अविनाश
अरसा हुए, ब्लॉगिंग से कटे। कल दिलीप मंडल जी के फोन से कबाड़खाने पर चल रही बहस के बारे में ख़बर मिली। पूरी बहस देखे बिना ही मैंने उनसे कहा कि मसला गंभीर है - लेकिन उदय प्रकाश जी की दलील सुननी चाहिए। उदय प्रकाश जी ने दलील दी भी है, ऐसा उन्होंने बताया। पर वह संतोषजनक नहीं है। शाम में उदय प्रकाश के प्रिय और हमारे मित्र विश्वदीपक से आजतक के दफ्तर में मुलाक़ात हुई, तो उन्होंने डीटेल्स दी। कहा कि उदय प्रकाश जी ने बात की है, लेकिन वे मूल मसले से कट गये हैं। मसला ये कि वो कौन-सी मजबूरी रही कि योगी आदित्यनाथ के हाथों उन्हें पुरस्कार लेना पड़ा।
तो ख़बर ये है कि जुलाई 2009 के पहले हफ्ते में गोरखपुर में उन्होंने योगी आदित्यनाथ के हाथों पहला नरेंद्र स्मृति सम्मान पाया। सम्मान पाना बड़ी बात नहीं है। उदय प्रकाश हमारे समय के बड़े लेखक हैं - और यक़ीनन किसी भी सम्मान से बड़े। कई बार ऐसा होता है कि बड़ा लेखक बड़े सम्मान की जगह छोटे सम्मान को अपने से मोहब्बत करने वालों का मान रखने के लिए गहरी उदारतापूर्वक ग्रहण कर लेता है। हम मान सकते हैं कि नरेंद्र स्मृति सम्मान ऐसी ही कोटि का सम्मान रहा होगा। लेकिन योगी आदित्यनाथ? वह तो दलित और मुस्लिमविरोधी शख्सीयत के रूप में प्रचारित है और यह प्रचार कतई झूठा भी नहीं है। ऐसे योगी के साथ एक सार्वजनिक मंच पर खड़े होने का दुस्साहस भी उदय प्रकाश जी ने कैसे किया - यह हम जैसे उदय प्रकाश के प्रशंसकों के लिए एक दुख का प्रसंग है, क्षोभ का प्रसंग है।
क्या इस मंच शेयरिंग को हम उदय प्रकाश जी की महानता के रूप में देखें? या उन प्रशंसकों की आत्माओं पर हमले के रूप में देखें - जो उदय प्रकाश जैसे लेखकों को अपना आदर्श मानते रहे हैं? हज़ारों मुसलमानों का क़त्ल करने वाले योगी के साथ खड़े होने की पारिवारिक दुविधा और मजबूरी का तार्किक पक्ष भला क्या हो सकता है? नहीं हो सकता है, इसलिए उदय प्रकाश जी ने उस तर्क को रचा भी नहीं है बल्कि इस मसले की आड़ में खुद की हो रही आलोचना को समाज और साहित्य में जातिवादी गंठजोड़ की साज़िश बता कर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की है। हमारी सदिच्छा भी है कि ये मामला रफा-दफा हो जाए और उदय प्रकाश हमारे लिए उतने ही बेदाग़ बनें रहें - जैसा कि वे रहे हैं। पर लेखकीय हठ इसके आड़े आ रहा है। आत्मस्वीकार एक बड़ा हथियार हो सकता था उदय जी के बेदाग़ बने रहने में - पर वे इससे बच रहे हैं। पटना में नब्बे के दशक में ग़रीब-मज़लूमों के नरसंहारों के दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव से पुरस्कार लेने के बाद बाबा नागार्जुन ने उन्हें दम भर गाली देकर खुद को पवित्र किया था।
बहरहाल, मेरे लिए विस्मयकारी प्रसंग ये है कि जो लेखक महाराष्ट्र के अमरावती में दलित आंदोलनकारियों के बीच नायक की तरह सम्मान पाता है, वह उत्तर भारत में एक दलित और मुसलमान विरोधी खलनायक के साथ खड़ा नज़र आता है! क्या कुछ हज़ार किलोमीटर की यात्रा में विचार और चिंतन का भी कायांतरण हो जाता है? नहीं ऐसा संभव नहीं है। मुझे तो नहीं लगता। यह सब झूठ है, जो लिखा जा रहा है। अख़बार की वो कटिंग भी झूठ है, जो कबाड़खाने पर चिपकायी गयी है। जितने लोगों ने लिखा है - सब झूठ है। एक सच की प्रतीक्षा में मैं खूब रोना चाहता हूं...
...आइए हम, उदय प्रकाश के प्रशंसक, अपने आंसू बहा कर अपने लेखक की तरफ से प्रायश्चित करें।