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Wednesday, March 25, 2015

एक क़स्बे की कथाएँ - 4



जल के असंख्य नाम होते हैं. मेरे एक परम सखा के भी ऐसे ही असंख्य नाम हैं. कोई तीसेक साल पहले एक दफा होली के मौसम में उन्होंने बाबा तम्बाकू के टीन के डिब्बे में छेद कर और उस छेद में से घासलेट में भीगी सुतली को गुजारकर पागल कुत्ते की आवाज़ निकालने वाली मशीन का आविष्कार किया था. इस मशीन की मदद से वे अपने घर के बाहर से गुजरने वाले हर आदमी, विशेषतः बूढ़ों के प्रति अपने सीजनल अनुराग का प्रदर्शन किया करते. अपनी पीठ पीछे अचानक आ धमके पागल कुत्ते की आवाज़ सुनकर बूढ़े धरती से कोई डेढ़ फुट हवा में उछल जाते थे. भाग्यवान बूढ़े धरती माता की शरण में पहुँच जाया करते और जो कम भाग्यवान होते उन्हें केवल अपने चेहरे पर आ गए खौफ़-ए-अज़ल भर से काम चलाना पड़ता था. 

इसमें मेरे मित्र का और मित्र के अनुसार बूढ़ों का खूब मनोरंजन होता था. उनका विचार था कि हमारे जीवन में और ख़ासतौर पर रिटायर्ड लोगों के जीवन में स्वस्थ मनोरंजन की बहुत कमी है. यही उनका स्थाई दर्द था और कुत्ता मशीन बनाने की प्रेरणा. इस महामना कर्म के एवज़ में उन्हें आसपास के मोहल्ले तक में सुतली नंगा और उनके शिष्यटोले में सुतली उस्ताद के नामों से संबोधित किये जाने का एज़ाज़ हासिल हो गया.

जब हमारे मोहल्ले में पान-बीड़ी की पहली दुकान खुली तो उसका उद्घाटन मेरे इन्हीं मित्र के हाथों हुआ. हाईस्कूल के इम्तहान में चौथी दफ़ा असफलता मिलने के बाद मेरे एक और सखा नब्बू डीयर, जिनकी जीवनगाथा मैं फिर कभी लिखूंगा, ने लगातार फेलियर कहे जाने के सुख का मोह त्यागकर इस दुकान को खोला था. दुकान सरकारी नर्सरी में आई आम की पेटियों से निकली फंटियों और सरकारी नर्सरी के ही साइनबोर्डों इत्यादि पदार्थों से बनाया गया इस कार्य में लगने वाली मेहनत के लिए नर्सरी के चौकीदार को भागीदार बनाने का काम सुतली उस्ताद ने ही किया था क्योंकि चौकीदार की निगाह में सुतली ही मोहल्ले का इकलौता शिक्षित और सभ्य इंसान था जो बिना फीस लिए उसके इकलौते बच्चे को पढ़ाया करता था. यह अलग बात है कि उसका बच्चा सातवीं में दो साल से फेल हो रहा था. उद्घाटन कार्यक्रम सुतली उस्ताद से ही कराये जाने की शर्त पर ही चौकीदार ने दुकान-निर्माण में योगदान दिया था.

तो बिना छत कीनब्बू डीयर की दुकान के उदघाटन की रस्म के तौर पर जब सुतली ने फ़ोकट कैपिस्टन का पहला सुट्टा खींचा, उनके नाम के आगे सुट्टन की उपाधि लग ही जानी थी. अगले सात माह तक नब्बू डीयर सुतली को फिरी-फ़ोकट कराता रहा. शनैः शनैः सुतली ने स्वाध्याय से चरस पीने में पीएचडी हासिल कर ली और इस शोध में नब्बू डीयर को अपना रिसर्च असिस्टेंट बनाया. सुतली चरस के सेवन से पहले घर पर खाना भकोस कर आता था जबकि नब्बू डीयर के घर हर बखत फाके चला करते. अंततः जीवन से विरक्त होकर दुकान को एक रात आग के हवाले कर नब्बू डीयर संन्यासी बन गया अर्थात घर से भाग गया. कोई कहता वह गोपेश्वर चला गया है कोई कहता उसने मुरादाबाद में एक्सपोर्ट का काम शुरू कर दिया है. नब्बू की अम्मा अलबत्ता कुछ नहीं कहती थी, पुत्र के नाम का ज़िक्र चलते ही अपनी आँखों के कोरों पर अपनी मैली धोती चिपका लेती. नब्बू-पलायन प्रकरण के बाद चरस ठूंसने की समर ट्रेनिंग कर रहे नए छोकरों की निगाह में सुतली ईश्वर हुआ चाहते थे. नब्बू की जली हुई दुकान के खंडहरों पर बड़े बड़े पत्थरों की सुरक्षित आड़ में उन्होंने एक मंदिर का निर्माण किया जिसे सुट्टन चरस के आस्ताने के नाम से ख्याति मिली.

इस तरह अच्छे भले जमुनादत्त पुत्र गंगादत्त को पहले सुतली नंगा फिर सुतली उस्ताद और फिर सुट्टन चरस के नाम दे दिए गए. हमारे देश का इतिहास गवाह है महापुरुषों की सर्जना ऐसे ही होती रही है.

पढ़ाई और कामधाम के चक्कर में मेरा हल्द्वानी से सामान बंध तो गया लेकिन मन यहीं रमा रहा. चिठ्ठी-फोन इत्यादि से मालूम पड़ता था सुतली ने पहले चरस और उसके बाद लकड़ी की तस्करी में हाथ डाला. इस दूसरे काम ने उसे क्रमशः सुतली लठ्ठ, सुतली फर्री, सुतली जड़िया, सुतली धरमकाँटा, सुतली लेलेण्ड और सुतली जंगलात जैसे नामों से विभूषित किया. हल्द्वानी में निर्माण कार्य की धूम मचना शुरू हुई तो पूर्ववर्ती धंधों में अटैच्ड रिस्क से निजात पाने की नीयत से उसने रेता बजरी की खदानों में हाथ आज़माया. यहाँ अकूत धन था और सुतली के पास उसे कमाने की कूव्वत. एक बड़ा सा प्लाट खरीदकर सुतली गौला नदी के उस पार जा बसा और दुनिया उसे सुतली गारा कहने लगी. सुतली गारा से वापस श्री जमनादत्त पुत्र स्व. श्री गंगादत्त बनने में सुतली ने सबसे मुफीद हिन्दुस्तानी दांव खेला. ज़मीन का धंधा और जनसेवा. यह दांव भी सदा की तरह निशाने पर लगा और नियतिचक्र ने सुतली को पहले अमीर आदमी फिर ग्राम प्रधान और बाद में ब्लॉक सदस्य बनवा दिया. सुतली नाम से उसे लोग अब सामने से नहीं बुलाते थे. उसमें सुतली के क्रोधित हो जाने का भय था और सुतली अब वह पुराना आविष्कारक भर नहीं रहा था जो घासलेट में सुतली डुबोकर तम्बाकू के खाली डिब्बे से पागल कुत्ते की आवाज़ निकालता था. सुतली को नागरों और ज़माने ने हल्द्वानी के सबसे संपन्न और आदरणीय लोगों में प्रतिष्ठित कर दिया था.

मेरा सुतली से सीधा संपर्क लम्बे समय तक कटा रहा था और हमारे बीच जैसा कि मुहावरे में कहा जाता है पुल के नीचे से भतेरा पानी बह चुका था. तो कहने का मतलब यह है कि जब मैंने हल्द्वानी लौटने का फैसला किया तो इससे यह साबित नहीं होता था कि सुतली इतने सालों से मेरी बाट जोह रहा था. वह मेरी स्मृति के उन गुप्त तहखानों में जा बसा था जहां खुद मैं भी बहुत मेहनत कर के ही पहुँच सकता था. इसके अलावा यह भी बात थी कि वह मेरी किसी भी तात्कालिक आवश्यकता का हिस्सा भी नहीं था. हमारे रास्ते अलग हो चुके थे.

कोई दो साल पहले घर पर घंटी बजी तो सुतली को आया देख मुझे हैरानी और खुशी दोनों का मिलाजुला अनुभव हुआ. मैं उसे तकरीबन पच्चीस सालों बाद सशरीर देख रहा था. हाल ही में स्थानीय अखबार में उसकी एकाधिक बार फ़ोटो मुझे दिखी थी लेकिन वह इतना बदल गया होगा मुझे उम्मीद न थी. उसने उम्दा काट के कपड़े पहने हुए थे, तनिक मुटा गया था और पहली निगाह में सम्मानीय समझे जाने लायक लग रहा था. हम गले मिले उसने माँ की खबर पूछी, तीन साल पहले गुज़र गए पिताजी की फ़ोटो को स्पर्श कर प्रणाम किया. हमने बहुत देर तक अपने मोहल्ले के नब्बूडीयर युग को याद किया और भरसक नोस्टाल्जिक होते रहे. हमने दिन का खाना भी साथ खाया. वह लौटने के मूड में नहीं लगता था. धीरे धीरे मेरे बिस्तर पर लुढ़क गया और बाकायदा दो घंटे सोता रहा.

शाम हो गयी थी. वह उठकर दो कप चाय सूत चुका था और अब बोतल खोलने का प्लान बना रहा था. मुझे लगा उसके बच्चे बाहर गए होंगे और उसने समय काटने की नीयत से मेरे घर का रुख किया होगा. वरना उसका मुझसे क्या काम. मैं अनमना सा उसके साथ बाहर जाने को तैयार होने लगा तो वह अभी आया पंडितकहकर बाहर चला गया.

यार आज बच्चों ने ये दिला दिया हैकहते हुए उसने अचानक कमरे में एंट्री ली और अपने साथ गाड़ी से निकाल कर लाये झोले के भीतर से चमचमाता लैपटॉप निकालते हुए कहा. मुझे गश आते-आते बचा.

कैसा है?” उसके चेहरे पर किसी महंगी चीज़ पर पैसे खर्च कर देने का कोई भी भाव नहीं था.

अच्छा बुरा तो छोड़ सुतली लेकिन ये बता यार तू इसका करेगा क्या. वो भी इस उमर में.

अरे यार पंडित, पढ़ाई के लिए बेटा दिल्ली भेज रखा है पिछले महीने से. वाइफ भी उसी के पास है. फोन करता हूँ तो बेटा कहता है पापा फेसबुक किया करो फेसबुक किया करो. वाइफ कहती है मैं कर लेती हूँ तो तुमसे कैसे नहीं होता फेसबुक. अब हमने बखत में कोई पढ़ाई कर रखी होती तो करते ना साले फेसबुक ... बाबू ने शादी भी साली एम ए पास से करा दी हुई यार पंडित. क्या लाटापंथी है साली ...

चेहरे पर गोपनीयता का भाव लाते हुए वह फुसफुसाया मुझे कम्प्यूटर सिखा दे यार पंडित. मना मती करियो भाई.

यह मेरे लिए बहुत ज़्यादा बड़ी डोज़ हो गयी थी सो रात की हत्या करने के लिए पूरी बोतल निबटाने से बेहतर कोई रास्ता था भी नहीं.

अगले दिन से मैं सुतली के इस नवीनतम साइबरावातार के चक्करों में लिपझ गया. पहले तो उसे ढंग से माउस पकड़वाना सिखाने में दिन भर की ऐसी-तैसी हुई फिर वह सीधे पोर्नोग्राफी डाउनलोड करने के तरीके सीखने पर आ गया. मेरे झिड़कने पर उसने पोर्नोग्राफी का आइडिया पोस्टपोन कर दिया और ताश के पत्तों वाले खेल में दूसरे ही दिन महारत हासिल कर ली. वह सुबह दस बजे मेरे दरवाज़े पर होता और गलत नहीं कहूँगा उसकी यह कर्मठताभरी जिद मुझे अच्छी लगने लगी थी. मैंने अपने भीतर के अध्यापक को झकझोर कर जगाया और जी जान से सुतली को बिल गेट्स बनाने में जुट गया. दिन भर तल्लीन होकर कम्प्यूटर पर हाथ साफ़ करने में सन्नद्ध सुतली को देखते मुझे लगने लगा था जैसे इतने सालों में उसके बारे में सुनी गयी सारी बातों में कोई सच्चाई नहीं थी. उसके फोन भी बहुत कम आते थे. जो आते भी थे उन्हें वह घर के बाहर जाकर अटैंड करता था और वापस आकर पहले से अधिक उत्साह से इस नवीन ज्ञान की बारीकियां समझने की कोशिश करता.

चौथे दिन जब वह ठीकठाक ऑपरेट करने लगा तो मैंने उसे फेसबुक दिखा कर उसका अकाउंट बनवा दिया.
पांचवे दिन मुझे बाहर जाना था. सुतली चौबीस घंटों में एक्सपर्ट फेसबुकिया बन चुका था और उसके फ्रेंड्स में उसके बीवी बच्चों के अलावा मेरी भी एंट्री हो चुकी थी. वह तीसेक लोगों की लिस्ट में शुमार था.

मेरे लौटने में कोई तीन सप्ताह लगे. दो एक बार सुतली का फोन आया. लेकिन औपचारिकता वाला ही. मैं पूछता फेसबुक कैसा चल रहा है सुतली गुरु?” तो वह मुदित होकर कहता चीज तो अच्छी बनाई यार अमरीकावालों ने. कल बेटे ने वाइफ के साथ पिक्चर देखी तो उसकी फ़ोटो देखने को मिल गयी. सही चीज़ है पंडित यार.

एक दिन उसने अपनी सेल्फी अपलोड की. दो घंटे बाद दूसरी. अगले दिन पूरा अल्बम था दो साल पुरानी गोवा यात्रा का. प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ उसकी एक फ़ोटो पर पैंतालीस लाइक्स आये. एमएपास बीवी की स्कर्ट वाली फ़ोटो लगाई तो उस पर दो सौ से ऊपर. फ़ोटो उसने हटा दिया. फ्रेंड लिस्ट में उसे जाननेवाले अब पांच सौ हुआ चाहते थे.

फिर मैं लौट आया. सुतली अगले छः माह तक नज़र नहीं आया. अखबारों में उसकी नियमित फ़ोटो लगती. एक दफा उसने नगरपालिका लाइब्रेरी की बदहाली को लेकर इंटरव्यू दिया था तो एक दफा उसे पुलिस ने शांतिभंग की आशंका में हिरासत में ले लिया था.

फेसबुक पर उसकी अपडेट्स बेहद बेसिक और भोली होती थीं. उनकी संख्या अलबत्ता अब कम होती जा रही थी.

यार पंडित फेसबुक पे लोगों को टैग कैसे करते हैं?” छः महीने के अंतराल पर उसका फोन आधी रात के बाद आया. वह बेतरह हंस रहा था और पार्श्व की गूंजें बता रही थीं कि वह अपनी मंडली के साथ पार्टी कर रहा है.

एक माह बाद मैंने अखबार में उसकी फ़ोटो देखी. जेल में था सुतली. एसडीम को धमकाने के आरोप में.
फिर सुतली बाहर था. सुतली पर मुकदमा चल रहा था. सुतली का बेटा नशेड़ी हो गया था पूना में उसका इलाज चल रहा था. सुतली ने हमारे मोहल्ले में स्कूल की बिल्डिंग खरीद ली थी और वह उसे बैंकेट हॉल में बदलने ला रहा था.

सुतली एक दिन मिल ही गया. एक शादी थी. वह अपने असल चरित्र में था. काला चश्मा, कमर में पिस्तौल वाली चमड़े की पेटी, ००७ नंबर की लम्बी गाड़ी और चमचों की बारात.

अरे पंडित गुरु, क्या हाल!उसने उत्साहपूर्वक मुझे गले लगाया.

बस ठीक है यार सुतली. तू बता कैसा चल रहा है तेरा फेसबुक.

अरे छोड़ यार, तू बता माँ कैसी हैं आजकल? मैं जल्दी आ रहा हूँ रस-भात खाने. उनके हाथ का स्वाद उस दिन से भूला कौन साला है यार पंडित.

हमें तू-तड़ाक करता देख उसके चमचों के चेहरों पर मेरे लिए थोड़ी सी तात्कालिक इज्ज़त भभक आई.

उसकी गाड़ी के भीतर हम अपना दूसरा पैग खींच रहे थे जब वह अचानक बोला साली फेसबुक ने जीना हराम कर दिया यार. आधी आधी रात पैन्चो फोन में टुणुन्ग टुणुन्ग. सुबह हगने जाओ तो साली फोन में टुणुन्ग टुणुन्ग. इसका फ़ोटो देखो उसकी फ़ोटो देखो. बीजेपी वाले की लाइक करो तो साले कांग्रेसी नाराज़. कांग्रेसी की लाइक करो बीजेपी वालों की पिछाड़ी में चरस. बेटे ने अलग अपनी साली फ़ोटो लगा लगा के दिक कर रखा था. साले हाथ भर के हुए नहीं गर्लफ्रेंड के साथ बीयर सूत रहे हैं बाप के पैसों से. हमें गधा समझा है साला. फेसबुक पे सब दिख जाता है. बड़ी दिक्कत है यार पंडित. चल खींच ना! एक और ठोकते हैं.

माह भर बाद उसका फिर से फोन आया पंडित यार फेसबुक बंद कैसे करते हैं.

अबे हुआ क्या सुतली बाबू?”

कुछ नहीं यार. बड़ी कुत्ती चीज़ है साली फेसबुक. इतना टाइम बर्बाद होता है दिनमान भर. पिछली दीवाली पे दारू पी के साला वो वाइफ के फादर को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी एक दिन. उसका अकाउंट भी वाइफ ने ही बनाया था. वाइफ भी वहीं थी उन दिनों देहरादून. बुड्ढा निकला रंगीला सायर. रोज़ सुबह से आधी रात तक हर दस मिन्ट में पैन्चो एक सायरी. लाइक करो तो आफ़त. न करो तो आफ़त. वाइफ अलग नाराज़. आपने पापा की सायरी लाइक नहीं की. अबे खच्चर हैं साले यार हम कोई. फोन में साली हर बखत टुणुन्ग टुणुन्ग. आज बुड्ढे ने परिवार की फ़ोटो लगाई हैं. मेरी भी है एक. जेल से बाहर निकलते हमारे जामाता ये लिख के टैग किया है साले ने.

इस वाकये को साल बीतने आया. कहाँ हो सुतली उस्ताद?

एक क़स्बे की कथाएँ - 3

फेसबुक पर दो दिन पहले मैंने अपने शहर हल्द्वानी के कुछ किस्से लगाना शुरू किया है. अभी इनका क्या बनेगा, ऐसी कोई ठोस सूरत इस विचार ने नहीं ली है. फिलहाल उन्हें यहाँ भी शेयर कर रहा हूँ –



त्रिपाठीजी मेरे पड़ोसी हुआ करते थे कोई दो साल पहले तक. भारत सरकार के अधिकारी. सामान्य सरकारी अधिकारी की तरह उनकी कोई विशेष पहचान न थी. विशेष पहचान बनाने के लिए सरकारी अधिकारी को या तो परम भ्रष्ट होना होता है या मूर्ख समझे जाने की हद तक ईमानदार.

खैर.

दस साल के उनके छोटे बेटे गौतम उर्फ़ पिंटू से मेरा गहरा याराना था - बावजूद इस तथ्य के कि हमारी उम्रों में कोई पैंतीस साल का फर्क था. पिंटू का एक बड़ा भाई भी था अनिमेष.

अनिमेष का घर का कोई नाम नहीं था. नवीं का छात्र था और एक दफा मोटरसाइकिल की जिद पूरी न होने पर तीन दिन तक घर में बिना खाए-पिए विरोध प्रदर्शन कर चुका था. इस विरोध प्रदर्शन का अंत उसके पापा द्वारा ज़मीन पर अपनी नाक रगड़ कर मोटरसाइकिल दिलाये जाने पर तब हुआ था जब लखनऊ से आई उनकी मौसियों ने उसे सोता देख अधमरा समझ लिया और बदहवास चीखना शुरू कर दिया था. 

मिसेज़ त्रिपाठी उस वक़्त कबाड़ी से रद्दी के भाव को लेकर आधे घंटे से झिकझिक में संलिप्त थीं. जीवन के मूलभूत अधिकारों जैसे रोटी के स्थान पर केवल पिज़्ज़ा और सब्जी के स्थान पर केवल गुलाटी या शमा के यहाँ का मुर्गा, मोबाइल फोन के केवल सबसे महंगे मॉडल की उपलब्धता, जब तक चाहें टीवी पर एकाधिकार, केवल प्यूमा की चप्पल, केवल नेस्ले का दही, केवल लीवाइस की जीन्स, केवल एप्पल के कम्प्यूटर और अन्य सभी केवलों के प्रति उसके घनघोर आग्रह और कबहूँ न छाड़ें खेत जैसी कर्मठता ने अनिमेष को मोहल्ले भर में पर्याप्त ख्याति दिला रखी थी. अनिमेष में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी, बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि इसकी उलट बात सच थी यानी मैं उसके किसी काम का न था.

त्रिपाठीजी बिचारे टाइप के भले आदमी थे, इसलिए उन्होंने समाज में अपना नाम बचाये रखने की नीयत से एकाध एडल्ट किस्म की शिकायतों के बाद घर पर इंटरनेट का कनेक्शन कटा दिया था और बड़े बेटे के तीन ट्यूशन दो कोचिंग लगा दिए. आलम यह था कि अनिमेष सुबह चार बजे पहली कोचिंग के बाद एक या दो ट्यूशन पढ़ कर स्कूल जाता फिर लौटकर आता तो घर पर दो ट्यूटर एक-एक कर आते. वह फिर कोचिंग जाता. दस बजे रात डिनर करता था अनिमेष. यदि उसे भूख लगी होती, तो.

यानी वह आधुनिक समाज का टीनेजर महामानव था कि इतना सारा कोचिंग-स्कूल-ट्यूशन करने के बावजूद उसके पास टीवी, फोन, पिज़्ज़ा, चिकन, प्यूमा, एप्पल और केवल अफवाहों में विद्यमान एक गर्लफ्रेंड वगैरह सबके लिए समय की इफरात रहती. मुझे लगता है उसका दिन अडतालीस या सौ घंटे का रहा होता होगा. मिसेज़ त्रिपाठी पड़ोस में कहीं कहती पाई जातीं - अनिमेष ना अपने पापा के लिए एक नया रेजर मंगाने को कहा रहा था कम्प्यूटर से. कितना तो टाइम लगाते हैं ये अपनी दाढ़ी सैट करने में. अनिमेष कह रहा था इस नए रेजर से टाइम बिलकुल नहीं लगता. मैंने इनका एटीम छुपा के दे दिया है उसको. आजकल बच्चे हमसे बहुत आगे का सोचने वाले हुए. अनिमेष कह रहा था ...

अनिमेष एक काम और करता था. उसे बात-बेबात पिंटू गुरु को धुनने का शौक था. पिंटू के सुतने की आवाजें अक्सर मोहल्लावासियों के कानों में पड़ा करतीं. यही मेरे और पिंटू के पास आने की वजह बना. उसका पिटते हुए क्रंदन करना मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. त्रिपाठीजी से मैंने एक दफा कहा कि पिंटू को मेरे पास भेज दिया करें. कुछ ग्रामर वगैरह पढ़ा दिया करूंगा. तो पिंटू एक दफा आया तो बस आता ही गया. शुरू में मुझे लगा पिंटू मेरे अनलिमिटेड इंटरनेट प्लान के लालच में मुझसे दोस्ती बढ़ा रहा था. ग्रामर वैसे भी बहाना भर थी. मुझे कोई ऐतराज़ भी न था. उसे स्कूल के प्रोजेक्ट्स बनाने होते थे, घर के इंटरनेटरहित कम्प्यूटर पर अग्रज का एकछत्र रहता था और मेरे कमरे की चीज़ें उसे लुभाती भी थीं.

पिंटू का दिमाग दुनिया भर की चीज़ों में मुब्तिला रहता और वह किसी भी तरह के सवाल पूछने से गुरेज़ न करता. ऐसे बच्चे मुझे अच्छे लगते हैं और उनसे मेरी खूब पट जाती है. एक दिन उसने मुझे बताया कि अनिमेष भैया सुबह कोचिंग जाते समय मम्मी से पचास रूपये मांग के ले जाता है हर रोज़. मोमो खाने के लिए.

सुबह चार बजे कोचिंग में जाने वाला बच्चा पचास रुपये के मोमो खा जाता है, यह मेरे लिए उतनी हैरानी की बात नहीं थी जितनी यह कि इतनी जल्दी मोमो मिलते कहाँ हैं. थोड़ी बहुत रिसर्च से पता चल गया कि हल्द्वानी में सुबह साढ़े तीन बजे से नालियों के ऊपर लगनेवाले कुछ अड्डों में ताज़े मोमो मिलने शुरू होते हैं जिनके ठेले सुबह छः सात बजे तक पहली पारी निबटा देते हैं. विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि तकरीबन कच्चे मैदे और सड़ी-गली सब्जियों और सस्ते मांस के कीमे से बनने वाले इस तिब्बती व्यंजन के हल्द्वानी-संस्करण को लेकर हल्द्वानी के टीनएजर-समुदाय में पोर्नोग्राफी और थिनर-चरस वगैरह से भी ज़्यादा क्रेज़ है.

खैर. इस नयी व्यवस्था में पिंटू पिटाई से बच जाता था और मेरा मन बहलाव हो जाता था. हमने शामों को अपने बरामदे में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया. एकाध बच्चे और आ जाया करते. ज़्यादा गर्मी पड़ने लगती तो हम स्क्रैबल खेलते. कैरम और शतरंज भी. पिंटू ने धीरे-धीरे मेरे घर से किताबे ले जाना शुरू कर दिया. उसने मेरा एस्टरिक्स और टिनटिन का पूरा संग्रह चाट डाला. बचपन से संजो कर रखी अमर चित्र कथाएँ भी. एन फ्रैंक की डायरी और लिटल प्रिंस तक उसे भाने लगी थी.

एक दिन उसके मुझे फुसफुसाते हुए बताया कि अनिमेष भैया की एक गर्लफ्रेंड है जिसे उन्होंने अपना मोबाइल फोन गिफ्ट कर दिया है. पापा के पूछने पर उसने खो गया है कह कर झूठ बोल दिया था.
एक दिन उसने यह भी बताया कि भैया की साइंस की किताब के बीच में पांच-पांच सौ के कुछ नोट छिपाकर रखे रहते हैं जिन्हें वह पापा के पर्स से निकाल लेता है जो अक्सर भरा हुआ होता है. शाम को पापा भैया से ही ड्रिंक्स बनवाते हैं और जब वे खूब हंसने लगते हैं तो अनिमेष उनके बाथरूम में टंगी उनकी पेंट की जेब से एक-दो या तीन नोट पार कर लाता है.

ये सब हमारे सीक्रेट्स थे जिन्हें किसी और को न बताना हमारी दोस्ती की पहली शर्त थी.

मई का महीना था जब वे एक शाम को मेरे पास बेहद चिंताग्रस्त चेहरा लिए आया. मेरे पूछने से पहले ही बोल पड़ा - पेपर में आया है परसों को दुनिया ख़त्म हो जाएगी.

मतलब?”

उसने बहुत संजीदा होकर बताया कि स्कूल और घर में भी इसी बारे में दिन भर बातें होती रही थीं. मेरा मन ठिठोली करने का हुआ.

अच्छा तो है न यार. सब ख़त्म हो जाएगा तो तुम्हें स्कूल नहीं जाना पड़ेगा. होमवर्क भी नहीं मिलेगा. पापा-मम्मी नाराज़ नहीं होंगे. भैया भी पीट नहीं सकेगा.

जितना संभव था मैं इस फिजूल की बात से उसका ध्यान हटाकर शतरंज खेलना चाहता था लेकिन उसे पक्का यकीन था कि दुनिया परसों को उजड़ जाने वाली है क्योंकि अखबार में आया है.

तो मैं भी मर जाऊंगा.

हां

और आप भी

हां

वह चुप हो गया तो मैंने फिर से उसे स्कूल, होमवर्क, पिटाई वगैरह से मुक्त हो जाने की संभावना से ललचाने की कोशिश की. लेकिन उसका मूड बिगड़ा हुआ था.

हम बरामदे में खड़े बातें कर रहे थे और सामने सड़क पर मोटरसाइकिल घर्राता हुआ रेबैन लगाए अनिमेष निकला, अपने पीछे महंगे डियोडरेंट का भभका छोड़ता हुआ. पिंटू उसे देर तक जाता हुआ देखता रहा. उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि अपने बड़े भाई को लेकर उसके मन में बेतरह गुस्सा और खीझ भरी हुई है.

दुनिया ख़त्म होते को थी और मैं उतना गंभीर नहीं हो रहा था जितनी उसे आशा थी. मैं ताड़ गया वह इसी वजह से उखडा हुआ था.

अब हमने डीटेल में दुनिया के विनाश की बातें करना शुरू कर दिया. जब जब अनिमेष और पड़ोस में रहनेवाले एक क्रूर गेंदप्रेमी बुढ्ढे और उसके सतत भौंकायमान कटखने कुत्ते की बात होती उसके मुंह पर कमीनी संतोषपूर्ण मुस्कराहट आ जाती. उसे अफ़सोस इतना ही हो रहा था कि वह स्पाइडरमैन की अगली पिक्चर नहीं देख पाएगा. मैंने पिछले हफ्ते उसके लिए स्पाइडरमैन का पोस्टर फ्लिपकार्ट से मंगवाकर गिफ्ट किया था. उसे तकलीफ हो रही थी कि वह ढंग से उस पोस्टर को देख भी नहीं सका है क्योंकि भैया उसे कमरे की दीवार पर लगाने की इजाज़त नहीं दे रहे.

दुनिया के साथ मम्मी-पापा के भी न रहने की बात उसे नहीं भाई लेकिन प्रलय तो प्रलय होता है. हमने कुछेक फिल्मों की बातें करनी शुरू कर दीं.

आधा घंटा बीतते न बीतते पिंटू सामान्य होकर किसी उस्ताद की तरह कैरम की गोटियाँ पिल कर रहा था और मुझे दो गेम हरा चुका था.

एक बात बता यार पिंटू, परसों को हम सब यहाँ नहीं होंगे. मर गए होंगे. मरने से पहले तेरी कोई आख़िरी इच्छा है क्या?”

वह कैरम छोड़कर फिर तल्लीन होकर सोचने लगा.

दो मिनट सोचकर कुछ झेंपता हुआ बोला आप पूरी कर पाओगे?”

देख लेंगे यार! देख लेंगे. पहले बता तो क्या है तेरी आख़िरी इच्छा.

मुझे मोमो खाने हैं."

कच्चे कीचड़ से बना कोई व्यंजन किसी के जीवन की अंतिम इच्छा हो सकता है, मेरी समझ से परे था. मैं हैरत से पिंटू को ताक रहा था.

"... खूब सारे मोमो!ध्यान से क्वीन कवर करने के बाद उसने बहुत गंभीर मुद्रा बनाकर अपनी अंतिम इच्छा पर मोहर लगाई.


(कथाकाल: मई २०१२)

Tuesday, March 24, 2015

एक क़स्बे की कथाएँ - 2

फेसबुक पर दो दिन पहले मैंने अपने शहर हल्द्वानी के कुछ किस्से लगाना शुरू किया है. अभी इनका क्या बनेगा, ऐसी कोई ठोस सूरत इस विचार ने नहीं ली है. फिलहाल उन्हें यहाँ भी शेयर कर रहा हूँ –


(एक क़स्बे की कथाएँ - 1)

हल्द्वानी के किस्से - 2

नैनीतालनिवासी मेरा एक मित्र अमरीका में नौकरी करता है. साल में एक दफ़ा अपने माता-पिता से मिलने यहां आता है. पिता सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, फ़िलहाल रिटायर हो चुके हैं.

दोस्त के आने की ख़बर सुनकर जाहिर है उस से मिलने उसके घर जाना होता था. अक्सर वह बिजली विभाग के किसी दफ़्तर गया पाया जाता था. और मुझे उसके लौटने तक उस के पिता से सौ बार सुना जा चुका 'रागदरबारी' के लंगड़-प्रकरण सरीखी उनकी एक संघर्षगाथा को पुनः सुनना पड़ता था.

रिटायरमेन्ट के समय मिली पीएफ़ की रकम से साहब ने हल्द्वानी में एक प्लॉट खरीदा ताकि बुढ़ापे के जाड़ों की धूप सेकने को अपना खुद का एक ठीहा बनाया जा सके. प्लॉट एक परिचित के माध्यम से खरीदा गया. परिचित के किसी चचेरे भाई के किसी दोस्त के किसी प्रॉपर्टी डीलर से सम्बन्ध थे. तो बिना देखे, हर किसी की भलमनसाहत पर भरोसा रखते हुए जो प्लॉट इन्हें मिला उसके बीचोबीच बिजली का ट्रान्सफ़ॉर्मर था.

रजिस्ट्री हो चुकी थी, पैसे का धुंआं निकल चुका था. तो पिछले तीन सालों से एक पखवाड़े के लिए घर आए मेरे दोस्त का ज़्यादातर समय बिजली विभाग के बाबुओं से अपने पिता द्वारा उक्त ट्रान्सफ़ॉर्मर को हटाए जाने सम्बन्धी आवेदन का स्टैटस मालूम करने में बीता करता था. कभी बड़ा साहब दौरे पर गया होता, कभी कोई अनापत्ति प्रमाणपत्र कम पड़ जाता.

"दिस कन्ट्री वुड नेवर इम्प्रूव! हू वान्ट्स टु कम टू दिस गटर! आई रादर टेक माई पेरेन्ट्स अलॉन्ग नैक्स्ट टाइम!" अमरीका से ही लाई सिन्गल माल्ट व्हिस्की के घूंट लगाता भारत महान को इसी तरह की लानतें-मलामतें भेजता मित्र किसी शुभ दिन अमरीका चला जाता और पिताजी का प्लॉट बमय ट्रान्सफ़ॉर्मर बना रहता.

यह बेहद इत्तफ़ाकन हुआ कि मेरा एक स्कूली सहपाठी एक पार्टी में टकरा गया जो बिजली महकमे में एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर बन कर पिछले ही हफ़्ते मेरे शहर पोस्टेड हो कर आया था. अमरीकावासी दोस्त के पिताजी को इस बात की भनक लगने में करीब दसेक दिन लगे और वे बड़ी आशा के साथ अपने शाश्वत बनते जा रहे विद्युतविभागीय दुख की फ़ाइलों का पुलिन्दा यह कह कर मेरे घर छोड़ गए कि बस मेरे दोस्त के एक दस्तख़त से उनका काम बन जाएगा.

अगले ही दिन करीब दस फ़ाइलों का वह पुलिन्दा ले कर मैं अभियन्तामित्र के दफ़्तर गया. उसने फ़ाइलें अपने मातहत किसी कर्मचारी को थमाते हुए कहा कि कामधाम तो होता रहेगा थोड़ा गपशप की जाए.
शाम को उसका फ़ोन आया कि उसने अपने असिस्टेन्ट इंजीनियर को साइट पर भेज कर रपट तैयार करवा ली है और इस काम में प्रार्थी को एक लाख उन्नीस हज़ार रुपये खर्च करने पड़ेंगे क्योंकि ट्रान्सफ़ॉर्मर हटवाने का काम बहुत पेचीदा होता है.

अमरीकावासी मित्र के पिता को बताया तो वे बोले यह रकम तो प्लॉट की कीमत से भी ज़्यादा है. अभियन्तामित्र से मैंने कुछ रियायत करने को कहा तो उसने खुद मौका मुआयना करने का आश्वासन दिया और हफ़्ते भर बाद उक्त रकम को तेईस हज़ार बनाने का चमत्कार कर दिखाया. यह समझौता किये जाने लायक रकम थी.

अगली सुबह जब अमरीकावासी मित्र के पिता रकम लेकर बिजली दफ़्तर पहुंचे तो दोस्त ने उनसे कहा कि अभी पैसा जमा करवाने की आवश्यकता नहीं. उसने यह सलाह भी दी कि फ़िलहाल वे पैसा मेरे पास छोड़ जाएं क्योंकि पता नहीं खम्भों का इन्तज़ाम कब हो जाए. तो साहब यह रकम भी मेरे पास छोड़ दी गई.

उसी शाम अभियन्तामित्र ने अपने घर खाने पर बुलाया. एकाध घन्टे की गपशप के बाद उसे अचानक कुछ याद आया. वह फुसफुसाते हुए बोला: "देखो ये तेरे बुढ़ऊ बहुत शरीफ़ आदमी हैं इसी लिए इनका काम नहीं बनता. अगर मैं इनके पैसे जमा करा लेता तो ऑफ़ीशियली भी इस काम में कम से कम एक साल लगना था. एक तो इनकी एप्लीकेशन अस्सीवें नम्बर पर होती फिर कब कहां से तार आते, कहां से खम्भे और लेबर कब फ़्री होती ... तो ... " उसने आंख मारते हुए कहा: "तेरे परिचित मेरे भी तो कुछ हुए न यार ... ऐसा है तू उनके दस हज़ार रुपए लौटा देना ... कल तक खेत से ट्रान्सफ़ॉर्मर हटा मिलेगा."

मैंने असमंजस और अविश्वास में उसे देखना शुरू किया ही था कि वह बोला: "देख भाई, चाहो तो काम अब भी वैसे ही करवा लो. मगर उसमें कागज़-पत्तर कम पड़े तो फिर अड़ंगा लग सकता है. और क्या पता चुनाव के बाद कहीं मेरा ट्रान्सफ़र हो गया तो! अब काम को ऐसे कराने में क्या हर्ज़ है ... देख, मैं अपना हिस्सा छोड़ रहा हूं ... पर दूसरे इंजीनियर हैं, लाइनमैन हैं, उन्होंने भी तो बच्चे पालने हैं न! और कागज़-पत्तर पर कुछ लिखत-पढ़त कराने की ज़िद न करें, बोल देना बुढ़ऊ को! फ़िज़ूल काम में अड़ंगा लगेगा."

अगली शाम तक वाकई काम हो चुका था. प्लॉट का ट्रान्सफ़ार्मर हट चुका था, सभी सम्बन्धित 'महोदय' और 'प्रार्थी' पार्टियां सन्तुष्ट थीं. तीन साल तक लंगड़ बनते बनते अमरीकावासी मित्र के पिता की गरदन और पीठ इस लायक नहीं बचे थे कि उन्हें दोबारा सीधा किया जा सके. खैर, जब मैंने उनसे फ़ाइलें वापस ले जाने के बाबत पूछा तो उन्होंने हिकारत से आसमान को देखते हुए कहा: "अरे बेटा खड्डे में डाल सालियों को."

अभियन्तामित्र ने इन फ़ाइलों को लेकर जो शब्द इस्तेमाल किए उन्हें यहां लिखा नहीं जा सकता. 

एक क़स्बे की कथाएँ - 1

फेसबुक पर दो दिन पहले मैंने अपने शहर हल्द्वानी के कुछ किस्से लगाना शुरू किया है. अभी इनका क्या बनेगा, ऐसी कोई ठोस सूरत इस विचार ने नहीं ली है. फिलहाल उन्हें यहाँ भी शेयर कर रहा हूँ –


हल्द्वानी के किस्से - 1

माँ ने आकर कहा "ज़रा देख तो, कोई आया है."

दरवाज़े पर थोड़ा सा परेशान लगता पैसठ-सत्तर साल का एक टिपिकल रिटायर्ड मध्यवर्गीय दिख रहा आदमी. कुछ कहने-पूछने से पहले ही बोला "ये डी पैंतीस नहीं मिल रहा." "ये डी पैंतीस ही है." मैंने कहा.

वह थोड़ा और परेशान हो गया. थोड़ा पूछताछ के बाद मालूम चला कि उसकी बेटी हमारे मोहल्ले के डी/35 में रहती है जहां आज उसके बच्चे का मुंडन संस्कार है. अब डी/35 मेरे घर का नंबर है. अच्छा खासा पसर जाने के बावजूद हमारे मोहल्ले में आज भी पड़ोसियों को हरेक छोटे-बड़े आयोजन में न्यौते जाने का रिवाज़ बना हुआ है. मैंने माँ से पूछा कि आज कहीं ऐसा कोई कार्यक्रम तो नहीं. उसे जानकारी नहीं थी.
मैंने भरसक सहानुभूति जताई कि हो सकता है उसकी बेटी ई/35 में रहती हो. उसे वहां जाने का रास्ता भी बता दिया.

दसेक मिनट बाद पाया कि वह फिर घर के बाहर की सड़क पर ही परेशान टहल रहा था. चेहरा बताता था वह अच्छा परेशान हो चुका. मुझे दया आ गयी.

बरामदे पर उसके लिए कुर्सी लगाई. साप्ताहिक कॉलम लिखने का जो काम मैं इमरजेंसी की हालत में कर रहा था, उसे किनारे रखा और बूढ़े की तकलीफ का समाधान खोजने की जुगत में लग गया.

दामाद एक आधुनिक बैंक में है. स्मार्टफोन पर उस बैंक हल्द्वानी का नम्बर खोजा. लैंडलाइन था. उठा नहीं. एकाध बैकर दोस्तों से पूछा फोन पर. कुछ नहीं.

इधर बूढ़ा उस रिक्शेवाले को कई बार गालियाँ दे चुका था जिसने उसे नहर के पास छोड़ने के बजाय क्रियाशाला के आगे छोड़ दिया था, वरना अपनी बेटी के घर तो वह कितनी बार जा चुका है वगैरह .
"आपके पास कोई फोन नंबर है?" - मैंने यह सवाल पहले पूछ लेना चाहिए था. उसे अपना नंबर याद था लेकिन फोन वह घर पर भूल आया था. शुक्र है नंबर याद था. घंटी मारी तो तीसरी कॉल पर उसकी बीवी ने उठाया. मैंने ज़रूरी सूचनाएं देकर बुढ़िया से कहा कि मेरे नंबर पर फोन करे. बीवी की आवाज़ ने उसे तात्कालिक राहत दिला दी थी. बूढ़े की बात भी कराई.

इधर माँ ने उसके लिए पहले पानी और फिर सेव-अंगूर पेश कर दिए. अंगूर टूंगता बूढ़ा अब आत्मकथात्मक मोड में आ गया था. बैंक में नौकरी करता था. २००४ में रिटायर हुआ. हल्द्वानी में मकान बना लिया है. कोई दोस्त नहीं है. टीवी कोई कितना देखे. सुबह-शाम वॉक करता है. एक बेटा अफ्रीका में कहीं है. बड़ी फैक्ट्री का मालिक है. छोटा इंजीनियर है गुडगाँव में. वहीं उसने दूसरा फ़्लैट खरीद लिया है, पहला फ़्लैट नोएडा में था ही. दामाद-बेटी-कुलीन ब्राह्मण-रिश्तेदार-भांग-घंटा-प्लाट वगैरह.

बीसेक मिनट बीत गए थे. बूढ़े की आत्मकथा समाप्त हो चुकी थी. बुढ़िया का फोन अब तक नहीं आया.
इधर माँ उसके लिए कॉफ़ी बना लाई.

फिर बुढ़िया को फोन लगाया. शायद ऐसा पहली बार हुआ था सो बुढ़िया के पास परिस्थिति से निबटने को कोई तात्कालिक स्ट्रेटेजी नहीं थी. मैंने उसकी बेटी का नंबर माँगा. यह भी मैंने बीस मिनट पहले कर लेना था.

बेटी ने दूसरी बार में फोन उठाया.

"येस" - फोन उठा. बेटी शायद हल्द्वानी के किसी पब्लिक स्कूल की मास्टरनी थी.

उसे बताया कि उसके पिताजी पौन घंटे से यहाँ भटक रहे हैं और यह भी कि मैं डी/35 से बोल रहा हूँ. वह भी डी/35 से बोल रही है - ऐसा उसने कहा.

वह हमारे अगले मोहल्ले से थी. यानी बूढ़ा गलत मोहल्ले में पहुँच गया था.

बेटी ने कहा वह किसी को स्कूटी से भेज रही है, मेरे मन में अब भी बूढ़े के लिए सहानुभूति बची हुई थी. सोच रहा था पिताजी ऐसे कहीं भटके होते तो!

पन्द्रह मिनट और बीत गए. बूढ़े ने अपनी जीवनगाथा रिपीट कर के सुनाई - इस बार दामाद-बेटी-कुलीन ब्राह्मण-रिश्तेदार-भांग-घंटा-प्लाट वगैरह पर ज़्यादा जोर था. इस रिपीट नेरेशन ने पहली बार मेरे भीतर उसके लिए नापसंदगी जैसी कोई चीज़ पैदा की. अब अपनी कल्पना में मैं उसे नौकरी के दौरान बैंक में आये गरीबों पर झींकता, चिल्लाता देख सकता था.

स्कूटी आ गयी. कलावा बांधे, तिलक लगाए बीसेक साल का गुटकाखोर एक मुटल्ला लौंडा था. लौंडे ने बूढ़े को देखा. बूढ़े ने लौंडे को. मैंने दोनों को देखा. बिजली की फुर्ती से बूढ़े ने उठकर गेट खोला. स्कूटी में बैठने से पहले बूढ़े लोगों को जितनी मशक्कत करनी पड़ती है उतनी करने में दो-तीन मिनट लगे. मैं गेट के बाहर सड़क पर खड़ा था.

यह विदा करने का समय था. आज के दिन के अच्छे काम के उपसंहार का समय.

लौंडे ने किक मारी, स्कूटी फुर्र. बूढ़े ने एक अक्षर बोलना तो दूर एक सेकेण्ड को भी पलट कर नहीं देखा. और दरअसल स्कूटी को देखने के बाद से उसके लिए मैं मर गया था. लौंडे से किसी तरह की थैंक्यू वगैरह की उम्मीद मुझे नहीं थी.

गेट बंद करता मैं कुर्सी, कप, प्लेट, संतरे के छिलके वगैरह देख रहा हूँ.

फिर एक बार गेट खोलता हूँ, सड़क पर निगाह मारता हूँ. स्कूटी पर एक तरफ को तनिक लटक सी गयी बूढ़े की पिछवाड़ी मोड़ पर ओझल होने को है.

गले में थूक भर गया है. मन माँ की गाली देने का कर रहा है.

(घटनाकाल: मार्च २०१५)