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Thursday, February 14, 2013

सब खोल के रख दिया है मिट्ठू ने


मिट्ठू हमारे घर में

-हरीश चन्द्र पांडे 

बाहर गये हुए हैं पड़ोसी
हफ़्ते भर से मेरे घर में है पड़ोसी का मिट्ठू

चहक उठा है घर

जो दिन भर चुप्प रहा करता था वह गाना गा रहा है उसके लिए
जो बात करने के नाम पर काटने दौड़ता था वह
सीटी सिखा रहा है
घर से निकलते वक़्त सब कहने लगे हैं
अच्छा मिट्ठू जा रहा हूँ
टूटा है पिता का लम्बा अबोल
उन्होंने आज बेटा कहा है मिट्ठू से

किसके पास कितनी मिठास बची है अभी भी
सब खोल के रख दिया है मिट्ठू ने

Wednesday, February 13, 2013

यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत



यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत

- हरीश चन्द्र पांडे

यहाँ आटे की चक्की है

एक जंग लगे टिन को रगड़-रगड़
प्राइमर के ऊपर काला रंग पोत
सफ़ेद अक्षरों में लिखा गया है इसे
और टाँग दिया गया है बिजली के खम्भे के सीने पर

यहाँ आटे की चक्की है
इस इबारत के ठीक नीचे बना है एक तीर

यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत
कि ग्राहक को ठीक-ठाक पहुँचा सके चक्की तक

माना कि बड़ी सामर्थ्य है शब्द में

Tuesday, February 12, 2013

आज खुरों ने कंकड़-पत्थरों से मिल कर पहला कोरस गाया है



जंगल में एक बछड़े का पहला दिन

-हरीश चन्द्र पांडे 


आज जंगल देखने का पहला दिन है
गले में घण्टी घनघना रही है

आज चरना कम..देखना ज्यादा है
जहाँ हरापन गझिन है लपक नहीं जाना है वहीं
वहाँ मुड़ने की जगह भी है....देखना है

आज झाड़ियों से उलझ-उलझ पैने हुए हैं उपराते सींग
आज एक छिदा पत्ता चला आया है घर तक
आज खुरों ने कंकड़-पत्थरों से मिल कर पहला कोरस गाया है

आज देखी है दुनिया
आज उछल-उछल डौंरिया कर पैर हवा में तैरे हैं
और पूँछ का गुच्छ आकाश तक उठा है

आज रात...नदी की कल-कल नहीं सुनाई देगी

Monday, February 11, 2013

आदमी ने उसे देवता बना दिया


देवता

-       - हरीश चन्द्र पांडे

पहला पत्थर
आदमी की उदरपूर्ति में उठा

दूसरा पत्थर
आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा

तीसरे पत्थर ने उठने से इन्कार कर दिया

आदमी ने उसे
देवता बना दिया

Sunday, February 10, 2013

इनका पखेरुओं की तरह चुपचाप विदा हो जाना कोई नहीं जानता !



हिजड़े

-हरीश चन्द्र पांडे

ये अभी अभी एक घर से बाहर निकले हैं 
टूट गए रंगीन गुच्छे की तरह 
काजल लिपस्टिक और सस्ती खुशबुओं का एक सोता फूट पड़ा है 

एक औरत होने के लिए कपडे की छातियां उभारे
ये औरतों की तरह चलने लगे हैं 
और औरत नहीं हो पा रहे हैं 

ये मर्द होने के लिए गालियाँ दे रहे हैं 
औरतों से चुहल कर रहे हैं अपने सारे पुन्सत्व के साथ 
और मर्द नहीं हो पा रहे हैं 
मर्द और औरतें इन पर हंस रहे हैं 

सारी नदियों का रुख मोड़ दिया जाए इनकी ओर
तब भी ये फसल न हो सकेंगें 
ऋतू बसंत का ताज पहना दिया जाए इन्हें 
तब भी एक अन्कुवा नहीं फूटेगा इनके 
इनके लिए तो होनी थी ये दुनिया एक महासिफर 
लेकिन 
लेकिन ये हैं कि
अपने व्यक्तित्व के सारे बेसुरेपन के साथ गा रहे हैं 
जीवन में अन्कुवाने के गीत 
ये अपने एकांत के लिए किलकारियों की अनुगूंजें इकठ्ठा कर रहे हैं 

विद्रूप हारमोनों और उदास वल्दियत के साथ 
ये दुनिया के हर मेले में शामिल हो रहे हैं समूहों में 

नहीं सुनने में आ रही आत्महत्याएं हिजडों की 
दंगों में शामिल होने के समाचार नहीं आ रहे 

मर्द और औरतों से अटी पड़ी इस दुनिया में 
इनका पखेरुओं की तरह चुपचाप विदा हो जाना
कोई नहीं जानता !

Saturday, February 9, 2013

भीतर-भीतर पुलकता मगर मेंड़ पर संभलता, चलता-सा भी



भाई-बहन

-
हरीश चन्द्र पांडे

भाई की शादी में ये फुर्र-फुर्र नाचती बहनें
जैसे सारी कायनात फूलों से लद गई हो

हवा में तैर रही हैं हँसी की अनगिनत लड़ियाँ
केशर की क्यारियाँ महक रही हैं

याद आ गई वह बहन
जो होती तो सारी दिशाओं को नचाती अपने साथ

जिसका पता नहीं चला
गंगा समेत सारी गहराईयाँ छानने के बाद भी...

और बहन की शादी में यह भाई
भीतर-भीतर पुलकता
मगर मेंड़ पर संभलता, चलता-सा भी

कुछ-कुछ निर्भार
मगर बगल का फूल तोड़े जाने के बाद पत्ते-सा
श्रीहीन...

Friday, February 8, 2013

क्या नर्क से भी बदतर हो गई थी उनकी खेती



किसान और आत्महत्या

-हरीश चन्द्र पांडे


उन्हें धर्मगुरुओं ने बताया था प्रवचनों में
आत्महत्या करने वाला सीधे नर्क जाता है
तब भी उन्होंने आत्महत्या की

क्या नर्क से भी बदतर हो गई थी उनकी खेती

वे क्यों करते आत्महत्या
जीवन उनके लिए उसी तरह काम्य था
जिस तरह मुमुक्षुओं के लिए मोक्ष
लोकाचार उनमें सदानीरा नदियों की तरह
प्रवहमान थे
उन्हीं के हलों के फाल से संस्कृति की लकीरें
खिंची चली आई थीं
उनका आत्म तो कपास की तरह उजार था
वे क्यों करते आत्महत्या

वे तो आत्मा को ही शरीर पर वसन की तरह
बरतते थे
वे कड़ें थे फुनगियाँ नहीं
अन्नदाता थे, बिचौलिये नहीं
उनके नंगे पैरों के तलुवों को धरती अपनी संरक्षित
ऊर्जा से थपथपाती थी
उनके खेतों के नाक-नक्श उनके बच्चों की तरह थे

वो पितरों का ऋण तारने के लिए
भाषा-भूगोल के प्रायद्वीप नाप डालते हैं
अपने ही ऋणों के दलदल में धँस गए 
वो आरुणि के शरीर को ही मेंड़ बना लेते थे
मिट्टी का
जीवन-द्रव्य बचाने
स्वयं खेत हो गए

कितना आसान है हत्या को आत्महत्या कहना
और दुर्नीति को नीति

Thursday, February 7, 2013

नया साल मुबारक हो अंकल



नया साल मुबारक हो

-
हरीश चन्द्र पांडे

नया साल मुबारक हो
झाड़ियों के उलझाव से
बाहर निकलने की कोशिश में
बैलों के गले में बंधी घंटियां बोल उठीं
नया साल मुबारक हो

बिगड़ी गाड़ी को
बड़ी देर से ठीक करने में जुटा मैकेनिक
गाड़ी के नीचे से उतान स्वरों में ही बोला
नया साल मुबारक हो

बरसों से मंगली लड़का ढूंढते-ढूंढते परेशान मां-बाप को देख
नीबू के पत्ते की नोक पर ठिठकी
जनवरी की ओस ने कहा
नया साल मुबारक हो

कल बुलडोज़र की आसानी के लिए
आज घर को चिह्नित करते कर्मचारी को देख
घर का छोटा बच्चा दूर से ही बोला पंचम में
नया साल मुबारक हो अंकल
नया साल मुबारक हो …

Wednesday, February 6, 2013

पत्थर नहीं एक पहाड़ पूजा जाएगा अब



कबीर

-
हरीश चन्द्र पांडे

१.

सामने छात्रगण
गुरु पढा रहे हैं कबीर

सूखते गलों के लिए
एक काई लगे घड़े में पानी भरा है

गुरु पढ़ा रहे हैं कबीर
बीच बीच में घड़े की ओर देख रहे हैं

बीच-बीच में उनका सीना चौड़ा हुआ जा रहा है

२.

कौन जाएगा मरने मगहर
सबको चाहिए काशी अभी भी
मगहर वाले भी यह सोचते हुए मरते हैं सन्तोष से

वे मगहर में नहीं
अपने घर में मर रहे हैं

३.

इतनी विशालकाय वह मूर्ति
कि सौ मज़दूर भी नहीं सँभाल पाये
उसे खड़ा करना मुश्किल

पत्थर नहीं
एक पहाड़ पूजा जाएगा अब

४.

एक नहीं
दसियों लाउडस्पीकर हैं
एक ही आवाज़ अपनी कई आवाज़ों से टकरा रही है
पखेरू भाग खड़े हुए हैं पेड़ों से
अब और भी कम सुनाई पड़ता है ईश्वर को

५.

जब केवल पाँच प्रश्न हुआ करते थे हल करने को
अनिवार्य थे कबीर
आज अनगिनत प्रश्न हैं