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Monday, July 11, 2011

आज का दिन शिव बटालवी के नाम - 3


माए नी माए मैं इक शिकरा यार बणाया
ओ ते सिर ते कलगी ते पैरी झांझ
वो चोग चुगींदा आया ...

पंजाब लोक साहित्य में प्रेमी या प्रेमी अपने प्रेम की पीड़ा को रिवायतन अपनी मांओं के साथ बांटा करते थे. उसी परम्परा में इस रचना में प्रेमी अपनी मां से कहता है कि उसने एक कबूतर को अपना यार बना लिया. और कैसा सुन्दर कबूतर! सर पे कलगी अर पैरों में घुंघरू. दाना चुगते चुगते कब उसने अपने प्रेम का जाल फैला लिया. ...

गीत में एक जगह शिव बटालवी लिखते हैं -

चूरी कुट्टां ते ओ खाओंदा नईं
ओ नू दिल दा मांस खवाया

अब क्या तो इस का अनुवाद करूं साहेबान. और काहे को. गीत सुनिए हंसराज हंस से एक दफ़ा और

आज का दिन शिव बटालवी के नाम - 2


ग़मां दी रात लम्मी ऐ ...

यानी ग़मों की रात ज़्यादा लम्बी है या मेरे गीत. न ये मनहूस रात ख़त्म होती है न मेरे गीत. ... अविस्मरणीय रचना. गायक हंसराज हंस



(फ़ोटो: शिव कुमार बटालवी का घर. बैंगनी लिबास में उनकी शरीक-ए-हयात)

आज का दिन शिव बटालवी के नाम - १


शिव कुमार बटालवी पर एक बेहतरीन परिच्यात्मक पोस्ट हमारे पुराने कबाड़ी गीत चतुर्वेदी अपने ब्लॉग वैतागवाड़ी पर कोई दो साल पहले लिख चुके हैं. वहीं से लेकर यह आलेख जस का तस यहां लगा रहा हूं. साभार. और आज दिन भर आपको शिव बटालवी के गीत सुनने को मिलेंगे. वजह. कोई ख़ास नहीं बस ऐसे ही.

हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है.

1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है. कहते हैं, एक बार पाश ने शिव का गला पकड़ लिया था, किसी मंच पर. पाश को शिव की कविता पसंद नहीं थी. ख़ैर.

शिव की बरसी पिछले सप्ताह ही बीती है। यहां शिव की एक कविता प्रस्तुत है, जो पंजाबी में ही है. शिव बहुत सुंदर था. नाम था. कविताओं की गूंज थी. कहते हैं, एक वरिष्ठ साहित्यकार की बेटी उस पर फिदा हो गई. नाराज़ होकर बाप ने लड़की को लंदन भेज दिया. तो उस 'खो गई लड़की' के लिए शिव ने यह कविता लिखी थी, जिसका असली शीर्षक है इश्तेहार. सरल-सी यह कविता सरल-सी पंजाबी में है. इसका अनुवाद मेरे बस का नहीं है, पर ऐसे भी यह समझ में आ जाती है. न आए, तो मुझे क्षमा करेंगे और बता देंगे, ताकि आगे ऐसी भूल न करूं.

एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है
सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी
गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है
ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है
वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है
हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है
ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है


इसी गीत को सुनिए हंसराज हंस की आवाज़ में -