या पाकिस्तान के.

इन सबके बावजूद पाकिस्तानी राजनेता, कमेंटेटर, टीवी ऐंकर, फ़नकार जब भी कोई लेख लिखते हैं, कोई बात करते हैं तो अफ़ग़ानिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान, ईरान को ईरान, चीन को चीन कहते हैं लेकिन भारत को भारत, इंडिया या हिंदुस्तान नहीं कहते, पड़ोसी मुल्क कहते हैं.

जैसे पारंपरिक पत्नियां और पति एक दूसरे का नाम नहीं लेते, मुन्ने के अब्बा और अजी सुनती हो कह कर गुज़ारा करते हैं.

ऐसा भला क्यों है, क्या भारत में भी पाकिस्तान को पाकिस्तान कहा जाता है या पड़ोसी मुल्क़ कह कर काम चलाया जाता है?

Wednesday, December 10, 2014

अच्छे दिन आर जस्ट राउंड द कॉर्नर

बीबीसी के संवाददाता वुसतुल्लाह खान का एक व्यंग्य आपने कल पढ़ा था. आज उन्हीं का एक और आलेख बीबीसी से साभार -



बस कुछ ही दिनों की तो बात है, आपके साथ भी वही होने वाला है जो मेरे साथ हो रहा है.

आपका बच्चा भी मेरे सबसे छोटे बालक की तरह आपका ज्ञान आप ही के सिर पर पटक देगा.

मेरी पीढ़ी को इसी इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में ये पढ़ाया गया था कि हमारा इतिहास मोहन जोदड़ो से शुरू होता है.

पर आज मेरा बालक अपनी किताब खोलते हुए कहता है, बाबा आपको इतना भी नहीं पता कि हमारा इतिहास मोहम्मद बिन कासिम से शुरू होता है.

मेरी पीढ़ी को पढ़ाया गया कि मानव को वर्तमान शरीर में आने तक लाखों वर्ष लगे.

मेरा बच्चा ये बात सुनकर कहता है, बाबा क्या आप वाकई मुसलमान हैं, आपको किसी ने नहीं बताया कि अल्लाह मियाँ ने एक मिट्टी का पुतला बनाकर उसमें आत्मा डाली और फिर उसे पृथ्वी पर भेज दिया...ये देखिए ये लिखा है मेरी पुस्तक में.

कब बना पाकिस्तान?

मेरी पीढ़ी को पढ़ाया गया कि पाकिस्तान १९४७ में बना.

मेरा बच्चा झुंझलाते हुए कहता है...बाबा आपको बीबीसी में किसने नौकरी दे दी...हमारे मास्टर साहब कहते हैं पाकिस्तान उसी दिन बन गया था जिस दिन इस उप-महाद्वीप में पहला आदमी मुसलमान हुआ.

अगर आपका बेटा या पोता आने वाले दिनों में आपसे पूछे कि मोटरकार किसने ईज़ाद की तो फट से किसी जर्मन कार्ल बेंज़ का नाम न ले बैठिएगा, वो फौरन अपनी क्लास में पढ़ाई जाने वाली दीनानाथ बत्रा की पुस्तक खोलकर दिखा देगा कि अब्बा जी, पहली कार महाभारत के युग में एक महान ऋषि ने बनायी थी.

'कथा-वथा'


और ख़बरदार, कभी अपने बच्चे को नहीं बताइएगा कि आर्य कौन थे और कहाँ से आए थे, वरना वो आपको आत्म-विश्वास के साथ समझाएगा कि आर्य-वार्य कुछ नहीं होता, हम लोग इस जगत के जन्म से भी पहले से भारतवासी हैं.

और ध्यान रखिएगा कि रामायण या महाभारत सुनाते समय कहीं मुँह से कथा का शब्द न निकल पड़े.
वरना मेरी ज़िम्मेदारी नहीं अगर बालक, इंडियन काउंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर सुदर्शन राव के अनुसंधानिक विचार मुँह पर न दे मारे, कि बाबा जी आपने क्या पूरा जीवन भांड़ झोका जो ये तक नहीं मालूम की रामायण और महाभारत में जो भी है वो कथा-वथा नहीं बल्कि जैसा प्राचीन समय में हुआ वैसा ही बताया गया है, उपन्यास तो अभी १००-२०० बरस पहले ही पश्चिम में आया.

'गंदे लोग'


मैंने अपने लाड़ले सुपुत्र को जब बताया कि मेरी क्लास में दो हिंदू, एक ईसाई और चार-पाँच अहमदी बच्चे भी पढ़ते थे और हम सब एक साथ परीक्षा की तैयारी करते थे तो मेरे बेटे ने इस पर ध्यान देने के बजाय ये पूछा कि फिर तो आप लोग साथ बैठकर खान-पान भी करते होंगे.

मैंने कहा, हाँ करते थे, इसमें क्या मसला है....तौबा-तौबा बाबा आप कितने गंदे हैं...मेरी क्लास में तो बस एक अहमदी लड़का है मगर हम तो उससे हाथ भी नहीं मिलाते.

आप बिल्कुल चिंतित न हों, आपका बच्चा या पोता भी साल-दो साल बाद ऐसा ही बताया करेगा कि बाबा हमारी क्लास में दो ईसाई और तीन मुसलमान बच्चे भी हैं पर हममें से कोई भी उनसे हाथ नहीं मिलाता.

... ये लोग गंदे होते हैं ... है न बाबा ...

अच्छे दिन बस नुक्कड़ पर ही तो हैं...