Showing posts with label सैक्सोफोन. Show all posts
Showing posts with label सैक्सोफोन. Show all posts

Sunday, December 14, 2014

रीपोस्ट - मनोहारी सिंह का इंटरव्यू - अंतिम भाग

(पिछली क़िस्त से आगे)


क्या आपने कभी हेमंत कुमार के साथ भी काम किया?

हां, मुझे उनके कुछ गानों में बांसुरी और मैन्डोलिन बजा चुके होने की याद है. दरअसल उनके एक बांग्ला गीत में मैंने क्लैरिनेट बजाया था.

आपने शंकर-जयकिशन के साथ कई बार काम किया. उनका अल्बम ‘जैज़ रागा’ किस बारे में था?

मेरा ख़याल है एच.एम.वी. ने जयकिशन से एक जैज़ अल्बम कम्पोज़ करने को कहा था. उन्होंने रईस खान, सुमंत राज, दिलीप नायक और मुझे इस अल्न्बम के लिए साथ काम करने को बुलावा भेजा.

उषा खन्ना, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे कम्पोज़र्स के साथ अपने समय को आप कैसे याद रखना चाहेंगे?

हां, मैंने इन सभी के साथ काम किया. इन प्रतिभावान लोगों के साथ काम करना शानदार था. मैंने रविन्द्र जैन के साथ भी काम किया और उनकी फ़िल्म ‘चोर मचाये शोर’ के लिए म्यूजिक अरेंजर का काम किया. हालांकि मैं उनके साथ काफ़ी काम नहीं कर पाया ... मैं और चीज़ों में व्यस्त हो गया था और रविन्द्र जैन का संगीत समय के साथ बदल गया था ...

आपने अपने एक पुराने इंटरव्यू में कहा था कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के कम्पोज़ किये ‘अमीर गरीब’ के गाने “मैं आया हूँ” का सैक्सोफोन पीस बजाना आपके लिए सबसे बड़ी चुनौती था...

हां, मैं इस बात को कहना चाहूँगा कि उस शानदार कम्पोजीशन में उस सैक्सोफोन पीस को बजा पाना बेहद संतुष्ट करनेवाला था. वह मेरे दिल के बेहद करीब हमेशा एक अमर कृति रहेगी.

बाद के कम्पोज़रों जैसे बप्पी लाहिरी, राजेश रोशन, हेमंत भोसले और राम-लक्ष्मण के बारे में कुछ बताइये.

मुझे इन सब के साथ काम करने में मज़ा आया है. सच बात तो यह है कि बप्पी लाहिरी के संगीत के लिए हम शुरुआती अरेंजर थे.

‘सदमा’ के लिए दक्षिण भारतीय उस्ताद इलियाराजा ने आर.डी. बर्मन के संगीतकारों को लिया था ...

मैंने उनके साथ भी काम किया – न सिर्फ़ ‘सदमा’ में बल्कि कुछेक तमिल फिल्मों में भी. मेरे लिए वे एक सम्पूर्ण संगीत निर्देशक रहे हैं जिन्हें हर साज़ की रेंज मालूम रहती है और उन साजों के लिए नोटेशंस लिखना भी उन्हें आता है. सचमुच वे एक महान संगीतकार हैं.

अपने समय के किन साथी संगीतकारों के लिए आपके मन में आदर का भाव है?

हमारे समय में एक से एक संगीतकार थे. उन सब के लिए मेरे भीतर बहुत आदर है – ट्रम्पेट पर जॉर्ज, गिटार पर भूपिंदर, और अकॉर्डियन पर केरसी लार्ड का नाम सबसे पहले जेहन में आ रहा है.

क्या आपके बच्चों में से किसी ने संगीत को चुना?

मेरा सबसे बड़ा बेटा वायोलिन बजाया करता था. छोटा वाला कीबोर्ड बजाता है. लेकिन वे हिन्दी फ़िल्म संगीत में कहीं नहीं पहुँच पाए.


Saturday, December 13, 2014

रीपोस्ट - मनोहारी सिंह का इंटरव्यू - 5

(पिछली क़िस्त से आगे)


आप एस.डी. बर्मन के भी बहुत नज़दीकी थे. बर्मनदा की कम्पोजिंग की शैली कैसी थी? पंचम की शैली पर उनका कितना प्रभाव था?

दोनों की शैलियाँ बहुत अलग थीं. बर्मनदा पर लोकसंगीत और प्रकृति का गहरा असर था; हालांकि उन्होंने प्रकृति से प्रेरित अपने संगीत को नए रंग देने की कोशिश की. एक दफ़ा प्राकृतिक सूत बनाने में निकलने वाली आवाज़ से वे इतने प्रभावित हुए कि वे उन्हीं आवाज़ों को अपनी गीतों में इस्तेमाल करना चाहते थे.

पंचम की साउंड रेकॉर्डिंग की शानदार क्वालिटी का राज़ क्या था?

पंचम की साउंड रेकॉर्डिंग का गहरा ज्ञान था. वे सारे सेशंस में बैठा करते थे और बैलेंसिंग का काम भी किया करते थे. वांछित साउंड क्वालिटी पाने के लिए वे बहुत ज़्यादा मशक्कत करते थे.

सलिलदा और उनकी कम्पोज़ीशन्स के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

सलिलदा भी एक महान आदमी थे. उन्हें संगीत का इतना ज्ञान था और इतनी ज़्यादा सूचनाएं. वे बहुत पढ़े-लिखे थे – दरअसल वे डबल ग्रेजुएट थे. वे बहुत उम्दा कहानीकार भी थी और मैं समझता हूँ उन्हें अपनी प्रतिभा के लिए कहीं ज़्यादा पहचान  मिलनी चाहिए थी ...

ओ.पी. नैयर के साथ भी आप लम्बे समय तक रहे. इस की शुरुआत कब और कैसे हुई?

अरेंजर सेबेस्टियन ने मुझे शंकर-जयकिशन की ‘जंगली’ के टाइटिल म्यूजिक और ‘प्रोफ़ेसर’ के लोकप्रिय गीत “आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ” के लिए बजाने का प्रस्ताव दिया. हमारी गहरी छनती थी और मेरी वादन शैली के वे बड़े फैन थे. १९६० के दशक के शुरू में उन्होंने ही मुझे नैयर साहब से मिलवाया था.

एक कम्पोज़र के तौर पर आप नैयर साहब को कैसे देखते हैं?

नैयर साहब का संगीत सबसे ऊंचे रूमानी मेयार का था. हालांकि उनके संगीत में पंजाबी रंग खासा था पर मूलतः वह भारतीय संगीत था. उनका संगीत युवाओं के लिए तैयार किया गया था और वह हमेशा जवान बना रहेगा.
नैयर साहब अपने संगीतकारों से कितना प्यार करते थे, इस बारे में कई किस्से प्रचलित हैं. क्या सचमुच ऐसा था?

हाँ. वे सबके सामने अपने संगीतकारों की तारीफ़ करते हुए कहते थे “ये मेरे गहने हैं”. यही कोई तीन साल पहले उन्होंने मंच पर मुझे और केसरी लार्ड को याद करते हुए कहा “ये वो लोग हैं जिन्होंने मेरे संगीत को सजाया.” उनके मन में संगीतकारों के लिए गहरी संवेदना थी और वे हमेशा मानते थे कि उनकी सफलता के लिए वे बेहद अहम हैं.

रोशन और मदनमोहन जैसे कम्पोज़रों के साथ काम करने की आपकी क्या यादें हैं?

रोशन और मदनमोहन के साथ मैंने कई गानों में बजाया. दोनों की संगीत-शैलियाँ अलहदा थीं. दोनों ने उच्च कोटि का विशुद्ध भारतीय संगीत दिया. दोनों अपनी रचनाओं में ख़ास लेकिन छोटी छोटी चीज़ों को जगह देते थे जो उनके संगीत को परिभाषित करती थीं.

आपने रवि और चित्रगुप्त के साथ भी काम किया ...

इनके साथ भी मैंने ख़ूब काम किया. ‘वक़्त’ का गाना “आगे भी जाने न तू” उन दिनों खासा लोकप्रिय हुआ था. मैंने एन. दत्ता के लिए भी संगीत अरेंज किया था हालांकि मुझे किसी फ़िल्म का नाम याद नहीं आ रहा.


(जारी, अगली क़िस्त में समाप्य)     

Friday, December 12, 2014

रीपोस्ट - मनोहारी सिंह का इंटरव्यू - 4


(पिछली क़िस्त से आगे)

बाद में आपने बासुदा से साथ टीम बनाई और ‘सबसे बड़ा रुपैय्या’ और ‘चटपटी’ जैसी फिल्मों का संगीत किया. एक कम्पोज़र, अरेंजर और असिस्टेंट म्यूजिक डायरेक्टर के बीच क्या अंतर है?

कम्पोजर गाने का पूरा स्केच तैयार करता है; यानी उसका पूरा कैनवास. असिस्टेंट्स अपने अपने हिस्से की मदद मुहैय्या करते हैं. संगीत निर्माण के वक़्त जो सिटिंग टीम होती है, उसका वे हिस्सा होते हैं. अरेंजर का काम होता है नोटेशन लिखना और गाने को एक संरचना देने के लिए ज़रूरी तत्व जोड़ना. आप कह सकते हैं कि वह गीत का सज्जाकार होता है. प्रभावी रूप से सारे के सारे किसी रचनात्मक काम में लगे रहते हैं और सभी को कम्पोज़र कहा जा सकता है.

आर.डी. बर्मन के साथ आपका लम्बा जुड़ाव क्या उनकी पहली फ़िल्म ‘छोटे नवाब’ से शुरू हुआ था?

नहीं, ‘छोटे नवाब’ में मैंने बांसुरी और सैक्सोफोन बजाये थे. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उसके अरेंजर थे. पंचम की दूसरी फ़िल्म ‘भूत बंगला’ से मैंने अरेंजर के तौर पर अपनी पारी शुरू की. हालांकि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल फ़िल्म के आधिकारिक अरेंजर थे, मैंने टाइटिल सांग के लिए संगीत अरेंज किया था.

पंचम के साथ आपकी ट्यूनिंग इतनी ख़ास किस वजह से बन सकी?

पंचम मुझे एक प्रतिभावान और जानकार संगीतकार मानते थे. मुझे पा लेने की उन्हें ख़ुशी थी. और हमने क्या बेहतरीन टीम तैयार की – मारुती राव, बासु, मैं, केसरी लार्ड, भूपिंदर सिंह, देवीचंद चौहान, भानु गुप्ता, टोनी वाज़, होमी मुल्लन, सुनील कौशिक, रमेश अय्यर, रंजीत गाजमेर और बाकी. अधिकतर सिटिंग्स में हम सब साथ होते थे.  

पंचम गाने कैसे बनाते थे?

गानों की सिचुएशन्स के लिए हम सिटिंग्स किया करते थे. निर्देशक सिचुएशन समझा दिया करते थे – रोमांस, डांस, कैबरे वगैरह; हम ज़रुरत के हिसाब से संगीत तैयार करते थे. यह मेरे एच.एम.वी.. सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और नाईट-क्लबों में हासिल किया गया अनुभव था कि मैं अलग अलग सिचुएशन के गाने के लिए कुछ न कुछ अर्थपूर्ण तत्व जोड़ पाता था. जाने-माने संगीतकार और अरेंजर केसरी लार्ड आज भी याद करते हैं कि नाईट-क्लबों का मेरा लम्बा अनुभव किस तरह अरेंजिंग के मेरे कौशल को, खासतौर पर ब्रास सैक्शन में, पैना बनाता था.    

पंचम की कम्पोजीशन की शैली के बारे में आप क्या सोचते हैं? एक कम्पोज़र के तौर पर उनकी क्या ताकतें थीं?

पंचम एक अच्छे प्रतिभावान कम्पोज़र थे. उन्होंने कितनी महान धुनें बनाईं. उनके भीतर एक ख़ास कम्पोजिंग प्रतिभा थी. वे अपनी गानों में हमेशा कुछ नया करना चाहते थे. वे सुनिश्चित करते थे कि उनके गानों में उनका ट्रेडमार्क पंचम “पंच” होना चाहिए. मिसाल के लिए मादल के एक नोट का इस्तेमाल या गाने में सीटी का एक टुकड़ा या या अलग अलग धुनों के पैटर्नों को आपस में गूंथ देना एक गाने के लिए तीन या चार तबले ... ये सब उनके आइडिया होते थे!  साथ ही उनकी धुनें भी शानदार होती थी. मुझे कहना नहीं चाहिए पर कुछ कम्पोजर पंचम पर ‘वेस्टर्न’ होने का ग़लत ठप्पा लगाते थे जो ठीक नहीं था. पूरी तरह से भारतीय गीत रचने में भी उन्हें वैसी ही महारत हासिल थी. आप ‘अमर प्रेम’, ‘आंधी’ या ‘महबूबा’ (“मेरे नैना सावन भादों”) जैसी फिल्मों के गीत देखिये. यह कहने का किसी को हक़ नहीं कि वे ‘वेस्टर्न’ कम्पोज़र थे. आज सारी इंडस्ट्री उनसे प्रेरणा लेती है. यह दिखाता है कि वे अपने समय से बीस साल आगे के आदमी थे. और सबसे बड़ी बात यह है कि उनके गाने आज भी वैसे ही ताज़गीभरे हैं.    

 (जारी)     


Thursday, December 11, 2014

रीपोस्ट - मनोहारी सिंह का इंटरव्यू - 3

(पिछली क़िस्त से आगे)


उन दिनों आप म्यूजिक अरेंजिंग का काम भी कर रहे थे?

‘इंसान जाग उठा’ के बाद मैं बासु चटर्जी के साथ एस. डी. बर्मन का आधिकारिक अरेंजर बन गया. हाँ धुनें बर्मनदा ही बनाया करते थे. साथ साथ मैंने ‘सोलवां साल’ ‘बात एक रात की’ और १९६५ की लैंडमार्क फ़िल्म ‘गाइड’ का संगीत भी अरेंज किया.

क्या लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल बर्मनदा की टीम के नियमित संगीतकार थे?

लक्ष्मीकांत थे. प्यारेलाल कभी कभी टीम का हिस्सा बनते थे. मुझे एक घटना अब तक याद है. ‘माया’ फ़िल्म में सलिलदा के गीत ‘जा रे उड़ जा रे पंछी’ में मेरे बांसुरी और सैक्सोफोन पीसेज सुनने के बाद प्यारेलाल जी ने मुझे सौ रूपये का नोट दिया था. ख़ुद प्यारेलाल उस गीत में ग्रुप वायोलिनिस्ट के तौर पर शामिल थे.

आपने जयदेव जी का ज़िक्र किया था. एस. डी. बर्मन के सहायक के रूप में उनकी क्या भूमिका होती थी?

वे अन्य संगीतकारों जैसे सुमंत राज, लक्ष्मीकांत और पंचम के साथ संगीत निर्माण में सहयोग दिया करते थे

‘काला बाज़ार’ का गीत “न मैं धन चाहूं” मुझे काफ़ी कुछ जयदेव जी का बनाया लगता है ...

आप सही कह रहे हैं. गीत की धुन और कम्पोजीशन दोनों जयदेव जी के थे. उनकी धुनों को हम ‘जलेबी’ कहा करते थे क्योंकि उनमें इतने सारे घुमाव और मोड़ होते थे. लेकिन वे क्या शानदार संगीतकार थे! बेहतरीन!

एक साधारण श्रोता के लिए हमें बताइये कि सैक्सोफोन में ऑल्टो, टेनर और सोप्रानो के बीच क्या फर्क है.

ऑल्टो का इस्तेमाल धुन को भिगोने लिए होता है. सोप्रानो ऑल्टो से एक ओक्टेव ऊंचा होता है जबकि टेनर एक ओक्टेव नीचे. सोप्रानो सैक्सोफोन आमतौर पर सीधे होते हैं लेकिन कभी कभार उनकी गर्दन तनिक मुड़ी हुई होती है. ऑल्टो सैक्सोफोन छोटे और हलके होते हैं जबकि टेनर सैक्सोफोन बड़े और भारी. टेनर सैक्सोफोन की आवाज़ गहरी और भारी होती है. हालांकि तीनों का इस्तेमाल मैलोडी इंस्ट्रूमेंट्स की तरह होता है, उन्हें संगीत की वांछित रेंज के हिसाब से छांटा जाता है खासतौर पर जैज़ में. तीनों का इस्तेमाल सोलो पीसेज बजाने में भी किया जा सकता है.

क्या आप तीनों को बजाते थे?

हाँ, शुरू में. ‘शोले’ के “महबूबा महबूबा” और ‘रॉकी’ के “क्या यही प्यार है” जैसे गानों में आप मेरा सोप्रानो सैक्सोफोन सुन सकते हैं. उन दिनों मैं मुख्य सोप्रानो सैक्सोफोन प्लेयर हुआ करता था. अब मैं ज़्यादातर ऑल्टो सैक्सोफोन बजाता हूँ. पिछले कई सालों से श्यामराज एक उस्ताद टेनर सैक्सोफोन वादक हैं

क्या ट्रौमबोन, ट्रम्पेट और सैक्सोफोन आपस में बहुत ज़्यादा फर्क होते हैं?

हाँ, उनसे निकलने वाली आवाज़ें फर्क होती हैं. सलिलदा इन वाद्यों का शानदार इस्तेमाल करते थे; वे इन्हें सोलो इंस्ट्रूमेंट्स के तौर पर बरतते थे. मिसाल के लिए आप ‘आनंद’ के “ज़िन्दगी कैसी है पहेली” में ट्रम्पेट की आवाज़ और ‘माया’ के “जा रे उड़ जा रे पंछी” के सैक्सोफोन की आवाज़ का अंतर पकड़ सकते हैं.

 (जारी)     


Wednesday, December 10, 2014

रीपोस्ट - मनोहारी सिंह का इंटरव्यू - 2

(पिछली क़िस्त से आगे)


बंबई आने के बारे में आपने कब सोचना शुरू किया था?

जोसेफ़ न्यूमैन १९५० में एच.एम.वी. छोड़कर ऑस्ट्रेलिया बसने चले गए थे. मैंने भी १९५२ में एच.एम.वी. से विदा ले ली लेकिन उसके पहले मेरा परिचय सलिल चौधरी और हेमंत कुमार जैसी शख्सियतों से हो चुका था. तब मैंने फुर्फो रेस्तरां जॉइन कर लिया और वायोलिन वादक स्टेनली गोम्स के साथ मिलाकर पहला भारतीय बैंड स्थापित किया.

कलकत्ता के अपने शुरुआती दिनों में मैं सलिलदा के गीतों के लिए बजा चुका था. वे मुझे बहुत पसंद करते थे और उन्होंने मुझे बंबई चलने को कहा. हालांकि मेरा मन था पर पक्का नहीं. अलबत्ता मैंने उन्हें कलकत्ता के अपने पार्टनर बासु चक्रवर्ती का नाम सुझा दिया. बासु (लोग अब उसे बासुदा के नाम से जानते हैं) तब मेरा पड़ोसी था. वह बंगाली फ़िल्मी गीतों में वायोला और चेलो बजाता था. मैं अंततः १९५८ में अपना मन बनाकर बंबई आ गया.

बंबई की आपकी सबसे शुरुआती यादें कैसी हैं?

जब मैं बंबई आया सलिलदा ने मुझे एस.डी. बर्मन, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ.पी. नैयर और नौशाद जैसे संगीतकारों से मिलवाया. लेकिन बर्मनदा पहले थे जिन्होंने मुझे अपनी फ़िल्म ‘सितारों से आगे’ (१९५८) के लिए याद किया. यह अलग बात है कि जब मैं स्टूडियो पहुंचा तो सारे गानों की रेकॉर्डिंग हो चुकी थी. बैकग्राउंड म्यूजिक बॉम्बे लैब्स में बन रहा था; मुझे उसमें बांसुरी बजाने का मौका दिया गया. वहीं मेरी मुलाक़ात जयदेव, लक्ष्मीकांत, पंचम और उस्ताद संगीतकार सुमंत राज से हुई.

धीरे-धीरे मैंने सभी कम्पोजरों को बतला दिया कि मैं सैक्सोफोन और मैन्डोलिन भी बजा लेता हूँ. एक दिन पंचम ने मुझे बर्मनदा की एक रेकॉर्डिंग के लिए बुलाया. लक्ष्मीकांत ने मुझसे कहा कि रेकॉर्डिंग के लिए मैं अपना मैन्डोलिन निकाल लूं. बॉम्बे लैब्स में फ़िल्म ‘काला पानी’ के लिए “अच्छाजी मैं हारी” की रेकॉर्डिंग चल रही थी. आपको याद होगा इस गाने के पहले स्टेन्जा इंटरलूड  में दो मैन्डोलिन बजते हैं. एक मेरा बजाया हुआ है दूसरा लक्ष्मीकांत का. इसी दौरान मैंने ‘काला बाज़ार’ फ़िल्म के “सच हुए सपने तेरे मेरे” गीत के लिए सैक्सोफोन और मैन्डोलिन बजाया. जो भी हुआ हो इस पीस पर लोगों का ज़्यादा ध्यान नहीं गया. लेकिन अब मुझे सैक्सोफोन बजाने के लिय्मित मौके मिलने लगे थे.

क्या उस ज़माने के या उसके पहले के किसी सैक्सोफोन वादक ने आप पर प्रभाव डाला था?

हाँ मुझे रामसिंह के सैक्सोफोन वादन से बहुत प्रेरणा मिली. रामसिंह अनिल बिस्वास के सहायक के बतौर काम करते थे. उनके ओब्लिगादो पीसेज और सोलो सैक्सोफोन वादन ने मुझ पर गहरा असर डाला.

आपके शुरुआती दिनों में कौन सी फ़िल्म या गीत आपके हिसाब से आपका सबसे बड़ा ब्रेक मानी जाएगी?

बर्मनदा मुझे अधिक से अधिक मौके देने लगे थे और मेरा पहला सोलो सैक्सोफोन वादन ‘लाजवंती’ के गीत ‘गा मेरे मन गा” के लिए था. गाना दादर के रमन स्टूडियो में रेकॉर्ड हुआ था. आप इस पीस को गाने के दोनों अंतरों में सुन सकते हैं. इस पर हर किसी का ध्यान गया, लक्ष्मीकांत ने खासतौर पर इसे याद रखा.

कल्याणजी-आनंदजी की ‘सट्टा बाज़ार’ के गाने “तुम्हें याद होगा” के लिए मुझे बुलाया गया. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उनके सहायक थे. रिहर्सल श्री साउंड रेकॉर्डिंग स्टूडियो में चल रही थी. गाने से लक्ष्मीकांत बहुत ख़ुश नहीं थे और उन्होंने हम सब को अगले दिन महबूब स्टूडियो बुलवाया. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं रिहर्सल का पीस सोलो बजाकर दिखाऊँ. सोलो पीस बजाने का मेरा बहुत मन था पर मैंने उनसे पूछा कि क्या ऐसा संभव होगा. उन्होंने मेरा हौसला बढाते हुए कहा कि वे बाकी लोगों को मना लेंगे. जब पीस रेकॉर्ड हो रहा था लक्ष्मीकांत ने प्यारेलाल को रोक कर कहा कि अब मैं सोलो बजाऊंगा. मेरा वह सोलो रातोंरात हिट हुआ और संगीतकार के रूप में मेरे करियर के लिए वह एक बड़ा मरहला था. उसने फ़िल्म संगीत का समूचा संसार मेरे लिए खोल दिया.

(जारी)     


Tuesday, December 9, 2014

रीपोस्ट - मनोहारी सिंह का इंटरव्यू - 1


मनोहारी सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. संगीतप्रेमी उनके बजाए गीतों को कभी भूल नहीं सकते. चाहे सैक्सोफोन हो या पश्चिमी बांसुरी या क्लैरिनेट या मेंडोलिन, इन वाद्यों के साथ जिस तरह का जादुई बर्ताव मनोहारी दादा ने किया, भारतीय फ़िल्मी संगीत में वह अद्वितीय है. वे देश के सबसे बड़े सैक्सोफोन वादक के तौर पर स्थापित हुए.

८ मार्च १९२९ को जन्मे मनोहारी १९५८ में बंबई आए और उसी साल उन्होंने एस.डी. बर्मन की ‘सितारों से आगे’ का बैकग्राउंड स्कोर कम्पोज़ किया.

१३ जुलाई २०१० को उन्होंने अपनी अंतिम साँसें ली थीं.

उनकी मृत्यु से कुछ समय पहले शंकर अय्यर ने उनका यह इंटरव्यू लिया था.

हमें अपने बचपन के बारे में बताइये. और यह कि संगीत ने आपको सबसे पहले कब आकर्षित किया?

मैं पश्चिमी बंगाल के हुगली जिले में संगीतकारों के एक घर में पैदा हुआ और वहीं मेरी परवरिश हुई. मेरे पिता भीम बहादुर सिंह ब्रिटिश ज़माने में पुलिस बैंड में बांसुरी और बैगपाइप बजाया करते थे. मेरे मामा क्लैरिनेट बजाते थे और मेरे पिता भी. मेरे दादाजी ट्रम्पेट वादक थे और म्यूजिक ऑपेराओं में हिस्सा लेते थे.

हालांकि मैं शुरू में स्कूल गया लेकिन पढाई में मेरा मन नहीं लगता था. हमारे घर में एक की-फ्लूट होती थी. छः साल की आयु में मैंने उस पर कुछ बेसिक धुनें बजाने की कोशिश की. दादाजी हफ़्ते में एक बार हमारे घर आया करते थे. उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और बांसुरी बजाने के लिए मुझे बाकायदा पैसा भी इनाम में दिया. इस से उत्साहित होकर मैंने की-फ्लूट सीखना शुरू कर दिया.

क्या आप अपनी बनाई धुनें बजाया करते थे?

कुछ मेरी अपनी थीं कुछ अंग्रेज़ी धुनों से प्रभावित थीं. इन्हें बैंड में बजाया जाता था. हम किस्मत वाले थे कि इन बैंड्स को लाइव सुन सकते थे. मेरे पिताजी अच्छे संगीतकार तो थे ही उन्हें नोटेशन लिखने में भी महारत थी. उन्होंने बांसुरी की जटिलताओं के साथ साथ मुझे नोटेशन पढ़ना भी सिखाया. धीरे धीरे मैंने सीखना शुरू कर दिया और दादाजी के घर आने पर मेरा हौसला कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाता था.

अपनी प्रतिभा को संवारने के लिए आपने और क्या किया?

मेरे चाचा और मामा तब के कलकत्ता के बाटानगर की बाटा शू कम्पनी के ब्रास बैंड में हिस्सेदारी किया करते थे. मेरे चाचा ने बैंड के कंडक्टर हंगरी के रहनेवाले जोसेफ़ न्यूमैन से मुझे मिलवाया. १९४२ में मुझे ३ रुपये हफ़्ते की तनख्वाह पर नौकरी मिल गयी और मैं १९४५ तक वहां रहा.

बैंड में अमूमन चेकोस्लोवाकिया का शास्त्रीय संगीत बजाया जाता था. मैंने न्यूमैन से बहुत सीखा. उन्होंने मुझे पियानो तक बजाना सिखाया. यह दौर दिन-रात अभ्यास करने का था. मुझे दो कंसर्ट्स में हिस्सा लेने की याद है जिसमें जोसेफ़ के पिता, जो एक शानदार ज़ाईलोफ़ोन वादक थे, ने भी बजाया था. मैं पिकोलो और पोल्का जैसे वाद्य बजाया करता था. यह बाटानगर में बिताए दिनों की बदौलत हुआ कि नोटेशंस पढ़ने और बजाने की मेरी बुनियाद खासी मज़बूत हो गयी.

१९४५ में जोसेफ़ न्यूमैन ने एच.एम.वी. जॉइन की और उन्हें बाटानगर का ब्रास बैंड छोड़ना पड़ा. वे मुझे और मेरे मामाओं-चाचाओं को अपने साथ ले गए. उन्होंने मुझ छोकरे की संगीत प्रतिभा पर भरोसा किया और उन्हें विश्वास था कि अधिक अभ्यास से मैं बेहतर होता जाऊंगा.

एच.एम.वी. के साथ वाले इन दिनों में मैंने बंगाली और हिन्दी गाने बजाना शुरू किया. नोटेशंस पढ़ने और बजाने के पिछले अभ्यास के कारण कलकत्ता में बीते मेरे आठ साल बहुत आनंददायक रहे. वहीं कलकत्ता सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा भी था जहाँ बीथोवन, मोत्ज़ार्ट, बाख़ और चाइकोवस्की जैसे दिग्गजों की कम्पोज़ीशन्स बजाई जाती थी. यहीं पर अत्यंत प्रतिभावान संगीतकारों की संगत में मेरा संगीत-ज्ञान और निखरा. इनमें विख्यात वायोलिन वादक स्टेनली जेम्स थे. ऑर्केस्ट्रा के कंडक्टर एक फ्रेंच सज्जन थे डॉ. सनरे और उनके सहायक थे फ्रांसेस्को कैसानोवा.

अच्छा वही मशहूर कैसानोवा जिन्होंने पंकज मालिक के “याद आये कि न आये तुम्हारी” का संगीत अरेंज किया था! कलकत्ता के उन दिनों के बारे में हमें और बताइये.

हम लोग एच.एम.वी. में हफ़्ते में दो दिन बजाते थे. जोसेफ़ न्यूमैन कई संगीत निर्देशकों जैसे कमल दासगुप्ता, एस.डी. बर्मन, तिमिर बरन और पंडित रविशंकर के लिए संगीत अरेंज करते थे. हम उनकी नोटेशंस बजाते थे; यह काम डमडम के मशहूर स्टूडियो में संपन्न होता था. बाकी समय मैं कलकत्ता सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा में बांसुरी और पिकोलो बजाया करता था.

कलकत्ता में और उसके आसपास कई सारे संगीतकार हुआ करते थे. कलकत्ता सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा में गवर्नर बैंड के अलावा बहुत सारे प्रतिभाशाली नाईट-क्लब संगीतकार हिस्सेदारी करते थे. संगीत का स्तर बहुत ऊंचा हुआ करता. फ्रांसेस्को कैसानोवा कलकत्ता के एक नाईट-क्लब रेस्तरां फुर्फो में एक स्पेनिश बैंड की अगुवाई किया करते थे. वे खासे विख्यात बांसुरीवादक थे. उन्हें मैं पसंद था और उन्होंने मुझे की-फ्लूट बजाने की बारीकियों से परिचित कराया. जिस तरह के अलग अलग मौके मुझे मिल रहे थे, वे मेरे पथप्रदर्शक बने रहे. उनकी वजह से वाद्यों को बजाने की मेरी प्रतिभा लगातार निखरी. बाद में जब मैं कलकत्ते में रहने लगा, मैंने तमाम नाईट-क्लबों और सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा में नियमित रूप से ख़ूब बजाया.

आपने सैक्सोफोन बजाना सबसे पहले कब शुरू किया? क्योंकि अब तो आपका नाम सबसे ज़्यादा इसी के साथ जोड़ कर देखा जाता है.

नाईट-क्लबों में बजानी की मेरी इच्छा ने मुझे सैक्सोफोन बजाना सीखने को प्रेरित किया. जैसा मैंने बताया मुख्य कलकत्ता में आने के बाद मुझे कई नाईट-क्लब संगीतकारों को सुनने का अवसर मिला. बेनी गुडमैन और आर्टीसियो जैसे कुछ नाम याद आ रहे हैं. मेरे दूर के रिश्ते के दो चाचा भी कलकत्ता के कई बैंड्स में संगीतकार थे. ग्रैंड होटल कलकत्ता में कई बैंड्स के साथ काम कर चुके तेग बहादुर (ख्यात संगीतकार लुई बैंक्स के पिता) एक शानदार ट्रम्पेट प्लेयर थे. वे जॉर्जी बैंक्स के नाम से बजाया करते थे. दुसरे चाचा बॉबी बैंक्स थे. इन चाचाओं के कारण नाईट-क्लबों में बजाने की मेरी इच्छा बलवती होती गयी.

मैंने सैक्सोफोन के साथ ज़्यादा समय बिताना शुरू कर दिया. बांसुरी और क्लैरिनेट बजाना मैं पहले ही सीख चुका था. करीब साल भर-छः महीने में मैं ठीकठाक सैक्सोफोन बजाने लगा. धीरे-धीरे मैं सांस के नियंत्रण और अन्य बारीकियों पर काम करने लगा.

मुझे नाईट-क्लबों में सैक्सोफोन बजाने के मौके मिलना शुरू हो गए. अंतर्राष्ट्रीय बैंड प्लेयर्स की तरह मुझे अनिवार्यतः सैक्सोफोन और क्लैरिनेट दोनों बजाने होते थे. साथ ही मैंने बंगाली फिल्मों के लिए बजाना भी शुरू कर दिया – कभी बांसुरी, कभी सैक्सोफोन तो कभी क्लैरिनेट. मुझे आर.सी. बोराल, पंकज मालिक, नचिकेता घोष, कमल दासगुप्ता और सुधीन दासगुप्ता जैसे बड़े नामों के साथ काम करने का मौका मिला.

आपको उन दिनों के कोई लोकप्रिय गीत याद हैं?

मुझे कमल दासगुप्ता के गाने की याद आ रही है अलबत्ता उसके शब्द याद नहीं.

रेस्त्राओं और नाईट-क्लबों में बजाए जाने वाले संगीत को कौन कम्पोज़ करता था?

अमूमन अमेरिका में छपा नाईट-क्लब संगीत बजता था. दुनिया भर के नाईट-क्लबों में बजाए जाने वाले और ज़्यादातर जैज़ विधा से सम्बंधित पीसेज़ बजाए जाते थे. हमारी भूमिका नोटेशन को पढ़ने और बजाने की होती थी. कभी कभार हमें इम्प्रोवाइज़ करने की छूट होती थी. इस सब से मुझे बहुत फायदा हुआ जिसने लम्बे समय तक मेरी सहायता की. जब मैं बंबई आया तो एस.डी. बर्मन के क्लैरिनेट प्लेयर डेनिस वाज़ और एक दूसरे मशहूर क्लैरिनेट वादक पीटर मोंसोराटे मुझ से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे सी.सी.आई. क्लब जाकर गुडी सर्वाय का बैंड जॉइन करने की सलाह दी.

(जारी)


Monday, July 22, 2013

मनोहारी सिंह का साक्षात्कार – २

(पिछली क़िस्त से आगे)


बंबई आने के बारे में आपने कब सोचना शुरू किया था?

जोसेफ़ न्यूमैन १९५० में एच.एम.वी. छोड़कर ऑस्ट्रेलिया बसने चले गए थे. मैंने भी १९५२ में एच.एम.वी. से विदा ले ली लेकिन उसके पहले मेरा परिचय सलिल चौधरी और हेमंत कुमार जैसी शख्सियतों से हो चुका था. तब मैंने फुर्फो रेस्तरां जॉइन कर लिया और वायोलिन वादक स्टेनली गोम्स के साथ मिलाकर पहला भारतीय बैंड स्थापित किया.

कलकत्ता के अपने शुरुआती दिनों में मैं सलिलदा के गीतों के लिए बजा चुका था. वे मुझे बहुत पसंद करते थे और उन्होंने मुझे बंबई चलने को कहा. हालांकि मेरा मन था पर पक्का नहीं. अलबत्ता मैंने उन्हें कलकत्ता के अपने पार्टनर बासु चक्रवर्ती का नाम सुझा दिया. बासु (लोग अब उसे बासुदा के नाम से जानते हैं) तब मेरा पड़ोसी था. वह बंगाली फ़िल्मी गीतों में वायोला और चेलो बजाता था. मैं अंततः १९५८ में अपना मन बनाकर बंबई आ गया.

बंबई की आपकी सबसे शुरुआती यादें कैसी हैं?

जब मैं बंबई आया सलिलदा ने मुझे एस.डी. बर्मन, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ.पी. नैयर और नौशाद जैसे संगीतकारों से मिलवाया. लेकिन बर्मनदा पहले थे जिन्होंने मुझे अपनी फ़िल्म ‘सितारों से आगे’ (१९५८) के लिए याद किया. यह अलग बात है कि जब मैं स्टूडियो पहुंचा तो सारे गानों की रेकॉर्डिंग हो चुकी थी. बैकग्राउंड म्यूजिक बॉम्बे लैब्स में बन रहा था; मुझे उसमें बांसुरी बजाने का मौका दिया गया. वहीं मेरी मुलाक़ात जयदेव, लक्ष्मीकांत, पंचम और उस्ताद संगीतकार सुमंत राज से हुई.

धीरे-धीरे मैंने सभी कम्पोजरों को बतला दिया कि मैं सैक्सोफोन और मैन्डोलिन भी बजा लेता हूँ. एक दिन पंचम ने मुझे बर्मनदा की एक रेकॉर्डिंग के लिए बुलाया. लक्ष्मीकांत ने मुझसे कहा कि रेकॉर्डिंग के लिए मैं अपना मैन्डोलिन निकाल लूं. बॉम्बे लैब्स में फ़िल्म ‘काला पानी’ के लिए “अच्छाजी मैं हारी” की रेकॉर्डिंग चल रही थी. आपको याद होगा इस गाने के पहले स्टेन्जा इंटरलूड  में दो मैन्डोलिन बजते हैं. एक मेरा बजाया हुआ है दूसरा लक्ष्मीकांत का. इसी दौरान मैंने ‘काला बाज़ार’ फ़िल्म के “सच हुए सपने तेरे मेरे” गीत के लिए सैक्सोफोन और मैन्डोलिन बजाया. जो भी हुआ हो इस पीस पर लोगों का ज़्यादा ध्यान नहीं गया. लेकिन अब मुझे सैक्सोफोन बजाने के लिय्मित मौके मिलने लगे थे.

क्या उस ज़माने के या उसके पहले के किसी सैक्सोफोन वादक ने आप पर प्रभाव डाला था?

हाँ मुझे रामसिंह के सैक्सोफोन वादन से बहुत प्रेरणा मिली. रामसिंह अनिल बिस्वास के सहायक के बतौर काम करते थे. उनके ओब्लिगादो पीसेज और सोलो सैक्सोफोन वादन ने मुझ पर गहरा असर डाला.

आपके शुरुआती दिनों में कौन सी फ़िल्म या गीत आपके हिसाब से आपका सबसे बड़ा ब्रेक मानी जाएगी?

बर्मनदा मुझे अधिक से अधिक मौके देने लगे थे और मेरा पहला सोलो सैक्सोफोन वादन ‘लाजवंती’ के गीत ‘गा मेरे मन गा” के लिए था. गाना दादर के रमन स्टूडियो में रेकॉर्ड हुआ था. आप इस पीस को गाने के दोनों अंतरों में सुन सकते हैं. इस पर हर किसी का ध्यान गया, लक्ष्मीकांत ने खासतौर पर इसे याद रखा.

कल्याणजी-आनंदजी की ‘सट्टा बाज़ार’ के गाने “तुम्हें याद होगा” के लिए मुझे बुलाया गया. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उनके सहायक थे. रिहर्सल श्री साउंड रेकॉर्डिंग स्टूडियो में चल रही थी. गाने से लक्ष्मीकांत बहुत ख़ुश नहीं थे और उन्होंने हम सब को अगले दिन महबूब स्टूडियो बुलवाया. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं रिहर्सल का पीस सोलो बजाकर दिखाऊँ. सोलो पीस बजाने का मेरा बहुत मन था पर मैंने उनसे पूछा कि क्या ऐसा संभव होगा. उन्होंने मेरा हौसला बढाते हुए कहा कि वे बाकी लोगों को मना लेंगे. जब पीस रेकॉर्ड हो रहा था लक्ष्मीकांत ने प्यारेलाल को रोक कर कहा कि अब मैं सोलो बजाऊंगा. मेरा वह सोलो रातोंरात हिट हुआ और संगीतकार के रूप में मेरे करियर के लिए वह एक बड़ा मरहला था. उसने फ़िल्म संगीत का समूचा संसार मेरे लिए खोल दिया.

(जारी)     


Sunday, July 21, 2013

मनोहारी सिंह का साक्षात्कार – १


मनोहारी सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. संगीतप्रेमी उनके बजाए गीतों को कभी भूल नहीं सकते. चाहे सैक्सोफोन हो या पश्चिमी बांसुरी या क्लैरिनेट या मेंडोलिन, इन वाद्यों के साथ जिस तरह का जादुई बर्ताव मनोहारी दादा ने किया, भारतीय फ़िल्मी संगीत में वह अद्वितीय है. वे देश के सबसे बड़े सैक्सोफोन वादक के तौर पर स्थापित हुए.

८ मार्च १९२९ को जन्मे मनोहारी १९५८ में बंबई आए और उसी साल उन्होंने एस.डी. बर्मन की ‘सितारों से आगे’ का बैकग्राउंड स्कोर कम्पोज़ किया.

१३ जुलाई २०१० को उन्होंने अपनी अंतिम साँसें ली थीं.

उनकी मृत्यु से कुछ समय पहले शंकर अय्यर ने उनका यह इंटरव्यू लिया था.

हमें अपने बचपन के बारे में बताइये. और यह कि संगीत ने आपको सबसे पहले कब आकर्षित किया?

मैं पश्चिमी बंगाल के हुगली जिले में संगीतकारों के एक घर में पैदा हुआ और वहीं मेरी परवरिश हुई. मेरे पिता भीम बहादुर सिंह ब्रिटिश ज़माने में पुलिस बैंड में बांसुरी और बैगपाइप बजाया करते थे. मेरे मामा क्लैरिनेट बजाते थे और मेरे पिता भी. मेरे दादाजी ट्रम्पेट वादक थे और म्यूजिक ऑपेराओं में हिस्सा लेते थे.

हालांकि मैं शुरू में स्कूल गया लेकिन पढाई में मेरा मन नहीं लगता था. हमारे घर में एक की-फ्लूट होती थी. छः साल की आयु में मैंने उस पर कुछ बेसिक धुनें बजाने की कोशिश की. दादाजी हफ़्ते में एक बार हमारे घर आया करते थे. उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और बांसुरी बजाने के लिए मुझे बाकायदा पैसा भी इनाम में दिया. इस से उत्साहित होकर मैंने की-फ्लूट सीखना शुरू कर दिया.

क्या आप अपनी बनाई धुनें बजाया करते थे?

कुछ मेरी अपनी थीं कुछ अंग्रेज़ी धुनों से प्रभावित थीं. इन्हें बैंड में बजाया जाता था. हम किस्मत वाले थे कि इन बैंड्स को लाइव सुन सकते थे. मेरे पिताजी अच्छे संगीतकार तो थे ही उन्हें नोटेशन लिखने में भी महारत थी. उन्होंने बांसुरी की जटिलताओं के साथ साथ मुझे नोटेशन पढ़ना भी सिखाया. धीरे धीरे मैंने सीखना शुरू कर दिया और दादाजी के घर आने पर मेरा हौसला कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाता था.

अपनी प्रतिभा को संवारने के लिए आपने और क्या किया?

मेरे चाचा और मामा तब के कलकत्ता के बाटानगर की बाटा शू कम्पनी के ब्रास बैंड में हिस्सेदारी किया करते थे. मेरे चाचा ने बैंड के कंडक्टर हंगरी के रहनेवाले जोसेफ़ न्यूमैन से मुझे मिलवाया. १९४२ में मुझे ३ रुपये हफ़्ते की तनख्वाह पर नौकरी मिल गयी और मैं १९४५ तक वहां रहा.

बैंड में अमूमन चेकोस्लोवाकिया का शास्त्रीय संगीत बजाया जाता था. मैंने न्यूमैन से बहुत सीखा. उन्होंने मुझे पियानो तक बजाना सिखाया. यह दौर दिन-रात अभ्यास करने का था. मुझे दो कंसर्ट्स में हिस्सा लेने की याद है जिसमें जोसेफ़ के पिता, जो एक शानदार ज़ाईलोफ़ोन वादक थे, ने भी बजाया था. मैं पिकोलो और पोल्का जैसे वाद्य बजाया करता था. यह बाटानगर में बिताए दिनों की बदौलत हुआ कि नोटेशंस पढ़ने और बजाने की मेरी बुनियाद खासी मज़बूत हो गयी.

१९४५ में जोसेफ़ न्यूमैन ने एच.एम.वी. जॉइन की और उन्हें बाटानगर का ब्रास बैंड छोड़ना पड़ा. वे मुझे और मेरे मामाओं-चाचाओं को अपने साथ ले गए. उन्होंने मुझ छोकरे की संगीत प्रतिभा पर भरोसा किया और उन्हें विश्वास था कि अधिक अभ्यास से मैं बेहतर होता जाऊंगा.

एच.एम.वी. के साथ वाले इन दिनों में मैंने बंगाली और हिन्दी गाने बजाना शुरू किया. नोटेशंस पढ़ने और बजाने के पिछले अभ्यास के कारण कलकत्ता में बीते मेरे आठ साल बहुत आनंददायक रहे. वहीं कलकत्ता सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा भी था जहाँ बीथोवन, मोत्ज़ार्ट, बाख़ और चाइकोवस्की जैसे दिग्गजों की कम्पोज़ीशन्स बजाई जाती थी. यहीं पर अत्यंत प्रतिभावान संगीतकारों की संगत में मेरा संगीत-ज्ञान और निखरा. इनमें विख्यात वायोलिन वादक स्टेनली जेम्स थे. ऑर्केस्ट्रा के कंडक्टर एक फ्रेंच सज्जन थे डॉ. सनरे और उनके सहायक थे फ्रांसेस्को कैसानोवा.

अच्छा वही मशहूर कैसानोवा जिन्होंने पंकज मालिक के “याद आये कि न आये तुम्हारी” का संगीत अरेंज किया था! कलकत्ता के उन दिनों के बारे में हमें और बताइये.

हम लोग एच.एम.वी. में हफ़्ते में दो दिन बजाते थे. जोसेफ़ न्यूमैन कई संगीत निर्देशकों जैसे कमल दासगुप्ता, एस.डी. बर्मन, तिमिर बरन और पंडित रविशंकर के लिए संगीत अरेंज करते थे. हम उनकी नोटेशंस बजाते थे; यह काम डमडम के मशहूर स्टूडियो में संपन्न होता था. बाकी समय मैं कलकत्ता सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा में बांसुरी और पिकोलो बजाया करता था.

कलकत्ता में और उसके आसपास कई सारे संगीतकार हुआ करते थे. कलकत्ता सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा में गवर्नर बैंड के अलावा बहुत सारे प्रतिभाशाली नाईट-क्लब संगीतकार हिस्सेदारी करते थे. संगीत का स्तर बहुत ऊंचा हुआ करता. फ्रांसेस्को कैसानोवा कलकत्ता के एक नाईट-क्लब रेस्तरां फुर्फो में एक स्पेनिश बैंड की अगुवाई किया करते थे. वे खासे विख्यात बांसुरीवादक थे. उन्हें मैं पसंद था और उन्होंने मुझे की-फ्लूट बजाने की बारीकियों से परिचित कराया. जिस तरह के अलग अलग मौके मुझे मिल रहे थे, वे मेरे पथप्रदर्शक बने रहे. उनकी वजह से वाद्यों को बजाने की मेरी प्रतिभा लगातार निखरी. बाद में जब मैं कलकत्ते में रहने लगा, मैंने तमाम नाईट-क्लबों और सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा में नियमित रूप से ख़ूब बजाया.

आपने सैक्सोफोन बजाना सबसे पहले कब शुरू किया? क्योंकि अब तो आपका नाम सबसे ज़्यादा इसी के साथ जोड़ कर देखा जाता है.

नाईट-क्लबों में बजानी की मेरी इच्छा ने मुझे सैक्सोफोन बजाना सीखने को प्रेरित किया. जैसा मैंने बताया मुख्य कलकत्ता में आने के बाद मुझे कई नाईट-क्लब संगीतकारों को सुनने का अवसर मिला. बेनी गुडमैन और आर्टीसियो जैसे कुछ नाम याद आ रहे हैं. मेरे दूर के रिश्ते के दो चाचा भी कलकत्ता के कई बैंड्स में संगीतकार थे. ग्रैंड होटल कलकत्ता में कई बैंड्स के साथ काम कर चुके तेग बहादुर (ख्यात संगीतकार लुई बैंक्स के पिता) एक शानदार ट्रम्पेट प्लेयर थे. वे जॉर्जी बैंक्स के नाम से बजाया करते थे. दुसरे चाचा बॉबी बैंक्स थे. इन चाचाओं के कारण नाईट-क्लबों में बजाने की मेरी इच्छा बलवती होती गयी.

मैंने सैक्सोफोन के साथ ज़्यादा समय बिताना शुरू कर दिया. बांसुरी और क्लैरिनेट बजाना मैं पहले ही सीख चुका था. करीब साल भर-छः महीने में मैं ठीकठाक सैक्सोफोन बजाने लगा. धीरे-धीरे मैं सांस के नियंत्रण और अन्य बारीकियों पर काम करने लगा.

मुझे नाईट-क्लबों में सैक्सोफोन बजाने के मौके मिलना शुरू हो गए. अंतर्राष्ट्रीय बैंड प्लेयर्स की तरह मुझे अनिवार्यतः सैक्सोफोन और क्लैरिनेट दोनों बजाने होते थे. साथ ही मैंने बंगाली फिल्मों के लिए बजाना भी शुरू कर दिया – कभी बांसुरी, कभी सैक्सोफोन तो कभी क्लैरिनेट. मुझे आर.सी. बोराल, पंकज मालिक, नचिकेता घोष, कमल दासगुप्ता और सुधीन दासगुप्ता जैसे बड़े नामों के साथ काम करने का मौका मिला.

आपको उन दिनों के कोई लोकप्रिय गीत याद हैं?

मुझे कमल दासगुप्ता के गाने की याद आ रही है अलबत्ता उसके शब्द याद नहीं.

रेस्त्राओं और नाईट-क्लबों में बजाए जाने वाले संगीत को कौन कम्पोज़ करता था?

अमूमन अमेरिका में छपा नाईट-क्लब संगीत बजता था. दुनिया भर के नाईट-क्लबों में बजाए जाने वाले और ज़्यादातर जैज़ विधा से सम्बंधित पीसेज़ बजाए जाते थे. हमारी भूमिका नोटेशन को पढ़ने और बजाने की होती थी. कभी कभार हमें इम्प्रोवाइज़ करने की छूट होती थी. इस सब से मुझे बहुत फायदा हुआ जिसने लम्बे समय तक मेरी सहायता की. जब मैं बंबई आया तो एस.डी. बर्मन के क्लैरिनेट प्लेयर डेनिस वाज़ और एक दूसरे मशहूर क्लैरिनेट वादक पीटर मोंसोराटे मुझ से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे सी.सी.आई. क्लब जाकर गुडी सर्वाय का बैंड जॉइन करने की सलाह दी.

(जारी)